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शान्ति पर्व · अध्याय 210

प्रयाणकाल में नारायण का अनुस्मरण

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मोक्ष चाहने वाले मृत्यु के समीप आने पर किसका जप और स्मरण करें। भीष्म वह प्रसंग सुनाते हैं जिसमें नारद ने देव नारायण से यही पूछा था: भगवान् उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मन्त्र बताते हैं, नारद शरणागति का लम्बा स्तोत्र गाते हैं, और भगवान् इन्द्रियों तथा भूतों को आत्मा में लीन करने की विधि, कर्मकाण्ड से बढ़कर भक्ति के महत्त्व और "नमो नारायणाय" मन्त्र का उपदेश देते हैं। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से इसी प्रकार परमात्मा का ध्यान करने को कहते हैं।

अध्याय 209अध्याय-सूचीअध्याय 211

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.210.1)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रयाणकाले किं जप्यं मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकैः ॥

pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | prayāṇakāle kiṃ japyaṃ mokṣibhistattvacintakaiḥ

पितामह! हे महाप्राज्ञ, आप सब शास्त्रों में निपुण हैं। मोक्ष चाहने वाले तत्त्वचिन्तक जन प्रयाण के समय किसका जप करें?

श्लोक 2 (12.210.2)

किंनु स्मरन्कुरुश्रेष्ठ मरणे समुपस्थिते । प्राप्नुयात्परमां सिद्धिं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥

kiṃnu smarankuruśreṣṭha maraṇe samupasthite | prāpnuyātparamāṃ siddhiṃ śrotumicchāmi tatvataḥ

हे कुरुश्रेष्ठ! मृत्यु के निकट आने पर किसका स्मरण करता हुआ मनुष्य परम सिद्धि पा सकता है? मैं यह यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.210.3)

त्वद्युक्तश्च हितः सूक्ष्म उक्तः प्रश्नस्त्वयाऽनघ । शृणुष्वावहितो राजन्नारदेन पुरा श्रुतम् ॥

tvadyuktaśca hitaḥ sūkṣma uktaḥ praśnastvayā'nagha | śṛṇuṣvāvahito rājannāradena purā śrutam

हे निष्पाप! तुमने जो प्रश्न पूछा है, वह उचित, हितकर और सूक्ष्म है। हे राजन्! नारद ने पूर्वकाल में जो सुना था, उसे ध्यान से सुनो।

श्लोक 4 (12.210.4)

श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् । पुरा नारायणं देवं नारदः पर्यपृच्छत ॥

śrīvatsāṅkaṃ jagadbījamanantaṃ lokasākṣiṇam | purā nārāyaṇaṃ devaṃ nāradaḥ paryapṛcchata

पूर्वकाल में नारद ने श्रीवत्सचिह्न से युक्त, जगत् के बीज, अनन्त और लोकों के साक्षी देव नारायण से प्रश्न किया था।

नारद उवाच

श्लोक 5 (12.210.5)

अक्षरं परमं ब्रह्म निर्गुणं तमसः परम् । आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ॥

akṣaraṃ paramaṃ brahma nirguṇaṃ tamasaḥ param | āhurvedyaṃ paraṃ dhāma brahmādikamalodbhavam

आप अविनाशी परब्रह्म हैं, गुणों से रहित और अन्धकार से परे हैं। लोग आपको ही जानने योग्य परम धाम कहते हैं, जिनसे कमल से उत्पन्न ब्रह्मा आदि प्रकट हुए।

श्लोक 6 (12.210.6)

भगवन्भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितेन्द्रियैः । कथं भक्तैर्विचिन्त्योसि योगिभिर्मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥

bhagavanbhūtabhavyeśa śraddadhānairjitendriyaiḥ | kathaṃ bhaktairvicintyosi yogibhirmokṣakāṅkṣibhiḥ

हे भगवन्! हे भूत और भविष्य के स्वामी! श्रद्धालु, जितेन्द्रिय और मोक्ष की इच्छा रखने वाले भक्त योगी आपका चिन्तन किस प्रकार करें?

श्लोक 7 (12.210.7)

किंनु जप्यं जपेन्नित्यं काल्यमुत्थाय मानवः । स्मरेच्च म्रियमाणो वै विशेषेण महाद्युते ॥

kiṃnu japyaṃ japennityaṃ kālyamutthāya mānavaḥ | smarecca mriyamāṇo vai viśeṣeṇa mahādyute

हे महातेजस्वी! मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन किसका जप करे? और मरते समय विशेष रूप से किसका स्मरण करे?

श्लोक 8 (12.210.8)

कथं युञ्जन्समाध्यायेद्ब्रूहि तत्वं सनातनम् ॥

kathaṃ yuñjansamādhyāyedbrūhi tatvaṃ sanātanam

योग का अभ्यास करता हुआ वह किस प्रकार ध्यान करे? यह सनातन तत्त्व मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 9 (12.210.9)

श्रुत्वा च नारदोक्तं तु देवानामीश्वरः स्वयम् । प्रोवाच भगवान्विष्णुर्नारदं वरदः प्रभुः ॥

śrutvā ca nāradoktaṃ tu devānāmīśvaraḥ svayam | provāca bhagavānviṣṇurnāradaṃ varadaḥ prabhuḥ

नारद की यह बात सुनकर देवताओं के ईश्वर, वरदाता प्रभु भगवान् विष्णु ने स्वयं नारद से कहा।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 10 (12.210.10)

हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यामनुस्मृतिम् । यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ॥

hanta te kathayiṣyāmi imāṃ divyāmanusmṛtim | yāmadhītya prayāṇe tu madbhāvāyopapadyate

आओ, मैं तुम्हें यह दिव्य अनुस्मृति बताता हूँ, जिसका पाठ करके मनुष्य प्रयाण के समय मेरे भाव को प्राप्त होता है।

श्लोक 11 (12.210.11)

ओंकारमग्रतः कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद । एकाग्रः प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥

oṃkāramagrataḥ kṛtvā māṃ namaskṛtya nārada | ekāgraḥ prayato bhūtvā imaṃ mantramudīrayet

हे नारद! पहले ओंकार का उच्चारण करके और मुझे नमस्कार करके, एकाग्र और शुद्ध होकर वह इस मन्त्र का उच्चारण करे:

श्लोक 12 (12.210.12)

ओं नमो भगवते वासुदेवायेति ॥

oṃ namo bhagavate vāsudevāyeti

ॐ भगवान् वासुदेव को नमस्कार है।

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (12.210.13)

इत्युक्तो नारदः प्राह प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः । सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् ॥

ityukto nāradaḥ prāha prāñjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ | sarvadeveśvaraṃ viṣṇuṃ sarvātmānaṃ hariṃ prabhum

इस प्रकार कहे जाने पर नारद हाथ जोड़े, विनम्र होकर खड़े रहे और सब देवताओं के ईश्वर, सबके आत्मा, प्रभु हरि विष्णु से बोले।

नारद उवाच

श्लोक 14 (12.210.14)

अव्ययं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् । प्रपद्ये प्राञ्जलिर्विष्णुमक्षरं परमं पदम् ॥

avyayaṃ śāśvataṃ devaṃ prabhavaṃ puruṣottamam | prapadye prāñjalirviṣṇumakṣaraṃ paramaṃ padam

मैं हाथ जोड़कर उन अविनाशी, शाश्वत देव की शरण लेता हूँ, जो सबके उद्गम और पुरुषोत्तम हैं, उन विष्णु की, जो अक्षर और परम पद हैं।

श्लोक 15 (12.210.15)

पुराणं प्रभवं विष्णुमक्षयं लोकसाक्षिणम् । प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् ॥

purāṇaṃ prabhavaṃ viṣṇumakṣayaṃ lokasākṣiṇam | prapadye puṇḍarīkākṣamīśaṃ bhaktānukampinam

मैं उन पुराण पुरुष, सबके उद्गम, अक्षय और लोकसाक्षी विष्णु की शरण लेता हूँ, जो कमलनयन हैं, ईश्वर हैं और भक्तों पर कृपा करने वाले हैं।

श्लोक 16 (12.210.16)

लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परदं पदम् । भगवन्तं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् ॥

lokanāthaṃ sahasrākṣamadbhutaṃ paradaṃ padam | bhagavantaṃ prapanno'smi bhūtabhavyabhavatprabhum

हे लोकनाथ, सहस्रनेत्र, अद्भुत, परम फल देने वाले पद! भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी आप भगवान् की मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 17 (12.210.17)

स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं सर्वतोमुखम् । पद्मनाभं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् ॥

sraṣṭāraṃ sarvalokānāmanantaṃ sarvatomukham | padmanābhaṃ hṛṣīkeśaṃ prapadye satyamacyutam

मैं समस्त लोकों के स्रष्टा, अनन्त, सब ओर मुख वाले, पद्मनाभ, हृषीकेश, सत्य स्वरूप और अच्युत की शरण लेता हूँ।

श्लोक 18 (12.210.18)

हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भं परतः परम् । प्रभोः प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् ॥

hiraṇyagarbhamamṛtaṃ bhūgarbhaṃ parataḥ param | prabhoḥ prabhumanādyantaṃ prapadye taṃ raviprabham

मैं उन हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वी के गर्भ, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, प्रभुओं के प्रभु, आदि और अन्त से रहित, सूर्य के समान तेजस्वी की शरण लेता हूँ।

श्लोक 19 (12.210.19)

सहस्रशीर्षं पुरुषं महर्षिं तत्वभावनम् । प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ॥

sahasraśīrṣaṃ puruṣaṃ maharṣiṃ tatvabhāvanam | prapadye sūkṣmamacalaṃ vareṇyamabhayapradam

मैं सहस्रशीर्ष पुरुष, महर्षि और तत्त्वभावना के आधार की शरण लेता हूँ, जो सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभय देने वाले हैं।

श्लोक 20 (12.210.20)

नारायणं पुराणर्षिं योगात्मानं सनातनम् । संस्थानं सर्वतत्वानां प्रपद्ये ध्रुवमीश्वरम् ॥

nārāyaṇaṃ purāṇarṣiṃ yogātmānaṃ sanātanam | saṃsthānaṃ sarvatatvānāṃ prapadye dhruvamīśvaram

मैं पुराण ऋषि नारायण की शरण लेता हूँ, जो योगात्मा, सनातन, समस्त तत्त्वों के आधार और ध्रुव ईश्वर हैं।

श्लोक 21 (12.210.21)

यः प्रभुः सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् । परावरगुरुर्विष्णुः स मे देवः प्रसीदतु ॥

yaḥ prabhuḥ sarvabhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam | parāvaragururviṣṇuḥ sa me devaḥ prasīdatu

जो सब भूतों के प्रभु हैं, जिनसे यह सब व्याप्त है, जो ऊँच और नीच सबके गुरु हैं, वे विष्णु देव मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 22 (12.210.22)

यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पद्मयोनिः सनातनः । ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥

yasmādutpadyate brahmā padmayoniḥ sanātanaḥ | brahmayonirhi viśvātmā sa me viṣṇuḥ prasīdatu

जिनसे सनातन कमलयोनि ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, जो स्वयं ब्रह्मा के भी उद्गम और विश्वात्मा हैं, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 23 (12.210.23)

यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे । ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोकपरावरे ॥

yaḥ purā pralaye prāpte naṣṭe sthāvarajaṅgame | brahmādiṣu pralīneṣu naṣṭe lokaparāvare

जो पूर्वकाल में प्रलय आने पर, जब चर और अचर नष्ट हो गए, ब्रह्मा आदि लीन हो गए और ऊँच-नीच सब लोक नष्ट हो गए,

श्लोक 24 (12.210.24)

आभूतसंप्लवे चैव प्रलीनेऽप्राकृतो महान् । एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥

ābhūtasaṃplave caiva pralīne'prākṛto mahān | ekastiṣṭhati viśvātmā sa me viṣṇuḥ prasīdatu

समस्त प्राणियों के महाप्रलय में सब कुछ लीन हो जाने पर, अकेले रहते हैं, वे अप्राकृत महान् विश्वात्मा विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 25 (12.210.25)

चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥

caturbhiśca caturbhiśca dvābhyāṃ pañcabhireva ca | hūyate ca punardvābhyāṃ sa me viṣṇuḥ prasīdatu

जिनके लिए चार और चार, दो, पाँच और फिर दो से आहुति दी जाती है, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 26 (12.210.26)

पर्जन्यः पृथिवी सस्यं कालो धर्मः क्रियाक्रिये । गुणाकरः स मे बभ्रुर्वासुदेवः प्रसीदतु ॥

parjanyaḥ pṛthivī sasyaṃ kālo dharmaḥ kriyākriye | guṇākaraḥ sa me babhrurvāsudevaḥ prasīdatu

जो पर्जन्य, पृथ्वी, अन्न, काल, धर्म तथा क्रिया और अक्रिया हैं, जो गुणों की खान हैं, वे मेरे बभ्रु वासुदेव मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 27 (12.210.27)

अग्नीषोमार्कताराणां ब्रह्मरुद्रेन्द्रयोगिनाम् । यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥

agnīṣomārkatārāṇāṃ brahmarudrendrayoginām | yastejayati tejāṃsi sa me viṣṇuḥ prasīdatu

जो अग्नि, सोम, सूर्य और तारों के, तथा ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और योगियों के तेज को प्रज्वलित करते हैं, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 28 (12.210.28)

योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद । यज्ञगर्भ हिरण्याङ्ग पञ्चयज्ञ नमोस्तु ते ॥

yogāvāsa namastubhyaṃ sarvāvāsa varaprada | yajñagarbha hiraṇyāṅga pañcayajña namostu te

हे योग के निवास! आपको नमस्कार है। हे सबके आश्रय, वरदायक! हे यज्ञगर्भ, हिरण्याङ्ग, पञ्चयज्ञ! आपको नमस्कार है।

श्लोक 29 (12.210.29)

चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्तेऽस्तु वासुदेव प्रधानकृत् ॥

caturmūrte paraṃ dhāma lakṣmyāvāsa parārcita | sarvāvāsa namaste'stu vāsudeva pradhānakṛt

हे चतुर्मूर्ते, परम धाम, लक्ष्मी के निवास, श्रेष्ठों द्वारा पूजित, सबके आश्रय वासुदेव, प्रधान के रचयिता! आपको नमस्कार है।

श्लोक 30 (12.210.30)

अजस्त्वनामयः पन्था ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृत् । विकर्तः पञ्चकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ॥

ajastvanāmayaḥ panthā hyamūrtirviśvamūrtidhṛt | vikartaḥ pañcakālajña namaste jñānasāgara

आप अजन्मा, निरामय और मार्गस्वरूप हैं; निराकार होकर भी विश्वरूप धारण करने वाले हैं। हे विकर्त, हे पाँचों कालों के ज्ञाता, हे ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है।

श्लोक 31 (12.210.31)

अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नमव्यक्ताद्यः परोऽक्षरः । यस्मात्परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥

avyaktādvyaktamutpannamavyaktādyaḥ paro'kṣaraḥ | yasmātparataraṃ nāsti tamasmi śaraṇaṃ gataḥ

अव्यक्त से व्यक्त उत्पन्न हुआ। जो अव्यक्त से भी परे अक्षर हैं, जिनसे श्रेष्ठ कुछ नहीं है, उनकी मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 32 (12.210.32)

न प्रधानो न च महान्पुरुषश्चेतनो ह्यजः । अनयोर्यः परतरस्तमस्मि शरणं गतः ॥

na pradhāno na ca mahānpuruṣaścetano hyajaḥ | anayoryaḥ paratarastamasmi śaraṇaṃ gataḥ

जो न प्रधान हैं, न महत्तत्त्व हैं, न चेतन और अजन्मा पुरुष हैं, और इन सबसे भी परे हैं, उनकी मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 33 (12.210.33)

चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्मेशानादयः प्रभुम् । निश्चयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गतः ॥

cintayanto hi yaṃ nityaṃ brahmeśānādayaḥ prabhum | niścayaṃ nādhigacchanti tamasmi śaraṇaṃ gataḥ

ब्रह्मा और ईशान आदि जिन प्रभु का नित्य चिन्तन करते हुए भी निश्चय को नहीं पाते, उनकी मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 34 (12.210.34)

जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ॥

jitendriyā mahātmāno jñānadhyānaparāyaṇāḥ | yaṃ prāpya na nivartante tamasmi śaraṇaṃ gataḥ

जितेन्द्रिय, ज्ञान और ध्यान में लगे महात्मा जिन्हें पाकर नहीं लौटते, उनकी मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 35 (12.210.35)

एकांशेन जगत्सर्वमवष्टभ्य विभुः स्थितः । अग्राह्यं निर्गुणं नित्यं तमस्मि शरणं गतः ॥

ekāṃśena jagatsarvamavaṣṭabhya vibhuḥ sthitaḥ | agrāhyaṃ nirguṇaṃ nityaṃ tamasmi śaraṇaṃ gataḥ

जो विभु अपने एक अंश से सारे जगत् को धारण करके स्थित हैं, जो अग्राह्य, निर्गुण और नित्य हैं, उनकी मैं शरण में आया हूँ।

श्लोक 36 (12.210.36)

सोमार्काग्निमयं तेजो या च तारमयी द्युतिः । दिवि संजायते योऽयं स महात्मा प्रसीदतु ॥

somārkāgnimayaṃ tejo yā ca tāramayī dyutiḥ | divi saṃjāyate yo'yaṃ sa mahātmā prasīdatu

चन्द्र, सूर्य और अग्निमय जो तेज है और तारों से बनी जो दीप्ति है, आकाश में जो इस रूप में प्रकट होते हैं, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 37 (12.210.37)

गुणादिर्निर्गुणश्चाद्यो लक्ष्मीवांश्चेतनो ह्यजः । सूक्ष्मः सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ॥

guṇādirnirguṇaścādyo lakṣmīvāṃścetano hyajaḥ | sūkṣmaḥ sarvagato yogī sa mahātmā prasīdatu

जो गुणों के आदि होकर भी निर्गुण हैं, आदि पुरुष हैं, लक्ष्मीवान्, चेतन और अजन्मा हैं, सूक्ष्म, सर्वव्यापी योगी हैं, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 38 (12.210.38)

साङ्ख्ययोगाश्च ये चान्ये सिद्धाश्च परमर्षयः । यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥

sāṅkhyayogāśca ye cānye siddhāśca paramarṣayaḥ | yaṃ viditvā vimucyante sa mahātmā prasīdatu

सांख्य और योग के अनुयायी, अन्य सिद्ध और परम ऋषि जिन्हें जानकर मुक्त हो जाते हैं, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 39 (12.210.39)

अव्यक्तः समधिष्ठाता अचिन्त्यः सदसत्परः । अस्थितिः प्रकृतिश्रेष्ठः स महात्मा प्रसीदतु ॥

avyaktaḥ samadhiṣṭhātā acintyaḥ sadasatparaḥ | asthitiḥ prakṛtiśreṣṭhaḥ sa mahātmā prasīdatu

जो अव्यक्त अधिष्ठाता हैं, अचिन्त्य हैं, सत् और असत् से परे हैं, निराधार हैं और प्रकृति में श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 40 (12.210.40)

क्षेत्रज्ञः पञ्चधा भुङ्क्ते प्रकृतिं पञ्चभिर्मुखैः । महान्गुणांश्च यो भुङ्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥

kṣetrajñaḥ pañcadhā bhuṅkte prakṛtiṃ pañcabhirmukhaiḥ | mahānguṇāṃśca yo bhuṅkte sa mahātmā prasīdatu

जो क्षेत्रज्ञ पाँच मुखों से पाँच प्रकार से प्रकृति का भोग करते हैं और महत्तत्त्व तथा गुणों का भी भोग करते हैं, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 41 (12.210.41)

सूर्यमध्ये स्थितः सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता । भूतबाह्या च या दीप्तिः स महात्मा प्रसीदतु ॥

sūryamadhye sthitaḥ somastasya madhye ca yā sthitā | bhūtabāhyā ca yā dīptiḥ sa mahātmā prasīdatu

सूर्य के मध्य में स्थित जो चन्द्रमा है, उसके मध्य में जो दीप्ति स्थित है और प्राणियों से परे जो प्रकाश है, वे महात्मा प्रसन्न हों।

श्लोक 42 (12.210.42)

नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतोक्षिशिरोमुख । निर्विकार नमस्तेऽस्तु साक्षी क्षेत्रध्रुवस्थितिः ॥

namaste sarvataḥ sarva sarvatokṣiśiromukha | nirvikāra namaste'stu sākṣī kṣetradhruvasthitiḥ

हे सर्वरूप! आप सब ओर से हैं, सब ओर आपके नेत्र, सिर और मुख हैं; आपको नमस्कार है। हे निर्विकार, साक्षी और क्षेत्र में दृढ़ स्थित! आपको नमस्कार है।

श्लोक 43 (12.210.43)

अतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिङ्गैर्व्यक्तैर्न मीयसे । ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ॥

atīndriya namastubhyaṃ liṅgairvyaktairna mīyase | ye ca tvāṃ nābhijānanti saṃsāre saṃsaranti te

हे इन्द्रियातीत! आपको नमस्कार है; प्रकट चिह्नों से आपको नापा नहीं जा सकता। जो आपको नहीं जानते, वे संसार में भटकते रहते हैं।

श्लोक 44 (12.210.44)

कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिताः । मान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्भवका द्विजाः ॥

kāmakrodhavinirmuktā rāgadveṣavivarjitāḥ | mānyabhaktā vijānanti na punarbhavakā dvijāḥ

काम और क्रोध से मुक्त, राग और द्वेष से रहित, पूज्य भक्त आपको जानते हैं; वे द्विज फिर जन्म नहीं लेते।

श्लोक 45 (12.210.45)

एकान्तिनो हि निर्द्वन्द्वा निराशीःकर्मकारिणः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विचिन्तकाः ॥

ekāntino hi nirdvandvā nirāśīḥkarmakāriṇaḥ | jñānāgnidagdhakarmāṇastvāṃ viśanti vicintakāḥ

एकनिष्ठ, द्वन्द्वों से रहित, फल की इच्छा के बिना कर्म करने वाले, ज्ञान की अग्नि में कर्मों को भस्म कर देने वाले विचारशील जन आप में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 46 (12.210.46)

अशरीरं शरीरस्थं समं सर्वेषु देहिषु । पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्राविशन्त्युत ॥

aśarīraṃ śarīrasthaṃ samaṃ sarveṣu dehiṣu | puṇyapāpavinirmuktā bhaktāstvāṃ prāviśantyuta

आप शरीरों में रहकर भी अशरीरी हैं और सब देहधारियों में समान हैं। पुण्य और पाप से मुक्त भक्त आप में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 47 (12.210.47)

अव्यक्तं बुद्ध्यहङ्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च । त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ॥

avyaktaṃ buddhyahaṅkāramanobhūtendriyāṇi ca | tvayi tāni ca teṣu tvaṃ na teṣu tvaṃ na te tvayi

अव्यक्त, बुद्धि, अहंकार, मन, भूत और इन्द्रियाँ आप में हैं और आप उनमें हैं; फिर भी आप उनमें नहीं हैं और वे आप में नहीं हैं।

श्लोक 48 (12.210.48)

एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् । समोसि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्योस्ति न प्रियः ॥

ekatvānyatvanānātvaṃ ye viduryānti te param | samosi sarvabhūteṣu na te dveṣyosti na priyaḥ

जो एकत्व, अन्यत्व और नानात्व को जानते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं। आप सब प्राणियों में समान हैं; न कोई आपका द्वेष्य है, न कोई प्रिय।

श्लोक 49 (12.210.49)

समत्वमभिकाङ्क्षेऽहं भक्त्या वै नान्यचेतसा । चराचरमिदं सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् । त्वया त्वय्येव तत्प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

samatvamabhikāṅkṣe'haṃ bhaktyā vai nānyacetasā | carācaramidaṃ sarvaṃ bhūtagrāmaṃ caturvidham | tvayā tvayyeva tatprotaṃ sūtre maṇigaṇā iva

मैं अनन्य मन से भक्तिपूर्वक उसी समत्व की कामना करता हूँ। यह सारा चराचर जगत् और चार प्रकार का प्राणिसमूह आप में उसी प्रकार पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियों के समूह पिरोये जाते हैं।

श्लोक 50 (12.210.50)

स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यतत्वं तत्वसंज्ञिकः । अकर्ता हेतुरचलः पृथगात्मन्यवस्थितः ॥

sraṣṭā bhoktāsi kūṭastho hyatatvaṃ tatvasaṃjñikaḥ | akartā heturacalaḥ pṛthagātmanyavasthitaḥ

आप स्रष्टा और भोक्ता होकर भी कूटस्थ हैं; तत्त्वरहित होकर भी तत्त्व नाम से कहे जाते हैं; अकर्ता, कारण और अचल हैं, और अपने आत्मा में पृथक् स्थित रहते हैं।

श्लोक 51 (12.210.51)

न ते भूतेषु संयोगो भूततत्वगुणाधिकः । अहङ्कारेण बुद्ध्या वा न ते योगस्त्रिभिर्गुणैः ॥

na te bhūteṣu saṃyogo bhūtatatvaguṇādhikaḥ | ahaṅkāreṇa buddhyā vā na te yogastribhirguṇaiḥ

आपका प्राणियों से कोई संयोग नहीं है; आप भूतों, तत्त्वों और गुणों से बढ़कर हैं। अहंकार, बुद्धि या तीनों गुणों से आपका योग नहीं है।

श्लोक 52 (12.210.52)

न मोक्षधर्मो वा न त्वं नारम्भो जन्म वा पुनः । जरामरणमोक्षार्थं त्वां प्रपन्नोस्मि सर्वग ॥

na mokṣadharmo vā na tvaṃ nārambho janma vā punaḥ | jarāmaraṇamokṣārthaṃ tvāṃ prapannosmi sarvaga

न मोक्ष का धर्म है, न "आप" हैं, न कोई आरम्भ है, न फिर जन्म है। हे सर्वव्यापी! जरा और मृत्यु से छूटने के लिए मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 53 (12.210.53)

ईश्वरोसि जगन्नाथ ततः परम उच्यसे । भक्तानां यद्धितं देव तद्ध्याहि त्रिदशेश्वर ॥

īśvarosi jagannātha tataḥ parama ucyase | bhaktānāṃ yaddhitaṃ deva taddhyāhi tridaśeśvara

हे जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिए आप परम कहे जाते हैं। हे देव, हे देवेश्वर! भक्तों का जो हित हो, उसका चिन्तन कीजिए।

श्लोक 54 (12.210.54)

विषयैरिन्द्रियैर्वाऽपि न मे भूयः समागमः । पृथिवीं यातु गन्धो वै रसं यातु जलं तथा ॥

viṣayairindriyairvā'pi na me bhūyaḥ samāgamaḥ | pṛthivīṃ yātu gandho vai rasaṃ yātu jalaṃ tathā

विषयों और इन्द्रियों से मेरा फिर संसर्ग न हो। गन्ध पृथ्वी में जाए और रस जल में।

श्लोक 55 (12.210.55)

तेजो हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् । श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुनः ॥

tejo hutāśanaṃ yātu sparśo yātu ca mārutam | śrotramākāśamapyetu mano vaikārikaṃ punaḥ

तेज अग्नि में जाए, स्पर्श वायु में; श्रोत्र आकाश में जाए और वैकारिक मन फिर अपने कारण में लौट जाए।

श्लोक 56 (12.210.56)

इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासुस्वासु च योनिषु । पृथिवी यातु सलिलमापोग्निमनलोऽनिलम् ॥

indriyāṇyapi saṃyāntu svāsusvāsu ca yoniṣu | pṛthivī yātu salilamāpognimanalo'nilam

इन्द्रियाँ अपने-अपने उद्गम में लीन हो जाएँ; पृथ्वी जल में, जल अग्नि में और अग्नि वायु में लीन हो जाए।

श्लोक 57 (12.210.57)

वायुराकाशमप्येतु मनश्चाकाश एव च । अहंकारं मनो यातु मोहनं सर्वदेहिनाम् ॥

vāyurākāśamapyetu manaścākāśa eva ca | ahaṃkāraṃ mano yātu mohanaṃ sarvadehinām

वायु आकाश में जाए और मन भी आकाश में; मन सब देहधारियों को मोह में डालने वाले अहंकार में लीन हो जाए।

श्लोक 58 (12.210.58)

अहंकारस्ततो बुद्धिं बुद्धिरव्यक्तमच्युत ॥

ahaṃkārastato buddhiṃ buddhiravyaktamacyuta

फिर अहंकार बुद्धि में और बुद्धि अव्यक्त में लीन हो, हे अच्युत!

श्लोक 59 (12.210.59)

प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते । वियोगः सर्वकरणैर्गुणैर्भूतैश्च मे भवेत् ॥

pradhāne prakṛtiṃ yāte guṇasāmye vyavasthite | viyogaḥ sarvakaraṇairguṇairbhūtaiśca me bhavet

जब प्रकृति प्रधान में लीन हो जाए और गुण साम्यावस्था में स्थित हो जाएँ, तब मेरा सब इन्द्रियों, गुणों और भूतों से वियोग हो जाए।

श्लोक 60 (12.210.60)

निष्केवलं पदं तात काङ्क्षेऽहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत्पुनः ॥

niṣkevalaṃ padaṃ tāta kāṅkṣe'haṃ paramaṃ tava | ekībhāvastvayā me'stu na me janma bhavetpunaḥ

हे तात! मैं केवल आपका निर्मल परम पद चाहता हूँ। आपके साथ मेरा एकत्व हो; मेरा फिर जन्म न हो।

श्लोक 61 (12.210.61)

त्वद्बुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तिस्त्वत्परायणः । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ॥

tvadbuddhistvadgataprāṇastvadbhaktistvatparāyaṇaḥ | tvāmevāhaṃ smariṣyāmi maraṇe paryupasthite

आप में बुद्धि लगाए, आप में प्राण समर्पित किए, आपका भक्त और आप ही के परायण होकर मैं मृत्यु के समीप आने पर आपका ही स्मरण करूँगा।

श्लोक 62 (12.210.62)

पूर्वदेहकृता ये तु व्याधयः प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋणं मे प्रविमुञ्चतु ॥

pūrvadehakṛtā ye tu vyādhayaḥ praviśantu mām | ardayantu ca duḥkhāni ṛṇaṃ me pravimuñcatu

पूर्व शरीर में बने जो रोग हैं, वे मुझमें प्रवेश करें; वे दुःखों से मुझे पीड़ित करें और मेरा ऋण चुक जाए।

श्लोक 63 (12.210.63)

अनुध्यातोऽसि देवेश न मे जन्म भवेत्पुनः । तस्माद्ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥

anudhyāto'si deveśa na me janma bhavetpunaḥ | tasmādbravīmi karmāṇi ṛṇaṃ me na bhavediti

हे देवेश! मैंने आपका ध्यान किया है; मेरा फिर जन्म न हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कर्मों का ऋण मुझ पर न रहे।

श्लोक 64 (12.210.64)

नोपतिष्ठन्तु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ॥

nopatiṣṭhantu māṃ sarve vyādhayaḥ pūrvasaṃcitāḥ | anṛṇo gantumicchāmi tadviṣṇoḥ paramaṃ padam

पहले संचित सब रोग मेरे पास न आएँ। ऋणमुक्त होकर मैं विष्णु के उस परम पद को जाना चाहता हूँ।

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 65 (12.210.65)

अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातनः । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

ahaṃ bhagavatastasya mama cāsau sanātanaḥ | tasyāhaṃ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati

मैं उन भगवान् का हूँ और वे सनातन मेरे हैं। मैं उनसे नष्ट नहीं होता और वे मुझसे नष्ट नहीं होते।

श्लोक 66 (12.210.66)

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च । दशेन्द्रियाणि मनसि अहंकारे तथा मनः ॥

karmendriyāṇi saṃyamya pañca buddhīndriyāṇi ca | daśendriyāṇi manasi ahaṃkāre tathā manaḥ

कर्मेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों को संयम में करके, दसों इन्द्रियों को मन में और मन को अहंकार में लगाए,

श्लोक 67 (12.210.67)

अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । यतबुद्धीन्द्रियः पश्येद्बुद्ध्या बुद्ध्येत्परात्परम् ॥

ahaṃkāraṃ tathā buddhau buddhimātmani yojayet | yatabuddhīndriyaḥ paśyedbuddhyā buddhyetparātparam

अहंकार को बुद्धि में और बुद्धि को आत्मा में लगाए। बुद्धि और इन्द्रियों को वश में रखकर वह देखे और बुद्धि से परे से भी परे तत्त्व को जाने।

श्लोक 68 (12.210.68)

ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । ततो बुद्धेः परं बुद्ध्वा लभते न पुनर्भवम् ॥

mamāyamiti yasyāhaṃ yena sarvamidaṃ tatam | tato buddheḥ paraṃ buddhvā labhate na punarbhavam

"यह मेरा है और मैं उनका हूँ, जिनसे यह सब व्याप्त है" इस प्रकार जानकर, और बुद्धि से परे तत्त्व को जानकर मनुष्य फिर जन्म नहीं पाता।

श्लोक 69 (12.210.69)

मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् । अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् ॥

maraṇe samanuprāpte yaścaivaṃ māmanusmaret | api pāpasamācāraḥ sa yāti paramāṃ gatim

मृत्यु आने पर जो इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पापाचारी हो तो भी परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 70 (12.210.70)

ओं नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने । नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्वते ॥

oṃ namo bhagavate tasmai dehināṃ paramātmane | nārāyaṇāya bhaktānāmekaniṣṭhāya śāśvate

ॐ उन भगवान् को नमस्कार है, जो देहधारियों के परमात्मा हैं, उन शाश्वत नारायण को, जो भक्तों के एकमात्र आश्रय हैं।

श्लोक 71 (12.210.71)

इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहितः । स्वपन्विबुद्धश्च पठेद्यत्र तत्र समभ्यसेत् ॥

imāmanusmṛtiṃ divyāṃ vaiṣṇavīṃ susamāhitaḥ | svapanvibuddhaśca paṭhedyatra tatra samabhyaset

एकाग्र मन से सोते समय और जागने पर इस दिव्य वैष्णवी अनुस्मृति का पाठ करे और जहाँ कहीं भी हो, इसका अभ्यास करे।

श्लोक 72 (12.210.72)

पौर्णमास्याममावास्यां द्वादश्यां च विशेषतः । श्रावयेच्छ्रद्दधानांश्च मद्भक्तांश्च विशेषतः ॥

paurṇamāsyāmamāvāsyāṃ dvādaśyāṃ ca viśeṣataḥ | śrāvayecchraddadhānāṃśca madbhaktāṃśca viśeṣataḥ

पूर्णिमा, अमावस्या और विशेषकर द्वादशी को श्रद्धालुओं को, और उनमें भी विशेष रूप से मेरे भक्तों को यह सुनाए।

श्लोक 73 (12.210.73)

यद्यहंकारमाश्रित्य यज्ञदानतपः क्रियाः । कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं न तु ॥

yadyahaṃkāramāśritya yajñadānatapaḥ kriyāḥ | kurvaṃstatphalamāpnoti punarāvartanaṃ na tu

यदि कोई अहंकार का आश्रय लेकर यज्ञ, दान, तप और कर्म करता है, तो वह उनका फल पाता है, पर पुनरावर्तन से मुक्त नहीं होता।

श्लोक 74 (12.210.74)

अभ्यर्चयन्पितॄन्देवान्पठञ्जुह्वन्बलिं ददत् । ज्वलन्नग्निं स्मरेद्यो मां स याति परमां गतिम् ॥

abhyarcayanpitṝndevānpaṭhañjuhvanbaliṃ dadat | jvalannagniṃ smaredyo māṃ sa yāti paramāṃ gatim

पितरों और देवताओं का पूजन करता हुआ, पाठ करता, आहुति देता, बलि अर्पित करता और प्रज्वलित अग्नि की सेवा करता हुआ जो मेरा स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 75 (12.210.75)

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि शरीरिणाम् । यज्ञं दानं तपस्तस्मात्कुर्यादाशीर्विवर्जितः ॥

yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni śarīriṇām | yajñaṃ dānaṃ tapastasmātkuryādāśīrvivarjitaḥ

यज्ञ, दान और तप देहधारियों को पवित्र करने वाले हैं; इसलिए फल की आशा छोड़कर यज्ञ, दान और तप करना चाहिए।

श्लोक 76 (12.210.76)

नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः । तस्याक्षयो भवेल्लोकः श्वपाकस्यापि नारद ॥

nama ityeva yo brūyānmadbhaktaḥ śraddhayānvitaḥ | tasyākṣayo bhavellokaḥ śvapākasyāpi nārada

जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक केवल "नमः" कह देता है, उसके लिए अक्षय लोक होता है, चाहे वह श्वपाक ही क्यों न हो, हे नारद!

श्लोक 77 (12.210.77)

किं पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् । श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिताः ॥

kiṃ punarye yajante māṃ sādhakā vidhipūrvakam | śraddhāvanto yatātmānaste māṃ yānti madāśritāḥ

फिर उनका तो कहना ही क्या, जो विधिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं; श्रद्धालु, संयमी और मेरे आश्रित साधक मुझे प्राप्त होते हैं।

श्लोक 78 (12.210.78)

कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्भक्तोऽमृतमश्नुते । मामेव तस्माद्देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रितः । अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यस्येव पदं मम ॥

karmāṇyādyantavantīha madbhakto'mṛtamaśnute | māmeva tasmāddevarṣe dhyāhi nityamatandritaḥ | avāpsyasi tataḥ siddhiṃ drakṣyasyeva padaṃ mama

इस लोक में कर्मों का आदि और अन्त होता है, पर मेरा भक्त अमृतत्व को पाता है। इसलिए हे देवर्षि! तुम सदा बिना थके केवल मेरा ध्यान करो; तब तुम सिद्धि पाओगे और मेरे पद को देखोगे।

श्लोक 79 (12.210.79)

अज्ञानिने च यो ज्ञानं दद्याद्धर्मोपदेशनम् । कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात्तेन तुल्यं न तत्फलम् ॥

ajñānine ca yo jñānaṃ dadyāddharmopadeśanam | kṛtsnāṃ vā pṛthivīṃ dadyāttena tulyaṃ na tatphalam

जो अज्ञानी को ज्ञान और धर्म का उपदेश देता है, उसके फल के बराबर सम्पूर्ण पृथ्वी के दान का फल भी नहीं होता।

श्लोक 80 (12.210.80)

तस्मात्प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् । एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्यं च विन्दति ॥

tasmātpradeyaṃ sādhubhyo janmabandhabhayāpaham | evaṃ dattvā naraśreṣṭha śreyo vīryaṃ ca vindati

इसलिए जन्म और बन्धन के भय को हरने वाला यह ज्ञान सज्जनों को देना चाहिए। हे नरश्रेष्ठ! इस प्रकार देकर मनुष्य कल्याण और सामर्थ्य प्राप्त करता है।

श्लोक 81 (12.210.81)

अश्वमेधसहस्राणां सहस्रं यः समाचरेत् । नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥

aśvamedhasahasrāṇāṃ sahasraṃ yaḥ samācaret | nāsau padamavāpnoti madbhaktairyadavāpyate

जो हजारों-हजार अश्वमेध यज्ञ करे, वह भी उस पद को नहीं पाता, जिसे मेरे भक्त पाते हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 82 (12.210.82)

एवं पृष्टः पुरा तेन नारदेन सुरर्षिणा । यदुवाच तदाऽसौ भो तदुक्तं तव सुव्रत ॥

evaṃ pṛṣṭaḥ purā tena nāradena surarṣiṇā | yaduvāca tadā'sau bho taduktaṃ tava suvrata

हे सुव्रत! पूर्वकाल में देवर्षि नारद के इस प्रकार पूछने पर उन्होंने जो कहा था, वही मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 83 (12.210.83)

त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ज्ञेयं गुणातिगम् । भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ॥

tvamapyekamanā bhūtvā dhyāhi jñeyaṃ guṇātigam | bhajasva sarvabhāvena paramātmānamavyayam

तुम भी एकाग्र मन से गुणों से परे उस ज्ञेय तत्त्व का ध्यान करो और सम्पूर्ण भाव से अविनाशी परमात्मा की उपासना करो।

श्लोक 84 (12.210.84)

श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं दिव्यं नारायणेरितम् । अत्यन्तभक्तिमान्देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ॥

śrutvaitannārado vākyaṃ divyaṃ nārāyaṇeritam | atyantabhaktimāndeva ekāntatvamupeyivān

नारायण द्वारा कहे गए इस दिव्य वचन को सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् नारद एकान्त भाव को प्राप्त हुए।

श्लोक 85 (12.210.85)

नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् । इदं जपन्वै प्राप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥

nārāyaṇamṛṣiṃ devaṃ daśavarṣāṇyananyabhāk | idaṃ japanvai prāpnoti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam

अनन्य भाव से दस वर्ष तक उन्होंने ऋषि देव नारायण की उपासना की। इसका जप करने वाला विष्णु के उस परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 86 (12.210.86)

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने । नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥

kiṃ tasya bahubhirmantrairbhaktiryasya janārdane | namo nārāyaṇāyeti mantraḥ sarvārthasādhakaḥ

जिसकी जनार्दन में भक्ति है, उसे बहुत से मन्त्रों से क्या प्रयोजन? "नमो नारायणाय" यह मन्त्र सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 87 (12.210.87)

इमां रहस्यां परमामनुस्मृतिम् । अधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् । विहाय दुःखान्यवमुच्य सङ्कटात् । स वीतरागो विगतज्वरः सुखी ॥

imāṃ rahasyāṃ paramāmanusmṛtim | adhītya buddhiṃ labhate ca naiṣṭhikīm | vihāya duḥkhānyavamucya saṅkaṭāt | sa vītarāgo vigatajvaraḥ sukhī

इस परम रहस्यमय अनुस्मृति का पाठ करके मनुष्य निष्ठायुक्त बुद्धि पाता है; दुःखों को त्यागकर और संकट से छूटकर वह वीतराग, सन्तापरहित और सुखी हो जाता है।

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