शान्ति पर्व · अध्याय 180
भृगु द्वारा भरद्वाज को सृष्टि-रचना का उपदेश
युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि यह जगत् कैसे बना, प्रलय में किसमें लीन होता है, और जीवित तथा मृत प्राणियों की क्या गति है। भीष्म कैलास पर भृगु द्वारा भरद्वाज को दिया गया पुराना उपदेश सुनाते हैं: अव्यक्त नारायण से महत्, अहंकार, आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी उत्पन्न हुए, फिर वह कमल बना जिससे ब्रह्मा का जन्म हुआ। भृगु विष्णु के विराट् शरीर, आकाश की अनन्तता और लोक को घेरने वाले समुद्रों का वर्णन करते हैं, और बताते हैं कि पृथ्वी ही वह कमल है जिसकी कर्णिका मेरु पर्वत है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.180.1)
कुतः सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च किमभ्येति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kutaḥ sṛṣṭamidaṃ sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam | pralaye ca kimabhyeti tanme brūhi pitāmaha
यह सारा चराचर जगत् किससे उत्पन्न हुआ है? और प्रलय के समय यह किसमें लीन हो जाता है? हे पितामह, यह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (12.180.2)
ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः । सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥
sasāgaraḥ sagaganaḥ saśailaḥ sabalāhakaḥ | sabhūmiḥ sāgnipavano loko'yaṃ kena nirmitaḥ
समुद्रों और आकाश सहित, पर्वतों और मेघों सहित, पृथ्वी, अग्नि और वायु सहित यह लोक किसने रचा है?
श्लोक 3 (12.180.3)
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः । शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मावथो कथम् ॥
kathaṃ sṛṣṭāni bhūtāni kathaṃ varṇavibhaktayaḥ | śaucāśaucaṃ kathaṃ teṣāṃ dharmādharmāvatho katham
प्राणी कैसे रचे गए? वर्णों के विभाग कैसे हुए? उनमें शुद्धि और अशुद्धि कैसी है, और धर्म तथा अधर्म कैसे हैं?
श्लोक 4 (12.180.4)
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः । अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु नो भवान् ॥
kīdṛśo jīvatāṃ jīvaḥ kva vā gacchanti ye mṛtāḥ | asmāllokādamuṃ lokaṃ sarvaṃ śaṃsatu no bhavān
जीवों का जीव क्या है? जो मर जाते हैं वे कहाँ जाते हैं? इस लोक से उस लोक तक की सारी बात आप हमें बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.180.5)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भृगुणाऽभिहितं श्रेष्ठं भरद्वाजाय पृच्छते ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bhṛguṇā'bhihitaṃ śreṣṭhaṃ bharadvājāya pṛcchate
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, वह उत्तम उपदेश जो भृगु ने पूछने वाले भरद्वाज को दिया था।
श्लोक 6 (12.180.6)
कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानमिवौजसा । भृगुं महर्षिमासीनं भरद्वाजोऽन्वपृच्छत ॥
kailāsaśikhare dṛṣṭvā dīpyamānamivaujasā | bhṛguṃ maharṣimāsīnaṃ bharadvājo'nvapṛcchata
कैलास के शिखर पर तेज से दमकते हुए-से बैठे महर्षि भृगु को देखकर भरद्वाज ने उनसे प्रश्न किया।
श्लोक 7 (12.180.7)
ससागरः सगगनः सशैलः सवलाहकः । सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥
sasāgaraḥ sagaganaḥ saśailaḥ savalāhakaḥ | sabhūmiḥ sāgnipavano loko'yaṃ kena nirmitaḥ
समुद्रों और आकाश सहित, पर्वतों और मेघों सहित, पृथ्वी, अग्नि और वायु सहित यह लोक किसने रचा है?
श्लोक 8 (12.180.8)
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः । शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मावथो कथम् ॥
kathaṃ sṛṣṭāni bhūtāni kathaṃ varṇavibhaktayaḥ | śaucāśaucaṃ kathaṃ teṣāṃ dharmādharmāvatho katham
प्राणी कैसे रचे गए? वर्णों के विभाग कैसे हुए? उनमें शुद्धि और अशुद्धि कैसी है, और धर्म तथा अधर्म कैसे हैं?
श्लोक 9 (12.180.9)
कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छन्ति ये मृताः । परलोकमिमं चापि सर्वं शंसितृमर्हसि ॥
kīdṛśo jīvatāṃ jīvaḥ kva vā gacchanti ye mṛtāḥ | paralokamimaṃ cāpi sarvaṃ śaṃsitṛmarhasi
जीवों का जीव क्या है? जो मर जाते हैं वे कहाँ जाते हैं? परलोक और इस लोक की सारी बात आपको बतानी चाहिए।
श्लोक 10 (12.180.10)
एवं स भगवान्पृष्टो भरद्वाजेन संशयम् । ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसंकाशः सर्वं तस्मै ततोऽब्रवीत् ॥
evaṃ sa bhagavānpṛṣṭo bharadvājena saṃśayam | brahmarṣirbrahmasaṃkāśaḥ sarvaṃ tasmai tato'bravīt
भरद्वाज के इस प्रकार संशय पूछने पर ब्रह्मा के समान तेजस्वी उन पूज्य ब्रह्मर्षि ने उन्हें तब सब कुछ बताया।
भृगुरुवाच
श्लोक 11 (12.180.11)
नारायणो जगन्मूर्तिरन्तरात्मा सनातनः । कूटस्थोऽक्षर अव्यक्तो निर्लेपो व्यापकः प्रभुः ॥
nārāyaṇo jaganmūrtirantarātmā sanātanaḥ | kūṭastho'kṣara avyakto nirlepo vyāpakaḥ prabhuḥ
नारायण जगत् की मूर्ति और सबके अन्तरात्मा हैं, सनातन हैं; कूटस्थ, अक्षर, अव्यक्त, निर्लेप, सर्वव्यापी प्रभु हैं।
श्लोक 12 (12.180.12)
प्रकृतेः परतो नित्यमिन्द्रियैरप्यगोचरः । स सिसृक्षुः सहस्रांशादसृजत्पुरुषं प्रभुः ॥
prakṛteḥ parato nityamindriyairapyagocaraḥ | sa sisṛkṣuḥ sahasrāṃśādasṛjatpuruṣaṃ prabhuḥ
प्रकृति से परे, सदा इन्द्रियों की पहुँच से बाहर उन प्रभु ने सृष्टि की इच्छा से सहस्रांश से पुरुष को उत्पन्न किया।
श्लोक 13 (12.180.13)
मानसो नाम यः पूर्वो विश्रुतो वै महर्षिभिः । अनादिनिधनो देवस्तथाऽभेद्योऽजरामरः ॥
mānaso nāma yaḥ pūrvo viśruto vai maharṣibhiḥ | anādinidhano devastathā'bhedyo'jarāmaraḥ
जो पहले से विद्यमान हैं और महर्षियों में 'मानस' नाम से प्रसिद्ध हैं, वे आदि-अन्त से रहित, अभेद्य, जरा और मृत्यु से परे देव हैं,
श्लोक 14 (12.180.14)
अव्यक्त इति विख्यातः शाश्वतोऽथाक्षयोऽव्ययः । यतः सृष्टानि भूतानि तिष्ठन्ति च म्रियन्ति च ॥
avyakta iti vikhyātaḥ śāśvato'thākṣayo'vyayaḥ | yataḥ sṛṣṭāni bhūtāni tiṣṭhanti ca mriyanti ca
वे 'अव्यक्त' नाम से विख्यात, शाश्वत, अक्षय और अव्यय हैं; उन्हीं से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, और वे जीते तथा मरते हैं।
श्लोक 15 (12.180.15)
सोऽसृजत्प्रथमं देवो महान्तं नाम नामतः । महान्ससर्जाहंकारं स चापि भगवानथ । आकाशमिति विख्यातं सर्वभूतधरः प्रभुः ॥
so'sṛjatprathamaṃ devo mahāntaṃ nāma nāmataḥ | mahānsasarjāhaṃkāraṃ sa cāpi bhagavānatha | ākāśamiti vikhyātaṃ sarvabhūtadharaḥ prabhuḥ
उन देव ने सबसे पहले 'महत्' नामक तत्त्व की सृष्टि की। महत् ने अहंकार को रचा। और उन्हीं भगवान् ने फिर आकाश नाम से प्रसिद्ध तत्त्व को रचा, जो सब भूतों को धारण करने वाला प्रभु है।
श्लोक 16 (12.180.16)
आकाशादभवद्वारि सलिलादग्निमारुतौ । अग्निमारुतसंयोगात्ततः समभवन्मही ॥
ākāśādabhavadvāri salilādagnimārutau | agnimārutasaṃyogāttataḥ samabhavanmahī
आकाश से जल हुआ, जल से अग्नि और वायु हुए; अग्नि और वायु के संयोग से फिर पृथ्वी उत्पन्न हुई।
श्लोक 17 (12.180.17)
ततस्तेजोमयं दिव्यं पद्मं सृष्टं स्वयंभुवा । तस्मात्पद्मात्समभवद्ब्रह्मा वेदमयो निधिः ॥
tatastejomayaṃ divyaṃ padmaṃ sṛṣṭaṃ svayaṃbhuvā | tasmātpadmātsamabhavadbrahmā vedamayo nidhiḥ
तब स्वयम्भू ने तेजोमय दिव्य कमल रचा; उस कमल से वेदमय निधि-स्वरूप ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
श्लोक 18 (12.180.18)
अहंकार इति ख्यातः सर्वभूतात्मभूतकृत् । ब्रह्मा वै स महातेजा य एते पञ्चधातवः ॥
ahaṃkāra iti khyātaḥ sarvabhūtātmabhūtakṛt | brahmā vai sa mahātejā ya ete pañcadhātavaḥ
वे 'अहंकार' नाम से प्रसिद्ध हैं, सब प्राणियों की आत्माओं के रचयिता हैं; वे महातेजस्वी ब्रह्मा ही ये पाँचों धातुएँ (तत्त्व) हैं।
श्लोक 19 (12.180.19)
शैलास्तस्यास्थिसंज्ञास्तु मेदो मांसं च मेदिनी । समुद्रास्तस्य रुधिरमाकाशमुदरं तथा ॥
śailāstasyāsthisaṃjñāstu medo māṃsaṃ ca medinī | samudrāstasya rudhiramākāśamudaraṃ tathā
पर्वत उनकी अस्थियाँ कहे जाते हैं, पृथ्वी उनकी चर्बी और मांस है; समुद्र उनका रक्त हैं और आकाश उनका उदर।
श्लोक 20 (12.180.20)
पवनश्चैव निःश्वासस्तेजोऽग्निर्निम्नगाः सिराः । दिवाकरश्च सोमश्च नयने तस्य विश्रुते ॥
pavanaścaiva niḥśvāsastejo'gnirnimnagāḥ sirāḥ | divākaraśca somaśca nayane tasya viśrute
वायु उनका श्वास है, अग्नि उनका तेज, नदियाँ उनकी नसें हैं; सूर्य और चन्द्रमा उनकी दोनों आँखें कहे जाते हैं।
श्लोक 21 (12.180.21)
नभश्चोर्ध्वं शिरस्तस्य क्षितिः पादौ भुजौ दिशः । दुर्विज्ञेयो ह्यनन्तात्मा सिद्धैरपि न संशयः ॥
nabhaścordhvaṃ śirastasya kṣitiḥ pādau bhujau diśaḥ | durvijñeyo hyanantātmā siddhairapi na saṃśayaḥ
आकाश उनका सिर है, पृथ्वी उनके चरण और दिशाएँ उनकी भुजाएँ। वे अनन्त आत्मा हैं, सिद्धों के लिए भी जानना कठिन, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 22 (12.180.22)
स एष भगवान्विष्णुरनन्त इति विश्रुतः । सर्वभूतात्मभूतस्थो दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥
sa eṣa bhagavānviṣṇurananta iti viśrutaḥ | sarvabhūtātmabhūtastho durvijñeyo'kṛtātmabhiḥ
वे ही भगवान् विष्णु हैं, 'अनन्त' नाम से प्रसिद्ध; सब प्राणियों की आत्मा बनकर उनमें स्थित हैं, और अपरिपक्व आत्मा वालों के लिए जानना कठिन हैं।
श्लोक 23 (12.180.23)
अहंकारस्य यः स्रष्टा सर्वभूतोद्भवाय वै । यतः समभवद्विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वया ॥
ahaṃkārasya yaḥ sraṣṭā sarvabhūtodbhavāya vai | yataḥ samabhavadviśvaṃ pṛṣṭo'haṃ yadiha tvayā
वे ही अहंकार के सृष्टा हैं, सब प्राणियों की उत्पत्ति के लिए; और जिससे यह विश्व उत्पन्न हुआ, जिसके विषय में तुमने मुझसे यहाँ पूछा, वे वही हैं।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 24 (12.180.24)
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य च । कान्यत्र परिमाणानि संशयं छिन्धि मेऽर्थितः ॥
gaganasya diśāṃ caiva bhūtalasyānilasya ca | kānyatra parimāṇāni saṃśayaṃ chindhi me'rthitaḥ
आकाश, दिशाओं, भूतल और वायु के परिमाण क्या हैं? मेरी जिज्ञासा के अनुसार मेरा संशय दूर कीजिए।
भृगुरुवाच
श्लोक 25 (12.180.25)
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धचारणसेवितम् । रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यान्तो नाधिगम्यते ॥
anantametadākāśaṃ siddhacāraṇasevitam | ramyaṃ nānāśrayākīrṇaṃ yasyānto nādhigamyate
यह आकाश अनन्त है, सिद्धों और चारणों से सेवित, रमणीय और अनेक आश्रयों से भरा हुआ; इसका अन्त नहीं पाया जा सकता।
श्लोक 26 (12.180.26)
ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चन्द्रादित्यौ न दृश्यतः । तत्र देवाः स्वयं दीप्ताः सूर्यभासोऽग्निवर्चसः ॥
ūrdhvaṃ gateradhastāttu candrādityau na dṛśyataḥ | tatra devāḥ svayaṃ dīptāḥ sūryabhāso'gnivarcasaḥ
उनकी गति से ऊपर और नीचे भी चन्द्रमा और सूर्य नहीं दिखाई देते। वहाँ अपने ही तेज से दीप्त, सूर्य की प्रभा और अग्नि के तेज वाले देवता रहते हैं।
श्लोक 27 (12.180.27)
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः । दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति वै विद्धि मानद ॥
te cāpyantaṃ na paśyanti nabhasaḥ prathitaujasaḥ | durgamatvādanantatvāditi vai viddhi mānada
वे प्रसिद्ध पराक्रम वाले देवता भी आकाश का अन्त नहीं देख पाते, क्योंकि वह दुर्गम और अनन्त है। हे मान देने वाले, यह जान लो।
श्लोक 28 (12.180.28)
उपर्युपरि तैर्देवैः प्रज्वलद्भिः स्वयंप्रभैः । निरुद्धमेतदाकाशमप्रमेयं सुरैरपि ॥
uparyupari tairdevaiḥ prajvaladbhiḥ svayaṃprabhaiḥ | niruddhametadākāśamaprameyaṃ surairapi
ऊपर से ऊपर तक जलते हुए, स्वयं प्रकाशमान उन देवताओं से घिरा हुआ यह आकाश देवताओं के लिए भी अपरिमेय है।
श्लोक 29 (12.180.29)
पृथिव्यन्ते समुद्रास्तु समुद्रान्ते तमः स्मृतम् । तमसोऽन्ते जलं प्राहुर्जलस्यान्तेऽग्निरेव च ॥
pṛthivyante samudrāstu samudrānte tamaḥ smṛtam | tamaso'nte jalaṃ prāhurjalasyānte'gnireva ca
पृथ्वी के अन्त में समुद्र हैं, समुद्रों के अन्त में अन्धकार बताया गया है; अन्धकार के अन्त में जल कहते हैं, और जल के अन्त में अग्नि है।
श्लोक 30 (12.180.30)
रसातलान्ते सलिलं जलान्ते पन्नगाधिपाः । तदन्ते पुनराकाशमाकाशान्ते पुनर्जलम् ॥
rasātalānte salilaṃ jalānte pannagādhipāḥ | tadante punarākāśamākāśānte punarjalam
रसातल के अन्त में जल है, जल के अन्त में सर्पराज हैं; उनके अन्त में फिर आकाश है, और आकाश के अन्त में फिर जल।
श्लोक 31 (12.180.31)
एवमन्तं हि नभसः प्रमाणं सलिलस्य च । अग्निमारुतयोश्चैव दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि ॥
evamantaṃ hi nabhasaḥ pramāṇaṃ salilasya ca | agnimārutayoścaiva durjñeyaṃ daivatairapi
इस प्रकार आकाश का अन्त और जल, अग्नि तथा वायु का परिमाण देवताओं के लिए भी जानना कठिन है।
श्लोक 32 (12.180.32)
अग्निमारुततोयानां वर्णाः क्षितितलस्य च । आकाशसदृशा ह्येते भिद्यन्तेऽतत्वदर्शनात् ॥
agnimārutatoyānāṃ varṇāḥ kṣititalasya ca | ākāśasadṛśā hyete bhidyante'tatvadarśanāt
अग्नि, वायु, जल और भूतल के रूप आकाश के समान ही हैं; तत्त्व को न देखने के कारण ही वे अलग-अलग प्रतीत होते हैं।
श्लोक 33 (12.180.33)
पठन्ति चैव मुनयः शास्त्रेषु विविधेषु च । त्रैलोक्यसागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा ॥
paṭhanti caiva munayaḥ śāstreṣu vividheṣu ca | trailokyasāgare caiva pramāṇaṃ vihitaṃ yathā
मुनि अनेक शास्त्रों में यह भी पढ़ते हैं कि तीनों लोकों और सागर का प्रमाण किस प्रकार निर्धारित किया गया है।
श्लोक 34 (12.180.34)
अदृश्यत्वादगम्यत्वात्कः प्रमाणमुदाहरेत् । सिद्धानां देवतानां च यदा परिमिता गतिः । तदा गौणमनन्तस्य नामानन्तेति विश्रुतम् ॥
adṛśyatvādagamyatvātkaḥ pramāṇamudāharet | siddhānāṃ devatānāṃ ca yadā parimitā gatiḥ | tadā gauṇamanantasya nāmānanteti viśrutam
किन्तु जो न दिखाई देता है और न पहुँचा जा सकता है, उसका प्रमाण कौन बता सकता है? जब सिद्धों और देवताओं की गति भी सीमित है, तब अनन्त का 'अनन्त' नाम गौण अर्थ में ही प्रसिद्ध है।
श्लोक 35 (12.180.35)
नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मनः । यदा तु दिव्यं यद्रूपं ह्रसते वर्धते पुनः । कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ॥
nāmadheyānurūpasya mānasasya mahātmanaḥ | yadā tu divyaṃ yadrūpaṃ hrasate vardhate punaḥ | ko'nyastadvedituṃ śakto yo'pi syāttadvidho'paraḥ
नाम के अनुरूप उन महात्मा 'मानस' के दिव्य रूप के घटने और फिर बढ़ने को उनके समान कोई दूसरा होकर भी भला कौन जान सकता है?
श्लोक 36 (12.180.36)
ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान्प्रभुः । ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥
tataḥ puṣkarataḥ sṛṣṭaḥ sarvajño mūrtimānprabhuḥ | brahmā dharmamayaḥ pūrvaḥ prajāpatiranuttamaḥ
तब पुष्कर (कमल) से सर्वज्ञ, मूर्तिमान् प्रभु ब्रह्मा उत्पन्न हुए, धर्ममय, आदि प्रजापति, जिनसे बढ़कर कोई नहीं।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 37 (12.180.37)
पुष्कराद्यदि संभूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् । ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान्संदेह एव मे ॥
puṣkarādyadi saṃbhūto jyeṣṭhaṃ bhavati puṣkaram | brahmāṇaṃ pūrvajaṃ cāha bhavānsaṃdeha eva me
यदि वे कमल से उत्पन्न हुए तो कमल ज्येष्ठ होना चाहिए; फिर भी आप ब्रह्मा को पूर्वज कहते हैं। यही मेरा संदेह है।
भृगुरुवाच
श्लोक 38 (12.180.38)
मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता । तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥
mānasasyeha yā mūrtirbrahmatvaṃ samupāgatā | tasyāsanavidhānārthaṃ pṛthivī padmamucyate
मानस की जो मूर्ति ब्रह्मत्व को प्राप्त हुई, उसके आसन की व्यवस्था के लिए पृथ्वी को कमल कहा जाता है।
श्लोक 39 (12.180.39)
कर्णिकां तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः । तस्य मध्ये स्थितो लोकान्सृजते जगतः प्रभुः । मानसांश्च तथा देवान्भूतानि विविधानि च ॥
karṇikāṃ tasya padmasya merurgaganamucchritaḥ | tasya madhye sthito lokānsṛjate jagataḥ prabhuḥ | mānasāṃśca tathā devānbhūtāni vividhāni ca
आकाश तक ऊँचा मेरु उस कमल की कर्णिका है। उसके मध्य में स्थित होकर जगत् के प्रभु लोकों की सृष्टि करते हैं, तथा मन से उत्पन्न देवताओं और अनेक प्रकार के प्राणियों की भी।