शान्ति पर्व · अध्याय 178
सियार रूपी इन्द्र और काश्यप
युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य का सच्चा आधार क्या है, और भीष्म प्रज्ञा को आधार बताकर ऋषि-पुत्र काश्यप की कथा सुनाते हैं, जो एक वैश्य के रथ से गिरकर प्राण त्यागना चाहता था। सियार का रूप धरे इन्द्र उसे समझाते हैं कि मनुष्य-जन्म और ब्राह्मणत्व दुर्लभ हैं, और हाथहीन, कीड़ों से खाया जाता सियार भी जीना चाहता है। वे बताते हैं कि तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती और अपने पूर्वजन्म की नास्तिकता से यह योनि मिली; तब काश्यप इन्द्र को पहचानकर उनकी पूजा करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.178.1)
बान्धवाः कर्म वित्तं वा प्रज्ञा वेह पितामह । नरस्य का प्रतिष्ठा स्यादेतत्पृष्टो वदस्व मे ॥
bāndhavāḥ karma vittaṃ vā prajñā veha pitāmaha | narasya kā pratiṣṭhā syādetatpṛṣṭo vadasva me
पितामह! इस संसार में मनुष्य का आधार क्या है—बान्धव, कर्म, धन या प्रज्ञा? पूछे जाने पर यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.178.2)
प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानां प्रज्ञा लाभः परो मतः । प्रज्ञा निःश्रेयसी लोके प्रज्ञा स्वर्गो मतः सताम् ॥
prajñā pratiṣṭhā bhūtānāṃ prajñā lābhaḥ paro mataḥ | prajñā niḥśreyasī loke prajñā svargo mataḥ satām
प्रज्ञा प्राणियों का आधार है, प्रज्ञा को सबसे बड़ा लाभ माना गया है; प्रज्ञा लोक में परम कल्याण है, और सज्जनों के लिए प्रज्ञा ही स्वर्ग मानी गई है।
श्लोक 3 (12.178.3)
प्रज्ञया प्रापितार्थो हि बलिरैश्वर्यसंक्षये । प्रह्लादो नमुचिर्मङ्किस्तस्याः किं विद्यते परम् ॥
prajñayā prāpitārtho hi baliraiśvaryasaṃkṣaye | prahlādo namucirmaṅkistasyāḥ kiṃ vidyate param
ऐश्वर्य नष्ट हो जाने पर बलि को प्रज्ञा ने ही उसके प्रयोजन तक पहुँचाया; प्रह्लाद, नमुचि और मङ्कि को भी। उससे बढ़कर और क्या है?
श्लोक 4 (12.178.4)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इन्द्रकाश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | indrakāśyapasaṃvādaṃ tannibodha yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं—इन्द्र और काश्यप का संवाद; हे युधिष्ठिर! उसे सुनो।
श्लोक 5 (12.178.5)
वैश्यः कश्चिदृषिसुतं काश्यपं संशितव्रतम् । रथेन पातयामास श्रीमान्दृप्तस्तपस्विनम् ॥
vaiśyaḥ kaścidṛṣisutaṃ kāśyapaṃ saṃśitavratam | rathena pātayāmāsa śrīmāndṛptastapasvinam
एक धनी और घमण्डी वैश्य ने कठोर व्रत वाले, ऋषि-पुत्र तपस्वी काश्यप को अपने रथ से गिरा दिया।
श्लोक 6 (12.178.6)
आर्तः स पतितः क्रुद्धस्त्यक्त्वाऽऽत्मानमथाब्रवीत् । मरिष्याम्यधनस्येह जीवितार्थो न विद्यते ॥
ārtaḥ sa patitaḥ kruddhastyaktvā''tmānamathābravīt | mariṣyāmyadhanasyeha jīvitārtho na vidyate
पीड़ित, गिरा हुआ और क्रुद्ध होकर, धैर्य छोड़कर वह बोला—‘मैं मर जाऊँगा; निर्धन के लिए यहाँ जीने का कोई प्रयोजन नहीं है।’
श्लोक 7 (12.178.7)
तथा मुमूर्षुमासीनमकूजन्तमचेतसम् । इन्द्रः सृगालरूपेण बभाषे क्षुब्धमानसम् ॥
tathā mumūrṣumāsīnamakūjantamacetasam | indraḥ sṛgālarūpeṇa babhāṣe kṣubdhamānasam
इस प्रकार मरने की इच्छा से चुपचाप, अचेत-सा बैठे हुए क्षुब्ध-चित्त उस ब्राह्मण से इन्द्र ने सियार का रूप धरकर कहा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 8 (12.178.8)
मनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः । मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति ॥
manuṣyayonimicchanti sarvabhūtāni sarvaśaḥ | manuṣyatve ca vipratvaṃ sarva evābhinandati
सब प्राणी सब ओर मनुष्य-योनि चाहते हैं, और मनुष्यों में सभी ब्राह्मणत्व का अभिनन्दन करते हैं।
श्लोक 9 (12.178.9)
मनुष्यो ब्राह्मणश्चासि श्रोत्रियश्चासि काश्यप । सुदुर्लभमवाप्यैतन्न दोषान्मर्तुमर्हसि ॥
manuṣyo brāhmaṇaścāsi śrotriyaścāsi kāśyapa | sudurlabhamavāpyaitanna doṣānmartumarhasi
हे काश्यप! तुम मनुष्य हो, ब्राह्मण हो और श्रोत्रिय हो। इस अत्यन्त दुर्लभ स्थिति को पाकर तुम्हें मूढ़तावश मरना उचित नहीं।
श्लोक 10 (12.178.10)
सर्वे लाभाः साभिमाना इति सत्यवती श्रुतिः । संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद्यदभिमन्यसे ॥
sarve lābhāḥ sābhimānā iti satyavatī śrutiḥ | saṃtoṣaṇīyarūpo'si lobhādyadabhimanyase
‘सभी लाभ अभिमान के साथ आते हैं’—यह श्रुति-वचन सत्य है। तुम्हारी दशा सन्तोष के योग्य है, फिर भी लोभ के कारण तुम उसका तिरस्कार करते हो।
श्लोक 11 (12.178.11)
अहो सिद्धार्थता तेषां येषां सन्तीह पाणयः । अतीव स्पृहये तेषां येषां सन्तीह पाणयः ॥
aho siddhārthatā teṣāṃ yeṣāṃ santīha pāṇayaḥ | atīva spṛhaye teṣāṃ yeṣāṃ santīha pāṇayaḥ
जिनके यहाँ हाथ हैं, उनके प्रयोजन कितने सिद्ध हैं! जिनके पास यहाँ हाथ हैं, उनसे मुझे अत्यन्त स्पृहा होती है।
श्लोक 12 (12.178.12)
पाणिमद्भ्यः स्पृहाऽस्माकं यथा तव धनस्य वै । न पाणिलाभादधिको लाभः कश्चन विद्यते ॥
pāṇimadbhyaḥ spṛhā'smākaṃ yathā tava dhanasya vai | na pāṇilābhādadhiko lābhaḥ kaścana vidyate
हाथ वालों के प्रति हमारी चाह वैसी ही है जैसी तुम्हारी धन के प्रति; हाथ पाने से बड़ा कोई लाभ नहीं है।
श्लोक 13 (12.178.13)
अपाणित्वाद्वयं ब्रह्मन्कण्टकं नोद्धरामहे । जन्तूनुच्चावचानङ्गे दशतो न कषाम वा ॥
apāṇitvādvayaṃ brahmankaṇṭakaṃ noddharāmahe | jantūnuccāvacānaṅge daśato na kaṣāma vā
हे ब्राह्मण! हाथ न होने से हम न काँटा निकाल पाते हैं, न शरीर पर काटने वाले तरह-तरह के जन्तुओं को खुजलाकर हटा पाते हैं।
श्लोक 14 (12.178.14)
अथ येषां पुनः पाणी देवदत्तौ दशाङ्गुली । उद्धरन्ति कृमीनङ्गाद्दशतो निकषन्ति च ॥
atha yeṣāṃ punaḥ pāṇī devadattau daśāṅgulī | uddharanti kṛmīnaṅgāddaśato nikaṣanti ca
पर जिनके दस उँगलियों वाले दोनों हाथ देव-प्रदत्त हैं, वे शरीर से कीड़ों को निकाल लेते हैं और काटने वालों को खुजलाकर हटा देते हैं।
श्लोक 15 (12.178.15)
वर्षाहिमातपानां च परित्राणानि कुर्वते । चेलमन्नं सुखं शय्यां निवातं चोपभुञ्जते ॥
varṣāhimātapānāṃ ca paritrāṇāni kurvate | celamannaṃ sukhaṃ śayyāṃ nivātaṃ copabhuñjate
वे वर्षा, ठण्ड और धूप से बचाव के साधन बनाते हैं; वस्त्र, अन्न, सुख, शय्या और वायु से सुरक्षित आश्रय का उपभोग करते हैं।
श्लोक 16 (12.178.16)
अधिष्ठाय च गां लोके भुञ्जते वाहयन्ति च । उपायैर्बहुभिश्चैव वश्यानात्मनि कुर्वते ॥
adhiṣṭhāya ca gāṃ loke bhuñjate vāhayanti ca | upāyairbahubhiścaiva vaśyānātmani kurvate
संसार में पशुओं पर अधिकार करके वे उनका उपभोग करते हैं और उनसे भार ढुलवाते हैं, और अनेक उपायों से दूसरों को अपने वश में कर लेते हैं।
श्लोक 17 (12.178.17)
ये खल्वजिह्वाः कृपणा अल्पप्राणा अपाणयः । सहन्ते तानि दुःखानि दिष्ट्या त्वं न तथा मुने ॥
ye khalvajihvāḥ kṛpaṇā alpaprāṇā apāṇayaḥ | sahante tāni duḥkhāni diṣṭyā tvaṃ na tathā mune
जो जीभ-रहित, दीन, अल्प-बल और हाथहीन हैं, वे वे दुःख सहते हैं; हे मुने! सौभाग्य है कि तुम वैसे नहीं हो।
श्लोक 18 (12.178.18)
दिष्ट्या त्वं न शृगालो वै न कृमिर्न च मूषकः । न सर्पो न च मण्डूको न चान्यः पापयोनिजः ॥
diṣṭyā tvaṃ na śṛgālo vai na kṛmirna ca mūṣakaḥ | na sarpo na ca maṇḍūko na cānyaḥ pāpayonijaḥ
सौभाग्य है कि तुम न सियार हो, न कीड़ा, न चूहा, न साँप, न मेंढक और न पाप-योनि में जन्मा कोई और प्राणी।
श्लोक 19 (12.178.19)
एतावताऽपि लाभेन तोष्टुमर्हसि काश्यप । किं पुनर्योऽसि सत्वानां सर्वेषां ब्राह्मणोत्तमः ॥
etāvatā'pi lābhena toṣṭumarhasi kāśyapa | kiṃ punaryo'si satvānāṃ sarveṣāṃ brāhmaṇottamaḥ
हे काश्यप! इतने ही लाभ से तुम्हें सन्तुष्ट होना चाहिए; फिर जब तुम सब प्राणियों में श्रेष्ठ ब्राह्मण हो, तब तो कहना ही क्या!
श्लोक 20 (12.178.20)
इमे मां कृमयोऽदन्ति येषामुद्धरणाय वै । नास्ति शक्तिरपाणित्वात्पश्यावस्थामिमां मम ॥
ime māṃ kṛmayo'danti yeṣāmuddharaṇāya vai | nāsti śaktirapāṇitvātpaśyāvasthāmimāṃ mama
ये कीड़े मुझे खा रहे हैं, और हाथ न होने से उन्हें निकालने की मुझमें शक्ति नहीं है; मेरी यह दशा देखो।
श्लोक 21 (12.178.21)
अकार्यमिति चैवेमं नात्मानं संत्यजाम्यहम् । नातः पापीयसीं योनिं पतेयमपरामिति ॥
akāryamiti caivemaṃ nātmānaṃ saṃtyajāmyaham | nātaḥ pāpīyasīṃ yoniṃ pateyamaparāmiti
फिर भी ‘यह अनुचित है’ ऐसा सोचकर मैं अपने को नहीं छोड़ता, कि कहीं इससे भी निकृष्ट योनि में न जा पड़ूँ।
श्लोक 22 (12.178.22)
मध्ये वै पापयोनीनां सृगालीयामहं गतः । पापीयस्यो बहुतरा इतोऽन्याः पापयोनयः ॥
madhye vai pāpayonīnāṃ sṛgālīyāmahaṃ gataḥ | pāpīyasyo bahutarā ito'nyāḥ pāpayonayaḥ
पाप-योनियों में मुझे सियार की योनि मिली है; इससे भी अधिक पापपूर्ण बहुत-सी और पाप-योनियाँ हैं।
श्लोक 23 (12.178.23)
जात्यैवैके सुखितराः सन्त्यन्ये भृशदुःखिताः । नैकान्तं सुखमेवेह क्वचित्पश्यामि कस्यचित् ॥
jātyaivaike sukhitarāḥ santyanye bhṛśaduḥkhitāḥ | naikāntaṃ sukhameveha kvacitpaśyāmi kasyacit
कुछ प्राणी जन्म से ही अधिक सुखी होते हैं, कुछ अत्यन्त दुःखी; मैं कहीं किसी को भी पूर्ण सुखी नहीं देखता।
श्लोक 24 (12.178.24)
मनुष्या ह्याढ्यतां प्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् । राज्याद्देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ॥
manuṣyā hyāḍhyatāṃ prāpya rājyamicchantyanantaram | rājyāddevatvamicchanti devatvādindratāmapi
मनुष्य धनी होकर राज्य चाहते हैं, राज्य से देवत्व और देवत्व से इन्द्रपद तक चाहते हैं।
श्लोक 25 (12.178.25)
भवेस्त्वं यद्यपि त्वाढ्यो न राजा न च दैवतम् । देवत्वं प्राप्य चेन्द्रत्वं नैव तुष्येस्तथा सति ॥
bhavestvaṃ yadyapi tvāḍhyo na rājā na ca daivatam | devatvaṃ prāpya cendratvaṃ naiva tuṣyestathā sati
यदि तुम धनी भी हो जाओ, तब भी न राजा बनोगे, न देवता; और देवत्व तथा इन्द्रपद पाकर भी उस दशा में सन्तुष्ट नहीं होगे।
श्लोक 26 (12.178.26)
न तृप्तिः प्रियलाभेऽस्ति तृष्णा नाद्भिः प्रशाम्यति । संप्रज्वलति सा भूयः समिद्भिरिव पावकः ॥
na tṛptiḥ priyalābhe'sti tṛṣṇā nādbhiḥ praśāmyati | saṃprajvalati sā bhūyaḥ samidbhiriva pāvakaḥ
प्रिय वस्तु पाने से तृप्ति नहीं होती; तृष्णा जल से शान्त नहीं होती। वह ईंधन से अग्नि की तरह फिर और भड़क उठती है।
श्लोक 27 (12.178.27)
अस्त्येव त्वयि शोकोऽपि हर्षश्चापि तथा त्वयि । सुखदुःखे तथा चोभे तत्र का परिदेवना ॥
astyeva tvayi śoko'pi harṣaścāpi tathā tvayi | sukhaduḥkhe tathā cobhe tatra kā paridevanā
तुम में शोक भी है और हर्ष भी; सुख और दुःख दोनों तुम में हैं—फिर विलाप कैसा?
श्लोक 28 (12.178.28)
परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् । मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥
paricchidyaiva kāmānāṃ sarveṣāṃ caiva karmaṇām | mūlaṃ buddhīndriyagrāmaṃ śakuntāniva pañjare
समस्त कामनाओं और कर्मों की सीमा बाँधकर, उनके मूल ज्ञानेन्द्रियों के समूह को पिंजरे में पक्षियों की तरह रोक लिया जाता है।
श्लोक 29 (12.178.29)
न द्वितीयस्य शिरसश्छेदनं विद्यते क्वचित् । न च पाणेस्तृतीयस्य यन्नास्ति न ततो भयम् ॥
na dvitīyasya śirasaśchedanaṃ vidyate kvacit | na ca pāṇestṛtīyasya yannāsti na tato bhayam
कहीं दूसरे सिर का कटना नहीं होता, न तीसरे हाथ का; जो है ही नहीं, उससे भय नहीं।
श्लोक 30 (12.178.30)
न खल्वप्यरसज्ञस्य कामः क्वचन जायते । संस्पर्शाद्दर्शनाद्वापि श्रवणाद्वापि जायते ॥
na khalvapyarasajñasya kāmaḥ kvacana jāyate | saṃsparśāddarśanādvāpi śravaṇādvāpi jāyate
जो स्वाद नहीं जानता, उसमें कहीं कामना उत्पन्न नहीं होती; वह स्पर्श से, दर्शन से या श्रवण से उत्पन्न होती है।
श्लोक 31 (12.178.31)
न त्वं स्मरसि वारुण्या लट्वाकानां च पक्षिणाम् । ताभ्यां चाभ्यधिको भक्ष्यो न कश्चिद्विद्यते क्वचित् ॥
na tvaṃ smarasi vāruṇyā laṭvākānāṃ ca pakṣiṇām | tābhyāṃ cābhyadhiko bhakṣyo na kaścidvidyate kvacit
तुम्हें मदिरा और लट्वा पक्षियों के मांस के स्वाद की स्मृति नहीं है; और उन दोनों से बढ़कर स्वादिष्ट भक्ष्य कहीं कोई नहीं है।
श्लोक 32 (12.178.32)
यानि चान्यानि भूतेषु भक्ष्यभोज्यानि काश्यप । येषामभुक्तपूर्वाणि तेषामस्मृतिरेव ते ॥
yāni cānyāni bhūteṣu bhakṣyabhojyāni kāśyapa | yeṣāmabhuktapūrvāṇi teṣāmasmṛtireva te
हे काश्यप! प्राणियों में और जो भी भक्ष्य-भोज्य हैं, जिन्हें तुमने पहले कभी खाया नहीं, उनकी तुम्हें स्मृति ही नहीं है।
श्लोक 33 (12.178.33)
अप्राशनमसंस्पर्शमसंदर्शनमेव च । पुरुषस्यैष नियमो मन्ये श्रेयो न संशयः ॥
aprāśanamasaṃsparśamasaṃdarśanameva ca | puruṣasyaiṣa niyamo manye śreyo na saṃśayaḥ
न खाना, न छूना और न देखना—यह पुरुष के लिए नियम है, और मैं इसे निःसन्देह श्रेयस्कर मानता हूँ।
श्लोक 34 (12.178.34)
पाणिमन्तो बलवन्तो धनवन्तो न संशयः । मनुष्या मानुषैरेव दासत्वमुपपादिताः ॥
pāṇimanto balavanto dhanavanto na saṃśayaḥ | manuṣyā mānuṣaireva dāsatvamupapāditāḥ
हाथ वाले, बलवान और धनवान मनुष्य भी निःसन्देह दूसरे मनुष्यों द्वारा ही दास बना दिए जाते हैं।
श्लोक 35 (12.178.35)
वधबन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्ते च पुनः पुनः । ते खल्वपि रमन्ते च मोदन्ते च हसन्ति च ॥
vadhabandhaparikleśaiḥ kliśyante ca punaḥ punaḥ | te khalvapi ramante ca modante ca hasanti ca
वध, बन्धन और क्लेशों से वे बार-बार कष्ट पाते हैं; फिर भी वे रमते हैं, आनन्द मनाते हैं और हँसते हैं।
श्लोक 36 (12.178.36)
अपरे बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । जुगुप्सितां च कृपणां पापवृत्तिमुपासते ॥
apare bāhubalinaḥ kṛtavidyā manasvinaḥ | jugupsitāṃ ca kṛpaṇāṃ pāpavṛttimupāsate
कुछ अन्य बाहुबली, विद्वान और स्वाभिमानी लोग निन्दित, दयनीय और पापपूर्ण जीविका अपनाते हैं।
श्लोक 37 (12.178.37)
उत्सहन्ते च ते वृत्तिमन्यामप्युपसेवितुम् । स्वकर्मणा तु नियतं भवितव्यं तु तत्तथा ॥
utsahante ca te vṛttimanyāmapyupasevitum | svakarmaṇā tu niyataṃ bhavitavyaṃ tu tattathā
वे दूसरी जीविका भी अपनाने का उत्साह रखते हैं; किन्तु जो होना है, वह अपने कर्म से ही निश्चित होता है, और वैसा ही होता है।
श्लोक 38 (12.178.38)
न पुल्कसो न चण्डाल आत्मानं त्यक्तुमिच्छति । तया तुष्टः स्वया योन्या मायां पश्यस्व यादृशीम् ॥
na pulkaso na caṇḍāla ātmānaṃ tyaktumicchati | tayā tuṣṭaḥ svayā yonyā māyāṃ paśyasva yādṛśīm
न पुल्कस और न चाण्डाल अपने को त्यागना चाहता है; वह अपनी ही योनि से सन्तुष्ट रहता है—देखो, यह माया कैसी है!
श्लोक 39 (12.178.39)
दृष्ट्वा कुणीन्पक्षहतान्मनुष्यानामयाविनः । सुसंपूर्णः स्वया योन्या लब्धलाभोऽसि काश्यप ॥
dṛṣṭvā kuṇīnpakṣahatānmanuṣyānāmayāvinaḥ | susaṃpūrṇaḥ svayā yonyā labdhalābho'si kāśyapa
लँगड़े-लूले, लकवे से मारे गए और रोगी मनुष्यों को देखकर, हे काश्यप! तुम अपनी योनि में पूर्ण हो; तुम्हें बड़ा लाभ मिला है।
श्लोक 40 (12.178.40)
यदि ब्राह्मणदेहस्ते निरातङ्को निरामयः । अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ॥
yadi brāhmaṇadehaste nirātaṅko nirāmayaḥ | aṅgāni ca samagrāṇi na ca lokeṣu dhikkṛtaḥ
यदि तुम्हारा ब्राह्मण-शरीर निर्भय और नीरोग है, सब अंग पूरे हैं और लोगों में तुम्हारी निन्दा नहीं होती—
श्लोक 41 (12.178.41)
न केनचित्प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा । धर्मायोत्तिष्ठ विप्रर्षे नात्मानं त्यक्तुमर्हसि ॥
na kenacitpravādena satyenaivāpahāriṇā | dharmāyottiṣṭha viprarṣe nātmānaṃ tyaktumarhasi
तो, चूँकि तुम पर न कोई कलंक है और न कोई ऐसा सत्य आरोप जो पतित करे, हे विप्रर्षि! धर्म के लिए उठो; तुम्हें अपने को त्यागना उचित नहीं।
श्लोक 42 (12.178.42)
यदि ब्रह्मञ्शृणोष्येतच्छ्रद्दधासि च मे वचः । वेदोक्तस्यैव धर्मस्य फलं मुख्यमवाप्स्यसि ॥
yadi brahmañśṛṇoṣyetacchraddadhāsi ca me vacaḥ | vedoktasyaiva dharmasya phalaṃ mukhyamavāpsyasi
हे ब्रह्मन्! यदि तुम यह सुनो और मेरी बात पर विश्वास करो, तो वेदोक्त धर्म का मुख्य फल पाओगे।
श्लोक 43 (12.178.43)
स्वाध्यायमग्निसंस्कारमप्रमत्तोऽनुपालय । सत्यं दमं च दानं च स्पर्धिष्ठा मा च केनचित् ॥
svādhyāyamagnisaṃskāramapramatto'nupālaya | satyaṃ damaṃ ca dānaṃ ca spardhiṣṭhā mā ca kenacit
स्वाध्याय और अग्निहोत्र का सावधान रहकर पालन करो; सत्य, दम और दान का भी, और किसी से स्पर्धा मत करो।
श्लोक 44 (12.178.44)
ये केचन स्वध्ययनाः प्राप्ता यजनयाजनम् । कथं ते चानुशोचेयुर्ध्यायेयुर्वाऽप्यशोभनम् ॥
ye kecana svadhyayanāḥ prāptā yajanayājanam | kathaṃ te cānuśoceyurdhyāyeyurvā'pyaśobhanam
जिन्होंने भली-भाँति अध्ययन किया है और यज्ञ करना-कराना पाया है, वे भला कैसे शोक करेंगे या अशुभ का चिन्तन करेंगे?
श्लोक 45 (12.178.45)
इच्छन्तस्ते विहाराय सुखं महदवाप्नुयुः । येऽनुजाताः सुनक्षत्रे सुतिथौ सुमुहूर्तके । यज्ञदानप्रजेहायां यतन्ते शक्तिपूर्वकम् ॥
icchantaste vihārāya sukhaṃ mahadavāpnuyuḥ | ye'nujātāḥ sunakṣatre sutithau sumuhūrtake | yajñadānaprajehāyāṃ yatante śaktipūrvakam
जो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त में उत्पन्न हुए हैं और यज्ञ, दान तथा सन्तान की चेष्टा में शक्ति भर यत्न करते हैं, वे विहार की इच्छा से बड़ा सुख पाते हैं।
श्लोक 46 (12.178.46)
नक्षत्रेष्वासुरेष्वन्ये दुस्तिथौ दुर्मुहूर्तजाः । सम्पतन्त्यासुरीं योनिं यज्ञप्रसववर्जिताः ॥
nakṣatreṣvāsureṣvanye dustithau durmuhūrtajāḥ | sampatantyāsurīṃ yoniṃ yajñaprasavavarjitāḥ
दूसरे, जो आसुर नक्षत्रों में, बुरी तिथि और बुरे मुहूर्त में उत्पन्न होते हैं, वे यज्ञ और सन्तान से वंचित होकर आसुरी योनि में गिरते हैं।
श्लोक 47 (12.178.47)
अहमासं पण्डितको हैतुको वेदनिन्दकः । आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥
ahamāsaṃ paṇḍitako haituko vedanindakaḥ | ānvīkṣikīṃ tarkavidyāmanurakto nirarthikām
मैं पूर्वजन्म में नाममात्र का पण्डित, तर्कवादी और वेद-निन्दक था; निरर्थक आन्वीक्षिकी तर्क-विद्या में अनुरक्त रहता था।
श्लोक 48 (12.178.48)
हेतुवादान्प्रवदिता वक्ता संसत्सु हेतुमत् । आक्रोष्टा चातिवक्ता च ब्रह्मवाक्येषु च द्विजान् ॥
hetuvādānpravaditā vaktā saṃsatsu hetumat | ākroṣṭā cātivaktā ca brahmavākyeṣu ca dvijān
मैं हेतुवाद करने वाला था, सभाओं में युक्तियुक्त वक्ता, निन्दक और बहुभाषी, और वैदिक वचन के विषय में ब्राह्मणों को कोसने वाला।
श्लोक 49 (12.178.49)
नास्तिकः सर्वशङ्की च मूर्खः पण्डितमानिकः । तस्येयं फलनिर्वृत्तिः सृगालत्वं मम द्विज ॥
nāstikaḥ sarvaśaṅkī ca mūrkhaḥ paṇḍitamānikaḥ | tasyeyaṃ phalanirvṛttiḥ sṛgālatvaṃ mama dvija
नास्तिक, सबमें शंका करने वाला, मूर्ख और अपने को पण्डित मानने वाला—हे द्विज! उसी का यह फल है कि मैं सियार हुआ।
श्लोक 50 (12.178.50)
अपि जातु तथा तत्स्यादहोरात्रशतैरपि । यदहं मानुषीं योनिं सृगालः प्राप्नुयां पुनः ॥
api jātu tathā tatsyādahorātraśatairapi | yadahaṃ mānuṣīṃ yoniṃ sṛgālaḥ prāpnuyāṃ punaḥ
क्या कभी सैकड़ों दिन-रात बाद भी ऐसा हो सकेगा कि मैं सियार होकर फिर मनुष्य-योनि पाऊँ?
श्लोक 51 (12.178.51)
संतुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतः । ज्ञेयं ज्ञाता भवेयं वै वर्ज्यं वर्जयिता तथा ॥
saṃtuṣṭaścāpramattaśca yajñadānataporataḥ | jñeyaṃ jñātā bhaveyaṃ vai varjyaṃ varjayitā tathā
तब मैं सन्तुष्ट और सावधान होकर यज्ञ, दान और तप में रत रहूँगा; जानने योग्य को जानने वाला और त्यागने योग्य को त्यागने वाला बनूँगा।
भीष्म उवाच
श्लोक 52 (12.178.52)
ततः स मुनिरुत्थाय काश्यपस्तमुवाच ह । अहो बतासि कुशलो बुद्धिमांश्चेति विस्मितः ॥
tataḥ sa munirutthāya kāśyapastamuvāca ha | aho batāsi kuśalo buddhimāṃśceti vismitaḥ
तब मुनि काश्यप उठकर विस्मित होकर उससे बोले—‘अहो, तुम तो बड़े कुशल और बुद्धिमान हो!’
श्लोक 53 (12.178.53)
समवैक्षत तं विप्रो ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा । ददर्श चैनं देवानां देवमिन्द्रं शचीपतिम् ॥
samavaikṣata taṃ vipro jñānadīrgheṇa cakṣuṣā | dadarśa cainaṃ devānāṃ devamindraṃ śacīpatim
उस ब्राह्मण ने ज्ञान की दूरदर्शी दृष्टि से उसे देखा और पहचान लिया कि वह देवों के देव, शचीपति इन्द्र हैं।
श्लोक 54 (12.178.54)
ततः संपूजयामास काश्यपो हरिवाहनम् । अनुज्ञातस्तु तेनाथ प्रविवेश स्वमालयम् ॥
tataḥ saṃpūjayāmāsa kāśyapo harivāhanam | anujñātastu tenātha praviveśa svamālayam
तब काश्यप ने हरि-वाहन इन्द्र की पूजा की और उनकी अनुमति पाकर अपने निवास में चले गए।