शान्ति पर्व · अध्याय 193
भीष्म द्वारा ध्यानयोग का उपदेश
भीष्म युधिष्ठिर को चार प्रकार का ध्यानयोग बताते हैं, जिससे महर्षि पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं। योगी इन्द्रियों और मन को समेटता है, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का ग्रहण छोड़ता है और चंचल मन को ध्यान में स्थिर करता है, यद्यपि वह बिजली या पत्ते पर पड़ी बूँद की तरह चंचल रहता है। जैसे नमी से सूखा चूर्ण धीरे-धीरे भीगता है, वैसे ही निरन्तर अभ्यास से मन शान्त होता है और योगी निरामय निर्वाण को पाते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.193.1)
हन्त वक्ष्यामि ते पार्थ ध्यानयोगं चतुर्विधम् । यं ज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धिं गच्छन्तीह महर्षयः ॥
hanta vakṣyāmi te pārtha dhyānayogaṃ caturvidham | yaṃ jñātvā śāśvatīṃ siddhiṃ gacchantīha maharṣayaḥ
हे पार्थ, सुनो; मैं तुम्हें चार प्रकार का ध्यानयोग बताऊँगा, जिसे जानकर महर्षि यहाँ शाश्वत सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 2 (12.193.2)
यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिनः । महर्षयो ज्ञानतृप्ता निर्वाणगतमानसाः ॥
yathā svanuṣṭhitaṃ dhyānaṃ tathā kurvanti yoginaḥ | maharṣayo jñānatṛptā nirvāṇagatamānasāḥ
योगी ध्यान को ठीक से सम्पन्न करके वैसा ही करते हैं - वे महर्षि, जो ज्ञान से तृप्त हैं और जिनका मन निर्वाण की ओर गया है।
श्लोक 3 (12.193.3)
नावर्तन्ते पुनः पार्थ मुक्ताः संसारदोषतः । जन्मदोषपरिक्षीणाः स्वभावे पर्युपस्थिताः ॥
nāvartante punaḥ pārtha muktāḥ saṃsāradoṣataḥ | janmadoṣaparikṣīṇāḥ svabhāve paryupasthitāḥ
हे पार्थ, वे संसार के दोषों से मुक्त होकर फिर नहीं लौटते; जन्म के दोष उनके क्षीण हो चुके हैं और वे अपने स्वभाव में स्थित हैं।
श्लोक 4 (12.193.4)
निर्द्वन्द्वा नित्यसत्वस्था विमुक्तिं नित्यमाश्रिताः । असङ्गीन्यविवादीनि मनः शान्तिकराणि च ॥
nirdvandvā nityasatvasthā vimuktiṃ nityamāśritāḥ | asaṅgīnyavivādīni manaḥ śāntikarāṇi ca
वे द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित और नित्य मुक्ति का आश्रय लिए हुए हैं; उनके साधन अनासक्त, विवादरहित और मन को शान्त करने वाले हैं।
श्लोक 5 (12.193.5)
तत्र ध्यानेन संश्लिष्टमेकाग्रे धारयेन्मनः । तत्र च ध्यानसंरोधादथ ज्ञानी भवत्युत ॥
tatra dhyānena saṃśliṣṭamekāgre dhārayenmanaḥ | tatra ca dhyānasaṃrodhādatha jñānī bhavatyuta
वहाँ ध्यान से जुड़े हुए मन को एक ही विषय पर टिकाए; और वहीं ध्यान के संयम से मनुष्य ज्ञानी हो जाता है।
श्लोक 6 (12.193.6)
चतुर्विधेषु भावेषु योऽर्थसक्तः सदैव हि । तज्ज्ञात्वा वास्तवं तेषामर्थेषु परिवर्तते । पिण्डीकृत्येन्द्रियग्राममासीनः काष्ठवन्मुनिः ॥
caturvidheṣu bhāveṣu yo'rthasaktaḥ sadaiva hi | tajjñātvā vāstavaṃ teṣāmartheṣu parivartate | piṇḍīkṛtyendriyagrāmamāsīnaḥ kāṣṭhavanmuniḥ
जो चार प्रकार के भावों में विषयों से सदा आसक्त रहता है, वह उनके यथार्थ स्वरूप को जानकर उन विषयों में विचरता है; मुनि इन्द्रियों के समूह को एक पिण्ड की तरह समेटकर काठ की भाँति बैठता है।
श्लोक 7 (12.193.7)
शब्दं न विन्देच्छ्रोत्रेण त्वचा स्पर्शं न वेदयेत् । रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा ॥
śabdaṃ na vindecchrotreṇa tvacā sparśaṃ na vedayet | rūpaṃ na cakṣuṣā vidyājjihvayā na rasāṃstathā
वह कान से शब्द को ग्रहण न करे, त्वचा से स्पर्श का अनुभव न करे, नेत्र से रूप को न जाने और जिह्वा से रसों को भी नहीं।
श्लोक 8 (12.193.8)
घ्रेयाण्यपि च सर्वाणि जह्याद्घ्राणेन योगवित् । पञ्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ॥
ghreyāṇyapi ca sarvāṇi jahyādghrāṇena yogavit | pañcavargapramāthīni neccheccaitāni vīryavān
और योग को जानने वाला नाक से सब गन्धों को छोड़ दे; पाँचों इन्द्रियों को मथ डालने वाली इन वस्तुओं को वीर्यवान् पुरुष न चाहे।
श्लोक 9 (12.193.9)
ततो मनसि संसृज्य पञ्चवर्गं विचक्षणः । समादध्यान्मनो भ्रान्तमिन्द्रियैः सह पञ्चभिः ॥
tato manasi saṃsṛjya pañcavargaṃ vicakṣaṇaḥ | samādadhyānmano bhrāntamindriyaiḥ saha pañcabhiḥ
तब बुद्धिमान् पुरुष पाँचों के समूह को मन में मिलाकर पाँचों इन्द्रियों सहित भटकते हुए मन को स्थिर करे।
श्लोक 10 (12.193.10)
विसंचारि निरालम्बं पञ्चद्वारं चलाचलम् । पूर्वं ध्यानपदे धीरः समादध्यान्मनो नरः ॥
visaṃcāri nirālambaṃ pañcadvāraṃ calācalam | pūrvaṃ dhyānapade dhīraḥ samādadhyānmano naraḥ
चंचल, निराधार, पाँच द्वारों वाला और सदा हिलता-डुलता जो मन है, उसे धीर पुरुष पहले ध्यान के मार्ग में स्थिर करे।
श्लोक 11 (12.193.11)
इन्द्रियाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् । एष ध्यानपथः पूर्वो मया समनुवर्णितः ॥
indriyāṇi manaścaiva yadā piṇḍīkarotyayam | eṣa dhyānapathaḥ pūrvo mayā samanuvarṇitaḥ
जब मनुष्य इन्द्रियों और मन को एक साथ समेट लेता है, तब यही ध्यान का पहला मार्ग है, जैसा मैंने बताया।
श्लोक 12 (12.193.12)
तस्य तत्पूर्वसंरुद्धमात्मषष्ठं मनोऽन्तरा । स्फुरिष्यति समुद्भ्रान्तं विद्युदम्बुधरे यथा ॥
tasya tatpūrvasaṃruddhamātmaṣaṣṭhaṃ mano'ntarā | sphuriṣyati samudbhrāntaṃ vidyudambudhare yathā
उसका वह पहले रोका हुआ छठा (मन) भीतर घबराया हुआ कौंधेगा, जैसे बादल में बिजली।
श्लोक 13 (12.193.13)
जलबिन्दुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः । एवमेवास्य तच्चित्तं भ्रमति ध्यानवर्त्मनि ॥
jalabinduryathā lolaḥ parṇasthaḥ sarvataścalaḥ | evamevāsya taccittaṃ bhramati dhyānavartmani
जैसे पत्ते पर रखी चंचल जल की बूँद चारों ओर हिलती है, वैसे ही ध्यान के मार्ग में उसका चित्त घूमता है।
श्लोक 14 (12.193.14)
समाहितं क्षणं किंचिद्ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति । पुनर्वायुपथं प्राप्तं मनो भवति वायुवत् ॥
samāhitaṃ kṣaṇaṃ kiṃciddhyānavartmani tiṣṭhati | punarvāyupathaṃ prāptaṃ mano bhavati vāyuvat
क्षणभर वह ध्यान के मार्ग में समाहित रहता है; फिर वायु के मार्ग में भटक जाने पर मन वायु के समान हो जाता है।
श्लोक 15 (12.193.15)
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रीरमत्सरः । समादध्यात्पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥
anirvedo gatakleśo gatatandrīramatsaraḥ | samādadhyātpunaśceto dhyānena dhyānayogavit
निराशा, क्लेश, आलस्य और मत्सर से रहित होकर ध्यानयोग को जानने वाला ध्यान से फिर मन को स्थिर करे।
श्लोक 16 (12.193.16)
विचारश्च विवेकश्च वितर्कश्चोपजायते । मुनेः समादधानस्य प्रथमं ध्यानमादितः ॥
vicāraśca vivekaśca vitarkaścopajāyate | muneḥ samādadhānasya prathamaṃ dhyānamāditaḥ
मन को स्थिर करते हुए मुनि में विचार, विवेक और वितर्क उत्पन्न होते हैं; यह आरम्भ में पहला ध्यान है।
श्लोक 17 (12.193.17)
मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारयेत् । न निर्वेदं मुनिर्गच्छेत्कुर्यादेवात्मनो हितम् ॥
manasā kliśyamānastu samādhānaṃ ca kārayet | na nirvedaṃ munirgacchetkuryādevātmano hitam
मन से कष्ट पाते हुए भी वह समाधान कराए; मुनि निराश न हो, अपने हित का ही कार्य करे।
श्लोक 18 (12.193.18)
पांसुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्चिताः । सहसा वारिणा सिक्ता न यान्ति परिभावनम् ॥
pāṃsubhasmakarīṣāṇāṃ yathā vai rāśayaścitāḥ | sahasā vāriṇā siktā na yānti paribhāvanam
जैसे धूल, राख और सूखे गोबर के ढेर अचानक पानी छिड़कने पर भीगकर एकरस नहीं होते,
श्लोक 19 (12.193.19)
किंचित्स्निग्धं यथा च स्याच्छुष्कचूर्णमभावितम् । क्रमशस्तु शनैर्गच्छेत्सर्वं तत्परिभावनम् ॥
kiṃcitsnigdhaṃ yathā ca syācchuṣkacūrṇamabhāvitam | kramaśastu śanairgacchetsarvaṃ tatparibhāvanam
वैसे ही थोड़ी नमी हो तो सूखा चूर्ण, जो अभी भीगा नहीं है, क्रम से और धीरे-धीरे सब ओर से भीग जाता है।
श्लोक 20 (12.193.20)
एवमेवेन्द्रियग्रामं शनैः संपरिभावयेत् । संहरेत्क्रमशश्चैनं स सम्यक्प्रशमिष्यति ॥
evamevendriyagrāmaṃ śanaiḥ saṃparibhāvayet | saṃharetkramaśaścainaṃ sa samyakpraśamiṣyati
इसी प्रकार इन्द्रियों के समूह को धीरे-धीरे भिगोए और क्रम से उसे समेटे; तब वह भली-भाँति शान्त हो जाएगा।
श्लोक 21 (12.193.21)
स्वयमेव मनश्चैवं पञ्चवर्गं च भारत । पूर्वं ध्यानपथे स्थाप्य नित्ययोगेन शाम्यति ॥
svayameva manaścaivaṃ pañcavargaṃ ca bhārata | pūrvaṃ dhyānapathe sthāpya nityayogena śāmyati
हे भारत, इस प्रकार मन और पाँचों का समूह, पहले ध्यान के मार्ग में स्थापित होकर, निरन्तर योग से शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 22 (12.193.22)
न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् । सुखमेष्यति तत्तस्य न भवन्ति विपत्तयः ॥
na tatpuruṣakāreṇa na ca daivena kenacit | sukhameṣyati tattasya na bhavanti vipattayaḥ
वह सुख न पुरुषार्थ से और न किसी दैव से उसे मिलेगा; और उसके लिए विपत्तियाँ नहीं रहतीं।
श्लोक 23 (12.193.23)
सुखेन तेन संयुक्तो रंस्यते ध्यानकर्मणि । गच्छन्ति योगिनो ह्येवं निर्वाणं तन्निरामयम् ॥
sukhena tena saṃyukto raṃsyate dhyānakarmaṇi | gacchanti yogino hyevaṃ nirvāṇaṃ tannirāmayam
उस सुख से युक्त होकर वह ध्यान-कर्म में रमेगा; इस प्रकार योगी उस निरामय निर्वाण को प्राप्त होते हैं।