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शान्ति पर्व · अध्याय 220

पञ्चशिख द्वारा जनक को सौ आचार्यों से विमुख करना

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मिथिला के राजा जनक को मोक्ष कैसे मिला, और भीष्म यह पुरानी कथा सुनाते हैं। जनक के घर सौ आचार्य अलग-अलग मतों के थे, पर कपिल के अनुयायी मुनि पञ्चशिख मिथिला आए, तर्कों से उन्हें निरुत्तर किया और जनक को साङ्ख्य का वैराग्यमार्ग सिखाया। वे नास्तिकों के आत्मा और पुनर्जन्म सम्बन्धी तर्क रखते हैं, दिखाते हैं कि चंचल तर्क और कामनाओं की दौड़ प्राणियों को दुःख में छोड़ देती है, और राजा विस्मित होकर फिर उनसे प्रश्न करने लगते हैं।

अध्याय 219अध्याय-सूचीअध्याय 221

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.220.1)

केन वृत्तेन वृत्तज्ञो जनको मिथिलाधिपः । जगाम मोक्षं धर्मज्ञो भोगानुत्सृज्य बुद्धिमान् ॥

kena vṛttena vṛttajño janako mithilādhipaḥ | jagāma mokṣaṃ dharmajño bhogānutsṛjya buddhimān

धर्म और सदाचार को जानने वाले, बुद्धिमान मिथिलापति जनक किस आचरण से भोगों को त्यागकर मोक्ष को प्राप्त हुए?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.220.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । येन वृत्तेन धर्मज्ञः स जगाम महत्सुखम् ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yena vṛttena dharmajñaḥ sa jagāma mahatsukham

इस विषय में लोग इस प्राचीन इतिहास को सुनाते हैं कि उन धर्मज्ञ ने किस आचरण से महान् सुख प्राप्त किया।

श्लोक 3 (12.220.3)

जनको जनदेवस्तु मिथिलायां जनाधिप । और्ध्वदेहिकधर्माणामासीद्युक्तो विचिन्तने ॥

janako janadevastu mithilāyāṃ janādhipa | aurdhvadehikadharmāṇāmāsīdyukto vicintane

हे नरेश्वर! मिथिला के राजा जनक, जिन्हें जनदेव भी कहते थे, देह के पश्चात् की गति से जुड़े धर्मों के चिन्तन में लगे रहते थे।

श्लोक 4 (12.220.4)

तस्य स्म शतमाचार्या वसन्ति सततं गृहे । दर्शयन्तः पृथग्धर्मान्नानापाषण्डवादिनः ॥

tasya sma śatamācāryā vasanti satataṃ gṛhe | darśayantaḥ pṛthagdharmānnānāpāṣaṇḍavādinaḥ

उनके घर में सदा सौ आचार्य रहते थे, जो अनेक पाषण्ड मतों के प्रवक्ता थे और अलग-अलग धर्म दिखलाते थे।

श्लोक 5 (12.220.5)

स तेषां प्रेत्यभावेन प्रेत्य जातौ विनिश्चये । आगमस्थः स भूयिष्ठमात्मतत्त्वे न तुष्यति ॥

sa teṣāṃ pretyabhāvena pretya jātau viniścaye | āgamasthaḥ sa bhūyiṣṭhamātmatattve na tuṣyati

मृत्यु के बाद की स्थिति, मरकर फिर जन्म लेने और उसके निश्चय के विषय में शास्त्र पर टिके रहने वाले वे उन आचार्यों के बताए आत्मतत्त्व से प्रायः सन्तुष्ट नहीं होते थे।

श्लोक 6 (12.220.6)

तत्र पञ्चशिखो नाम कापिलेयो महामुनिः । परिधावन्महीं कृत्स्नां जगाम मिथिलामपि ॥

tatra pañcaśikho nāma kāpileyo mahāmuniḥ | paridhāvanmahīṃ kṛtsnāṃ jagāma mithilāmapi

तब कपिला के पुत्र महामुनि पञ्चशिख सारी पृथ्वी में घूमते हुए मिथिला में भी आ पहुँचे।

श्लोक 7 (12.220.7)

सर्वसंन्यासधर्माणां तत्त्वज्ञाननिश्चये । सुपर्यवसितार्थश्च निर्द्वन्द्वो नष्टसंशयः ॥

sarvasaṃnyāsadharmāṇāṃ tattvajñānaniścaye | suparyavasitārthaśca nirdvandvo naṣṭasaṃśayaḥ

वे संन्यास के सब धर्मों के विषय में तत्त्वज्ञान का निश्चय करके अपना प्रयोजन पूरी तरह पा चुके थे; वे द्वन्द्वों से मुक्त थे और उनके सब संशय नष्ट हो चुके थे।

श्लोक 8 (12.220.8)

ऋषीणामाहुरेकं यं कामादवसितं नृषु । शाश्वतं सुखमत्यन्तमन्विच्छन् स सुदुर्लभम् ॥

ṛṣīṇāmāhurekaṃ yaṃ kāmādavasitaṃ nṛṣu | śāśvataṃ sukhamatyantamanvicchan sa sudurlabham

ऋषियों में वे ऐसे अकेले कहे जाते थे जो अपनी इच्छा से मनुष्यों के बीच रहे, और जो शाश्वत, परम तथा अत्यन्त दुर्लभ सुख की खोज में थे।

श्लोक 9 (12.220.9)

यमाहुः कपिलं साङ्ख्याः परमर्षिं प्रजापतिम् । समेत्य तेन रूपेण विस्मापयति हि स्वयम् ॥

yamāhuḥ kapilaṃ sāṅkhyāḥ paramarṣiṃ prajāpatim | sametya tena rūpeṇa vismāpayati hi svayam

साङ्ख्यवादी जिन्हें परम ऋषि और प्रजापति कपिल कहते हैं, उन्हीं के रूप में लोगों से मिलकर वे स्वयं सबको विस्मित कर देते थे।

श्लोक 10 (12.220.10)

आसुरेः प्रथमं शिष्यं यमाहुश्चिरजीविनम् । पञ्चस्रोतसि यः सत्रमास्ते वर्षसहस्रिकम् ॥

āsureḥ prathamaṃ śiṣyaṃ yamāhuścirajīvinam | pañcasrotasi yaḥ satramāste varṣasahasrikam

कहते हैं कि वे आसुरि के प्रथम शिष्य थे और चिरंजीवी थे; आसुरि पञ्चस्रोत में हज़ार वर्ष तक चलने वाले सत्र में बैठे रहे।

श्लोक 11 (12.220.11)

तमासीनं समागम्य कापिलं मण्डलं महत् । पञ्चस्रोतसि निष्णातः पञ्चरात्रविशारदः ॥

tamāsīnaṃ samāgamya kāpilaṃ maṇḍalaṃ mahat | pañcasrotasi niṣṇātaḥ pañcarātraviśāradaḥ

कपिल के अनुयायियों की उस विशाल मण्डली में बैठे हुए आसुरि के पास जाकर, जो पञ्चस्रोत में निपुण और पाञ्चरात्र के विशारद थे,

श्लोक 12 (12.220.12)

पञ्चज्ञः पञ्चकृत्पञ्चगुणः पञ्चशिखः स्मृतः । पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थं न्यवेदयत् ॥

pañcajñaḥ pañcakṛtpañcaguṇaḥ pañcaśikhaḥ smṛtaḥ | puruṣāvasthamavyaktaṃ paramārthaṃ nyavedayat

पञ्चज्ञ, पञ्चकृत् और पञ्चगुण कहे जाने वाले पञ्चशिख ने उन्हें परम तत्त्व बताया, अर्थात् पुरुष में स्थित अव्यक्त का स्वरूप।

श्लोक 13 (12.220.13)

इष्ट्वा सत्रेण संपृष्टो भूयश्च तपसाऽऽसुरिः । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्व्यक्तिं बुबुधे देवदर्शनात् ॥

iṣṭvā satreṇa saṃpṛṣṭo bhūyaśca tapasā''suriḥ | kṣetrakṣetrajñayorvyaktiṃ bubudhe devadarśanāt

उस सत्र से यज्ञ करके, प्रश्न पूछे जाने पर और फिर तप के बल से आसुरि ने दिव्य दर्शन द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को प्रत्यक्ष जाना।

श्लोक 14 (12.220.14)

यत्तदेकाक्षरं ब्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते । बोधायनपरान्विप्रानृषिभावमुपागतः । आसुरिर्मण्डले तस्मिन्प्रतिपेदे तदव्ययम् ॥

yattadekākṣaraṃ brahma nānārūpaṃ pradṛśyate | bodhāyanaparānviprānṛṣibhāvamupāgataḥ | āsurirmaṇḍale tasminpratipede tadavyayam

बोधायन के अनुयायी ब्राह्मणों के बीच ऋषिभाव को प्राप्त हुए आसुरि ने उस सभा में उस अविनाशी एकाक्षर ब्रह्म को जाना, जो अनेक रूपों में दिखाई देता है।

श्लोक 15 (12.220.15)

तस्य पञ्चशिखः शिष्यो मानुष्याः पयसा भृतः । ब्राह्मणी कपिला नाम काचिदासीत्कुटुम्बिनी ॥

tasya pañcaśikhaḥ śiṣyo mānuṣyāḥ payasā bhṛtaḥ | brāhmaṇī kapilā nāma kācidāsītkuṭumbinī

पञ्चशिख उनके शिष्य थे, जिनका पोषण एक मानवी के दूध से हुआ था। कपिला नाम की कोई ब्राह्मणी गृहस्थिन थी।

श्लोक 16 (12.220.16)

तस्याः पुत्रत्वमागम्य स्त्रियाः स पिबति स्तनौ । ततः स कापिलेयत्वं लेभे बुद्धिं च नैष्ठिकीम् ॥

tasyāḥ putratvamāgamya striyāḥ sa pibati stanau | tataḥ sa kāpileyatvaṃ lebhe buddhiṃ ca naiṣṭhikīm

उस स्त्री का पुत्र बनकर उन्होंने उसके स्तनों का पान किया; इसी से उन्होंने कापिलेय नाम पाया और निष्ठा से स्थिर बुद्धि भी प्राप्त की।

श्लोक 17 (12.220.17)

एतन्मे भगवानाह कापिलेयस्य संभवम् । तस्य तत्कापिलेयत्वं सर्ववित्त्वमनुत्तमम् ॥

etanme bhagavānāha kāpileyasya saṃbhavam | tasya tatkāpileyatvaṃ sarvavittvamanuttamam

पूज्य मुनि ने मुझे कापिलेय की उत्पत्ति, उनके कपिला-पुत्र होने और उनकी सर्वोत्तम सर्वज्ञता के विषय में यह बताया था।

श्लोक 18 (12.220.18)

सामान्यं जनकं ज्ञात्वा धर्मज्ञानामनुत्तमम् । उपेत्य शतमाचार्यान्मोहयामास हेतुभिः ॥

sāmānyaṃ janakaṃ jñātvā dharmajñānāmanuttamam | upetya śatamācāryānmohayāmāsa hetubhiḥ

जनक को अपने सब आचार्यों के प्रति समभाव रखने वाला और धर्मज्ञों में श्रेष्ठ जानकर वे उन सौ आचार्यों के पास गए और तर्कों से उन्हें भ्रमित कर दिया।

श्लोक 19 (12.220.19)

निराकरिष्णुस्तान्सर्वांस्तेषां हेतुगुणान्बहून् । श्रावयामास मतिमान्मुनिः पञ्चशिखो नृप ॥

nirākariṣṇustānsarvāṃsteṣāṃ hetuguṇānbahūn | śrāvayāmāsa matimānmuniḥ pañcaśikho nṛpa

हे राजन्! उन सबका खण्डन करना चाहते हुए बुद्धिमान मुनि पञ्चशिख ने उन्हें तर्कों के अनेक गुण सुनाए।

श्लोक 20 (12.220.20)

जनकस्त्वभिसंरक्तः कापिलेयानुदर्शनात् । उत्सृज्य शतमाचार्यान्पृष्ठतोऽनुजगाम तम् ॥

janakastvabhisaṃraktaḥ kāpileyānudarśanāt | utsṛjya śatamācāryānpṛṣṭhato'nujagāma tam

परन्तु कापिलेय को देखकर जनक उनके प्रति गहरे अनुराग से भर गए और सौ आचार्यों को छोड़कर उनके पीछे चल पड़े।

श्लोक 21 (12.220.21)

तस्मै परमकल्याय प्रणताय च धर्मतः । अब्रवीत्परमं मोक्षं यतः साङ्ख्यं विधीयते ॥

tasmai paramakalyāya praṇatāya ca dharmataḥ | abravītparamaṃ mokṣaṃ yataḥ sāṅkhyaṃ vidhīyate

परम सुयोग्य और धर्मपूर्वक प्रणत जनक से उन्होंने उस परम मोक्ष का उपदेश किया जिसके लिए साङ्ख्य का विधान है।

श्लोक 22 (12.220.22)

जातिनिर्वेदमुक्त्वा स कर्मनिर्वेदमब्रवीत् । कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमब्रवीत् ॥

jātinirvedamuktvā sa karmanirvedamabravīt | karmanirvedamuktvā ca sarvanirvedamabravīt

जन्म से वैराग्य बताकर उन्होंने कर्म से वैराग्य बताया, और कर्म से वैराग्य बताकर सबसे वैराग्य का उपदेश दिया।

श्लोक 23 (12.220.23)

यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणां च फलोदयः । तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥

yadarthaṃ dharmasaṃsargaḥ karmaṇāṃ ca phalodayaḥ | tamanāśvāsikaṃ mohaṃ vināśi calamadhruvam

जिसके लिए धर्म-कर्मों में लगना होता है और कर्मों का फल उत्पन्न होता है, उस सबको उन्होंने मोह कहा, जो भरोसे के योग्य नहीं, नाशवान्, चंचल और अस्थिर है।

श्लोक 24 (12.220.24)

दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके । आगमात्परमस्तीति ब्रुवन्नपि पराजितः ॥

dṛśyamāne vināśe ca pratyakṣe lokasākṣike | āgamātparamastīti bruvannapi parājitaḥ

जब संसार की आँखों के सामने नाश प्रत्यक्ष दीखता है, तब शास्त्र के आधार पर यह कहने वाला कि इससे परे कुछ है, फिर भी हार जाता है।

श्लोक 25 (12.220.25)

आत्मना ह्यात्मनो नित्यं क्लेशमृत्युजरामयम् । आत्मानं मन्यते मोहात्तदसम्यक्परं मतम् ॥

ātmanā hyātmano nityaṃ kleśamṛtyujarāmayam | ātmānaṃ manyate mohāttadasamyakparaṃ matam

मोह के कारण मनुष्य अपने ही आत्मा को सदा क्लेश, मृत्यु, जरा और रोग से ग्रस्त मान लेता है; यह मान्यता ठीक नहीं मानी गई है।

श्लोक 26 (12.220.26)

अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते । अजरोऽयममृत्युश्च राजाऽसौ मन्यते तथा ॥

atha cedevamapyasti yalloke nopapadyate | ajaro'yamamṛtyuśca rājā'sau manyate tathā

और यदि ऐसा कुछ हो भी जो लोक में सिद्ध नहीं होता, तो यह राजा भी अपने को वैसा ही अजर और अमर मानता है।

श्लोक 27 (12.220.27)

अस्ति नास्तीति चाप्येतत्तस्मिन्नसति लक्षणे । किमधिष्ठाय तद्ब्रूयाल्लोकयात्राविनिश्चयम् ॥

asti nāstīti cāpyetattasminnasati lakṣaṇe | kimadhiṣṭhāya tadbrūyāllokayātrāviniścayam

"है" और "नहीं है", जब इसका निर्णय करने वाला कोई लक्षण ही नहीं है, तो किस आधार पर कोई लोकव्यवहार का निश्चय बता सकता है?

श्लोक 28 (12.220.28)

प्रत्यक्षं ह्येतयोर्मूलं कृतान्तैतिह्ययोरपि । प्रत्यक्षेणागमो भिन्नः कृतान्तो वा न कश्चन ॥

pratyakṣaṃ hyetayormūlaṃ kṛtāntaitihyayorapi | pratyakṣeṇāgamo bhinnaḥ kṛtānto vā na kaścana

सिद्धान्त और परम्परा, दोनों का मूल प्रत्यक्ष ही है; प्रत्यक्ष से अलग न कोई शास्त्र है और न कोई सिद्धान्त।

श्लोक 29 (12.220.29)

यत्रतत्रानुमानेऽस्मिन्कृतं भावयतोऽपि च । नान्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्मृतः ॥

yatratatrānumāne'sminkṛtaṃ bhāvayato'pi ca | nānyo jīvaḥ śarīrasya nāstikānāṃ mate smṛtaḥ

ऐसे किसी भी अनुमान में, चाहे सिद्ध बात पर कितना भी विचार किया जाए, नास्तिकों के मत में शरीर से अलग कोई जीव नहीं माना गया है।

श्लोक 30 (12.220.30)

रेतो वटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिः स्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ॥

reto vaṭakaṇīkāyāṃ ghṛtapākādhivāsanam | jātiḥ smṛtirayaskāntaḥ sūryakānto'mbubhakṣaṇam

वीर्य; वट के बीज में बीज-तत्त्व; घी में पकाने से उसका रस रम जाना; जन्म; स्मृति; चुम्बक; सूर्यकान्त मणि; पानी पीना;

श्लोक 31 (12.220.31)

प्रेत्य भूताप्ययश्चैव देवताभ्युपयाचनम् । मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चयः ॥

pretya bhūtāpyayaścaiva devatābhyupayācanam | mṛte karmanivṛttiśca pramāṇamiti niścayaḥ

मरने पर भूतों का लय हो जाना; देवताओं से प्रार्थना; और मृतक में कर्म का रुक जाना; इन्हें वे प्रमाण ठहराते हैं।

श्लोक 32 (12.220.32)

न त्वेते हेतवः सन्ति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः । अमूर्तस्य हि मूर्तेन सामान्यं नोपपद्यते ॥

na tvete hetavaḥ santi ye kecinmūrtisaṃsthitāḥ | amūrtasya hi mūrtena sāmānyaṃ nopapadyate

परन्तु रूप में टिके ये कोई भी हेतु ठीक नहीं बैठते; क्योंकि अमूर्त की मूर्त के साथ समानता हो ही नहीं सकती।

श्लोक 33 (12.220.33)

अविद्याकर्मचेष्टानां केचिदाहुः पुनर्भवे । कारणं लोभमोहौ तु दोषाणां च निषेवणम् ॥

avidyākarmaceṣṭānāṃ kecidāhuḥ punarbhave | kāraṇaṃ lobhamohau tu doṣāṇāṃ ca niṣevaṇam

कुछ लोग कहते हैं कि पुनर्जन्म का कारण अविद्या, कर्म और चेष्टा है; इनका कारण लोभ, मोह और दोषों का सेवन है।

श्लोक 34 (12.220.34)

अविद्यां क्षेत्रमाहुर्हि कर्मबीजं तथा कृतम् । तृष्णासंजननं स्नेह एष तेषां पुनर्भवः ॥

avidyāṃ kṣetramāhurhi karmabījaṃ tathā kṛtam | tṛṣṇāsaṃjananaṃ sneha eṣa teṣāṃ punarbhavaḥ

वे अविद्या को खेत, किए हुए कर्म को बीज और तृष्णा को जन्म देने वाले स्नेह को नमी कहते हैं; यही उनके लिए पुनर्जन्म है।

श्लोक 35 (12.220.35)

तस्मिन्मूढे च जग्धे च देहे मरणधर्मिणि । अन्योऽसौ जायते प्रेतस्तदाहुस्तत्वमक्षयम् ॥

tasminmūḍhe ca jagdhe ca dehe maraṇadharmiṇi | anyo'sau jāyate pretastadāhustatvamakṣayam

जब मरणधर्मी शरीर चेतनाहीन होकर भस्म हो जाता है, तब कोई दूसरा प्रेत उत्पन्न होता है; इसी को वे अविनाशी तत्त्व कहते हैं।

श्लोक 36 (12.220.36)

यदा स्वरूपतश्चान्यो जातितः श्रुतितोऽर्थतः । कथमस्मिन्स इत्येवं संबोधः स्यादसंहितः ॥

yadā svarūpataścānyo jātitaḥ śrutito'rthataḥ | kathamasminsa ityevaṃ saṃbodhaḥ syādasaṃhitaḥ

जब वह रूप, जन्म, शास्त्र-ज्ञान और प्रयोजन में अलग है, तो "यह वही है" ऐसी असंगत पहचान उसमें कैसे हो सकती है?

श्लोक 37 (12.220.37)

एवं सति च का प्रीतिर्दानविद्यातपोबलैः । यद्यदाचरितं कर्म सर्वमन्यत्प्रपद्यते ॥

evaṃ sati ca kā prītirdānavidyātapobalaiḥ | yadyadācaritaṃ karma sarvamanyatprapadyate

ऐसा हो तो दान, विद्या, तप और बल से क्या सुख, जब एक का किया सारा कर्म दूसरे को मिलता है?

श्लोक 38 (12.220.38)

यदि ह्ययमिहैवान्यैः प्राकृतैर्दुःखितो भवेत् । सुखितो दुःखितैर्वाऽपि दृश्यो ह्यस्यविनिर्णयः ॥

yadi hyayamihaivānyaiḥ prākṛtairduḥkhito bhavet | sukhito duḥkhitairvā'pi dṛśyo hyasyavinirṇayaḥ

यदि यहीं दूसरे साधारण जनों द्वारा कोई दुखी किया जाता, या सुखी किया जाता, या दुखियों के कारण दुखी होता, तो उसका निर्णय सामने दिखाई दे जाता।

श्लोक 39 (12.220.39)

यदा हि मुसलैर्हन्युः शरीरं न पुनर्भवेत् । पृथग्ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपपद्यते ॥

yadā hi musalairhanyuḥ śarīraṃ na punarbhavet | pṛthagjñānaṃ yadanyacca yenaitannopapadyate

जब लोग मूसलों से शरीर को कूट डालते हैं, तो वह फिर जीवित नहीं होता; और वह अलग दूसरा ज्ञान, जिससे यह समझाया जा सके, सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 40 (12.220.40)

ऋतुसंवत्सरौ तिथ्यः शीतोष्णेऽथ प्रियाप्रिये । यथाऽतीता न दृश्यन्ते तादृशः सत्वसंक्षयः ॥

ṛtusaṃvatsarau tithyaḥ śītoṣṇe'tha priyāpriye | yathā'tītā na dṛśyante tādṛśaḥ satvasaṃkṣayaḥ

ऋतुएँ, वर्ष, तिथियाँ, सर्दी-गर्मी, प्रिय और अप्रिय जैसे बीतने पर फिर नहीं दीखते, वैसा ही प्राणी का क्षय है।

श्लोक 41 (12.220.41)

जरयाऽभिपरीतस्य मृत्युना न विनाशिना । दुर्बलं दुर्बलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति ॥

jarayā'bhiparītasya mṛtyunā na vināśinā | durbalaṃ durbalaṃ pūrvaṃ gṛhasyeva vinaśyati

बुढ़ापे और कभी न मिटने वाली मृत्यु से घिरे शरीर में, घर की तरह, पहले सबसे दुर्बल अंग ही नष्ट होता है।

श्लोक 42 (12.220.42)

इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च । आनुपूर्व्या विनश्यन्ति स्वं धातुमुपयान्ति च ॥

indriyāṇi mano vāyuḥ śoṇitaṃ māṃsamasthi ca | ānupūrvyā vinaśyanti svaṃ dhātumupayānti ca

इन्द्रियाँ, मन, प्राण, रक्त, मांस और हड्डी क्रम से नष्ट होती हैं और अपने-अपने तत्त्व में जा मिलती हैं।

श्लोक 43 (12.220.43)

लोकयात्राविधानं च दानधर्मफलागमः । तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः ॥

lokayātrāvidhānaṃ ca dānadharmaphalāgamaḥ | tadarthaṃ vedaśabdāśca vyavahārāśca laukikāḥ

लोकयात्रा की व्यवस्था, दान और धर्म के फल की प्राप्ति, और उसी के लिए वेद के शब्द तथा लौकिक व्यवहार;

श्लोक 44 (12.220.44)

इति सम्यङ्मनस्येते बहवः सन्ति हेतवः । एतदासीन्ममास्तीति न कश्चित्प्रतिपद्यते ॥

iti samyaṅmanasyete bahavaḥ santi hetavaḥ | etadāsīnmamāstīti na kaścitpratipadyate

इस प्रकार ठीक विचार करने वाले के मन में बहुत से हेतु रहते हैं; फिर भी "यह मेरा था, यह मेरा है", इसे कोई सचमुच नहीं समझ पाता।

श्लोक 45 (12.220.45)

तेषां विमृशतामेवं तत्तत्समभिधावताम् । क्वचिन्निविशते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् ॥

teṣāṃ vimṛśatāmevaṃ tattatsamabhidhāvatām | kvacinniviśate buddhistatra jīryati vṛkṣavat

इस तरह विचार करते हुए, इधर-उधर दौड़ते हुए उनकी बुद्धि कहीं टिक जाती है, और वहीं वृक्ष की तरह जीर्ण हो जाती है।

श्लोक 46 (12.220.46)

एवमर्थैरनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजन्तवः । आगमैरपकृष्यन्ते हस्तिपैर्हस्तिनो यथा ॥

evamarthairanarthaiśca duḥkhitāḥ sarvajantavaḥ | āgamairapakṛṣyante hastipairhastino yathā

इस प्रकार लाभ और हानि दोनों से दुखी सब प्राणी शास्त्रों द्वारा वैसे ही खींचे जाते हैं जैसे हाथी महावतों द्वारा।

श्लोक 47 (12.220.47)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

भोगों के उपभोग से कामना कभी शान्त नहीं होती; घी से अग्नि की तरह वह और भी बढ़ती ही जाती है।

श्लोक 48 (12.220.48)

अर्थांस्तथाऽत्यन्तसुखावहांश्च । लिप्सन्त एते बहवो विशुष्काः । महत्तरं दुःखमनुप्रपन्ना । हित्वा सुखं मृत्युवशं प्रयान्ति ॥

arthāṃstathā'tyantasukhāvahāṃśca | lipsanta ete bahavo viśuṣkāḥ | mahattaraṃ duḥkhamanuprapannā | hitvā sukhaṃ mṛtyuvaśaṃ prayānti

अत्यन्त सुख देने वाली वस्तुओं को चाहते हुए बहुत से लोग सूख जाते हैं; और उससे भी बड़े दुःख में पड़कर सुख को छोड़ मृत्यु के वश में चले जाते हैं।

श्लोक 49 (12.220.49)

विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य । किं बन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च । विहाय यो गच्छति सर्वमेव । क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥

vināśino hyadhruvajīvitasya | kiṃ bandhubhirmitraparigrahaiśca | vihāya yo gacchati sarvameva | kṣaṇena gatvā na nivartate ca

नाशवान् और अस्थिर जीवन वाले के लिए बन्धुओं और मित्रों के संग्रह से क्या लाभ? वह सब कुछ छोड़कर क्षण भर में चला जाता है और जाकर लौटता नहीं।

श्लोक 50 (12.220.50)

भूव्योमतोयानलवायवोऽपि । सदा शरीरं प्रतिपालयन्ति । इतीदमालक्ष्य रतिः कुतो भवे । द्विनाशिनो ह्यस्य न कर्म विद्यते ॥

bhūvyomatoyānalavāyavo'pi | sadā śarīraṃ pratipālayanti | itīdamālakṣya ratiḥ kuto bhave | dvināśino hyasya na karma vidyate

पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु भी सदा शरीर को सँभाले रखते हैं। यह देखकर उसमें रति कैसे हो? क्योंकि नाशवान् का कोई कर्म स्थिर नहीं रहता।

श्लोक 51 (12.220.51)

इदमनुपधिवाक्यमच्छलं । परमनिरामयमात्मसाक्षिकम् । नरपतिरभिवीक्ष्य विस्मितः । पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे ॥

idamanupadhivākyamacchalaṃ | paramanirāmayamātmasākṣikam | narapatirabhivīkṣya vismitaḥ | punaranuyoktumidaṃ pracakrame

निष्कपट, छलरहित, परम निर्दोष और आत्मा के साक्षी वाले इस वचन को देखकर राजा विस्मित हुए और फिर उनसे प्रश्न करने लगे।

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