शान्ति पर्व · अध्याय 213
कारण और कार्य का चक्र
गुरु शिष्य को समझाना आरम्भ करते हैं कि जगत् कैसे उत्पन्न होता है। सब प्राणी अव्यक्त से उसी प्रकार उत्पन्न होते हैं जैसे नन्हे बीज से विशाल वृक्ष। जगत् एक चक्र है जिसकी नाभि अव्यक्त है और जो क्षेत्रज्ञ के अधिष्ठान में घूमता है; अज्ञान से उपजे भोग प्राणियों को उस चक्र पर तिल की तरह पेरते हैं। कारण और कार्य एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं करते, क्षेत्रज्ञ प्रकृति के भावों से वैसे ही अछूता रहता है जैसे वायु धूल से, और ज्ञान से जले हुए क्लेश फिर जन्म नहीं देते।
गुरुरुवाच
श्लोक 1 (12.213.1)
चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । अव्यक्तप्रभवान्याहुरव्यक्तनिधनानि च । अव्यक्तलक्षणं विद्यादव्यक्तात्मात्मकं मनः ॥
caturvidhāni bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca | avyaktaprabhavānyāhuravyaktanidhanāni ca | avyaktalakṣaṇaṃ vidyādavyaktātmātmakaṃ manaḥ
प्राणी चार प्रकार के हैं, स्थावर भी और जंगम भी। कहा गया है कि वे अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं और अव्यक्त में ही लय होते हैं। मन को अव्यक्त के लक्षणों से युक्त और अव्यक्त-स्वरूप ही जानना चाहिए।
श्लोक 2 (12.213.2)
यथाऽश्वत्थकणीकायामन्तर्भूतो महाद्रुमः । निष्पन्नो दृश्यते व्यक्तमव्यक्तात्संभवस्तथा ॥
yathā'śvatthakaṇīkāyāmantarbhūto mahādrumaḥ | niṣpanno dṛśyate vyaktamavyaktātsaṃbhavastathā
जैसे पीपल के नन्हे बीज के भीतर विशाल वृक्ष छिपा रहता है और पूरा बढ़ने पर प्रत्यक्ष दिखाई देता है, वैसे ही व्यक्त जगत् अव्यक्त से उत्पन्न होता है।
श्लोक 3 (12.213.3)
आत्मानमनुसंयाति बुद्धिरव्यक्तजा तथा । तामन्वेति मनो यद्वल्लोहवर्मणि सन्निधौ ॥
ātmānamanusaṃyāti buddhiravyaktajā tathā | tāmanveti mano yadvallohavarmaṇi sannidhau
अव्यक्त से उत्पन्न बुद्धि आत्मा के पीछे चलती है, और मन उस बुद्धि के पीछे चलता है, जैसे चुम्बक के निकट होने पर लोहा खिंच जाता है।
श्लोक 4 (12.213.4)
अभिद्रवत्ययस्कान्तमयोनिश्चेतनं यथा । स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ॥
abhidravatyayaskāntamayoniścetanaṃ yathā | svabhāvahetujā bhāvā yadvadanyadapīdṛśam
जैसे चेतनारहित लोहा चुम्बक की ओर दौड़ता है, और जैसे इसी प्रकार की दूसरी वस्तुएँ भी अपने स्वभाव के कारण ही होती हैं,
श्लोक 5 (12.213.5)
तद्वदव्यक्तजा भावाः कर्तुः कारणलक्षणाः । अचेतनाश्चेतयितुः कारणादभिसंगताः ॥
tadvadavyaktajā bhāvāḥ kartuḥ kāraṇalakṣaṇāḥ | acetanāścetayituḥ kāraṇādabhisaṃgatāḥ
वैसे ही अव्यक्त से उत्पन्न भाव अपने कारण, कर्ता के लक्षणों से युक्त होते हैं; वे अचेतन होकर भी चेतन के कारण ही परस्पर मिलते हैं।
श्लोक 6 (12.213.6)
न भूर्न खं द्यौर्भूतानि नर्षयो न सुरासुराः । नान्यदासीदृते जीवमासेदुर्न तु संहतिम् ॥
na bhūrna khaṃ dyaurbhūtāni narṣayo na surāsurāḥ | nānyadāsīdṛte jīvamāsedurna tu saṃhatim
न पृथ्वी थी, न आकाश, न स्वर्ग; न भूत थे, न ऋषि, न देवता और असुर। जीव के सिवा और कुछ नहीं था, और ये तत्त्व अभी परस्पर संयुक्त नहीं हुए थे।
श्लोक 7 (12.213.7)
सर्वं नित्यं सर्वगतं मनोहेतुत्वलक्षणम् । अज्ञानकर्म निर्दिष्टमेतत्कारणलक्षणम् ॥
sarvaṃ nityaṃ sarvagataṃ manohetutvalakṣaṇam | ajñānakarma nirdiṣṭametatkāraṇalakṣaṇam
यह सब नित्य और सर्वव्यापी है; मन का हेतु होना ही इसका लक्षण है। अज्ञान से उत्पन्न कर्म यही बताया गया है, यही कारण का लक्षण है।
श्लोक 8 (12.213.8)
तत्कारणेन संयुक्तं कार्यसंग्रहकारकम् । येनैतद्वर्तते चक्रमनादिनिधनं महत् ॥
tatkāraṇena saṃyuktaṃ kāryasaṃgrahakārakam | yenaitadvartate cakramanādinidhanaṃ mahat
उस कारण से युक्त होकर यह कार्यों का संग्रह करता है, और इसी से यह आदि-अन्त से रहित विशाल चक्र घूमता रहता है।
श्लोक 9 (12.213.9)
येन स्वभावसद्भावं हेतुभूता सकारणा । एवं प्राकृतविस्तारो ह्याश्रित्य पुरुषं परम् ॥
yena svabhāvasadbhāvaṃ hetubhūtā sakāraṇā | evaṃ prākṛtavistāro hyāśritya puruṣaṃ param
इसी से वस्तुओं का अपने स्वभाव के अनुसार अस्तित्व सिद्ध होता है, क्योंकि यह अपने कारणों सहित स्वयं हेतु बनता है। इस प्रकार प्रकृति का यह सारा विस्तार परम पुरुष के आश्रय पर टिका है।
श्लोक 10 (12.213.10)
अव्यक्तनाभं व्यक्तारं विकारपरिमण्डलम् । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चक्रं स्निग्धाक्षं वर्तते ध्रुवम् ॥
avyaktanābhaṃ vyaktāraṃ vikāraparimaṇḍalam | kṣetrajñādhiṣṭhitaṃ cakraṃ snigdhākṣaṃ vartate dhruvam
यह एक चक्र है जिसकी नाभि अव्यक्त है, अरे व्यक्त हैं और घेरा विकारों का मण्डल है; क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित होकर, चिकनी धुरी पर, यह निरन्तर घूमता रहता है।
श्लोक 11 (12.213.11)
स्निग्धत्वात्तिलवत्सर्वं चक्रेऽस्मिन्पीड्यते जगत् । तिलपीडैरिवाक्रम्य भोगैरज्ञानसंभवैः ॥
snigdhatvāttilavatsarvaṃ cakre'sminpīḍyate jagat | tilapīḍairivākramya bhogairajñānasaṃbhavaiḥ
उसी चिकनाई के कारण इस चक्र पर सारा जगत् तिल की तरह पेरा जाता है, मानो तेलियों के कोल्हुओं की भाँति अज्ञान से उपजे भोग उसे दबोचकर पीस रहे हों।
श्लोक 12 (12.213.12)
प्राणेनायं हि शान्ते तु विरोधात्प्रतिपालनम् । देहस्येषून्य आस्ते यः शुद्धोऽचिन्त्यः सनातनः ॥
prāṇenāyaṃ hi śānte tu virodhātpratipālanam | dehasyeṣūnya āste yaḥ śuddho'cintyaḥ sanātanaḥ
प्राण के शान्त हो जाने पर विरोध से रक्षा होती है; और जो शरीर के भीतर इन बाणों के बीच रहता है, शुद्ध, अचिन्त्य और सनातन,
श्लोक 13 (12.213.13)
भ्रामयन्नेषतो याति कालचक्रसमन्वितः । भूतानि मोहयन्नित्यं चक्रस्य च रयं गतः ॥
bhrāmayanneṣato yāti kālacakrasamanvitaḥ | bhūtāni mohayannityaṃ cakrasya ca rayaṃ gataḥ
वह उन्हें घुमाता हुआ आगे बढ़ता है, कालचक्र से युक्त होकर, प्राणियों को सदा मोहित करता हुआ, चक्र के वेग के साथ चलता हुआ।
श्लोक 14 (12.213.14)
स्नेहद्रव्यसमायोगे क्षेत्रपाचं न वस्तुषु । तिलवत्पीडिते चक्रे ह्याधियन्त्रनिपीडिते । बहिश्चाधिष्ठिते यद्वज्ज्ञानिनां कर्मसंभवम् ॥
snehadravyasamāyoge kṣetrapācaṃ na vastuṣu | tilavatpīḍite cakre hyādhiyantranipīḍite | bahiścādhiṣṭhite yadvajjñānināṃ karmasaṃbhavam
स्नेह-द्रव्य के संयोग में वस्तुओं के भीतर क्षेत्र का परिपाक नहीं होता। जब चक्र तिल की तरह पेरा जाता है, अधिष्ठित यन्त्र से दबाया जाता है और बाहर से भी अधिष्ठित रहता है, तब जानने वालों का कर्म उत्पन्न होता है।
श्लोक 15 (12.213.15)
कर्म तत्कुरुते तर्षादहंकारपरिग्रहम् । कार्यकारणसंयोगे स हेतुरुपपादितः ॥
karma tatkurute tarṣādahaṃkāraparigraham | kāryakāraṇasaṃyoge sa heturupapāditaḥ
तृष्णा के कारण वह अहंकार को पकड़कर कर्म करता है। कार्य और कारण के संयोग में वही हेतु सिद्ध किया गया है।
श्लोक 16 (12.213.16)
यथाऽऽकर्ण्य च तच्छिष्यस्तत्वज्ञानमनुत्तमम् । नात्येति कारणं कार्यं न कार्यं कारणं तथा । कार्याण्यमूनि करणे कालो भवति हेतुमान् ॥
yathā''karṇya ca tacchiṣyastatvajñānamanuttamam | nātyeti kāraṇaṃ kāryaṃ na kāryaṃ kāraṇaṃ tathā | kāryāṇyamūni karaṇe kālo bhavati hetumān
जब शिष्य उस सर्वोत्तम तत्त्वज्ञान को सुन लेता है, तब वह जानता है कि कारण कार्य का अतिक्रमण नहीं करता और कार्य कारण का नहीं। इन कार्यों के घटित होने में काल ही हेतु बनता है।
श्लोक 17 (12.213.17)
हेतुयुक्ताः प्रकृतयो विकाराश्च परस्परम् । अन्योन्यमभिवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठिताः सदा ॥
hetuyuktāḥ prakṛtayo vikārāśca parasparam | anyonyamabhivartante puruṣādhiṣṭhitāḥ sadā
प्रकृतियाँ और उनके विकार हेतुओं से बँधे हुए परस्पर एक-दूसरे में घूमते रहते हैं, और पुरुष सदा उनका अधिष्ठाता रहता है।
श्लोक 18 (12.213.18)
सत्वरजस्तामसैर्भावैश्च्युतो हेतुबलान्वितः । क्षेत्रज्ञमेवानुयाति पांसुर्वातेरितो यथा ॥
satvarajastāmasairbhāvaiścyuto hetubalānvitaḥ | kṣetrajñamevānuyāti pāṃsurvāterito yathā
सत्त्व, रजस् और तमस् के भावों से अलग होकर भी, हेतु के बल से युक्त वह क्षेत्रज्ञ का ही अनुगमन करता है, जैसे वायु से उड़ी हुई धूल।
श्लोक 19 (12.213.19)
न च तैः स्पृश्यते भावैर्न ते तेन महात्मना । सरजस्कोऽरजस्कश्च स वै वायुर्भवेद्यथा ॥
na ca taiḥ spṛśyate bhāvairna te tena mahātmanā | sarajasko'rajaskaśca sa vai vāyurbhavedyathā
वे भाव उस महात्मा को स्पर्श नहीं करते, और वह भी उन्हें नहीं छूता; वायु धूल से युक्त हो या धूल से रहित, वह वायु ही रहती है।
श्लोक 20 (12.213.20)
तथैतदन्तरं विद्यात्सत्वक्षेत्रज्ञयोर्बुधः । अभ्यासात्स तथा युक्तो न गच्छेत्प्रकृतिं पुनः ॥
tathaitadantaraṃ vidyātsatvakṣetrajñayorbudhaḥ | abhyāsātsa tathā yukto na gacchetprakṛtiṃ punaḥ
इसी प्रकार ज्ञानी को सत्त्व और क्षेत्रज्ञ के बीच का भेद जानना चाहिए। इस अभ्यास से युक्त होकर वह फिर प्रकृति को नहीं लौटता।
श्लोक 21 (12.213.21)
संदेहमेतमुत्पन्नमच्छिनद्भगवानृषिः । तथा वार्तां समीक्षेत कृतलक्षणसंविदम् ॥
saṃdehametamutpannamacchinadbhagavānṛṣiḥ | tathā vārtāṃ samīkṣeta kṛtalakṣaṇasaṃvidam
भगवान् ऋषि ने इस उत्पन्न हुए संशय को काट दिया है। उसी प्रकार लक्षणों के निश्चय और उनके ज्ञान सहित इस विषय की समीक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 22 (12.213.22)
बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संपद्यते पुनः ॥
bījānyagnyupadagdhāni na rohanti yathā punaḥ | jñānadagdhaistathā kleśairnātmā saṃpadyate punaḥ
जैसे अग्नि से जले हुए बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञान से दग्ध हुए क्लेशों के कारण आत्मा फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता।