शान्ति पर्व · अध्याय 197
जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु
युधिष्ठिर काल, मृत्यु, यम, इक्ष्वाकु और ब्राह्मण के विवाद के विषय में पूछते हैं। भीष्म बताते हैं कि जापक पैप्पलाद कौशिक को संहिता के एक हज़ार वर्ष के जप के बाद देवी सावित्री ने वचन दिया कि उसकी जप-निष्ठा बढ़ती रहेगी; फिर सौ वर्ष और बीतने पर धर्म, यम, काल और मृत्यु उसे स्वर्ग ले जाने आते हैं, पर वह शरीर छोड़ने से मना कर देता है। तब राजा इक्ष्वाकु आकर ब्राह्मण के जप का फल माँगते हैं; ब्राह्मण उन्हें सत्य पर टिककर उसे लेने को कहता है, राजा नहीं लेते, और तभी ऋण के विवाद में उलझे दो पुरुष आ पहुँचते हैं। वे काम और क्रोध निकलते हैं, जिन्होंने यह परीक्षा रखी थी। अन्त में भीष्म जापक को मिलने वाली गतियाँ बताते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.197.1)
कालमृत्युयमानां ते इक्ष्वाकोर्ब्राह्मणस्य च । विवादो व्याहृतः पूर्वं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
kālamṛtyuyamānāṃ te ikṣvākorbrāhmaṇasya ca | vivādo vyāhṛtaḥ pūrvaṃ tadbhavānvaktumarhati
काल, मृत्यु और यम के साथ इक्ष्वाकु और ब्राह्मण का जो विवाद पहले कहा गया था, उसे आप मुझे सुनाने के योग्य हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.197.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । इक्ष्वाकोः सूर्यपुत्रस्य यद्वृत्तं ब्राह्मणस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | ikṣvākoḥ sūryaputrasya yadvṛttaṃ brāhmaṇasya ca
इस विषय में लोग यह पुरानी कथा सुनाते हैं, जो सूर्यपुत्र इक्ष्वाकु और एक ब्राह्मण के साथ घटी थी।
श्लोक 3 (12.197.3)
कालस्य मृत्योश्च तथा यद्वृत्तं तन्निबोध मे । यथा स तेषां संवादो यस्मिन्स्थानेऽपि चाभवत् । येनैव कारणेनात्र धर्मवादसमन्वितः ॥
kālasya mṛtyośca tathā yadvṛttaṃ tannibodha me | yathā sa teṣāṃ saṃvādo yasminsthāne'pi cābhavat | yenaiva kāraṇenātra dharmavādasamanvitaḥ
काल और मृत्यु के साथ जो घटना घटी, वह मुझसे सुनो: उनका उसके साथ संवाद कैसे और किस स्थान पर हुआ, और किस कारण से वह धर्म-चर्चा से जुड़ा हुआ था।
श्लोक 4 (12.197.4)
ब्राह्मणो जापकः कश्चिद्धर्मवृत्तो महायशाः । षडङ्गविन्महाप्राज्ञः पैप्पलादिः स कौशिकः ॥
brāhmaṇo jāpakaḥ kaściddharmavṛtto mahāyaśāḥ | ṣaḍaṅgavinmahāprājñaḥ paippalādiḥ sa kauśikaḥ
एक ब्राह्मण था, जो जप करने वाला, धर्म में दृढ़, महान यशस्वी, षडंगों का ज्ञाता और अत्यन्त बुद्धिमान था; वह कौशिक गोत्र का पैप्पलादि था।
श्लोक 5 (12.197.5)
तस्यापरोक्षं विज्ञानं षडङ्गेषु बभूव ह । वेदेषु चैव निष्णातो हिमवत्पादसंश्रयः ॥
tasyāparokṣaṃ vijñānaṃ ṣaḍaṅgeṣu babhūva ha | vedeṣu caiva niṣṇāto himavatpādasaṃśrayaḥ
उसे छहों अंगों का प्रत्यक्ष ज्ञान था, वह वेदों में भी निपुण था और हिमालय की तलहटी में रहता था।
श्लोक 6 (12.197.6)
सोऽयं ब्राह्मं तपस्तेपे संहितां संयतो जपन् । तस्य वर्षसहस्रं तु नियमेन तथा गतम् ॥
so'yaṃ brāhmaṃ tapastepe saṃhitāṃ saṃyato japan | tasya varṣasahasraṃ tu niyamena tathā gatam
वह संयमी ब्राह्मण संहिता का जप करता हुआ ब्रह्म-तप करता रहा, और इसी प्रकार नियमपूर्वक उसके एक हज़ार वर्ष बीत गए।
श्लोक 7 (12.197.7)
स देव्या दर्शितः साक्षात्प्रीतास्मीति तदा किल । जप्यमावर्तयंस्तूष्णीं न स तां किंचिदब्रवीत् ॥
sa devyā darśitaḥ sākṣātprītāsmīti tadā kila | japyamāvartayaṃstūṣṇīṃ na sa tāṃ kiṃcidabravīt
तब कहते हैं, देवी ने साक्षात् दर्शन देकर कहा, “मैं प्रसन्न हूँ।” पर वह मौन रहकर अपना जप दोहराता रहा और उससे कुछ भी नहीं बोला।
श्लोक 8 (12.197.8)
तस्यानुकम्पया देवी प्रीता समभवत्तदा । वेदमाता ततस्तस्य तज्जप्यं समपूजयत् ॥
tasyānukampayā devī prītā samabhavattadā | vedamātā tatastasya tajjapyaṃ samapūjayat
उस पर दया करके वेदमाता देवी तब प्रसन्न हुईं और उन्होंने उसके जप का सम्मान किया।
श्लोक 9 (12.197.9)
चतुर्भिरक्षरैर्युक्ता सोमपानेऽक्षराष्टका । जगद्बीजसमायुक्ता चतुर्विंशाक्षरात्मिका ॥
caturbhirakṣarairyuktā somapāne'kṣarāṣṭakā | jagadbījasamāyuktā caturviṃśākṣarātmikā
वह चार अक्षरों से युक्त है और सोमपान के समय आठ अक्षरों वाली है; जगत् के बीज से संयुक्त वह चौबीस अक्षरों से बनी है।
श्लोक 10 (12.197.10)
समाप्य जप्यं तूत्थाय शिरसा पादयोस्तदा । पपात देव्या धर्मात्मा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
samāpya japyaṃ tūtthāya śirasā pādayostadā | papāta devyā dharmātmā vacanaṃ cedamabravīt
जप पूरा करके वह उठा और सिर के बल देवी के चरणों में गिर पड़ा, और उस धर्मात्मा ने ये वचन कहे।
श्लोक 11 (12.197.11)
दिष्ट्या देवि प्रसन्ना त्वं दर्शनं चागता मम । यदि चापि प्रसन्नासि जप्ये मे रमतां मनः ॥
diṣṭyā devi prasannā tvaṃ darśanaṃ cāgatā mama | yadi cāpi prasannāsi japye me ramatāṃ manaḥ
“देवि, सौभाग्य से आप प्रसन्न हैं और मेरे दर्शन के लिए आई हैं। यदि आप सचमुच प्रसन्न हैं, तो मेरा मन जप में ही रमा रहे।”
सावित्र्युवाच
श्लोक 12 (12.197.12)
किं प्रार्थयसि विप्रर्षे किं चेष्टं करवाणि ते । प्रब्रूहि जपतां श्रेष्ठ सर्वं तत्ते भविष्यति ॥
kiṃ prārthayasi viprarṣe kiṃ ceṣṭaṃ karavāṇi te | prabrūhi japatāṃ śreṣṭha sarvaṃ tatte bhaviṣyati
हे विप्रर्षि, तुम क्या माँगते हो? तुम्हारी कौन-सी इच्छा मैं पूरी करूँ? हे जपियों में श्रेष्ठ, बताओ; वह सब तुम्हें मिलेगा।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.197.13)
इत्युक्तः स तदा देव्या विप्रः प्रोवाच धर्मवित् । जप्यं प्रति ममेच्छेयं वर्धत्विति पुनः पुनः ॥
ityuktaḥ sa tadā devyā vipraḥ provāca dharmavit | japyaṃ prati mameccheyaṃ vardhatviti punaḥ punaḥ
देवी के ऐसा कहने पर धर्म को जानने वाले उस ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “जप के प्रति मेरी इच्छा बार-बार बढ़ती रहे।”
श्लोक 14 (12.197.14)
मनसश्च समाधिर्मे वर्धेताहरहः शुभे । तत्तथेति ततो देवी मधुरं प्रत्यभाषत ॥
manasaśca samādhirme vardhetāharahaḥ śubhe | tattatheti tato devī madhuraṃ pratyabhāṣata
“और हे शुभे, मेरे मन की समाधि दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहे।” तब देवी ने मधुर स्वर में उत्तर दिया, “ऐसा ही हो।”
श्लोक 15 (12.197.15)
इदं चैवापरं प्राह देवी तत्प्रियकाम्यया । निरयं नैव याता त्वं यत्र याता द्विजर्षभाः ॥
idaṃ caivāparaṃ prāha devī tatpriyakāmyayā | nirayaṃ naiva yātā tvaṃ yatra yātā dvijarṣabhāḥ
और देवी ने उसे प्रसन्न करने की इच्छा से यह भी कहा, “तुम उस नरक में कभी नहीं जाओगे जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण गए हैं।”
सावित्र्युवाच
श्लोक 16 (12.197.16)
यास्यसि ब्रह्मणः स्थानमनिमित्तमतन्द्रितः । साधु ते भविता चैतद्यत्त्वयाऽहमिहार्थिता ॥
yāsyasi brahmaṇaḥ sthānamanimittamatandritaḥ | sādhu te bhavitā caitadyattvayā'hamihārthitā
“तुम निरन्तर सजग रहकर ब्रह्मा के उस धाम को जाओगे जो किसी हेतु पर निर्भर नहीं है, और तुमने मुझसे यहाँ जो माँगा है, वह तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा।
श्लोक 17 (12.197.17)
नियतो जप चैकाग्रो धर्मस्त्वां समुपैष्यति । कालो मृत्युर्यमश्चैव समायास्यन्ति तेऽन्तिकम् । भविता च विवादोऽत्र तव तेषां च धर्मतः ॥
niyato japa caikāgro dharmastvāṃ samupaiṣyati | kālo mṛtyuryamaścaiva samāyāsyanti te'ntikam | bhavitā ca vivādo'tra tava teṣāṃ ca dharmataḥ
संयमित रहकर एकाग्र मन से जप करते रहो; धर्म तुम्हारे पास आएगा। काल, मृत्यु और यम भी तुम्हारे निकट आएँगे, और यहाँ तुम्हारे तथा उनके बीच धर्म को लेकर विवाद होगा।”
भीष्म उवाच
श्लोक 18 (12.197.18)
एवमुक्त्वा भगवती जगाम भवनं स्वकम् ॥
evamuktvā bhagavatī jagāma bhavanaṃ svakam
यह कहकर पूज्य देवी अपने निवास को चली गईं।
श्लोक 19 (12.197.19)
ब्राह्मणोऽपि जपन्नास्ते दिव्यं वर्षशतं तथा । सदा दान्तो जितक्रोधः सत्यसन्धोऽनसूयकः ॥
brāhmaṇo'pi japannāste divyaṃ varṣaśataṃ tathā | sadā dānto jitakrodhaḥ satyasandho'nasūyakaḥ
और वह ब्राह्मण सौ दिव्य वर्षों तक और जप करता रहा; वह सदा संयमी, क्रोध को जीते हुए, सत्य पर अटल और ईर्ष्या से रहित था।
श्लोक 20 (12.197.20)
समाप्ते नियमे तस्मिन्नथ विप्रस्य धीमतः । साक्षात्प्रीतस्तदा धर्मो दर्शयामास तं द्विजम् ॥
samāpte niyame tasminnatha viprasya dhīmataḥ | sākṣātprītastadā dharmo darśayāmāsa taṃ dvijam
जब उस बुद्धिमान ब्राह्मण का वह नियम पूरा हुआ, तब प्रसन्न होकर स्वयं धर्म ने साक्षात् उसे दर्शन दिए।
धर्म उवाच
श्लोक 21 (12.197.21)
द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः । जप्यस्यास्य फलं यत्तत्संप्राप्तं तच्च मे शृणु ॥
dvijāte paśya māṃ dharmamahaṃ tvāṃ draṣṭumāgataḥ | japyasyāsya phalaṃ yattatsaṃprāptaṃ tacca me śṛṇu
हे ब्राह्मण, मुझे देखो; मैं धर्म हूँ और तुम्हें देखने आया हूँ। इस जप का जो फल तुम्हें प्राप्त हुआ है, उसे मुझसे सुनो।
श्लोक 22 (12.197.22)
जिता लोकास्त्वया सर्वे ये दिव्या ये च मानुषाः । देवानां निलयान्साधो सर्वानुत्क्रम्य यास्यसि ॥
jitā lokāstvayā sarve ye divyā ye ca mānuṣāḥ | devānāṃ nilayānsādho sarvānutkramya yāsyasi
तुमने सब लोक जीत लिए हैं, चाहे वे दिव्य हों या मानव। हे साधु, देवताओं के सब निवासों को पार करके तुम आगे जाओगे।
श्लोक 23 (12.197.23)
प्राणत्यागं कुरु मुने गच्छ लोकान्यथेप्सितान् । त्यक्त्वाऽऽत्मनः शरीरं च ततो लोकानवाप्स्यसि ॥
prāṇatyāgaṃ kuru mune gaccha lokānyathepsitān | tyaktvā''tmanaḥ śarīraṃ ca tato lokānavāpsyasi
हे मुनि, प्राण त्याग दो और इच्छित लोकों को जाओ; अपना शरीर छोड़कर तुम उन लोकों को पा लोगे।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 24 (12.197.24)
कृतं लोकेन मे धर्म गच्छ त्वं च यथासुखम् । बहुदुःखमहं देहं नोत्सृजेयमहं विभो ॥
kṛtaṃ lokena me dharma gaccha tvaṃ ca yathāsukham | bahuduḥkhamahaṃ dehaṃ notsṛjeyamahaṃ vibho
हे धर्म, मुझे लोकों से क्या प्रयोजन? आप सुखपूर्वक जाइए। हे प्रभु, बहुत दुःख देने वाले इस शरीर को भी मैं नहीं छोड़ूँगा।
धर्म उवाच
श्लोक 25 (12.197.25)
अचलं ते मनः कृत्वा त्यज देहं महामते । अनेन किं ते संयोगः कथं मोहं गमिष्यसि ॥
acalaṃ te manaḥ kṛtvā tyaja dehaṃ mahāmate | anena kiṃ te saṃyogaḥ kathaṃ mohaṃ gamiṣyasi
हे महामति, मन को अटल करके देह त्याग दो। इससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? तुम मोह में कैसे पड़ोगे?
श्लोक 26 (12.197.26)
अवश्यं भोः शरीरं ते त्यक्तव्यं मुनिपुङ्गव । स्वर्गमारोह भो विप्र किं वा वै रोचतेऽनघ ॥
avaśyaṃ bhoḥ śarīraṃ te tyaktavyaṃ munipuṅgava | svargamāroha bho vipra kiṃ vā vai rocate'nagha
हे मुनिश्रेष्ठ, आपको यह शरीर अवश्य छोड़ना पड़ेगा। हे विप्र, स्वर्ग पर आरोहण कीजिए; या हे निष्पाप, आपको और क्या रुचता है?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 27 (12.197.27)
किमुक्तं धर्म किं नेति कस्मान्मां प्रोक्तवानसि । त्यज देहं द्विजेति त्वं ससंबुध्यात्र मे यदि ॥
kimuktaṃ dharma kiṃ neti kasmānmāṃ proktavānasi | tyaja dehaṃ dvijeti tvaṃ sasaṃbudhyātra me yadi
हे धर्म, आपने क्या कहा और मुझसे ऐसा क्यों कहा? आप मुझे सम्बोधित करके कहते हैं, “हे ब्राह्मण, देह त्याग दो”; यदि यहाँ मुझसे आपका यही कहना है, तो मैं इससे सहमत नहीं हूँ।
श्लोक 28 (12.197.28)
न रोचये स्वर्गवासं विना देहमहं विभो । गच्छ धर्म न मे श्रद्धा स्वर्गं गन्तुं विनाऽऽत्मना ॥
na rocaye svargavāsaṃ vinā dehamahaṃ vibho | gaccha dharma na me śraddhā svargaṃ gantuṃ vinā''tmanā
हे प्रभु, मैं शरीर के बिना स्वर्ग में निवास करना नहीं चाहता। हे धर्म, आप जाइए; अपने इस आत्मा के बिना स्वर्ग जाने की मेरी श्रद्धा नहीं है।
धर्म उवाच
श्लोक 29 (12.197.29)
अलं देहे मनः कृत्वा त्यक्त्वा देहं सुखी भव । गच्छ लोकानरजसो यत्र गत्वा न शोचसि ॥
alaṃ dehe manaḥ kṛtvā tyaktvā dehaṃ sukhī bhava | gaccha lokānarajaso yatra gatvā na śocasi
देह में मन लगाना बहुत हुआ; देह छोड़कर सुखी हो जाओ। उन रजोगुण-रहित लोकों को जाओ, जहाँ पहुँचकर तुम्हें शोक नहीं होगा।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 30 (12.197.30)
रमे जपन्महाभाग कृतं लोकैः सनातनैः । सशरीरेण गन्तव्यं मया स्वर्गं न चान्यथा ॥
rame japanmahābhāga kṛtaṃ lokaiḥ sanātanaiḥ | saśarīreṇa gantavyaṃ mayā svargaṃ na cānyathā
हे महाभाग, मैं तो जप में ही रमता हूँ; सनातन लोकों से मुझे क्या? मैं स्वर्ग जाऊँगा तो शरीर के साथ ही, किसी और प्रकार से नहीं।
धर्म उवाच
श्लोक 31 (12.197.31)
एवं ते कार्यसंप्रीतिर्वर्तते मुनिसत्तम । यदि त्वं नेच्छसि त्यक्तुं शरीरं पश्य वै द्विज । एष कालस्तथा मृत्युर्यमश्च त्वामुपागताः ॥
evaṃ te kāryasaṃprītirvartate munisattama | yadi tvaṃ necchasi tyaktuṃ śarīraṃ paśya vai dvija | eṣa kālastathā mṛtyuryamaśca tvāmupāgatāḥ
हे मुनिश्रेष्ठ, तुम्हारे प्रयोजन की तृप्ति इसी प्रकार चल रही है। यदि तुम शरीर त्यागना नहीं चाहते, तो देखो, हे ब्राह्मण: ये काल, मृत्यु और यम तुम्हारे पास आ पहुँचे हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 32 (12.197.32)
अथ वैवस्वतः कालो मृत्युश्च त्रितयं विभो । ब्राह्मणं तं महाभागमुपगम्येदमब्रवन् ॥
atha vaivasvataḥ kālo mṛtyuśca tritayaṃ vibho | brāhmaṇaṃ taṃ mahābhāgamupagamyedamabravan
तब, हे प्रभु, वैवस्वत यम, काल और मृत्यु, ये तीनों उस महाभाग ब्राह्मण के पास आए और यह बोले।
यम उवाच
श्लोक 33 (12.197.33)
तपसोऽस्य सुतप्तस्य तथा सुचरितस्य च । फलप्राप्तिस्तव श्रेष्ठा यमोऽहं त्वामुपब्रुवे ॥
tapaso'sya sutaptasya tathā sucaritasya ca | phalaprāptistava śreṣṭhā yamo'haṃ tvāmupabruve
तुम्हारी यह तपस्या भली-भाँति तपी गई और तुम्हारा आचरण उत्तम रहा; इसलिए तुम्हें श्रेष्ठ फल प्राप्त हुआ है। मैं यम हूँ और तुमसे यह कह रहा हूँ।
काल उवाच
श्लोक 34 (12.197.34)
यथावदस्य जप्यस्य फलं प्राप्तस्त्वमुत्तमम् । कालस्ते स्वर्गमारोढुं कालोऽहं त्वामुपागतः ॥
yathāvadasya japyasya phalaṃ prāptastvamuttamam | kālaste svargamāroḍhuṃ kālo'haṃ tvāmupāgataḥ
तुमने इस जप का उत्तम फल पूर्ण रूप से पा लिया है। अब तुम्हारे स्वर्ग जाने का समय आ गया है; मैं काल हूँ और तुम्हारे पास आया हूँ।
मृत्युरुवाच
श्लोक 35 (12.197.35)
मृत्युं मां विद्धि धर्मज्ञ रूपिणं स्वयमागतम् । कालेन चोदितो विप्र त्वामितो नेतुमद्य वै ॥
mṛtyuṃ māṃ viddhi dharmajña rūpiṇaṃ svayamāgatam | kālena codito vipra tvāmito netumadya vai
हे धर्मज्ञ, मुझे मृत्यु जानो, जो रूप धारण करके स्वयं आई है। हे विप्र, काल की प्रेरणा से मैं आज तुम्हें यहाँ से ले जाने आई हूँ।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 36 (12.197.36)
स्वागतं सूर्यपुत्राय कालाय च महात्मने । मृत्यवे चाथ धर्माय किं कार्यं करवाणि वः ॥
svāgataṃ sūryaputrāya kālāya ca mahātmane | mṛtyave cātha dharmāya kiṃ kāryaṃ karavāṇi vaḥ
सूर्यपुत्र का स्वागत है, महात्मा काल का और मृत्यु का भी, और धर्म का भी। मैं आप लोगों का कौन-सा कार्य करूँ?
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (12.197.37)
अर्ध्यं पाद्यं च दत्त्वा स तेभ्यस्तत्र समागमे । अब्रवीत्परमप्रीतः स्वशक्त्या किं करोमि वः ॥
ardhyaṃ pādyaṃ ca dattvā sa tebhyastatra samāgame | abravītparamaprītaḥ svaśaktyā kiṃ karomi vaḥ
उसने उन्हें अर्घ्य और पाद्य देकर, उस समागम में अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा, “मैं अपनी शक्ति के अनुसार आपके लिए क्या करूँ?”
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 38 (12.197.38)
स्वकार्यनिर्भरा यूयं परोपद्रवहेतवः । भवन्तो लोकसामान्याः किमर्थं ब्रूत सत्तमाः ॥
svakāryanirbharā yūyaṃ paropadravahetavaḥ | bhavanto lokasāmānyāḥ kimarthaṃ brūta sattamāḥ
आप लोग अपने कार्य में ही पूरी तरह लगे रहते हैं और दूसरों के लिए विपत्ति के कारण बनते हैं; आप सम्पूर्ण लोक के लिए समान हैं। हे श्रेष्ठ जनो, बताइए कि आप किस प्रयोजन से आए हैं।
यम उवाच
श्लोक 39 (12.197.39)
वयमप्येवमत्युग्रा धातुराज्ञापुरः सराः । चोदिता धावमाना वै कर्मभावमनुव्रताः ॥
vayamapyevamatyugrā dhāturājñāpuraḥ sarāḥ | coditā dhāvamānā vai karmabhāvamanuvratāḥ
हम भी इसी प्रकार अत्यन्त उग्र हैं और विधाता की आज्ञा के आगे-आगे चलते हैं; प्रेरित होकर हम कर्मों की गति का अनुसरण करते हुए दौड़ते रहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 40 (12.197.40)
तस्मिन्नेवाथ काले तु तीर्थयात्रामुपागतः । इक्ष्वाकुरगमत्तत्र समेता यत्र ते विभो ॥
tasminnevātha kāle tu tīrthayātrāmupāgataḥ | ikṣvākuragamattatra sametā yatra te vibho
ठीक उसी समय तीर्थयात्रा पर निकले हुए इक्ष्वाकु, हे प्रभु, वहाँ आए जहाँ वे सब एकत्र थे।
श्लोक 41 (12.197.41)
सर्वानेव तु राजर्षिः संपूज्याथ प्रणम्य च । कुशलप्रश्नमकरोत्सर्वेषां राजसत्तमः ॥
sarvāneva tu rājarṣiḥ saṃpūjyātha praṇamya ca | kuśalapraśnamakarotsarveṣāṃ rājasattamaḥ
उस राजर्षि ने, जो राजाओं में श्रेष्ठ था, उन सबका आदर किया, उन्हें प्रणाम किया और सबका कुशल-क्षेम पूछा।
श्लोक 42 (12.197.42)
तस्मै सोऽथासनं दत्त्वा पाद्यमर्ध्यं तथैव च । अब्रवीद्ब्राह्मणो वाक्यं कृत्वा कुशलसंविदम् ॥
tasmai so'thāsanaṃ dattvā pādyamardhyaṃ tathaiva ca | abravīdbrāhmaṇo vākyaṃ kṛtvā kuśalasaṃvidam
ब्राह्मण ने उसे आसन, पाद्य और अर्घ्य देकर, कुशल पूछकर उससे यह कहा।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 43 (12.197.43)
स्वागतं ते महाराज ब्रूहि यद्यदिहेच्छसि । स्वशक्त्या किं करोमीह तद्भवान्प्रब्रवीतु माम् ॥
svāgataṃ te mahārāja brūhi yadyadihecchasi | svaśaktyā kiṃ karomīha tadbhavānprabravītu mām
हे महाराज, आपका स्वागत है। जो कुछ आप चाहें, कहिए। यहाँ मैं अपनी शक्ति के अनुसार आपके लिए क्या करूँ? आप मुझे बताइए।
राजोवाच
श्लोक 44 (12.197.44)
राजाऽहं ब्राह्मणश्च त्वं यदा षट्कर्मसंस्थितः । ददानि वसु किंचित्ते प्रार्थितं तद्वदस्व मे ॥
rājā'haṃ brāhmaṇaśca tvaṃ yadā ṣaṭkarmasaṃsthitaḥ | dadāni vasu kiṃcitte prārthitaṃ tadvadasva me
मैं राजा हूँ और आप छह कर्मों में लगे हुए ब्राह्मण हैं। मैं आपको कुछ धन दूँगा; जो आपको अभीष्ट हो, वह मुझे बताइए।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 45 (12.197.45)
द्विविधो ब्राह्मणो राजन्धर्मश्च द्विविधः स्मृतः । प्रवृत्तश्च निवृत्तश्च निवृत्तोऽस्मि प्रतिग्रहात् ॥
dvividho brāhmaṇo rājandharmaśca dvividhaḥ smṛtaḥ | pravṛttaśca nivṛttaśca nivṛtto'smi pratigrahāt
हे राजन्, ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं और धर्म भी दो प्रकार का कहा गया है: प्रवृत्ति और निवृत्ति। मैं दान लेने से निवृत्त हूँ।
श्लोक 46 (12.197.46)
तेभ्यः प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप । अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददामि ते । ब्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधयामि किम् ॥
tebhyaḥ prayaccha dānāni ye pravṛttā narādhipa | ahaṃ na pratigṛhṇāmi kimiṣṭaṃ kiṃ dadāmi te | brūhi tvaṃ nṛpatiśreṣṭha tapasā sādhayāmi kim
हे नरेश, जो प्रवृत्ति-मार्ग में हैं, उन्हें दान दीजिए। मैं कुछ भी नहीं लेता। आपकी क्या इच्छा है और मैं आपको क्या दूँ? हे नृपश्रेष्ठ, बताइए कि अपनी तपस्या से मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?
राजोवाच
श्लोक 47 (12.197.47)
क्षत्रियोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् । प्रयच्छ युद्धमित्येवंवादी चास्मि द्विजोत्तम ॥
kṣatriyo'haṃ na jānāmi dehīti vacanaṃ kvacit | prayaccha yuddhamityevaṃvādī cāsmi dvijottama
मैं क्षत्रिय हूँ; मैं कहीं भी “दीजिए” यह वचन नहीं जानता। हे द्विजश्रेष्ठ, मैं तो “युद्ध दो” ऐसा कहने वाला हूँ।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 48 (12.197.48)
तुष्यसि त्वं स्वधर्मेण तथा तुष्टा वयं नृप । अन्योन्यस्योत्तरं नास्ति यदिष्टं तत्समाचर ॥
tuṣyasi tvaṃ svadharmeṇa tathā tuṣṭā vayaṃ nṛpa | anyonyasyottaraṃ nāsti yadiṣṭaṃ tatsamācara
हे राजन्, आप अपने धर्म से सन्तुष्ट हैं और हम भी सन्तुष्ट हैं। हम दोनों के पास एक-दूसरे के लिए कोई उत्तर नहीं है; जो आपको अभीष्ट हो, वही कीजिए।
राजोवाच
श्लोक 49 (12.197.49)
स्वशक्त्याऽहं ददानीति त्वया पूर्वमुदाहृतम् । याचे त्वां दीयतां मह्यं जप्यस्यास्य फलं द्विज ॥
svaśaktyā'haṃ dadānīti tvayā pūrvamudāhṛtam | yāce tvāṃ dīyatāṃ mahyaṃ japyasyāsya phalaṃ dvija
आपने पहले कहा था, “मैं अपनी शक्ति के अनुसार दूँगा।” हे ब्राह्मण, मैं आपसे माँगता हूँ: अपने इस जप का फल मुझे दे दीजिए।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 50 (12.197.50)
युद्धं मम सदा वाणी याचतीति विकत्थसे । न च युद्धं मया सार्धं किमर्थं याचसे पुनः ॥
yuddhaṃ mama sadā vāṇī yācatīti vikatthase | na ca yuddhaṃ mayā sārdhaṃ kimarthaṃ yācase punaḥ
आप बड़ाई करते हैं कि “मेरी वाणी सदा युद्ध ही माँगती है।” पर मेरे साथ आपका कोई युद्ध नहीं है; फिर आप दोबारा क्यों माँगते हैं?
राजोवाच
श्लोक 51 (12.197.51)
वाग्वज्रा ब्राह्मणाः प्रोक्ताः क्षत्रिया बाहुजीविनः । वाग्युद्धं तदिदं तीव्रं मम विप्र त्वया सह ॥
vāgvajrā brāhmaṇāḥ proktāḥ kṣatriyā bāhujīvinaḥ | vāgyuddhaṃ tadidaṃ tīvraṃ mama vipra tvayā saha
कहा गया है कि ब्राह्मणों का वज्र उनकी वाणी है और क्षत्रिय अपनी भुजाओं से जीते हैं। हे विप्र, आपके और मेरे बीच यह तीव्र वाग्युद्ध ही है।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 52 (12.197.52)
सेयमद्य प्रतिज्ञा मे स्वशक्त्या किं प्रदीयताम् । ब्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति माचिरम् ॥
seyamadya pratijñā me svaśaktyā kiṃ pradīyatām | brūhi dāsyāmi rājendra vibhave sati māciram
आज भी वही मेरी प्रतिज्ञा है: अपनी शक्ति के अनुसार क्या दिया जाए? हे राजेन्द्र, बताइए; सामर्थ्य होने पर मैं बिना देर किए दे दूँगा।
राजोवाच
श्लोक 53 (12.197.53)
यत्तद्वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वया । फलं प्राप्तं तत्प्रयच्छ मम दित्सुर्भवान्यदि ॥
yattadvarṣaśataṃ pūrṇaṃ japyaṃ vai japatā tvayā | phalaṃ prāptaṃ tatprayaccha mama ditsurbhavānyadi
आपने पूरे सौ वर्ष जप करके जो फल पाया है, वह मुझे दे दीजिए, यदि आप देना चाहते हैं।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 54 (12.197.54)
परमं गृह्यतां तस्य फलं यज्जपितं मया । अर्धं त्वमविचारेण फलं तस्य ह्यवाप्नुहि ॥
paramaṃ gṛhyatāṃ tasya phalaṃ yajjapitaṃ mayā | ardhaṃ tvamavicāreṇa phalaṃ tasya hyavāpnuhi
मेरे जप का जो उत्तम फल है, उसे ले लीजिए; बिना विचारे उस फल का आधा आप पा लीजिए।
श्लोक 55 (12.197.55)
अथवा सर्वमेवेह मामकं जापकं फलम् । राजन्प्राप्नुहि कामं त्वं यदि सर्वमिहेच्छसि ॥
athavā sarvameveha māmakaṃ jāpakaṃ phalam | rājanprāpnuhi kāmaṃ tvaṃ yadi sarvamihecchasi
अथवा हे राजन्, यदि आप यहाँ सब कुछ चाहते हैं, तो मेरे जप का सारा फल अपनी इच्छा से ले लीजिए।
राजोवाच
श्लोक 56 (12.197.56)
कृतं सर्वेण भद्रं ते जप्यं यद्याचितं मया । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि किंच तस्य फलं वद ॥
kṛtaṃ sarveṇa bhadraṃ te japyaṃ yadyācitaṃ mayā | svasti te'stu gamiṣyāmi kiṃca tasya phalaṃ vada
“सब कुछ” की आवश्यकता नहीं; आपका कल्याण हो, मैंने तो केवल जप माँगा था। अब मैं चला जाऊँगा; पर बताइए, उसका फल क्या है?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 57 (12.197.57)
फलप्राप्तिं न जानामि दत्तं यज्जपितं मया । अयं धर्मश्च कालश्च यमो मृत्युश्च साक्षिणः ॥
phalaprāptiṃ na jānāmi dattaṃ yajjapitaṃ mayā | ayaṃ dharmaśca kālaśca yamo mṛtyuśca sākṣiṇaḥ
मैंने जो जप किया, उसका फल क्या है, यह मैं नहीं जानता, क्योंकि उसे मैं दे चुका हूँ। ये धर्म, काल, यम और मृत्यु साक्षी हैं।
राजोवाच
श्लोक 58 (12.197.58)
अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं किं मे करिष्यति । फलं ब्रवीषि धर्मस्य न चेज्जप्यकृतस्य माम् । प्राप्नोतु तत्फलं विप्रो नाहमिच्छे ससंशयम् ॥
ajñātamasya dharmasya phalaṃ kiṃ me kariṣyati | phalaṃ bravīṣi dharmasya na cejjapyakṛtasya mām | prāpnotu tatphalaṃ vipro nāhamicche sasaṃśayam
जिस धर्म का फल मैं जानता ही नहीं, वह मेरा क्या करेगा? आप मुझे धर्म का फल बताते हैं, पर जप से उत्पन्न फल नहीं बताते। वह फल ब्राह्मण ही रखें; मैं संशय वाली वस्तु नहीं चाहता।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 59 (12.197.59)
नाददेऽपरदत्तं वै दत्तं वा चाफलं मया । वाक्यं प्रमाणं राजर्षे ममाद्य तव चैव हि ॥
nādade'paradattaṃ vai dattaṃ vā cāphalaṃ mayā | vākyaṃ pramāṇaṃ rājarṣe mamādya tava caiva hi
हे राजर्षि, दूसरे को दिया हुआ मैं वापस नहीं लेता, और अपने दिए हुए दान को निष्फल भी नहीं करता। आज मेरे और आपके लिए वचन ही प्रमाण है।
श्लोक 60 (12.197.60)
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदेव ददानीति त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥
sakṛdaṃśo nipatati sakṛtkanyā pradīyate | sakṛdeva dadānīti trīṇyetāni sakṛtsakṛt
बँटवारे का भाग एक ही बार गिरता है, कन्या एक ही बार दी जाती है, और “मैं देता हूँ” यह भी एक ही बार कहा जाता है; ये तीनों बातें एक ही बार होती हैं, बस एक ही बार।
श्लोक 61 (12.197.61)
नाभिसंधिर्मया जप्ये कृतपूर्वः कदाचन । जप्यस्य राजशार्दूल कथं वेत्स्याम्यहं फलम् ॥
nābhisaṃdhirmayā japye kṛtapūrvaḥ kadācana | japyasya rājaśārdūla kathaṃ vetsyāmyahaṃ phalam
मैंने अपने जप में कभी फल की कामना नहीं की। हे राजाओं में व्याघ्र, मैं उसका फल कैसे जान सकता हूँ?
श्लोक 62 (12.197.62)
ददस्वेति त्वया चोक्तं दत्तं वाचा फलं मया । न वाचं दूषयिष्यामि सत्यं रक्ष स्थिरो भव ॥
dadasveti tvayā coktaṃ dattaṃ vācā phalaṃ mayā | na vācaṃ dūṣayiṣyāmi satyaṃ rakṣa sthiro bhava
आपने कहा, “दीजिए,” और मैंने वाणी से फल दे दिया। मैं अपनी वाणी को दूषित नहीं करूँगा; आप सत्य की रक्षा कीजिए और स्थिर रहिए।
श्लोक 63 (12.197.63)
अथैवं वदतो मेऽद्य वचनं न करिष्यसि । महानधर्मो भविता तव राजन्मृषा कृतः ॥
athaivaṃ vadato me'dya vacanaṃ na kariṣyasi | mahānadharmo bhavitā tava rājanmṛṣā kṛtaḥ
यदि आज मेरे ऐसा कहने पर भी आप मेरी बात नहीं मानेंगे, तो हे राजन्, उसे झूठा करने के कारण आपको बड़ा अधर्म लगेगा।
श्लोक 64 (12.197.64)
न युक्ता तु मृषावाणी त्वया वक्तुमरिंदम । तथा मयाऽप्यभिहितं मिथ्या कर्तुं न शक्यते ॥
na yuktā tu mṛṣāvāṇī tvayā vaktumariṃdama | tathā mayā'pyabhihitaṃ mithyā kartuṃ na śakyate
हे शत्रुदमन, आपके लिए झूठी बात कहना उचित नहीं है; और मैंने जो कहा है, उसे मैं भी मिथ्या नहीं कर सकता।
श्लोक 65 (12.197.65)
संश्रुतं च मया पूर्वं ददानीत्यविचारितम् । तद्गृह्णीष्वाविचारेण यदि सत्ये स्थितो भवान् ॥
saṃśrutaṃ ca mayā pūrvaṃ dadānītyavicāritam | tadgṛhṇīṣvāvicāreṇa yadi satye sthito bhavān
मैंने पहले बिना सोचे-विचारे वचन दे दिया था कि “मैं दूँगा।” यदि आप सत्य पर स्थित हैं, तो बिना हिचक उसे ले लीजिए।
श्लोक 66 (12.197.66)
इहागम्य हि मां राजञ्जाप्यं फलमयाचथाः । तन्मे निसृष्टं गृह्णीष्व भव सत्ये स्थितोऽपि च ॥
ihāgamya hi māṃ rājañjāpyaṃ phalamayācathāḥ | tanme nisṛṣṭaṃ gṛhṇīṣva bhava satye sthito'pi ca
हे राजन्, आप यहाँ आए और आपने मुझसे जप का फल माँगा। वह मेरे द्वारा दे दिया गया है; उसे ले लीजिए और सत्य में भी स्थिर रहिए।
श्लोक 67 (12.197.67)
नायं लोकोऽस्ति न परो न च पूर्वान्स तारयेत् । कुत एवापरान्राजन्मृषावादपरायणः ॥
nāyaṃ loko'sti na paro na ca pūrvānsa tārayet | kuta evāparānrājanmṛṣāvādaparāyaṇaḥ
जो असत्य में लगा रहता है, उसके लिए न यह लोक है, न परलोक; वह अपने पूर्वजों को भी नहीं तार सकता, फिर हे राजन्, आगे आने वालों को कैसे तारेगा?
श्लोक 68 (12.197.68)
न यज्ञाध्ययने दानं नियमास्तारयन्ति हि । यथा सत्यं परे लोके तथेह पुरुषर्षभ ॥
na yajñādhyayane dānaṃ niyamāstārayanti hi | yathā satyaṃ pare loke tatheha puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, यज्ञ, अध्ययन, दान और नियम भी मनुष्य को वैसा नहीं तारते जैसा परलोक में सत्य तारता है; और यहाँ भी वैसा ही है।
श्लोक 69 (12.197.69)
तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यन्ति च यत्तपः । समाशतैः सहस्रैश्च तत्सत्यान्न विशिष्यते ॥
tapāṃsi yāni cīrṇāni cariṣyanti ca yattapaḥ | samāśataiḥ sahasraiśca tatsatyānna viśiṣyate
जो तप किए जा चुके हैं और जो आगे किए जाएँगे, सैकड़ों-हज़ारों वर्षों के भी, उनमें से कोई सत्य से बढ़कर नहीं है।
श्लोक 70 (12.197.70)
सत्यमेकं परं ब्रह्म सत्यमेकं परं तपः । सत्यमेकं परो यज्ञः सत्यमेकं परं श्रुतम् ॥
satyamekaṃ paraṃ brahma satyamekaṃ paraṃ tapaḥ | satyamekaṃ paro yajñaḥ satyamekaṃ paraṃ śrutam
एकमात्र सत्य ही परम ब्रह्म है, एकमात्र सत्य ही परम तप है; एकमात्र सत्य ही परम यज्ञ है, एकमात्र सत्य ही परम श्रुत है।
श्लोक 71 (12.197.71)
सत्यं वेदेषु जागर्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् । तपो धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
satyaṃ vedeṣu jāgarti phalaṃ satye paraṃ smṛtam | tapo dharmo damaścaiva sarvaṃ satye pratiṣṭhitam
वेदों में सत्य ही जाग्रत रहता है और परम फल सत्य में ही बताया गया है। तप, धर्म और दम, सब कुछ सत्य में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 72 (12.197.72)
सत्यं वेदास्तथाङ्गानि सत्यं यज्ञास्तथा विधिः । व्रतचर्या तथा सत्यमोंकारः सत्यमेव च ॥
satyaṃ vedāstathāṅgāni satyaṃ yajñāstathā vidhiḥ | vratacaryā tathā satyamoṃkāraḥ satyameva ca
वेद और उनके अंग सत्य हैं; यज्ञ और विधि सत्य हैं; व्रत का आचरण सत्य है और ओंकार भी सत्य ही है।
श्लोक 73 (12.197.73)
प्राणिनां जननं सत्यं सत्यं सन्ततिरेव च । सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ॥
prāṇināṃ jananaṃ satyaṃ satyaṃ santatireva ca | satyena vāyurabhyeti satyena tapate raviḥ
प्राणियों की उत्पत्ति सत्य है और उनकी सन्तति भी सत्य है। सत्य से वायु बहती है और सत्य से सूर्य तपता है।
श्लोक 74 (12.197.74)
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्यं यज्ञस्तपो वेदाः स्तोभा मन्त्राः सरस्वती ॥
satyena cāgnirdahati svargaḥ satye pratiṣṭhitaḥ | satyaṃ yajñastapo vedāḥ stobhā mantrāḥ sarasvatī
सत्य से अग्नि जलाती है और स्वर्ग सत्य में प्रतिष्ठित है। सत्य ही यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती है।
श्लोक 75 (12.197.75)
तुलामारोपितो धर्मः सत्यं चैवेति नः श्रुतम् । समां कक्षां धारयतो यः सत्यं ततोऽधिकम् ॥
tulāmāropito dharmaḥ satyaṃ caiveti naḥ śrutam | samāṃ kakṣāṃ dhārayato yaḥ satyaṃ tato'dhikam
हमने सुना है कि धर्म और सत्य को एक बार तराज़ू पर चढ़ाया गया था; पलड़े को बराबर थामने पर जिस ओर सत्य था, वही अधिक भारी निकला।
श्लोक 76 (12.197.76)
यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते । किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ॥
yato dharmastataḥ satyaṃ sarvaṃ satyena vardhate | kimarthamanṛtaṃ karma kartuṃ rājaṃstvamicchasi
जहाँ धर्म है, वहाँ सत्य है; सब कुछ सत्य से बढ़ता है। हे राजन्, आप झूठा कर्म क्यों करना चाहते हैं?
श्लोक 77 (12.197.77)
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः । कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ॥
satye kuru sthiraṃ bhāvaṃ mā rājannanṛtaṃ kṛthāḥ | kasmāttvamanṛtaṃ vākyaṃ dehīti kuruṣe'śubham
हे राजन्, सत्य में अपना भाव स्थिर कीजिए; असत्य मत कीजिए। “दीजिए” कहकर आप झूठी बात का अशुभ कर्म क्यों करते हैं?
श्लोक 78 (12.197.78)
यदि जप्यफलं दत्तं मया नेच्छसि वै नृप । स्वधर्मेभ्यः परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ॥
yadi japyaphalaṃ dattaṃ mayā necchasi vai nṛpa | svadharmebhyaḥ paribhraṣṭo lokānanucariṣyasi
हे राजन्, यदि आप मेरे दिए हुए जप-फल को नहीं लेंगे, तो अपने धर्मों से गिरकर आप दूसरे लोकों में भटकते फिरेंगे।
श्लोक 79 (12.197.79)
संश्रुत्य यो न दित्सेत याचित्वा यश्च नेच्छति । उभावानृतिकावेतौ न मृषा कर्तुमर्हसि ॥
saṃśrutya yo na ditseta yācitvā yaśca necchati | ubhāvānṛtikāvetau na mṛṣā kartumarhasi
जो वचन देकर देना नहीं चाहता और जो माँगकर लेना नहीं चाहता, ये दोनों असत्यवादी हैं। आपको इसे झूठा नहीं करना चाहिए।
राजोवाच
श्लोक 80 (12.197.80)
योद्धव्यं रक्षितव्यं च क्षत्रधर्मः किल द्विज । दातारः क्षत्रियाः प्रोक्ता गृह्णीयां भवतः कथम् ॥
yoddhavyaṃ rakṣitavyaṃ ca kṣatradharmaḥ kila dvija | dātāraḥ kṣatriyāḥ proktā gṛhṇīyāṃ bhavataḥ katham
हे द्विज, क्षत्रिय का धर्म लड़ना और रक्षा करना है। क्षत्रिय दाता कहे गए हैं; फिर मैं आपसे कैसे लूँ?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 81 (12.197.81)
न च्छन्दयामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम् । इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुनः कथम् ॥
na cchandayāmi te rājannāpi te gṛhamāvrajam | ihāgamya tu yācitvā na gṛhṇīṣe punaḥ katham
हे राजन्, मैंने न आपको प्रेरित किया, न आपके घर गया। आप यहाँ आकर माँग चुके हैं; अब आप उसे क्यों नहीं लेते?
धर्म उवाच
श्लोक 82 (12.197.82)
अविवादोऽस्तु युवयोर्वित्तं मां धर्ममागतम् । द्विजो दानफलैर्युक्तो राजा सत्यफलेन च ॥
avivādo'stu yuvayorvittaṃ māṃ dharmamāgatam | dvijo dānaphalairyukto rājā satyaphalena ca
तुम दोनों के बीच कोई विवाद न रहे। मुझे, धर्म को, यहाँ आया हुआ जानो: ब्राह्मण को दान का फल मिलेगा और राजा को सत्य का फल।
स्वर्ग उवाच
श्लोक 83 (12.197.83)
स्वर्गं मां विद्धि राजेन्द्र रूपिणं स्वयमागतम् । अविवादोऽस्तु युवयोरुभौ तुल्यफलौ युवाम् ॥
svargaṃ māṃ viddhi rājendra rūpiṇaṃ svayamāgatam | avivādo'stu yuvayorubhau tulyaphalau yuvām
हे राजेन्द्र, मुझे स्वर्ग जानो, जो रूप धारण करके स्वयं आया है। तुम दोनों के बीच विवाद न रहे; तुम दोनों समान फल वाले हो।
राजोवाच
श्लोक 84 (12.197.84)
कृतं स्वर्गेण मे कार्यं गच्छ स्वर्ग यथागतम् । विप्रो यदीच्छते दातुं चीर्णं गृह्णातु मे फलम् ॥
kṛtaṃ svargeṇa me kāryaṃ gaccha svarga yathāgatam | vipro yadīcchate dātuṃ cīrṇaṃ gṛhṇātu me phalam
स्वर्ग से मेरा कोई प्रयोजन नहीं; हे स्वर्ग, जैसे आए थे वैसे ही लौट जाओ। यदि ब्राह्मण देना चाहते हैं, तो मेरे अर्जित पुण्य का फल ही ले लें।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 85 (12.197.85)
बाल्ये यदि स्यादज्ञानान्मया हस्तः प्रसारितः । निवृत्तलक्षणं धर्ममुपासे संहितां जपन् ॥
bālye yadi syādajñānānmayā hastaḥ prasāritaḥ | nivṛttalakṣaṇaṃ dharmamupāse saṃhitāṃ japan
यदि बचपन में अज्ञानवश मैंने हाथ फैलाया भी हो, तो अब मैं संहिता का जप करता हुआ निवृत्ति के लक्षणों वाले धर्म का पालन करता हूँ।
श्लोक 86 (12.197.86)
निवृत्तं मां चिराद्राजन्विप्रलोभयसे कथम् । स्वेन कार्यं करिष्यामि त्वत्तो नेच्छे फलं नृप । तपःस्वाध्यायशीलोऽहं निवृत्तश्च प्रतिग्रहात् ॥
nivṛttaṃ māṃ cirādrājanvipralobhayase katham | svena kāryaṃ kariṣyāmi tvatto necche phalaṃ nṛpa | tapaḥsvādhyāyaśīlo'haṃ nivṛttaśca pratigrahāt
हे राजन्, जो मैं इतने समय से निवृत्त हूँ, उस विप्र को आप क्यों लुभाते हैं? मैं अपना कार्य स्वयं करूँगा; मुझे आपसे कोई फल नहीं चाहिए। मैं तप और स्वाध्याय में लगा हूँ और दान लेने से निवृत्त हूँ।
राजोवाच
श्लोक 87 (12.197.87)
यदि विप्र विसृष्टं ते जप्यस्य फलमुत्तमम् । आवयोर्यत्फलं किंचित्सहितं नौ तदस्त्विह ॥
yadi vipra visṛṣṭaṃ te japyasya phalamuttamam | āvayoryatphalaṃ kiṃcitsahitaṃ nau tadastviha
हे विप्र, यदि आपने अपने जप का उत्तम फल छोड़ दिया है, तो हम दोनों का जो भी फल है, वह यहाँ हम दोनों का साझा हो।
श्लोक 88 (12.197.88)
द्विजाः प्रतिग्रहे युक्ता दातारो राजवंशजाः । यदि धर्मः श्रुतो विप्र सहैव फलमस्तु नौ ॥
dvijāḥ pratigrahe yuktā dātāro rājavaṃśajāḥ | yadi dharmaḥ śruto vipra sahaiva phalamastu nau
ब्राह्मण दान लेने में लगे रहते हैं और राजवंश में जन्मे लोग दाता होते हैं। हे विप्र, यदि यही धर्म सुना गया है, तो फल हम दोनों का साथ-साथ हो।
श्लोक 89 (12.197.89)
मा वा भूत्सह भोज्यं नौ मदीयं फलमाप्नुहि । प्रतीच्छ मत्कृतं धर्मं यदि ते मय्यनुग्रहः ॥
mā vā bhūtsaha bhojyaṃ nau madīyaṃ phalamāpnuhi | pratīccha matkṛtaṃ dharmaṃ yadi te mayyanugrahaḥ
अथवा यदि हम दोनों का भोग साझा न हो सके, तो मेरा फल आप ही ले लीजिए। यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो मेरे किए हुए धर्म को स्वीकार कीजिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 90 (12.197.90)
ततो विकृतवेषौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ । गृहीत्वाऽन्योन्यमावेष्ठ्य कुचेलावूचतुर्वचः ॥
tato vikṛtaveṣau dvau puruṣau samupasthitau | gṛhītvā'nyonyamāveṣṭhya kucelāvūcaturvacaḥ
तब विचित्र वेश वाले दो पुरुष वहाँ आए, जो एक-दूसरे को पकड़कर लिपटे हुए थे और फटे-पुराने कपड़े पहने थे; उन्होंने यह कहा।
श्लोक 91 (12.197.91)
न मे धारयसीत्येको धारयामीति चापरः । इहास्ति नौ विवादोऽयमयं राजाऽनुशासकः ॥
na me dhārayasītyeko dhārayāmīti cāparaḥ | ihāsti nau vivādo'yamayaṃ rājā'nuśāsakaḥ
एक ने कहा, “तुम मुझे कुछ नहीं देते,” और दूसरे ने कहा, “मैं तो तुम्हारा देनदार हूँ।” “यहाँ हमारा यह विवाद है और राजा हमारा निर्णायक है।”
श्लोक 92 (12.197.92)
सत्यं ब्रवीम्यहमिदं न मे धारयते भवान् । अनृतं वदसीह त्वमृणं ते धारयाम्यहम् ॥
satyaṃ bravīmyahamidaṃ na me dhārayate bhavān | anṛtaṃ vadasīha tvamṛṇaṃ te dhārayāmyaham
“मैं सत्य कहता हूँ: तुम मुझे कुछ नहीं देते।” “तुम झूठ बोलते हो; मैं तुम्हारा ऋणी हूँ।”
श्लोक 93 (12.197.93)
तावुभौ सुभृशं तप्तौ राजानमिदमूचतुः । परीक्ष्यौ तु यथा स्याव नावामिह विगर्हितौ ॥
tāvubhau subhṛśaṃ taptau rājānamidamūcatuḥ | parīkṣyau tu yathā syāva nāvāmiha vigarhitau
दोनों अत्यन्त व्यथित होकर राजा से यह बोले, “हमारी परीक्षा कीजिए, ताकि यहाँ हम दोनों में से किसी की निन्दा न हो।”
विरूप उवाच
श्लोक 94 (12.197.94)
धारयामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम् । ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते ॥
dhārayāmi naravyāghra vikṛtasyeha goḥ phalam | dadataśca na gṛhṇāti vikṛto me mahīpate
हे नरव्याघ्र, मैं यहाँ विकृत को एक गाय का फल देने का ऋणी हूँ; और देने पर भी, हे पृथ्वीपति, विकृत उसे नहीं लेता।
विकृत उवाच
श्लोक 95 (12.197.95)
न मे धारयते किंचिद्विरूपोऽयं नराधिप । मिथ्या ब्रवीत्ययं हि त्वां सत्याभासं नराधिप ॥
na me dhārayate kiṃcidvirūpo'yaṃ narādhipa | mithyā bravītyayaṃ hi tvāṃ satyābhāsaṃ narādhipa
हे नरेश, यह विरूप मुझे कुछ नहीं देता; यह आपसे झूठ बोल रहा है और सत्य का आभास दिखा रहा है।
राजोवाच
श्लोक 96 (12.197.96)
विरूप किं धारयते भवानस्य ब्रवीतु मे । श्रुत्वा तथा करिष्येऽहमिति मे धीयते मनः ॥
virūpa kiṃ dhārayate bhavānasya bravītu me | śrutvā tathā kariṣye'hamiti me dhīyate manaḥ
विरूप, तुम इसके कितने देनदार हो? मुझे बताओ। सुनकर मैं वैसा ही करूँगा; मेरा मन यही निश्चय कर रहा है।
विरूप उवाच
श्लोक 97 (12.197.97)
शृणुष्वावहितो राजन्यथैतद्धारयाम्यहम् । विकृतस्यास्य राजर्षे निखिलेन नराधिप ॥
śṛṇuṣvāvahito rājanyathaitaddhārayāmyaham | vikṛtasyāsya rājarṣe nikhilena narādhipa
हे राजन्, ध्यान से सुनिए कि मैं इस विकृत का यह ऋण कैसे धारण करता हूँ, हे राजर्षि, हे नरेश, पूरे विस्तार से।
श्लोक 98 (12.197.98)
अनेन धर्मप्राप्त्यर्थं शुभा दत्ता पुराऽनघ । धेनुर्विप्राय राजर्षे तपःस्वाध्यायशीलिने ॥
anena dharmaprāptyarthaṃ śubhā dattā purā'nagha | dhenurviprāya rājarṣe tapaḥsvādhyāyaśīline
हे निष्पाप राजर्षि, पहले इसने धर्म की प्राप्ति के लिए तप और स्वाध्याय में लगे एक ब्राह्मण को एक उत्तम गाय दान में दी थी।
श्लोक 99 (12.197.99)
तस्याश्चायं मया राजन्फलमभ्येत्य याचितः । विकृतेन च मे दत्तं विशुद्धेनान्तरात्मना ॥
tasyāścāyaṃ mayā rājanphalamabhyetya yācitaḥ | vikṛtena ca me dattaṃ viśuddhenāntarātmanā
हे राजन्, उस गाय के फल को मैंने आकर इससे माँगा; और विकृत ने शुद्ध अन्तःकरण से वह मुझे दे दिया।
श्लोक 100 (12.197.100)
ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धये । गावौ च कपिले क्रीत्वा वत्सले बहुदोहने ॥
tato me sukṛtaṃ karma kṛtamātmaviśuddhaye | gāvau ca kapile krītvā vatsale bahudohane
तब मैंने अपनी आत्मशुद्धि के लिए एक पुण्य कर्म किया: मैंने दो कपिला गायें खरीदीं, जो बछड़ों से स्नेह रखने वाली और बहुत दूध देने वाली थीं।
श्लोक 101 (12.197.101)
ते चोञ्छवृत्तये राजन्मया समुपवर्जिते । यथाविधि यथाश्रद्धं तदस्याहं पुनः प्रभो ॥
te coñchavṛttaye rājanmayā samupavarjite | yathāvidhi yathāśraddhaṃ tadasyāhaṃ punaḥ prabho
हे राजन्, उन दोनों को मैंने विधि के अनुसार और श्रद्धा के साथ उञ्छवृत्ति से जीने वाले एक व्यक्ति को दे दिया। और अब, हे प्रभु, वही मैं इसे लौटाना चाहता हूँ।
श्लोक 102 (12.197.102)
इहाद्यैव प्रयच्छामि गृहीत्वा द्विगुणं फलम् । एवं स्यात्पुरुषव्याघ्र कःशुद्धः कोऽत्र दोषवान् ॥
ihādyaiva prayacchāmi gṛhītvā dviguṇaṃ phalam | evaṃ syātpuruṣavyāghra kaḥśuddhaḥ ko'tra doṣavān
मैं आज यहीं उसे वह फल दुगुना करके दे रहा हूँ। तो हे पुरुषव्याघ्र, इस विषय में कौन शुद्ध है और कौन दोषी?
श्लोक 103 (12.197.103)
एवं विवदमानौ स्वस्त्वामिहाभ्यागतौ नृप । कुरु धर्ममधर्मं वा विनये नौ समादध ॥
evaṃ vivadamānau svastvāmihābhyāgatau nṛpa | kuru dharmamadharmaṃ vā vinaye nau samādadha
इस प्रकार झगड़ते हुए हम दोनों, हे राजन्, आपके पास आए हैं। धर्म या अधर्म का निर्णय कीजिए और हम दोनों को उचित मार्ग पर लगाइए।
श्लोक 104 (12.197.104)
यदि नेच्छति मे दानं यथा दत्तमनेन वै । भवानत्र स्थिरो भूत्वा मार्गे स्थापयिताऽद्य नौ ॥
yadi necchati me dānaṃ yathā dattamanena vai | bhavānatra sthiro bhūtvā mārge sthāpayitā'dya nau
यदि यह मेरा दान नहीं लेना चाहता, जैसा इसने स्वयं दिया था, तो आप यहाँ स्थिर रहकर आज हम दोनों को सही मार्ग पर स्थापित कीजिए।
राजोवाच
श्लोक 105 (12.197.105)
दीयमानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात्त्वमद्य वै । यथैव तेऽभ्यनुज्ञातं यथा गृह्णीष्व माचिरम् ॥
dīyamānaṃ na gṛhṇāsi ṛṇaṃ kasmāttvamadya vai | yathaiva te'bhyanujñātaṃ yathā gṛhṇīṣva māciram
तुम इस दिए जाते हुए ऋण को आज क्यों नहीं ले रहे? जैसी तुम्हें अनुमति मिली है, वैसे ही इसे बिना देर किए ले लो।
विकृत उवाच
श्लोक 106 (12.197.106)
दीयतामित्यनेनोक्तं ददानीति तथा मया । नायं मे धारयत्यत्र गच्छतां यत्र वाञ्छति ॥
dīyatāmityanenoktaṃ dadānīti tathā mayā | nāyaṃ me dhārayatyatra gacchatāṃ yatra vāñchati
इसने कहा था, “दिया जाए,” और मैंने कहा था, “मैं देता हूँ।” पर यह यहाँ मुझे कुछ नहीं देता; यह जहाँ चाहे, चला जाए।
राजोवाच
श्लोक 107 (12.197.107)
ददतोऽस्य न गृह्णासि विषमं प्रतिभाति मे । दण्ड्यो हि त्वं मम मतो नास्त्यत्र खलु संशयः ॥
dadato'sya na gṛhṇāsi viṣamaṃ pratibhāti me | daṇḍyo hi tvaṃ mama mato nāstyatra khalu saṃśayaḥ
दिए जाते हुए को तुम नहीं लेते, और यह मुझे अनुचित लगता है। मेरी दृष्टि में तुम दण्ड के योग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं।
विकृत उवाच
श्लोक 108 (12.197.108)
मयाऽस्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत्कथं पुनः । को ममात्रापराधो मे दण्डमाज्ञापय प्रभो ॥
mayā'sya dattaṃ rājarṣe gṛhṇīyāṃ tatkathaṃ punaḥ | ko mamātrāparādho me daṇḍamājñāpaya prabho
हे राजर्षि, जो मैंने इसे दे दिया, उसे मैं फिर कैसे ले सकता हूँ? इसमें मेरा क्या अपराध है? हे प्रभु, यदि दण्ड है तो आज्ञा कीजिए।
विरूप उवाच
श्लोक 109 (12.197.109)
दीयमानं यदि मया न गृह्णासि कथंचन । नियच्छति त्वां नृपतिरयं धर्मानुशासकः ॥
dīyamānaṃ yadi mayā na gṛhṇāsi kathaṃcana | niyacchati tvāṃ nṛpatirayaṃ dharmānuśāsakaḥ
यदि मेरे देने पर भी तुम किसी प्रकार नहीं लोगे, तो धर्म का निर्णय करने वाले ये राजा तुम्हें नियन्त्रित करेंगे।
विकृत उवाच
श्लोक 110 (12.197.110)
स्वयं मया याचितेन दत्तं कथमिहाद्य तत् । गृह्णीयां गच्छतु भवानभ्यनुज्ञां ददानि ते ॥
svayaṃ mayā yācitena dattaṃ kathamihādya tat | gṛhṇīyāṃ gacchatu bhavānabhyanujñāṃ dadāni te
इसके स्वयं माँगने पर मैंने दिया था; अब मैं उसे यहाँ कैसे ले लूँ? आप जाइए, मैं आपको अनुमति देता हूँ।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 111 (12.197.111)
श्रुतमेतत्त्वया राजन्ननयोः कथितं द्वयोः । प्रतिज्ञातं मया यत्ते तद्गृहाणाविचारितम् ॥
śrutametattvayā rājannanayoḥ kathitaṃ dvayoḥ | pratijñātaṃ mayā yatte tadgṛhāṇāvicāritam
हे राजन्, इन दोनों ने जो कहा, वह आपने सुन लिया। जो मैंने आपसे प्रतिज्ञा की थी, उसे बिना विचारे ले लीजिए।
राजोवाच
श्लोक 112 (12.197.112)
प्रस्तुतं सुमहत्कार्यमनयोर्गह्वरं यथा । जापकस्य दृढीकारः कथमेतद्भविष्यति ॥
prastutaṃ sumahatkāryamanayorgahvaraṃ yathā | jāpakasya dṛḍhīkāraḥ kathametadbhaviṣyati
इन दोनों को लेकर एक बहुत भारी और गहन मामला खड़ा हो गया है, जैसे घना जंगल। जापक का संकल्प कैसे दृढ़ किया जाएगा?
श्लोक 113 (12.197.113)
यदि तावन्न गृह्णामि जापकेनापवर्जितम् । कथं न लिप्येयमहं पापेन महताऽद्य वै ॥
yadi tāvanna gṛhṇāmi jāpakenāpavarjitam | kathaṃ na lipyeyamahaṃ pāpena mahatā'dya vai
यदि मैं जापक के छोड़े हुए को स्वीकार नहीं करता, तो आज बड़े पाप से कैसे नहीं लिप्त होऊँगा?
भीष्म उवाच
श्लोक 114 (12.197.114)
तौ चोवाच स राजर्षिः कृतकार्यौ गमिष्यथः । नेदानीं मामिहासाद्य राजधर्मो भवेन्मृषा ॥
tau covāca sa rājarṣiḥ kṛtakāryau gamiṣyathaḥ | nedānīṃ māmihāsādya rājadharmo bhavenmṛṣā
और उस राजर्षि ने उन दोनों से कहा, “आपका कार्य पूरा हो गया, आप जाइए। अब, मेरे पास आ जाने पर, राजधर्म मिथ्या नहीं होना चाहिए।”
राजोवाच
श्लोक 115 (12.197.115)
स्वधर्मः परिपाल्यस्तु राज्ञामिति विनिश्चयः । विप्रधर्मश्च गहनो मामनात्मानमाविशत् ॥
svadharmaḥ paripālyastu rājñāmiti viniścayaḥ | vipradharmaśca gahano māmanātmānamāviśat
यह निश्चय है कि राजाओं को अपने धर्म का पालन करना चाहिए; और ब्राह्मण का गहन धर्म मुझ पर छा गया है, जो अभी अपने को वश में नहीं कर पाया हूँ।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 116 (12.197.116)
गृहाण धारयेऽहं च याचितं संश्रुतं मया । न चेद्ग्रहीष्यसे राजञ्शपिष्ये त्वां न संशयः ॥
gṛhāṇa dhāraye'haṃ ca yācitaṃ saṃśrutaṃ mayā | na cedgrahīṣyase rājañśapiṣye tvāṃ na saṃśayaḥ
इसे ले लीजिए; आपने जो माँगा और मैंने जो वचन दिया, उसका मैं देनदार हूँ। हे राजन्, यदि आप नहीं लेंगे, तो मैं आपको निःसन्देह शाप दूँगा।
राजोवाच
श्लोक 117 (12.197.117)
धिग्राजधर्मं यस्यायं कार्यस्येह विनिश्चयः । इत्यर्थं मे ग्रहीतव्यं कथं तुल्यं भवेदिति ॥
dhigrājadharmaṃ yasyāyaṃ kāryasyeha viniścayaḥ | ityarthaṃ me grahītavyaṃ kathaṃ tulyaṃ bhavediti
राजधर्म को धिक्कार है, जिसके द्वारा ऐसे मामले का निर्णय होता है! इसलिए मुझे इसे लेना ही होगा; पर तब हम दोनों के बीच यह बराबर कैसे होगा?
श्लोक 118 (12.197.118)
एष पाणिरपूर्वं मे निक्षेपार्थं प्रसारितः । यन्मे धारयसे विप्र तदिदानीं प्रदीयताम् ॥
eṣa pāṇirapūrvaṃ me nikṣepārthaṃ prasāritaḥ | yanme dhārayase vipra tadidānīṃ pradīyatām
यह मेरा हाथ है, जो पहले कभी नहीं फैला था, अब धरोहर लेने के लिए फैलाया गया है। हे विप्र, मेरे लिए आप जो भी धारण करते हैं, वह अब दे दीजिए।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 119 (12.197.119)
संहितां जपता यावान्गुणः कश्चित्कृतो मया । तत्सर्वं प्रतिगृह्णीष्व यदि किंचिदिहास्ति मे ॥
saṃhitāṃ japatā yāvānguṇaḥ kaścitkṛto mayā | tatsarvaṃ pratigṛhṇīṣva yadi kiṃcidihāsti me
संहिता का जप करके मैंने जो भी पुण्य अर्जित किया है, यदि यहाँ मेरे पास कुछ भी है, तो वह सब आप ले लीजिए।
राजोवाच
श्लोक 120 (12.197.120)
जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम । सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ॥
jalametannipatitaṃ mama pāṇau dvijottama | samamastu sahaivāstu pratigṛhṇātu vai bhavān
हे द्विजश्रेष्ठ, यह जल मेरी हथेली में गिर चुका है। यह बराबर हो, साझा हो, और आप भी इसे ग्रहण करें।
विरूप उवाच
श्लोक 121 (12.197.121)
कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् । जिज्ञासमानौ युवयोर्मनोत्थं तु द्विजोत्तम ॥
kāmakrodhau viddhi nau tvamāvābhyāṃ kārito bhavān | jijñāsamānau yuvayormanotthaṃ tu dvijottama
हमें काम और क्रोध जानो; हम दोनों ने ही तुमसे यह सब करवाया, हे द्विजश्रेष्ठ, यह जानने की इच्छा से कि तुम दोनों के मन में क्या उठता है।
श्लोक 122 (12.197.122)
सहेति च यदुक्तं ते समा लोकास्तवास्य च । नायं धारयते किंचिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ॥
saheti ca yaduktaṃ te samā lokāstavāsya ca | nāyaṃ dhārayate kiṃcijjijñāsā tvatkṛte kṛtā
और तुमने जो कहा, “साथ-साथ,” तो तुम्हारे और इसके लिए लोक समान हैं। यह कुछ नहीं देता; यह परीक्षा तुम्हारे लिए ही की गई थी।
श्लोक 123 (12.197.123)
कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् । सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निकृष्टं पश्यतस्तव ॥
kālo dharmastathā mṛtyuḥ kāmakrodhau tathā yuvām | sarvamanyonyaniṣkarṣe nikṛṣṭaṃ paśyatastava
काल, धर्म और मृत्यु, काम और क्रोध, और तुम दोनों: यह सब कुछ तुम्हारे देखते-देखते एक-दूसरे की कसौटी पर कसा गया है।
श्लोक 124 (12.197.124)
सर्वेषामुपरिस्थानं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः । युवयोः स्थानमूलं निर्द्वन्द्वममलात्मकम् ॥
sarveṣāmuparisthānaṃ brahmaṇo vyaktajanmanaḥ | yuvayoḥ sthānamūlaṃ nirdvandvamamalātmakam
सबके ऊपर ब्रह्मा का वह स्थान है जिनका जन्म प्रकट है। तुम दोनों के स्थान का मूल द्वन्द्वों से रहित और निर्मल है।
श्लोक 125 (12.197.125)
सर्वे गच्छाम यत्र स्वान्स्वाँल्लोकांश्च तथा वयम् । गच्छ लोकाञ्जितान्स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ॥
sarve gacchāma yatra svānsvām̐llokāṃśca tathā vayam | gaccha lokāñjitānsvena karmaṇā yatra vāñchasi
हम सब अपने-अपने लोकों को जाएँ, जैसे हम भी जाएँगे। तुम अपने कर्म से जीते हुए लोकों में, जहाँ चाहो, जाओ।
भीष्म उवाच
श्लोक 126 (12.197.126)
ततो धर्मयमाद्यास्ते वाक्यमूचुर्नृपद्विजौ । अस्माकं यः स्मृतो मूर्धा ब्रह्मलोकमिति स्मृतं ॥
tato dharmayamādyāste vākyamūcurnṛpadvijau | asmākaṃ yaḥ smṛto mūrdhā brahmalokamiti smṛtaṃ
तब धर्म, यम और उनके साथियों ने राजा और ब्राह्मण से कहा, “हमारा जो शिरोभाग माना गया है, वह ब्रह्मलोक है; ऐसा ही स्मरण किया जाता है।
धर्मयमाद्या ऊचुः
श्लोक 127 (12.197.127)
तत्रस्थौ हि भवन्तौ हि युवाभ्यां निर्जिता वयम् । युवयोः काम आपन्नस्तत्काम्यमविशङ्कया ॥
tatrasthau hi bhavantau hi yuvābhyāṃ nirjitā vayam | yuvayoḥ kāma āpannastatkāmyamaviśaṅkayā
आप दोनों वहाँ स्थित हैं और हम आप दोनों से जीत लिए गए हैं। आप दोनों को जो इच्छा हुई है, वह इच्छित वस्तु निःशंक होकर आपकी है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 128 (12.197.128)
जापकानां फलावाप्तिर्मया ते संप्रदर्शिता । गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ॥
jāpakānāṃ phalāvāptirmayā te saṃpradarśitā | gatiḥ sthānaṃ ca lokāśca jāpakena yathā jitāḥ
हे राजन्, मैंने तुम्हें दिखा दिया कि जापक फल कैसे पाते हैं: उनकी गति, उनका स्थान और वे लोक, जिन्हें जापक जीतता है।
श्लोक 129 (12.197.129)
प्रयाति संहिताध्यायी ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । अथवाऽग्निं समायाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ॥
prayāti saṃhitādhyāyī brahmāṇaṃ parameṣṭhinam | athavā'gniṃ samāyāti sūryamāviśate'pi vā
संहिता का अध्ययन करने वाला परमेष्ठी ब्रह्मा के पास जाता है; अथवा अग्नि को प्राप्त होता है, या सूर्य में प्रवेश करता है।
श्लोक 130 (12.197.130)
स तैजसेन भावेन यदि तत्र रमत्युत । गुणांस्तेषां समाधत्ते रागेण प्रतिमोहितः ॥
sa taijasena bhāvena yadi tatra ramatyuta | guṇāṃsteṣāṃ samādhatte rāgeṇa pratimohitaḥ
यदि वह वहाँ उस तेजोमय भाव में रमता है, तो राग से मोहित होकर उन देवताओं के गुणों को धारण कर लेता है।
श्लोक 131 (12.197.131)
एवं सोमे तथा वायौ भूम्याकाशशरीरगः । सरागस्तत्र वसति गुणांस्तेषां समाचरन् ॥
evaṃ some tathā vāyau bhūmyākāśaśarīragaḥ | sarāgastatra vasati guṇāṃsteṣāṃ samācaran
इसी प्रकार चन्द्रमा में, वायु में, और पृथ्वी तथा आकाश के शरीर में भी वह राग-सहित वहाँ रहता है और उनके गुणों का आचरण करता है।
श्लोक 132 (12.197.132)
अथ तत्र विरागी स परं गच्छत्यसंशयम् । परमव्ययमिच्छन्स तमेवाविशते पुनः ॥
atha tatra virāgī sa paraṃ gacchatyasaṃśayam | paramavyayamicchansa tamevāviśate punaḥ
पर यदि वहाँ वह विरक्त हो जाता है, तो निःसन्देह परम को प्राप्त होता है; अविनाशी परम को चाहता हुआ वह फिर उसी में प्रवेश कर जाता है।
श्लोक 133 (12.197.133)
अमृताच्चामृतं प्राप्तः शान्तीभूतो निरात्मवान् । ब्रह्मभूतः स निर्द्वन्द्वः सुखी शान्तो निरामयः ॥
amṛtāccāmṛtaṃ prāptaḥ śāntībhūto nirātmavān | brahmabhūtaḥ sa nirdvandvaḥ sukhī śānto nirāmayaḥ
अमर से वह अमर को प्राप्त होता है; शान्त और अहंकार से रहित होकर वह ब्रह्मस्वरूप, द्वन्द्वों से परे, सुखी, शान्त और निरामय हो जाता है।
श्लोक 134 (12.197.134)
ब्रह्मस्थानमनावर्तमेकमक्षरसंज्ञकम् । अदुःखमजरं शान्तं स्थानं तत्प्रतिपद्यते ॥
brahmasthānamanāvartamekamakṣarasaṃjñakam | aduḥkhamajaraṃ śāntaṃ sthānaṃ tatpratipadyate
ब्रह्म का वह धाम, जहाँ से लौटना नहीं होता, जो एक है और अक्षर नाम से जाना जाता है, जो दुःखरहित, अजर और शान्त है, उस स्थान को वह प्राप्त करता है।
श्लोक 135 (12.197.135)
चतुर्भिर्लक्षणैर्हीनं तथा षड्भिः सषोडशैः । पुरुषं तमतिक्रम्य आकाशं प्रतिपद्यते ॥
caturbhirlakṣaṇairhīnaṃ tathā ṣaḍbhiḥ saṣoḍaśaiḥ | puruṣaṃ tamatikramya ākāśaṃ pratipadyate
चार लक्षणों से रहित, तथा छह और सोलह से भी रहित होकर वह पुरुष को लाँघकर आकाश को प्राप्त होता है।
श्लोक 136 (12.197.136)
अथ नेच्छति रागात्मा सर्वं तदधितिष्ठति । यच्च प्रार्थयते तच्च मनसा प्रतिपद्यते ॥
atha necchati rāgātmā sarvaṃ tadadhitiṣṭhati | yacca prārthayate tacca manasā pratipadyate
पर यदि रागयुक्त स्वभाव वाला उसे नहीं चाहता, तो वह उस सबका अधिष्ठाता हो जाता है; और जो कुछ वह चाहता है, उसे मन से प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 137 (12.197.137)
अथवा चेक्षते लोकान्सर्वान्निरयसंज्ञितान् । निस्पृहः सर्वतो मुक्तस्तत्र वै रमते सुखम् ॥
athavā cekṣate lokānsarvānnirayasaṃjñitān | nispṛhaḥ sarvato muktastatra vai ramate sukham
अथवा वह निस्पृह और सर्वथा मुक्त होकर “नरक” कहे जाने वाले सब लोकों को देखता है और वहाँ सुखपूर्वक रमता है।
श्लोक 138 (12.197.138)
एवमेषा महाराज जापकस्य गतिर्यथा । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमर्हसि ॥
evameṣā mahārāja jāpakasya gatiryathā | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumarhasi
इस प्रकार, हे महाराज, जापक की गति ऐसी है। यह सब तुम्हें बता दिया गया; अब और क्या सुनना चाहते हो?