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शान्ति पर्व · अध्याय 214

देहधारी के गुण और दोष

गुरु शिष्य से कहते हैं कि आत्मज्ञान तभी चमकता है जब उसमें से मल पककर निकल जाए, और पृथ्वी से बना तथा पृथ्वी के पदार्थों से पलने वाला यह शरीर जंगल में चलते यात्री के भोजन की तरह केवल निर्वाह के लिए पोसना चाहिए। अज्ञान प्राणियों को चक्र की भाँति घुमाता है; अहंकार ही वह जड़ है जिस पर तीनों लोक टिके हैं। वे सत्त्व, रजस् और तमस् के लक्षण तथा उनसे उपजे दोष गिनाते हैं। शिष्य पूछता है कि कौन-से दोष छूटते हैं, कौन लौट आते हैं और उनका बल कैसे परखा जाए; गुरु उत्तर देते हैं कि जड़ से कटे दोष शुद्धात्मा को मुक्त कर देते हैं, और रजस्, तमस् तथा उन्हें पोसने वाले आहार से बचना चाहिए।

अध्याय 213अध्याय-सूचीअध्याय 215

गुरुरुवाच

श्लोक 1 (12.214.1)

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो यथा समुपलभ्यते । तेषां विज्ञाननिष्ठानामन्यत्तत्वं न रोचते ॥

pravṛttilakṣaṇo dharmo yathā samupalabhyate | teṣāṃ vijñānaniṣṭhānāmanyattatvaṃ na rocate

प्रवृत्ति जिसका लक्षण है, वह धर्म जैसा लोक में समझा जाता है वैसा ही है; पर जो विज्ञान में स्थित हैं, उन्हें कोई और तत्त्व नहीं रुचता।

श्लोक 2 (12.214.2)

दुर्लभा वेदविद्वांसो वेदोक्तेषु व्यवस्थिताः । प्रयोजनं महत्त्वात्तु मार्गमिच्छन्ति संस्तुतम् ॥

durlabhā vedavidvāṃso vedokteṣu vyavasthitāḥ | prayojanaṃ mahattvāttu mārgamicchanti saṃstutam

वेद के जानने वाले, जो वेदोक्त विधि में स्थित हों, दुर्लभ हैं। प्रयोजन की महत्ता के कारण वे उस मार्ग को चाहते हैं जिसकी स्तुति की गई है।

श्लोक 3 (12.214.3)

वेदस्य न विदुर्भावं ज्ञानमार्गप्रतिष्ठितम् । सद्भिराचरितत्वात्तु वृत्तमेतदगर्हितम् । इयं सा बुद्धिरभ्येत्य यथा याति परां गतिम् ॥

vedasya na vidurbhāvaṃ jñānamārgapratiṣṭhitam | sadbhirācaritatvāttu vṛttametadagarhitam | iyaṃ sā buddhirabhyetya yathā yāti parāṃ gatim

वे ज्ञानमार्ग पर टिके हुए वेद के भाव को नहीं जानते। पर सज्जनों ने इसका आचरण किया है, इसलिए यह आचार निर्दोष है। यह वही बुद्धि है जिसे पाकर मनुष्य परम गति को पहुँचता है।

श्लोक 4 (12.214.4)

शरीरवानुपादत्ते मोहात्सर्वान्परिग्रहान् । कामक्रोधादिभिर्भावैर्युक्तो राजसतामसैः ॥

śarīravānupādatte mohātsarvānparigrahān | kāmakrodhādibhirbhāvairyukto rājasatāmasaiḥ

देहधारी मोह के कारण सब परिग्रह अपना लेता है, और रजस् तथा तमस् से उपजे काम-क्रोध आदि भावों से युक्त रहता है।

श्लोक 5 (12.214.5)

नाशुद्धमाचरेत्तस्मादभीप्सन्देहयापनम् । कर्मणां विवरं कुर्वन्न लोकानाप्नुयाच्छुभान् ॥

nāśuddhamācarettasmādabhīpsandehayāpanam | karmaṇāṃ vivaraṃ kurvanna lokānāpnuyācchubhān

इसलिए शरीर-निर्वाह चाहने वाले को अशुद्ध आचरण नहीं करना चाहिए; जो कर्मों में छिद्र करता है, वह शुभ लोकों को नहीं पाता।

श्लोक 6 (12.214.6)

लोहयुक्तं तथा हेम विपक्वं न विराजते । तथाऽपक्वकषायाख्यं विज्ञानं न प्रकाशते ॥

lohayuktaṃ tathā hema vipakvaṃ na virājate | tathā'pakvakaṣāyākhyaṃ vijñānaṃ na prakāśate

जैसे लोहे आदि से मिला सोना पूरी तरह तपे बिना नहीं चमकता, वैसे ही जिस ज्ञान में कषाय पका नहीं है, वह प्रकाशित नहीं होता।

श्लोक 7 (12.214.7)

केचिदात्मगुणं प्राप्तास्ते मुक्ताश्चक्रबन्धनात् । इतरे दुःखसन्द्वन्द्वास्तथा दुःखपरायणाः ॥

kecidātmaguṇaṃ prāptāste muktāścakrabandhanāt | itare duḥkhasandvandvāstathā duḥkhaparāyaṇāḥ

कुछ लोग आत्मगुण को पाकर चक्र के बन्धन से मुक्त हो गए हैं; दूसरे दुःखों के द्वन्द्व में फँसे हैं और दुःख में ही डूबे रहते हैं।

श्लोक 8 (12.214.8)

शुकाकर्मानुरूपं ते जायमानाः पुनः पुनः । क्रोधलोभमदाविष्टा मूढान्तःकरणाः सदा ॥

śukākarmānurūpaṃ te jāyamānāḥ punaḥ punaḥ | krodhalobhamadāviṣṭā mūḍhāntaḥkaraṇāḥ sadā

वे अपने कर्मों के अनुरूप बार-बार जन्म लेते हैं, क्रोध, लोभ और मद से भरे रहते हैं, और उनके अन्तःकरण सदा मूढ़ रहते हैं।

श्लोक 9 (12.214.9)

यथा--- संछाया नास्ति नित्यतया परा । गुणानेव तथा चिन्त्या सन्त्येति च विदुर्बुधाः ॥

yathā--- saṃchāyā nāsti nityatayā parā | guṇāneva tathā cintyā santyeti ca vidurbudhāḥ

जैसे — यहाँ पाठ खण्डित है — वहाँ और कोई छाया नहीं है, क्योंकि वह सदा ऐसी ही है; उसी प्रकार केवल गुणों का ही चिन्तन करना चाहिए, और ज्ञानी जानते हैं कि वे हैं।

श्लोक 10 (12.214.10)

यश्चाधर्मं चरेल्लोभात्कामक्रोधावनुप्लुवन् । धर्म्यं पन्थानमुत्क्रम्य सानुबन्धो विनश्यति ॥

yaścādharmaṃ carellobhātkāmakrodhāvanupluvan | dharmyaṃ panthānamutkramya sānubandho vinaśyati

जो लोभवश कामना और क्रोध के पीछे बहकर अधर्म करता है और धर्म के मार्ग को छोड़ देता है, वह अपने सम्बन्धों सहित नष्ट हो जाता है।

श्लोक 11 (12.214.11)

अचलं ज्ञानमप्राप्य चलचित्तश्चलानियात् । शब्दादीन्विषयांस्तस्मान्न संरागादुपप्लवेत् । क्रोधो हर्षो विषादश्च जायन्ते हि परस्परात् ॥

acalaṃ jñānamaprāpya calacittaścalāniyāt | śabdādīnviṣayāṃstasmānna saṃrāgādupaplavet | krodho harṣo viṣādaśca jāyante hi parasparāt

स्थिर ज्ञान को पाए बिना चंचल चित्त वाला चंचल वस्तुओं के बीच भटकता है। इसलिए शब्द आदि विषयों के पीछे आसक्ति से नहीं दौड़ना चाहिए; क्योंकि क्रोध, हर्ष और विषाद एक-दूसरे से उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 12 (12.214.12)

गुणाः कार्याः क्रोधहर्षौ सुखदुःखे प्रियाप्रिये । द्वन्द्वान्यथैवमादीनि विजयेच्चैव सर्ववित् ॥

guṇāḥ kāryāḥ krodhaharṣau sukhaduḥkhe priyāpriye | dvandvānyathaivamādīni vijayeccaiva sarvavit

ये गुण हैं, मात्र कार्य हैं: क्रोध और हर्ष, सुख और दुःख, प्रिय और अप्रिय, तथा इसी प्रकार के अन्य द्वन्द्व; सब कुछ जानने वाला इन्हें जीत ले।

श्लोक 13 (12.214.13)

पञ्चभूतात्मके देहे सत्त्वराजसतामसे । कमभिष्टुवते चायं कं वा क्रोशति किं वदन् ॥

pañcabhūtātmake dehe sattvarājasatāmase | kamabhiṣṭuvate cāyaṃ kaṃ vā krośati kiṃ vadan

पाँच भूतों से बने, सत्त्व, रजस् और तमस् से युक्त इस शरीर में कौन किसकी स्तुति करता है, कौन किसकी निन्दा करता है, और कहने को ही क्या है?

श्लोक 14 (12.214.14)

स्पर्शरूपरसाद्येषु सङ्गं गच्छन्ति बालिशाः । नावगच्छन्ति विज्ञानादात्मानं पार्थिवं गुणम् ॥

sparśarūparasādyeṣu saṅgaṃ gacchanti bāliśāḥ | nāvagacchanti vijñānādātmānaṃ pārthivaṃ guṇam

मूर्ख लोग स्पर्श, रूप, रस आदि में आसक्त होते हैं; वे विवेक से यह नहीं समझते कि जिसे वे आत्मा मानते हैं वह पृथ्वी का गुण है।

श्लोक 15 (12.214.15)

मृन्मयं शरणं यद्वन्मृदैव परिलिप्यते । पार्थिवोऽयं तथा देहो मृद्विकारान्न नश्यति ॥

mṛnmayaṃ śaraṇaṃ yadvanmṛdaiva parilipyate | pārthivo'yaṃ tathā deho mṛdvikārānna naśyati

जैसे मिट्टी का घर मिट्टी से ही लीपा जाता है, वैसे ही पृथ्वी से बना यह शरीर पृथ्वी के विकारों से नष्ट होने से बचा रहता है।

श्लोक 16 (12.214.16)

मधु तैलं पयः सर्पिर्मांसानि लवणं गुडः । धान्यानि फलमूलानि मृद्विकाराः सहाम्भसा ॥

madhu tailaṃ payaḥ sarpirmāṃsāni lavaṇaṃ guḍaḥ | dhānyāni phalamūlāni mṛdvikārāḥ sahāmbhasā

मधु, तेल, दूध, घी, मांस, नमक, गुड़, अन्न, फल और मूल, जल के साथ — ये सब पृथ्वी के विकार हैं।

श्लोक 17 (12.214.17)

यद्वत्कान्तारमातिष्ठन्नौत्सुक्यं समनुव्रजेत् । ग्राम्यमाहारमादद्यादस्वाद्वपि हि यापनम् ॥

yadvatkāntāramātiṣṭhannautsukyaṃ samanuvrajet | grāmyamāhāramādadyādasvādvapi hi yāpanam

जैसे वन में चलने वाला उतावला नहीं होता और केवल निर्वाह के लिए गाँव का भोजन, स्वादहीन हो तो भी, ले लेता है,

श्लोक 18 (12.214.18)

तद्वत्संसारकान्तारमातिष्ठञ्श्रमतत्परः । यात्रार्थमद्यादाहारं व्याधितो भेषजं यथा ॥

tadvatsaṃsārakāntāramātiṣṭhañśramatatparaḥ | yātrārthamadyādāhāraṃ vyādhito bheṣajaṃ yathā

वैसे ही संसाररूपी वन में प्रवेश करने वाले को परिश्रम में लगे रहकर केवल यात्रा के लिए आहार लेना चाहिए, जैसे रोगी औषधि लेता है।

श्लोक 19 (12.214.19)

भक्षणे श्वापदैर्मार्गादिति चारं करोति चेत् । एवं संसारमार्गेण यात्रार्थं विषयाणि च ॥

bhakṣaṇe śvāpadairmārgāditi cāraṃ karoti cet | evaṃ saṃsāramārgeṇa yātrārthaṃ viṣayāṇi ca

यदि यात्री हिंस्र पशुओं के खा जाने के भय से मार्ग पर ही चलता है, तो वैसे ही संसार-मार्ग में विषयों को केवल यात्रा के लिए ही ग्रहण करना चाहिए।

श्लोक 20 (12.214.20)

न गच्छेद्भोगविज्ञानादुन्मार्गे पद्यते तदा । तस्माददुःखतो मार्गमास्थितस्तमनुस्मरेत् ॥

na gacchedbhogavijñānādunmārge padyate tadā | tasmādaduḥkhato mārgamāsthitastamanusmaret

यदि भोग के उस ज्ञान के अनुसार नहीं चलता, तो वह कुमार्ग में जा गिरता है। इसलिए दुःखरहित मार्ग पर चल पड़ा हुआ मनुष्य उसी का स्मरण रखे।

श्लोक 21 (12.214.21)

नानापर्णफला वृक्षा बहवः सन्ति तत्र हि । भोक्तारो मुनयश्चैव तस्मात्परतरं वनम् ॥

nānāparṇaphalā vṛkṣā bahavaḥ santi tatra hi | bhoktāro munayaścaiva tasmātparataraṃ vanam

वहाँ अनेक प्रकार के पत्तों और फलों वाले बहुत-से वृक्ष हैं, वहाँ भोग करने वाले भी हैं और मुनि भी; उससे आगे एक और श्रेष्ठ वन है।

श्लोक 22 (12.214.22)

अनुमानैस्तथाशास्त्रैर्यशसा विक्रमेण च । सत्यशौचार्जवत्यागैर्वर्चसा विक्रमेण च । क्षान्त्या धृत्या च बुद्ध्या च मनसा तपसैव च ॥

anumānaistathāśāstrairyaśasā vikrameṇa ca | satyaśaucārjavatyāgairvarcasā vikrameṇa ca | kṣāntyā dhṛtyā ca buddhyā ca manasā tapasaiva ca

अनुमान और शास्त्रों से, यश और पराक्रम से; सत्य, शौच, सरलता और त्याग से, तेज और पराक्रम से; क्षमा, धैर्य, बुद्धि, मन और तप से —

श्लोक 23 (12.214.23)

भावान्सर्वान्यथावृत्तान्संवसेत यथाक्रमम् । शान्तिमिच्छन्नदीनात्मा संयच्छेदिन्द्रियाणि च ॥

bhāvānsarvānyathāvṛttānsaṃvaseta yathākramam | śāntimicchannadīnātmā saṃyacchedindriyāṇi ca

सब भावों के साथ, जैसे वे वास्तव में हैं, क्रम से रहना चाहिए; शान्ति चाहने वाला, दीन न होने वाला मनुष्य इन्द्रियों को संयम में रखे।

श्लोक 24 (12.214.24)

सत्त्वेन रजसा चैव तमसा चैव मोहिताः । चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यज्ञानाज्जन्तवो भृशम् ॥

sattvena rajasā caiva tamasā caiva mohitāḥ | cakravatparivartante hyajñānājjantavo bhṛśam

सत्त्व, रजस् और तमस् से मोहित हुए प्राणी अज्ञान के कारण चक्र की भाँति बार-बार घूमते रहते हैं।

श्लोक 25 (12.214.25)

तस्मात्सम्यक्परीक्षेत दोषानज्ञानसंभवान् । अज्ञानप्रभवं नित्यमहंकारं परित्यजेत् ॥

tasmātsamyakparīkṣeta doṣānajñānasaṃbhavān | ajñānaprabhavaṃ nityamahaṃkāraṃ parityajet

इसलिए अज्ञान से उत्पन्न दोषों की भली-भाँति परीक्षा करनी चाहिए, और जिसका उद्गम सदा अज्ञान है उस अहंकार को छोड़ देना चाहिए।

श्लोक 26 (12.214.26)

महाभूतानीन्द्रियाणि गुणाः सत्त्वं रजस्तमः । देहमूलं विजानीहि नैतानि भगवानतः ॥

mahābhūtānīndriyāṇi guṇāḥ sattvaṃ rajastamaḥ | dehamūlaṃ vijānīhi naitāni bhagavānataḥ

महाभूत, इन्द्रियाँ और गुण — सत्त्व, रजस् और तमस् — इन्हें देह-मूलक जानो; इसलिए ये भगवान् नहीं हैं।

श्लोक 27 (12.214.27)

उपायतः प्रवक्ष्यामि तं च मृत्युं दुरासदम् । त्रैलोक्यं सेश्वरं सर्वमहंकारे प्रतिष्ठितम् ॥

upāyataḥ pravakṣyāmi taṃ ca mṛtyuṃ durāsadam | trailokyaṃ seśvaraṃ sarvamahaṃkāre pratiṣṭhitam

मैं उपाय बताऊँगा, और उस दुर्जेय मृत्यु के विषय में भी। ईश्वरों सहित तीनों लोक सब अहंकार में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 28 (12.214.28)

यथेह नियतः कालो दर्शयत्यार्तवान्गुणान् । तद्वद्भूतेष्वहंकारं विद्याद्भूतप्रवर्तकम् ॥

yatheha niyataḥ kālo darśayatyārtavānguṇān | tadvadbhūteṣvahaṃkāraṃ vidyādbhūtapravartakam

जैसे नियत काल ऋतुओं के अपने-अपने गुणों को प्रकट करता है, वैसे ही अहंकार को प्राणियों में उन्हें प्रवृत्त करने वाला जानो।

श्लोक 29 (12.214.29)

संमोहकं तमो विद्यात्कृष्णमज्ञानसंभवम् । प्रकृतेर्गुणसंजातो महानहंक्रिया ततः ॥

saṃmohakaṃ tamo vidyātkṛṣṇamajñānasaṃbhavam | prakṛterguṇasaṃjāto mahānahaṃkriyā tataḥ

तमस् को मोह उत्पन्न करने वाला, काला और अज्ञान से उत्पन्न जानो। प्रकृति के गुणों से महत् उत्पन्न हुआ, और उससे अहंकार की क्रिया।

श्लोक 30 (12.214.30)

अहंकारात्पुनः पश्चाद्भूतग्राममुदाहृतम् । अव्यक्तस्य गुणेभ्यस्तु तद्गुणांश्च निबोध तान् ॥

ahaṃkārātpunaḥ paścādbhūtagrāmamudāhṛtam | avyaktasya guṇebhyastu tadguṇāṃśca nibodha tān

फिर अहंकार से भूतों का समूह उत्पन्न हुआ कहा गया है। अब अव्यक्त के गुणों से उत्पन्न उन गुणों को भी समझो।

श्लोक 31 (12.214.31)

प्रीतिदुःखनिबद्धांश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान् । सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निबोध तान् ॥

prītiduḥkhanibaddhāṃśca samastāṃstrīnatho guṇān | sattvasya rajasaścaiva tamasaśca nibodha tān

प्रीति और दुःख से बाँधने वाले तीनों गुणों को पूरी तरह समझो: सत्त्व के, रजस् के और तमस् के।

श्लोक 32 (12.214.32)

प्रसादो हर्षजा प्रीतिरसंदेहो धृतिः स्मृतिः । एतान्सत्त्वगुणान्विद्यादिमान्राजसतामसान् ॥

prasādo harṣajā prītirasaṃdeho dhṛtiḥ smṛtiḥ | etānsattvaguṇānvidyādimānrājasatāmasān

प्रसन्नता, हर्ष से उत्पन्न प्रीति, संशय का अभाव, धृति और स्मृति — इन्हें सत्त्व के गुण जानो; और आगे के गुण रजस् और तमस् के हैं।

श्लोक 33 (12.214.33)

असन्तोषोऽक्षमाऽधैर्यमतृप्तिर्विषयादिषु । राजसाश्च गुणा ह्येते तत्परं तामसाञ्शृणु ॥

asantoṣo'kṣamā'dhairyamatṛptirviṣayādiṣu | rājasāśca guṇā hyete tatparaṃ tāmasāñśṛṇu

असन्तोष, अधीरता, अधैर्य, विषयों में अतृप्ति आदि — ये रजस् के गुण हैं। अब इसके बाद तमस् के गुण सुनो।

श्लोक 34 (12.214.34)

मोहस्तन्द्री तथा दुःखं निद्राऽऽलस्यं प्रमादता । विषादी दीर्घसूत्रश्च तत्तामसमुदाहृतम् ॥

mohastandrī tathā duḥkhaṃ nidrā''lasyaṃ pramādatā | viṣādī dīrghasūtraśca tattāmasamudāhṛtam

मोह, तन्द्रा, दुःख, निद्रा, आलस्य, प्रमाद, विषाद और दीर्घसूत्रता — ये तमस् के गुण कहे गए हैं।

श्लोक 35 (12.214.35)

कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भयं क्लमः । विषादशोकावरतिर्मानदर्पावनार्यता ॥

kāmakrodhau pramādaśca lobhamohau bhayaṃ klamaḥ | viṣādaśokāvaratirmānadarpāvanāryatā

काम और क्रोध, प्रमाद, लोभ और मोह, भय और थकान, विषाद और शोक, अरति, मान और दर्प, तथा अनार्यता —

श्लोक 36 (12.214.36)

दोषाणामेवमादीनां परीक्ष्य गुरुलाघवम् । विमृशेदात्मसंस्थानमेकैकमनुसंततम् ॥

doṣāṇāmevamādīnāṃ parīkṣya gurulāghavam | vimṛśedātmasaṃsthānamekaikamanusaṃtatam

इन और ऐसे दोषों के भारी-हलकेपन को परखकर एक-एक करके, निरन्तर ध्यान से, आत्मा की स्थिति का विचार करना चाहिए।

श्लोक 37 (12.214.37)

यस्मिन्प्रतिष्ठितं चेदं यस्मिन्सज्ज्ञाननिर्गतिः । सर्वभूताधिकं नित्यमहंकारं विलोकयेत् ॥

yasminpratiṣṭhitaṃ cedaṃ yasminsajjñānanirgatiḥ | sarvabhūtādhikaṃ nityamahaṃkāraṃ vilokayet

उसे अहंकार को देखना चाहिए, जिसमें यह सब प्रतिष्ठित है, जिसमें सम्यक् ज्ञान का निर्गम होता है, और जो सब भूतों से ऊपर सदा स्थित है।

श्लोक 38 (12.214.38)

विलोकमानः स तदा स्वबुद्ध्या सूक्ष्मया पुनः । तदेव भाति तद्रूपमात्मना यत्सुनिर्मलम् ॥

vilokamānaḥ sa tadā svabuddhyā sūkṣmayā punaḥ | tadeva bhāti tadrūpamātmanā yatsunirmalam

इस प्रकार अपनी सूक्ष्म बुद्धि से देखते हुए उसे तब वही रूप प्रकाशित होता है, जो आत्मा से अत्यन्त निर्मल है।

शिष्य उवाच

श्लोक 39 (12.214.39)

के दोषा मनसा त्यक्ताः के बुद्ध्या शिथिलीकृताः । के पुनः पुनरायान्ति के मोहादचला इव ॥

ke doṣā manasā tyaktāḥ ke buddhyā śithilīkṛtāḥ | ke punaḥ punarāyānti ke mohādacalā iva

कौन-से दोष मन से छोड़े जाते हैं, कौन-से बुद्धि से शिथिल किए जाते हैं? कौन-से बार-बार लौट आते हैं, और कौन-से मोह के कारण अचल-से बने रहते हैं?

श्लोक 40 (12.214.40)

केषां बलाबलं बुद्ध्या हेतुभिर्विमृशेद्बुधः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व यथा विद्यामहं विभो । मह्यं शुश्रूषवे विद्वन्वक्ष्येतद्बुद्धिनिश्चितम् ॥

keṣāṃ balābalaṃ buddhyā hetubhirvimṛśedbudhaḥ | etanme sarvamācakṣva yathā vidyāmahaṃ vibho | mahyaṃ śuśrūṣave vidvanvakṣyetadbuddhiniścitam

बुद्धिमान् पुरुष बुद्धि और हेतुओं से इनमें से प्रत्येक के बल और निर्बलता को कैसे परखे? हे विभो, यह सब मुझे बताइए जिससे मैं जान सकूँ। हे विद्वन्, मुझ सुनने के इच्छुक को बुद्धि से निश्चित किया हुआ यह सब कहिए।

श्लोक 41 (12.214.41)

शान्तत्वादपरान्ताच्च आरम्भादपि चैकतः । प्रोक्तो ह्यत्र यथा हेतुरेवमाहुर्मनीषिणः ॥

śāntatvādaparāntācca ārambhādapi caikataḥ | prokto hyatra yathā heturevamāhurmanīṣiṇaḥ

ज्ञानी कहते हैं कि यहाँ हेतु इस प्रकार बताया गया है: शान्तता से, अन्तिम सीमा से, और आरम्भ से भी, अकेले-अकेले लेकर।

गुरुरुवाच

श्लोक 42 (12.214.42)

दोषैर्मूलादवच्छिन्नैर्विशुद्धात्मा विमुच्यते । विनाशयति संभूतमयस्मयमयो यथा । तथाऽकृतात्मा सहजैर्दोषैर्नश्यति राजसैः ॥

doṣairmūlādavacchinnairviśuddhātmā vimucyate | vināśayati saṃbhūtamayasmayamayo yathā | tathā'kṛtātmā sahajairdoṣairnaśyati rājasaiḥ

जड़ से कटे हुए दोषों से शुद्धात्मा मुक्त हो जाता है। जैसे लोहे से उत्पन्न वस्तु लोहे को ही नष्ट कर देती है, वैसे ही जिसका आत्मा सिद्ध नहीं हुआ वह रजस् के सहज दोषों से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 43 (12.214.43)

सहजैरविशुद्धात्मा दोषैर्नश्यति तामसैः । राजसं तामसं चैव शुद्धात्मा कालसंभवम् ॥

sahajairaviśuddhātmā doṣairnaśyati tāmasaiḥ | rājasaṃ tāmasaṃ caiva śuddhātmā kālasaṃbhavam

अशुद्ध आत्मा वाला तमस् के सहज दोषों से नष्ट होता है। शुद्धात्मा — जो रजस् और तमस् से उत्पन्न, काल से जन्मा है —

श्लोक 44 (12.214.44)

शमयेत्सत्त्वमास्थाय बुद्ध्या केवलया द्विजः । त्यजेच्च मनसा चेतः शुद्धात्मा बुद्धिमास्थितः ॥

śamayetsattvamāsthāya buddhyā kevalayā dvijaḥ | tyajecca manasā cetaḥ śuddhātmā buddhimāsthitaḥ

सत्त्व का आश्रय लेकर केवल शुद्ध बुद्धि से उसे शान्त करे, हे द्विज; और मन से चित्त को त्याग दे, शुद्ध आत्मा वाला होकर बुद्धि में स्थित रहे।

श्लोक 45 (12.214.45)

तत्सर्वं देहिनां बीजं सत्त्वमात्मवतः समम् । तस्मादात्मवता वर्ज्यं रजश्च तम एव च ॥

tatsarvaṃ dehināṃ bījaṃ sattvamātmavataḥ samam | tasmādātmavatā varjyaṃ rajaśca tama eva ca

वह सब देहधारियों का बीज है; आत्मसंयमी के लिए सत्त्व उसके समान है। इसलिए आत्मसंयमी को रजस् और तमस् का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 46 (12.214.46)

रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं सत्त्वं निर्मलतामियात् । आहारान्वर्जयेन्नित्यं राजसांस्तामसानपि ॥

rajastamobhyāṃ nirmuktaṃ sattvaṃ nirmalatāmiyāt | āhārānvarjayennityaṃ rājasāṃstāmasānapi

रजस् और तमस् से मुक्त होकर सत्त्व निर्मलता को प्राप्त हो सकता है। रजस् और तमस् बढ़ाने वाले आहारों को सदा छोड़ देना चाहिए;

श्लोक 47 (12.214.47)

ते ब्रह्म पुनरायान्ति न मोहादचला इव । अथवा मन्त्रवद्ब्रूयुर्मांसादीनां यजुष्कृतम् ॥

te brahma punarāyānti na mohādacalā iva | athavā mantravadbrūyurmāṃsādīnāṃ yajuṣkṛtam

जो ऐसा करते हैं वे फिर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, मोह में जड़ बने हुओं की तरह नहीं। अथवा वे मन्त्र की तरह कहें कि मांस आदि यजुर्मन्त्रों से संस्कृत किए गए हैं।

श्लोक 48 (12.214.48)

स वै हेतुरनादाने शुद्धधर्मानुपालने । रजसा कामयुक्तानि कार्याण्यपि समाप्नुते ॥

sa vai heturanādāne śuddhadharmānupālane | rajasā kāmayuktāni kāryāṇyapi samāpnute

वही शुद्ध धर्म के पालन में उसे न लेने का कारण है। रजस् से वह कामना से युक्त कर्म करने लगता है,

श्लोक 49 (12.214.49)

अर्थयुक्तानि चात्यर्थं कामान्सर्वांश्च सेवते । तमसा लोभयुक्तानि क्रोधजानि च सेवते । हिंसाविहाराभिरतस्तन्द्रीनिद्रासमन्वितः ॥

arthayuktāni cātyarthaṃ kāmānsarvāṃśca sevate | tamasā lobhayuktāni krodhajāni ca sevate | hiṃsāvihārābhiratastandrīnidrāsamanvitaḥ

वह अर्थ से जुड़े कर्मों में अत्यधिक लगता है और सब कामनाओं का सेवन करता है। तमस् से वह लोभयुक्त और क्रोध से उपजे कर्मों में लगता है, हिंसा और विहार में रमता है, तन्द्रा और निद्रा से घिरा रहता है।

श्लोक 50 (12.214.50)

सत्वस्थः सात्विकान्भावाञ्शुद्धान्पश्यति संश्रितः । स देही विमलः श्रीमाञ्श्रद्धाविद्यासमन्वितः ॥

satvasthaḥ sātvikānbhāvāñśuddhānpaśyati saṃśritaḥ | sa dehī vimalaḥ śrīmāñśraddhāvidyāsamanvitaḥ

सत्त्व में स्थित होकर वह उन्हीं का आश्रय लेकर शुद्ध सात्त्विक भावों को देखता है। वह देहधारी निर्मल, श्रीमान्, श्रद्धा और विद्या से युक्त होता है।

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