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शान्ति पर्व · अध्याय 187

चार वर्णों के लक्षण; क्रोध और लोभ का संयम

भरद्वाज पूछते हैं कि मनुष्य किससे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होता है। भृगु हर वर्ण को उसके आचरण से बताते हैं और कहते हैं कि जिस शूद्र में ब्राह्मण के लक्षण हों वह शूद्र नहीं, और जिस ब्राह्मण में वे न हों वह ब्राह्मण नहीं। फिर वे लोभ और क्रोध के निग्रह, त्याग, सब प्राणियों के प्रति अहिंसा तथा मन को प्राण में और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करने का उपदेश देते हैं, और अन्त में शौच, सदाचार और दया को द्विजों का लक्षण बताते हैं।

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भरद्वाज उवाच

श्लोक 1 (12.187.1)

ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम । वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्ब्रूहि वदतां वर ॥

brāhmaṇaḥ kena bhavati kṣatriyo vā dvijottama | vaiśyaḥ śūdraśca viprarṣe tadbrūhi vadatāṃ vara

हे द्विजश्रेष्ठ, मनुष्य किससे ब्राह्मण होता है या क्षत्रिय? हे विप्रर्षि, वैश्य और शूद्र किससे होता है? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, यह मुझे बताइए।

भृगुरुवाच

श्लोक 2 (12.187.2)

जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः षट्‌सु कर्मस्ववस्थितः ॥

jātakarmādibhiryastu saṃskāraiḥ saṃskṛtaḥ śuciḥ | vedādhyayanasaṃpannaḥ ṣaṭsu karmasvavasthitaḥ

जो जातकर्म आदि संस्कारों से संस्कृत और शुद्ध है, वेदाध्ययन में निपुण है और छह कर्मों में स्थित है,

श्लोक 3 (12.187.3)

शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रियः । नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥

śaucācārasthitaḥ samyagvighasāśī gurupriyaḥ | nityavratī satyaparaḥ sa vai brāhmaṇa ucyate

जो शौच और सदाचार में स्थित है, ठीक प्रकार से यज्ञ का शेष भोजन करने वाला है, गुरु का प्रिय है, सदा व्रतों में दृढ़ और सत्य में तत्पर है, वही ब्राह्मण कहलाता है।

श्लोक 4 (12.187.4)

सत्यं दानमथाद्रोह आनृशंस्यं क्षमा धृणा । तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥

satyaṃ dānamathādroha ānṛśaṃsyaṃ kṣamā dhṛṇā | tapaśca dṛśyate yatra sa brāhmaṇa iti smṛtaḥ

सत्य, दान, अद्रोह, कोमलता, क्षमा, दया और तप, ये जिसमें दिखाई दें, वह ब्राह्मण माना गया है।

श्लोक 5 (12.187.5)

क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥

kṣatrajaṃ sevate karma vedādhyayanasaṃgataḥ | dānādānaratiryastu sa vai kṣatriya ucyate

जो क्षत्रिय के कर्म का पालन करता है, वेदाध्ययन में लगा है और दान देने तथा लेने में रुचि रखता है, वह क्षत्रिय कहलाता है।

श्लोक 6 (12.187.6)

कृपिगोरक्षवाणिज्यं यो विशत्यनिशं शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥

kṛpigorakṣavāṇijyaṃ yo viśatyaniśaṃ śuciḥ | vedādhyayanasaṃpannaḥ sa vaiśya iti saṃjñitaḥ

जो सदा शुद्ध रहकर निरन्तर खेती, गोरक्षा और व्यापार में लगा है और वेदाध्ययन में निपुण है, वह वैश्य कहलाता है।

श्लोक 7 (12.187.7)

सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥

sarvabhakṣaratirnityaṃ sarvakarmakaro'śuciḥ | tyaktavedastvanācāraḥ sa vai śūdra iti smṛtaḥ

जो सदा सब कुछ खाने में रत रहता है, हर प्रकार का काम करता है, अशुद्ध है तथा वेद और सदाचार को छोड़ चुका है, वह शूद्र कहलाता है।

श्लोक 8 (12.187.8)

शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥

śūdre caitadbhavellakṣyaṃ dvije tacca na vidyate | na vai śūdro bhavecchūdro brāhmaṇo na ca brāhmaṇaḥ

यदि ये लक्षण शूद्र में पाए जाएँ और द्विज में न हों, तो शूद्र शूद्र नहीं है और ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं।

श्लोक 9 (12.187.9)

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं ज्ञातव्यं तथा चैवात्मसंयमः ॥

sarvopāyaistu lobhasya krodhasya ca vinigrahaḥ | etatpavitraṃ jñātavyaṃ tathā caivātmasaṃyamaḥ

सब उपायों से लोभ और क्रोध का निग्रह करना चाहिए। इसे पवित्र करने वाला जानना चाहिए, और आत्मसंयम को भी।

श्लोक 10 (12.187.10)

वार्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुच्छ्रितौ ॥

vāryau sarvātmanā tau hi śreyoghātārthamucchritau

इन दोनों को पूरे मन से रोकना चाहिए, क्योंकि ये कल्याण का नाश करने के लिए उठ खड़े होते हैं।

श्लोक 11 (12.187.11)

नित्यं क्रोधाच्छ्रियं रक्षेत्तपो रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥

nityaṃ krodhācchriyaṃ rakṣettapo rakṣecca matsarāt | vidyāṃ mānāpamānābhyāmātmānaṃ tu pramādataḥ

मनुष्य को सदा अपनी श्री की क्रोध से, तप की डाह से, विद्या की मान-अपमान से और अपनी रक्षा प्रमाद से करनी चाहिए।

श्लोक 12 (12.187.12)

यस्य सर्वे समारम्भा निराशाबन्धना द्विज । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी च स बुद्धिमान् ॥

yasya sarve samārambhā nirāśābandhanā dvija | tyāge yasya hutaṃ sarvaṃ sa tyāgī ca sa buddhimān

हे द्विज, जिसके सारे कार्य आशा के बन्धन से रहित हैं और जिसके त्याग में सब कुछ हवन हो जाता है, वही त्यागी है और वही बुद्धिमान् है।

श्लोक 13 (12.187.13)

अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतिश्चरेत् । परिग्रहान्परित्यज्य भवेद्बुद्ध्या जितेन्द्रियः । अचलं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चोभयोः ॥

ahiṃsraḥ sarvabhūtānāṃ maitrāyaṇagatiścaret | parigrahānparityajya bhavedbuddhyā jitendriyaḥ | acalaṃ sthānamātiṣṭhediha cāmutra cobhayoḥ

सब प्राणियों को कष्ट न देता हुआ वह मैत्री को ही अपनी गति बनाकर चले। परिग्रह छोड़कर बुद्धि से इन्द्रियों को जीते। वह इस लोक और परलोक, दोनों में अचल स्थिति में टिके।

श्लोक 14 (12.187.14)

तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना । अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥

taponityena dāntena muninā saṃyatātmanā | ajitaṃ jetukāmena bhāvyaṃ saṅgeṣvasaṅginā

सदा तप में लगे, दमनशील, संयत चित्त वाले मुनि को, जो अब तक न जीते हुए को जीतना चाहता है, आसक्ति के विषयों के बीच अनासक्त रहना चाहिए।

श्लोक 15 (12.187.15)

इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः । अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥

indriyairgṛhyate yadyattattadvyaktamiti sthitiḥ | avyaktamiti vijñeyaṃ liṅgagrāhyamatīndriyam

जो-जो इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है, वह व्यक्त है, ऐसी स्थिति है। जो अनुमान से ही जाना जाता है और इन्द्रियों से परे है, उसे अव्यक्त जानना चाहिए।

श्लोक 16 (12.187.16)

अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः । मनः प्राणे निगृह्णीयात्प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥

avisrambhe na gantavyaṃ visrambhe dhārayenmanaḥ | manaḥ prāṇe nigṛhṇīyātprāṇaṃ brahmaṇi dhārayet

जहाँ विश्वास न हो वहाँ नहीं जाना चाहिए; जहाँ विश्वास हो वहाँ मन को स्थिर रखे। मन को प्राण में रोके और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करे।

श्लोक 17 (12.187.17)

निर्वेदादेव निर्वायान्न च किंचिद्विचिन्तयेत् । सुखं वै ब्राह्मणो ब्रह्म स वै तेनाधिगच्छति ॥

nirvedādeva nirvāyānna ca kiṃcidvicintayet | sukhaṃ vai brāhmaṇo brahma sa vai tenādhigacchati

वैराग्य से ही वह शान्त हो और कुछ भी चिन्तन न करे। ब्राह्मण के लिए ब्रह्म ही सुख है, और उसी से वह उसे पाता है।

श्लोक 18 (12.187.18)

शौचेन सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः । सानुक्रोशश्च भूतेषु तद्द्विजातिषु लक्षणम् ॥

śaucena satataṃ yuktaḥ sadācārasamanvitaḥ | sānukrośaśca bhūteṣu taddvijātiṣu lakṣaṇam

जो सदा शुद्धता से युक्त, सदाचार से सम्पन्न और प्राणियों पर दयालु है, यही द्विजों का लक्षण है।

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