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शान्ति पर्व · अध्याय 196

जापक और नरक

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जप करने वाला किस प्रकार के नरक में जाता है। भीष्म उत्तर देते हैं कि लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुतों, विश्वेदेवों, साध्यों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों, आदित्यों और वसुओं के दिव्य लोक परमात्मा के धाम की तुलना में 'नरक' ही कहलाते हैं। वह परम धाम भय और शोक से रहित है; वहाँ काल पकता तो है, पर स्वामी नहीं है, और वहाँ पहुँचकर जापक फिर कभी शोक नहीं करता।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.196.1)

कीदृशं निरयं याति जापको वर्णयस्व मे । कौतूहलं हि राजन्मे तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

kīdṛśaṃ nirayaṃ yāti jāpako varṇayasva me | kautūhalaṃ hi rājanme tadbhavānvaktumarhati

जप करने वाला किस प्रकार के नरक में जाता है, यह मुझे बताइए। हे राजन्, मुझे इसे जानने की बड़ी उत्सुकता है, और आप ही इसे कहने के योग्य हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.196.2)

धर्मस्यांशप्रसूतोऽसि धर्मज्ञोऽसि स्वभावतः । धर्ममूलाश्रयं वाक्यं शृणुष्वावहितोऽनघ ॥

dharmasyāṃśaprasūto'si dharmajño'si svabhāvataḥ | dharmamūlāśrayaṃ vākyaṃ śṛṇuṣvāvahito'nagha

तुम धर्म के अंश से उत्पन्न हो और स्वभाव से ही धर्म को जानने वाले हो। हे निष्पाप, धर्म के मूल पर टिकी हुई यह बात ध्यान से सुनो।

श्लोक 3 (12.196.3)

अमूनि यानि स्थानानि देवानाममरात्मनाम् । नानासंस्थानवर्णानि नानारूपफलानि च ॥

amūni yāni sthānāni devānāmamarātmanām | nānāsaṃsthānavarṇāni nānārūpaphalāni ca

अमर स्वरूप वाले देवताओं के जो ये धाम हैं, जिनके आकार और रंग अनेक हैं तथा जिनके रूप और फल भी अनेक प्रकार के हैं,

श्लोक 4 (12.196.4)

दिव्यानि कामचारीणि विमानानि सभास्तथा । आक्रीडा विविधा राजन्पद्मिन्यश्चामलोदकाः ॥

divyāni kāmacārīṇi vimānāni sabhāstathā | ākrīḍā vividhā rājanpadminyaścāmalodakāḥ

इच्छानुसार विचरने वाले दिव्य विमान और सभाएँ, हे राजन्, अनेक प्रकार के क्रीड़ा-उद्यान और निर्मल जल वाले कमल-सरोवर,

श्लोक 5 (12.196.5)

चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्याथ बृहस्पतेः । मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि ॥

caturṇāṃ lokapālānāṃ śukrasyātha bṛhaspateḥ | marutāṃ viśvadevānāṃ sādhyānāmaśvinorapi

चारों लोकपालों के, शुक्र और बृहस्पति के, मरुतों, विश्वेदेवों, साध्यों और दोनों अश्विनीकुमारों के,

श्लोक 6 (12.196.6)

रुद्रादित्यवसूनां च तथाऽन्येषां दिवौकसाम् । एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः ॥

rudrādityavasūnāṃ ca tathā'nyeṣāṃ divaukasām | ete vai nirayāstāta sthānasya paramātmanaḥ

रुद्रों, आदित्यों और वसुओं के तथा अन्य स्वर्गवासियों के, हे तात, ये सब परमात्मा के धाम की तुलना में नरक ही हैं।

श्लोक 7 (12.196.7)

अभयं चानिमित्तं च न च क्लेशभयावृतम् । द्वाभ्यां मुक्तं त्रिभिर्मुक्तमष्टाभिस्त्रिभिरेव च ॥

abhayaṃ cānimittaṃ ca na ca kleśabhayāvṛtam | dvābhyāṃ muktaṃ tribhirmuktamaṣṭābhistribhireva ca

वह धाम भय से रहित है, किसी हेतु पर निर्भर नहीं है और क्लेशों के भय से ढका हुआ नहीं है; वह दो से मुक्त है, तीन से मुक्त है, और आठ तथा तीन से भी मुक्त है।

श्लोक 8 (12.196.8)

चतुर्लक्षणवर्जं तु चतुष्कारणवर्जितम् । अप्रहर्षमनानन्दमशोकं विगतक्लमम् ॥

caturlakṣaṇavarjaṃ tu catuṣkāraṇavarjitam | apraharṣamanānandamaśokaṃ vigataklamam

उसमें चार लक्षण नहीं हैं और चार कारण भी नहीं हैं; वहाँ न हर्ष है, न आनन्द, न शोक है और न थकान।

श्लोक 9 (12.196.9)

कालः संपच्यते तत्र कालस्तत्र न वै प्रभुः । स कालस्य प्रभू राजन्सर्वस्यापि तथेश्वरः ॥

kālaḥ saṃpacyate tatra kālastatra na vai prabhuḥ | sa kālasya prabhū rājansarvasyāpi tatheśvaraḥ

वहाँ काल पकता तो है, परन्तु वहाँ काल का प्रभुत्व नहीं है। हे राजन्, वह धाम काल का भी स्वामी है और सबका भी ईश्वर है।

श्लोक 10 (12.196.10)

एतद्वै ब्रह्मणः स्थाने जापकस्य महात्मनः । तत्रस्थं परमात्मानं ध्यायन्वै सुसमाहितः । हिरण्यगर्भः सायुज्यं प्राप्नुयाद्वा नृपोत्तम ॥

etadvai brahmaṇaḥ sthāne jāpakasya mahātmanaḥ | tatrasthaṃ paramātmānaṃ dhyāyanvai susamāhitaḥ | hiraṇyagarbhaḥ sāyujyaṃ prāpnuyādvā nṛpottama

यह ब्रह्मा का धाम है, जो महात्मा जापक के लिए है। वहाँ स्थित होकर, एकाग्र चित्त से परमात्मा का ध्यान करता हुआ वह, हे नृपश्रेष्ठ, हिरण्यगर्भ के साथ सायुज्य प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 11 (12.196.11)

आत्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति । ईदृशं परमं स्थानं निरयास्ते च तादृशाः ॥

ātmakevalatāṃ prāptastatra gatvā na śocati | īdṛśaṃ paramaṃ sthānaṃ nirayāste ca tādṛśāḥ

केवल आत्मभाव को प्राप्त होकर वह वहाँ जाकर शोक नहीं करता। ऐसा है वह परम धाम, और वे नरक भी ऐसे ही (उसकी तुलना में) हैं।

श्लोक 12 (12.196.12)

एते ते निरयाः प्रोक्ताः सर्व एव यथातथम् । तस्य स्थानवरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः ॥

ete te nirayāḥ proktāḥ sarva eva yathātatham | tasya sthānavarasyeha sarve nirayasaṃjñitāḥ

इस प्रकार वे सब नरक तुम्हें ठीक-ठीक बता दिए गए। उस श्रेष्ठ धाम की तुलना में ही वे सब यहाँ 'नरक' कहे जाते हैं।

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