शान्ति पर्व · अध्याय 215
कामना, जन्म और दुःख की शृंखला
गुरु बताते हैं कि विष्णु की माया से मोहित मनुष्य कामना से क्रोध, लोभ, मान, अहंकार और कर्म तक, फिर आसक्ति, शोक और जन्म के दुःख तक कैसे पहुँचता है। वे गर्भवास, यौवन, बुढ़ापे और अविवेकी पुरुषों पर स्त्रियों के खिंचाव का कठोर चित्र खींचते हैं। फिर समझाते हैं कि कर्म और तृष्णा से इन्द्रियाँ, प्राण और शरीर कैसे बनते हैं, कि दुःख पकड़ने से बढ़ता है और छोड़ने से मिटता है, और कि जो ज्ञानी इन्द्रियों की उत्पत्ति और लय को समझ लेता है, वह फिर जन्म नहीं लेता।
गुरुरुवाच
श्लोक 1 (12.215.1)
रजसा साध्यते मोहस्तमश्च भरतर्षभ । क्रोधलोभौ भयं दर्प एतेषां सादनाच्छुचिः ॥
rajasā sādhyate mohastamaśca bharatarṣabha | krodhalobhau bhayaṃ darpa eteṣāṃ sādanācchuciḥ
हे भरतश्रेष्ठ, रजस् से मोह उत्पन्न होता है, और तमस् से भी। क्रोध, लोभ, भय और दर्प का नाश करने से मनुष्य शुद्ध होता है।
श्लोक 2 (12.215.2)
परमं परमात्मानं देवमक्षयमव्ययम् । विष्णुमव्यक्तसंस्थानं विदुस्तं देवसत्तमम् ॥
paramaṃ paramātmānaṃ devamakṣayamavyayam | viṣṇumavyaktasaṃsthānaṃ vidustaṃ devasattamam
वे उस परमात्मा को, अक्षय और अविनाशी परम देव को, अव्यक्त में स्थित विष्णु को, देवों में सर्वश्रेष्ठ जानते हैं।
श्लोक 3 (12.215.3)
तस्य मायापिनद्धाङ्गा ज्ञानभ्रष्टा निराशिषः । मानवा ज्ञानसंमोहात्ततः कामं प्रयान्ति वै ॥
tasya māyāpinaddhāṅgā jñānabhraṣṭā nirāśiṣaḥ | mānavā jñānasaṃmohāttataḥ kāmaṃ prayānti vai
उसकी माया से लिपटे हुए, ज्ञान से भ्रष्ट और निराश मनुष्य, ज्ञान के मोह के कारण, फिर कामना की ओर बढ़ जाते हैं।
श्लोक 4 (12.215.4)
कामात्क्रोधमवाप्याथ लोभमोहौ च मानवाः । मानदर्पावहंकारमहंकारात्ततः क्रियाः ॥
kāmātkrodhamavāpyātha lobhamohau ca mānavāḥ | mānadarpāvahaṃkāramahaṃkārāttataḥ kriyāḥ
कामना से मनुष्य क्रोध को प्राप्त होते हैं, फिर लोभ और मोह को, मान और दर्प को, अहंकार को; और अहंकार से कर्मों को।
श्लोक 5 (12.215.5)
क्रियाभिः स्नेहसंबन्धः स्नेहाच्छोकमनन्तरम् । अथ दुःखसमारम्भा जराजन्मकृतक्षणाः ॥
kriyābhiḥ snehasaṃbandhaḥ snehācchokamanantaram | atha duḥkhasamārambhā jarājanmakṛtakṣaṇāḥ
कर्मों से स्नेह का बन्धन होता है और स्नेह से तुरन्त शोक। फिर दुःख आरम्भ होते हैं, जो जरा और जन्म को निमित्त बनाते हैं।
श्लोक 6 (12.215.6)
जन्मतो गर्भवासं तु शुक्रशोणितसंभवम् । पुरीषमूत्रविक्लेदं शोणितप्रभवाविलम् ॥
janmato garbhavāsaṃ tu śukraśoṇitasaṃbhavam | purīṣamūtravikledaṃ śoṇitaprabhavāvilam
फिर शुक्र और रक्त से उत्पन्न गर्भवास होता है, जो मल-मूत्र से भीगा और रक्त से उपजी गन्दगी से मलिन है।
श्लोक 7 (12.215.7)
तृष्णाभिभूतस्तैर्बद्धस्तानेवाभिपरिप्लवन् । तथा नरकगर्तस्थस्तृष्णारज्जुभिराचितः । पुण्यपापप्रणुन्नाङ्गो जायते स यथा कृमिः ॥
tṛṣṇābhibhūtastairbaddhastānevābhipariplavan | tathā narakagartasthastṛṣṇārajjubhirācitaḥ | puṇyapāpapraṇunnāṅgo jāyate sa yathā kṛmiḥ
तृष्णा से अभिभूत, उन्हीं से बँधा हुआ, वह उन्हीं में छटपटाता है; नरक के गड्ढे में पड़ा, तृष्णा की रस्सियों से कसा हुआ, पुण्य-पाप से धकेला जाकर वह कीड़े की तरह जन्म लेता है।
श्लोक 8 (12.215.8)
मशकैर्मत्कुणैर्दष्टस्तथा चित्रवधार्दितः । नानाव्याधिभिराकीर्णः कथंचिद्यौवनं गतः ॥
maśakairmatkuṇairdaṣṭastathā citravadhārditaḥ | nānāvyādhibhirākīrṇaḥ kathaṃcidyauvanaṃ gataḥ
मच्छरों और खटमलों से डसा हुआ, तरह-तरह की मार से पीड़ित, अनेक रोगों से घिरा हुआ वह जैसे-तैसे यौवन को पहुँचता है।
श्लोक 9 (12.215.9)
कूर्मोत्सृजति भूयश्च रज्जुः स्वस्वमुखेप्सया । योषितं नरकं गृह्य जन्मकर्मवशानुगः ॥
kūrmotsṛjati bhūyaśca rajjuḥ svasvamukhepsayā | yoṣitaṃ narakaṃ gṛhya janmakarmavaśānugaḥ
कछुए की तरह वह छोड़ता है, और फिर रस्सी बाँध लेती है, सब अपने-अपने सुख की चाह से; वह स्त्री को, जो नरक है, अपनाकर जन्म और कर्म के वश में चलता है।
श्लोक 10 (12.215.10)
पुरक्षेत्रनिमित्तं यद्दुःखं वक्तुं न शक्यते । कस्तत्र निन्दकश्चैव नरके पच्यते भृशम् ॥
purakṣetranimittaṃ yadduḥkhaṃ vaktuṃ na śakyate | kastatra nindakaścaiva narake pacyate bhṛśam
नगर और खेत के कारण जो दुःख होता है, वह कहा नहीं जा सकता। वहाँ निन्दा करने वाला कौन है? वह नरक में बुरी तरह पकाया जाता है।
श्लोक 11 (12.215.11)
वार्धक्यमनुलङ्घेत तत्र कर्मारभेत्पुनः । भगवान्संस्तुतः पश्चात्किं प्रवक्ष्यामि ते भृशम् ॥
vārdhakyamanulaṅgheta tatra karmārabhetpunaḥ | bhagavānsaṃstutaḥ paścātkiṃ pravakṣyāmi te bhṛśam
बुढ़ापा पार करके वह वहाँ फिर कर्म आरम्भ करता है; भगवान् की स्तुति तो बाद में होती है। मैं तुम्हें और विस्तार से क्या बताऊँ?
श्लोक 12 (12.215.12)
संसारतन्त्रवाहिन्यस्तत्र बुद्ध्येत योषितः । प्रकृत्याः क्षेत्रभूतास्ता नराः क्षेत्रज्ञलक्षणाः । तस्मादेवाविशेषेण नरोऽतीयाद्विशेषतः ॥
saṃsāratantravāhinyastatra buddhyeta yoṣitaḥ | prakṛtyāḥ kṣetrabhūtāstā narāḥ kṣetrajñalakṣaṇāḥ | tasmādevāviśeṣeṇa naro'tīyādviśeṣataḥ
संसार के तन्त्र को चलाने वाली स्त्रियों को वहाँ समझ लेना चाहिए। वे प्रकृति से क्षेत्ररूप हैं, और पुरुष क्षेत्रज्ञ के लक्षणों वाले हैं। इसलिए पुरुष को सामान्य रूप से और विशेष रूप से भी उनसे ऊपर उठना चाहिए।
श्लोक 13 (12.215.13)
कृत्या ह्येता घोररूपा मोहयन्त्यविचक्षणान् । रजस्यन्तर्हिता मूर्तिरिन्द्रियाणां सनातनी ॥
kṛtyā hyetā ghorarūpā mohayantyavicakṣaṇān | rajasyantarhitā mūrtirindriyāṇāṃ sanātanī
ये कृत्या की भाँति भयंकर रूप वाली हैं और अविवेकियों को मोहित करती हैं। इन्द्रियों की सनातन मूर्ति रजस् में छिपी हुई है।
श्लोक 14 (12.215.14)
तस्मात्तर्षात्मकाद्रागाद्बीजाज्जायन्ति जन्तवः । स्वदेहजानस्वसंज्ञान्यद्वदङ्गात्कृमींस्त्यजेत् । स्वसंज्ञानस्वकांस्तद्वत्सुतसंज्ञान्कृमींस्त्यजेत् ॥
tasmāttarṣātmakādrāgādbījājjāyanti jantavaḥ | svadehajānasvasaṃjñānyadvadaṅgātkṛmīṃstyajet | svasaṃjñānasvakāṃstadvatsutasaṃjñānkṛmīṃstyajet
इसलिए तृष्णामयी आसक्ति के बीज से प्राणी उत्पन्न होते हैं। जैसे अपने शरीर से उपजे, पर 'अपने' न कहे जाने वाले कीड़ों को अंग से झाड़ दिया जाता है, वैसे ही 'मेरे' कहे जाने वाले, पर वास्तव में अपने न होने वाले, पुत्र नामधारी कीड़ों को भी त्याग देना चाहिए।
श्लोक 15 (12.215.15)
शुक्रतो रसतश्चैव देहाज्जायन्ति जन्तवः । स्वभावात्कर्मयोगाद्वा तानुपेक्षेत बुद्धिमान् ॥
śukrato rasataścaiva dehājjāyanti jantavaḥ | svabhāvātkarmayogādvā tānupekṣeta buddhimān
शुक्र और रस से, देह से, प्राणी उत्पन्न होते हैं। स्वभाव से या कर्म के योग से — बुद्धिमान् को उनकी उपेक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 16 (12.215.16)
रजस्तमसि पर्यस्तं सत्वं च रजसि स्थितम् । ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं बुद्ध्यंहंकारलक्षणम् ॥
rajastamasi paryastaṃ satvaṃ ca rajasi sthitam | jñānādhiṣṭhānamajñānaṃ buddhyaṃhaṃkāralakṣaṇam
रजस् तमस् में गिरा हुआ है और सत्त्व रजस् में स्थित है; ज्ञान पर आधारित अज्ञान बुद्धि और अहंकार के लक्षणों वाला है।
श्लोक 17 (12.215.17)
तद्बीजं देहिनामाहुस्तद्बीजं जीवसंज्ञितम् । कर्मणा कालयुक्तेन संसारपरिवर्तनम् ॥
tadbījaṃ dehināmāhustadbījaṃ jīvasaṃjñitam | karmaṇā kālayuktena saṃsāraparivartanam
उसे देहधारियों का बीज कहा गया है, और उसी बीज को जीव कहते हैं; काल से युक्त कर्म के द्वारा संसार का चक्र घूमता रहता है।
श्लोक 18 (12.215.18)
रमत्ययं यथा स्वप्ने मनसा देहवानिव । कर्मगर्भैर्गुणैर्देही गर्भे तदुपलभ्यते ॥
ramatyayaṃ yathā svapne manasā dehavāniva | karmagarbhairguṇairdehī garbhe tadupalabhyate
जैसे स्वप्न में जीव मन से मानो शरीरधारी बनकर रमता है, वैसे ही कर्म को गर्भ में धारण करने वाले गुणों के साथ वह जीव गर्भ में पाया जाता है।
श्लोक 19 (12.215.19)
कर्मणा बीजभूतेन चोद्यते यद्यदिन्द्रियम् । जायते तदहंकाराद्रागयुक्तेन चेतसा ॥
karmaṇā bījabhūtena codyate yadyadindriyam | jāyate tadahaṃkārādrāgayuktena cetasā
बीजरूप कर्म से जो-जो इन्द्रिय प्रेरित होती है, वह राग से भरे चित्त और अहंकार से उत्पन्न होती है।
श्लोक 20 (12.215.20)
शब्दरागाच्छ्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः । रूपरागात्तथा चक्षुर्घ्राणं गन्धजिघृक्षया ॥
śabdarāgācchrotramasya jāyate bhāvitātmanaḥ | rūparāgāttathā cakṣurghrāṇaṃ gandhajighṛkṣayā
शब्द के प्रति राग से इस भावितात्मा के कान उत्पन्न होते हैं; रूप के प्रति राग से आँख; और गन्ध पाने की इच्छा से नाक।
श्लोक 21 (12.215.21)
संस्पर्शेभ्यस्तथा वायुः प्राणापानव्यपाश्रयः । व्यानोदानौ समानश्च पञ्चधा देहयापनम् ॥
saṃsparśebhyastathā vāyuḥ prāṇāpānavyapāśrayaḥ | vyānodānau samānaśca pañcadhā dehayāpanam
स्पर्शों से वायु उत्पन्न होती है, जो प्राण और अपान पर टिकी है; व्यान, उदान और समान के साथ वह शरीर का पाँच प्रकार का निर्वाह करती है।
श्लोक 22 (12.215.22)
संजातैर्जायते गात्रैः कर्मजैर्ब्रह्मणा वृतः । दुःखाद्यन्तैर्दुःखमध्यैर्नरः शारीरमानसैः ॥
saṃjātairjāyate gātraiḥ karmajairbrahmaṇā vṛtaḥ | duḥkhādyantairduḥkhamadhyairnaraḥ śārīramānasaiḥ
मनुष्य कर्म से उत्पन्न, बने हुए अंगों के साथ, ब्रह्म से आवृत होकर जन्म लेता है, और शारीरिक तथा मानसिक दुःखों से घिरा रहता है, जिनका आदि, मध्य और अन्त दुःख ही है।
श्लोक 23 (12.215.23)
दुःखं विद्यादुपादानादभिमानाच्च वर्धते । त्यागात्तेभ्यो निरोधः स्यान्निरोधज्ञो विमुच्यते ॥
duḥkhaṃ vidyādupādānādabhimānācca vardhate | tyāgāttebhyo nirodhaḥ syānnirodhajño vimucyate
जानो कि दुःख ग्रहण करने और अभिमान से बढ़ता है। उनके त्याग से उसका निरोध होता है, और निरोध को जानने वाला मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (12.215.24)
इन्द्रियाणां रजस्येव प्रलयप्रभवावुभौ । परीक्ष्य संचरेद्विद्वान्यथावच्छास्त्रचक्षुषा ॥
indriyāṇāṃ rajasyeva pralayaprabhavāvubhau | parīkṣya saṃcaredvidvānyathāvacchāstracakṣuṣā
इन्द्रियों की उत्पत्ति और लय दोनों रजस् में ही हैं। विद्वान् को चाहिए कि शास्त्ररूपी नेत्र से यथावत् परीक्षा करके चले।
श्लोक 25 (12.215.25)
ज्ञानेन्द्रियाणीन्द्रियार्थान्नोपसर्पन्त्यतर्षुलम् । ज्ञानैश्च करणैर्देही न देहं पुनरर्हति ॥
jñānendriyāṇīndriyārthānnopasarpantyatarṣulam | jñānaiśca karaṇairdehī na dehaṃ punararhati
तृष्णारहित पुरुष में ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों की ओर नहीं दौड़तीं; और ज्ञान के साधनों से देहधारी फिर देह के योग्य नहीं रहता।