शान्ति पर्व · अध्याय 222
पञ्चशिख का मोक्ष-उपदेश
पञ्चशिख से उपदेश पा चुके जनक पूछते हैं कि यदि मरने के बाद कुछ नहीं रहता तो ज्ञान या अज्ञान से क्या अन्तर पड़ता है। पञ्चशिख बताते हैं कि शरीर, इन्द्रियाँ और मन तत्त्वों का एक समूह मात्र हैं। वे ज्ञान और कर्म की इन्द्रियाँ गिनाते हैं, सत्त्व, रज और तम का स्वरूप समझाते हैं और सिखाते हैं कि दुःख का अन्त पूर्ण त्याग से ही होता है। मुक्त पुरुष की उपमा जल से अछूते कमल-पत्र, सींग छोड़ते मृग और गिरते वृक्ष को छोड़ते पक्षी से दी गई है। अन्त में भीष्म जनक का वह कथन याद दिलाते हैं, जो उन्होंने अपने नगर को जलते देखकर कहा था कि उनका भूसी का एक कण भी नहीं जल रहा।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.222.1)
जनको नरदेवस्तु ज्ञापितः परमर्षिणा । पुनरेवानुपप्रच्छ सांपराये भवाभवौ ॥
janako naradevastu jñāpitaḥ paramarṣiṇā | punarevānupapraccha sāṃparāye bhavābhavau
परम ऋषि से उपदेश पाए हुए नरदेव जनक ने परलोक में होने और न होने के विषय में उनसे फिर पूछा।
जनक उवाच
श्लोक 2 (12.222.2)
भगवन्यदि न प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित् । एवं सति किमज्ञानं ज्ञानं वा किं करिष्यति ॥
bhagavanyadi na pretya saṃjñā bhavati kasyacit | evaṃ sati kimajñānaṃ jñānaṃ vā kiṃ kariṣyati
भगवन्! यदि मरने के बाद किसी को कोई चेतना नहीं रहती, तो ऐसी दशा में अज्ञान क्या करेगा और ज्ञान ही क्या करेगा?
श्लोक 3 (12.222.3)
सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्यात्पश्य चैतद्द्विजोत्तम । अप्रमत्तः प्रमत्तो वा किं विशेषं करिष्यति ॥
sarvamucchedaniṣṭhaṃ syātpaśya caitaddvijottama | apramattaḥ pramatto vā kiṃ viśeṣaṃ kariṣyati
हे द्विजश्रेष्ठ! इस पर विचार कीजिए—तब तो सब कुछ उच्छेद पर ही टिका होगा; फिर सावधान और असावधान में क्या अन्तर पड़ेगा?
श्लोक 4 (12.222.4)
असंसर्गो हि भूतेषु संसर्गो वा विनाशिषु । कस्मै क्रियेत तत्वेन निश्चयः कोऽत्र तत्त्वतः ॥
asaṃsargo hi bhūteṣu saṃsargo vā vināśiṣu | kasmai kriyeta tatvena niścayaḥ ko'tra tattvataḥ
प्राणियों में अनासक्ति हो या नाशवान् वस्तुओं में आसक्ति—वह किसके लिए की जाए? और इस विषय में वास्तव में निश्चित बात क्या है?
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.222.5)
तमसा हि प्रतिच्छन्नं विभ्रान्तमिव चातुरम् । पुनः प्रशमयन्वाक्यैः कविः पञ्चशिखोऽब्रवीत् ॥
tamasā hi praticchannaṃ vibhrāntamiva cāturam | punaḥ praśamayanvākyaiḥ kaviḥ pañcaśikho'bravīt
जनक अन्धकार से ढके हुए और व्याकुल रोगी की भाँति घबराए हुए थे। कवि पञ्चशिख ने उन्हें अपने वचनों से फिर शान्त करते हुए कहा—
पञ्चशिख उवाच
श्लोक 6 (12.222.6)
उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते । अयं ह्यपि समाहारः शरीरेन्द्रियचेतसाम् । वर्तते पृथगन्योन्यमप्यपाश्रित्य कर्मसु ॥
ucchedaniṣṭhā nehāsti bhāvaniṣṭhā na vidyate | ayaṃ hyapi samāhāraḥ śarīrendriyacetasām | vartate pṛthaganyonyamapyapāśritya karmasu
यहाँ न तो उच्छेद में कोई अन्तिम ठहराव है और न (स्थायी) सत्ता में ही। यह तो शरीर, इन्द्रियों और चित्त का एक समूह है, जिसका प्रत्येक अंग कर्मों में दूसरों का सहारा लेकर भी अलग-अलग काम करता है।
श्लोक 7 (12.222.7)
धातवः पञ्च तेषां तु खं वायुर्ज्योतिरम्बु भूः । ते स्वभावेन तिष्ठन्ति वियुज्यन्ते स्वभावतः ॥
dhātavaḥ pañca teṣāṃ tu khaṃ vāyurjyotirambu bhūḥ | te svabhāvena tiṣṭhanti viyujyante svabhāvataḥ
उनके धातु पाँच हैं—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। वे अपने स्वभाव से साथ रहते हैं और अपने स्वभाव से ही अलग हो जाते हैं।
श्लोक 8 (12.222.8)
आकाशो वायुरूष्मा च स्नेहो यश्चापि पार्थिवः । एष पञ्चसमाहारः शरीरमपि नैकधा ॥
ākāśo vāyurūṣmā ca sneho yaścāpi pārthivaḥ | eṣa pañcasamāhāraḥ śarīramapi naikadhā
आकाश, वायु, ऊष्मा, स्नेह (तरल तत्त्व) और जो पार्थिव है—इन पाँच का यह मेल है; इसी प्रकार शरीर भी एक ही प्रकार का नहीं है।
श्लोक 9 (12.222.9)
अहं वाच्यं द्विजानां यद्विशिष्टं बुद्धिरूपवत् । वाचामगोचरं नित्यं ज्ञेयमेवं भविष्यति ॥
ahaṃ vācyaṃ dvijānāṃ yadviśiṣṭaṃ buddhirūpavat | vācāmagocaraṃ nityaṃ jñeyamevaṃ bhaviṣyati
द्विज जिसे "अहं" कहकर बताते हैं, जो विशिष्ट है, बुद्धि के रूप वाला है और सदा वाणी की पहुँच से परे है, उसे इसी प्रकार जानना चाहिए।
श्लोक 10 (12.222.10)
ज्ञानं ज्ञेयं तथाज्ञानं त्रिविधं ज्ञानमुच्यते । ज्ञानमूष्मा च वायुश्च त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥
jñānaṃ jñeyaṃ tathājñānaṃ trividhaṃ jñānamucyate | jñānamūṣmā ca vāyuśca trividhaḥ karmasaṃgrahaḥ
ज्ञान, ज्ञेय और अज्ञान—इस प्रकार ज्ञान तीन प्रकार का कहा जाता है। ज्ञान, ऊष्मा और वायु—ये तीनों मिलकर कर्म का तीन प्रकार का संग्रह हैं।
श्लोक 11 (12.222.11)
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः । प्राणापानौ विकारश्च धातवश्चात्र निःसृताः ॥
indriyāṇīndriyārthāśca svabhāvaścetanā manaḥ | prāṇāpānau vikāraśca dhātavaścātra niḥsṛtāḥ
इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय, स्वभाव, चेतना, मन, प्राण और अपान, विकार और धातुएँ—ये सब इसी से निकले हैं।
श्लोक 12 (12.222.12)
प्राणादयस्तथा स्पर्शा न संबाधगतास्तथा । पुत्राधीनं भविष्येत चिन्मात्रः स परः पुमान् ॥
prāṇādayastathā sparśā na saṃbādhagatāstathā | putrādhīnaṃ bhaviṣyeta cinmātraḥ sa paraḥ pumān
प्राण आदि और उसी प्रकार स्पर्श भी बाधा में पड़े हुए नहीं हैं। वह पुत्र के अधीन होगा; परन्तु वह परम पुरुष केवल चैतन्यमात्र है।
श्लोक 13 (12.222.13)
श्रवणं स्पर्शनं जिह्वा दृष्टिर्नासा तथैव च । इन्द्रियाणीति पञ्चैते चित्तपूर्वगमा गुणाः ॥
śravaṇaṃ sparśanaṃ jihvā dṛṣṭirnāsā tathaiva ca | indriyāṇīti pañcaite cittapūrvagamā guṇāḥ
श्रवण, स्पर्श, जिह्वा, दृष्टि और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ हैं, और इनके गुण चित्त को आगे रखकर चलते हैं।
श्लोक 14 (12.222.14)
तत्र विज्ञानसंयुक्ता त्रिविधा चेतना ध्रुवा । सुखदुःखेति यामाहुरदुःखेत्यसुखेति च ॥
tatra vijñānasaṃyuktā trividhā cetanā dhruvā | sukhaduḥkheti yāmāhuraduḥkhetyasukheti ca
इनमें विज्ञान से जुड़ी हुई स्थिर वेदना तीन प्रकार की है—जिसे सुख कहते हैं, जिसे दुःख कहते हैं, और जो न दुःख है न सुख।
श्लोक 15 (12.222.15)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च मूर्तयः । एते ह्यामरणात्पञ्च षङ्गुणा ज्ञानसिद्धये ॥
śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhaśca mūrtayaḥ | ete hyāmaraṇātpañca ṣaṅguṇā jñānasiddhaye
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये मूर्त विषय हैं। मृत्यु तक ये पाँच (मन के साथ) छह गुणों का समूह बनकर ज्ञान की सिद्धि के साधन हैं।
श्लोक 16 (12.222.16)
तेषु कर्मविसर्गश्च सर्वतत्वार्थनिश्चयः । तमाहुः परमं शुक्रं पारे च रजसः प्रभुम् ॥
teṣu karmavisargaśca sarvatatvārthaniścayaḥ | tamāhuḥ paramaṃ śukraṃ pāre ca rajasaḥ prabhum
इन्हीं में कर्मों का विसर्जन होता है और सब तत्त्वों के अर्थ का निश्चय होता है। उसे वे परम शुक्र कहते हैं, जो रजोगुण से परे का स्वामी है।
श्लोक 17 (12.222.17)
विरागाद्वर्तते तस्मिन्मनो रजसि नित्यगम् । तस्मिन्प्रसन्ने संपश्येद्बुद्धिरित्यव्ययं महत् ॥
virāgādvartate tasminmano rajasi nityagam | tasminprasanne saṃpaśyedbuddhirityavyayaṃ mahat
वैराग्य से रजोगुण में सदा चलने वाला मन उसी में टिक जाता है। उसके प्रसन्न होने पर साधक उसे बुद्धि के रूप में देखता है, जो अविनाशी और महान् है।
श्लोक 18 (12.222.18)
इमं गुणसमाहारमात्मभावेन पश्यतः । असम्यग्दर्शिनो दुःखमनन्तं नोपशाम्यति ॥
imaṃ guṇasamāhāramātmabhāvena paśyataḥ | asamyagdarśino duḥkhamanantaṃ nopaśāmyati
इस गुणों के समूह को आत्मभाव से देखने वाले, ठीक न देखने वाले का अनन्त दुःख कभी शान्त नहीं होता।
श्लोक 19 (12.222.19)
तस्मादेतेषु मेधावी न प्रसज्येत बुद्धिमान् । अनात्मेति च यद्दृष्टं तन्नाहं न ममेत्यपि । वर्तते किमधिष्ठाना प्रसक्ता दुःखसंततिः ॥
tasmādeteṣu medhāvī na prasajyeta buddhimān | anātmeti ca yaddṛṣṭaṃ tannāhaṃ na mametyapi | vartate kimadhiṣṭhānā prasaktā duḥkhasaṃtatiḥ
इसलिए बुद्धिमान् और विवेकी पुरुष इनमें आसक्त न हो। जब ये अनात्मा देखे गए हैं, तब ये न "मैं" हैं न "मेरे"; फिर आसक्ति से जुड़ी यह दुःख की परम्परा किस आधार पर टिकी है?
श्लोक 20 (12.222.20)
यत्र सम्यङ्मनो नाम त्यागमात्रमनुत्तमम् । शृणु यत्तव मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति ॥
yatra samyaṅmano nāma tyāgamātramanuttamam | śṛṇu yattava mokṣāya bhāṣyamāṇaṃ bhaviṣyati
जहाँ "सम्यक् मन" नाम की सर्वोत्तम बात केवल त्याग ही है, उसके विषय में जो तुम्हारे मोक्ष के लिए कहा जाने वाला है, उसे सुनो।
श्लोक 21 (12.222.21)
त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम् । नित्यदुःखविनीतानां श्लेषो दुःखवहो हतः ॥
tyāga eva hi sarveṣāṃ yuktānāmapi karmaṇām | nityaduḥkhavinītānāṃ śleṣo duḥkhavaho hataḥ
यथाविधि किए जाने वाले सब कर्मों का भी अन्त त्याग में ही है। जो नित्य दुःख से शिक्षित हो चुके हैं, उनके लिए दुःख लाने वाली आसक्ति नष्ट हो चुकी है।
श्लोक 22 (12.222.22)
द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि । सुखत्यागे तपोयोगं सर्वत्यागे समापना ॥
dravyatyāge tu karmāṇi bhogatyāge vratānyapi | sukhatyāge tapoyogaṃ sarvatyāge samāpanā
धन के त्याग में यज्ञ आदि कर्म हैं, भोग के त्याग में व्रत हैं, सुख के त्याग में तप और योग हैं, और सब कुछ त्याग देने में इन सबकी पूर्णता है।
श्लोक 23 (12.222.23)
तस्य मार्गोऽयमद्वैधः सर्वत्यागस्य दर्शितः । विप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिस्त्वन्यथा भवेत् ॥
tasya mārgo'yamadvaidhaḥ sarvatyāgasya darśitaḥ | viprahāṇāya duḥkhasya durgatistvanyathā bhavet
सर्वत्याग का यह मार्ग द्वैधरहित बताया गया है; यह दुःख के नाश के लिए है, अन्यथा दुर्गति होगी।
श्लोक 24 (12.222.24)
शेते जरामृत्युभयैर्विमुक्तः । क्षीणे पुण्ये विगते च पापे । तपोनिमित्ते विगते च निष्ठे । फले यथाऽऽकाशमलिङ्ग एव ॥
śete jarāmṛtyubhayairvimuktaḥ | kṣīṇe puṇye vigate ca pāpe | taponimitte vigate ca niṣṭhe | phale yathā''kāśamaliṅga eva
जब पुण्य क्षीण हो गया हो और पाप चला गया हो, तप का निमित्त और उसकी परिणति भी चली गई हो, तब वह जरा और मृत्यु के भय से मुक्त होकर फल में आकाश की भाँति चिह्नरहित होकर विश्राम करता है।
श्लोक 25 (12.222.25)
पञ्चज्ञानेन्द्रियाण्युक्त्वा मनःषष्ठानि चेतसि । मनःषष्ठानि वक्ष्यामि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि तु ॥
pañcajñānendriyāṇyuktvā manaḥṣaṣṭhāni cetasi | manaḥṣaṣṭhāni vakṣyāmi pañcakarmendriyāṇi tu
चित्त में मन को छठा रखकर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ कह चुकने के बाद अब मैं मन को छठा रखकर पाँच कर्मेन्द्रियाँ कहूँगा।
श्लोक 26 (12.222.26)
हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ञेयमथ पादौ गतीन्द्रियम् । प्रजनानन्दयोः शेफो निसर्गे पायुरिन्द्रियम् ॥
hastau karmendriyaṃ jñeyamatha pādau gatīndriyam | prajanānandayoḥ śepho nisarge pāyurindriyam
हाथ कर्म की इन्द्रिय जानने चाहिए और पैर गति की इन्द्रिय। सन्तान और आनन्द के लिए उपस्थ है, और मल-त्याग में गुदा इन्द्रिय है।
श्लोक 27 (12.222.27)
वाक्च शब्दविशेषार्थं गतिं पञ्चान्वितां विदुः । एवमेकादशैतानि बुद्ध्या तूपहतं मनः ॥
vākca śabdaviśeṣārthaṃ gatiṃ pañcānvitāṃ viduḥ | evamekādaśaitāni buddhyā tūpahataṃ manaḥ
वाणी शब्द-विशेष के प्रयोजन के लिए है, और उसकी गति को वे पाँच से युक्त जानते हैं। इस प्रकार ये ग्यारह हैं; मन बुद्धि से दबा हुआ है।
श्लोक 28 (12.222.28)
कर्णौ शब्दश्च चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे । तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगन्धयोः ॥
karṇau śabdaśca cittaṃ ca trayaḥ śravaṇasaṃgrahe | tathā sparśe tathā rūpe tathaiva rasagandhayoḥ
कान, शब्द और चित्त—ये तीन श्रवण के संग्रह में हैं; इसी प्रकार स्पर्श में, रूप में तथा रस और गन्ध में भी।
श्लोक 29 (12.222.29)
एवं पञ्चत्रिका ह्येते गुणास्तदुपलब्धये । येनायं त्रिविधो भावः पर्यायात्समुपस्थितः ॥
evaṃ pañcatrikā hyete guṇāstadupalabdhaye | yenāyaṃ trividho bhāvaḥ paryāyātsamupasthitaḥ
इस प्रकार ये गुण उसकी उपलब्धि के लिए पाँच त्रिकों के रूप में हैं, जिनके द्वारा यह तीन प्रकार का भाव क्रम से उपस्थित होता है।
श्लोक 30 (12.222.30)
सात्विको राजसश्चापि तामसश्चापि ते त्रयः । त्रिविधा वेदना येषु प्रसूताः सर्वसाधनाः ॥
sātviko rājasaścāpi tāmasaścāpi te trayaḥ | trividhā vedanā yeṣu prasūtāḥ sarvasādhanāḥ
सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन हैं, जिनमें सब कुछ सिद्ध करने वाली तीन प्रकार की वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं।
श्लोक 31 (12.222.31)
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता । अकुतश्चित्कुतश्चिद्वा चिन्तितः सात्विको गुणः ॥
praharṣaḥ prītirānandaḥ sukhaṃ saṃśāntacittatā | akutaścitkutaścidvā cintitaḥ sātviko guṇaḥ
हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्त की शान्ति—चाहे वे किसी कारण से हों या बिना कारण—सात्त्विक गुण माने गए हैं।
श्लोक 32 (12.222.32)
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाऽक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुतः ॥
atuṣṭiḥ paritāpaśca śoko lobhastathā'kṣamā | liṅgāni rajasastāni dṛśyante hetvahetutaḥ
असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ और अक्षमा—ये रजोगुण के लक्षण हैं, जो कारण सहित या बिना कारण दिखाई देते हैं।
श्लोक 33 (12.222.33)
अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदपि वर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥
avivekastathā mohaḥ pramādaḥ svapnatandritā | kathaṃcidapi vartante vividhāstāmasā guṇāḥ
अविवेक, मोह, प्रमाद, निद्रा और तन्द्रा—ये अनेक प्रकार के तामस गुण किसी न किसी प्रकार प्रकट होते रहते हैं।
श्लोक 34 (12.222.34)
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । वर्तते सात्विको भाव इत्यपेक्षेत तत्तथा ॥
tatra yatprītisaṃyuktaṃ kāye manasi vā bhavet | vartate sātviko bhāva ityapekṣeta tattathā
इनमें से जो प्रीति से युक्त भाव शरीर या मन में उत्पन्न हो, वह सात्त्विक भाव है; उसे ऐसा ही समझना चाहिए।
श्लोक 35 (12.222.35)
यत्तु सन्तापसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । प्रवृत्तं रज इत्येवं ततस्तदपि चिन्तयेत् ॥
yattu santāpasaṃyuktamaprītikaramātmanaḥ | pravṛttaṃ raja ityevaṃ tatastadapi cintayet
और जो सन्ताप से युक्त हो, अपने लिए अप्रिय हो और प्रवृत्त हो रहा हो, वह रजोगुण है; उस पर भी इसी प्रकार विचार करना चाहिए।
श्लोक 36 (12.222.36)
अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥
atha yanmohasaṃyuktaṃ kāye manasi vā bhavet | apratarkyamavijñeyaṃ tamastadupadhārayet
और जो मोह से युक्त हो, शरीर या मन में, जिसे तर्क से न समझा जा सके और जाना न जा सके, उसे तमोगुण समझो।
श्लोक 37 (12.222.37)
श्रोत्रं व्योमाश्रितं भूतं शब्दः श्रोत्रं समाश्रितः । नोभयं शब्दविज्ञाने विज्ञानस्येतरस्य वा ॥
śrotraṃ vyomāśritaṃ bhūtaṃ śabdaḥ śrotraṃ samāśritaḥ | nobhayaṃ śabdavijñāne vijñānasyetarasya vā
कान आकाश पर आश्रित भूत है और शब्द कान पर आश्रित है। शब्द के विज्ञान में इन दोनों में से कोई अकेला विज्ञान नहीं है, और न अकेले दूसरे का ही विज्ञान है।
श्लोक 38 (12.222.38)
एवं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चेति पञ्चमी । स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्च तत् ॥
evaṃ tvakcakṣuṣī jihvā nāsikā ceti pañcamī | sparśe rūpe rase gandhe tāni ceto manaśca tat
इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवीं नासिका—ये स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के लिए हैं; और वे चित्त तथा मन से जुड़ी हुई हैं।
श्लोक 39 (12.222.39)
स्वकर्मयुगपद्भावो दशस्वेतेषु तिष्ठति । चित्तमेकादशं विद्धि बुद्धिर्द्वादशमी भवेत् ॥
svakarmayugapadbhāvo daśasveteṣu tiṣṭhati | cittamekādaśaṃ viddhi buddhirdvādaśamī bhavet
इन दसों में अपने-अपने कर्म का एक साथ होना स्थित है। चित्त को ग्यारहवाँ जानो और बुद्धि बारहवीं होगी।
श्लोक 40 (12.222.40)
तेषामयुगपद्भाव उच्छेदो नास्ति तामसः । आस्थितो युगपद्भावे व्यवहारः स लौकिकः ॥
teṣāmayugapadbhāva ucchedo nāsti tāmasaḥ | āsthito yugapadbhāve vyavahāraḥ sa laukikaḥ
जब वे एक साथ नहीं होते, तब तामसिक उच्छेद नहीं होता; और जो एक साथ होने पर आश्रित है, वह लौकिक व्यवहार है।
श्लोक 41 (12.222.41)
इन्द्रियाण्युपसृत्यापि दृष्ट्वा पूर्वं श्रुतागमात् । चिन्तयन्ननुपर्येति त्रिभिरेवान्वितो गुणैः ॥
indriyāṇyupasṛtyāpi dṛṣṭvā pūrvaṃ śrutāgamāt | cintayannanuparyeti tribhirevānvito guṇaiḥ
इन्द्रियों के पास जाकर, देखकर और पहले सुने हुए शास्त्र के आधार पर विचार करता हुआ मनुष्य तीनों गुणों से युक्त होकर उनके पीछे चलता है।
श्लोक 42 (12.222.42)
यत्तमोपहतं चित्तमाशुसंचारमध्रुवम् । करोत्युपरमं काये तदाहुस्तामसं सुखम् ॥
yattamopahataṃ cittamāśusaṃcāramadhruvam | karotyuparamaṃ kāye tadāhustāmasaṃ sukham
तम से दबा हुआ, शीघ्र चलने वाला और अस्थिर जो चित्त शरीर में विश्राम उत्पन्न करता है, उसे वे तामसिक सुख कहते हैं।
श्लोक 43 (12.222.43)
यद्यदागमसंयुक्तं न कृच्छ्रादुपशाम्यति । अथ तत्राप्युपादत्ते तमो व्यक्तमिवानृतम् ॥
yadyadāgamasaṃyuktaṃ na kṛcchrādupaśāmyati | atha tatrāpyupādatte tamo vyaktamivānṛtam
जो आगम से जुड़ा हुआ है, वह कठिनाई के बिना शान्त नहीं होता; और तब भी वह उस तम को ग्रहण कर लेता है, जो प्रकट-सा लगता है पर असत्य है।
श्लोक 44 (12.222.44)
एवमेव प्रसङ्ख्यातः स्वकर्मप्रत्ययो गुणः । कथंचिद्वर्तते सम्यक्केषांचिद्वा निवर्तते ॥
evameva prasaṅkhyātaḥ svakarmapratyayo guṇaḥ | kathaṃcidvartate samyakkeṣāṃcidvā nivartate
इस प्रकार अपने कर्म पर आश्रित रहने वाले गुण की गणना कर दी गई; वह किसी में ठीक-ठीक प्रवृत्त होता है और किसी में निवृत्त हो जाता है।
श्लोक 45 (12.222.45)
अहमित्येष वै भावो नान्यत्र प्रतितिष्ठति । यस्य भावो दृढो नित्यं स वै विद्वांस्तथेतरः ॥
ahamityeṣa vai bhāvo nānyatra pratitiṣṭhati | yasya bhāvo dṛḍho nityaṃ sa vai vidvāṃstathetaraḥ
यह "मैं हूँ" का भाव और कहीं नहीं टिकता। जिसका यह भाव सदा दृढ़ है, वही सच्चा विद्वान् है, और दूसरा भी वैसा ही।
श्लोक 46 (12.222.46)
देहधर्मस्तथा नित्यं सर्वभूतेषु वै दृढः । एतेनैवानुमानेन त्याज्यो धर्मस्तथा ह्यसौ ॥
dehadharmastathā nityaṃ sarvabhūteṣu vai dṛḍhaḥ | etenaivānumānena tyājyo dharmastathā hyasau
देह का धर्म सब प्राणियों में सदा दृढ़ है। इसी अनुमान से वह धर्म भी त्यागने योग्य है।
श्लोक 47 (12.222.47)
ज्ञानेन मुच्यते जन्तुर्धर्मात्मा ज्ञानवान्भवेत् । धर्मेण धार्यते लोकः सर्वं धर्मे प्रतिष्ठितम् ॥
jñānena mucyate janturdharmātmā jñānavānbhavet | dharmeṇa dhāryate lokaḥ sarvaṃ dharme pratiṣṭhitam
ज्ञान से प्राणी मुक्त होता है; जिसकी आत्मा धर्ममय है, वही ज्ञानवान् होता है। धर्म से लोक धारण किया जाता है और सब कुछ धर्म में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 48 (12.222.48)
सर्वार्थजनकश्चैव धर्मः सर्वस्य कारणम् । सर्वो हि दृश्यते लोके न सर्वार्थः कथंचन ॥
sarvārthajanakaścaiva dharmaḥ sarvasya kāraṇam | sarvo hi dṛśyate loke na sarvārthaḥ kathaṃcana
धर्म सब प्रयोजनों को उत्पन्न करने वाला और सबका कारण है। लोक में सब दिखाई देते हैं, पर कोई भी किसी प्रकार सब प्रयोजनों का स्वामी नहीं है।
श्लोक 49 (12.222.49)
सर्वत्यागे कृते तस्मात्परमात्मा प्रसीदति । व्यक्तादव्यक्तमतुलं लोकेषु परिवर्तते ॥
sarvatyāge kṛte tasmātparamātmā prasīdati | vyaktādavyaktamatulaṃ lokeṣu parivartate
इसलिए सर्वत्याग कर लेने पर परमात्मा प्रसन्न होता है; व्यक्त से अनुपम अव्यक्त लोकों में विचरता है।
श्लोक 50 (12.222.50)
एतदाहुः समाहारं क्षेत्रमध्यात्मचिन्तकाः । स्थितो मनसि यो भावः स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥
etadāhuḥ samāhāraṃ kṣetramadhyātmacintakāḥ | sthito manasi yo bhāvaḥ sa vai kṣetrajña ucyate
अध्यात्म का चिन्तन करने वाले इस समूह को क्षेत्र कहते हैं; और मन में जो भाव स्थित है, वही क्षेत्रज्ञ कहलाता है।
श्लोक 51 (12.222.51)
एवं सति क उच्छेदः शाश्वतो वा कथं भवेत् । स्वभावाद्वर्तमानेषु सर्वभूतेषु हेतुषु ॥
evaṃ sati ka ucchedaḥ śāśvato vā kathaṃ bhavet | svabhāvādvartamāneṣu sarvabhūteṣu hetuṣu
ऐसा होने पर उच्छेद क्या है, या शाश्वत कैसे हो सकता है, जब सब प्राणी और सब हेतु अपने स्वभाव से प्रवृत्त हो रहे हैं?
श्लोक 52 (12.222.52)
यथार्णवगता नद्यो व्यक्तीर्जहति नाम च । नतु स्वतां नियच्छन्ति तादृशः सत्वसंक्षयः ॥
yathārṇavagatā nadyo vyaktīrjahati nāma ca | natu svatāṃ niyacchanti tādṛśaḥ satvasaṃkṣayaḥ
जैसे समुद्र में पहुँची हुई नदियाँ अपने अलग रूप और नाम छोड़ देती हैं, पर अपनी निजता को नहीं रखतीं, वैसा ही प्राणी का लय है।
श्लोक 53 (12.222.53)
एवं सति कुतः संज्ञा प्रेत्यभावे पुनर्भवेत् । प्रतिसंमिश्रिते जीवे गृह्यमाणे च सर्वतः ॥
evaṃ sati kutaḥ saṃjñā pretyabhāve punarbhavet | pratisaṃmiśrite jīve gṛhyamāṇe ca sarvataḥ
ऐसा होने पर, जब जीव पूरी तरह मिल गया हो और चारों ओर से ग्रहण कर लिया गया हो, तब मरने के बाद या पुनर्जन्म में संज्ञा कहाँ से होगी?
श्लोक 54 (12.222.54)
इमां च यो वेद विमोक्षबुद्धि । मात्मानमन्विच्छति चाप्रमत्तः । न लिप्यते कर्मफलैरनिष्टैः । पत्रं बिसस्येव जलेन सिक्तम् ॥
imāṃ ca yo veda vimokṣabuddhi | mātmānamanvicchati cāpramattaḥ | na lipyate karmaphalairaniṣṭaiḥ | patraṃ bisasyeva jalena siktam
जो इस मोक्षबुद्धि को जानता है और सावधान रहकर आत्मा की खोज करता है, वह अनिष्ट कर्मफलों से लिप्त नहीं होता, जैसे जल से सींचा हुआ कमल का पत्ता।
श्लोक 55 (12.222.55)
दृढैर्हि पाशैर्बहुभिर्विमुक्तः । प्रजानिमित्तैरपि दैवतैश्च । यदा ह्यसौ सुखदुःखे जहाति । मुक्तस्तदाग्र्यां गतिमेत्यलिङ्गः ॥
dṛḍhairhi pāśairbahubhirvimuktaḥ | prajānimittairapi daivataiśca | yadā hyasau sukhaduḥkhe jahāti | muktastadāgryāṃ gatimetyaliṅgaḥ
संतान-सम्बन्धी और देवता-सम्बन्धी भी अनेक दृढ़ बन्धनों से छूटा हुआ वह जब सुख और दुःख को त्याग देता है, तब मुक्त होकर चिह्नरहित श्रेष्ठ गति को पाता है।
श्लोक 56 (12.222.56)
श्रुतिप्रमाणागममङ्गलैश्च । शेते जरामृत्युभयादतीतः । क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे । ततोनिमित्ते च फले विनष्टे । अलेपमाकाशमलिङ्गमेव । मास्थाय पश्यन्ति महत्यसक्ताः ॥
śrutipramāṇāgamamaṅgalaiśca | śete jarāmṛtyubhayādatītaḥ | kṣīṇe ca puṇye vigate ca pāpe | tatonimitte ca phale vinaṣṭe | alepamākāśamaliṅgameva | māsthāya paśyanti mahatyasaktāḥ
वेद, प्रमाण, परम्परा और मंगल-कर्मों के सहारे वह जरा और मृत्यु के भय से परे होकर विश्राम करता है। जब पुण्य क्षीण हो जाता है, पाप चला जाता है और कारण-सहित फल नष्ट हो जाता है, तब अनासक्त पुरुष इस निर्लेप, चिह्नरहित, आकाश-तुल्य अवस्था में स्थित होकर महान् को देखते हैं।
श्लोक 57 (12.222.57)
यथोर्णनाभिः परिवर्तमान । स्तन्तुक्षये तिष्ठति पात्यमानः । तथा विमुक्तः प्रजहाति दुःखं । विध्वंसते लोष्ठ इवाद्रिमृच्छन् ॥
yathorṇanābhiḥ parivartamāna | stantukṣaye tiṣṭhati pātyamānaḥ | tathā vimuktaḥ prajahāti duḥkhaṃ | vidhvaṃsate loṣṭha ivādrimṛcchan
जैसे जाल पर घूमती हुई मकड़ी तन्तु के समाप्त होने पर गिराए जाने पर भी टिकी रहती है, वैसे ही मुक्त पुरुष दुःख को छोड़ देता है; वह दुःख पर्वत से टकराए हुए ढेले की तरह चूर-चूर हो जाता है।
श्लोक 58 (12.222.58)
यथा रुरुः शृङ्गमथो पुराणं । हित्वा त्वचं वाऽप्युरगो यथा च । विहाय गच्छत्यनवेक्षमाण । स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ॥
yathā ruruḥ śṛṅgamatho purāṇaṃ | hitvā tvacaṃ vā'pyurago yathā ca | vihāya gacchatyanavekṣamāṇa | stathā vimukto vijahāti duḥkham
जैसे मृग अपना पुराना सींग और साँप अपनी केंचुली छोड़कर बिना पीछे देखे चला जाता है, वैसे ही मुक्त पुरुष दुःख को छोड़ देता है।
श्लोक 59 (12.222.59)
द्रुमं यथावाऽप्युदके पतन्त । मुत्सृज्य पक्षी निपतत्यसक्तः । तथा ह्यसौ सुखदुःखे विहाय । मुक्तः पराद्धर्यां गतिमेत्यलिङ्गः ॥
drumaṃ yathāvā'pyudake patanta | mutsṛjya pakṣī nipatatyasaktaḥ | tathā hyasau sukhaduḥkhe vihāya | muktaḥ parāddharyāṃ gatimetyaliṅgaḥ
जैसे पक्षी जल में गिरते हुए वृक्ष को छोड़कर अनासक्त भाव से उड़ जाता है, वैसे ही वह सुख-दुःख को त्यागकर मुक्त हो चिह्नरहित श्रेष्ठ गति को पाता है।
श्लोक 60 (12.222.60)
इमान्स्वलोकाननुपश्य सर्वान् । व्रजन्यथाकाशमिवाप्तकामः । इमां हि गाथां प्रलपन्यथास्ति । समस्तसंकल्पविशेषमुक्तः । अहं हि सर्वं किल सर्वभावे । ह्यहं तदन्तर्ह्यहमेव भोक्ता ॥
imānsvalokānanupaśya sarvān | vrajanyathākāśamivāptakāmaḥ | imāṃ hi gāthāṃ pralapanyathāsti | samastasaṃkalpaviśeṣamuktaḥ | ahaṃ hi sarvaṃ kila sarvabhāve | hyahaṃ tadantarhyahameva bhoktā
अपने इन सब लोकों को देखता हुआ, आकाश की भाँति विचरता हुआ, पूर्णकाम होकर, इस गाथा को जैसी है वैसी गाता हुआ और हर विशेष संकल्प से मुक्त होकर वह कहता है—"मैं ही सब हूँ, सबके भाव में; मैं उसके भीतर हूँ, और मैं ही भोक्ता हूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 61 (12.222.61)
अपिच भवति मैथिलेन गीतं । नगरमुपाहितमग्निनाऽभिवीक्ष्य । न खलु मम तुषोऽपि दह्यतेऽत्र । स्वयमिदमाह किल स्म भूमिपालः ॥
apica bhavati maithilena gītaṃ | nagaramupāhitamagninā'bhivīkṣya | na khalu mama tuṣo'pi dahyate'tra | svayamidamāha kila sma bhūmipālaḥ
और मिथिला के राजा का गाया हुआ एक श्लोक भी है। अपने नगर को आग से घिरा देखकर उस राजा ने स्वयं कहा था—"निश्चय ही यहाँ मेरा भूसी का एक कण भी नहीं जल रहा।"
श्लोक 62 (12.222.62)
इदममृतपदं विदेहराजा । स्वयमिह पञ्चशिखेन भाष्यमाणम् । निखिलमभिसमीक्ष्य निश्चितार्थः । परमसुखी विजहार वीतशोकः ॥
idamamṛtapadaṃ videharājā | svayamiha pañcaśikhena bhāṣyamāṇam | nikhilamabhisamīkṣya niścitārthaḥ | paramasukhī vijahāra vītaśokaḥ
यहाँ पञ्चशिख के स्वयं कहे हुए इस अमृतपद को पूरी तरह समझकर विदेहराज निश्चित अर्थ वाले होकर शोकरहित और परम सुखी हो विचरते रहे।
श्लोक 63 (12.222.63)
इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं । महीपते सततमवेक्षते तथा । उपद्रवान्नानुभवत्यदुःखितः । प्रमुच्यते कपिलमिवैत्य मैथिलः ॥
imaṃ hi yaḥ paṭhati vimokṣaniścayaṃ | mahīpate satatamavekṣate tathā | upadravānnānubhavatyaduḥkhitaḥ | pramucyate kapilamivaitya maithilaḥ
हे राजन्! जो इस मोक्ष-निश्चय को पढ़ता है और निरन्तर इस पर विचार करता है, वह उपद्रवों का अनुभव नहीं करता, दुःखरहित रहता है और कपिल के पास पहुँचे हुए मैथिल की भाँति मुक्त हो जाता है।