शान्ति पर्व · अध्याय 181
जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी की उत्पत्ति
भरद्वाज पूछते हैं कि मेरु के मध्य में स्थित ब्रह्मा ने प्राणियों की सृष्टि कैसे की और जल, अग्नि, वायु तथा पृथ्वी कैसे उत्पन्न हुए। भृगु बताते हैं कि प्राणियों के पोषण के लिए सबसे पहले जल रचा गया और सभी ठोस वस्तुएँ जल का ही जमा हुआ रूप हैं। वे कथा सुनाते हैं कि जब ऋषि सौ दिव्य वर्षों तक मौन ध्यान में रहे, तब आकाश से दिव्य वाणी आई: शान्त और शब्दहीन शून्य में जल प्रकट हुआ, उससे वायु फूट निकला, दोनों की टक्कर से अग्नि जला और उसने जल को ऊपर उठाया; जमा हुआ उसका स्नेह (रस) पृथ्वी बना, जो सबकी योनि है।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 1 (12.181.1)
मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा कथं स ससृजे प्रजाः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन पृच्छतः ॥
merumadhye sthito brahmā kathaṃ sa sasṛje prajāḥ | etanme sarvamācakṣva yāthātathyena pṛcchataḥ
मेरु के मध्य में स्थित ब्रह्मा ने प्रजाओं को कैसे रचा? मैं पूछता हूँ, इसलिए यह सब यथार्थ रूप में मुझे बताइए।
भृगुरुवाच
श्लोक 2 (12.181.2)
प्रजाविसर्गं पूर्वं स मानसो मनसाऽसृजत् । संरक्षणार्थं भूतानां सृष्टं प्रथमतो जलम् ॥
prajāvisargaṃ pūrvaṃ sa mānaso manasā'sṛjat | saṃrakṣaṇārthaṃ bhūtānāṃ sṛṣṭaṃ prathamato jalam
मानस (मन से उत्पन्न) उन्होंने पहले मन से प्रजाओं की सृष्टि की; प्राणियों के पालन के लिए सबसे पहले जल रचा गया।
श्लोक 3 (12.181.3)
यत्प्राणाः सर्वभूतानां वर्धन्ते येन च प्रजाः । परित्यक्ताश्च नश्यन्ति तेनेदं सर्वमावृतम् ॥
yatprāṇāḥ sarvabhūtānāṃ vardhante yena ca prajāḥ | parityaktāśca naśyanti tenedaṃ sarvamāvṛtam
जिससे सब प्राणियों के प्राण टिकते हैं और प्रजाएँ बढ़ती हैं, और जिसके छोड़ देने पर वे नष्ट हो जाते हैं, उसी से यह सब आच्छादित है।
श्लोक 4 (12.181.4)
पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमन्तश्च ये परे । सर्वं तद्वारुणं ज्ञेयमापस्तस्तम्भिरे हि ताः ॥
pṛthivī parvatā meghā mūrtimantaśca ye pare | sarvaṃ tadvāruṇaṃ jñeyamāpastastambhire hi tāḥ
पृथ्वी, पर्वत, मेघ और जो अन्य मूर्तिमान् वस्तुएँ हैं, उन सबको वरुण-सम्बन्धी, अर्थात् जलमय जानो; क्योंकि वे जल ही जमकर ठोस हो गए।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 5 (12.181.5)
कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ । कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान् ॥
kathaṃ salilamutpannaṃ kathaṃ caivāgnimārutau | kathaṃ vā medinī sṛṣṭetyatra me saṃśayo mahān
जल कैसे उत्पन्न हुआ, और अग्नि तथा वायु कैसे? और पृथ्वी कैसे रची गई? इस विषय में मुझे बड़ा संशय है।
भृगुरुवाच
श्लोक 6 (12.181.6)
ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन्ब्रह्मर्षीणां समागमे । लोकसंभवसन्देहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥
brahmakalpe purā brahmanbrahmarṣīṇāṃ samāgame | lokasaṃbhavasandehaḥ samutpanno mahātmanām
हे ब्रह्मन्, बहुत पहले ब्रह्मकल्प में ब्रह्मर्षियों की एक सभा में उन महात्माओं के मन में लोकों की उत्पत्ति के विषय में संदेह उठा।
श्लोक 7 (12.181.7)
तेऽतिष्ठन्ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः । त्यक्ताहाराः पवनपा दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ॥
te'tiṣṭhandhyānamālambya maunamāsthāya niścalāḥ | tyaktāhārāḥ pavanapā divyaṃ varṣaśataṃ dvijāḥ
वे द्विज ध्यान का आश्रय लेकर, मौन धारण किए, निश्चल भाव से, आहार त्यागकर और वायु पर रहकर सौ दिव्य वर्षों तक खड़े रहे।
श्लोक 8 (12.181.8)
तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत् । दिव्या सरस्वती तत्र संबभूव नभस्तलात् ॥
teṣāṃ brahmamayī vāṇī sarveṣāṃ śrotramāgamat | divyā sarasvatī tatra saṃbabhūva nabhastalāt
तब ब्रह्ममयी वाणी, दिव्य सरस्वती, आकाश से प्रकट होकर उन सबके कानों में पहुँची।
श्लोक 9 (12.181.9)
पुराऽस्तमितनिःशब्दमाकाशमचलोपमम् । नष्टचन्द्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव संबभौ ॥
purā'stamitaniḥśabdamākāśamacalopamam | naṣṭacandrārkapavanaṃ prasuptamiva saṃbabhau
पूर्वकाल में आकाश शान्त और शब्दहीन, पर्वत के समान अचल था; चन्द्रमा, सूर्य और वायु के लुप्त होने पर वह मानो गहरी नींद में सोया हुआ-सा लगता था।
श्लोक 10 (12.181.10)
ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीवापरं तमः । तस्माच्च सलिलोत्पीडात्समजायत मारुतः ॥
tataḥ salilamutpannaṃ tamasīvāparaṃ tamaḥ | tasmācca salilotpīḍātsamajāyata mārutaḥ
तब जल उत्पन्न हुआ, मानो अन्धकार में एक और अन्धकार हो; और उस जल के दबाव से वायु उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 11 (12.181.11)
यथा भाजनमच्छिद्रं निःशब्दमिह लक्ष्यते । तच्चाम्भसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः ॥
yathā bhājanamacchidraṃ niḥśabdamiha lakṣyate | taccāmbhasā pūryamāṇaṃ saśabdaṃ kurute'nilaḥ
जैसे छेदरहित बर्तन शब्दहीन दिखता है, पर जल से भरते समय उसमें वायु शब्द करने लगती है,
श्लोक 12 (12.181.12)
तथा सलिलसंरुद्धे नभसोऽन्ते निरन्तरे । भित्त्वाऽर्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान् ॥
tathā salilasaṃruddhe nabhaso'nte nirantare | bhittvā'rṇavatalaṃ vāyuḥ samutpatati ghoṣavān
वैसे ही जब आकाश जल से बिना अन्तर के ठसाठस भर गया, तब वायु समुद्र की तलहटी को भेदकर गर्जना करता हुआ ऊपर उठा।
श्लोक 13 (12.181.13)
स एष चरते वायुरर्णवोत्पीडसंभवः । आकाशस्थानमासाद्य प्रशान्तिं नाधिगच्छति ॥
sa eṣa carate vāyurarṇavotpīḍasaṃbhavaḥ | ākāśasthānamāsādya praśāntiṃ nādhigacchati
समुद्र के दबाव से उत्पन्न वह वायु इधर-उधर घूमता है; आकाश के स्थान में पहुँचकर भी उसे शान्ति नहीं मिलती।
श्लोक 14 (12.181.14)
तस्मिन्वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः । प्रादुर्बभूवोर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं नभः ॥
tasminvāyvambusaṃgharṣe dīptatejā mahābalaḥ | prādurbabhūvordhvaśikhaḥ kṛtvā nistimiraṃ nabhaḥ
वायु और जल की उस टक्कर में प्रज्वलित और महाबली अग्नि प्रकट हुआ, जिसकी लपट ऊपर की ओर उठ रही थी, और जिसने आकाश को अन्धकार से रहित कर दिया।
श्लोक 15 (12.181.15)
अग्निः पवनसंयुक्तः खात्समुत्क्षिपते जलम् । सोऽग्निमारुतसंयोगाद्धनत्वमुपपद्यते ॥
agniḥ pavanasaṃyuktaḥ khātsamutkṣipate jalam | so'gnimārutasaṃyogāddhanatvamupapadyate
वायु से युक्त अग्नि ने आकाश से जल को ऊपर उछाल दिया; और अग्नि तथा वायु के संयोग से वह जल घनता को प्राप्त हो गया।
श्लोक 16 (12.181.16)
तस्याकाशान्निपतितः स्नेहस्तिष्ठति योऽपरः । स संघातत्वमापन्नो भूमित्वमनुगच्छति ॥
tasyākāśānnipatitaḥ snehastiṣṭhati yo'paraḥ | sa saṃghātatvamāpanno bhūmitvamanugacchati
उसका जो दूसरा स्नेह (रस) आकाश से गिरकर वहाँ टिका रहा, वह संहत होकर पृथ्वी के रूप को प्राप्त हुआ।
श्लोक 17 (12.181.17)
रसानां सर्वगन्धानां स्नेहानां प्राणिनां तथा । भूमिर्योनिरिह ज्ञेया यस्यां सर्वं प्रसूयते ॥
rasānāṃ sarvagandhānāṃ snehānāṃ prāṇināṃ tathā | bhūmiryoniriha jñeyā yasyāṃ sarvaṃ prasūyate
रसों, सब गन्धों, स्नेहों (चिकने पदार्थों) और प्राणियों की योनि यहाँ पृथ्वी को जानो, जिसमें सब कुछ उत्पन्न होता है।