शान्ति पर्व · अध्याय 195
कुछ जापकों का नरक में गिरना
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जापकों की सर्वोच्च गति ही एकमात्र गति है या दूसरी भी हैं। भीष्म उन जापकों को गिनाते हैं जो नरक में जाते हैं: जो विधि का केवल एक अंश करता है, जो अनादर, अहंकार या दूसरों के तिरस्कार के साथ जप करता है, जो लोभ, ऐश्वर्य की आसक्ति या 'मैं कर रहा हूँ' के भाव से जप करता है, और अप्रशिक्षित बुद्धि वाला मूर्ख जो मोह में पड़ता है। जो जापक सचमुच अव्यक्त ब्रह्म हो गया है, उसके फिर शरीर में आने का कारण नहीं; नरक दुर्बुद्धि के दोष हैं, जबकि जापक की स्थिति स्वयं प्रशंसनीय है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.195.1)
गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथिता जापकेष्विह । एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि ॥
gatīnāmuttamā prāptiḥ kathitā jāpakeṣviha | ekaivaiṣā gatisteṣāmuta yāntyaparāmapi
यहाँ जापकों के लिए गतियों में सर्वोच्च प्राप्ति बताई गई है। क्या यही उनकी एकमात्र गति है, अथवा वे दूसरी गतियों को भी जाते हैं?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.195.2)
शृणुष्वावहितो राजञ्जापकानां गतिं विभो । यथा गच्छन्ति निरयमनेकं पुरुषर्षभ ॥
śṛṇuṣvāvahito rājañjāpakānāṃ gatiṃ vibho | yathā gacchanti nirayamanekaṃ puruṣarṣabha
हे राजन्, हे विभो, ध्यान से सुनो जापकों की गति कैसी होती है - हे पुरुषश्रेष्ठ, वे किस प्रकार अनेक प्रकार के नरक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3 (12.195.3)
यथोक्तमेतत्पूर्वं यो नानुतिष्ठति जापकः । एकदेशक्रियश्चात्र निरयं स निगच्छति ॥
yathoktametatpūrvaṃ yo nānutiṣṭhati jāpakaḥ | ekadeśakriyaścātra nirayaṃ sa nigacchati
जो जापक पहले बताई हुई विधि का पालन नहीं करता और केवल एक अंश का ही आचरण करता है, वह नरक में जाता है।
श्लोक 4 (12.195.4)
अवमानेन कुरुते न तुष्यति न शोचति । ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशयः ॥
avamānena kurute na tuṣyati na śocati | īdṛśo jāpako yāti nirayaṃ nātra saṃśayaḥ
जो अनादर के साथ करता है, न प्रसन्न होता है न शोक करता है - ऐसा जापक नरक को जाता है; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 5 (12.195.5)
अहंकारकृतश्चैव सर्वे निरयगामिनः । परावमानी पुरुषो भविता निरयोपगः ॥
ahaṃkārakṛtaścaiva sarve nirayagāminaḥ | parāvamānī puruṣo bhavitā nirayopagaḥ
अहंकार से कर्म करने वाले सभी नरक में जाते हैं; दूसरों का अपमान करने वाला पुरुष नरक को प्राप्त होगा।
श्लोक 6 (12.195.6)
अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहितः । यत्रास्य रागः पतति तत्रतत्रोपपद्यते ॥
abhidhyāpūrvakaṃ japyaṃ kurute yaśca mohitaḥ | yatrāsya rāgaḥ patati tatratatropapadyate
जो मोहित होकर लोभ-भरे संकल्प के साथ जप करता है, उसकी आसक्ति जहाँ पड़ती है, वह वहीं-वहीं जन्म लेता है।
श्लोक 7 (12.195.7)
अथैश्वर्यप्रसक्तः सञ्जापको यत्र रज्यते । स एव निरयस्तस्य नासौ तस्मात्प्रमुच्यते ॥
athaiśvaryaprasaktaḥ sañjāpako yatra rajyate | sa eva nirayastasya nāsau tasmātpramucyate
और जो जापक ऐश्वर्य में आसक्त होकर जहाँ रमता है, वही उसके लिए नरक है; वह उससे मुक्त नहीं होता।
श्लोक 8 (12.195.8)
रागेण जापको जप्यं कुरुते यश्च मोहितः । यत्रास्य रागः पतति तत्र तत्रोपजायते ॥
rāgeṇa jāpako japyaṃ kurute yaśca mohitaḥ | yatrāsya rāgaḥ patati tatra tatropajāyate
जो जापक मोहित होकर राग के साथ जप करता है, उसका राग जहाँ पड़ता है, वहीं-वहीं वह उत्पन्न होता है।
श्लोक 9 (12.195.9)
दुर्बुद्धिरकृतप्रज्ञश्चले मनसि तिष्ठति । फलस्यापचितिं याति निरयं चाधिगच्छति ॥
durbuddhirakṛtaprajñaścale manasi tiṣṭhati | phalasyāpacitiṃ yāti nirayaṃ cādhigacchati
दुर्बुद्धि और अप्रशिक्षित बुद्धि वाला, जिसका मन चंचल रहता है, फल की हानि को प्राप्त होता है और नरक में जाता है।
श्लोक 10 (12.195.10)
अकृतप्रज्ञको बालो मोहं गच्छति जापकः । स मोहान्निरयं याति यत्र गत्वाऽनुशोचति ॥
akṛtaprajñako bālo mohaṃ gacchati jāpakaḥ | sa mohānnirayaṃ yāti yatra gatvā'nuśocati
अप्रशिक्षित बुद्धि वाला मूर्ख जापक मोह में पड़ जाता है; मोह से वह नरक में जाता है, जहाँ जाकर वह शोक करता है।
श्लोक 11 (12.195.11)
दृढग्राही करोमीति जाप्यं जपति जापकः । न संपूर्णो न वा युक्तो निरयं सोऽधिगच्छति ॥
dṛḍhagrāhī karomīti jāpyaṃ japati jāpakaḥ | na saṃpūrṇo na vā yukto nirayaṃ so'dhigacchati
जो जापक 'मैं कर रहा हूँ' सोचकर दृढ़ पकड़ के साथ जप करता है, वह न पूर्ण होता है और न योगयुक्त; वह नरक को जाता है।
श्लोक 12 (12.195.12)
अनिमित्तं परं यत्तदव्यक्तं ब्रह्मणि स्थितम् । तद्भूतो जापकः कस्मात्सशरीरमिहाविशेत् ॥
animittaṃ paraṃ yattadavyaktaṃ brahmaṇi sthitam | tadbhūto jāpakaḥ kasmātsaśarīramihāviśet
जो निमित्तरहित, परम, अव्यक्त और ब्रह्म में स्थित है - उसमें लीन हुआ जापक यहाँ शरीर में क्यों प्रवेश करेगा?
श्लोक 13 (12.195.13)
दुष्प्रज्ञानेन निरया बहवः समुदाहृताः । प्रशस्तं जापकत्वं च दोषाश्चैते तदात्मकाः ॥
duṣprajñānena nirayā bahavaḥ samudāhṛtāḥ | praśastaṃ jāpakatvaṃ ca doṣāścaite tadātmakāḥ
दुर्बुद्धि के कारण बहुत-से नरक बताए गए हैं। जापक होना प्रशंसनीय है, और ये दोष उसी (दुर्बुद्धि) के रूप हैं।