शान्ति पर्व · अध्याय 198
जापक और राजा का ब्रह्मा में प्रवेश
जापक ब्राह्मण और राजा, दोनों एक-दूसरे को समान फल का अधिकारी बताकर साथ चलने का निश्चय करते हैं; धर्म और लोकपालों सहित देवता यह देखने एकत्र होते हैं। योग से दोनों इन्द्रियों और प्राणों को समेटकर आत्मा को मस्तक पर स्थिर करते हैं; ब्राह्मण के भीतर से एक महान् ज्योति निकलकर ब्रह्मा में प्रवेश करती है। ब्रह्मा उसका स्वागत करते हैं, जापकों और योगियों को तुल्य फल वाला बताते हैं और दोनों को अपने में समा लेते हैं। वे महास्मृति का पाठ करने वालों और योग के भक्तों को अपना लोक देने का वचन देते हैं, और भीष्म जापकों की कथा समाप्त करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.198.1)
किमुत्तरं तदा तौ स्म चक्रतुस्तस्य भाषिते । ब्राह्मणो वाऽथवा राजा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kimuttaraṃ tadā tau sma cakratustasya bhāṣite | brāhmaṇo vā'thavā rājā tanme brūhi pitāmaha
पितामह, उसके कहने पर उन दोनों ने, ब्राह्मण ने या राजा ने, तब क्या उत्तर दिया? वह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (12.198.2)
अथवा तौ गतौ तत्र यदेतत्कीर्तितं त्वया । संवादो वा तयोः कोऽभूत्किं वा तौ तत्र चक्रतुः ॥
athavā tau gatau tatra yadetatkīrtitaṃ tvayā | saṃvādo vā tayoḥ ko'bhūtkiṃ vā tau tatra cakratuḥ
अथवा जैसा आपने बताया, उसके अनुसार जब वे दोनों वहाँ पहुँचे, तब उनमें क्या बातचीत हुई और उन दोनों ने वहाँ क्या किया?
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.198.3)
तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं संपूज्य जापकः । यमं कालं च मृत्युं च स्वर्गं संपूज्य चार्हतः ॥
tathetyevaṃ pratiśrutya dharmaṃ saṃpūjya jāpakaḥ | yamaṃ kālaṃ ca mṛtyuṃ ca svargaṃ saṃpūjya cārhataḥ
“ऐसा ही हो” कहकर स्वीकार करते हुए जापक ने धर्म का आदर किया; उसने यम, काल, मृत्यु, स्वर्ग और पूजनीय जनों का भी सत्कार किया।
श्लोक 4 (12.198.4)
पूर्वं ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभाः । सर्वान्संपूज्य शिरसा राजानं सोऽब्रवीद्द्विजः ॥
pūrvaṃ ye cāpare tatra sametā brāhmaṇarṣabhāḥ | sarvānsaṃpūjya śirasā rājānaṃ so'bravīddvijaḥ
वहाँ पहले से जो अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण एकत्र थे, उन सबको सिर झुकाकर प्रणाम करने के बाद उस ब्राह्मण ने राजा से कहा।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 5 (12.198.5)
फलेनानेन संयुक्तो राजर्षे गच्छ मुख्यताम् । भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेयं भूय एव ह ॥
phalenānena saṃyukto rājarṣe gaccha mukhyatām | bhavatā cābhyanujñāto japeyaṃ bhūya eva ha
“हे राजर्षि, आप इस फल से युक्त हो चुके हैं; आप श्रेष्ठता को प्राप्त हों। आपकी अनुमति पाकर मैं फिर जप करता रहूँगा।
श्लोक 6 (12.198.6)
वरश्च मम पूर्वं हि दत्तो देव्या महाबल । श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवत्विति विशांपते ॥
varaśca mama pūrvaṃ hi datto devyā mahābala | śraddhā te japato nityaṃ bhavatviti viśāṃpate
“हे महाबली, देवी ने बहुत पहले मुझे वर दिया था: ‘हे राजन्, जप करते हुए तुम्हारी श्रद्धा सदा बनी रहे।’”
राजोवाच
श्लोक 7 (12.198.7)
यद्येवं सफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव । गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि ॥
yadyevaṃ saphalā siddhiḥ śraddhā ca japituṃ tava | gaccha vipra mayā sārdhaṃ jāpakaṃ phalamāpnuhi
“यदि ऐसा है — यदि तुम्हारी सिद्धि सफल है और जप करने में तुम्हारी श्रद्धा भी बनी है — तो हे विप्र, मेरे साथ चलो और जापक का फल प्राप्त करो।”
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 8 (12.198.8)
कृतः प्रयत्नः सुमहान्सर्वेषां सन्निधाविह । सह तुल्यफलावावां गच्छावो यत्र नौ गतिः ॥
kṛtaḥ prayatnaḥ sumahānsarveṣāṃ sannidhāviha | saha tulyaphalāvāvāṃ gacchāvo yatra nau gatiḥ
“यहाँ सबके सामने बड़ा प्रयत्न किया गया है। हम दोनों तुल्य फल वाले होकर साथ चलें, जहाँ हमारी गति है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 9 (12.198.9)
व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः । सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च ॥
vyavasāyaṃ tayostatra viditvā tridaśeśvaraḥ | saha devairupayayau lokapālaistathaiva ca
उन दोनों का निश्चय जानकर देवेश्वर देवताओं और लोकपालों के साथ वहाँ आए।
श्लोक 10 (12.198.10)
साध्याश्च विश्वे मरुतो वाक्यानि सुमहान्ति च । नद्यः शैलाः समुद्राश्च तीर्थानि विविधानि च ॥
sādhyāśca viśve maruto vākyāni sumahānti ca | nadyaḥ śailāḥ samudrāśca tīrthāni vividhāni ca
साध्य, विश्वेदेव और मरुद्गण आए, साथ ही महान् पवित्र वाक्य भी; नदियाँ, पर्वत, समुद्र और अनेक प्रकार के तीर्थ भी आए;
श्लोक 11 (12.198.11)
तपांसि संयोगविधिर्वेदास्तोभाः सरस्वती । नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः ॥
tapāṃsi saṃyogavidhirvedāstobhāḥ sarasvatī | nāradaḥ parvataścaiva viśvāvasurhahāhuhūḥ
तप, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (सामगान के अक्षर) और सरस्वती; नारद और पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूहू;
श्लोक 12 (12.198.12)
गन्धर्वश्चित्रसेनश्च परिवारगणैर्युतः । नागाः सिद्धाश्च मुनयो देवदेवः प्रजापतिः ॥
gandharvaścitrasenaśca parivāragaṇairyutaḥ | nāgāḥ siddhāśca munayo devadevaḥ prajāpatiḥ
गन्धर्व चित्रसेन अपने परिवारजनों सहित; नाग, सिद्ध और मुनि; और देवों के देव प्रजापति।
श्लोक 13 (12.198.13)
आजगाम च देवेशो ब्रह्मा वेदमयोऽव्ययः । विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत् । अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो ॥
ājagāma ca deveśo brahmā vedamayo'vyayaḥ | viṣṇuḥ sahasraśīrṣaśca devo'cintyaḥ samāgamat | avādyantāntarikṣe ca bheryastūryāṇi vā vibho
वेदमय, अविनाशी देवेश ब्रह्मा भी आए; सहस्र सिरों वाले अचिन्त्य देव विष्णु भी पधारे। हे विभो, आकाश में भेरियाँ और तुरहियाँ बज उठीं।
श्लोक 14 (12.198.14)
पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् । ननृतुश्चाप्सरः सङ्घास्तत्रतत्र समन्ततः ॥
puṣpavarṣāṇi divyāni tatra teṣāṃ mahātmanām | nanṛtuścāpsaraḥ saṅghāstatratatra samantataḥ
वहाँ उन महात्माओं पर दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई, और अप्सराओं के समूह चारों ओर जहाँ-तहाँ नाचने लगे।
श्लोक 15 (12.198.15)
अथ स्वर्गस्तथा रूपी ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् । संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नृप ॥
atha svargastathā rūpī brāhmaṇaṃ vākyamabravīt | saṃsiddhastvaṃ mahābhāga tvaṃ ca siddhastathā nṛpa
तब रूप धारण करके स्वयं स्वर्ग ने ब्राह्मण से कहा: “हे महाभाग, तुम सिद्ध हो गए; और हे राजन्, तुम भी वैसे ही सिद्ध हो गए।”
श्लोक 16 (12.198.16)
अथ तौ सहितौ राजन्नन्योन्यस्य विधानतः । विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ॥
atha tau sahitau rājannanyonyasya vidhānataḥ | viṣayapratisaṃhāramubhāveva pracakratuḥ
तब वे दोनों साथ मिलकर, एक-दूसरे की विधि के अनुसार, अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाने लगे।
श्लोक 17 (12.198.17)
प्राणापानौ तथोदानं समानं व्यानमेव च । एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतुः प्राणयोर्मनः ॥
prāṇāpānau tathodānaṃ samānaṃ vyānameva ca | evaṃ tau manasi sthāpya dadhatuḥ prāṇayormanaḥ
प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान को मन में स्थिर करके उन्होंने मन को प्राणों में धारण किया।
श्लोक 18 (12.198.18)
उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवोः । भ्रुकुट्याक्ष्णोश्च मनसा शनैर्धारयतस्तदा ॥
upasthitakṛtau tau ca nāsikāgramadho bhruvoḥ | bhrukuṭyākṣṇośca manasā śanairdhārayatastadā
तैयार होकर दोनों ने धीरे-धीरे मन को नासिका के अग्र भाग, भौंहों के नीचे तथा भ्रूमध्य और आँखों पर टिकाया।
श्लोक 19 (12.198.19)
निश्चेष्टाभ्यां शरीराभ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ । जितासनौ समाधाय मूर्धन्यात्मानमेव च ॥
niśceṣṭābhyāṃ śarīrābhyāṃ sthiradṛṣṭī samāhitau | jitāsanau samādhāya mūrdhanyātmānameva ca
शरीर निश्चल, दृष्टि स्थिर और चित्त एकाग्र करके, आसन जीतकर उन्होंने आत्मा को मस्तक में स्थित किया।
श्लोक 20 (12.198.20)
तालुदेशमथोद्दाल्य ब्राह्मणस्य महात्मनः । ज्योतिर्ज्वाला सुमहती जगाम त्रिदिवं तदा ॥
tāludeśamathoddālya brāhmaṇasya mahātmanaḥ | jyotirjvālā sumahatī jagāma tridivaṃ tadā
उस महात्मा ब्राह्मण के तालु-प्रदेश को फोड़कर एक महान् ज्योति-ज्वाला उस समय स्वर्ग की ओर चली गई।
श्लोक 21 (12.198.21)
हाहाकारस्तथा दिक्षु सर्वासु सुमहानभूत् । तज्ज्योतिः स्तूयमानं स्म ब्रह्माणं प्राविशत्तदा ॥
hāhākārastathā dikṣu sarvāsu sumahānabhūt | tajjyotiḥ stūyamānaṃ sma brahmāṇaṃ prāviśattadā
तब सब दिशाओं में ‘हा!’ का बड़ा शब्द उठा; और स्तुति पाती हुई वह ज्योति ब्रह्मा में प्रविष्ट हो गई।
श्लोक 22 (12.198.22)
ततः स्वागतमित्याह तत्तेजः प्रपितामहः । प्रादेशमात्रं पुरुषं प्रत्युद्गम्य विशांपते ॥
tataḥ svāgatamityāha tattejaḥ prapitāmahaḥ | prādeśamātraṃ puruṣaṃ pratyudgamya viśāṃpate
तब प्रपितामह ने उस तेज से कहा, “स्वागत है,” — हे प्रजापालक, वे उस प्रादेशमात्र पुरुष की अगवानी को आगे बढ़े।
श्लोक 23 (12.198.23)
भूयश्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं स्मयन् । जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः ॥
bhūyaścaivāparaṃ prāha vacanaṃ madhuraṃ smayan | jāpakaistulyaphalatā yogānāṃ nātra saṃśayaḥ
और फिर उन्होंने मुस्कराकर मधुर वचन कहा: “इसमें सन्देह नहीं कि योगियों को जापकों के तुल्य ही फल मिलता है।”
ब्रह्मोवाच
श्लोक 24 (12.198.24)
योगस्य तावदेतेभ्यः प्रत्यक्षं फलदर्शनम् । जापकानां विशिष्टं तु प्रत्युत्थानं समाहितम् ॥
yogasya tāvadetebhyaḥ pratyakṣaṃ phaladarśanam | jāpakānāṃ viśiṣṭaṃ tu pratyutthānaṃ samāhitam
“योग का फल तो इन उपस्थित जनों के सामने प्रत्यक्ष दीखता है; पर जापकों के लिए उठकर उनका स्वागत करना विशेष और विहित सम्मान है।”
भीष्म उवाच
श्लोक 25 (12.198.25)
उष्यतां मयि चेत्युक्त्वा व्याददे स ततो मुखम् । अथास्यं प्रविवेशास्य ब्राह्मणो विगतज्वरः ॥
uṣyatāṃ mayi cetyuktvā vyādade sa tato mukham | athāsyaṃ praviveśāsya brāhmaṇo vigatajvaraḥ
“मुझ में निवास करो” — ऐसा कहकर उन्होंने मुख खोला; और ताप से मुक्त वह ब्राह्मण उनके मुख में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 26 (12.198.26)
राजाऽप्येतेन विधिना भगवन्तं पितामहम् । यथैव द्विजशार्दूलस्तथैव प्राविशत्तदा ॥
rājā'pyetena vidhinā bhagavantaṃ pitāmaham | yathaiva dvijaśārdūlastathaiva prāviśattadā
राजा ने भी उसी विधि से पूज्य पितामह में प्रवेश किया, जैसे द्विजश्रेष्ठ ने किया था।
श्लोक 27 (12.198.27)
स्वयंभुवमथो देवा अभिवाद्य ततोऽब्रुवन् ॥
svayaṃbhuvamatho devā abhivādya tato'bruvan
तब देवताओं ने स्वयम्भू को प्रणाम करके कहा:
देवा ऊचुः
श्लोक 28 (12.198.28)
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थं वयमागताः । कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलान्वितौ ॥
jāpakārthamayaṃ yatno yadarthaṃ vayamāgatāḥ | kṛtapūjāvimau tulyau tvayā tulyaphalānvitau
“यह प्रयत्न जापक के लिए हुआ है, और इसी के लिए हम आए हैं। आपसे सत्कृत ये दोनों समान हैं और समान फल से युक्त हैं।
श्लोक 29 (12.198.29)
योगजापकयोस्तुल्यं फलं सुमहदद्य वै । सर्वांल्लोकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम् ॥
yogajāpakayostulyaṃ phalaṃ sumahadadya vai | sarvāṃllokānatikramya gacchetāṃ yatra vāñchitam
आज योग और जप का फल एक-सा और बहुत महान् दिखाई दिया है। सब लोकों को लाँघकर ये दोनों जहाँ चाहें, वहाँ जाएँ।”
ब्रह्मोवाच
श्लोक 30 (12.198.30)
महास्मृतिं पठेद्यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् । तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ॥
mahāsmṛtiṃ paṭhedyastu tathaivānusmṛtiṃ śubhām | tāvapyetena vidhinā gacchetāṃ matsalokatām
“जो महास्मृति का पाठ करता है, और वैसे ही शुभ अनुस्मृति का — वे दोनों भी इसी विधि से मेरे लोक को प्राप्त करें।
श्लोक 31 (12.198.31)
यश्च योगे भवेद्भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशयः । विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् । साधये गम्यतां चैव यथा स्थानानि सिद्धये ॥
yaśca yoge bhavedbhaktaḥ so'pi nāstyatra saṃśayaḥ | vidhinānena dehānte mama lokānavāpnuyāt | sādhaye gamyatāṃ caiva yathā sthānāni siddhaye
और जो योग का भक्त है — इसमें कोई सन्देह नहीं — वह भी इसी विधि से देह के अन्त में मेरे लोकों को पाएगा। मैं इसे पूरा करूँगा; और अब तुम सब अपनी सिद्धि के लिए अपने-अपने स्थान को जाओ।”
भीष्म उवाच
श्लोक 32 (12.198.32)
इत्युक्त्वा स तदा देवस्तत्रैवान्तरधीयत । आमन्त्र्य च ततो देवा ययुः स्वंस्वं निवेशनम् ॥
ityuktvā sa tadā devastatraivāntaradhīyata | āmantrya ca tato devā yayuḥ svaṃsvaṃ niveśanam
यह कहकर वे देव वहीं अन्तर्धान हो गए; और देवता भी उनसे विदा लेकर अपने-अपने निवास को चले गए।
श्लोक 33 (12.198.33)
ते च सर्वे महात्मानो धर्मं सत्कृत्य तत्र वै । पृष्ठतोऽनुययू राजन्सर्वे सुप्रीतचेतसः ॥
te ca sarve mahātmāno dharmaṃ satkṛtya tatra vai | pṛṣṭhato'nuyayū rājansarve suprītacetasaḥ
और वे सब महात्मा, धर्म का सत्कार करके, हे राजन्, प्रसन्न चित्त से उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 34 (12.198.34)
एतत्फलं जापकानां गतिश्चैषा प्रकीर्तिता । यथाश्रुतं महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
etatphalaṃ jāpakānāṃ gatiścaiṣā prakīrtitā | yathāśrutaṃ mahārāja kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
इस प्रकार, हे महाराज, जापकों का फल और उनकी गति मैंने जैसी सुनी थी वैसी कह दी। अब और क्या सुनना चाहते हो?