शान्ति पर्व · अध्याय 191
भीष्म द्वारा सदाचार का उपदेश
युधिष्ठिर भीष्म से सदाचार के नियम बताने को कहते हैं। भीष्म कहते हैं कि सज्जन अपने आचरण से पहचाने जाते हैं, और फिर दैनिक जीवन के नियम गिनाते हैं: शौच, स्नान, सन्ध्या-वन्दन, भोजन की विधि, गुरुजनों, अतिथियों और ब्राह्मणों का सम्मान, बोलने और अभिवादन का शिष्टाचार तथा घर में संयम। वे चेताते हैं कि मनुष्यों से छिपाया पाप देवता देख लेते हैं और वह करने वाले के पास लौट आता है, और अन्त में कहते हैं कि धर्म मन का है, उसका पालन अकेले करना चाहिए, और वह परलोक में स्थायी सुख देता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.191.1)
आचारस्य विधिं तात प्रोच्यमानं त्वयाऽनघ । श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥
ācārasya vidhiṃ tāta procyamānaṃ tvayā'nagha | śrotumicchāmi dharmajña sarvajño hyasi me mataḥ
हे तात, हे निष्पाप धर्मज्ञ, मैं आपके द्वारा बताए जाते हुए आचार के विधान को सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.191.2)
दुराचारा दुर्विचेष्टा दुष्प्रज्ञाः प्रियसाहसाः । असन्तस्त्वभिविख्याताः सन्तश्चाचारलक्षणाः ॥
durācārā durviceṣṭā duṣprajñāḥ priyasāhasāḥ | asantastvabhivikhyātāḥ santaścācāralakṣaṇāḥ
जो दुराचारी, बुरी चेष्टा वाले, कुबुद्धि और दुस्साहस के प्रेमी हैं, वे असज्जन के रूप में प्रसिद्ध हैं; और सज्जन वे हैं जिनका लक्षण सदाचार है।
श्लोक 3 (12.191.3)
पुरीषं यदि वा मूत्रं ये न कुर्वन्ति मानवाः । राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये शिवालये । अग्न्यगारे तथा तीरे ये न कुर्वन्ति ते शुभाः ॥
purīṣaṃ yadi vā mūtraṃ ye na kurvanti mānavāḥ | rājamārge gavāṃ madhye dhānyamadhye śivālaye | agnyagāre tathā tīre ye na kurvanti te śubhāḥ
जो मनुष्य राजमार्ग पर, गायों के बीच, अनाज के बीच, मन्दिर में, अग्निशाला में और नदी के तट पर मल या मूत्र नहीं त्यागते, वे शुभ हैं।
श्लोक 4 (12.191.4)
शौचमावश्यकं कृत्वा देवतानां च तर्पणम् । धर्ममाहुर्मनुष्याणामुपस्पृश्य नदीं तरेत् ॥
śaucamāvaśyakaṃ kṛtvā devatānāṃ ca tarpaṇam | dharmamāhurmanuṣyāṇāmupaspṛśya nadīṃ taret
आवश्यक शौच कर लेने और देवताओं का तर्पण करने के बाद, जिसे मनुष्यों का धर्म कहते हैं, आचमन करके वह नदी में स्नान करे।
श्लोक 5 (12.191.5)
सूर्यं सदोपतिष्ठेत न स्वपेद्भास्करोदये । सायंप्रातर्जपेत्सन्ध्यां तिष्ठन्पूर्वां तथेतराम् ॥
sūryaṃ sadopatiṣṭheta na svapedbhāskarodaye | sāyaṃprātarjapetsandhyāṃ tiṣṭhanpūrvāṃ tathetarām
वह सदा सूर्य की उपासना करे और सूर्योदय के समय न सोए। सायं और प्रातः खड़े होकर सन्ध्या का जप करे, पहली सन्ध्या को भी और दूसरी को भी।
श्लोक 6 (12.191.6)
पञ्चार्द्रो भोजनं भुञ्ज्यात्प्राङ्मुखो मौनमास्थितः । न निन्द्यादन्नभक्ष्यांश्च स्वादुस्वादु च भक्षयेत् ॥
pañcārdro bhojanaṃ bhuñjyātprāṅmukho maunamāsthitaḥ | na nindyādannabhakṣyāṃśca svādusvādu ca bhakṣayet
वह हाथ, पैर और मुख गीले रखकर, पूर्व की ओर मुख करके मौन रहकर भोजन करे। अन्न और भोज्य पदार्थों की निन्दा न करे और उन्हें स्वाद ले-लेकर खाए।
श्लोक 7 (12.191.7)
नार्द्रपाणिः समुत्तिष्ठेन्नार्द्रपादः स्वपेन्निशि । देवर्षिर्नारदः प्राह एतदाचारलक्षणम् ॥
nārdrapāṇiḥ samuttiṣṭhennārdrapādaḥ svapenniśi | devarṣirnāradaḥ prāha etadācāralakṣaṇam
वह गीले हाथों से न उठे और रात में गीले पैरों से न सोए। देवर्षि नारद ने यह सदाचार का लक्षण बताया है।
श्लोक 8 (12.191.8)
शोचिष्केशमनड्वाहं देवगोष्ठं चतुष्पथम् । ब्राह्मणं धार्मिकं चैव नित्यं कुर्यात्प्रदक्षिणम् ॥
śociṣkeśamanaḍvāhaṃ devagoṣṭhaṃ catuṣpatham | brāhmaṇaṃ dhārmikaṃ caiva nityaṃ kuryātpradakṣiṇam
वह अग्नि, साँड़, देवस्थान, चौराहे और धर्मात्मा ब्राह्मण की सदा दाहिनी ओर से प्रदक्षिणा करे।
श्लोक 9 (12.191.9)
अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च । सामान्यं भोजनं भृत्यैः पुरुषस्य प्रशस्यते ॥
atithīnāṃ ca sarveṣāṃ preṣyāṇāṃ svajanasya ca | sāmānyaṃ bhojanaṃ bhṛtyaiḥ puruṣasya praśasyate
सब अतिथियों, सेवकों और अपने जनों के साथ तथा भृत्यों के साथ समान भोजन करना पुरुष के लिए प्रशंसनीय है।
श्लोक 10 (12.191.10)
सायंप्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम् । नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ॥
sāyaṃprātarmanuṣyāṇāmaśanaṃ vedanirmitam | nāntarā bhojanaṃ dṛṣṭamupavāsī tathā bhavet
मनुष्यों के लिए सायं और प्रातः का भोजन वेद ने निश्चित किया है; बीच में भोजन करना नहीं देखा गया, और इस प्रकार वह उपवास करने वाले के समान होता है।
श्लोक 11 (12.191.11)
होमकाले तथा जुह्वन्नृतुकाले तथा व्रजन् । अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ब्रह्मचारी तथा भवेत् ॥
homakāle tathā juhvannṛtukāle tathā vrajan | ananyastrījanaḥ prājño brahmacārī tathā bhavet
हवन के समय आहुति दे और ऋतुकाल में पत्नी के पास जाए; वह विवेकी पुरुष किसी अन्य स्त्री से सम्बन्ध न रखे, इस प्रकार वह ब्रह्मचारी भी हो।
श्लोक 12 (12.191.12)
अमृतं ब्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदयं कृतम् । तज्जनाः पर्युपासन्ते सत्यं सन्तः समासते ॥
amṛtaṃ brāhmaṇocchiṣṭaṃ jananyā hṛdayaṃ kṛtam | tajjanāḥ paryupāsante satyaṃ santaḥ samāsate
ब्राह्मण का उच्छिष्ट अमृत है; वह माता के हृदय के समान हितकारी बनाया गया है। लोग उसकी उपासना करते हैं और सज्जन सत्य में स्थित रहते हैं।
श्लोक 13 (12.191.13)
लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी तु यो नरः । नित्योच्छिष्टः संकसुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥
loṣṭamardī tṛṇacchedī nakhakhādī tu yo naraḥ | nityocchiṣṭaḥ saṃkasuko nehāyurvindate mahat
जो मनुष्य मिट्टी के ढेले मसलता है, तिनके तोड़ता है, नाखून चबाता है, सदा जूठे से सना रहता है और चंचल है, वह इस लोक में दीर्घ आयु नहीं पाता।
श्लोक 14 (12.191.14)
यजुषा संस्कृतं मांसं निवृत्तो मांसभक्षणात् । भक्षयेन्न वृथामांसं पृष्ठमांसं च वर्जयेत् ॥
yajuṣā saṃskṛtaṃ māṃsaṃ nivṛtto māṃsabhakṣaṇāt | bhakṣayenna vṛthāmāṃsaṃ pṛṣṭhamāṃsaṃ ca varjayet
जो मांस-भक्षण से निवृत्त हो चुका है, वह केवल यजुर्मन्त्र से संस्कारित मांस खाए; वह व्यर्थ मांस न खाए और पीठ का मांस त्याग दे।
श्लोक 15 (12.191.15)
स्वदेशे परदेशे वा अतिथिं नोपवासयेत् । काम्यकर्मफलं लब्ध्वा गुरूणामुपपादयेत् ॥
svadeśe paradeśe vā atithiṃ nopavāsayet | kāmyakarmaphalaṃ labdhvā gurūṇāmupapādayet
अपने देश में हो या दूसरे देश में, वह अतिथि को भूखा न रहने दे। किसी इच्छित कर्म का फल पाकर उसे गुरुजनों को अर्पित करे।
श्लोक 16 (12.191.16)
गुरूणामासनं देयं कर्तव्यं चाभिवादनम् । गुरूनभ्यर्च्य युज्येत आयुषा यशसा श्रिया ॥
gurūṇāmāsanaṃ deyaṃ kartavyaṃ cābhivādanam | gurūnabhyarcya yujyeta āyuṣā yaśasā śriyā
गुरुजनों को आसन देना चाहिए और उनका अभिवादन करना चाहिए। गुरुजनों की पूजा करके मनुष्य आयु, यश और श्री से युक्त होता है।
श्लोक 17 (12.191.17)
नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं न च नग्नां परस्त्रियम् । मैथुनं सततं धर्म्यं गुह्ये चैव समाचरेत् ॥
nekṣetādityamudyantaṃ na ca nagnāṃ parastriyam | maithunaṃ satataṃ dharmyaṃ guhye caiva samācaret
वह उगते सूर्य को न देखे और न पराई नग्न स्त्री को। मैथुन का वह सदा धर्मानुकूल और एकान्त में ही आचरण करे।
श्लोक 18 (12.191.18)
तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः । सर्वमार्यकृतं धर्म्यं वालसंस्पर्शनानि च ॥
tīrthānāṃ hṛdayaṃ tīrthaṃ śucīnāṃ hṛdayaṃ śuciḥ | sarvamāryakṛtaṃ dharmyaṃ vālasaṃsparśanāni ca
तीर्थों का हृदय स्वयं तीर्थ है और पवित्रों का हृदय स्वयं पवित्र है। श्रेष्ठ जनों का किया हुआ सब कुछ धर्मसंगत है, और केश का स्पर्श भी।
श्लोक 19 (12.191.19)
दर्शनेदर्शने नित्यं सुखप्रश्नमुदाहरेत् । सायं प्रातश्च विप्राणां प्रदिष्टमभिवादनम् ॥
darśanedarśane nityaṃ sukhapraśnamudāharet | sāyaṃ prātaśca viprāṇāṃ pradiṣṭamabhivādanam
प्रत्येक भेंट पर वह सदा कुशल-क्षेम पूछे; सायं और प्रातः ब्राह्मणों का अभिवादन विहित है।
श्लोक 20 (12.191.20)
देवगोष्ठे गवां मध्ये ब्राह्मणानां क्रियापथे । स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥
devagoṣṭhe gavāṃ madhye brāhmaṇānāṃ kriyāpathe | svādhyāye bhojane caiva dakṣiṇaṃ pāṇimuddharet
देवस्थान में, गायों के बीच, ब्राह्मणों के कर्मपथ में, स्वाध्याय के समय और भोजन के समय वह दाहिना हाथ ऊपर उठाए।
श्लोक 21 (12.191.21)
सायं प्रातश्च विप्राणां पूजनं च यथाविधि । पण्यानां शोभते पण्यं कृषीणामृद्ध्यतां कृषिः । बहुकारं च सस्यानां वाह्ये वाहो गवां तथा ॥
sāyaṃ prātaśca viprāṇāṃ pūjanaṃ ca yathāvidhi | paṇyānāṃ śobhate paṇyaṃ kṛṣīṇāmṛddhyatāṃ kṛṣiḥ | bahukāraṃ ca sasyānāṃ vāhye vāho gavāṃ tathā
सायं और प्रातः विधि के अनुसार ब्राह्मणों का पूजन करे। वह वस्तुओं में उत्तम वस्तु के रूप में, फलते-फूलते किसानों की खेती के रूप में, फसलों की भरपूर उपज के रूप में और पशुओं में बोझ ढोने वाले के रूप में शोभा देता है।
श्लोक 22 (12.191.22)
संपन्नं भोजने नित्यं पानीये तर्पणं तथा । सुशृतं पायसे ब्रूयाद्यवाग्वां कृसरे तथा ॥
saṃpannaṃ bhojane nityaṃ pānīye tarpaṇaṃ tathā | suśṛtaṃ pāyase brūyādyavāgvāṃ kṛsare tathā
भोजन के समय वह सदा कहे "सुसम्पन्न है"; जल के विषय में "तृप्त करने वाला"; खीर के विषय में "अच्छी पकी"; और इसी प्रकार यवागू तथा कृसर (तिल-चावल की खिचड़ी) के विषय में।
श्लोक 23 (12.191.23)
श्मश्रुकर्मणि संप्राप्ते क्षुते स्नानेऽथ भोजने । व्याधितानां च सर्वेषामायुष्यमभिनन्दनम् ॥
śmaśrukarmaṇi saṃprāpte kṣute snāne'tha bhojane | vyādhitānāṃ ca sarveṣāmāyuṣyamabhinandanam
हजामत का समय आने पर, छींकने पर, स्नान में, भोजन में और सभी रोगियों के लिए अभिनन्दन आयुष्य की शुभकामना का है।
श्लोक 24 (12.191.24)
प्रत्यादित्यं न मेहेत न पश्येदात्मनः शकृत् । सुतैः स्त्रिया च शयनं सह भोज्यं च वर्जयेत् ॥
pratyādityaṃ na meheta na paśyedātmanaḥ śakṛt | sutaiḥ striyā ca śayanaṃ saha bhojyaṃ ca varjayet
वह सूर्य की ओर मुख करके मूत्र न करे और अपना मल न देखे। पुत्रों और स्त्री के साथ सोना तथा साथ बैठकर भोजन करना छोड़ दे।
श्लोक 25 (12.191.25)
त्वंकारं नामधेयं च ज्येष्ठानां परिवर्जयेत् । अवराणां समानानामुभयं नैव दुष्यति ॥
tvaṃkāraṃ nāmadheyaṃ ca jyeṣṭhānāṃ parivarjayet | avarāṇāṃ samānānāmubhayaṃ naiva duṣyati
वह बड़ों के प्रति तू-तड़ाक और नाम लेकर पुकारना छोड़ दे। छोटों और बराबर वालों के प्रति ये दोनों ही दोष नहीं हैं।
श्लोक 26 (12.191.26)
हृदयं पापवृत्तानां पापमाख्याति वैकृतम् । ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ॥
hṛdayaṃ pāpavṛttānāṃ pāpamākhyāti vaikṛtam | jñānapūrvaṃ vinaśyanti gūhamānā mahājane
पापाचारियों का हृदय अपनी विकृति से उनके पाप को बता देता है; जो जान-बूझकर उसे लोगों से छिपाते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 27 (12.191.27)
ज्ञानपूर्वकृतं पापं छादयन्त्यबहुश्रुताः । नैनं मनुष्याः पश्यन्ति पश्यन्त्येव दिवौकसः ॥
jñānapūrvakṛtaṃ pāpaṃ chādayantyabahuśrutāḥ | nainaṃ manuṣyāḥ paśyanti paśyantyeva divaukasaḥ
अल्पज्ञ लोग जान-बूझकर किए पाप को ढकते हैं। मनुष्य उसे नहीं देखते, पर स्वर्गवासी देवता देखते ही हैं।
श्लोक 28 (12.191.28)
पापेनापिहितं पापं पापमेवानुवर्तते । धर्मेणापिहितो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते । धार्मिकेण कृतो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते ॥
pāpenāpihitaṃ pāpaṃ pāpamevānuvartate | dharmeṇāpihito dharmo dharmamevānuvartate | dhārmikeṇa kṛto dharmo dharmamevānuvartate
पाप से ढका हुआ पाप पाप का ही अनुसरण करता है। धर्म से ढका हुआ धर्म धर्म का ही अनुसरण करता है। धार्मिक पुरुष का किया हुआ धर्म भी धर्म का ही अनुसरण करता है।
श्लोक 29 (12.191.29)
पापं कृतं न स्मरतीह मूढो । विवर्तमानस्य तदेति कर्तुः । राहुर्यथा चन्द्रमुपैति चापि । तथाऽबुधं पापमुपैति कर्म ॥
pāpaṃ kṛtaṃ na smaratīha mūḍho | vivartamānasya tadeti kartuḥ | rāhuryathā candramupaiti cāpi | tathā'budhaṃ pāpamupaiti karma
मूढ़ मनुष्य किए हुए पाप को याद नहीं रखता, फिर भी जब वह जन्म-जन्मान्तर में घूमता है तब वह कर्ता के पास लौट आता है। जैसे राहु चन्द्रमा के पास पहुँचता है, वैसे ही पाप-कर्म मूर्ख के पास पहुँचता है।
श्लोक 30 (12.191.30)
आशया संचितं द्रव्यं दुःखेनैवोपभुज्यते । तद्बुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ॥
āśayā saṃcitaṃ dravyaṃ duḥkhenaivopabhujyate | tadbudhā na praśaṃsanti maraṇaṃ na pratīkṣate
आशा से जोड़ा हुआ धन दुःख के साथ ही भोगा जाता है। ज्ञानी उसकी प्रशंसा नहीं करते, और मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती।
श्लोक 31 (12.191.31)
मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात्सर्वेषु भूतेषु मनसा शिवमाचरेत् ॥
mānasaṃ sarvabhūtānāṃ dharmamāhurmanīṣiṇaḥ | tasmātsarveṣu bhūteṣu manasā śivamācaret
मनीषी कहते हैं कि सब प्राणियों का धर्म मन का है। इसलिए सब प्राणियों के प्रति मन से कल्याण का आचरण करे।
श्लोक 32 (12.191.32)
एक एव चरेद्धर्मं नास्ति धर्मे सहायता । केवलं विधिमासाद्य सहायः किं करिष्यति ॥
eka eva careddharmaṃ nāsti dharme sahāyatā | kevalaṃ vidhimāsādya sahāyaḥ kiṃ kariṣyati
धर्म का आचरण अकेले ही करे; धर्म में कोई सहायक नहीं होता। जिसने केवल विधि को अपना लिया है, उसके लिए सहायक क्या करेगा?
श्लोक 33 (12.191.33)
धर्मो योनिर्मनुष्याणां देवानाममृतं दिवि । प्रेत्यभावे सुखं धर्माच्छश्वत्तैरुपभुज्यते ॥
dharmo yonirmanuṣyāṇāṃ devānāmamṛtaṃ divi | pretyabhāve sukhaṃ dharmācchaśvattairupabhujyate
धर्म मनुष्यों का उद्गम है और स्वर्ग में देवताओं के लिए अमृत है। परलोक में धर्म से मिला सुख वे सदा भोगते हैं।