शान्ति पर्व · अध्याय 184
भरद्वाज का जीव के अस्तित्व पर संदेह
भरद्वाज पृथक् जीव के विरुद्ध तर्क देते हैं: यदि वायु ही श्वास, वाणी और गति देता है और अग्नि ही ताप तथा पाचन करती है, तो जीव का कोई प्रयोजन नहीं रहता, और मरते शरीर से किसी जीव को निकलते भी नहीं देखा जाता। वे कहते हैं कि शरीर पाँच तत्त्वों का संयोग है और एक के नष्ट होने पर बिखर जाता है, तब अनुभव करने, सुनने या बोलने वाला कुछ शेष नहीं रहता। वे दाता को पार उतारने वाली गोदान की मान्यता का उपहास करते हैं, पूछते हैं कि पक्षियों द्वारा खाया या जला हुआ व्यक्ति कैसे लौटेगा, और मृत्यु की तुलना कटे हुए वृक्ष से करते हैं, जिसका बीज ही नई वृद्धि देता है।
भरद्वाज उवाच
श्लोक 1 (12.184.1)
यदि प्राणयते वायुर्वायुरेव विचेष्टते । श्वसित्याभाषते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥
yadi prāṇayate vāyurvāyureva viceṣṭate | śvasityābhāṣate caiva tasmājjīvo nirarthakaḥ
यदि वायु ही प्राण देता है, वायु ही चेष्टा करता है, श्वास लेता और बोलता है, तो जीव निरर्थक है।
श्लोक 2 (12.184.2)
यदूष्मभाव आग्नेयो वह्निना पच्यते यदि । अग्निर्जरयते चैतत्तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥
yadūṣmabhāva āgneyo vahninā pacyate yadi | agnirjarayate caitattasmājjīvo nirarthakaḥ
यदि ऊष्मा का भाव अग्नि का है, यदि अन्न अग्नि से पकाया जाता है और अग्नि ही उसे जीर्ण करती है, तो जीव निरर्थक है।
श्लोक 3 (12.184.3)
जन्तोः प्रमीयमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते । वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥
jantoḥ pramīyamāṇasya jīvo naivopalabhyate | vāyureva jahātyenamūṣmabhāvaśca naśyati
मरते हुए प्राणी में कोई जीव दिखाई नहीं देता; वायु ही उसे छोड़ता है और ऊष्मा का भाव नष्ट हो जाता है।
श्लोक 4 (12.184.4)
यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना । वायुमण्डलवद्दृश्येद्गच्छन्सह मरुद्गणैः ॥
yadi vāyumayo jīvaḥ saṃśleṣo yadi vāyunā | vāyumaṇḍalavaddṛśyedgacchansaha marudgaṇaiḥ
यदि जीव वायुमय होता, यदि वायु के साथ उसका संश्लेष होता, तो वह वायु-मण्डल के समान, मरुद्गणों के साथ जाता हुआ दिखाई देता।
श्लोक 5 (12.184.5)
श्लेषो वा यदि वा जीवः सह तेन प्रणश्यति । महार्णववियुक्तत्वादन्यत्सलिलभाजनम् ॥
śleṣo vā yadi vā jīvaḥ saha tena praṇaśyati | mahārṇavaviyuktatvādanyatsalilabhājanam
अथवा यदि जीव वायु का संश्लेष मात्र है, तो वह उसके साथ ही नष्ट हो जाता है; महासागर से अलग हो जाने पर जल का पात्र दूसरी ही वस्तु होता है।
श्लोक 6 (12.184.6)
यत्क्षिपेत्सलिलं कूपे प्रदीपं वा हुताशने । तन्नश्यत्युभयं तद्वज्जीवो वातानलात्मकः ॥
yatkṣipetsalilaṃ kūpe pradīpaṃ vā hutāśane | tannaśyatyubhayaṃ tadvajjīvo vātānalātmakaḥ
कुएँ में फेंका हुआ जल और अग्नि में डाला हुआ दीपक, ये दोनों नष्ट हो जाते हैं; उसी प्रकार जीव, जो वायु और अग्नि के स्वभाव का है, नष्ट हो जाता है।
श्लोक 7 (12.184.7)
पञ्च साधारणो ह्यस्मिञ्शरीरे जीवितं कुतः । तेषामन्यतरत्यागाच्चतुर्णां नास्ति संग्रहः ॥
pañca sādhāraṇo hyasmiñśarīre jīvitaṃ kutaḥ | teṣāmanyataratyāgāccaturṇāṃ nāsti saṃgrahaḥ
पाँचों के साधारण इस शरीर में जीवन कहाँ है? इनमें से किसी एक के छूट जाने पर शेष चारों का संग्रह नहीं रह सकता।
श्लोक 8 (12.184.8)
नश्यन्त्यापो ह्यनाधाराद्वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्ठभेदात्खमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥
naśyantyāpo hyanādhārādvāyurucchvāsanigrahāt | naśyate koṣṭhabhedātkhamagnirnaśyatyabhojanāt
आधार न रहने पर जल नष्ट होता है, श्वास रुकने पर वायु; पेट फटने पर आकाश नष्ट होता है और भोजन न मिलने पर अग्नि बुझ जाती है।
श्लोक 9 (12.184.9)
व्याधिप्राणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतमे ह्येषां संघातो याति पञ्चताम् ॥
vyādhiprāṇaparikleśairmedinī caiva śīryate | pīḍite'nyatame hyeṣāṃ saṃghāto yāti pañcatām
रोग और प्राणों के क्लेशों से पृथ्वी भी क्षीण होती है। इनमें से किसी एक के पीड़ित होने पर सारा संघात पाँचों में विलीन हो जाता है।
श्लोक 10 (12.184.10)
तस्मिन्पञ्चत्वमापन्ने जीवः किमनुधावति । किं वेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥
tasminpañcatvamāpanne jīvaḥ kimanudhāvati | kiṃ vedayati vā jīvaḥ kiṃ śṛṇoti bravīti ca
जब वह शरीर पाँच तत्त्वों में विलीन हो जाता है, तब जीव किसके पीछे दौड़ता है? जीव क्या अनुभव करता है, क्या सुनता है, या क्या कहता है?
श्लोक 11 (12.184.11)
एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति । यो दत्त्वा म्रियते जन्तुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥
eṣā gauḥ paralokasthaṃ tārayiṣyati māmiti | yo dattvā mriyate jantuḥ sā gauḥ kaṃ tārayiṣyati
'यह गौ परलोक में स्थित मुझे पार उतारेगी': ऐसा सोचकर गौ दान करके जो मनुष्य मरता है, वह गौ किसे पार उतारेगी?
श्लोक 12 (12.184.12)
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा । इहैव विलयं यान्ति कुतस्तेषां समागमः ॥
gauśca pratigrahītā ca dātā caiva samaṃ yadā | ihaiva vilayaṃ yānti kutasteṣāṃ samāgamaḥ
जब गौ, उसे लेने वाला और देने वाला, ये सब समान रूप से यहीं विलीन हो जाते हैं, तब उनका मिलना कैसे होगा?
श्लोक 13 (12.184.13)
विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात्पतितस्य च । अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥
vihagairupabhuktasya śailāgrātpatitasya ca | agninā copayuktasya kutaḥ saṃjīvanaṃ punaḥ
जिसे पक्षियों ने खा लिया हो, जो पर्वत के शिखर से गिर पड़ा हो, या जिसे अग्नि ने जला डाला हो, उसका फिर से जी उठना कैसे हो सकता है?
श्लोक 14 (12.184.14)
छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति । बीजान्यस्य प्ररोहन्ति मृतः क्व पुनरेष्यति ॥
chinnasya yadi vṛkṣasya na mūlaṃ pratirohati | bījānyasya prarohanti mṛtaḥ kva punareṣyati
यदि कटे हुए वृक्ष की जड़ फिर नहीं उगती, तो उसके बीज उगते हैं; पर मरा हुआ मनुष्य कहाँ लौटकर आएगा?
श्लोक 15 (12.184.15)
बीजमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत्परिवर्तते । मृतामृताः प्रणश्यन्ति बीजाद्वीजं प्रवर्तते ॥
bījamātraṃ purā sṛṣṭaṃ yadetatparivartate | mṛtāmṛtāḥ praṇaśyanti bījādvījaṃ pravartate
आरम्भ में केवल बीज ही रचा गया था, और वही चक्कर काटता है; मरे हुए एक-एक करके नष्ट हो जाते हैं, और बीज से बीज चलता रहता है।