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शान्ति पर्व · अध्याय 182

पाँच महाभूत, इन्द्रियाँ और वृक्षों में जीवन

भरद्वाज पूछते हैं कि केवल पाँच ही महाभूत क्यों कहलाते हैं, और वृक्ष, जिनमें इन्द्रियाँ नहीं दिखतीं, उनसे कैसे बने हो सकते हैं। भृगु उत्तर देते हैं कि वृक्षों में आकाश है, उनमें स्पर्श, श्रवण, दर्शन, घ्राण और रस का बोध दिखता है, वे सुख-दुःख अनुभव करते हैं और कटने पर फिर उग आते हैं, इसलिए वे जीवित हैं। फिर वे बताते हैं कि पाँच भूत शरीर, पाँच प्राणवायु तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द के गुणों और उनके भेदों को कैसे बनाते हैं, और अन्त में सात स्वरों तथा देहधारियों में सदा जागने वाले जल, अग्नि और वायु का वर्णन करते हैं।

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

भरद्वाज उवाच

श्लोक 1 (12.182.1)

त एते धातवः पञ्च ब्रह्मा यानसृजत्पुरा । आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञिताः ॥

ta ete dhātavaḥ pañca brahmā yānasṛjatpurā | āvṛtā yairime lokā mahābhūtābhisaṃjñitāḥ

ये वे पाँच तत्त्व हैं जिन्हें ब्रह्मा ने पहले रचा था, जिनसे ये लोक घिरे हुए हैं, और जिन्हें महाभूत कहा जाता है।

श्लोक 2 (12.182.2)

यदाऽसृजत्सहस्राणि भूतानां स महामतिः । पञ्चानामेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥

yadā'sṛjatsahasrāṇi bhūtānāṃ sa mahāmatiḥ | pañcānāmeva bhūtatvaṃ kathaṃ samupapadyate

जब उन बुद्धिमान् ने हजारों प्राणी रचे, तब केवल पाँच को ही 'भूत' कहना कैसे संगत होता है?

भृगुरुवाच

श्लोक 3 (12.182.3)

अमितानां महाशब्दो भूतानां याति संभवम् । ततस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥

amitānāṃ mahāśabdo bhūtānāṃ yāti saṃbhavam | tatasteṣāṃ mahābhūtaśabdo'yamupapadyate

'महा' शब्द असंख्य प्राणियों की उत्पत्ति के साथ जुड़ता है; इसीलिए उनके लिए 'महाभूत' नाम उचित बैठता है।

श्लोक 4 (12.182.4)

चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माऽग्निः सलिलं द्रवः । पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥

ceṣṭā vāyuḥ khamākāśamūṣmā'gniḥ salilaṃ dravaḥ | pṛthivī cātra saṃghātaḥ śarīraṃ pāñcabhautikam

चेष्टा वायु है, शून्य स्थान आकाश है, ऊष्मा अग्नि है, द्रव जल है, और यहाँ का ठोस पिण्ड पृथ्वी है। इस प्रकार शरीर पाँच भूतों से बना है।

श्लोक 5 (12.182.5)

इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावरजङ्गमम् । श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिताः ॥

ityetaiḥ pañcabhirbhūtairyuktaṃ sthāvarajaṅgamam | śrotraṃ ghrāṇaṃ rasaḥ sparśo dṛṣṭiścendriyasaṃjñitāḥ

चर और अचर सब इन्हीं पाँच भूतों से युक्त हैं। श्रवण, घ्राण, रस, स्पर्श और दृष्टि इन्द्रियाँ कहलाती हैं।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 6 (12.182.6)

पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः । स्थावराणां न दृश्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥

pañcabhiryadi bhūtaistu yuktāḥ sthāvarajaṅgamāḥ | sthāvarāṇāṃ na dṛśyante śarīre pañca dhātavaḥ

यदि चर और अचर पाँच भूतों से युक्त हैं, तो अचर वस्तुओं के शरीर में ये पाँच तत्त्व दिखाई नहीं देते।

श्लोक 7 (12.182.7)

अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः । वृक्षा नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥

anūṣmaṇāmaceṣṭānāṃ ghanānāṃ caiva tattvataḥ | vṛkṣā nopalabhyante śarīre pañca dhātavaḥ

वृक्ष ऊष्मा और चेष्टा से रहित तथा घने हैं; वास्तव में उनके शरीर में ये पाँच तत्त्व नहीं पाए जाते।

श्लोक 8 (12.182.8)

न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरसवेदिनः । न च स्पर्शं विजानन्ति ते कथं पाञ्चभौतिकाः ॥

na śṛṇvanti na paśyanti na gandharasavedinaḥ | na ca sparśaṃ vijānanti te kathaṃ pāñcabhautikāḥ

वे न सुनते हैं, न देखते हैं, न गन्ध और रस को जानते हैं, और न स्पर्श का ज्ञान रखते हैं। फिर वे पाँच भूतों से बने कैसे हो सकते हैं?

श्लोक 9 (12.182.9)

अद्रवत्वादनग्नित्वादभौमत्वादवायुतः । आकाशस्याप्रमेयत्वाद्वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥

adravatvādanagnitvādabhaumatvādavāyutaḥ | ākāśasyāprameyatvādvṛkṣāṇāṃ nāsti bhautikam

उनमें द्रवता, अग्नि, पार्थिवता और वायु नहीं है, और आकाश का भी पता नहीं चलता; इसलिए वृक्षों में भूतों से बना कुछ नहीं है।

भृगुरुवाच

श्लोक 10 (12.182.10)

घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः । तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥

ghanānāmapi vṛkṣāṇāmākāśo'sti na saṃśayaḥ | teṣāṃ puṣpaphalavyaktirnityaṃ samupapadyate

घने वृक्षों में भी आकाश है, इसमें संदेह नहीं; इसी से उनमें फूल और फल का प्रकट होना सदा सिद्ध होता है।

श्लोक 11 (12.182.11)

ऊष्मतो म्लायते वर्णं त्वक्फलं पुष्पमेव च । म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥

ūṣmato mlāyate varṇaṃ tvakphalaṃ puṣpameva ca | mlāyate śīryate cāpi sparśastenātra vidyate

ऊष्मा से उनका रंग, छाल, फल और फूल मुरझा जाते हैं; वे मुरझाते और झड़ते भी हैं। इसलिए उनमें स्पर्श का बोध है।

श्लोक 12 (12.182.12)

वाय्वग्न्यशनिनिष्पेषैः फलं पुष्पं विशीर्यते । श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥

vāyvagnyaśaniniṣpeṣaiḥ phalaṃ puṣpaṃ viśīryate | śrotreṇa gṛhyate śabdastasmācchṛṇvanti pādapāḥ

वायु, अग्नि और वज्र के आघातों से फल-फूल बिखर जाते हैं, और शब्द कान से ग्रहण किया जाता है; इसलिए वृक्ष सुनते हैं।

श्लोक 13 (12.182.13)

वल्ली वेष्टयते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति । न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात्पश्यन्ति पादपाः ॥

vallī veṣṭayate vṛkṣaṃ sarvataścaiva gacchati | na hyadṛṣṭeśca mārgo'sti tasmātpaśyanti pādapāḥ

लता वृक्ष को लपेट लेती है और चारों ओर जाती है; जो देखता नहीं उसके लिए कोई मार्ग नहीं होता; इसलिए वृक्ष देखते हैं।

श्लोक 14 (12.182.14)

पुण्यापुण्यैस्तथा गन्धैर्धूपैश्च विविधैरपि । अरोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः ॥

puṇyāpuṇyaistathā gandhairdhūpaiśca vividhairapi | arogāḥ puṣpitāḥ santi tasmājjighranti pādapāḥ

शुभ-अशुभ गन्धों और अनेक प्रकार के धूपों से वे रोगरहित होकर फूलते हैं; इसलिए वृक्ष सूँघते हैं।

श्लोक 15 (12.182.15)

पादैः सलिलपानाच्च व्याधीनां चापि दर्शनात् । व्याधिप्रतिक्रियत्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे ॥

pādaiḥ salilapānācca vyādhīnāṃ cāpi darśanāt | vyādhipratikriyatvācca vidyate rasanaṃ drume

वे पैरों (जड़ों) से जल पीते हैं, उनमें रोग दिखाई देते हैं, और रोगों का उपचार भी होता है; इसलिए वृक्ष में रसना (स्वाद का बोध) है।

श्लोक 16 (12.182.16)

वक्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत् । तथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः ॥

vakreṇotpalanālena yathordhvaṃ jalamādadet | tathā pavanasaṃyuktaḥ pādaiḥ pibati pādapaḥ

जैसे मुड़ी हुई कमलनाल से जल ऊपर खींचा जाता है, वैसे ही वायु से युक्त होकर वृक्ष पैरों (जड़ों) से जल पीता है।

श्लोक 17 (12.182.17)

सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥

sukhaduḥkhayośca grahaṇācchinnasya ca virohaṇāt | jīvaṃ paśyāmi vṛkṣāṇāmacaitanyaṃ na vidyate

सुख-दुःख को ग्रहण करने और कटने पर फिर उग आने से मैं वृक्षों में जीव देखता हूँ; उनमें चेतना का अभाव नहीं है।

श्लोक 18 (12.182.18)

तेन तज्जलमादत्तं जरयत्यग्निमारुतौ । आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥

tena tajjalamādattaṃ jarayatyagnimārutau | āhārapariṇāmācca sneho vṛddhiśca jāyate

इस प्रकार लिया गया जल अग्नि और वायु द्वारा पचाया जाता है, और आहार के परिणाम से स्निग्धता तथा वृद्धि उत्पन्न होती है।

श्लोक 19 (12.182.19)

जङ्गमानां च सर्वेषां शरीरे पञ्च धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ॥

jaṅgamānāṃ ca sarveṣāṃ śarīre pañca dhātavaḥ | pratyekaśaḥ prabhidyante yaiḥ śarīraṃ viceṣṭate

सभी जंगम प्राणियों के शरीर में पाँच तत्त्व हैं, जो अलग-अलग विभक्त होते हैं और जिनसे शरीर चेष्टा करता है।

श्लोक 20 (12.182.20)

त्वक्च मांसं तथाऽस्थीनि मज्जा स्नायुश्च पञ्चमम् । इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमयम् ॥

tvakca māṃsaṃ tathā'sthīni majjā snāyuśca pañcamam | ityetadiha saṃghātaṃ śarīre pṛthivīmayam

त्वचा, मांस, अस्थियाँ, मज्जा और पाँचवाँ स्नायु: यह शरीर में पृथ्वीमय संघात है।

श्लोक 21 (12.182.21)

तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जरयते यच्च पञ्चाग्नेयाः शरीरिणः ॥

tejo hyagnistathā krodhaścakṣurūṣmā tathaiva ca | agnirjarayate yacca pañcāgneyāḥ śarīriṇaḥ

तेज, अग्नि, क्रोध, नेत्र और ऊष्मा, तथा जो अन्न को पचाती है वह अग्नि: इस प्रकार देहधारियों के शरीर में पाँच आग्नेय अंश हैं।

श्लोक 22 (12.182.22)

श्रोत्रं घ्राणं तथाऽऽस्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पञ्च धातवः ॥

śrotraṃ ghrāṇaṃ tathā''syaṃ ca hṛdayaṃ koṣṭhameva ca | ākāśātprāṇināmete śarīre pañca dhātavaḥ

कान, नाक, मुख, हृदय और उदर: ये प्राणियों के शरीर में आकाश से बने पाँच तत्त्व हैं।

श्लोक 23 (12.182.23)

श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च । इत्यापः पञ्चधा देहे भवन्ति प्राणिनां सदा ॥

śleṣmā pittamatha svedo vasā śoṇitameva ca | ityāpaḥ pañcadhā dehe bhavanti prāṇināṃ sadā

कफ, पित्त, पसीना, चर्बी और रक्त: इस प्रकार प्राणियों के देह में जल सदा पाँच रूपों में रहता है।

श्लोक 24 (12.182.24)

प्राणात्प्राणयते प्राणी व्यानाद्व्यायच्छते तथा । गच्छत्यपाने वाक्चैव समानने समः स्थितः ॥

prāṇātprāṇayate prāṇī vyānādvyāyacchate tathā | gacchatyapāne vākcaiva samānane samaḥ sthitaḥ

प्राण से प्राणी जीवित रहता है, व्यान से वह उद्यम करता है; अपान में वायु नीचे जाती है और वाणी भी; समान में वह सम होकर स्थित रहती है।

श्लोक 25 (12.182.25)

उदानादुच्छ्वसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते । इत्येते वायवः पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम् ॥

udānāducchvasiti ca pratibhedācca bhāṣate | ityete vāyavaḥ pañca ceṣṭayantīha dehinam

उदान से वह श्वास लेता है और उसके भेदों से बोलता है। इस प्रकार ये पाँच वायु यहाँ देहधारी को चेष्टा में लगाते हैं।

श्लोक 26 (12.182.26)

भूमेर्गन्धगुणान्वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् । ज्योतेः पश्यति रूपाणि स्पर्शं वेत्ति च वायुतः । शब्दं शृणोति च तदैवाकाशात्तु शरीरवान् ॥

bhūmergandhaguṇānvetti rasaṃ cādbhyaḥ śarīravān | jyoteḥ paśyati rūpāṇi sparśaṃ vetti ca vāyutaḥ | śabdaṃ śṛṇoti ca tadaivākāśāttu śarīravān

देहधारी पृथ्वी से गन्ध के गुणों को जानता है और जल से रस को; ज्योति से रूपों को देखता है और वायु से स्पर्श को जानता है; और उसी प्रकार आकाश से देहधारी शब्द को सुनता है।

श्लोक 27 (12.182.27)

गन्धः स्पर्शो रसो रूपं शब्दश्चात्र गुणाः स्मृताः । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान्गुणान् ॥

gandhaḥ sparśo raso rūpaṃ śabdaścātra guṇāḥ smṛtāḥ | tasya gandhasya vakṣyāmi vistarābhihitānguṇān

गन्ध, स्पर्श, रस, रूप और शब्द: ये यहाँ गुण कहे गए हैं। मैं गन्ध के गुणों को विस्तार से कहे अनुसार तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 28 (12.182.28)

इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरः कटुरेव च । निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च । एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्धविस्तरः ॥

iṣṭaścāniṣṭagandhaśca madhuraḥ kaṭureva ca | nirhārī saṃhataḥ snigdho rūkṣo viśada eva ca | evaṃ navavidho jñeyaḥ pārthivo gandhavistaraḥ

इष्ट और अनिष्ट गन्ध, मधुर और तीखी, फैलने वाली और घनी, स्निग्ध और रूखी, तथा विशद (स्पष्ट): इस प्रकार पार्थिव गन्ध का विस्तार नौ प्रकार का जानना चाहिए।

श्लोक 29 (12.182.29)

ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यां स्पर्शं वेत्ति च वायुना । शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः ॥

jyotiḥ paśyati cakṣurbhyāṃ sparśaṃ vetti ca vāyunā | śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca rasaścāpi guṇāḥ smṛtāḥ

वह ज्योति से दोनों नेत्रों द्वारा देखता है और वायु से स्पर्श को जानता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस भी गुण माने गए हैं।

श्लोक 30 (12.182.30)

रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु । रसो बहुविधः प्रोक्तः सूरिभिः प्रथितात्मभिः ॥

rasajñānaṃ tu vakṣyāmi tanme nigadataḥ śṛṇu | raso bahuvidhaḥ proktaḥ sūribhiḥ prathitātmabhiḥ

अब मैं रस का ज्ञान बताऊँगा; मैं जैसे कहता हूँ, सुनो। प्रसिद्ध बुद्धि वाले विद्वानों ने रस को अनेक प्रकार का कहा है।

श्लोक 31 (12.182.31)

मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा । एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः ॥

madhuro lavaṇastiktaḥ kaṣāyo'mlaḥ kaṭustathā | evaṃ ṣaḍvidhavistāro raso vārimayaḥ smṛtaḥ

मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल और कटु: इस प्रकार जलमय रस का विस्तार छह प्रकार का है।

श्लोक 32 (12.182.32)

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते । ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् । ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥

śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca triguṇaṃ jyotirucyate | jyotiḥ paśyati rūpāṇi rūpaṃ ca bahudhā smṛtam | hrasvo dīrghastathā sthūlaścaturasro'ṇuvṛttavān

शब्द, स्पर्श और रूप: ज्योति (अग्नि) को तीन गुणों वाला कहा जाता है। ज्योति रूपों को देखती है, और रूप अनेक प्रकार का माना गया है: ह्रस्व, दीर्घ और स्थूल, चौकोर, सूक्ष्म और गोल।

श्लोक 33 (12.182.33)

शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तः पीतो नीलारुणस्तथा । कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदुदारुणः । एवं द्वादशविस्तारो ज्योतीरूपगुणः स्मृतः ॥

śuklaḥ kṛṣṇastathā raktaḥ pīto nīlāruṇastathā | kaṭhinaścikkaṇaḥ ślakṣṇaḥ picchilo mṛdudāruṇaḥ | evaṃ dvādaśavistāro jyotīrūpaguṇaḥ smṛtaḥ

श्वेत, काला, लाल, पीला, नीला और अरुण; कठिन, चिकना, महीन, फिसलनदार, कोमल और कठोर: इस प्रकार अग्नि के रूप-गुण का विस्तार बारह प्रकार का है।

श्लोक 34 (12.182.34)

शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत । वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ॥

śabdasparśau ca vijñeyau dviguṇo vāyurityuta | vāyavyastu guṇaḥ sparśaḥ sparśaśca bahudhā smṛtaḥ

वायु को शब्द और स्पर्श, इन दो गुणों वाला जानना चाहिए। स्पर्श वायु का गुण है, और स्पर्श अनेक प्रकार का माना गया है।

श्लोक 35 (12.182.35)

उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च । तथा खरो मृदू रूक्षो लघुर्गुरुतरोऽपि च । एवं द्वादशधा स्पर्शो वायव्यो गुण उच्यते ॥

uṣṇaḥ śītaḥ sukho duḥkhaḥ snigdho viśada eva ca | tathā kharo mṛdū rūkṣo laghurgurutaro'pi ca | evaṃ dvādaśadhā sparśo vāyavyo guṇa ucyate

उष्ण, शीत, सुखद, दुःखद, स्निग्ध और विशद; खुरदरा, कोमल, रूखा, हल्का और भारी: इस प्रकार वायु का स्पर्श-गुण बारह प्रकार का कहा जाता है।

श्लोक 36 (12.182.36)

तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् । तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरं विविधात्मकम् ॥

tatraikaguṇamākāśaṃ śabda ityeva tatsmṛtam | tasya śabdasya vakṣyāmi vistaraṃ vividhātmakam

आकाश का एक ही गुण है, शब्द, ऐसा कहा गया है। मैं उस शब्द का अनेक प्रकार का विस्तार बताऊँगा।

श्लोक 37 (12.182.37)

षड्‌ज ऋषभगान्धारौ मध्यमो धैवतस्तथा । पञ्चमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् ॥

ṣaḍja ṛṣabhagāndhārau madhyamo dhaivatastathā | pañcamaścāpi vijñeyastathā cāpi niṣādavān

षड्ज, ऋषभ और गान्धार, मध्यम और धैवत, पंचम भी, तथा निषाद भी जानना चाहिए।

श्लोक 38 (12.182.38)

एष सप्तविधः प्रोक्तः शब्द आकाशसंभवः । त्रैस्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु ॥

eṣa saptavidhaḥ proktaḥ śabda ākāśasaṃbhavaḥ | traisvaryeṇa tu sarvatra sthito'pi paṭahādiṣu

यह सात प्रकार का शब्द है, जो आकाश से उत्पन्न कहा गया है; यह तीनों स्वरों सहित सर्वत्र, यहाँ तक कि ढोल आदि में भी, स्थित है।

श्लोक 39 (12.182.39)

मृदङ्गभेरीशङ्खानां स्तनयित्नो रथस्य च । यः कश्चिच्छ्रूयते शब्दः प्राणिनोऽप्राणिनोऽपि वा । एतेषामेव सर्वेषां विषये संप्रकीर्तितः ॥

mṛdaṅgabherīśaṅkhānāṃ stanayitno rathasya ca | yaḥ kaścicchrūyate śabdaḥ prāṇino'prāṇino'pi vā | eteṣāmeva sarveṣāṃ viṣaye saṃprakīrtitaḥ

मृदंग, भेरी, शंख, मेघगर्जन और रथ का, तथा प्राणी या अप्राणी का, जो कोई भी शब्द सुना जाता है, वह इन्हीं सबके क्षेत्र में आता है, ऐसा कहा गया है।

श्लोक 40 (12.182.40)

एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसंभवः । आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह ॥

evaṃ bahuvidhākāraḥ śabda ākāśasaṃbhavaḥ | ākāśajaṃ śabdamāhurebhirvāyuguṇaiḥ saha

इस प्रकार आकाश से उत्पन्न शब्द अनेक रूपों वाला है। आकाश से उत्पन्न शब्द को वायु के इन गुणों के साथ कहा जाता है।

श्लोक 41 (12.182.41)

अव्याहतैश्चेतयते न वेत्ति विषमस्थितैः । आप्याय्यन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः ॥

avyāhataiścetayate na vetti viṣamasthitaiḥ | āpyāyyante ca te nityaṃ dhātavastaistu dhātubhiḥ

वे बाधारहित हों तो उनसे बोध होता है, और बिगड़ी हुई स्थिति में हों तो बोध नहीं होता। और वे धातुएँ (तत्त्व) उन्हीं धातुओं से सदा पोषित होती रहती हैं।

श्लोक 42 (12.182.42)

आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु । मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः ॥

āpo'gnirmārutaścaiva nityaṃ jāgrati dehiṣu | mūlamete śarīrasya vyāpya prāṇāniha sthitāḥ

जल, अग्नि और वायु देहधारियों में सदा जागते रहते हैं। ये शरीर के मूल हैं, प्राणों में व्याप्त होकर यहाँ स्थित हैं।

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