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शान्ति पर्व · अध्याय 223

जनक और मिथिला का दाह

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मिथिला के जलने पर मिथिला-नरेश ने शोक क्यों नहीं किया। भीष्म बताते हैं कि भगवान् ब्राह्मण का रूप धरकर जनक की परीक्षा लेने आए और राज्य से निकाले गए; जनक अपने राज्य की सीमा न बता सके और बोले कि सारी पृथ्वी ही उनकी है और यहाँ उनका कोई निवास नहीं। ब्राह्मण ने मिथिला को जला दिया, तब भी जनक ने कहा कि उनका कुछ नहीं जल रहा। तब भगवान् ने नगरी को फिर जीवित किया, अपना स्वरूप दिखाया और जनक को आशीर्वाद दिया।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.223.1)

किं कारणं महाप्राज्ञ दह्यमानश्च मैथिलः । मिथिलां नेह धर्मात्मा प्राह वीक्ष्य विदाहिताम् ॥

kiṃ kāraṇaṃ mahāprājña dahyamānaśca maithilaḥ | mithilāṃ neha dharmātmā prāha vīkṣya vidāhitām

हे महाप्राज्ञ! वह क्या कारण था कि धर्मात्मा मैथिल ने जलती हुई मिथिला को आग में घिरा देखकर भी उसके लिए शोक की बात नहीं कही?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.223.2)

श्रूयतां नृपशार्दूल यदर्थं दीपिता पुरा । वह्निना दीपिता सा तु तन्मे शृणु महामते ॥

śrūyatāṃ nṛpaśārdūla yadarthaṃ dīpitā purā | vahninā dīpitā sā tu tanme śṛṇu mahāmate

हे नृपश्रेष्ठ, सुनिए कि प्राचीन काल में मिथिला क्यों जलाई गई थी। वह अग्नि से जलाई गई थी; हे महामते, वह मुझसे सुनिए।

श्लोक 3 (12.223.3)

जनको जनदेवस्तु कर्माण्याध्याय चात्मनि । सर्वभावमनुप्राप्य भावेन विचचार सः ॥

janako janadevastu karmāṇyādhyāya cātmani | sarvabhāvamanuprāpya bhāvena vicacāra saḥ

नरेश जनक अपने कर्मों को आत्मा में समर्पित करके और सर्वभाव को प्राप्त करके उसी भाव से विचरते रहे।

श्लोक 4 (12.223.4)

यजन्ददंस्तथा जुह्वन्पालयन्पृथिवीमिमाम् । अध्यात्मविन्महाप्राज्ञस्तन्मयत्वेन निष्ठितः ॥

yajandadaṃstathā juhvanpālayanpṛthivīmimām | adhyātmavinmahāprājñastanmayatvena niṣṭhitaḥ

यज्ञ करते, दान देते, आहुति डालते और इस पृथ्वी का पालन करते हुए वे अध्यात्म के ज्ञाता, महाप्राज्ञ राजा उसी में तन्मय होकर स्थित रहे।

श्लोक 5 (12.223.5)

स तस्य हृदि संकल्पं ज्ञातुमैच्छत्स्वयं प्रभुः । सर्वलोकाधिपस्तत्र द्विजरूपेण संयुतः ॥

sa tasya hṛdi saṃkalpaṃ jñātumaicchatsvayaṃ prabhuḥ | sarvalokādhipastatra dvijarūpeṇa saṃyutaḥ

सब लोकों के अधिपति स्वयं प्रभु ने उनके हृदय का संकल्प जानना चाहा और ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ आए।

श्लोक 6 (12.223.6)

मिथिलायां महाबुद्धिर्व्यलीकं किंचिदाचरन् । स गृहीत्वा द्विजश्रेष्ठैर्नृपाय प्रतिवेदितः ॥

mithilāyāṃ mahābuddhirvyalīkaṃ kiṃcidācaran | sa gṛhītvā dvijaśreṣṭhairnṛpāya prativeditaḥ

मिथिला में उन महाबुद्धि ने कोई छोटा-सा अपराध किया; श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उन्हें पकड़कर राजा को बताया।

श्लोक 7 (12.223.7)

अपराधं समुद्दिश्य तं राजा प्रत्यभाषत । न त्वां ब्राह्मण दण्डेन नियोक्ष्यामि कथंचन ॥

aparādhaṃ samuddiśya taṃ rājā pratyabhāṣata | na tvāṃ brāhmaṇa daṇḍena niyokṣyāmi kathaṃcana

उस अपराध के विषय में राजा ने उनसे कहा—"हे ब्राह्मण, मैं तुम्हें किसी प्रकार दण्ड नहीं दूँगा।

श्लोक 8 (12.223.8)

मम राज्याद्विनिर्गच्छ यावत्सीमा भुवो मम । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो गत्वा राजानं प्रत्युवाच ह ॥

mama rājyādvinirgaccha yāvatsīmā bhuvo mama | tacchrutvā brāhmaṇo gatvā rājānaṃ pratyuvāca ha

मेरे राज्य से निकल जाओ, जहाँ तक मेरी भूमि की सीमा है।" यह सुनकर ब्राह्मण ने राजा के पास जाकर उत्तर दिया—

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 9 (12.223.9)

करिष्ये वचनं राजन्ब्रवीहि मम जानतः । का सीमा तव भूमेस्तु ब्रूहि धर्मं ममाद्य वै ॥

kariṣye vacanaṃ rājanbravīhi mama jānataḥ | kā sīmā tava bhūmestu brūhi dharmaṃ mamādya vai

"राजन्! मैं आपकी बात मानूँगा। मुझे बताइए, ताकि मैं जान सकूँ—आपकी भूमि की सीमा क्या है? आज ही मुझे उसका धर्म बताइए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (12.223.10)

तच्छ्रुत्वा मैथिलो राजा लज्जयावनताननः । नोवाच वचनं विप्रं तत्वबुद्ध्या समीक्ष्य तत् ॥

tacchrutvā maithilo rājā lajjayāvanatānanaḥ | novāca vacanaṃ vipraṃ tatvabuddhyā samīkṣya tat

यह सुनकर मिथिला के राजा का मुख लज्जा से झुक गया। सत्य की बुद्धि से उस पर विचार करते हुए उन्होंने ब्राह्मण से कुछ नहीं कहा।

श्लोक 11 (12.223.11)

पुनःपुनश्च तं विप्रश्चोदयामास सत्वरम् । ब्रूहि राजेन्द्र गच्छामि तव राज्याद्विवासितः ॥

punaḥpunaśca taṃ vipraścodayāmāsa satvaram | brūhi rājendra gacchāmi tava rājyādvivāsitaḥ

ब्राह्मण ने बार-बार उतावली से उन्हें प्रेरित किया—"हे राजेन्द्र, बताइए; मैं आपके राज्य से निकाला गया हूँ, इसलिए चला जाऊँगा।"

श्लोक 12 (12.223.12)

ततो नृपो विचार्यैवमाह ब्राह्मणपुङ्गवम् । आवासो वा न मेऽस्त्यत्र सर्वा वा पृथिवी मम । गच्छ वा तिष्ठ वा ब्रह्मन्निति मे निश्चिता मतिः ॥

tato nṛpo vicāryaivamāha brāhmaṇapuṅgavam | āvāso vā na me'styatra sarvā vā pṛthivī mama | gaccha vā tiṣṭha vā brahmanniti me niścitā matiḥ

तब राजा ने विचार करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से कहा—"यहाँ मेरा कोई निवास नहीं है, अथवा सारी पृथ्वी ही मेरी है। हे ब्राह्मण, जाओ या ठहरो—यही मेरा निश्चित मत है।"

श्लोक 13 (12.223.13)

इत्युक्तः स तथा तेन मैथिलेन द्विजोत्तमः । अब्रवीत्तं महात्मानं राजानं मन्त्रिभिर्वृतम् ॥

ityuktaḥ sa tathā tena maithilena dvijottamaḥ | abravīttaṃ mahātmānaṃ rājānaṃ mantribhirvṛtam

मैथिल के ऐसा कहने पर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने मन्त्रियों से घिरे हुए उस महात्मा राजा से कहा—

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 14 (12.223.14)

त्वमेवं पद्मनाभस्य नित्यं पक्षपदाहितः । अहो सिद्धार्थरूपोऽसि गमिष्ये स्वस्ति तेऽस्तु वै ॥

tvamevaṃ padmanābhasya nityaṃ pakṣapadāhitaḥ | aho siddhārtharūpo'si gamiṣye svasti te'stu vai

"आप सदा पद्मनाभ के पक्ष में स्थापित हैं। अहो, आप सिद्धार्थरूप हैं! मैं जाऊँगा; आपका कल्याण हो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 15 (12.223.15)

इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तज्जिज्ञासुर्द्विजोत्तमः । अदहच्चाग्निना तस्य मिथिलां भगवान्स्वयम् ॥

ityuktvā prayayau viprastajjijñāsurdvijottamaḥ | adahaccāgninā tasya mithilāṃ bhagavānsvayam

यह कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें परखने की इच्छा से चला गया, और स्वयं भगवान् ने उनकी मिथिला को अग्नि से जला दिया।

श्लोक 16 (12.223.16)

प्रदीप्यमानां मिथिलां दृष्ट्वा राजा न कम्पितः । जनैः स परिपृष्टस्तु वाक्यमेतदुवाच ह ॥

pradīpyamānāṃ mithilāṃ dṛṣṭvā rājā na kampitaḥ | janaiḥ sa paripṛṣṭastu vākyametaduvāca ha

जलती हुई मिथिला को देखकर राजा काँपे नहीं। लोगों के पूछने पर उन्होंने यह वचन कहा—

जनक उवाच

श्लोक 17 (12.223.17)

अनन्तं वत मे वित्तं भाव्यं मे नास्ति किंचन । मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचन दह्यते ॥

anantaṃ vata me vittaṃ bhāvyaṃ me nāsti kiṃcana | mithilāyāṃ pradīptāyāṃ na me kiṃcana dahyate

"मेरा धन सचमुच अनन्त है; मेरा अपना कुछ भी नहीं है। मिथिला के जलने पर मेरा कुछ भी नहीं जल रहा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (12.223.18)

तदस्य भाषमाणस्य श्रुत्वा श्रुत्वा हृदि स्थितम् । पुनः संजीवयामास मिथिलां तां द्विजोत्तमः ॥

tadasya bhāṣamāṇasya śrutvā śrutvā hṛdi sthitam | punaḥ saṃjīvayāmāsa mithilāṃ tāṃ dvijottamaḥ

बोलते हुए राजा के हृदय में स्थित भाव को बार-बार सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उस मिथिला को फिर जीवित कर दिया।

श्लोक 19 (12.223.19)

आत्मानं दर्शयामास वरं चास्मै ददौ पुनः । धर्मे तिष्ठस्व सद्भावो बुद्धिस्तेऽर्थे नराधिप ॥

ātmānaṃ darśayāmāsa varaṃ cāsmai dadau punaḥ | dharme tiṣṭhasva sadbhāvo buddhiste'rthe narādhipa

उन्होंने अपना स्वरूप दिखाया और उन्हें फिर एक वर भी दिया—"धर्म में स्थिर रहो; तुम्हारा भाव शुभ हो और तुम्हारी बुद्धि उचित प्रयोजन में लगी रहे, हे नराधिप।

श्लोक 20 (12.223.20)

सत्ये तिष्ठस्व निर्विण्णः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् । इत्युक्त्वा भगवांश्चैनं तत्रैवान्तरधीयत । एतत्ते कथितं राजन्किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

satye tiṣṭhasva nirviṇṇaḥ svasti te'stu vrajāmyaham | ityuktvā bhagavāṃścainaṃ tatraivāntaradhīyata | etatte kathitaṃ rājankiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

सत्य में स्थिर रहो, आसक्ति से मुक्त रहो; तुम्हारा कल्याण हो, मैं जाता हूँ।" यह कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए। "हे राजन्, यह तुम्हें सुना दिया; और क्या सुनना चाहते हो?"

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