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शान्ति पर्व · अध्याय 192

भीष्म द्वारा अध्यात्म का उपदेश: भूत, इन्द्रियाँ और तीन गुण

युधिष्ठिर पूछते हैं कि अध्यात्म क्या है और यह जगत् किससे उत्पन्न होता तथा किसमें लीन होता है। भीष्म बताते हैं कि पाँच महाभूत ही सब प्राणियों की उत्पत्ति और लय के कारण हैं, जैसे कछुआ अपने अंग फैलाकर समेट लेता है; वे इन्द्रियों और उनके विषयों को भूतों से जोड़ते हैं तथा मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ का वर्णन करते हैं। वे सत्त्व, रजस् और तमस् के लक्षण समझाते हैं, मन से आत्मा के संयोग और भेद को स्पष्ट करते हैं, और कहते हैं कि जो मन से इन्द्रियों को रोक लेता है उसे आत्मा घड़े में जलते दीप की भाँति प्रकाशित दिखता है और वह परम शान्ति पाता है।

अध्याय 191अध्याय-सूचीअध्याय 193

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.192.1)

अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते । यदध्यात्मं यथा चैतत्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

adhyātmaṃ nāma yadidaṃ puruṣasyeha cintyate | yadadhyātmaṃ yathā caitattanme brūhi pitāmaha

हे पितामह, पुरुष के विषय में यहाँ जिसका चिन्तन किया जाता है और जिसे 'अध्यात्म' कहते हैं, वह अध्यात्म क्या है और किस प्रकार का है? यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (12.192.2)

कुतः सृष्टमिदं सर्वं ब्रह्मन्स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च कमभ्येति तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥

kutaḥ sṛṣṭamidaṃ sarvaṃ brahmansthāvarajaṅgamam | pralaye ca kamabhyeti tanme vaktumihārhasi

हे ब्रह्मन्, यह सारा स्थावर-जंगम जगत् किससे उत्पन्न हुआ है, और प्रलय के समय किसमें लीन होता है? यह मुझे बताना आपके योग्य है।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.192.3)

अध्यात्ममिति मां पार्थ यदेतदनुपृच्छसि । तद्व्याख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं शुभम् ॥

adhyātmamiti māṃ pārtha yadetadanupṛcchasi | tadvyākhyāsyāmi te tāta śreyaskaratamaṃ śubham

हे पार्थ, तुम मुझसे जो 'अध्यात्म' के विषय में पूछ रहे हो, उसे मैं तुम्हें समझाऊँगा, तात; वह अत्यन्त कल्याणकारी और शुभ है।

श्लोक 4 (12.192.4)

सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्यैः परिदर्शितम् । यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति । फललाभश्च तस्य स्यात्सर्वभूतहितं च तत् ॥

sṛṣṭipralayasaṃyuktamācāryaiḥ paridarśitam | yajjñātvā puruṣo loke prītiṃ saukhyaṃ ca vindati | phalalābhaśca tasya syātsarvabhūtahitaṃ ca tat

आचार्यों ने इसे सृष्टि और प्रलय से जुड़ा हुआ बताया है; इसे जानकर मनुष्य संसार में प्रीति और सुख पाता है, उसे फल की प्राप्ति होती है, और वह सब प्राणियों के लिए हितकर है।

श्लोक 5 (12.192.5)

आत्मानममलं राजन्नावृत्यैवं व्यवस्थितम् । तस्मिन्प्रकाशते नित्यं तमः सोमो यथैव तत् ॥

ātmānamamalaṃ rājannāvṛtyaivaṃ vyavasthitam | tasminprakāśate nityaṃ tamaḥ somo yathaiva tat

हे राजन्, निर्मल आत्मा इस प्रकार आवृत होकर स्थित है; उसमें अन्धकार निरन्तर प्रकाशित होता है, जैसे चन्द्रमा।

श्लोक 6 (12.192.6)

तद्विद्वान्नष्टपाप्मैष ब्रह्मभूयाय कल्पते । अण्डावरणभूतानां पर्यन्तं हि यथा तमः ॥

tadvidvānnaṣṭapāpmaiṣa brahmabhūyāya kalpate | aṇḍāvaraṇabhūtānāṃ paryantaṃ hi yathā tamaḥ

उसे जानकर पापरहित हुआ पुरुष ब्रह्मभाव को पाने योग्य हो जाता है; क्योंकि अण्ड के आवरण बने हुए तत्त्वों की अन्तिम सीमा पर अन्धकार ही है।

श्लोक 7 (12.192.7)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | mahābhūtāni bhūtānāṃ sarveṣāṃ prabhavāpyayau

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज - ये महाभूत सब प्राणियों की उत्पत्ति और लय के कारण हैं।

श्लोक 8 (12.192.8)

यतः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनःपुनः । महाभूतानि भूतेभ्यः सागरस्योर्मयो यथा ॥

yataḥ sṛṣṭāni tatraiva tāni yānti punaḥpunaḥ | mahābhūtāni bhūtebhyaḥ sāgarasyormayo yathā

ये महाभूत जिससे बने हैं उसी में बार-बार लौट जाते हैं, जैसे समुद्र की लहरें प्राणियों से उठकर उसी में समा जाती हैं।

श्लोक 9 (12.192.9)

प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः । तद्वद्भूतानि भूतात्मा सृष्ट्वा संहरते पुनः ॥

prasārya ca yathāṅgāni kūrmaḥ saṃharate punaḥ | tadvadbhūtāni bhūtātmā sṛṣṭvā saṃharate punaḥ

जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही भूतात्मा प्राणियों की सृष्टि करके फिर उनका संहार कर लेता है।

श्लोक 10 (12.192.10)

स तेषां गुणसंघातः शरीरे भरतर्षभ । सततं प्रविलीयन्ते गुणास्ते प्रभवन्ति च ॥

sa teṣāṃ guṇasaṃghātaḥ śarīre bharatarṣabha | satataṃ pravilīyante guṇāste prabhavanti ca

हे भरतश्रेष्ठ, शरीर में उन (भूतों) के गुणों का यही समूह है; वे गुण निरन्तर लीन होते और फिर उत्पन्न होते रहते हैं।

श्लोक 11 (12.192.11)

यद्विना नैव शृणुते न पश्यति न दीप्यते । यदधीनं यतस्तस्मादध्यात्ममिति कथ्यते ॥

yadvinā naiva śṛṇute na paśyati na dīpyate | yadadhīnaṃ yatastasmādadhyātmamiti kathyate

जिसके बिना मनुष्य न सुनता है, न देखता है, न प्रकाशित होता है, और जिसके अधीन यह सब है - इसी कारण उसे अध्यात्म कहा जाता है।

श्लोक 12 (12.192.12)

ज्ञानं तदेकरूपाख्यं नानाप्रज्ञान्वितं तदा । न तेवाचाऽनुरूपं स्याद्यया रासविवर्जितम् ॥

jñānaṃ tadekarūpākhyaṃ nānāprajñānvitaṃ tadā | na tevācā'nurūpaṃ syādyayā rāsavivarjitam

वह ज्ञान एक रूप वाला कहा गया है, फिर भी तब अनेक प्रकार की बुद्धियों से युक्त होता है; वह वाणी के अनुरूप नहीं हो सकता, क्योंकि वाणी से वह रस से रहित हो जाता है।

श्लोक 13 (12.192.13)

आकाशात्खलु याज्येषु भवन्ति सुमहागुणाः । इति तन्मयमेवैतत्सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥

ākāśātkhalu yājyeṣu bhavanti sumahāguṇāḥ | iti tanmayamevaitatsarvaṃ sthāvarajaṅgamam

आकाश से यज्ञ-योग्य पदार्थों में महान् गुण उत्पन्न होते हैं; इस प्रकार यह सब स्थावर-जंगम जगत् उसी से बना है।

श्लोक 14 (12.192.14)

प्रलये च तमभ्येति तस्मादुत्सृज्यते पुनः । महाभूतेषु भूतात्मा सृष्ट्वा संहरते पुनः ॥

pralaye ca tamabhyeti tasmādutsṛjyate punaḥ | mahābhūteṣu bhūtātmā sṛṣṭvā saṃharate punaḥ

प्रलय के समय वह उसी में जाता है और फिर उसी से छोड़ा जाता है; भूतात्मा महाभूतों में सृष्टि करके फिर संहार कर लेता है।

श्लोक 15 (12.192.15)

महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् । अकरोत्तेषु वैषम्यं तत्तु जीवो न पश्यति ॥

mahābhūtāni pañcaiva sarvabhūteṣu bhūtakṛt | akarotteṣu vaiṣamyaṃ tattu jīvo na paśyati

भूतों के रचयिता ने सब प्राणियों में पाँच ही महाभूत रखे; उनमें उसने विषमता कर दी, पर जीव उसे नहीं देखता।

श्लोक 16 (12.192.16)

शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसंभवम् । वायोः स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक्चैव त्रितयं स्मृतम् ॥

śabdaḥ śrotraṃ tathā khāni trayamākāśasaṃbhavam | vāyoḥ sparśastathā ceṣṭā tvakcaiva tritayaṃ smṛtam

शब्द, कान और शरीर के छिद्र - ये तीनों आकाश से उत्पन्न हैं। स्पर्श, चेष्टा और त्वचा - ये तीनों वायु के कहे गए हैं।

श्लोक 17 (12.192.17)

रूपं चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते । रसः क्लेदश्च जिह्वा च त्रयो जलगुणाः स्मृताः ॥

rūpaṃ cakṣustathā pākastrividhaṃ teja ucyate | rasaḥ kledaśca jihvā ca trayo jalaguṇāḥ smṛtāḥ

रूप, नेत्र और पाचन - यह तीन प्रकार का तेज कहा जाता है। रस, आर्द्रता और जिह्वा - ये तीन जल के गुण कहे गए हैं।

श्लोक 18 (12.192.18)

घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रयः । महाभूतानि पञ्चैव षष्ठं च मन उच्यते ॥

ghreyaṃ ghrāṇaṃ śarīraṃ ca ete bhūmiguṇāstrayaḥ | mahābhūtāni pañcaiva ṣaṣṭhaṃ ca mana ucyate

सूँघने योग्य गन्ध, नाक और शरीर - ये तीन पृथ्वी के गुण हैं। महाभूत पाँच ही हैं; मन को छठा कहा जाता है।

श्लोक 19 (12.192.19)

इन्द्रियाणि मनश्चैव विज्ञानान्यस्य भारत । सप्तमी बुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ॥

indriyāṇi manaścaiva vijñānānyasya bhārata | saptamī buddhirityāhuḥ kṣetrajñaḥ punaraṣṭamaḥ

हे भारत, इन्द्रियाँ और मन इसके ज्ञान के साधन हैं; बुद्धि को सातवाँ कहते हैं और क्षेत्रज्ञ को फिर आठवाँ।

श्लोक 20 (12.192.20)

चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः । बुद्धिरध्यवसानाय क्षेत्रज्ञः साक्षिवत्स्थितः ॥

cakṣurālocanāyaiva saṃśayaṃ kurute manaḥ | buddhiradhyavasānāya kṣetrajñaḥ sākṣivatsthitaḥ

नेत्र देखने के लिए है; मन संशय उत्पन्न करता है; बुद्धि निश्चय के लिए है; और क्षेत्रज्ञ साक्षी की भाँति स्थित रहता है।

श्लोक 21 (12.192.21)

चिच्छक्त्याधिष्ठिता बुद्धिश्चेतनेत्यभिविश्रुता । चेतनानन्तरो जीवस्तदा वेत्ति च लक्ष्यते ॥

cicchaktyādhiṣṭhitā buddhiścetanetyabhiviśrutā | cetanānantaro jīvastadā vetti ca lakṣyate

चित्-शक्ति से अधिष्ठित बुद्धि 'चेतना' नाम से प्रसिद्ध है; चेतना के बाद जीव है, और तब वह जानता हुआ लक्षित होता है।

श्लोक 22 (12.192.22)

नोत्सृजन्विसृजंश्चैव शरीरं दृश्यते तमः । तस्मिंश्चेतोपलब्धिः स्यात्तमो वा सारयन्त्युत ॥

notsṛjanvisṛjaṃścaiva śarīraṃ dṛśyate tamaḥ | tasmiṃścetopalabdhiḥ syāttamo vā sārayantyuta

शरीर को छोड़ते हुए या त्यागते हुए भी वह दिखाई नहीं देता; अन्धकार ही दिखता है। उसमें चेतना की उपलब्धि हो सकती है, अथवा वे अन्धकार को हटा देते हैं।

श्लोक 23 (12.192.23)

ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदर्वाक्चोर्ध्वं च पश्यति । एतेन सर्वमेवेदं बिद्ध्यभिव्याप्तमन्तरम् ॥

ūrdhvaṃ pādatalābhyāṃ yadarvākcordhvaṃ ca paśyati | etena sarvamevedaṃ biddhyabhivyāptamantaram

पैरों के तलवों से ऊपर, नीचे और ऊपर जहाँ तक दिखाई देता है, यह सारा भीतरी भाग इसी से व्याप्त है, ऐसा जानो।

श्लोक 24 (12.192.24)

पुरुषैरिन्द्रियाणीह विजेतव्यानि कृत्स्नशः । तमो रजश्च सत्वं च तेऽपि भावास्तदाश्रिताः ॥

puruṣairindriyāṇīha vijetavyāni kṛtsnaśaḥ | tamo rajaśca satvaṃ ca te'pi bhāvāstadāśritāḥ

पुरुषों को इन्द्रियों को पूरी तरह जीतना चाहिए; तमस्, रजस् और सत्त्व - वे भाव भी उन्हीं के आश्रित हैं।

श्लोक 25 (12.192.25)

एतां बुद्ध्वा नरो बुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम् । समवेक्ष्य शनैश्चैव लभते शममुत्तमम् ॥

etāṃ buddhvā naro buddhyā bhūtānāmāgatiṃ gatim | samavekṣya śanaiścaiva labhate śamamuttamam

जो मनुष्य बुद्धि से प्राणियों के आने-जाने को यह समझ लेता है और धीरे-धीरे उस पर विचार करता है, वह परम शान्ति पाता है।

श्लोक 26 (12.192.26)

गुणैर्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाण्यपि । मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ॥

guṇairnenīyate buddhirbuddhirevendriyāṇyapi | manaḥṣaṣṭhāni sarvāṇi buddhyabhāve kuto guṇāḥ

बुद्धि गुणों द्वारा चलाई जाती है, और इन्द्रियाँ भी बुद्धि द्वारा; मन को छठा लेकर सब इन्द्रियाँ उसी पर निर्भर हैं - बुद्धि न हो तो गुण कहाँ?

श्लोक 27 (12.192.27)

इति तन्मयमेवैतत्सर्वं स्थावरजङ्गमम् । प्रलीयते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा ॥

iti tanmayamevaitatsarvaṃ sthāvarajaṅgamam | pralīyate codbhavati tasmānnirdiśyate tathā

इस प्रकार यह सब स्थावर-जंगम जगत् उसी से बना है; वह लीन होता है और उत्पन्न होता है, इसी से ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 28 (12.192.28)

येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते । जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वया ॥

yena paśyati taccakṣuḥ śṛṇoti śrotramucyate | jighrati ghrāṇamityāhū rasaṃ jānāti jihvayā

जिससे देखा जाता है वह नेत्र है; जिससे सुना जाता है वह कान कहलाता है; जिससे सूँघा जाता है उसे नाक कहते हैं; और जिह्वा से रस जाना जाता है।

श्लोक 29 (12.192.29)

त्वचा स्पर्शयते स्पर्शं बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत् । येन संकल्पयत्यर्थं किंचिद्भवति तन्मनः ॥

tvacā sparśayate sparśaṃ buddhirvikriyate'sakṛt | yena saṃkalpayatyarthaṃ kiṃcidbhavati tanmanaḥ

त्वचा से स्पर्श का अनुभव कराया जाता है; बुद्धि बार-बार विकार को प्राप्त होती है; जिससे किसी वस्तु का संकल्प किया जाता है, वही मन है।

श्लोक 30 (12.192.30)

अधिष्ठानानि बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा । पञ्चेन्द्रियाणि यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ॥

adhiṣṭhānāni buddherhi pṛthagarthāni pañcadhā | pañcendriyāṇi yānyāhustānyadṛśyo'dhitiṣṭhati

बुद्धि के आधार पाँच प्रकार के हैं, प्रत्येक का अपना विषय है; जिन्हें पाँच इन्द्रियाँ कहते हैं, उन पर अदृश्य (आत्मा) अधिष्ठित है।

श्लोक 31 (12.192.31)

पुरुषाधिष्ठिता बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते । कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ॥

puruṣādhiṣṭhitā buddhistriṣu bhāveṣu vartate | kadācillabhate prītiṃ kadācidanuśocati

पुरुष से अधिष्ठित बुद्धि तीन भावों में वर्तती है: कभी वह प्रीति पाती है, कभी शोक करती है।

श्लोक 32 (12.192.32)

न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ॥

na sukhena na duḥkhena kadācidapi vartate | evaṃ narāṇāṃ manasi triṣu bhāveṣvavasthitā

कभी वह न सुख में रहती है न दुःख में; इस प्रकार मनुष्यों के मन में वह तीन भावों में स्थित है।

श्लोक 33 (12.192.33)

सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते । सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥

seyaṃ bhāvātmikā bhāvāṃstrīnetānativartate | saritāṃ sāgaro bhartā mahāvelāmivormimān

भावरूप यह बुद्धि इन तीन भावों को लाँघ जाती है, जैसे नदियों का स्वामी तरंगों वाला समुद्र अपनी विशाल तटरेखा को लाँघ जाता है।

श्लोक 34 (12.192.34)

अविभागगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते । प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावमनुवर्तते ॥

avibhāgagatā buddhirbhāve manasi vartate | pravartamānaṃ tu rajastadbhāvamanuvartate

अविभक्त अवस्था में पहुँची बुद्धि मन के भाव में वर्तती है; और प्रवृत्त होता हुआ रजस् उसी भाव के पीछे चलता है।

श्लोक 35 (12.192.35)

इन्द्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा तदा । ततः सत्वं तमो भावः प्रीतियोगात्प्रवर्तते ॥

indriyāṇi hi sarvāṇi pravartayati sā tadā | tataḥ satvaṃ tamo bhāvaḥ prītiyogātpravartate

तब वह सब इन्द्रियों को प्रवृत्त करती है; उसके बाद प्रीति के योग से सत्त्व और तमोभाव प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 36 (12.192.36)

प्रीतिः सत्वं रजः शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रयः । येये च भावा लोकेऽस्मिन्सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु ॥

prītiḥ satvaṃ rajaḥ śokastamo mohastu te trayaḥ | yeye ca bhāvā loke'sminsarveṣveteṣu vai triṣu

प्रीति सत्त्व है, शोक रजस् है और मोह तमस् है - ये तीन हैं; और इस लोक में जो-जो भाव हैं, वे सब इन्हीं तीनों में हैं।

श्लोक 37 (12.192.37)

इति बुद्धिगतिः सर्वा व्याख्याता तव भारत । इन्द्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता ॥

iti buddhigatiḥ sarvā vyākhyātā tava bhārata | indriyāṇi ca sarvāṇi vijetavyāni dhīmatā

हे भारत, इस प्रकार बुद्धि की सारी गति तुम्हें समझा दी गई; और बुद्धिमान् को सब इन्द्रियों को जीतना चाहिए।

श्लोक 38 (12.192.38)

सत्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा । त्रिविधा वेदना चैव सर्वसत्वेषु दृश्यते ॥

satvaṃ rajastamaścaiva prāṇināṃ saṃśritāḥ sadā | trividhā vedanā caiva sarvasatveṣu dṛśyate

सत्त्व, रजस् और तमस् प्राणियों में सदा आश्रित रहते हैं; और तीन प्रकार की वेदना सब प्राणियों में दिखाई देती है।

श्लोक 39 (12.192.39)

सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत । सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः । तमोगुणेन संयुक्तौ भवतो व्यावहारिकौ ॥

sātvikī rājasī caiva tāmasī ceti bhārata | sukhasparśaḥ sattvaguṇo duḥkhasparśo rajoguṇaḥ | tamoguṇena saṃyuktau bhavato vyāvahārikau

हे भारत, वह सात्त्विकी, राजसी और तामसी होती है। सत्त्वगुण सुख का स्पर्श है और रजोगुण दुःख का स्पर्श; तमोगुण से युक्त होकर ये दोनों व्यावहारिक (लौकिक व्यवहार के) हो जाते हैं।

श्लोक 40 (12.192.40)

तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । वर्तते सात्विको भाव इत्युपेक्षेत तत्तथा ॥

tatra yatprītisaṃyuktaṃ kāye manasi vā bhavet | vartate sātviko bhāva ityupekṣeta tattathā

इनमें जो शरीर या मन में प्रीति से युक्त हो, वह सात्त्विक भाव है; उसे उसी रूप में समभाव से देखना चाहिए।

श्लोक 41 (12.192.41)

अथ यद्दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । प्रवृत्तं रज इत्येव तन्न संरभ्य चिन्तयेत् ॥

atha yadduḥkhasaṃyuktamaprītikaramātmanaḥ | pravṛttaṃ raja ityeva tanna saṃrabhya cintayet

और जो दुःख से युक्त हो और अपने लिए अप्रीतिकर हो, वह प्रवृत्त हुआ रजस् है; उसका उत्तेजित होकर चिन्तन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 42 (12.192.42)

अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥

atha yanmohasaṃyuktamavyaktaviṣayaṃ bhavet | apratarkyamavijñeyaṃ tamastadupadhārayet

और जो मोह से युक्त हो, जिसका विषय अव्यक्त हो, जो तर्क और ज्ञान से परे हो, उसे तमस् समझना चाहिए।

श्लोक 43 (12.192.43)

प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता । कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्विका गुणाः ॥

praharṣaḥ prītirānandaḥ sukhaṃ saṃśāntacittatā | kathaṃcidabhivartanta ityete sātvikā guṇāḥ

हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और शान्त चित्त - ये जब कभी प्रकट होते हैं, तो सत्त्व के गुण हैं।

श्लोक 44 (12.192.44)

अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाऽक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ॥

atuṣṭiḥ paritāpaśca śoko lobhastathā'kṣamā | liṅgāni rajasastāni dṛśyante hetvahetubhiḥ

असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ और अक्षमा - ये रजस् के लक्षण हैं, जो कारण से या बिना कारण दिखाई देते हैं।

श्लोक 45 (12.192.45)

अभिमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥

abhimānastathā mohaḥ pramādaḥ svapnatandritā | kathaṃcidabhivartante vividhāstāmasā guṇāḥ

अभिमान, मोह, प्रमाद, निद्रा और तन्द्रा - ये जब कभी प्रकट होते हैं, तो तमस् के विविध गुण हैं।

श्लोक 46 (12.192.46)

दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् । मनः सुनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ॥

dūragaṃ bahudhāgāmi prārthanāsaṃśayātmakam | manaḥ suniyataṃ yasya sa sukhī pretya ceha ca

दूर तक जाने वाला, अनेक मार्गों पर भटकने वाला, इच्छा और संशय से भरा जो मन है - वह जिसका भली-भाँति नियन्त्रित है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।

श्लोक 47 (12.192.47)

सत्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः । सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥

satvakṣetrajñayoretadantaraṃ paśya sūkṣmayoḥ | sṛjate tu guṇāneka eko na sṛjate guṇān

सत्त्व (मन) और क्षेत्रज्ञ, दोनों सूक्ष्म हैं - इनके इस अन्तर को देखो: एक गुणों को रचता है, दूसरा नहीं रचता।

श्लोक 48 (12.192.48)

मशकोदुम्बरौ वाऽपि संप्रयुक्तौ यथा सदा । अन्योन्यमेतौ स्यातां च संप्रयोगस्तथा तयोः ॥

maśakodumbarau vā'pi saṃprayuktau yathā sadā | anyonyametau syātāṃ ca saṃprayogastathā tayoḥ

जैसे मच्छर और गूलर सदा साथ जुड़े रहते हैं फिर भी एक-दूसरे से अलग हैं, वैसा ही उन दोनों का संयोग है।

श्लोक 49 (12.192.49)

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ संप्रयुक्तौ च सर्वदा । यथा मत्स्यो जलं चैव संप्रयुक्तौ तथैव तौ ॥

pṛthagbhūtau prakṛtyā tau saṃprayuktau ca sarvadā | yathā matsyo jalaṃ caiva saṃprayuktau tathaiva tau

स्वभाव से वे दोनों अलग हैं, फिर भी सदा जुड़े रहते हैं, जैसे मछली और जल जुड़े रहते हैं; वैसे ही वे दोनों हैं।

श्लोक 50 (12.192.50)

न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्वेति सर्वशः । परिद्रष्टा गुणानां स संसृष्टान्मन्यते तथा ॥

na guṇā vidurātmānaṃ sa guṇānveti sarvaśaḥ | paridraṣṭā guṇānāṃ sa saṃsṛṣṭānmanyate tathā

गुण आत्मा को नहीं जानते; वह गुणों को सब प्रकार से जानता है। वह गुणों का द्रष्टा है, फिर भी उन्हें अपने से मिला हुआ मानता है।

श्लोक 51 (12.192.51)

इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते बुद्धिसप्तमैः । निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवत् ॥

indriyaistu pradīpārthaṃ kurute buddhisaptamaiḥ | nirviceṣṭairajānadbhiḥ paramātmā pradīpavat

बुद्धि को सातवाँ लेकर इन्द्रियों के द्वारा वह प्रकाश करता है, यद्यपि वे निश्चेष्ट और अजान हैं; परमात्मा दीपक के समान है।

श्लोक 52 (12.192.52)

सृजते हि गुणान्सत्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति । संप्रयोगस्तयोरेष सत्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ॥

sṛjate hi guṇānsatvaṃ kṣetrajñaḥ paripaśyati | saṃprayogastayoreṣa satvakṣetrajñayordhruvaḥ

सत्त्व (मन) गुणों को रचता है, क्षेत्रज्ञ देखता है। मन और क्षेत्रज्ञ का यह संयोग स्थिर है।

श्लोक 53 (12.192.53)

आश्रयो नास्ति सत्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन । सत्वं मनः संसृजते न गुणान्वै कदाचन ॥

āśrayo nāsti satvasya kṣetrajñasya ca kaścana | satvaṃ manaḥ saṃsṛjate na guṇānvai kadācana

सत्त्व और क्षेत्रज्ञ का कोई भी आश्रय नहीं है। मन संयोग कराता है, पर गुणों को कभी नहीं रचता।

श्लोक 54 (12.192.54)

रश्मीस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्नियच्छति । तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ॥

raśmīsteṣāṃ sa manasā yadā samyaṅniyacchati | tadā prakāśate'syātmā ghaṭe dīpo jvalanniva

जब वह मन से उनकी रश्मियों (लगामों) को भली-भाँति रोक लेता है, तब उसका आत्मा घड़े में जलते दीपक की भाँति प्रकाशित होता है।

श्लोक 55 (12.192.55)

त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः । सर्वभूतात्मभूस्तस्मात्स गच्छेदुत्तमां गतिम् ॥

tyaktvā yaḥ prākṛtaṃ karma nityamātmaratirmuniḥ | sarvabhūtātmabhūstasmātsa gaccheduttamāṃ gatim

जो मुनि प्राकृत कर्म को छोड़कर सदा आत्मा में रमता है, वह सब प्राणियों का आत्मभूत होकर परम गति को प्राप्त करे।

श्लोक 56 (12.192.56)

यथा वारिचरः पक्षी सलिलेन न लिप्यते । एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ॥

yathā vāricaraḥ pakṣī salilena na lipyate | evameva kṛtaprajño bhūteṣu parivartate

जैसे जल में विचरने वाला पक्षी जल से लिप्त नहीं होता, वैसे ही कृतप्रज्ञ पुरुष प्राणियों के बीच विचरता है।

श्लोक 57 (12.192.57)

एवं स्वभावमेवैतत्स्वबुद्ध्या विहरेन्नरः । अशोचन्नप्रहृष्यंश्च चरेद्विगतमत्सरः ॥

evaṃ svabhāvamevaitatsvabuddhyā viharennaraḥ | aśocannaprahṛṣyaṃśca caredvigatamatsaraḥ

इसका स्वभाव ऐसा ही है; मनुष्य अपनी बुद्धि से विचरे - न शोक करता हुआ, न हर्षित होता हुआ, मत्सर से रहित होकर चले।

श्लोक 58 (12.192.58)

स्वभावसिद्ध्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् । ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद्गुणाः ॥

svabhāvasiddhyā yuktastu sa nityaṃ sṛjate guṇān | ūrṇanābhiryathā sūtraṃ vijñeyāstantuvadguṇāḥ

स्वभाव की सिद्धि से युक्त पुरुष सदा गुणों को रचता है, जैसे मकड़ी अपना जाला; गुणों को तन्तुओं के समान समझना चाहिए।

श्लोक 59 (12.192.59)

प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते । प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ॥

pradhvastā na nivartante nivṛttirnopalabhyate | pratyakṣeṇa parokṣaṃ tadanumānena sidhyati

नष्ट हुए गुण लौटते नहीं; उनका लौटना दिखाई नहीं देता। अप्रत्यक्ष बात प्रत्यक्ष के आधार पर अनुमान से सिद्ध होती है।

श्लोक 60 (12.192.60)

एवमेकेऽध्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे । उभयं संप्रधार्यैतद्व्यवस्येत यथामति ॥

evameke'dhyavasyanti nivṛttiriti cāpare | ubhayaṃ saṃpradhāryaitadvyavasyeta yathāmati

कुछ लोग इस प्रकार निश्चय करते हैं, दूसरे कहते हैं कि निवृत्ति होती है; दोनों पर विचार करके मनुष्य अपनी समझ के अनुसार निश्चय करे।

श्लोक 61 (12.192.61)

इतीमं हृदयग्रन्थिं बुद्धिभेदमयं दृढम् । विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः ॥

itīmaṃ hṛdayagranthiṃ buddhibhedamayaṃ dṛḍham | vimucya sukhamāsīta na śocecchinnasaṃśayaḥ

बुद्धि के भेद से बनी हृदय की इस दृढ़ गाँठ को खोलकर संशय छिन्न हो जाने पर वह सुखपूर्वक बैठे और शोक न करे।

श्लोक 62 (12.192.62)

मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः । अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा ॥

malināḥ prāpnuyuḥ śuddhiṃ yathā pūrṇāṃ nadīṃ narāḥ | avagāhya suvidvāṃso viddhi jñānamidaṃ tathā

जैसे मलिन मनुष्य भरी हुई नदी में स्नान करके शुद्धि पाते हैं, वैसे ही विद्वानों के लिए इस ज्ञान को जानो।

श्लोक 63 (12.192.63)

महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा । न तु तप्यति तत्त्वज्ञः फले ज्ञाते तरत्युत ॥

mahānadyā hi pārajñastapyate na tadanyathā | na tu tapyati tattvajñaḥ phale jñāte taratyuta

महानदी के पार को जानने वाला दुःखी नहीं होता - इसके विपरीत नहीं; तत्त्वज्ञ भी दुःखी नहीं होता, क्योंकि फल जान लेने पर वह पार उतर जाता है।

श्लोक 64 (12.192.64)

एवं ये विदुराध्यात्मं केवलं ज्ञानमुत्तमम् ॥

evaṃ ye vidurādhyātmaṃ kevalaṃ jñānamuttamam

इसी प्रकार जो अध्यात्म को जानते हैं - उस केवल और उत्तम ज्ञान को -

श्लोक 65 (12.192.65)

एतां बुद्ध्वा नरः सर्वां भूतानामागतिं गतिम् । अवेक्ष्य च शनैर्बुद्ध्या लभते शममुत्तमम् ॥

etāṃ buddhvā naraḥ sarvāṃ bhūtānāmāgatiṃ gatim | avekṣya ca śanairbuddhyā labhate śamamuttamam

जो मनुष्य प्राणियों के इस सारे आने-जाने को समझ लेता है और बुद्धि से धीरे-धीरे उस पर विचार करता है, वह परम शान्ति पाता है।

श्लोक 66 (12.192.66)

त्रिवर्गो यस्य विदितः प्रेक्ष्य तं स विमुच्यते । अन्वीक्ष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥

trivargo yasya viditaḥ prekṣya taṃ sa vimucyate | anvīkṣya manasā yuktastattvadarśī nirutsukaḥ

जिसने त्रिवर्ग को जान लिया है और उसे देख लेता है, वह मुक्त हो जाता है; मन को एकाग्र करके विचार करने पर वह तत्त्वदर्शी और उत्सुकतारहित हो जाता है।

श्लोक 67 (12.192.67)

न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियेषु विभागशः । तत्रतत्र विसृष्टेषु दुर्वार्येष्वकृतात्मभिः ॥

na cātmā śakyate draṣṭumindriyeṣu vibhāgaśaḥ | tatratatra visṛṣṭeṣu durvāryeṣvakṛtātmabhiḥ

जब इन्द्रियाँ यहाँ-वहाँ छूट जाती हैं और अपने को न जीते हुए लोगों के लिए रोकना कठिन होता है, तब आत्मा को उनमें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

श्लोक 68 (12.192.68)

एतद्बुद्ध्वा भवेद्बुद्धः किमन्यद्बुद्धिलक्षणम् । प्रतिगृह्य च निह्नोति ह्यन्यथा च प्रदृश्यते ॥

etadbuddhvā bhavedbuddhaḥ kimanyadbuddhilakṣaṇam | pratigṛhya ca nihnoti hyanyathā ca pradṛśyate

इसे समझकर मनुष्य ज्ञानी हो जाए - ज्ञान का और क्या लक्षण है? वह ग्रहण करके फिर नकार देता है, और दूसरे रूप में दिखाई देता है।

श्लोक 69 (12.192.69)

न सर्पति च यं प्राहुः सर्वत्र प्रतिहन्यते । धूमेन चाप्रसन्नोऽग्निर्यथाऽर्कं न प्रवर्तयेत् ॥

na sarpati ca yaṃ prāhuḥ sarvatra pratihanyate | dhūmena cāprasanno'gniryathā'rkaṃ na pravartayet

जिसके विषय में कहा जाता है कि वह चलता नहीं, वह सर्वत्र रोक दिया जाता है; जैसे धुएँ से मलिन अग्नि सूर्य को गति नहीं दे सकती।

श्लोक 70 (12.192.70)

धिष्ण्याधिपे प्रसन्ने तु स्थितिमेतां निरीक्षते । अतिदूराच्च सूक्ष्मत्वात्प्रस्थानं न प्रकाशते ॥

dhiṣṇyādhipe prasanne tu sthitimetāṃ nirīkṣate | atidūrācca sūkṣmatvātprasthānaṃ na prakāśate

धिष्ण्य (आसन) का अधिपति जब प्रसन्न होता है तब वह इस स्थिति को देखता है; बहुत दूर और सूक्ष्म होने के कारण उसका प्रस्थान प्रकट नहीं होता।

श्लोक 71 (12.192.71)

प्रपद्य तच्छ्रुताह्वानि चिन्मयं स्वीकृतं विना । विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥

prapadya tacchrutāhvāni cinmayaṃ svīkṛtaṃ vinā | vijñāya taddhi manyante kṛtakṛtyā manīṣiṇaḥ

श्रुति में सुने हुए नामों का आश्रय लेकर, किसी और को स्वीकार किए बिना उस चिन्मय को जानकर बुद्धिमान् लोग अपने को कृतकृत्य मानते हैं।

श्लोक 72 (12.192.72)

न भवति विदुषां ततो भयं । यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचि । त्सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम् ॥

na bhavati viduṣāṃ tato bhayaṃ | yadaviduṣāṃ sumahadbhayaṃ bhavet | na hi gatiradhikāsti kasyaci | tsati hi guṇe pravadantyatulyatām

जो अज्ञानियों के लिए महान् भय है, उससे ज्ञानियों को भय नहीं होता। किसी के लिए इससे ऊँची गति नहीं है; गुण के रहने पर वे अतुलनीयता की घोषणा करते हैं।

श्लोक 73 (12.192.73)

यः करोत्यनभिसन्धिपूर्वकं । तच्च निर्णुदति यत्पुरा कृतम् । नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं । तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ॥

yaḥ karotyanabhisandhipūrvakaṃ | tacca nirṇudati yatpurā kṛtam | nāpriyaṃ tadubhayaṃ kutaḥ priyaṃ | tasya tajjanayatīha sarvataḥ

जो बिना पहले से किए गए संकल्प के कर्म करता है, वह पहले किए हुए कर्म को भी मिटा देता है। उसके लिए वे दोनों अप्रिय नहीं हैं; तो प्रिय कहाँ से हो? फिर भी वह यहाँ सब ओर से उसके लिए वही उत्पन्न करता है।

श्लोक 74 (12.192.74)

लोक आतुरजनान्विराविणः । तत्तदेव बहु पश्य शोचतः । तत्र पश्य कुशलानशोचतो । ये विदुस्तदुभयं पदं सताम् ॥

loka āturajanānvirāviṇaḥ | tattadeva bahu paśya śocataḥ | tatra paśya kuśalānaśocato | ye vidustadubhayaṃ padaṃ satām

संसार में पीड़ित और विलाप करते हुए बहुत-से लोगों को देखो, जो यह-वह सोचकर शोक करते हैं। उनके बीच उन कुशल लोगों को देखो जो शोक नहीं करते - जो उन दोनों को सज्जनों का पद जानते हैं।

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