शान्ति पर्व · अध्याय 217
संयम और मोक्ष पर गुरु का उपदेश
गुरु अपने शिष्य से कहता है कि इन्द्रिय-विषयों में आसक्त प्राणी डूबते हैं, जबकि अनासक्त परम गति पाते हैं। वह अहिंसा, सत्य और क्षमा के पालन, मधुर और सत्य वाणी तथा मन और बुद्धि के संयम का उपदेश देता है, और उसकी तुलना लुटेरों से बचकर कल्याणकारी मार्ग पर जाने वाले पथिक से करता है। परिमित आहार, एकान्त और योग से ज्ञान अग्नि की तरह प्रज्वलित होता है, और ज्ञान तथा अज्ञान को ठीक-ठीक जानने वाला मुक्त होकर अविनाशी ब्रह्म को पाता है।
गुरुरुवाच
श्लोक 1 (12.217.1)
दुरन्तेष्विन्द्रियार्थेषु सक्ताः सीदन्ति जन्तवः । ये त्वसक्ता महात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम् ॥
duranteṣvindriyārtheṣu saktāḥ sīdanti jantavaḥ | ye tvasaktā mahātmānaste yānti paramāṃ gatim
जिनका अन्त दुःखद है, उन इन्द्रिय-विषयों में आसक्त प्राणी डूबते हैं; किन्तु जो महात्मा अनासक्त हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 2 (12.217.2)
जन्ममृत्युजरादुःखैर्व्याधिभिर्मानसक्लमैः । दृष्ट्वैव संततं लोकं घटेन्मोक्षाय बुद्धिमान् ॥
janmamṛtyujarāduḥkhairvyādhibhirmānasaklamaiḥ | dṛṣṭvaiva saṃtataṃ lokaṃ ghaṭenmokṣāya buddhimān
जन्म, मृत्यु, जरा, दुःख, रोग और मानसिक पीड़ाओं से संसार को निरन्तर घिरा देखकर बुद्धिमान् पुरुष मोक्ष के लिए प्रयत्न करे।
श्लोक 3 (12.217.3)
वाङ्मनोभ्यां शरीरेण शुचिः स्यादनहंकृतः । प्रशान्तो ज्ञानवान्भिक्षुर्निरपेक्षश्चरेत्सुखम् ॥
vāṅmanobhyāṃ śarīreṇa śuciḥ syādanahaṃkṛtaḥ | praśānto jñānavānbhikṣurnirapekṣaścaretsukham
वाणी, मन और शरीर से शुद्ध, अहंकारहीन, शान्त और ज्ञानवान् भिक्षु किसी से अपेक्षा न रखता हुआ सुखपूर्वक विचरे।
श्लोक 4 (12.217.4)
वशा मोक्षवतां पाशास्तासां रूपं प्रदर्शकम् । दुर्ग्रहं पश्यमानोऽपि मन्यते मोहितस्तदा ॥
vaśā mokṣavatāṃ pāśāstāsāṃ rūpaṃ pradarśakam | durgrahaṃ paśyamāno'pi manyate mohitastadā
आसक्तियाँ मोक्ष चाहने वालों के लिए फन्दे हैं, और उनका बाहरी रूप ही उन्हें प्रकट करता है। उन्हें दुर्ग्रह देखते हुए भी मोहित मनुष्य तब उन्हें अपना ही मान बैठता है।
श्लोक 5 (12.217.5)
एवं पश्यन्तमात्मानमनुध्यातं हि बन्धुषु । अयथात्वेन जानामि भेदरूपेण संस्थितम् ॥
evaṃ paśyantamātmānamanudhyātaṃ hi bandhuṣu | ayathātvena jānāmi bhedarūpeṇa saṃsthitam
इस प्रकार देखने वाले और अपने बन्धुओं के चिन्तन में लगे हुए आत्मा को मैं मिथ्या रूप में, भेद के रूप में स्थित जानता हूँ।
श्लोक 6 (12.217.6)
अथवा मनसः सङ्गं पश्येद्भूतानुकम्पया । तत्राप्युपेक्षां कुर्वीत ज्ञात्वा कर्मफलं जगत् ॥
athavā manasaḥ saṅgaṃ paśyedbhūtānukampayā | tatrāpyupekṣāṃ kurvīta jñātvā karmaphalaṃ jagat
अथवा प्राणियों पर दया के कारण यदि मन में आसक्ति दिखाई दे, तो वहाँ भी जगत् को कर्मफल के अधीन जानकर वह उपेक्षा ही रखे।
श्लोक 7 (12.217.7)
यत्कृतं स्याच्छुभं कर्म पापं वा यदि वाऽश्नुते । तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद्वा बुद्धिकर्मभिः ॥
yatkṛtaṃ syācchubhaṃ karma pāpaṃ vā yadi vā'śnute | tasmācchubhāni karmāṇi kuryādvā buddhikarmabhiḥ
जो शुभ या अशुभ कर्म किया गया हो, उसका फल मनुष्य भोगता है; इसलिए बुद्धि और कर्म से शुभ कर्म ही करे।
श्लोक 8 (12.217.8)
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतेषु चार्जवम् । क्षमा चैवाप्रमादश्च यस्यैते स सुखी भवेत् ॥
ahiṃsā satyavacanaṃ sarvabhūteṣu cārjavam | kṣamā caivāpramādaśca yasyaite sa sukhī bhavet
अहिंसा, सत्य वचन, सब प्राणियों के प्रति सरलता, क्षमा और प्रमादहीनता, ये जिसमें हों, वह सुखी होता है।
श्लोक 9 (12.217.9)
अनक्षसाध्यं तद्ब्रह्म निर्मलं जगतः परम् । स्वात्मप्रकाशमग्राह्यमहेतुकमचञ्चलम् ॥
anakṣasādhyaṃ tadbrahma nirmalaṃ jagataḥ param | svātmaprakāśamagrāhyamahetukamacañcalam
वह ब्रह्म इन्द्रियों से साध्य नहीं है; वह निर्मल, जगत् से परे, स्वयंप्रकाश, अग्राह्य, कारणरहित और अचल है।
श्लोक 10 (12.217.10)
विवेकज्ञानवाचिस्थो ह्याशुरूपेण संस्थितः । वैकारिकात्प्रदृश्येते गैरिके मधुधारवत् ॥
vivekajñānavācistho hyāśurūpeṇa saṃsthitaḥ | vaikārikātpradṛśyete gairike madhudhāravat
विवेक, ज्ञान और वाणी में स्थित वह शीघ्र रूप से अवस्थित है; विकार से उत्पन्न होने वाले में वे दोनों गेरू पर शहद की धार के समान दिखाई देते हैं।
श्लोक 11 (12.217.11)
यश्चैनं परमं धर्मं सर्वभूतसुखावहम् । दुःखान्निः सरणं वेद तत्त्वज्ञः स सुखी भवेत् ॥
yaścainaṃ paramaṃ dharmaṃ sarvabhūtasukhāvaham | duḥkhānniḥ saraṇaṃ veda tattvajñaḥ sa sukhī bhavet
जो इस परम धर्म को जानता है, जो सब प्राणियों को सुख देने वाला और दुःख से निकलने का मार्ग है, वह तत्त्वज्ञ सुखी होता है।
श्लोक 12 (12.217.12)
तस्मात्समाहितं बुद्ध्या मनो भूतेषु धारयेत् । नापथ्यायेन्न स्पृहयेन्नाबद्धं चिन्तयेदसत् ॥
tasmātsamāhitaṃ buddhyā mano bhūteṣu dhārayet | nāpathyāyenna spṛhayennābaddhaṃ cintayedasat
इसलिए बुद्धि से समाहित मन को प्राणियों में लगाए रखे; न दूसरों का अनिष्ट सोचे, न लालसा करे, और न असत् तथा असम्बद्ध वस्तु का चिन्तन करे।
श्लोक 13 (12.217.13)
अथामोघप्रयत्नेन मनो ज्ञाने निवेशयेत् । सुवाचोऽथ प्रयोगेण मनोज्ञं संप्रवर्तते ॥
athāmoghaprayatnena mano jñāne niveśayet | suvāco'tha prayogeṇa manojñaṃ saṃpravartate
फिर अमोघ प्रयत्न से मन को ज्ञान में लगाए; और सुन्दर वाणी के अभ्यास से मन को प्रिय लगने वाली बात सिद्ध होती है।
श्लोक 14 (12.217.14)
विवेकयित्वा तद्वाक्यं धर्मसूक्ष्ममवेक्ष्य च । सत्यां वाचमहिंस्रां च वदेदनपवादिनीम् ॥
vivekayitvā tadvākyaṃ dharmasūkṣmamavekṣya ca | satyāṃ vācamahiṃsrāṃ ca vadedanapavādinīm
अपने वचन को विचारकर और धर्म की सूक्ष्मता को देखकर वह सत्य, हिंसारहित और निन्दारहित वाणी बोले।
श्लोक 15 (12.217.15)
कल्कापेतामपरुषामनृशंसामपैशुनीम् । ईदृगल्पं च वक्तव्यमविक्षिप्तेन चेतसा ॥
kalkāpetāmaparuṣāmanṛśaṃsāmapaiśunīm | īdṛgalpaṃ ca vaktavyamavikṣiptena cetasā
कपट से रहित, कठोरता से रहित, निर्दयता से रहित और चुगली से रहित; ऐसी वाणी, और वह भी थोड़ी, शान्त चित्त से बोलनी चाहिए।
श्लोक 16 (12.217.16)
वाक्यबन्धेन संरागविहाराद्व्याहरेद्यदि । बुद्ध्याऽप्यनुगृहीतेन मनसा कर्म तामसम् ॥
vākyabandhena saṃrāgavihārādvyāharedyadi | buddhyā'pyanugṛhītena manasā karma tāmasam
यदि कोई वाक्यों के बन्धन में पड़कर राग की क्रीड़ा से बोले, तो बुद्धि से सँभाले हुए मन के साथ भी वह कर्म तामस ही होता है।
श्लोक 17 (12.217.17)
रजोभूतैर्हि करणैः कर्मणि प्रतिपद्यते । स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन्नरकायोपपद्यते । तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद्धैर्यमात्मनः ॥
rajobhūtairhi karaṇaiḥ karmaṇi pratipadyate | sa duḥkhaṃ prāpya loke'sminnarakāyopapadyate | tasmānmanovākśarīrairācareddhairyamātmanaḥ
रजोगुण से रंगी हुई इन्द्रियों के द्वारा वह कर्म में प्रवृत्त होता है; इस लोक में दुःख पाकर वह नरक को प्राप्त होता है। इसलिए मन, वाणी और शरीर से वह अपने धैर्य का आचरण करे।
श्लोक 18 (12.217.18)
प्रकीर्ण एव भारो हि यद्वद्धार्येत दस्युभिः । प्रतिलोमां दिशं बुद्ध्वा संसारमबुधास्तथा । संसारमार्गमापन्नः प्रतिलोमं विवर्जयेत् ॥
prakīrṇa eva bhāro hi yadvaddhāryeta dasyubhiḥ | pratilomāṃ diśaṃ buddhvā saṃsāramabudhāstathā | saṃsāramārgamāpannaḥ pratilomaṃ vivarjayet
जैसे लुटेरे बिखरे हुए बोझ को उलटी दिशा में मोड़कर ले जाते हैं, वैसे ही अज्ञानी लोग संसार में चलते हैं। संसार के मार्ग में पड़कर मनुष्य उलटी दिशा से बचे।
श्लोक 19 (12.217.19)
तामेव च यथा दस्यून्हत्वा गच्छेच्छिवां दिशम् । तथा रजस्तमः कर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुयाच्छुभम् ॥
tāmeva ca yathā dasyūnhatvā gacchecchivāṃ diśam | tathā rajastamaḥ karmāṇyutsṛjya prāpnuyācchubham
और जैसे उन लुटेरों को मारकर मनुष्य कल्याणकारी दिशा में जाता है, वैसे ही रजोगुण और तमोगुण के कर्मों को छोड़कर वह शुभ को प्राप्त करता है।
श्लोक 20 (12.217.20)
निःसंदिग्धमनीहो वै मुक्तः सर्वपरिग्रहैः । विविक्तचारी लघ्वाशी तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥
niḥsaṃdigdhamanīho vai muktaḥ sarvaparigrahaiḥ | viviktacārī laghvāśī tapasvī niyatendriyaḥ
संशयरहित, कामनारहित, सब परिग्रहों से मुक्त, एकान्त में विचरने वाला, हल्का भोजन करने वाला, तपस्वी और संयमी इन्द्रियों वाला,
श्लोक 21 (12.217.21)
ज्ञानदग्धपरिक्लेशः प्रयोगरतिरात्मवान् । निष्प्रचारेण मनसा परं तदधिगच्छति ॥
jñānadagdhaparikleśaḥ prayogaratirātmavān | niṣpracāreṇa manasā paraṃ tadadhigacchati
ज्ञान से क्लेशों को जला देने वाला, योगाभ्यास में रत और आत्मवान् पुरुष स्थिर हुए मन से उस परम तत्त्व को प्राप्त करता है।
श्लोक 22 (12.217.22)
धृतिमानात्मवान्बुद्धिं निगृह्णीयादसंशयम् । मनो बुद्ध्या निगृह्णीयाद्विषयान्मनसाऽऽत्मनः । योजयित्वा मनस्तत्र निश्चलं परमात्मनि ॥
dhṛtimānātmavānbuddhiṃ nigṛhṇīyādasaṃśayam | mano buddhyā nigṛhṇīyādviṣayānmanasā''tmanaḥ | yojayitvā manastatra niścalaṃ paramātmani
धैर्यवान् और आत्मवान् पुरुष बुद्धि को निश्चय ही रोके; बुद्धि से मन को रोके और मन से अपने कल्याण के लिए विषयों को रोके। मन को वहाँ परमात्मा में निश्चल करके,
श्लोक 23 (12.217.23)
योगाभिसन्धियुक्तस्य ब्रह्म तत्संप्रकाशते । ऐकान्त्यं तदिदं विद्धि सर्ववस्त्वन्तरस्थितिः ॥
yogābhisandhiyuktasya brahma tatsaṃprakāśate | aikāntyaṃ tadidaṃ viddhi sarvavastvantarasthitiḥ
योग के संकल्प से युक्त उस पुरुष को वह ब्रह्म प्रकाशित होता है। इसे ऐकान्त्य जान, जो सब वस्तुओं के भीतर स्थित रहना है।
श्लोक 24 (12.217.24)
विशेषहीनं गृह्णन्ति विशेषां कारणात्मिकाम् । अथवा न प्रभुस्तत्र परमात्मनि वर्तितुम् । आगामित्तत्त्वं योगात्मा योगतन्त्रमुपक्रमेत् ॥
viśeṣahīnaṃ gṛhṇanti viśeṣāṃ kāraṇātmikām | athavā na prabhustatra paramātmani vartitum | āgāmittattvaṃ yogātmā yogatantramupakramet
वे विशेषरहित तत्त्व को और कारणरूप विशेषों को ग्रहण करते हैं। अथवा यदि कोई परमात्मा में टिकने में समर्थ न हो, तो योगात्मा पुरुष आगे प्राप्त होने वाले तत्त्व का ध्यान रखकर योग के साधनों का आरम्भ करे।
श्लोक 25 (12.217.25)
निगृहीतेन्द्रियस्यास्य कुर्वाणस्य मनो वशे । देवतास्ताः प्रकाशन्ते हृष्टा यान्ति तमीश्वरम् ॥
nigṛhītendriyasyāsya kurvāṇasya mano vaśe | devatāstāḥ prakāśante hṛṣṭā yānti tamīśvaram
जब इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं और वह मन को अपने अधीन कर लेता है, तब वे देवता उसे दिखाई देते हैं और प्रसन्न होकर उस ईश्वर के पास जाते हैं।
श्लोक 26 (12.217.26)
ताभिः संयुक्तमनसो ब्रह्म तत्संप्रकाशते । शनैश्चापगते सत्वे ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
tābhiḥ saṃyuktamanaso brahma tatsaṃprakāśate | śanaiścāpagate satve brahmabhūyāya kalpate
उनसे जुड़े हुए मन वाले को वह ब्रह्म प्रकाशित होता है; और धीरे-धीरे सत्त्व भी चला जाने पर वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
श्लोक 27 (12.217.27)
अथवा न प्रवर्तेत योगतन्त्रैरुपक्रमेत् । योगतन्त्रमयं तन्त्रं वृत्तिः स्यात्तत्तदाचरेत् ॥
athavā na pravarteta yogatantrairupakramet | yogatantramayaṃ tantraṃ vṛttiḥ syāttattadācaret
अथवा यदि वह इनमें प्रवृत्त न हो, तो योग के नियमों से आगे बढ़े; यह साधना योग के नियमों से बनी है, और जो आचरण उसकी जीवनचर्या के अनुकूल हो, उसी का वह पालन करे।
श्लोक 28 (12.217.28)
कणकुल्माषपिण्याकशाकयावकसक्तवः । तथा मूलफलं भैक्ष्यं पर्यायेणोपयोजयेत् ॥
kaṇakulmāṣapiṇyākaśākayāvakasaktavaḥ | tathā mūlaphalaṃ bhaikṣyaṃ paryāyeṇopayojayet
कण (टूटे अन्न), उबली दालें, खली, साग, यवागू और सत्तू, तथा कन्द-मूल, फल और भिक्षा का अन्न, इन्हें वह बारी-बारी से ग्रहण करे।
श्लोक 29 (12.217.29)
आहारनियमं चैव देशे काले च सात्विकः । तत्परीक्ष्यानुवर्तेत यत्प्रवृत्त्यनुवर्तकम् ॥
āhāraniyamaṃ caiva deśe kāle ca sātvikaḥ | tatparīkṣyānuvarteta yatpravṛttyanuvartakam
वह देश और काल के अनुसार सात्त्विक आहार का नियम भी रखे; उसकी परीक्षा करके वही अपनाए जो उसकी साधना का सहायक हो।
श्लोक 30 (12.217.30)
प्रवृत्तं नोपरुन्धेत शनैरग्निमिवेन्धयेत् । ज्ञानैधितं तथा ज्ञानमर्कवत्संप्रकाशते ॥
pravṛttaṃ noparundheta śanairagnimivendhayet | jñānaidhitaṃ tathā jñānamarkavatsaṃprakāśate
जो साधना आरम्भ हो चुकी है उसे रोके नहीं, बल्कि अग्नि की तरह धीरे-धीरे प्रज्वलित करे। ज्ञान से बढ़ा हुआ ज्ञान तब सूर्य के समान प्रकाशित होता है।
श्लोक 31 (12.217.31)
ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं त्रीँल्लोकानधितिष्ठति । विज्ञानानुगतं ज्ञानमज्ञानेनापकृष्यते ॥
jñānādhiṣṭhānamajñānaṃ trīm̐llokānadhitiṣṭhati | vijñānānugataṃ jñānamajñānenāpakṛṣyate
ज्ञान को आधार बनाने वाला अज्ञान तीनों लोकों पर अधिकार रखता है; विज्ञान के साथ चलने वाला ज्ञान अज्ञान के द्वारा खींच लिया जाता है।
श्लोक 32 (12.217.32)
पृथक्त्वात्संप्रयोगाच्च नासूयुर्वेद शाश्वतम् । स तयोरपवर्गज्ञो वीतरागो विमुच्यते ॥
pṛthaktvātsaṃprayogācca nāsūyurveda śāśvatam | sa tayorapavargajño vītarāgo vimucyate
जो असूया से रहित है, वह उन दोनों के पृथक्त्व और संयोग के द्वारा शाश्वत को जानता है; उन दोनों से छूटने की विधि जानने वाला वह वीतराग होकर मुक्त हो जाता है।
श्लोक 33 (12.217.33)
वयोतीतो जरामृत्यू जित्वा ब्रह्म सनातनम् । अमृतं तदवाप्नोति यत्तदक्षरमव्ययम् ॥
vayotīto jarāmṛtyū jitvā brahma sanātanam | amṛtaṃ tadavāpnoti yattadakṣaramavyayam
आयु से परे गया हुआ वह जरा और मृत्यु को जीतकर सनातन ब्रह्म को पाता है, उस अमृत, अक्षर और अव्यय पद को प्राप्त करता है।