शान्ति पर्व · अध्याय 183
शरीर में प्राणवायु और अग्नि
भरद्वाज पूछते हैं कि पार्थिव शरीर में अग्नि कैसे रहती है और वायु उसके रिक्त स्थानों में कैसे चलता है। भृगु शरीर के पाँच प्राणों का वर्णन करते हैं: प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान, उनके स्थान और कार्य, और बताते हैं कि प्राण तथा अपान के बीच पाचन की अग्नि कैसे प्रज्वलित रहती है। वे हृदय से फैली दस नाड़ियों का वर्णन करते हैं जो अन्न के रस को ले जाती हैं, और इसे उन योगियों का मार्ग बताते हैं जो आत्मा को मस्तक में स्थित करते हैं।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 1 (12.183.1)
पार्थिवं धातुमाश्रित्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् । अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥
pārthivaṃ dhātumāśritya śārīro'gniḥ kathaṃ bhavet | avakāśaviśeṣeṇa kathaṃ vartayate'nilaḥ
पार्थिव धातु का आश्रय लेकर शरीर की अग्नि कैसे बनी रहती है? और वायु विशेष अवकाशों के द्वारा कैसे चलता है?
भृगुरुवाच
श्लोक 2 (12.183.2)
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन्कीर्तयिष्यामि तेऽनघ । प्राणिनामनिलो देहान्यथा चेष्टयते बली ॥
vāyorgatimahaṃ brahmankīrtayiṣyāmi te'nagha | prāṇināmanilo dehānyathā ceṣṭayate balī
हे ब्रह्मन्, हे निष्पाप, मैं तुम्हें वायु की गति बताऊँगा: बलवान् वायु प्राणियों के शरीरों को किस प्रकार चेष्टा में लगाता है।
श्लोक 3 (12.183.3)
श्रितो मूर्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥
śrito mūrdhānamagnistu śarīraṃ paripālayan | prāṇo mūrdhani cāgnau ca vartamāno viceṣṭate
अग्नि मस्तक में रहकर शरीर की रक्षा करती है; प्राण मस्तक और अग्नि में रहकर उसे चेष्टा में लगाता है।
श्लोक 4 (12.183.4)
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि विषयाश्च सः ॥
sa jantuḥ sarvabhūtātmā puruṣaḥ sa sanātanaḥ | mano buddhirahaṃkāro bhūtāni viṣayāśca saḥ
वही जन्तु है, सब भूतों की आत्मा, सनातन पुरुष; वही मन, बुद्धि, अहंकार, भूत और विषय है।
श्लोक 5 (12.183.5)
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते । कोष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥
evaṃ tviha sa sarvatra prāṇena paripālyate | koṣṭhatastu samānena svāṃ svāṃ gatimupāśritaḥ
इस प्रकार वह यहाँ सर्वत्र प्राण से रक्षित होता है, और उदर में समान से, अपने-अपने मार्ग का आश्रय लिए हुए।
श्लोक 6 (12.183.6)
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं चाप्यपानः परिवर्तते ॥
vastimūlaṃ gudaṃ caiva pāvakaṃ samupāśritaḥ | vahanmūtraṃ purīṣaṃ cāpyapānaḥ parivartate
वस्ति के मूल, गुदा और अग्नि में स्थित होकर अपान मूत्र और मल को बाहर ले जाता हुआ चलता है।
श्लोक 7 (12.183.7)
प्रयत्ने कर्मणि बले य एकस्त्रिषु वर्तते । उदान इति तं प्राहुरध्यात्मकुशला जनाः ॥
prayatne karmaṇi bale ya ekastriṣu vartate | udāna iti taṃ prāhuradhyātmakuśalā janāḥ
जो अकेला प्रयत्न, कर्म और बल, इन तीनों में कार्य करता है, उसे अध्यात्म में कुशल लोग उदान कहते हैं।
श्लोक 8 (12.183.8)
संधिष्वपि च सर्वेषु सन्निविष्टस्तथाऽनिलः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥
saṃdhiṣvapi ca sarveṣu sanniviṣṭastathā'nilaḥ | śarīreṣu manuṣyāṇāṃ vyāna ityupadiśyate
मनुष्यों के शरीरों में सब सन्धियों में बैठा हुआ वायु व्यान कहा जाता है।
श्लोक 9 (12.183.9)
धातुष्वग्निस्तु विततः समानोऽग्निः समीरितः । रसान्धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नवतिष्ठते ॥
dhātuṣvagnistu vitataḥ samāno'gniḥ samīritaḥ | rasāndhātūṃśca doṣāṃśca vartayannavatiṣṭhate
धातुओं में फैली हुई अग्नि को समान कहा गया है; वह रसों, धातुओं और दोषों को गति देती हुई वहाँ स्थित रहती है।
श्लोक 10 (12.183.10)
अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः । समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ॥
apānaprāṇayormadhye prāṇāpānasamāhitaḥ | samanvitastvadhiṣṭhānaṃ samyakpacati pāvakaḥ
अपान और प्राण के बीच प्राण और अपान से धारण की हुई तथा उनसे युक्त अग्नि अपने स्थान में भली-भाँति पाचन करती है।
श्लोक 11 (12.183.11)
आस्यं हि पायुसंयुक्तमन्ते स्याद्गुदसंज्ञितम् । स्रोतस्तस्मात्प्रजायन्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम् ॥
āsyaṃ hi pāyusaṃyuktamante syādgudasaṃjñitam | srotastasmātprajāyante sarvasrotāṃsi dehinām
मुख नीचे के मार्ग से जुड़ा है, और उसके अन्त में गुदा कहलाने वाला स्थान है; उसी से देहधारियों के सब स्रोत (मार्ग) निकलते हैं।
श्लोक 12 (12.183.12)
प्राणानां सन्निपाताच्च सन्निपातः प्रजायते । ऊष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥
prāṇānāṃ sannipātācca sannipātaḥ prajāyate | ūṣmā so'gniriti jñeyo yo'nnaṃ pacati dehinām
प्राणों के मिलने से एक संयोग (ताप) उत्पन्न होता है। उसी ऊष्मा को अग्नि जानना चाहिए, जो देहधारियों के अन्न को पचाती है।
श्लोक 13 (12.183.13)
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते । स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥
agnivegavahaḥ prāṇo gudānte pratihanyate | sa ūrdhvamāgamya punaḥ samutkṣipati pāvakam
अग्नि के वेग को वहन करने वाला प्राण गुदा के अन्त में रोक दिया जाता है; वह ऊपर आकर फिर अग्नि को उभार देता है।
श्लोक 14 (12.183.14)
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्या ऊर्ध्वमामाशयः स्मृतः । नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाः समाश्रिताः ॥
pakvāśayastvadho nābhyā ūrdhvamāmāśayaḥ smṛtaḥ | nābhimadhye śarīrasya sarve prāṇāḥ samāśritāḥ
पक्वाशय नाभि के नीचे और आमाशय ऊपर बताया गया है; शरीर के नाभि-मध्य में सब प्राण आश्रित हैं।
श्लोक 15 (12.183.15)
प्रसृता हृदयात्सर्वास्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । वहन्त्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥
prasṛtā hṛdayātsarvāstiryagūrdhvamadhastathā | vahantyannarasānnāḍyo daśaprāṇapracoditāḥ
हृदय से सब ओर, तिरछे, ऊपर और नीचे फैली हुई नाड़ियाँ, दस प्राणों से प्रेरित होकर, अन्न के रसों को वहन करती हैं।
श्लोक 16 (12.183.16)
एष मार्गोऽथ योगानां येन गच्छन्ति तत्पदम् । जितक्लमासना धीरा मूर्धन्यात्मानमादधन् ॥
eṣa mārgo'tha yogānāṃ yena gacchanti tatpadam | jitaklamāsanā dhīrā mūrdhanyātmānamādadhan
यह योगियों का मार्ग है, जिससे वे उस पद को प्राप्त होते हैं: थकान और आसन को जीत लेने वाले धीर पुरुष आत्मा को मस्तक में स्थापित करते हैं।
श्लोक 17 (12.183.17)
एवं सर्वेषु विहितः प्राणापानेषु देहिनाम् । तस्मिन्योऽवस्थितो नित्यमग्निः स्थाल्यामिवाहितः ॥
evaṃ sarveṣu vihitaḥ prāṇāpāneṣu dehinām | tasminyo'vasthito nityamagniḥ sthālyāmivāhitaḥ
इस प्रकार देहधारियों के सब प्राणों और अपानों में यह व्यवस्था है; और उसमें जो अग्नि सदा स्थित है, वह मानो हाँडी में रखी हुई अग्नि के समान है।