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शान्ति पर्व · अध्याय 185

भृगु का उपदेश: देह के नाश पर भी जीव का नाश नहीं

भृगु भरद्वाज को बताते हैं कि शरीर के गिरने पर प्राणी का नाश नहीं होता; ईंधन के चुक जाने पर अदृश्य हो गई अग्नि की भाँति जीव दूसरे शरीर में चला जाता है। भरद्वाज आपत्ति करते हैं कि शरीर में जीव कहीं दिखता नहीं, क्योंकि मन के विचलित होने या नींद में सुनना, देखना और अनुभव करना सब थम जाता है। भृगु उत्तर देते हैं कि भीतर का आत्मा, क्षेत्रज्ञ, शरीर के द्वारा सुख-दुःख जानता है और मृत्यु में बिना नष्ट हुए देह छोड़ देता है, और ज्ञानी योग तथा चित्त की प्रसन्नता से उसे अपने भीतर देखते हैं।

अध्याय 184अध्याय-सूचीअध्याय 186

भृगुरुवाच

श्लोक 1 (12.185.1)

न प्रणाशोऽस्ति जीवानां दत्तस्य च कृतस्य च । याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥

na praṇāśo'sti jīvānāṃ dattasya ca kṛtasya ca | yāti dehāntaraṃ prāṇī śarīraṃ tu viśīryate

जीवों का नाश नहीं होता, न उनके दिए हुए का और न किए हुए का। प्राणी दूसरे शरीर में चला जाता है; केवल शरीर ही बिखरकर नष्ट होता है।

श्लोक 2 (12.185.2)

न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन्नष्टे प्रणश्यति । यथा समित्सु दग्धासु न प्रणश्यति पावकः ॥

na śarīrāśrito jīvastasminnaṣṭe praṇaśyati | yathā samitsu dagdhāsu na praṇaśyati pāvakaḥ

जीव शरीर के आश्रित नहीं है, इसलिए शरीर के नष्ट होने पर वह नष्ट नहीं होता, जैसे समिधाओं के जल जाने पर अग्नि नष्ट नहीं हो जाती।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 3 (12.185.3)

अग्नेर्यथा समिद्धस्य यदि नाशो न विद्यते । इन्धनस्योपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते ॥

agneryathā samiddhasya yadi nāśo na vidyate | indhanasyopayogānte sa cāgnirnopalabhyate

यदि प्रज्वलित अग्नि का नाश नहीं होता, तब भी ईंधन के समाप्त हो जाने पर वह अग्नि दिखाई नहीं देती।

श्लोक 4 (12.185.4)

नश्यतीत्येव जानामि शान्तमग्निमनिन्धनम् । मतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न दृश्यते ॥

naśyatītyeva jānāmi śāntamagnimanindhanam | matiryasya pramāṇaṃ vā saṃsthānaṃ vā na dṛśyate

मैं तो यही जानता हूँ कि ईंधन के बिना शान्त हुई अग्नि नष्ट हो जाती है; उसका न कोई बोध, न कोई परिमाण और न कोई आकार दिखाई देता है।

भृगुरुवाच

श्लोक 5 (12.185.5)

जीवस्य चेन्धनाग्नेश्च सदा नाशो न विद्यते । समिधामुपयोगान्ते सन्नेवाग्निर्न दृश्यते । आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्रहः स निराश्रयः ॥

jīvasya cendhanāgneśca sadā nāśo na vidyate | samidhāmupayogānte sannevāgnirna dṛśyate | ākāśānugatatvāddhi durgrahaḥ sa nirāśrayaḥ

जीव का और ईंधन की अग्नि का कभी नाश नहीं होता। समिधाओं के चुक जाने पर अग्नि विद्यमान तो रहती है, पर दिखाई नहीं देती; आकाश में व्याप्त होने से वह पकड़ में नहीं आती और निराधार रहती है।

श्लोक 6 (12.185.6)

तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशमाश्रितः । न गृह्यते तु सूक्ष्मत्वाद्यथा ज्योतिरनिन्धनम् ॥

tathā śarīrasaṃtyāge jīvo hyākāśamāśritaḥ | na gṛhyate tu sūkṣmatvādyathā jyotiranindhanam

इसी प्रकार शरीर के छूट जाने पर जीव आकाश में स्थित रहता है; सूक्ष्म होने के कारण वह ईंधन के बिना की ज्योति के समान पकड़ में नहीं आता।

श्लोक 7 (12.185.7)

प्राणान्धारयते योऽग्निः स जीव उपधार्यताम् । वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् ॥

prāṇāndhārayate yo'gniḥ sa jīva upadhāryatām | vāyusaṃdhāraṇo hyagnirnaśyatyucchvāsanigrahāt

जो अग्नि प्राणों को धारण करती है, उसी को जीव समझो। वह अग्नि वायु से धारण की जाती है और श्वास के रुक जाने पर नष्ट हो जाती है।

श्लोक 8 (12.185.8)

तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ शरीरं तदचेतनम् । पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षितिः ॥

tasminnaṣṭe śarīrāgnau śarīraṃ tadacetanam | patitaṃ yāti bhūmitvamayanaṃ tasya hi kṣitiḥ

शरीर की उस अग्नि के बुझ जाने पर शरीर अचेतन हो जाता है; वह गिरकर मिट्टी बन जाता है, क्योंकि पृथ्वी ही उसका अन्तिम आश्रय है।

श्लोक 9 (12.185.9)

जङ्गमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च । आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वं द्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ॥

jaṅgamānāṃ hi sarveṣāṃ sthāvarāṇāṃ tathaiva ca | ākāśaṃ pavano'nveti jyotistamanugacchati | teṣāṃ trayāṇāmekatvaṃ dvayaṃ bhūmau pratiṣṭhitam

समस्त चर और अचर प्राणियों में आकाश के पीछे वायु चलती है और वायु के पीछे अग्नि। ये तीनों एक हैं; शेष दो पृथ्वी पर टिके हैं।

श्लोक 10 (12.185.10)

यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया आपो मूर्तास्तथा क्षितिः ॥

yatra khaṃ tatra pavanastatrāgniryatra mārutaḥ | amūrtayaste vijñeyā āpo mūrtāstathā kṣitiḥ

जहाँ आकाश है वहाँ वायु है और जहाँ वायु है वहाँ अग्नि। इन्हें अमूर्त जानो; जल और पृथ्वी मूर्त हैं।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 11 (12.185.11)

यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ॥

yadyagnimārutau bhūmiḥ khamāpaśca śarīriṣu | jīvaḥ kiṃlakṣaṇastatretyetadācakṣva me'nagha

यदि देहधारियों में अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश और जल ही हैं, तो वहाँ जीव का लक्षण क्या है? हे निष्पाप, मुझे यह बताइए।

श्लोक 12 (12.185.12)

पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानसंयुते । शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुमिच्छामि यादृशम् ॥

pañcātmake pañcaratau pañcavijñānasaṃyute | śarīre prāṇināṃ jīvaṃ vettumicchāmi yādṛśam

पाँच तत्त्वों से बने, पाँच विषयों में रमने वाले और पाँच ज्ञानेन्द्रियों से युक्त प्राणियों के शरीर में जीव कैसा है, यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 13 (12.185.13)

मांसशोणितसंघाते मेदः स्नाय्वस्थिसंचये । भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥

māṃsaśoṇitasaṃghāte medaḥ snāyvasthisaṃcaye | bhidyamāne śarīre tu jīvo naivopalabhyate

मांस और रक्त के पुंज, मेद, स्नायु और हड्डियों के ढेर इस शरीर को चीरने पर जीव कहीं भी नहीं मिलता।

श्लोक 14 (12.185.14)

यद्यजीवं शरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् । शारीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदयते रुजम् ॥

yadyajīvaṃ śarīraṃ tu pañcabhūtasamanvitam | śārīre mānase duḥkhe kastāṃ vedayate rujam

यदि पाँच भूतों से बना शरीर जीव-रहित है, तो शरीर और मन के दुःख की वह पीड़ा कौन अनुभव करता है?

श्लोक 15 (12.185.15)

शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥

śṛṇoti kathitaṃ jīvaḥ karṇābhyāṃ na śṛṇoti tat | maharṣe manasi vyagre tasmājjīvo nirarthakaḥ

कहा जाता है कि जीव कही हुई बात सुनता है, पर हे महर्षि, मन के व्यग्र होने पर वह कानों से उसे नहीं सुनता। इसलिए जीव निरर्थक है।

श्लोक 16 (12.185.16)

सर्वं पश्यति यद्दृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा । मनसि व्याकुले तस्मिन्पश्यन्नपि न पश्यति ॥

sarvaṃ paśyati yaddṛśyaṃ manoyuktena cakṣuṣā | manasi vyākule tasminpaśyannapi na paśyati

मन से युक्त आँख से मनुष्य सब दृश्य देखता है; मन के व्याकुल होने पर वह देखते हुए भी नहीं देखता।

श्लोक 17 (12.185.17)

न पश्यति न चाघ्राति न शृणोति न भाषते । न च स्पर्शरसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥

na paśyati na cāghrāti na śṛṇoti na bhāṣate | na ca sparśarasau vetti nidrāvaśagataḥ punaḥ

जो नींद के वश में चला गया हो, वह न देखता है, न सूँघता है, न सुनता है, न बोलता है, और न स्पर्श या रस का ही अनुभव करता है।

श्लोक 18 (12.185.18)

हृष्यति क्रुध्यते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः । इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाचमीरयते च कः ॥

hṛṣyati krudhyate ko'tra śocatyudvijate ca kaḥ | icchati dhyāyati dveṣṭi vācamīrayate ca kaḥ

यहाँ कौन हर्षित होता है, कौन क्रुद्ध होता है? कौन शोक करता है और कौन घबराता है? कौन इच्छा करता है, कौन ध्यान करता है, कौन द्वेष करता है और कौन वाणी बोलता है?

भृगुरुवाच

श्लोक 19 (12.185.19)

न पञ्चसाधारणमत्र किंचि । च्छरीरमेकी वहतेऽन्तरात्मा । स वेत्ति गन्धांश्च रसाञ्श्रुतीश्च । स्पर्शं च रूपं च गुणाश्च येऽन्ये ॥

na pañcasādhāraṇamatra kiṃci | ccharīramekī vahate'ntarātmā | sa vetti gandhāṃśca rasāñśrutīśca | sparśaṃ ca rūpaṃ ca guṇāśca ye'nye

यहाँ पाँचों का साझा कुछ भी नहीं है; शरीर को एक ही अन्तरात्मा धारण करता है। वही गन्धों, रसों और शब्दों को, स्पर्श और रूप को तथा जो अन्य गुण हैं उन्हें भी जानता है।

श्लोक 20 (12.185.20)

पञ्चात्मके पञ्चगुणप्रदर्शी । स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा । स वेत्ति दुःखानि सुखानि चात्र । तद्विप्रयोगात्तु न वेत्ति देही ॥

pañcātmake pañcaguṇapradarśī | sa sarvagātrānugato'ntarātmā | sa vetti duḥkhāni sukhāni cātra | tadviprayogāttu na vetti dehī

पाँच से बने शरीर में वह अन्तरात्मा, जो सब अंगों में व्याप्त है, पाँचों गुणों को प्रकट करता है। वही यहाँ के दुःख और सुख जानता है; उसका वियोग हो जाने पर देहधारी कुछ नहीं जानता।

श्लोक 21 (12.185.21)

यदा न रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पञ्चके । तदा शान्ते शरीराग्नौ देहं त्यक्त्वा न नश्यति ॥

yadā na rūpaṃ na sparśo noṣmabhāvaśca pañcake | tadā śānte śarīrāgnau dehaṃ tyaktvā na naśyati

जब पाँचों में न रूप रहता है, न स्पर्श और न उष्णता, और शरीर की अग्नि शान्त हो जाती है, तब आत्मा देह को छोड़कर भी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 22 (12.185.22)

अम्मयं सर्वमेवेदमापो मूर्तिः शरीरिणाम् । तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥

ammayaṃ sarvamevedamāpo mūrtiḥ śarīriṇām | tatrātmā mānaso brahmā sarvabhūteṣu lokakṛt

यह सब जलमय है और जल ही देहधारियों का रूप है। उसमें मनोमय आत्मा ब्रह्मा है, जो सब प्राणियों में लोकों का कर्ता है।

श्लोक 23 (12.185.23)

आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥

ātmā kṣetrajña ityuktaḥ saṃyuktaḥ prākṛtairguṇaiḥ | taireva tu vinirmuktaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ

आत्मा जब प्रकृति के गुणों से संयुक्त होता है तब क्षेत्रज्ञ कहलाता है; उन्हीं गुणों से मुक्त होने पर उसे परमात्मा कहा गया है।

श्लोक 24 (12.185.24)

आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकविपाचकम् । स तस्मिन्संश्रितो देहे ह्यब्बिन्दुरिव पुष्करे ॥

ātmānaṃ taṃ vijānīhi sarvalokavipācakam | sa tasminsaṃśrito dehe hyabbinduriva puṣkare

उस आत्मा को समस्त लोकों को परिपक्व करने वाला जानो; वह उस शरीर में कमल के पत्ते पर जल की बूँद की भाँति टिका हुआ है।

श्लोक 25 (12.185.25)

क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् । तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥

kṣetrajñaṃ taṃ vijānīhi nityaṃ lokahitātmakam | tamo rajaśca sattvaṃ ca viddhi jīvaguṇānimān

उसे क्षेत्रज्ञ जानो, जो सदा लोक के हित में लगा रहता है। तमस्, रजस् और सत्त्व को जीव के ये गुण समझो।

श्लोक 26 (12.185.26)

सचेतनं जीवगुणं वदन्ति । स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति । प्रावर्तयद्यो भुवनानि सप्त ॥

sacetanaṃ jīvaguṇaṃ vadanti | sa ceṣṭate ceṣṭayate ca sarvam | tataḥ paraṃ kṣetravido vadanti | prāvartayadyo bhuvanāni sapta

वे कहते हैं कि चेतना जीव का गुण है; वह स्वयं चेष्टा करता है और सब से चेष्टा कराता है। उससे भी परे उसकी बात क्षेत्र को जानने वाले करते हैं, जिसने सातों भुवनों को चलाया।

श्लोक 27 (12.185.27)

न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे । मिथ्यैतदाहुर्मुत इत्यबुद्धाः । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति । दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥

na jīvanāśo'sti hi dehabhede | mithyaitadāhurmuta ityabuddhāḥ | jīvastu dehāntaritaḥ prayāti | daśārdhataivāsya śarīrabhedaḥ

देह के भेद होने पर जीव का नाश नहीं होता; जो अज्ञानी कहते हैं कि "वह मर गया", वे झूठ कहते हैं। जीव तो दूसरे शरीर में जाकर आगे बढ़ता है; शरीर का टूटना केवल उसका पाँच तत्त्वों में लौट जाना है।

श्लोक 28 (12.185.28)

एवं सर्वेषु भूतेषु गूढश्चरति संवृतः । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥

evaṃ sarveṣu bhūteṣu gūḍhaścarati saṃvṛtaḥ | dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā tattvadarśibhiḥ

इस प्रकार सब प्राणियों में छिपा हुआ वह गुप्त रूप से विचरता है; तत्त्वदर्शी उसे तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि से देखते हैं।

श्लोक 29 (12.185.29)

तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः । लध्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानंमात्मनि ॥

taṃ pūrvāpararātreṣu yuñjānaḥ satataṃ budhaḥ | ladhvāhāro viśuddhātmā paśyatyātmānaṃmātmani

जो ज्ञानी रात के पहले और पिछले पहर में निरन्तर योग करता है, हल्का आहार लेता है और जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वह आत्मा में आत्मा को देखता है।

श्लोक 30 (12.185.30)

चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽत्मनि स्थित्वा सुखमव्ययमश्नुते ॥

cittasya hi prasādena hitvā karma śubhāśubham | prasannātmā'tmani sthitvā sukhamavyayamaśnute

चित्त की प्रसन्नता से शुभ और अशुभ कर्म को त्यागकर, प्रसन्न अन्तःकरण वाला मनुष्य आत्मा में स्थित होकर अक्षय सुख पाता है।

श्लोक 31 (12.185.31)

मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते । सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चया ॥

mānaso'gniḥ śarīreṣu jīva ityabhidhīyate | sṛṣṭiḥ prajāpatereṣā bhūtādhyātmaviniścayā

शरीरों में मन की अग्नि को ही जीव कहा जाता है। यह प्रजापति की सृष्टि है और प्राणियों तथा अध्यात्म के विषय में निश्चित सिद्धान्त है।

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