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शान्ति पर्व · अध्याय 219

व्यक्त, अव्यक्त और क्षेत्रज्ञ

गुरु बताता है कि व्यक्त और अव्यक्त को जानना चाहिए, नारायण द्वारा उपदिष्ट निवृत्ति-मार्ग और प्रजापति द्वारा उपदिष्ट प्रवृत्ति-मार्ग को भी, और उस क्षेत्रज्ञ पुरुष को जो तीन वस्त्रों में लिपटे मनुष्य की तरह तीनों गुणों में ढका है। वह शरीर, वाणी और मन के तप, आहार के नियम और उन उपायों का वर्णन करता है जिनसे अलग-अलग साधक उपासना करके परम गति पाते हैं। तृष्णा वह डोरी है जो संसार को बाँधती है; जो प्रकृति, उसके विकारों और सनातन पुरुष को यथार्थ जानता है, वह मुक्त हो जाता है। भीष्म अन्त में कहते हैं कि नारायण ने यह उपदेश समस्त प्राणियों के हित के लिए दिया।

अध्याय 218अध्याय-सूचीअध्याय 220

गुरुरुवाच

श्लोक 1 (12.219.1)

न स वेद परं ब्रह्म यो न वेद चतुष्टयम् । व्यक्ताव्यक्तं च यत्तत्त्वं संप्रोक्तं परमर्षिणा ॥

na sa veda paraṃ brahma yo na veda catuṣṭayam | vyaktāvyaktaṃ ca yattattvaṃ saṃproktaṃ paramarṣiṇā

जो चतुष्टय को नहीं जानता, वह परम ब्रह्म को नहीं जानता: व्यक्त और अव्यक्त, और वह तत्त्व जो परमर्षि ने बताया है।

श्लोक 2 (12.219.2)

व्यक्तं मृत्युमुखं विद्यादव्यक्तममृतं पदम् । निवृत्तिलक्षणं धर्ममृषिर्नारायणोऽब्रवीत् ॥

vyaktaṃ mṛtyumukhaṃ vidyādavyaktamamṛtaṃ padam | nivṛttilakṣaṇaṃ dharmamṛṣirnārāyaṇo'bravīt

व्यक्त को मृत्यु का मुख जानो और अव्यक्त को अमृत पद। ऋषि नारायण ने निवृत्ति-लक्षण धर्म का उपदेश किया।

श्लोक 3 (12.219.3)

तत्रैवावस्थितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । निवृत्तिलक्षणं धर्ममव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम् ॥

tatraivāvasthitaṃ sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram | nivṛttilakṣaṇaṃ dharmamavyaktaṃ brahma śāśvatam

उसी में चर-अचर सहित सारा त्रिलोक स्थित है। निवृत्ति-लक्षण धर्म अव्यक्त, शाश्वत ब्रह्म है।

श्लोक 4 (12.219.4)

प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं प्रजापतिरथाब्रवीत् । प्रवृत्तिः पुनरावृत्तिर्निवृत्तिः परमा गतिः ॥

pravṛttilakṣaṇaṃ dharmaṃ prajāpatirathābravīt | pravṛttiḥ punarāvṛttirnivṛttiḥ paramā gatiḥ

फिर प्रजापति ने प्रवृत्ति-लक्षण धर्म का उपदेश किया। प्रवृत्ति पुनरावृत्ति है; निवृत्ति परम गति है।

श्लोक 5 (12.219.5)

तां गतिं परमामेति निवृत्तिपरमो मुनिः । ज्ञानतत्त्वपरो नित्यं शुभाशुभनिदर्शकः ॥

tāṃ gatiṃ paramāmeti nivṛttiparamo muniḥ | jñānatattvaparo nityaṃ śubhāśubhanidarśakaḥ

निवृत्ति को सर्वोपरि मानने वाला मुनि उस परम गति को प्राप्त होता है, जो सदा ज्ञान-तत्त्व में लगा रहता है और शुभ-अशुभ को पहचानता है।

श्लोक 6 (12.219.6)

तदेवमेतौ विज्ञेयावव्यक्तपुरुषावुभौ । अव्यक्तपुरुषाभ्यां तु यत्स्यादन्यन्महत्तरम् ॥

tadevametau vijñeyāvavyaktapuruṣāvubhau | avyaktapuruṣābhyāṃ tu yatsyādanyanmahattaram

इस प्रकार ये दोनों, अव्यक्त और पुरुष, जानने योग्य हैं; और अव्यक्त तथा पुरुष से भी जो कोई अन्य अधिक महान् है, वह भी।

श्लोक 7 (12.219.7)

तं विशेषमवेक्षेत विशेषेण विचक्षणः । अनाद्यन्तावुभावेतावलिङ्गौ चाप्युभावपि ॥

taṃ viśeṣamavekṣeta viśeṣeṇa vicakṣaṇaḥ | anādyantāvubhāvetāvaliṅgau cāpyubhāvapi

विवेकी पुरुष उस विशेष को विवेक से देखे। ये दोनों अनादि और अनन्त हैं, और दोनों ही लिङ्गरहित हैं।

श्लोक 8 (12.219.8)

उभौ नित्यावनुचरौ महद्भ्यश्च महत्तरौ । सामान्यमेतदुभयोरेवं ह्यन्यद्विशेषणम् ॥

ubhau nityāvanucarau mahadbhyaśca mahattarau | sāmānyametadubhayorevaṃ hyanyadviśeṣaṇam

दोनों नित्य हैं, सदा साथ चलने वाले हैं और महान् से भी महान् हैं। यह दोनों में समान है; शेष उनका विशेष लक्षण है।

श्लोक 9 (12.219.9)

प्रकृत्या सर्गधर्मिण्या तथा त्रिगुणसत्वया । विपरीतमतो विद्यात्क्षेत्रज्ञस्य स्वलक्षणम् ॥

prakṛtyā sargadharmiṇyā tathā triguṇasatvayā | viparītamato vidyātkṣetrajñasya svalakṣaṇam

प्रकृति सृष्टि-धर्म वाली और तीन गुणों से बनी है; इससे जानो कि क्षेत्रज्ञ का अपना लक्षण इसके विपरीत है।

श्लोक 10 (12.219.10)

प्रकृतेश्च विकाराणां द्रष्टारमगुणान्वितम् । क्षेत्रज्ञमाहुर्जीवं तु कर्तारं गुणसंवृतम् ॥

prakṛteśca vikārāṇāṃ draṣṭāramaguṇānvitam | kṣetrajñamāhurjīvaṃ tu kartāraṃ guṇasaṃvṛtam

प्रकृति और उसके विकारों के द्रष्टा, गुणरहित पुरुष को वे क्षेत्रज्ञ कहते हैं; किन्तु जीव गुणों से ढका हुआ कर्ता है।

श्लोक 11 (12.219.11)

अग्राह्यं येन जानन्ति तज्ज्ञानं दंशितश्च तत् । तेनैव दंशितो नित्यं न गुणः परिभूयते ॥

agrāhyaṃ yena jānanti tajjñānaṃ daṃśitaśca tat | tenaiva daṃśito nityaṃ na guṇaḥ paribhūyate

जिसके द्वारा वे अग्राह्य को जानते हैं, वह ज्ञान है, और वह कवच है; उसी से सदा कवचित रहने वाला गुण से पराभूत नहीं होता।

श्लोक 12 (12.219.12)

अग्राह्यौ पुरुषावेतावलिङ्गत्वादसङ्गिनौ । संयोगलक्षणोत्पत्तिः कर्मजा गृह्यते यथा ॥

agrāhyau puruṣāvetāvaliṅgatvādasaṅginau | saṃyogalakṣaṇotpattiḥ karmajā gṛhyate yathā

ये दोनों पुरुष अग्राह्य हैं और लिङ्गरहित होने से असंग हैं। संयोग-लक्षण वाली उत्पत्ति कर्म से उत्पन्न हुई मानी जाती है,

श्लोक 13 (12.219.13)

करणैः कर्मनिर्वृत्तैः कर्ता यद्यद्विचेष्टते । कीर्त्यते शब्दसंज्ञाभिः कोऽहमेषोप्यसाविति ॥

karaṇaiḥ karmanirvṛttaiḥ kartā yadyadviceṣṭate | kīrtyate śabdasaṃjñābhiḥ ko'hameṣopyasāviti

कर्म से बने साधनों द्वारा कर्ता जो-जो चेष्टा करता है, उसे शब्द और नामों से कहा जाता है: ‘मैं कौन हूँ? यह? वह?’

श्लोक 14 (12.219.14)

ममापि कायमिति च तदज्ञो नित्यसंवृतः । उष्णीषवान्यथा वस्त्रैस्त्रिभिर्भवति संवृतः । संवृतोऽयं तथा देही सत्त्वराजसतामसैः ॥

mamāpi kāyamiti ca tadajño nityasaṃvṛtaḥ | uṣṇīṣavānyathā vastraistribhirbhavati saṃvṛtaḥ | saṃvṛto'yaṃ tathā dehī sattvarājasatāmasaiḥ

और इस प्रकार सदा आवृत अज्ञानी सोचता है, ‘यह शरीर मेरा भी है।’ जैसे पगड़ी वाला मनुष्य तीन वस्त्रों से ढका होता है, वैसे ही यह देहधारी सत्त्व, रज और तम से ढका है।

श्लोक 15 (12.219.15)

भेदवस्तु त्वभेदेन जानाति स यदा पुमान् । तदा परं परात्माऽसौ भवत्येव निरञ्जनः ॥

bhedavastu tvabhedena jānāti sa yadā pumān | tadā paraṃ parātmā'sau bhavatyeva nirañjanaḥ

जब पुरुष भेद को अभेद रूप में जान लेता है, तब वह परम, परमात्मा और निर्मल हो जाता है।

श्लोक 16 (12.219.16)

क्रियायोगे च भेदाख्ये बहु संक्षिप्यते क्वचित् । वसुरुद्रगणाद्येषु स्वानुभोगेन भोगतः ॥

kriyāyoge ca bhedākhye bahu saṃkṣipyate kvacit | vasurudragaṇādyeṣu svānubhogena bhogataḥ

भेद नाम वाले क्रियायोग में कहीं-कहीं बहुत कुछ संक्षिप्त हो जाता है, वसुओं, रुद्रगणों आदि में, अपने-अपने अनुभव और भोग के कारण।

श्लोक 17 (12.219.17)

एवमेष परः सत्त्वो नानारूपेण संस्थितः । संक्षिप्तो दृश्यते पश्चादेकरूपेण विष्ठितः ॥

evameṣa paraḥ sattvo nānārūpeṇa saṃsthitaḥ | saṃkṣipto dṛśyate paścādekarūpeṇa viṣṭhitaḥ

इस प्रकार यह परम सत्ता अनेक रूपों में स्थित होकर बाद में संक्षिप्त होकर एक ही रूप में स्थित दिखाई देती है।

श्लोक 18 (12.219.18)

तस्माच्चतुष्टयं वेद्यमेतैर्हेतुभिरावृतम् । तथासंज्ञो ह्ययं सम्यगन्तकाले न मुह्यति । वायुर्विधो यथा भानुर्विप्रकाशं गमिष्यति ॥

tasmāccatuṣṭayaṃ vedyametairhetubhirāvṛtam | tathāsaṃjño hyayaṃ samyagantakāle na muhyati | vāyurvidho yathā bhānurviprakāśaṃ gamiṣyati

इसलिए इन कारणों से ढका हुआ चतुष्टय जानना चाहिए; इस प्रकार जानने वाला अन्त समय में मोहित नहीं होता। वह वायु और सूर्य की तरह पूर्ण प्रकाश को प्राप्त होगा।

श्लोक 19 (12.219.19)

श्रियं दिव्यामभिप्रेप्सुर्वर्ष्मवान्मनसा शुचिः । शारीरैर्नियमैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तपः ॥

śriyaṃ divyāmabhiprepsurvarṣmavānmanasā śuciḥ | śārīrairniyamairugraiścarenniṣkalmaṣaṃ tapaḥ

दिव्य श्री को पाना चाहने वाला, स्वस्थ शरीर और शुद्ध मन वाला पुरुष कठोर शारीरिक नियमों के साथ निर्मल तप करे।

श्लोक 20 (12.219.20)

त्रैलोक्यं तपसा व्याप्तमन्तर्भूतेन भास्वता । सूर्यश्च चन्द्रमाश्चैव भासतस्तपसा दिवि ॥

trailokyaṃ tapasā vyāptamantarbhūtena bhāsvatā | sūryaśca candramāścaiva bhāsatastapasā divi

तीनों लोक अपने भीतर रहने वाले तेजस्वी तप से व्याप्त हैं; सूर्य और चन्द्रमा भी तप से आकाश में चमकते हैं।

श्लोक 21 (12.219.21)

अन्यच्च धर्मसाम्यं यत्तपस्तत्कीर्त्यते पुनः । प्रकाशस्तपसो ज्ञानं लोके संशब्दितं तपः ॥

anyacca dharmasāmyaṃ yattapastatkīrtyate punaḥ | prakāśastapaso jñānaṃ loke saṃśabditaṃ tapaḥ

और धर्म के समान जो कुछ और है, वह भी फिर तप कहा जाता है। प्रकाश तप का है; लोक में ज्ञान ही तप कहलाता है।

श्लोक 22 (12.219.22)

रजस्तमोघ्नं यत्कर्म तपसस्तत्स्वलक्षणम् । त्रितयं ह्येतदाख्यातं यद्यस्माद्भासितुं पुनः ॥

rajastamoghnaṃ yatkarma tapasastatsvalakṣaṇam | tritayaṃ hyetadākhyātaṃ yadyasmādbhāsituṃ punaḥ

जो कर्म रजोगुण और तमोगुण का नाश करता है, वही तप का अपना लक्षण है। यह त्रिपुटी कही गई है, यदि इससे फिर प्रकाशित होना हो।

श्लोक 23 (12.219.23)

स्वभासा भासयंश्चापि चन्द्रमा ह्यत्र वर्तते । सूर्ययोगे तु यः सन्धिस्तपः सर्वं प्रदीप्यते ॥

svabhāsā bhāsayaṃścāpi candramā hyatra vartate | sūryayoge tu yaḥ sandhistapaḥ sarvaṃ pradīpyate

यहाँ चन्द्रमा अपनी ही आभा से प्रकाश करता हुआ स्थित है; और सूर्य के योग में जो सन्धि है, उसमें समस्त तप प्रदीप्त हो उठता है।

श्लोक 24 (12.219.24)

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते । वाङ्मनोनियमः सम्यङ्मानसं तप उच्यते ॥

brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate | vāṅmanoniyamaḥ samyaṅmānasaṃ tapa ucyate

ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप कहे जाते हैं; वाणी और मन का सम्यक् नियमन मानसिक तप कहा जाता है।

श्लोक 25 (12.219.25)

विधिज्ञेभ्यो द्विजातिभ्यो ग्राह्यमन्नं विशिष्यते । आहारनियमेनास्य पाप्मा शाम्यति राजसः ॥

vidhijñebhyo dvijātibhyo grāhyamannaṃ viśiṣyate | āhāraniyamenāsya pāpmā śāmyati rājasaḥ

विधि जानने वाले द्विजों से मिला हुआ अन्न ग्रहण करने के लिए श्रेष्ठ है; आहार के नियम से उसका राजस पाप शान्त होता है।

श्लोक 26 (12.219.26)

वैमनस्यं च विषये यान्त्यस्य करणानि च । तस्मात्तन्मात्रमादद्याद्यावदत्र प्रयोजनम् ॥

vaimanasyaṃ ca viṣaye yāntyasya karaṇāni ca | tasmāttanmātramādadyādyāvadatra prayojanam

उसकी इन्द्रियाँ विषयों से विरक्त हो जाती हैं। इसलिए जितने से यहाँ प्रयोजन सधे, उतना ही वह ग्रहण करे।

श्लोक 27 (12.219.27)

अन्तकाले बलोत्कर्षाच्छनैः कुर्यादनातुरः । एवं युक्तेन मनसा ज्ञानं यदुपपद्यते ॥

antakāle balotkarṣācchanaiḥ kuryādanāturaḥ | evaṃ yuktena manasā jñānaṃ yadupapadyate

अन्त समय में बल की पूर्णता से धीरे-धीरे, निराकुल होकर आगे बढ़े; इस प्रकार युक्त मन से ज्ञान उत्पन्न होता है।

श्लोक 28 (12.219.28)

रजोवर्ज्यो ह्ययं देही देहवाञ्छब्दवांश्चरेत् । कार्यैरव्याहतमतिर्वैराग्यात्प्रकृतौ स्थितः ॥

rajovarjyo hyayaṃ dehī dehavāñchabdavāṃścaret | kāryairavyāhatamatirvairāgyātprakṛtau sthitaḥ

यह देहधारी रजोगुण से बचता हुआ शरीर और वाणी के साथ विचरे; कार्यों से अव्याहत बुद्धि वाला और वैराग्य से प्रकृति में स्थित रहे।

श्लोक 29 (12.219.29)

आ देहादप्रमादाच्च देहान्ताद्विप्रमुच्यते । हेतुयुक्तः सदा सर्गो भूतानां प्रलयस्तथा ॥

ā dehādapramādācca dehāntādvipramucyate | hetuyuktaḥ sadā sargo bhūtānāṃ pralayastathā

शरीर के रहते अप्रमाद से वह शरीर के अन्त में मुक्त हो जाता है। सृष्टि सदा कारण से युक्त है, और प्राणियों का प्रलय भी वैसा ही है।

श्लोक 30 (12.219.30)

परप्रत्ययसर्गे तु नियमो नातिवर्तते । एवं तत्प्रभवां प्रज्ञामासते ये विपर्यये ॥

parapratyayasarge tu niyamo nātivartate | evaṃ tatprabhavāṃ prajñāmāsate ye viparyaye

दूसरे के कारण से होने वाली सृष्टि में नियम का उल्लंघन नहीं होता। इसी प्रकार जो विपरीत अवस्था में रहते हैं, वे उससे उत्पन्न ज्ञान में स्थित रहते हैं।

श्लोक 31 (12.219.31)

धृत्या देहान्धारयन्तो बुद्धिसंक्षिप्तचेतसः । स्थानेभ्यो ध्वंसमानाश्च सूक्ष्मत्वात्तदुपासते ॥

dhṛtyā dehāndhārayanto buddhisaṃkṣiptacetasaḥ | sthānebhyo dhvaṃsamānāśca sūkṣmatvāttadupāsate

धैर्य से शरीरों को धारण करते हुए, बुद्धि से संक्षिप्त चित्त वाले और अपने स्थानों से हटते हुए, वे उसकी सूक्ष्मता के कारण उसकी उपासना करते हैं।

श्लोक 32 (12.219.32)

यथागमं च तत्सर्वं बुद्ध्या तन्नैव बुद्ध्यते । देहान्तं कश्चिदन्वास्ते भावितात्मा निराश्रयः ॥

yathāgamaṃ ca tatsarvaṃ buddhyā tannaiva buddhyate | dehāntaṃ kaścidanvāste bhāvitātmā nirāśrayaḥ

वह सब परम्परा के अनुसार केवल बुद्धि से नहीं समझा जाता; फिर भी कोई शुद्ध आत्मा वाला, निराश्रय पुरुष देह के अन्त तक उसका सहारा लिए रहता है।

श्लोक 33 (12.219.33)

युक्तो धारणया कश्चित्सतः केचिदुपासते । अभ्यस्यन्ति परं देवं विद्यासंशब्दिताक्षरम् ॥

yukto dhāraṇayā kaścitsataḥ kecidupāsate | abhyasyanti paraṃ devaṃ vidyāsaṃśabditākṣaram

कोई धारणा से युक्त होकर सत् की उपासना करते हैं; कुछ विद्या नाम से पुकारे जाने वाले अक्षर परम देव का अभ्यास करते हैं।

श्लोक 34 (12.219.34)

अन्तकाले ह्युपासन्ते तपसा दग्धकिल्विषाः । सर्व एते महात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम् ॥

antakāle hyupāsante tapasā dagdhakilviṣāḥ | sarva ete mahātmāno gacchanti paramāṃ gatim

अन्त समय में तप से पाप जला चुके वे उपासना करते हैं। ये सब महात्मा परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 35 (12.219.35)

सूक्ष्मं विशेषणं तेषामवेक्षेच्छास्त्रचक्षुषा । देहं तु परमं विद्याद्विमुक्तमपरिग्रहम् ॥

sūkṣmaṃ viśeṣaṇaṃ teṣāmavekṣecchāstracakṣuṣā | dehaṃ tu paramaṃ vidyādvimuktamaparigraham

उनके सूक्ष्म भेद को शास्त्र-चक्षु से देखे। देह को वह अन्तिम, मुक्त और परिग्रहरहित समझे।

श्लोक 36 (12.219.36)

अन्तरिक्षादन्यतरं धारणासक्तमानसम् । मर्त्यलोकाद्विमुच्यन्ते विद्यासंसक्तचेतसः ॥

antarikṣādanyataraṃ dhāraṇāsaktamānasam | martyalokādvimucyante vidyāsaṃsaktacetasaḥ

धारणा में लगा हुआ मन अन्तरिक्ष से भिन्न स्थान को जाता है; विद्या में आसक्त चित्त वाले मर्त्यलोक से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 37 (12.219.37)

ब्रह्मभूता विरजसस्ततो यान्ति परां गतिम् । एवमेकायनं धर्ममाहुर्वेदविदो जनाः ॥

brahmabhūtā virajasastato yānti parāṃ gatim | evamekāyanaṃ dharmamāhurvedavido janāḥ

ब्रह्मभूत और रजोगुण से रहित होकर वे तब परम गति को जाते हैं। इसी को वेद जानने वाले लोग एकायन धर्म कहते हैं।

श्लोक 38 (12.219.38)

यथाज्ञानमुपासन्तः सर्वे यान्ति परां गतिम् । कषायवर्जितं ज्ञानं तेषामुत्पद्यतेऽमलम् । यान्ति तेऽपि परमाँल्लोकान्विशुध्यन्ति यथाबलं ॥

yathājñānamupāsantaḥ sarve yānti parāṃ gatim | kaṣāyavarjitaṃ jñānaṃ teṣāmutpadyate'malam | yānti te'pi paramām̐llokānviśudhyanti yathābalaṃ

अपने-अपने ज्ञान के अनुसार उपासना करते हुए सभी परम गति को प्राप्त होते हैं। उनमें कषायरहित, निर्मल ज्ञान उत्पन्न होता है; वे भी परम लोकों को जाते हैं और अपने बल के अनुसार शुद्ध होते हैं।

श्लोक 39 (12.219.39)

भगवन्तमजं दिव्यं विष्णुमव्यक्तसंज्ञितम् । भावेन यान्ति शुद्धा ये ज्ञानतृप्ता निराशिषः ॥

bhagavantamajaṃ divyaṃ viṣṇumavyaktasaṃjñitam | bhāvena yānti śuddhā ye jñānatṛptā nirāśiṣaḥ

जो शुद्ध हो गए हैं, ज्ञान से तृप्त और कामनारहित हैं, वे भाव से अव्यक्त नाम वाले भगवान्, अजन्मा, दिव्य विष्णु को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 40 (12.219.40)

ज्ञात्वाऽऽत्मस्थं हरिं चैव न निवर्तन्ति तेऽव्ययाः । प्राप्य तत्परमं स्थानमोदन्तेऽक्षरमव्ययम् ॥

jñātvā''tmasthaṃ hariṃ caiva na nivartanti te'vyayāḥ | prāpya tatparamaṃ sthānamodante'kṣaramavyayam

आत्मा में स्थित हरि को भी जानकर वे अविनाशी लौटते नहीं। उस परम स्थान को पाकर वे अक्षर, अव्यय में आनन्द करते हैं।

श्लोक 41 (12.219.41)

एतावदेतद्विज्ञानमेतदस्ति च नास्ति च । तृष्णाबद्धं जगत्सर्वं चक्रवत्परिवर्तते ॥

etāvadetadvijñānametadasti ca nāsti ca | tṛṣṇābaddhaṃ jagatsarvaṃ cakravatparivartate

विज्ञान इतना ही है: वह है भी और नहीं भी। तृष्णा से बँधा सारा संसार चक्र की तरह घूमता है।

श्लोक 42 (12.219.42)

विसतन्तुर्यथैवायमन्तस्थः सर्वतो बिसे । तृष्णातन्तुरनाद्यन्तस्तथा देहगतः सदा ॥

visatanturyathaivāyamantasthaḥ sarvato bise | tṛṣṇātanturanādyantastathā dehagataḥ sadā

जैसे कमलनाल के भीतर रेशा चारों ओर फैला रहता है, वैसे ही आदि-अन्त से रहित तृष्णा का तन्तु सदा देह में व्याप्त रहता है।

श्लोक 43 (12.219.43)

सूच्या सूत्रं यथा वस्त्रे संसारयति वायकः । तद्वत्संसारसूत्रं हि तृष्णासूच्या निबद्ध्यते ॥

sūcyā sūtraṃ yathā vastre saṃsārayati vāyakaḥ | tadvatsaṃsārasūtraṃ hi tṛṣṇāsūcyā nibaddhyate

जैसे जुलाहा सुई से वस्त्र में सूत पिरोता है, वैसे ही संसार का सूत्र तृष्णा की सुई से बँधा रहता है।

श्लोक 44 (12.219.44)

इतस्ततः समाहृत्य रूपं निर्वर्तयिष्यति । विकारं प्रकृतिं चैव पुरुषं च सनातनम् ॥

itastataḥ samāhṛtya rūpaṃ nirvartayiṣyati | vikāraṃ prakṛtiṃ caiva puruṣaṃ ca sanātanam

यहाँ-वहाँ से समेटकर वह रूप की रचना करेगा। विकार, प्रकृति और सनातन पुरुष को,

श्लोक 45 (12.219.45)

यो यथावद्विजानाति स वितृष्णो विमुच्यते । याति नित्यं स सद्भावमात्मनो वै महद्भुवम् ॥

yo yathāvadvijānāti sa vitṛṣṇo vimucyate | yāti nityaṃ sa sadbhāvamātmano vai mahadbhuvam

जो उन्हें यथार्थ रूप में जानता है, वह तृष्णारहित होकर मुक्त हो जाता है। वह सदा आत्मा की सद्भाव-रूप महान् भूमि को प्राप्त होता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 46 (12.219.46)

प्रकाशं भगवानेतदृषिर्नारायणोऽमृतम् । भूतानामनुकम्पार्थं जगाद जगतो हितम् ॥

prakāśaṃ bhagavānetadṛṣirnārāyaṇo'mṛtam | bhūtānāmanukampārthaṃ jagāda jagato hitam

भगवान् ऋषि नारायण ने प्राणियों पर दया करके जगत् के हित के लिए यह स्पष्ट, अमृतरूप उपदेश कहा।

अध्याय 218अध्याय-सूचीअध्याय 220