शान्ति पर्व · अध्याय 179
कर्म कर्ता का अनुसरण करता है
युधिष्ठिर पूछते हैं कि दान, यज्ञ, तप और गुरुजनों की सेवा का कोई फल होता है या नहीं। भीष्म बताते हैं कि दुष्कर्मी एक दुःख से दूसरे दुःख में जाता है और श्रद्धावान् एक सुख से दूसरे सुख में; विधान और अपने पूर्वकृत कर्म मनुष्य के पीछे छाया की तरह चलते हैं, जैसे हज़ारों गायों में बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ लेता है। पाप पुण्य कर्म और दीर्घ तप से धुल सकता है, और जो अपने लिए उचित और हितकर है वही करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.179.1)
यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च । गुरूणां वाऽपि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
yadyasti dattamiṣṭaṃ vā tapastaptaṃ tathaiva ca | gurūṇāṃ vā'pi śuśrūṣā tanme brūhi pitāmaha
यदि दान, यज्ञ, किया हुआ तप और गुरुजनों की सेवा का कोई फल है, तो हे पितामह! वह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.179.2)
यथाऽस्मिंश्च तथा तत्र जानीयां नृपसत्तम । दुष्कर्तारो यथा लोके यत्कुर्वन्ति तथा शृणु ॥
yathā'smiṃśca tathā tatra jānīyāṃ nṛpasattama | duṣkartāro yathā loke yatkurvanti tathā śṛṇu
हे नृपश्रेष्ठ! जैसा इस लोक में है, वैसा ही वहाँ भी है—ऐसा जानना चाहिए। अब सुनो कि संसार में दुष्कर्मी जन क्या करते हैं।
श्लोक 3 (12.179.3)
आत्मनाऽनर्थयुक्तेन पापे निविशते मनः । स्वकर्म कलुषं कृत्वा दुःखे महति धीयते ॥
ātmanā'narthayuktena pāpe niviśate manaḥ | svakarma kaluṣaṃ kṛtvā duḥkhe mahati dhīyate
जब मन अपने ही अनर्थ से जुड़ जाता है, तब वह पाप में प्रवेश करता है; अपने पापपूर्ण कर्म करके मनुष्य महान् दुःख में डूबता है।
श्लोक 4 (12.179.4)
दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात्क्लेशं भयाद्भयम् । मृतेभ्यः प्रमृता यान्ति दरिद्राः पापकारिणः ॥
durbhikṣādeva durbhikṣaṃ kleśātkleśaṃ bhayādbhayam | mṛtebhyaḥ pramṛtā yānti daridrāḥ pāpakāriṇaḥ
दुर्भिक्ष से दुर्भिक्ष में, क्लेश से क्लेश में, भय से भय में—निर्धन पापकर्मी एक मृत्यु के बाद दूसरी मृत्यु में पड़ते हैं।
श्लोक 5 (12.179.5)
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात्स्वर्गं सुखात्सुखम् । श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च सत्वस्थाः शुभकारिणः ॥
utsavādutsavaṃ yānti svargātsvargaṃ sukhātsukham | śraddadhānāśca dāntāśca satvasthāḥ śubhakāriṇaḥ
श्रद्धालु, इन्द्रिय-जयी, सत्त्वगुण में स्थित और शुभ कर्म करने वाले लोग उत्सव से उत्सव में, स्वर्ग से स्वर्ग में और सुख से सुख में जाते हैं।
श्लोक 6 (12.179.6)
व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचोरभयेषु च । हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ॥
vyālakuñjaradurgeṣu sarpacorabhayeṣu ca | hastāvāpena gacchanti nāstikāḥ kimataḥ param
नास्तिक लोग हाथों में बेड़ी पहने हिंसक पशुओं और हाथियों से भरे दुर्गम स्थानों में, साँपों और चोरों के भय वाले स्थानों में जाते हैं—इससे बढ़कर और क्या होगा?
श्लोक 7 (12.179.7)
प्रियदेवातिथेयाश्च वदान्याः प्रियसाधवः । क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ॥
priyadevātitheyāśca vadānyāḥ priyasādhavaḥ | kṣemyamātmavatāṃ mārgamāsthitā hastadakṣiṇam
देवताओं और अतिथियों के प्रेमी, उदार और सज्जनों से प्रेम करने वाले लोग संयमी जनों के उस सुरक्षित मार्ग पर चलते हैं, जो हाथ से दिए गए दान आदि से अनुकूल बनता है।
श्लोक 8 (12.179.8)
पुलाका इव धान्येषु पुत्तिका इव पक्षिषु । तद्विधास्ते मनुष्येषु येषां धर्मो न कारणम् ॥
pulākā iva dhānyeṣu puttikā iva pakṣiṣu | tadvidhāste manuṣyeṣu yeṣāṃ dharmo na kāraṇam
जिन मनुष्यों के लिए धर्म कोई प्रयोजन नहीं है, वे मनुष्यों में वैसे ही हैं जैसे अनाज में खोखले दाने और पक्षियों में छोटे कीड़े।
श्लोक 9 (12.179.9)
सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति । शेते सह शयानेन येनयेन यथाकृतम् ॥
suśīghramapi dhāvantaṃ vidhānamanudhāvati | śete saha śayānena yenayena yathākṛtam
बहुत तेज़ दौड़ने वाले के पीछे भी विधान दौड़ता है; जिसने जैसा कर्म किया है, उसके अनुसार वह सोने वाले के साथ सोता है।
श्लोक 10 (12.179.10)
उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति । करोति कुर्वतः कर्म छायेवाऽनुविधीयते ॥
upatiṣṭhati tiṣṭhantaṃ gacchantamanugacchati | karoti kurvataḥ karma chāyevā'nuvidhīyate
वह खड़े रहने वाले के पास खड़ा रहता है, चलने वाले के पीछे चलता है, कर्ता के कर्म करने पर करता है—छाया की तरह उसका अनुसरण करता है।
श्लोक 11 (12.179.11)
येनयेन यथा यद्यत्पुरा कर्म समार्जितम् । तत्तदेव नरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥
yenayena yathā yadyatpurā karma samārjitam | tattadeva naro bhuṅkte nityaṃ vihitamātmanā
जिसने जिस-जिस प्रकार जो-जो कर्म पहले कमाया है, मनुष्य उसी-उसी को सदा भोगता है; वह उसी का अपने द्वारा रचा हुआ विधान है।
श्लोक 12 (12.179.12)
स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् । भूतग्राममिमं कालः समन्तात्परिकर्षति ॥
svakarmaphalanikṣepaṃ vidhānaparirakṣitam | bhūtagrāmamimaṃ kālaḥ samantātparikarṣati
अपने कर्मों के फल को निक्षेप-रूप में धारण किए हुए, विधान से रक्षित इस प्राणि-समूह को काल सब ओर से खींचता है।
श्लोक 13 (12.179.13)
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च । स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ॥
acodyamānāni yathā puṣpāṇi ca phalāni ca | svaṃ kālaṃ nātivartante tathā karma purākṛtam
जैसे बिना प्रेरित किए ही फूल और फल अपने समय का उल्लंघन नहीं करते, वैसे ही पूर्वकृत कर्म भी।
श्लोक 14 (12.179.14)
संमानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ । प्रवृत्तानि विवर्तन्ते विधानान्ते पुनःपुनः ॥
saṃmānaścāvamānaśca lābhālābhau kṣayodayau | pravṛttāni vivartante vidhānānte punaḥpunaḥ
सम्मान और अपमान, लाभ और हानि, उदय और क्षय—ये प्रवृत्त होकर विधान की अवधि पूरी होने पर बार-बार लौट जाते हैं।
श्लोक 15 (12.179.15)
आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् । गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ॥
ātmanā vihitaṃ duḥkhamātmanā vihitaṃ sukham | garbhaśayyāmupādāya bhujyate paurvadehikam
दुःख अपने ही द्वारा रचा होता है, सुख भी अपने ही द्वारा रचा होता है; गर्भ-शय्या पाने के समय से ही पूर्व-देह में किए का भोग होता है।
श्लोक 16 (12.179.16)
बालो युवा च वृद्धश्च यत्करोति शुभाशुभम् । तस्यांतस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनिजन्मनि ॥
bālo yuvā ca vṛddhaśca yatkaroti śubhāśubham | tasyāṃtasyāmavasthāyāṃ bhuṅkte janmanijanmani
बालक, युवा या वृद्ध जो शुभ-अशुभ करता है, उसका फल वह उसी-उसी अवस्था में जन्म-जन्म में भोगता है।
श्लोक 17 (12.179.17)
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥
yathā dhenusahasreṣu vatso vindati mātaram | tathā pūrvakṛtaṃ karma kartāramanugacchati
जैसे हज़ारों गायों में बछड़ा अपनी माँ को पा लेता है, वैसे ही पूर्वकृत कर्म कर्ता के पीछे चलता है।
श्लोक 18 (12.179.18)
संक्लिन्नमग्रतो वस्त्रं पश्चाच्छुध्यति वारिणा । दुष्कर्मापि तथा पश्चात्पूयते पुण्यकर्मणा ॥
saṃklinnamagrato vastraṃ paścācchudhyati vāriṇā | duṣkarmāpi tathā paścātpūyate puṇyakarmaṇā
पहले मैला हुआ वस्त्र बाद में जल से शुद्ध होता है; वैसे ही दुष्कर्म करने वाला भी बाद में पुण्य कर्म से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 19 (12.179.19)
तपसा तप्यते देहस्तपसा विन्दते महत् । उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तरम् ॥
tapasā tapyate dehastapasā vindate mahat | upavāsaiḥ prataptānāṃ dīrghaṃ sukhamanantaram
तप से देह तपती है और तप से ही महान् फल मिलता है; उपवास से तपे हुए लोगों को दीर्घ सुख प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (12.179.20)
दीर्घकालेन तपसा सेवितेन तपोवने । धर्मनिर्धूतपापानां संसिद्ध्यन्ते मनोरथाः ॥
dīrghakālena tapasā sevitena tapovane | dharmanirdhūtapāpānāṃ saṃsiddhyante manorathāḥ
तपोवन में दीर्घकाल तक किए गए तप से, जिनके पाप धर्म से धुल गए हैं, उनके मनोरथ सिद्ध होते हैं।
श्लोक 21 (12.179.21)
शकुनीनामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके । पदं यथा न दृश्येत तथा धर्मविदां गतिः ॥
śakunīnāmivākāśe matsyānāmiva codake | padaṃ yathā na dṛśyeta tathā dharmavidāṃ gatiḥ
जैसे आकाश में पक्षियों का और जल में मछलियों का पदचिह्न नहीं दीखता, वैसे ही धर्म जानने वालों की गति नहीं दीखती।
श्लोक 22 (12.179.22)
अलमन्यैरुपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः । पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ॥
alamanyairupālambhaiḥ kīrtitaiśca vyatikramaiḥ | peśalaṃ cānurūpaṃ ca kartavyaṃ hitamātmanaḥ
दूसरों के उलाहनों और अपराधों के गिनाने से बस; जो अपने लिए सुन्दर, उचित और हितकर हो, वही करना चाहिए।