शान्ति पर्व · अध्याय 221
पञ्चशिख का जनक को आत्मतत्त्व का उपदेश (दाक्षिणात्य पाठ का अध्याय)
यह अध्याय केवल एक दक्षिणी पाण्डुलिपि में मिलता है और समीक्षित संस्करण में केवल जोड़े हुए अंश के रूप में। जनक पञ्चशिख से पूछते हैं कि यदि चेतना मृत्यु के बाद ही उत्पन्न होती है तो ज्ञान या अज्ञान क्या करेगा। पञ्चशिख उत्तर देते हैं कि चेतन आत्मा है और शास्त्र से सिद्ध है; वे एक परमात्मा, ज्ञान के मूल वेद, वेद से बाहर रहने वालों की दुर्गति और मोक्ष की साधना का वर्णन करते हैं, और फिर लौकिक हेतुओं, अनन्त कामना और नाशवान् शरीर वाले श्लोक दोहराते हैं। राजा विस्मित होकर फिर प्रश्न करने लगते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.221.1)
जनको नरदेवस्तु ज्ञापितः परमर्षिणा । पुनरेवानुपप्रच्छ सांपराये भवाभवौ ॥
janako naradevastu jñāpitaḥ paramarṣiṇā | punarevānupapraccha sāṃparāye bhavābhavau
नरदेव जनक ने महर्षि से इस प्रकार बोध पाकर परलोक में होने और न होने के विषय में फिर प्रश्न किया।
जनक उवाच
श्लोक 2 (12.221.2)
भगवन्यदिदं प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित् । एवं सति किमज्ञानं ज्ञानं वा किं करिष्यति ॥
bhagavanyadidaṃ pretya saṃjñā bhavati kasyacit | evaṃ sati kimajñānaṃ jñānaṃ vā kiṃ kariṣyati
"भगवन्! यदि मरने के बाद किसी को संज्ञा होती है, तो ऐसी दशा में अज्ञान या ज्ञान क्या करेगा?
श्लोक 3 (12.221.3)
विवादादेव सिद्धोऽसौ कारणस्येव वेदना ॥
vivādādeva siddho'sau kāraṇasyeva vedanā
यह तो केवल विवाद से ही सिद्ध होता है, जैसे कारण का अनुभव।"
पञ्चशिख उवाच
श्लोक 4 (12.221.4)
चेतनो विद्यते ह्यत्र हैतुकं च मनोगतम् ॥
cetano vidyate hyatra haitukaṃ ca manogatam
यहाँ चेतन अवश्य है; यह तर्क से सिद्ध होता है, और वह मन में स्थित है।
श्लोक 5 (12.221.5)
आगमादेव सिद्धोऽसौ स्वतः सिद्ध इति श्रुतिः । वर्तते पृथगन्योन्यं न ह्यपाश्रित्य कर्मसु ॥
āgamādeva siddho'sau svataḥ siddha iti śrutiḥ | vartate pṛthaganyonyaṃ na hyapāśritya karmasu
वह शास्त्र से ही सिद्ध है; श्रुति कहती है कि वह स्वतःसिद्ध है। प्रत्येक अलग-अलग काम करता है, अपने कर्मों में दूसरे का आश्रय लेकर नहीं।
श्लोक 6 (12.221.6)
चेतनो ह्यंशवस्तत्र स्वमूर्तं धारयन्त्यतः । स्वभावं पौरुषं कर्म ह्यात्मानं तमुपाश्रितम् । तमाश्रित्य प्रवर्तन्ते देहिनो देहबन्धनाः ॥
cetano hyaṃśavastatra svamūrtaṃ dhārayantyataḥ | svabhāvaṃ pauruṣaṃ karma hyātmānaṃ tamupāśritam | tamāśritya pravartante dehino dehabandhanāḥ
चेतन के अंश वहाँ अपना रूप धारण करते हैं; इसी से स्वभाव, पुरुषार्थ और कर्म उसी आत्मा के आश्रित हैं। उसी का आश्रय लेकर देह से बँधे देहधारी प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक 7 (12.221.7)
गुणज्ञानमभिज्ञानं तस्य लिङ्गानुशब्दयत् । पृथिव्यादिषु भूतेषु तत्तदाहुर्निदर्शनम् ॥
guṇajñānamabhijñānaṃ tasya liṅgānuśabdayat | pṛthivyādiṣu bhūteṣu tattadāhurnidarśanam
गुणों का ज्ञान ही उसकी पहचान है; उसके चिह्न शब्द के अनुरूप बोलते-से हैं। पृथ्वी आदि भूतों में वे उसी-उसी बात को उसका उदाहरण बताते हैं।
श्लोक 8 (12.221.8)
आत्माऽसौ वर्तते भिन्नस्तत्रतत्र समन्वितः । परमात्मा तथैवैको देवेऽस्मिन्निति वै श्रुतिः ॥
ātmā'sau vartate bhinnastatratatra samanvitaḥ | paramātmā tathaivaiko deve'sminniti vai śrutiḥ
यह आत्मा भिन्न-भिन्न रूप में वर्तमान है और जगह-जगह व्याप्त है; फिर भी परमात्मा इस देव में एक ही है, ऐसी श्रुति है।
श्लोक 9 (12.221.9)
आकाशं वायुरूष्मा च स्नेहो यच्चापि पार्थिवम् । यथा त्रिधा प्रवर्तन्ते तथाऽसौ पुरुषः स्मृतः ॥
ākāśaṃ vāyurūṣmā ca sneho yaccāpi pārthivam | yathā tridhā pravartante tathā'sau puruṣaḥ smṛtaḥ
जैसे आकाश, वायु, ऊष्मा, स्नेह और जो कुछ पार्थिव है, ये तीन प्रकार से प्रवृत्त होते हैं, वैसे ही वह पुरुष माना गया है।
श्लोक 10 (12.221.10)
पयस्यन्तर्हितं यद्वत्तद्वद्व्याप्तं महात्मकम् । पूर्वं नैश्वर्ययोगेन तस्मादेतन्न शेषवान् ॥
payasyantarhitaṃ yadvattadvadvyāptaṃ mahātmakam | pūrvaṃ naiśvaryayogena tasmādetanna śeṣavān
जैसे दूध में कुछ छिपा रहता है, वैसे ही वह महान् स्वरूप सबमें व्याप्त है; पहले अनैश्वर्य के योग से, इसलिए यह शेषवाला नहीं है।
श्लोक 11 (12.221.11)
शब्दाः कालः क्रिया देहो ममैकस्यैव कल्पना । स्वभावं तन्मयं त्वेदं मायारूपं तु भेदवत् ॥
śabdāḥ kālaḥ kriyā deho mamaikasyaiva kalpanā | svabhāvaṃ tanmayaṃ tvedaṃ māyārūpaṃ tu bhedavat
शब्द, काल, क्रिया और देह, ये मुझ एक की ही कल्पना हैं। यह स्वभाव उसी से बना है, पर माया का रूप भेद वाला है।
श्लोक 12 (12.221.12)
नानाख्यं परं शुद्धं निर्विकल्पं परात्मकम् । लिङ्गादि देवमध्यास्ते ज्ञानं देवस्य तत्तथा ॥
nānākhyaṃ paraṃ śuddhaṃ nirvikalpaṃ parātmakam | liṅgādi devamadhyāste jñānaṃ devasya tattathā
परम तत्त्व अनेक नामों वाला होकर भी शुद्ध, विकल्परहित और परमात्मस्वरूप है; वह लिङ्ग आदि से आरम्भ करके देव में अधिष्ठित है, और देव का ज्ञान भी वैसा ही है।
श्लोक 13 (12.221.13)
चिन्मयोऽयं हि नादाख्यः शब्दश्चासौ मनो महान् । गतिमानुत संधत्ते वर्णमत्तत्पदान्वितम् ॥
cinmayo'yaṃ hi nādākhyaḥ śabdaścāsau mano mahān | gatimānuta saṃdhatte varṇamattatpadānvitam
यह चिन्मय है, नाद कहलाता है, और यही शब्द तथा महान् मन है; गतिशील होकर यह वर्णों वाले, पदों से युक्त रूप को जोड़ता है।
श्लोक 14 (12.221.14)
कायो नास्ति च तेषां वै अवकाशस्तथा परम् । एतेनोढा इति चाख्याताः सर्वे ते धर्मदूषकाः ॥
kāyo nāsti ca teṣāṃ vai avakāśastathā param | etenoḍhā iti cākhyātāḥ sarve te dharmadūṣakāḥ
उनके लिए न काया है, न उससे परे कोई अवकाश; इसीलिए वे "ऊढ" कहे गए हैं, और वे सब धर्म को दूषित करने वाले हैं।
श्लोक 15 (12.221.15)
अवन्धनमविज्ञानाज्ज्ञानं तद्ध्रुवमव्ययम् । नानाभेदविकल्पने येषामात्मा स्मृतः सदा ॥
avandhanamavijñānājjñānaṃ taddhruvamavyayam | nānābhedavikalpane yeṣāmātmā smṛtaḥ sadā
विशेष ज्ञान के अभाव से बन्धन का न होना; वह ज्ञान दृढ़ और अविनाशी है। जो सदा आत्मा को अनेक भेद और विकल्पों से कल्पित करते हैं,
श्लोक 16 (12.221.16)
प्रकृतेरपरस्तेषां बहवोऽप्यात्मवादिनः । विरोधो ह्यात्मसन्मायां न तेषां सिद्ध एव हि । अन्यदा च गृहीतै… वेदबाह्यास्ततः स्मृताः ॥
prakṛteraparasteṣāṃ bahavo'pyātmavādinaḥ | virodho hyātmasanmāyāṃ na teṣāṃ siddha eva hi | anyadā ca gṛhītai… vedabāhyāstataḥ smṛtāḥ
उनके मत में आत्मा को मानने वाले वे बहुत-से लोग प्रकृति से अलग हैं; सत् आत्मा और माया के विषय में उनका विरोध सिद्ध ही नहीं होता। और दूसरे समय में ग्रहण करके ... इसी से वे वेद से बाहर कहे गए हैं।
श्लोक 17 (12.221.17)
एकानेकात्मकं तेषां प्रतिषेधो हि भेदनुत् । तस्माद्वेदस्य हृदयमद्वैध्यमिति विद्धि तत् ॥
ekānekātmakaṃ teṣāṃ pratiṣedho hi bhedanut | tasmādvedasya hṛdayamadvaidhyamiti viddhi tat
उनका एक और अनेक रूप वाला मत खण्डित हो जाता है, क्योंकि खण्डन भेद को मिटा देता है; इसलिए जान लो कि वेद का हृदय अद्वैत है।
श्लोक 18 (12.221.18)
वेदादृष्टेरयं लोकः सर्वार्थेषु प्रवर्तते । तस्माच्च स्मृतयो जाताः सेतिहासाः पृथग्विधाः ॥
vedādṛṣṭerayaṃ lokaḥ sarvārtheṣu pravartate | tasmācca smṛtayo jātāḥ setihāsāḥ pṛthagvidhāḥ
वेद में जो देखा गया है उसके अनुसार यह लोक सब कामों में प्रवृत्त होता है; उसी से इतिहासों सहित अनेक प्रकार की स्मृतियाँ उत्पन्न हुईं।
श्लोक 19 (12.221.19)
न यन्न साध्यं तद्ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत् । इन्द्रियाणि च भूरीणि परा च प्रकृतिर्मनः ॥
na yanna sādhyaṃ tadbrahma nādimadhyaṃ na cāntavat | indriyāṇi ca bhūrīṇi parā ca prakṛtirmanaḥ
ब्रह्म वह है जो अप्राप्य नहीं है; उसका न आदि है, न मध्य, न अन्त। इन्द्रियाँ अनेक हैं, और परा प्रकृति तथा मन भी,
श्लोक 20 (12.221.20)
आत्मा च परमः शुद्धः प्रोक्तोऽसौ परमः पुमान् ॥
ātmā ca paramaḥ śuddhaḥ prokto'sau paramaḥ pumān
और परम शुद्ध आत्मा को ही परम पुरुष कहा गया है।
श्लोक 21 (12.221.21)
उत्पत्तिलक्षणं चेदं विपरीतमथोभयोः । यो वेत्ति प्रकृतिं नित्यं तथा चैवात्मनस्तु ताम् । प्रदहत्येष कर्माख्यं दावोद्भूत इवानलः ॥
utpattilakṣaṇaṃ cedaṃ viparītamathobhayoḥ | yo vetti prakṛtiṃ nityaṃ tathā caivātmanastu tām | pradahatyeṣa karmākhyaṃ dāvodbhūta ivānalaḥ
और उत्पत्ति का यह लक्षण दोनों में उलटा है। जो प्रकृति को नित्य जानता है और उसी प्रकार आत्मा की प्रकृति को भी, वह कर्म कहलाने वाले को वैसे जला देता है जैसे वन में उठी आग।
श्लोक 22 (12.221.22)
चिन्मात्रपरमः शुद्धः सर्वाकृतिषु वर्तते ॥
cinmātraparamaḥ śuddhaḥ sarvākṛtiṣu vartate
केवल चेतनमात्र, परम और शुद्ध होकर वह सब आकृतियों में विद्यमान है।
श्लोक 23 (12.221.23)
आकाशकल्पं विमलं नानाशक्तिसमन्वितम् । तापनं सर्वभूतानां ज्योतिषां मध्यमस्थितिम् । दुःखमस्ति न निर्दुःखं तद्विद्वान्न च लिप्यति ॥
ākāśakalpaṃ vimalaṃ nānāśaktisamanvitam | tāpanaṃ sarvabhūtānāṃ jyotiṣāṃ madhyamasthitim | duḥkhamasti na nirduḥkhaṃ tadvidvānna ca lipyati
आकाश के समान निर्मल, अनेक शक्तियों से युक्त, सब प्राणियों को तपाने वाला, ज्योतियों के मध्य में स्थित; दुःख है, निर्दुःख नहीं; फिर भी उसे जानने वाला लिप्त नहीं होता।
श्लोक 24 (12.221.24)
असावश्नाति यद्वत्तद्भ्रमरोऽश्नाति यन्मधु । एवमेव महानात्मा नात्मानमवबुध्यते ॥
asāvaśnāti yadvattadbhramaro'śnāti yanmadhu | evameva mahānātmā nātmānamavabudhyate
जैसे वह भोग करता है, जैसे भौंरा मधु का भोग करता है, वैसे ही महान् आत्मा अपने को नहीं जानता।
श्लोक 25 (12.221.25)
एवंभूतस्त्वमित्यत्र स्वाधीतो बुद्ध्यते परम् । बुधस्य बोधनं तत्र क्रियते सद्भिरित्युत । न बुधस्येति वै कश्चिन्न तथावच्छृणुष्व मे ॥
evaṃbhūtastvamityatra svādhīto buddhyate param | budhasya bodhanaṃ tatra kriyate sadbhirityuta | na budhasyeti vai kaścinna tathāvacchṛṇuṣva me
"तुम ऐसे हो", यह सुनकर सुशिक्षित मनुष्य परम तत्त्व को जान लेता है। जो जाग चुका है उसे सज्जन वहाँ जगाते हैं, ऐसा कहा जाता है; पर जो जागा हुआ नहीं है उसके लिए यह कोई नहीं करता। इसे ठीक वैसे ही मुझसे सुनो।
श्लोक 26 (12.221.26)
शोकमस्य न गत्वा ते शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः । लोकं निध्नन्ति संभिन्ना ज्ञातिनोत्र वदन्त्युत ॥
śokamasya na gatvā te śāstrāṇāṃ śāstradasyavaḥ | lokaṃ nidhnanti saṃbhinnā jñātinotra vadantyuta
शास्त्रों के वे लुटेरे, जो इस शोक की जड़ तक नहीं पहुँचते, आपस में बँटकर लोक का नाश करते हैं, और स्वयं को ज्ञानी कहने वाले यहाँ बोलते रहते हैं।
श्लोक 27 (12.221.27)
एवं तस्य विभोः कृत्यं धातुरस्य महात्मनः । क्षमन्ति ते महात्मानः सर्वद्वन्द्वविवर्जिताः ॥
evaṃ tasya vibhoḥ kṛtyaṃ dhāturasya mahātmanaḥ | kṣamanti te mahātmānaḥ sarvadvandvavivarjitāḥ
उस सर्वव्यापी, महात्मा विधाता का कार्य ऐसा ही है; समस्त द्वन्द्वों से रहित वे महात्मा उसे सह लेते हैं।
श्लोक 28 (12.221.28)
अतोऽन्यथा महात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा ॥
ato'nyathā mahātmānamanyathā pratipadyate | kiṃ tena na kṛtaṃ pāpaṃ coreṇātmāpahāriṇā
जो महान् आत्मा को और ही प्रकार से समझता है, उस आत्मा को चुराने वाले चोर ने कौन-सा पाप नहीं किया?
श्लोक 29 (12.221.29)
तस्य संयोगयोगेन शुचिरप्यशुचिर्भवेत् । अशुचिश्च शुचिश्चापि ज्ञानाद्देहादयो यथा ॥
tasya saṃyogayogena śucirapyaśucirbhavet | aśuciśca śuciścāpi jñānāddehādayo yathā
उसके संयोग से पवित्र भी अपवित्र हो सकता है, और अपवित्र भी पवित्र, जैसे ज्ञान से देह आदि के विषय में होता है।
श्लोक 30 (12.221.30)
दृश्यं न चैव दृष्टं स्याद्दृष्टं दृश्यं तु नैव च ॥
dṛśyaṃ na caiva dṛṣṭaṃ syāddṛṣṭaṃ dṛśyaṃ tu naiva ca
जो दृश्य है वह द्रष्टा नहीं होता, और जो द्रष्टा है वह दृश्य नहीं होता।
श्लोक 31 (12.221.31)
अतीतत्रितयाः सिद्धा ज्ञानरूपेण सर्वदा । एवं न प्रतिपद्यन्ते रागमोहमदान्विताः ॥
atītatritayāḥ siddhā jñānarūpeṇa sarvadā | evaṃ na pratipadyante rāgamohamadānvitāḥ
तीनों से पार जा चुके सिद्ध सदा ज्ञानरूप से रहते हैं। राग, मोह और मद से भरे लोग इसे नहीं समझते।
श्लोक 32 (12.221.32)
वेदबाह्या दुरात्मानः संसारे दुःखभागिनः । आगमानुगतज्ञाना बुद्धियुक्ता भवन्ति ते ॥
vedabāhyā durātmānaḥ saṃsāre duḥkhabhāginaḥ | āgamānugatajñānā buddhiyuktā bhavanti te
वेद से बाहर रहने वाले दुरात्मा संसार में दुःख के भागी होते हैं; जिनका ज्ञान शास्त्र के अनुगत है, वे बुद्धियुक्त होते हैं।
श्लोक 33 (12.221.33)
बुद्ध्या भवति बुद्ध्या त्वं यद्बुद्धं चात्मरूपवत् । तमस्यन्धे न संदेहात्परं यान्ति न संशयः ॥
buddhyā bhavati buddhyā tvaṃ yadbuddhaṃ cātmarūpavat | tamasyandhe na saṃdehātparaṃ yānti na saṃśayaḥ
बुद्धि से यह होता है; बुद्धि से तुम उसे जानते हो जो आत्मरूप जाना गया है। अन्धकार में पड़े लोग संदेह के कारण परम को नहीं पहुँचते; इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 34 (12.221.34)
नित्यनैमित्तिकान्कृत्वा पापहानिमवाप्य च । शुद्धसत्वा महात्मानो ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥
nityanaimittikānkṛtvā pāpahānimavāpya ca | śuddhasatvā mahātmāno jñānanirdhūtakalmaṣāḥ
नित्य और नैमित्तिक कर्म करके और पाप का नाश पाकर, शुद्ध सत्त्व वाले वे महात्मा, जिनके दोष ज्ञान से धुल गए हैं,
श्लोक 35 (12.221.35)
असक्ताः परिवर्तन्ते संसरन्त्यथ वायुवत् । न युज्यन्तेऽथवा क्लेशैरहंभावोद्भवैः सह ॥
asaktāḥ parivartante saṃsarantyatha vāyuvat | na yujyante'thavā kleśairahaṃbhāvodbhavaiḥ saha
अनासक्त होकर वायु की तरह विचरते हैं; अहंभाव से उत्पन्न क्लेशों से वे नहीं जुड़ते।
श्लोक 36 (12.221.36)
इतस्ततः समाहृत्य ज्ञानं निर्वर्णयन्त्युत । ज्ञानान्वितस्तमो हन्यादर्कवत्स महामतिः ॥
itastataḥ samāhṛtya jñānaṃ nirvarṇayantyuta | jñānānvitastamo hanyādarkavatsa mahāmatiḥ
इधर-उधर से ज्ञान को बटोरकर वे उसका निरूपण करते हैं; ज्ञान से युक्त वह महाबुद्धि पुरुष सूर्य की तरह अन्धकार का नाश कर देता है।
श्लोक 37 (12.221.37)
एवमात्मानमन्वीक्ष्य नानादुःखसमन्वितम् । देहं पङ्कमले मग्नं निर्मलं परमार्थतः ॥
evamātmānamanvīkṣya nānāduḥkhasamanvitam | dehaṃ paṅkamale magnaṃ nirmalaṃ paramārthataḥ
इस प्रकार अनेक दुःखों से घिरे आत्मा को देखकर, जो देह पंक के कीचड़ में डूबा है, पर परमार्थ से निर्मल है,
श्लोक 38 (12.221.38)
तमेवं सर्वदुःखात्तु मोचयेत्परमात्मवान् । ब्रह्मचर्यव्रतोपेतः सर्वसङ्गबहिष्कृतः । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा परं निर्वाणमृच्छति ॥
tamevaṃ sarvaduḥkhāttu mocayetparamātmavān | brahmacaryavratopetaḥ sarvasaṅgabahiṣkṛtaḥ | laghvāhāro viśuddhātmā paraṃ nirvāṇamṛcchati
परमात्मा को पाने वाला उसे सब दुःख से छुड़ाए; ब्रह्मचर्य व्रत से युक्त, सब आसक्तियों से दूर, हल्का आहार करने वाला और शुद्ध आत्मा वाला पुरुष परम निर्वाण को पाता है।
श्लोक 39 (12.221.39)
इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च । आनुपूर्व्याद्विनश्यन्ति स्वं धातुमुपयान्ति च ॥
indriyāṇi mano vāyuḥ śoṇitaṃ māṃsamasthi ca | ānupūrvyādvinaśyanti svaṃ dhātumupayānti ca
इन्द्रियाँ, मन, प्राण, रक्त, मांस और हड्डी क्रम से नष्ट होती हैं और अपने-अपने तत्त्व में जा मिलती हैं।
श्लोक 40 (12.221.40)
कारणानुगतं कार्यं यदि तच्च विनश्यति । अलिङ्गस्य कथं लिङ्गं युज्यते तन्मृषा दृढम् ॥
kāraṇānugataṃ kāryaṃ yadi tacca vinaśyati | aliṅgasya kathaṃ liṅgaṃ yujyate tanmṛṣā dṛḍham
यदि कार्य कारण के अनुगत है और वह नष्ट होता है, तो चिह्नरहित के साथ चिह्न कैसे जुड़ सकता है? यह निश्चय ही मिथ्या है।
श्लोक 41 (12.221.41)
न त्वेव हेतवः सन्ति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः । अमर्त्यस्य च मर्त्येन सामान्यं नोपपद्यते ॥
na tveva hetavaḥ santi ye kecinmūrtisaṃsthitāḥ | amartyasya ca martyena sāmānyaṃ nopapadyate
रूप में टिके कोई भी हेतु ठीक नहीं बैठते; क्योंकि अमर और मरणशील में समानता हो ही नहीं सकती।
श्लोक 42 (12.221.42)
लोकदृष्टो यथा जातेः स्वेदजः पुरुषः स्त्रियाम् । कृतानुस्मरणात्सिद्धो वेदगम्यः परः पुमान् ॥
lokadṛṣṭo yathā jāteḥ svedajaḥ puruṣaḥ striyām | kṛtānusmaraṇātsiddho vedagamyaḥ paraḥ pumān
जैसे लोक में देखा गया है, जन्म में स्त्री के भीतर भी स्वेदज जीव उत्पन्न होता है; और पूर्वकृत के स्मरण से सिद्ध वह परम पुरुष वेद से जाना जाता है।
श्लोक 43 (12.221.43)
प्रत्यक्षानुगतो वेदो नामहेतुभिरिष्यते ॥
pratyakṣānugato vedo nāmahetubhiriṣyate
वेद प्रत्यक्ष के अनुगत है; नाममात्र के हेतुओं से उसे स्वीकार नहीं किया जाता।
श्लोक 44 (12.221.44)
यथा शाखा हि वै शाखा तरोः संबध्यते तदा । श्रुत्या तथापरोऽप्यात्मा दृश्यते सोऽप्यलिङ्गवान् । अलिङ्गसाध्यं तद्ब्रह्म बहवः सन्ति हेतवः ॥
yathā śākhā hi vai śākhā taroḥ saṃbadhyate tadā | śrutyā tathāparo'pyātmā dṛśyate so'pyaliṅgavān | aliṅgasādhyaṃ tadbrahma bahavaḥ santi hetavaḥ
जैसे वृक्ष की एक शाखा दूसरी शाखा से जुड़ी रहती है, वैसे ही श्रुति से दूसरा आत्मा भी दीखता है, वह भी चिह्नरहित। ब्रह्म चिह्नरहित के द्वारा साधा जाता है; इसके बहुत-से हेतु हैं।
श्लोक 45 (12.221.45)
लोकयात्राविधानं च दानधर्मफलागमः । तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः ॥
lokayātrāvidhānaṃ ca dānadharmaphalāgamaḥ | tadarthaṃ vedaśabdāśca vyavahārāśca laukikāḥ
लोकयात्रा की व्यवस्था, दान और धर्म के फल की प्राप्ति, और उसी के लिए वेद के शब्द तथा लौकिक व्यवहार;
श्लोक 46 (12.221.46)
इति सम्यङ्मनस्येते बहवः सन्ति हेतवः । एतदस्तीदमस्तीति न किंचित्प्रतिदृश्यते ॥
iti samyaṅmanasyete bahavaḥ santi hetavaḥ | etadastīdamastīti na kiṃcitpratidṛśyate
इस प्रकार ठीक विचार करने वाले के मन में बहुत-से हेतु रहते हैं; फिर भी "यह है, यह है", ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता।
श्लोक 47 (12.221.47)
तेषां विमृशतामेवं तत्तत्समभिधावताम् । क्वचिन्निविशते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् ॥
teṣāṃ vimṛśatāmevaṃ tattatsamabhidhāvatām | kvacinniviśate buddhistatra jīryati vṛkṣavat
इस तरह विचार करते हुए, इधर-उधर दौड़ते हुए उनकी बुद्धि कहीं टिक जाती है, और वहीं वृक्ष की तरह जीर्ण हो जाती है।
श्लोक 48 (12.221.48)
एवमर्थैरनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजन्तवः । आगमैरपकृष्यन्ति हस्तिनो हस्तिपैर्यथा ॥
evamarthairanarthaiśca duḥkhitāḥ sarvajantavaḥ | āgamairapakṛṣyanti hastino hastipairyathā
इस प्रकार लाभ और हानि दोनों से दुखी सब प्राणी शास्त्रों द्वारा वैसे ही खींचे जाते हैं जैसे हाथी महावतों द्वारा।
श्लोक 49 (12.221.49)
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate
भोगों के उपभोग से कामना कभी शान्त नहीं होती; घी से अग्नि की तरह वह और भी बढ़ती ही जाती है।
श्लोक 50 (12.221.50)
अर्थांस्तथाऽत्यन्तदुःखावहांश्च । लिप्सन्त एके बहवो विशुष्काः । महत्तरं दुःखमभिप्रपन्ना । हित्वा सुखं मृत्युवशं प्रयान्ति ॥
arthāṃstathā'tyantaduḥkhāvahāṃśca | lipsanta eke bahavo viśuṣkāḥ | mahattaraṃ duḥkhamabhiprapannā | hitvā sukhaṃ mṛtyuvaśaṃ prayānti
अत्यन्त दुःख लाने वाली वस्तुओं को चाहते हुए बहुत-से लोग सूख जाते हैं; और उससे भी बड़े दुःख में पड़कर सुख को छोड़ मृत्यु के वश में चले जाते हैं।
श्लोक 51 (12.221.51)
विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य । किं बन्धुभिर्मन्त्रपरिग्रहैश्च । विहाय यो गच्छति सर्वमेव । क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥
vināśino hyadhruvajīvitasya | kiṃ bandhubhirmantraparigrahaiśca | vihāya yo gacchati sarvameva | kṣaṇena gatvā na nivartate ca
नाशवान् और अस्थिर जीवन वाले के लिए बन्धुओं, मन्त्रियों और सहायकों के संग्रह से क्या लाभ? वह सब कुछ छोड़कर क्षण भर में चला जाता है और जाकर लौटता नहीं।
श्लोक 52 (12.221.52)
खं भूमितोयानलवायवो हि । सदा शरीरं प्रतिपालयन्ति । इतीदमालक्ष्य कुतो रतिर्भवे । द्विनाशिनो ह्यस्य न कर्म विद्यते ॥
khaṃ bhūmitoyānalavāyavo hi | sadā śarīraṃ pratipālayanti | itīdamālakṣya kuto ratirbhave | dvināśino hyasya na karma vidyate
आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु सदा शरीर को सँभाले रखते हैं। यह देखकर उसमें रति कैसे हो? क्योंकि नाशवान् का कोई कर्म स्थिर नहीं रहता।
भीष्म उवाच
श्लोक 53 (12.221.53)
इदमनुपधिवाक्यमच्छलं । परमनिरामयमात्मसाक्षिकम् । नरपतिरनुवीक्ष्य विस्मितः । पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे ॥
idamanupadhivākyamacchalaṃ | paramanirāmayamātmasākṣikam | narapatiranuvīkṣya vismitaḥ | punaranuyoktumidaṃ pracakrame
निष्कपट, छलरहित, परम निर्दोष और आत्मा के साक्षी वाले इस वचन पर विचार करके राजा विस्मित हुए और फिर उनसे प्रश्न करने लगे।