शान्ति पर्व · अध्याय 224
श्वेतकेतु और सुवर्चला का विवाह
युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या कोई गृहस्थ रहकर भी संसार से मुक्त हो सकता है, और भीष्म देवल की कन्या सुवर्चला की कथा सुनाते हैं, जो केवल ऐसे पुरुष से विवाह करना चाहती है जो अन्धा भी हो और अन्धा न भी हो। सभा में आए मुनि अपमानित होकर लौट जाते हैं, फिर उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु इस पहेली का अर्थ इन्द्रियों पर प्रभुत्व बताकर समझाता है और स्वीकार किया जाता है। विवाह के बाद सुवर्चला उससे पूछती है कि वह कौन है और शब्द तथा अर्थ का क्या सम्बन्ध है; वह उसे बताता है कि परम वाणी से परे है फिर भी वेद से जाना जाता है। इसी ज्ञान में गृहस्थ जीवन बिताकर दोनों परम गति को प्राप्त होते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.224.1)
अस्ति कश्चिद्यदि विभो सदारो नियतो गृहे । अतीतसर्वसंसारः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः । तं मे ब्रूहि महाप्राज्ञ दुर्लभः पुरुषो महान् ॥
asti kaścidyadi vibho sadāro niyato gṛhe | atītasarvasaṃsāraḥ sarvadvandvavivarjitaḥ | taṃ me brūhi mahāprājña durlabhaḥ puruṣo mahān
हे विभो! क्या ऐसा कोई पुरुष है जो पत्नी के साथ घर में रहता हुआ भी संयमी हो, सारे संसार को पार कर चुका हो और सब द्वन्द्वों से मुक्त हो? हे महाप्राज्ञ! उसके विषय में मुझे बताइए; ऐसा महान पुरुष दुर्लभ होता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.224.2)
शृणु राजन्यथावृत्तं यन्मां त्वं पृष्टवानसि । इतिहासमिमं शुद्धं संसारभयभेषजम् ॥
śṛṇu rājanyathāvṛttaṃ yanmāṃ tvaṃ pṛṣṭavānasi | itihāsamimaṃ śuddhaṃ saṃsārabhayabheṣajam
हे राजन्! आपने मुझसे जो पूछा है, उसे जैसा घटा था वैसा सुनिए। यह शुद्ध इतिहास है, संसार के भय की औषधि है।
श्लोक 3 (12.224.3)
देवलो नाम विप्रर्षिः सर्वशास्त्रार्थकोविदः । क्रियावान्धार्मिको नित्यं देवब्राह्मणपूजकः ॥
devalo nāma viprarṣiḥ sarvaśāstrārthakovidaḥ | kriyāvāndhārmiko nityaṃ devabrāhmaṇapūjakaḥ
देवल नाम के एक ब्रह्मर्षि थे, जो सब शास्त्रों के अर्थ के ज्ञाता, कर्मनिष्ठ, धार्मिक और सदा देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करने वाले थे।
श्लोक 4 (12.224.4)
सुता सुवर्चला नाम तस्य कल्याणलक्षणा । नातिह्रस्वा नातिकृशा नातिदीर्घा यशस्विनी । प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य ह्यचिन्तयत् ॥
sutā suvarcalā nāma tasya kalyāṇalakṣaṇā | nātihrasvā nātikṛśā nātidīrghā yaśasvinī | pradānasamayaṃ prāptā pitā tasya hyacintayat
उनकी सुवर्चला नाम की कन्या थी, जो शुभ लक्षणों से युक्त थी; वह न अधिक नाटी थी, न अधिक दुबली, न अधिक लम्बी, और यशस्विनी थी। जब वह विवाह के योग्य अवस्था को पहुँची, तो उसके पिता सोचने लगे।
श्लोक 5 (12.224.5)
अस्याः पतिः कुतो वेति ब्राह्मणः श्रोत्रियः परः । विद्वान्विप्रो ह्यकुटुम्बः प्रियवादी महातपाः ॥
asyāḥ patiḥ kuto veti brāhmaṇaḥ śrotriyaḥ paraḥ | vidvānvipro hyakuṭumbaḥ priyavādī mahātapāḥ
'इसका पति कहाँ से मिलेगा? वह ऐसा ब्राह्मण होना चाहिए जो वेदज्ञ और श्रेष्ठ हो, विद्वान हो, कुटुम्ब के बन्धनों से रहित हो, प्रिय बोलने वाला और महान तपस्वी हो।'
श्लोक 6 (12.224.6)
इत्येवं चिन्तयानं तं रहस्याह सुवर्चला ॥
ityevaṃ cintayānaṃ taṃ rahasyāha suvarcalā
वे इस प्रकार सोच ही रहे थे कि सुवर्चला ने एकान्त में उनसे कहा।
सुवर्चलोवाच
श्लोक 7 (12.224.7)
अन्धाय मां महाप्राज्ञ देह्यनन्धाय वै पितः । एवं स्मर सदा विद्वन्ममेदं प्रार्थितं मुने ॥
andhāya māṃ mahāprājña dehyanandhāya vai pitaḥ | evaṃ smara sadā vidvanmamedaṃ prārthitaṃ mune
'हे पिताजी, हे महाप्राज्ञ! मुझे किसी अन्धे को दीजिए, जो अन्धा न हो उसे नहीं। हे विद्वान मुनि! यही मेरी प्रार्थना है, इसे सदा स्मरण रखिए।'
पितोवाच
श्लोक 8 (12.224.8)
न शक्यं प्रार्थितं वत्से त्वयाऽद्य प्रतिभाति मे । अन्धतानन्धता चेति विकारो मम जायते ॥
na śakyaṃ prārthitaṃ vatse tvayā'dya pratibhāti me | andhatānandhatā ceti vikāro mama jāyate
'बेटी, तुम जो माँग रही हो वह सम्भव नहीं है; मुझे तो अभी ऐसा ही लगता है। यह अन्धता और अनन्धता की बात मुझे उलझन में डाल रही है।'
श्लोक 9 (12.224.9)
उन्मत्तेवाशुभं वाक्यं भाषसे शुभलोचने ॥
unmattevāśubhaṃ vākyaṃ bhāṣase śubhalocane
'हे सुन्दर नेत्रों वाली! तुम तो उन्मत्त की तरह अशुभ बात बोल रही हो।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 10 (12.224.10)
नाहमुन्मत्तभूताऽद्य बुद्धिपूर्वं ब्रवीमि ते । विद्यते चेत्पतिस्तादृक्स मां भरति वेदवित् ॥
nāhamunmattabhūtā'dya buddhipūrvaṃ bravīmi te | vidyate cetpatistādṛksa māṃ bharati vedavit
'मैं उन्मत्त नहीं हुई हूँ; मैं आपसे सोच-समझकर कह रही हूँ। यदि वैसा कोई पति है, कोई वेदवेत्ता, तो वही मेरा भरण-पोषण करेगा।'
श्लोक 11 (12.224.11)
येभ्यस्त्वं मन्यसे दातुं मामिहानय तान्द्विजान् । तादृशं तं पतिं तेषु वरयिष्ये यथातथम् ॥
yebhyastvaṃ manyase dātuṃ māmihānaya tāndvijān | tādṛśaṃ taṃ patiṃ teṣu varayiṣye yathātatham
'आप जिन ब्राह्मणों को मुझे देने की सोचते हैं, उन्हें यहाँ बुलवाइए। उन्हीं में से मैं वैसे पति को ठीक-ठीक चुन लूँगी।'
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (12.224.12)
तथेति चोक्त्वा तां कन्यामृषिः शिष्यानुवाच ह । ब्राह्मणान्वेदसंपन्नान्योनिगोत्रविशोधितान् ॥
tatheti coktvā tāṃ kanyāmṛṣiḥ śiṣyānuvāca ha | brāhmaṇānvedasaṃpannānyonigotraviśodhitān
कन्या से 'ऐसा ही हो' कहकर ऋषि ने अपने शिष्यों से कहा, 'जो ब्राह्मण वेद में निपुण हों और जिनके जन्म तथा गोत्र की शुद्धि जाँच ली गई हो,
पितोवाच
श्लोक 13 (12.224.13)
मातृतः पितृतः शुद्धाञ्शुद्धानाचारतः शुभान् । अरोगान्बुद्धिसंपन्नाञ्शीलसत्वगुणान्वितान् ॥
mātṛtaḥ pitṛtaḥ śuddhāñśuddhānācārataḥ śubhān | arogānbuddhisaṃpannāñśīlasatvaguṇānvitān
जो माता और पिता दोनों की ओर से शुद्ध हों, आचरण में शुद्ध और भले हों, नीरोग हों, बुद्धिमान हों, शील, सत्त्व और गुणों से युक्त हों,
श्लोक 14 (12.224.14)
असंकीर्णांश्च गोत्रेषु वेदव्रतसमन्वितान् । ब्राह्मणान्स्नातकाञ्शीघ्रं मातापितृसमन्वितान् । निवेष्टुकामान्कन्यां मे दृष्ट्वाऽऽनयत शिष्यकाः ॥
asaṃkīrṇāṃśca gotreṣu vedavratasamanvitān | brāhmaṇānsnātakāñśīghraṃ mātāpitṛsamanvitān | niveṣṭukāmānkanyāṃ me dṛṣṭvā''nayata śiṣyakāḥ
जिनके कुल में मिश्रण न हुआ हो, जो वेद के व्रतों का पालन करते हों, जो स्नातक ब्राह्मण हों, जिनके माता-पिता जीवित हों और जो विवाह करना चाहते हों, उन्हें खोजकर, हे शिष्यो, मेरी कन्या के लिए शीघ्र ले आओ।'
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (12.224.15)
तच्छ्रुत्वा त्वरिताः शिष्या ह्याश्रमेषु ततस्ततः । ग्रामेषु च ततो गत्वा ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥
tacchrutvā tvaritāḥ śiṣyā hyāśrameṣu tatastataḥ | grāmeṣu ca tato gatvā brāhmaṇebhyo nyavedayan
यह सुनकर शिष्य उतावली से इधर-उधर आश्रमों में गए, फिर गाँवों में भी जाकर उन्होंने ब्राह्मणों को यह सूचना दी।
श्लोक 16 (12.224.16)
ऋषेः प्रभावं मत्वा ते कन्यायाश्च द्विजोत्तमाः । अनेकमुनयो राजन्संप्राप्ता देवलाश्रमम् ॥
ṛṣeḥ prabhāvaṃ matvā te kanyāyāśca dvijottamāḥ | anekamunayo rājansaṃprāptā devalāśramam
हे राजन्! ऋषि और कन्या के प्रभाव को जानकर बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनि देवल के आश्रम में आ पहुँचे।
श्लोक 17 (12.224.17)
अनुमान्य यथान्यायं मुनीन्मुनिकुमारकान् । अभ्यर्च्य विधिवत्तत्र कन्यामाह पिता महान् ॥
anumānya yathānyāyaṃ munīnmunikumārakān | abhyarcya vidhivattatra kanyāmāha pitā mahān
मुनियों और मुनिकुमारों का यथोचित सम्मान करके तथा वहाँ विधिपूर्वक उनकी पूजा करके महान पिता ने कन्या से कहा।
पितोवाच
श्लोक 18 (12.224.18)
एतेऽपि मुनयो वत्से स्वपुत्रैकमता इह । वेदवेदाङ्गसंपन्नाः कुलीनाः शीलसंमताः ॥
ete'pi munayo vatse svaputraikamatā iha | vedavedāṅgasaṃpannāḥ kulīnāḥ śīlasaṃmatāḥ
'बेटी, ये मुनि भी यहाँ अपने पुत्रों के ही मत के हैं। ये वेद और वेदांगों में निपुण, कुलीन और शील के लिए सम्मानित हैं।
श्लोक 19 (12.224.19)
येऽमी तेषु वरं भद्रे त्वमिच्छसि महाव्रतम् । तं कुमारं वृणीष्वाद्य तस्मै दास्याम्यहं शुभे ॥
ye'mī teṣu varaṃ bhadre tvamicchasi mahāvratam | taṃ kumāraṃ vṛṇīṣvādya tasmai dāsyāmyahaṃ śubhe
हे भद्रे! इनमें से जिस महाव्रती कुमार को तुम चाहती हो, उसी को आज चुन लो; हे शुभे, उसी को मैं तुम्हें दूँगा।'
भीष्म उवाच
श्लोक 20 (12.224.20)
तथेति चोक्त्वा कल्याणी तप्तहेमनिभा तदा । सर्वलक्षणसंपन्ना वाक्यमाह यशस्विनी ॥
tatheti coktvā kalyāṇī taptahemanibhā tadā | sarvalakṣaṇasaṃpannā vākyamāha yaśasvinī
'ऐसा ही हो,' उस तपे सोने के रंग वाली, सब लक्षणों से सम्पन्न, यशस्विनी कल्याणी कन्या ने कहा और फिर वह बोली।
श्लोक 21 (12.224.21)
विप्राणां समितीर्दृष्ट्वा प्रणिपत्य तपोधनान् । यद्यस्ति समितौ विप्रो ह्यन्धोऽनन्धः स मे वरः ॥
viprāṇāṃ samitīrdṛṣṭvā praṇipatya tapodhanān | yadyasti samitau vipro hyandho'nandhaḥ sa me varaḥ
ब्राह्मणों की मण्डलियों को देखकर और तपोधनों को प्रणाम करके उसने कहा, 'यदि इस सभा में कोई ऐसा ब्राह्मण है जो अन्धा भी है और अन्धा नहीं भी है, तो वही मेरा वर है।'
श्लोक 22 (12.224.22)
तच्छ्रुत्वा मुनयस्तत्र वीक्षमाणाः परस्परम् । नोचुर्विप्रा महाभागाः कन्यां मत्वा ह्यवेदिकां ॥
tacchrutvā munayastatra vīkṣamāṇāḥ parasparam | nocurviprā mahābhāgāḥ kanyāṃ matvā hyavedikāṃ
यह सुनकर वहाँ के मुनि एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। उन महाभाग ब्राह्मणों ने कन्या को वेद से अनजान समझकर कुछ नहीं कहा।
श्लोक 23 (12.224.23)
कुत्सयित्वा मुनिं तत्र मनसा मुनिसत्तमाः । यथागतं ययुः क्रुद्धा नानादेशनिवासिनः ॥
kutsayitvā muniṃ tatra manasā munisattamāḥ | yathāgataṃ yayuḥ kruddhā nānādeśanivāsinaḥ
नाना देशों में रहने वाले वे श्रेष्ठ मुनि मन ही मन देवल मुनि की निन्दा करके क्रोधित हो जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 24 (12.224.24)
कन्या च संस्थिता तत्र पितृवेश्मनि भामिनी ॥
kanyā ca saṃsthitā tatra pitṛveśmani bhāminī
और वह कन्या वहीं अपने पिता के घर में रह गई।
श्लोक 25 (12.224.25)
ततः कदाचिद्ब्रह्मण्यो विद्वान्न्यायविशारदः । ऊहापोहविधानज्ञो ब्रह्मचर्यसमन्वितः ॥
tataḥ kadācidbrahmaṇyo vidvānnyāyaviśāradaḥ | ūhāpohavidhānajño brahmacaryasamanvitaḥ
तब एक बार एक ब्राह्मणनिष्ठ विद्वान आया, जो न्याय में कुशल था, तर्क और खण्डन की विधि का ज्ञाता था और ब्रह्मचर्य का पालन करता था,
श्लोक 26 (12.224.26)
वेदविद्वेदतत्वज्ञः क्रियाकल्पविशारदः । आत्मतत्वविभागज्ञः पितृमान्गुणसागरः ॥
vedavidvedatatvajñaḥ kriyākalpaviśāradaḥ | ātmatatvavibhāgajñaḥ pitṛmānguṇasāgaraḥ
जो वेदवेत्ता और वेद के तत्त्व का ज्ञाता था, क्रिया और कल्प में निपुण था, आत्मतत्त्व के विभागों को जानता था, जिसके पिता जीवित थे और जो गुणों का सागर था,
श्लोक 27 (12.224.27)
श्वेतकेतुरिति ख्यातः श्रुत्वा वृत्तान्तमादरात् । कन्यार्थं देवलं चापि शीघ्रं तत्रागतोऽभवत् ॥
śvetaketuriti khyātaḥ śrutvā vṛttāntamādarāt | kanyārthaṃ devalaṃ cāpi śīghraṃ tatrāgato'bhavat
श्वेतकेतु नाम से प्रसिद्ध था। यह समाचार सुनकर वह उत्सुकता से कन्या के निमित्त शीघ्र ही देवल के पास आ पहुँचा।
श्लोक 28 (12.224.28)
उद्दालकसुतं दृष्ट्वा श्वेतकेतुं महाव्रतम् । यथान्यायं च संपूज्य देवलः प्रत्यभाषत ॥
uddālakasutaṃ dṛṣṭvā śvetaketuṃ mahāvratam | yathānyāyaṃ ca saṃpūjya devalaḥ pratyabhāṣata
उद्दालक के पुत्र महाव्रती श्वेतकेतु को देखकर और यथाविधि उसका सत्कार करके देवल ने उससे बात की।
पितोवाच
श्लोक 29 (12.224.29)
कन्ये एष महाभागे प्राप्तो ऋषिकुमारकः । वरयैनं महाप्राज्ञं वेदवेदाङ्गपारगम् ॥
kanye eṣa mahābhāge prāpto ṛṣikumārakaḥ | varayainaṃ mahāprājñaṃ vedavedāṅgapāragam
'हे महाभागे कन्ये! यह ऋषिकुमार आया है। वेद और वेदांगों में पारंगत इस महाप्राज्ञ को वर लो।'
भीष्म उवाच
श्लोक 30 (12.224.30)
तच्छ्रुत्वा कुपिता कन्या ऋषिपुत्रमुदैक्षत । तां कन्यामाह विप्रर्षिः सोऽहं भद्रे समागतः ॥
tacchrutvā kupitā kanyā ṛṣiputramudaikṣata | tāṃ kanyāmāha viprarṣiḥ so'haṃ bhadre samāgataḥ
यह सुनकर कन्या कुपित हुई और उसने ऋषिपुत्र की ओर देखा। तब उस ब्राह्मण ऋषि ने कन्या से कहा, 'हे भद्रे, मैं वही हूँ जो आया है।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 31 (12.224.31)
अन्धोऽहमत्र तत्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा । विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम् । वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते ॥
andho'hamatra tatvaṃ hi tathā manye ca sarvadā | viśālanayanaṃ viddhi tathā māṃ hīnasaṃśayam | vṛṇīṣva māṃ varārohe bhaje ca tvāmanindite
'इस विषय में मैं अन्धा हूँ, क्योंकि यही तत्त्व है और मैं सदा ऐसा ही मानता हूँ। फिर भी मुझे निस्सन्देह विशाल नेत्रों वाला भी जानो। हे वरारोहे! मुझे वर लो; हे अनिन्दिते, मैं तुम्हारी सेवा करूँगा।
श्लोक 32 (12.224.32)
येनेदं वीक्षते नित्यं शृणोति स्पृशतेऽथवा । घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसयते पुनः ॥
yenedaṃ vīkṣate nityaṃ śṛṇoti spṛśate'thavā | ghrāyate vakti satataṃ yenedaṃ rasayate punaḥ
जिसके द्वारा मनुष्य इसे सदा देखता है, सुनता है अथवा छूता है; जिससे सूँघता है, बोलता है और फिर रस लेता है;
श्लोक 33 (12.224.33)
येनेदं मन्यते तत्वं येन बुध्यति वा पुनः । न चक्षुर्विद्यते ह्येतत्स वै भूतान्ध उच्यते ॥
yenedaṃ manyate tatvaṃ yena budhyati vā punaḥ | na cakṣurvidyate hyetatsa vai bhūtāndha ucyate
जिसके द्वारा वह इस तत्त्व पर विचार करता है और जिससे बार-बार जानता है, वह नेत्र नहीं है। जिसके पास वही है वह भूतों के प्रति अन्धा कहलाता है।
श्लोक 34 (12.224.34)
यस्मिन्प्रवर्तते चेदं पश्यञ्छृण्वन्स्पृशन्नपि । जिघ्रंश्च रसयंस्तद्वद्वर्तते येन चक्षुषा ॥
yasminpravartate cedaṃ paśyañchṛṇvanspṛśannapi | jighraṃśca rasayaṃstadvadvartate yena cakṣuṣā
जिसमें यह सब चलता है, जब मनुष्य देखता, सुनता, छूता, सूँघता और रस लेता है, और जिस नेत्र से यह इसी प्रकार चलता है,
श्लोक 35 (12.224.35)
तन्मे नास्ति ततो ह्यन्धो वृणु भद्रेऽद्य मामतः । लोकदृष्ट्या करोमीह नित्यनैमित्तिकादिकम् ॥
tanme nāsti tato hyandho vṛṇu bhadre'dya māmataḥ | lokadṛṣṭyā karomīha nityanaimittikādikam
वह मेरे पास नहीं है, इसलिए मैं अन्धा हूँ। अतः हे भद्रे, आज मुझे वर लो। लोक की दृष्टि से मैं नित्य और नैमित्तिक कर्म आदि करता हूँ।
श्लोक 36 (12.224.36)
आत्मदृष्ट्या च तत्सर्वं विलिप्यामि च नित्यशः । स्थितोऽहं निर्भरः शान्तः कार्यकारणभावनः ॥
ātmadṛṣṭyā ca tatsarvaṃ vilipyāmi ca nityaśaḥ | sthito'haṃ nirbharaḥ śāntaḥ kāryakāraṇabhāvanaḥ
फिर भी आत्मदृष्टि से मैं उस सबसे निरन्तर लिप्त रहता हूँ। मैं भारमुक्त और शान्त रहता हूँ, कार्य और कारण पर विचार करता हुआ।
श्लोक 37 (12.224.37)
अविद्यया तरन्मृत्युं विद्यया तं तथाऽमृतम् । यथाप्राप्तं तु संदृश्य वसामीह विमत्सरः । क्रीते व्यवसितं भद्रे भर्ताऽहं ते वृणीष्व माम् ॥
avidyayā taranmṛtyuṃ vidyayā taṃ tathā'mṛtam | yathāprāptaṃ tu saṃdṛśya vasāmīha vimatsaraḥ | krīte vyavasitaṃ bhadre bhartā'haṃ te vṛṇīṣva mām
अविद्या से मनुष्य मृत्यु को पार करता है और विद्या से अमृत को। जो कुछ मिल जाए उसे देखकर मैं ईर्ष्या से रहित हो यहाँ रहता हूँ। हे भद्रे, इस विषय में निश्चय हो चुका है; मैं तुम्हारा पति हूँ। मुझे वर लो।'
भीष्म उवाच
श्लोक 38 (12.224.38)
ततः सुवर्चला दृष्ट्वा प्राह तं द्विजसत्तमम् । मनसाऽसि वृतो विद्वञ्शेषकर्ता पिता मम । वृणीष्व पितरं मह्यमेष वेदविधिक्रमः ॥
tataḥ suvarcalā dṛṣṭvā prāha taṃ dvijasattamam | manasā'si vṛto vidvañśeṣakartā pitā mama | vṛṇīṣva pitaraṃ mahyameṣa vedavidhikramaḥ
तब सुवर्चला ने उस द्विजश्रेष्ठ को देखकर कहा, 'हे विद्वन्! मैंने मन से आपको वर लिया है; शेष कार्य करने वाले मेरे पिता हैं। मेरे लिए मेरे पिता से माँगिए; यही वेद की विधि का क्रम है।'
श्लोक 39 (12.224.39)
तद्विज्ञाय पिता तस्या देवलो मुनिसत्तमः । श्वेतकेतुं च संपूज्य तथैवोद्दालकेन तम् ॥
tadvijñāya pitā tasyā devalo munisattamaḥ | śvetaketuṃ ca saṃpūjya tathaivoddālakena tam
यह जानकर उसके पिता मुनिश्रेष्ठ देवल ने श्वेतकेतु का सत्कार किया, और उद्दालक के साथ उसका भी वैसे ही सम्मान किया।
श्लोक 40 (12.224.40)
मुनीनामग्रतः कन्यां प्रददौ जलपूर्वकम् । उदाहरन्ति वै तत्र श्वेतकेतुं निरीक्ष्य तम् ॥
munīnāmagrataḥ kanyāṃ pradadau jalapūrvakam | udāharanti vai tatra śvetaketuṃ nirīkṣya tam
मुनियों के सामने उसने जल छोड़कर कन्या का दान कर दिया। वहाँ उपस्थित लोग श्वेतकेतु को देखकर यह कहने लगे।
श्लोक 41 (12.224.41)
हृत्पुण्डरीकनिलयः सर्वभूतात्मको हरिः । श्वेतकेतुस्वरूपेण स्थितोऽसौ मधुसूदनः ॥
hṛtpuṇḍarīkanilayaḥ sarvabhūtātmako hariḥ | śvetaketusvarūpeṇa sthito'sau madhusūdanaḥ
'हृदय-कमल में निवास करने वाले, सब प्राणियों के आत्मा हरि, स्वयं मधुसूदन, श्वेतकेतु के रूप में यहाँ स्थित हैं।'
श्लोक 42 (12.224.42)
प्रीयतां माधवो देवः पत्नी चेयं सुता मम । प्रतिपादयामि ते कन्यां सहधर्मचरीं शुभाम् । इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देवलो मुनिपुङ्गवः ॥
prīyatāṃ mādhavo devaḥ patnī ceyaṃ sutā mama | pratipādayāmi te kanyāṃ sahadharmacarīṃ śubhām | ityuktvā pradadau tasmai devalo munipuṅgavaḥ
'देव माधव प्रसन्न हों। यह मेरी पुत्री आपकी पत्नी होगी। मैं आपको यह शुभ कन्या देता हूँ, जो धर्म में आपकी सहचारिणी होगी।' यह कहकर मुनिश्रेष्ठ देवल ने श्वेतकेतु को सौंप दिया।
श्लोक 43 (12.224.43)
प्रतिगृह्य च तां कन्यां श्वेतकेतुर्महायशाः । उपयम्य यथान्यायमत्र कृत्वा यथाविधि ॥
pratigṛhya ca tāṃ kanyāṃ śvetaketurmahāyaśāḥ | upayamya yathānyāyamatra kṛtvā yathāvidhi
महायशस्वी श्वेतकेतु ने उस कन्या को ग्रहण किया और वहीं विधिपूर्वक उससे यथान्याय विवाह किया,
श्लोक 44 (12.224.44)
समाप्य तन्त्रं मुनिभिर्वैवाहिकमनुत्तमम् । स गार्हस्थ्ये वसन्धीमान्भार्यां तामिदमब्रवीत् ॥
samāpya tantraṃ munibhirvaivāhikamanuttamam | sa gārhasthye vasandhīmānbhāryāṃ tāmidamabravīt
और मुनियों के साथ उत्तम विवाह-विधि पूरी करके, गृहस्थ-जीवन बिताते हुए उस बुद्धिमान ने अपनी पत्नी से यह कहा।
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 45 (12.224.45)
यानि चोक्तानि वेदेषु तत्सर्वं कुरु शोभने । मया सह यथान्यायं सहधर्मचरी मम ॥
yāni coktāni vedeṣu tatsarvaṃ kuru śobhane | mayā saha yathānyāyaṃ sahadharmacarī mama
'हे शोभने! वेदों में जो कुछ कहा गया है, वह सब मेरे साथ यथोचित रूप से करो, क्योंकि तुम मेरी सहधर्मचारिणी हो।
श्लोक 46 (12.224.46)
अहमित्येव भावेन स्थितोऽहं त्वं तथैव च । तस्मात्कर्माणि कुर्वीथाः कुर्यां ते च ततः परम् ॥
ahamityeva bhāvena sthito'haṃ tvaṃ tathaiva ca | tasmātkarmāṇi kurvīthāḥ kuryāṃ te ca tataḥ param
मैं 'मैं हूँ' इस भाव में स्थित हूँ, और तुम भी वैसी ही हो। इसलिए तुम कर्म करो; उसके बाद मैं भी उन्हें करूँगा।
श्लोक 47 (12.224.47)
न ममेति च भावेन ज्ञानाग्निनिलयेन च । अनन्तरं तथा कुर्यास्तानि कर्माणि भस्मसात् ॥
na mameti ca bhāvena jñānāgninilayena ca | anantaraṃ tathā kuryāstāni karmāṇi bhasmasāt
उसके पश्चात् 'यह मेरा नहीं है' इस भाव से और ज्ञानाग्नि में स्थित रहकर तुम उन कर्मों को भस्म कर देना।
श्लोक 48 (12.224.48)
एवं त्वया च कर्तव्यं सर्वदाऽदुर्भगा मया । यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । तस्माल्लोकस्य सिद्ध्यर्थं कर्तव्यं चात्मसिद्धये ॥
evaṃ tvayā ca kartavyaṃ sarvadā'durbhagā mayā | yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ | tasmāllokasya siddhyarthaṃ kartavyaṃ cātmasiddhaye
तुम्हें भी सदा इसी प्रकार करना चाहिए; मेरे साथ तुम कभी अभागी नहीं होओगी। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं। इसलिए लोक की सिद्धि के लिए और आत्मसिद्धि के लिए कर्म करना चाहिए।'
भीष्म उवाच
श्लोक 49 (12.224.49)
उक्त्वैवं स महाप्राज्ञः सर्वज्ञानैकभाजनः । पुत्रानुत्पाद्य तस्यां च यज्ञैः संतर्प्य देवताः ॥
uktvaivaṃ sa mahāprājñaḥ sarvajñānaikabhājanaḥ | putrānutpādya tasyāṃ ca yajñaiḥ saṃtarpya devatāḥ
ऐसा कहकर सब ज्ञान के एकमात्र पात्र उस महाप्राज्ञ ने उसमें पुत्र उत्पन्न किए और यज्ञों से देवताओं को तृप्त किया।
श्लोक 50 (12.224.50)
आत्मयोगपरो नित्यं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । भार्यां तां सदृशीं प्राप्य बुद्धिं क्षेत्रज्ञयोरिव ॥
ātmayogaparo nityaṃ nirdvandvo niṣparigrahaḥ | bhāryāṃ tāṃ sadṛśīṃ prāpya buddhiṃ kṣetrajñayoriva
वह सदा आत्मयोग में तत्पर, द्वन्द्वों से मुक्त और अपरिग्रही था। उसे अपने समान पत्नी मिली थी, जैसे बुद्धि और क्षेत्रज्ञ का मेल हो।
श्लोक 51 (12.224.51)
लोकमन्यमनुप्राप्तौ भार्या भर्ता तथैव च । साक्षिभूतौ जगत्यस्मिंश्चरमाणौ मुदाऽन्वितौ ॥
lokamanyamanuprāptau bhāryā bhartā tathaiva ca | sākṣibhūtau jagatyasmiṃścaramāṇau mudā'nvitau
पत्नी और पति दोनों एक अन्य लोक की स्थिति को प्राप्त होकर इस जगत् में साक्षी बनकर आनन्द से विचरते रहे।
श्लोक 52 (12.224.52)
ततः कदाचिद्भर्तारं श्वेतकेतुं सुवर्चला । पप्रच्छ को भवानत्र ब्रूहि मे तद्द्विजोत्तम ॥
tataḥ kadācidbhartāraṃ śvetaketuṃ suvarcalā | papraccha ko bhavānatra brūhi me taddvijottama
तब एक बार सुवर्चला ने अपने पति श्वेतकेतु से पूछा, 'आप यहाँ कौन हैं? हे द्विजोत्तम, मुझे यह बताइए।'
श्लोक 53 (12.224.53)
तामाह भगवान्वाग्मी त्वया ज्ञातो न संशयः । द्विजोत्तमेति मामुक्त्वा पुनः कमनुपृच्छसि ॥
tāmāha bhagavānvāgmī tvayā jñāto na saṃśayaḥ | dvijottameti māmuktvā punaḥ kamanupṛcchasi
भगवान् वाग्मी ने उससे कहा, 'तुमने मुझे निःसन्देह पहचान लिया है। मुझे द्विजोत्तम कहकर अब फिर किसके विषय में पूछती हो?'
श्लोक 54 (12.224.54)
सा तमाह महात्मानं पृच्छामि हृदि शायिनम् । तच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचैनां स न वक्ष्यति भामिनि ॥
sā tamāha mahātmānaṃ pṛcchāmi hṛdi śāyinam | tacchrutvā pratyuvācaināṃ sa na vakṣyati bhāmini
उसने उस महात्मा से कहा, 'मैं हृदय में शयन करने वाले के विषय में पूछ रही हूँ।' यह सुनकर उसने उसे उत्तर दिया, 'हे भामिनि! वह नहीं बताएगा।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 55 (12.224.55)
नामगोत्रसमायुक्तमात्मानं मन्यसे यदि । तन्मिथ्यागोत्रसद्भावे वर्तते देहबन्धनम् ॥
nāmagotrasamāyuktamātmānaṃ manyase yadi | tanmithyāgotrasadbhāve vartate dehabandhanam
'यदि तुम आत्मा को नाम और गोत्र से युक्त मानती हो, तो गोत्र के मिथ्या होने से वहाँ केवल देह का बन्धन ही रहता है।
श्लोक 56 (12.224.56)
अहमित्येष भावोऽत्र त्वयि चापि समाहितः । त्वमप्यहमहं सर्वमहमित्येव वर्तते । नात्र तत्परमार्थं वै किमर्थमनुपृच्छसि ॥
ahamityeṣa bhāvo'tra tvayi cāpi samāhitaḥ | tvamapyahamahaṃ sarvamahamityeva vartate | nātra tatparamārthaṃ vai kimarthamanupṛcchasi
यह 'मैं हूँ' का भाव यहाँ तुममें भी समाया हुआ है। तुम भी 'मैं' हो, सब कुछ 'मैं' ही है; ऐसा ही चलता रहता है। इसमें परम अर्थ कुछ नहीं है; फिर बार-बार क्यों पूछती हो?'
भीष्म उवाच
श्लोक 57 (12.224.57)
ततः प्रहस्य सा हृष्टा भर्तारं धर्मचारिणी । उवाच वचनं काले स्मयमाना तदा नृप ॥
tataḥ prahasya sā hṛṣṭā bhartāraṃ dharmacāriṇī | uvāca vacanaṃ kāle smayamānā tadā nṛpa
तब धर्मचारिणी वह स्त्री हँस पड़ी और प्रसन्न होकर, हे राजन्, मुस्कराती हुई उचित समय पर अपने पति से बोली।
सुवर्चलोवाच
श्लोक 58 (12.224.58)
किमनेकप्रकारेण विरोधेन प्रयोजनम् । क्रियाकलापैर्ब्रह्मर्षे ज्ञाननष्टोऽसि सर्वदा । तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ यथाऽहं त्वामनुव्रता ॥
kimanekaprakāreṇa virodhena prayojanam | kriyākalāpairbrahmarṣe jñānanaṣṭo'si sarvadā | tanme brūhi mahāprājña yathā'haṃ tvāmanuvratā
'इस अनेक प्रकार के विरोध से क्या प्रयोजन? हे ब्रह्मर्षि! कर्मों के समूह में पड़कर आप सदा ज्ञान से भ्रष्ट हैं। इसलिए हे महाप्राज्ञ, मुझे वह बताइए जिससे मैं आपकी निष्ठावती अनुगामिनी बनी रहूँ।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 59 (12.224.59)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । वर्तते तेन लोकोऽयं संकीर्णश्च भविष्यति ॥
yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ | vartate tena loko'yaṃ saṃkīrṇaśca bhaviṣyati
'श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं। उसी से यह लोक चलता है, और वह मर्यादाहीन हो जाएगा।
श्लोक 60 (12.224.60)
संकीर्णे च तथा धर्मे वर्णः संकरमेति च । संकरे च प्रवृत्ते तु मात्स्यो न्यायः प्रवर्तते ॥
saṃkīrṇe ca tathā dharme varṇaḥ saṃkarameti ca | saṃkare ca pravṛtte tu mātsyo nyāyaḥ pravartate
धर्म के संकीर्ण होने पर वर्ण मिल जाते हैं, और वर्णसंकर होने पर मात्स्य न्याय चल पड़ता है।
श्लोक 61 (12.224.61)
तदनिष्टं हरेर्भद्रे धातुरस्य महात्मनः । परमेश्वरसंक्रीडा लोकसृष्टिरियं शुभे ॥
tadaniṣṭaṃ harerbhadre dhāturasya mahātmanaḥ | parameśvarasaṃkrīḍā lokasṛṣṭiriyaṃ śubhe
हे भद्रे! वह इस महात्मा विधाता हरि को अप्रिय है। यह लोक-सृष्टि परमेश्वर की क्रीड़ा है, हे शुभे।
श्लोक 62 (12.224.62)
यावत्पांसव उद्दिष्टास्तावत्योऽस्य विभूतयः । तावत्यश्चैव मायास्तु तावत्योऽस्याश्च शक्तयः ॥
yāvatpāṃsava uddiṣṭāstāvatyo'sya vibhūtayaḥ | tāvatyaścaiva māyāstu tāvatyo'syāśca śaktayaḥ
जितने धूलि-कण बताए गए हैं, उतनी ही उसकी विभूतियाँ हैं, उतनी ही मायाएँ और उतनी ही शक्तियाँ हैं।
श्लोक 63 (12.224.63)
एवं सुगह्वरे युक्तो यत्र मे तद्भवाभवम् । छित्त्वा ज्ञानासिना गच्छेत्स विद्वान्स च मे प्रियः । सोऽहमेव न सन्देहः प्रतिज्ञा इति तस्य वै ॥
evaṃ sugahvare yukto yatra me tadbhavābhavam | chittvā jñānāsinā gacchetsa vidvānsa ca me priyaḥ | so'hameva na sandehaḥ pratijñā iti tasya vai
इस प्रकार अत्यन्त गहन बन में बँधा हुआ, जिसमें मेरे लिए यह उत्पत्ति और विनाश है, जो विद्वान उसे ज्ञान की तलवार से काटकर आगे निकल जाता है, वही मुझे प्रिय है। 'मैं वही हूँ, इसमें सन्देह नहीं' यही उसकी प्रतिज्ञा है।
श्लोक 64 (12.224.64)
ये मूढास्ते दुरात्मानो धर्मसंकरकारकाः । मर्यादाभेदका नीचा नरके यान्ति जन्तवः ॥
ye mūḍhāste durātmāno dharmasaṃkarakārakāḥ | maryādābhedakā nīcā narake yānti jantavaḥ
जो मूढ़ दुरात्मा धर्म में संकर उत्पन्न करते हैं और मर्यादा को तोड़ते हैं, वे नीच प्राणी नरक में जाते हैं।
श्लोक 65 (12.224.65)
आसुरीं योनिमापन्ना इति देवानुशासनम् ॥
āsurīṃ yonimāpannā iti devānuśāsanam
वे आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं; यही देवताओं का अनुशासन है।
श्लोक 66 (12.224.66)
भगवत्या तथा लोके रक्षितव्यं न संशयः । मर्यादालोकरक्षार्थमेवमस्मि तथा स्थितः ॥
bhagavatyā tathā loke rakṣitavyaṃ na saṃśayaḥ | maryādālokarakṣārthamevamasmi tathā sthitaḥ
हे पूज्या! तुम्हें भी लोक में इसकी रक्षा करनी चाहिए, इसमें सन्देह नहीं। मर्यादा और लोक की रक्षा के लिए ही मैं इस प्रकार स्थित हूँ।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 67 (12.224.67)
शब्दः कोऽत्र इति ख्यातस्तथाऽर्थं च महामुने । आकृतिं च तयोः ब्रूहि लक्षणेन पृथक्पृथक् ॥
śabdaḥ ko'tra iti khyātastathā'rthaṃ ca mahāmune | ākṛtiṃ ca tayoḥ brūhi lakṣaṇena pṛthakpṛthak
'हे महामुने! यहाँ 'शब्द' किसे कहा जाता है और 'अर्थ' किसे? उन दोनों का स्वरूप भी अलग-अलग लक्षण के साथ मुझे बताइए।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 68 (12.224.68)
व्यत्ययेन च वर्णानां परिवादकृतो हि यः । स शब्द इति विज्ञेयस्तन्निपातोऽर्थ उच्यते ॥
vyatyayena ca varṇānāṃ parivādakṛto hi yaḥ | sa śabda iti vijñeyastannipāto'rtha ucyate
'वर्णों के क्रम से बना हुआ जो कथन है, उसे शब्द जानना चाहिए; और जिस वस्तु पर वह जाकर टिकता है, उसे अर्थ कहा जाता है।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 69 (12.224.69)
शब्दार्थयोर्हि संबन्धस्त्वनयोरस्ति वा न वा । तन्मे ब्रूहि यथातत्वं शब्दस्थानेऽर्थ एव चेत् ॥
śabdārthayorhi saṃbandhastvanayorasti vā na vā | tanme brūhi yathātatvaṃ śabdasthāne'rtha eva cet
'शब्द और अर्थ इन दोनों के बीच कोई सम्बन्ध है या नहीं? यदि अर्थ ही शब्द के स्थान पर है, तो मुझे यह यथार्थ रूप से बताइए।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 70 (12.224.70)
शब्दार्थयोर्न चैवास्ति संबन्धोऽत्यन्त एव हि । पुष्करे च यथा तोयं तथाऽस्मीति च वेत्थ तत् ॥
śabdārthayorna caivāsti saṃbandho'tyanta eva hi | puṣkare ca yathā toyaṃ tathā'smīti ca vettha tat
'शब्द और अर्थ में कोई सम्बन्ध है ही नहीं। जैसे कमल पर जल रहता है, वैसे ही तुम 'मैं हूँ' इसे जानती हो।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 71 (12.224.71)
अर्थे स्थितिर्हि शब्दस्य नान्यथा च स्थितिर्भवेत् । विद्यते चेन्महाप्राज्ञ विनाऽर्थं ब्रूहि सत्तम ॥
arthe sthitirhi śabdasya nānyathā ca sthitirbhavet | vidyate cenmahāprājña vinā'rthaṃ brūhi sattama
'शब्द की स्थिति अर्थ में ही है; वह किसी और प्रकार से नहीं हो सकती। हे सत्तम! यदि अर्थ के बिना भी कोई शब्द रहता है, तो बताइए।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 72 (12.224.72)
ससंसर्गोऽतिमात्रस्तु वाचकत्वेन वर्तते । अस्ति चेद्वर्तते नित्यं विकारोच्चारणेन वै ॥
sasaṃsargo'timātrastu vācakatvena vartate | asti cedvartate nityaṃ vikāroccāraṇena vai
'अत्यन्त घनिष्ठ संसर्ग वाचकता के रूप में काम करता है। यदि वह है, तो सदा विकार के उच्चारण के द्वारा ही काम करता है।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 73 (12.224.73)
शब्दस्थानोऽत्र इत्युक्तस्तथाऽर्थ इति मे कृतः । अर्थः स्थितो न तिष्ठेच्च विरूढमिह भाषितम् ॥
śabdasthāno'tra ityuktastathā'rtha iti me kṛtaḥ | arthaḥ sthito na tiṣṭhecca virūḍhamiha bhāṣitam
'आपने कहा कि शब्द का स्थान यहाँ है, और मैंने अर्थ को वैसा ही मान लिया। पर स्थिर अर्थ टिकेगा नहीं; यहाँ जो कहा गया, वह केवल उग आया है।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 74 (12.224.74)
न विकूलोऽत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत् । संबन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम् ॥
na vikūlo'tra kathito nākāśaṃ hi vinā jagat | saṃbandhastatra nāstyeva tadvadityeṣa manyatām
'यहाँ कोई विरोध नहीं कहा गया है, क्योंकि आकाश के बिना जगत् नहीं है। वहाँ कोई सम्बन्ध है ही नहीं; ऐसा ही मानो।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 75 (12.224.75)
सदाऽहंकारशब्दोऽयं व्यक्तमात्मनि संश्रितः । न वाचस्तत्र वर्तन्ते इति मिथ्या भविष्यति ॥
sadā'haṃkāraśabdo'yaṃ vyaktamātmani saṃśritaḥ | na vācastatra vartante iti mithyā bhaviṣyati
'यह 'अहं' शब्द सदा स्पष्ट रूप से आत्मा में आश्रित है। यदि वहाँ वाणियाँ काम नहीं करतीं, तो यह मिथ्या हो जाएगा।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 76 (12.224.76)
अहंशब्दो ह्यहंभावो नात्मभावे शुभव्रते । न वर्तन्ते परेऽचिन्त्ये वाचः सगुणलक्षणाः ॥
ahaṃśabdo hyahaṃbhāvo nātmabhāve śubhavrate | na vartante pare'cintye vācaḥ saguṇalakṣaṇāḥ
'हे शुभव्रते! 'अहं' शब्द अहंभाव का है, आत्मभाव का नहीं। परम अचिन्त्य में गुणों का वर्णन करने वाली वाणियाँ काम नहीं करतीं।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 77 (12.224.77)
अहं गात्रैकतः श्यामा भवानपि तथैव च । तन्मे ब्रूहि यथान्यायमेवं चेन्मुनिसत्तम ॥
ahaṃ gātraikataḥ śyāmā bhavānapi tathaiva ca | tanme brūhi yathānyāyamevaṃ cenmunisattama
'मैं श्यामा हूँ, अपने शरीर से एक हूँ, और आप भी वैसे ही हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! यदि ऐसा है तो मुझे ठीक-ठीक बताइए।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 78 (12.224.78)
मृण्मये हि घटे भावस्तादृग्भाव इहेष्यते । अयं भावः परेऽचिन्त्ये ह्यात्मभावो यथा च तत् ॥
mṛṇmaye hi ghaṭe bhāvastādṛgbhāva iheṣyate | ayaṃ bhāvaḥ pare'cintye hyātmabhāvo yathā ca tat
'मिट्टी के घड़े में मिट्टी का भाव होता है, और वैसा भाव यहाँ माना जाता है। उसी प्रकार परम अचिन्त्य में आत्मभाव वैसा ही है।'
श्लोक 79 (12.224.79)
अहं त्वमेतदित्येव परे संकल्पना मया । तस्माद्वाचो न वर्तन्त इति नैव विरुध्यते ॥
ahaṃ tvametadityeva pare saṃkalpanā mayā | tasmādvāco na vartanta iti naiva virudhyate
'मैं, तुम, यह, ये सब परम में मेरी ही कल्पनाएँ हैं। इसलिए यह कहने में कोई विरोध नहीं कि वहाँ वाणियाँ काम नहीं करतीं।
श्लोक 80 (12.224.80)
तस्माद्वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वशः । यथाऽऽकाशगतं विश्वं संसक्तमिव लक्ष्यते ॥
tasmādvāmena vartante manasā bhīru sarvaśaḥ | yathā''kāśagataṃ viśvaṃ saṃsaktamiva lakṣyate
इसीलिए, हे भीरु, वे सब प्रकार से विपरीत मन के द्वारा चलती हैं, जैसे आकाश में स्थित विश्व उससे जुड़ा हुआ-सा दिखाई देता है।
श्लोक 81 (12.224.81)
संसर्गे सति संबन्धात्तद्विकारं भविष्यति । अनाकाशगतं सर्वं विकारे च सदा गतम् ॥
saṃsarge sati saṃbandhāttadvikāraṃ bhaviṣyati | anākāśagataṃ sarvaṃ vikāre ca sadā gatam
संसर्ग होने पर सम्बन्ध से उसमें विकार होगा; और जो आकाश में स्थित नहीं है, वह सब सदा विकार को प्राप्त होता रहा है।
श्लोक 82 (12.224.82)
तद्ब्रह्म परमं शुद्धमनौपम्यं न शक्यते । न दृश्यते तथा तच्च दृश्यते च मतिर्मम ॥
tadbrahma paramaṃ śuddhamanaupamyaṃ na śakyate | na dṛśyate tathā tacca dṛśyate ca matirmama
वह ब्रह्म परम और शुद्ध है, उपमा से परे है, उसे पकड़ा नहीं जा सकता। वह दिखाई नहीं देता, फिर भी दिखाई देता है; यही मेरा मत है।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 83 (12.224.83)
निर्विकारं ह्यमूर्तिं च निरयं सर्वगं तथा । दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते ॥
nirvikāraṃ hyamūrtiṃ ca nirayaṃ sarvagaṃ tathā | dṛśyate ca viyannityaṃ dṛgātmā tena dṛśyate
'वह निर्विकार, निराकार, अचल और सर्वव्यापी है। आकाश सदा दिखाई देता है, और उसी के द्वारा दृक्-स्वरूप आत्मा देखा जाता है।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 84 (12.224.84)
त्वचा स्पृशति वै वायुमाकाशस्थं पुनः पुनः । तत्स्थं गन्धं तथाघ्राति ज्योतिः पश्यति चक्षुषा ॥
tvacā spṛśati vai vāyumākāśasthaṃ punaḥ punaḥ | tatsthaṃ gandhaṃ tathāghrāti jyotiḥ paśyati cakṣuṣā
'त्वचा से मनुष्य आकाश में स्थित वायु को बार-बार छूता है; उसमें रहने वाली गन्ध को सूँघता है और नेत्र से ज्योति को देखता है।
श्लोक 85 (12.224.85)
तमोरश्मिगणश्चैव मेघजालं तथैव च । वर्षं तारागणं चैव नाकाशं दृश्यते पुनः ॥
tamoraśmigaṇaścaiva meghajālaṃ tathaiva ca | varṣaṃ tārāgaṇaṃ caiva nākāśaṃ dṛśyate punaḥ
अन्धकार, किरणों का समूह, मेघों का जाल, वर्षा और तारों का समुदाय दिखाई देते हैं, पर आकाश स्वयं नहीं दिखाई देता।
श्लोक 86 (12.224.86)
आकाशस्याप्यथाकाशं सद्रूपमिति निश्चितम् । तदर्थे कल्पिता ह्येते तत्सत्यो विष्णुरेव च । यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात्परात्मनि ॥
ākāśasyāpyathākāśaṃ sadrūpamiti niścitam | tadarthe kalpitā hyete tatsatyo viṣṇureva ca | yāni nāmāni gauṇāni hyupacārātparātmani
आकाश का भी आकाश सद्रूप है, यह निश्चित है। उसी के लिए ये सब कल्पित हैं और उसका सत्य स्वयं विष्णु ही है। जो नाम परमात्मा के लिए प्रयुक्त होते हैं, वे सब उपचार से कहे गए गौण नाम हैं।
श्लोक 87 (12.224.87)
न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभुः । चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्ध्या वाचा वक्तुं न शक्यते ॥
na cakṣuṣā na manasā na cānyena paro vibhuḥ | cintyate sūkṣmayā buddhyā vācā vaktuṃ na śakyate
वह सर्वव्यापी परम न नेत्र से, न मन से, न किसी और साधन से सोचा जाता है। उसका चिन्तन सूक्ष्म बुद्धि से होता है, वाणी से उसे कहा नहीं जा सकता।
श्लोक 88 (12.224.88)
एतत्प्रपञ्चमखिलं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् । महाघटोऽल्पकश्चैव यथा मह्यां प्रतिष्ठितौ ॥
etatprapañcamakhilaṃ tasminsarvaṃ pratiṣṭhitam | mahāghaṭo'lpakaścaiva yathā mahyāṃ pratiṣṭhitau
यह सारा प्रपंच उसी में प्रतिष्ठित है, जैसे बड़ा घड़ा और छोटा घड़ा दोनों पृथ्वी पर टिके रहते हैं।
श्लोक 89 (12.224.89)
न च स्त्री न पुमांश्चैव यथैव न नपुंसकः । केवलज्ञानमात्रं तत्तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
na ca strī na pumāṃścaiva yathaiva na napuṃsakaḥ | kevalajñānamātraṃ tattasminsarvaṃ pratiṣṭhitam
वह न स्त्री है, न पुरुष, न नपुंसक। वह केवल ज्ञानमात्र है, और उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है।
श्लोक 90 (12.224.90)
भूमिसंस्थानयोगेन वस्तुसंस्थानयोगतः । रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा ॥
bhūmisaṃsthānayogena vastusaṃsthānayogataḥ | rasabhedā yathā toye prakṛtyāmātmanastathā
जैसे पृथ्वी की बनावट और वस्तुओं की बनावट के योग से जल में रस के भेद उत्पन्न होते हैं, वैसे ही प्रकृति के योग से आत्मा में भेद दिखते हैं।
श्लोक 91 (12.224.91)
तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव । प्राप्नोति ज्ञानमखिलं तेन तत्सुखमेधते ॥
tadvākyasmaraṇānnityaṃ tṛptiṃ vāri pibanniva | prāpnoti jñānamakhilaṃ tena tatsukhamedhate
उसके वचनों के निरन्तर स्मरण से मनुष्य जल पीते हुए के समान तृप्ति पाता है। वह पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है, और उसी से वह सुख बढ़ता है।'
सुवर्चलोवाच
श्लोक 92 (12.224.92)
अनेन साध्यं किं स्याद्वै शब्देनेति मतिर्मम । वेदगम्यः परोऽचिन्त्य इति पौराणिका विदुः ॥
anena sādhyaṃ kiṃ syādvai śabdeneti matirmama | vedagamyaḥ paro'cintya iti paurāṇikā viduḥ
'इस शब्द से क्या सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विचार है। पौराणिक जानते हैं कि परम अचिन्त्य वेद से जाना जाता है।
श्लोक 93 (12.224.93)
निरर्थको यथा लोके तद्वत्स्यादिति मे मतिः । निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ॥
nirarthako yathā loke tadvatsyāditi me matiḥ | nirīkṣyaivaṃ yathānyāyaṃ vaktumarhasi me'nagha
तब वह लोक में निरर्थक शब्द के समान हो जाएगा, ऐसा मेरा विचार है। हे अनघ! इस प्रकार विचार करके आप मुझे यथान्याय बताइए।'
श्वेतकेतुरुवाच
श्लोक 94 (12.224.94)
वेदगम्यं परं शुद्धमिति सत्या परा श्रुतिः । व्याहत्या नैतदित्याह व्युपलिङ्गे च वर्तते ॥
vedagamyaṃ paraṃ śuddhamiti satyā parā śrutiḥ | vyāhatyā naitadityāha vyupaliṅge ca vartate
'परम शुद्ध वेद से जाना जाता है,' यह श्रेष्ठ श्रुति सत्य है। वह निषेध के द्वारा 'यह नहीं' कहती है और संकेतों के सहारे चलती है।
श्लोक 95 (12.224.95)
निरर्थको न चैवास्ति शब्दो लौकिक उत्तमे । अनन्वयास्तथा शब्दा निरर्था इति लौकिकैः ॥
nirarthako na caivāsti śabdo laukika uttame | ananvayāstathā śabdā nirarthā iti laukikaiḥ
लौकिक व्यवहार में सर्वोत्तम विषय में भी कोई शब्द निरर्थक नहीं है। जिन शब्दों का परस्पर अन्वय नहीं होता, उन्हें लौकिक लोग निरर्थक कहते हैं।
श्लोक 96 (12.224.96)
गृह्यन्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि । अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे ॥
gṛhyante tadvadityeva na vartante parātmani | agocaratvaṃ vacasāṃ yuktamevaṃ tathā śubhe
वे 'वैसे ही' ग्रहण किए जाते हैं, पर परमात्मा में काम नहीं करते। हे शुभे! वाणी का उसे न पहुँच पाना इस प्रकार उचित ही है।
श्लोक 97 (12.224.97)
साधनस्योपदेशाच्च ह्युपायस्य च सूचनात् । उपलक्षणयोगेन व्यावृत्त्या च प्रदर्शनात् । वेदगम्यः परः शुद्ध इति मे धीयते मतिः ॥
sādhanasyopadeśācca hyupāyasya ca sūcanāt | upalakṣaṇayogena vyāvṛttyā ca pradarśanāt | vedagamyaḥ paraḥ śuddha iti me dhīyate matiḥ
क्योंकि वह साधन का उपदेश करता है, उपाय का संकेत देता है, लक्षण और निषेध के द्वारा दिखाता है, इसलिए परम शुद्ध वेद से जाना जाता है; मेरी बुद्धि ऐसा ही मानती है।
श्लोक 98 (12.224.98)
अध्यात्मध्यानसंभूतमभूतं भूतवत्स्फुटम् । ज्ञानं विद्धि शुभाचारे तेन यान्ति परां गतिम् ॥
adhyātmadhyānasaṃbhūtamabhūtaṃ bhūtavatsphuṭam | jñānaṃ viddhi śubhācāre tena yānti parāṃ gatim
हे शुभाचारे! उस ज्ञान को जानो जो अध्यात्म के ध्यान से उत्पन्न होता है और जो अभूत को भूत के समान स्पष्ट दिखाता है; उसी से लोग परम गति को पाते हैं।
श्लोक 99 (12.224.99)
यदि मे व्याहृतं गुह्यं श्रुतं न तु त्वया शुभे । तथ्यमित्येव वा शुद्धे ज्ञानं ज्ञानविलोचने ॥
yadi me vyāhṛtaṃ guhyaṃ śrutaṃ na tu tvayā śubhe | tathyamityeva vā śuddhe jñānaṃ jñānavilocane
हे शुभे! यदि मेरा कहा हुआ गुह्य तुमने सुना पर ग्रहण नहीं किया, अथवा हे शुद्धे, हे ज्ञान-नेत्रों वाली! उसे केवल सत्य मानकर ले लिया, तो वही ज्ञान है।
श्लोक 100 (12.224.100)
नानारूपवदस्यैवमैश्वर्यं दृश्यते शुभे । न वायुस्तं न सूर्यस्तं नाग्निस्तत्तत्परं पदम् ॥
nānārūpavadasyaivamaiśvaryaṃ dṛśyate śubhe | na vāyustaṃ na sūryastaṃ nāgnistattatparaṃ padam
हे शुभे! उसका ऐश्वर्य इस प्रकार नाना रूपों वाला दिखाई देता है। उसे न वायु प्रकाशित करती है, न सूर्य, न अग्नि; वही परम पद है।
श्लोक 101 (12.224.101)
अनेन पूर्णमेतद्धि हृदि भूतमिहेष्यते । एतावदात्मविज्ञानमेतावद्यदहं स्मृतम् । आवयोर्न च सत्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम् ॥
anena pūrṇametaddhi hṛdi bhūtamiheṣyate | etāvadātmavijñānametāvadyadahaṃ smṛtam | āvayorna ca satve vai tasmādajñānabandhanam
उसी से यह सब पूर्ण है, और वह हृदय में स्थित माना जाता है। आत्मविज्ञान इतना ही है, और मैंने जो कहा है वह इतना ही है। हम दोनों में सत्ता न होने से यह अज्ञान का ही बन्धन है।'
भीष्म उवाच
श्लोक 102 (12.224.102)
एवं सुवर्चला हृष्टा प्रोक्ता भर्त्रा यथार्थवत् । परिचर्यमाणा ह्यनिशं तत्वबुद्धिसमन्विता ॥
evaṃ suvarcalā hṛṣṭā proktā bhartrā yathārthavat | paricaryamāṇā hyaniśaṃ tatvabuddhisamanvitā
इस प्रकार पति से यथार्थ उपदेश पाकर सुवर्चला प्रसन्न हुई। निरन्तर सेवित होती हुई और तत्त्वबुद्धि से युक्त होकर,
श्लोक 103 (12.224.103)
भर्ता च तामनुप्रेक्ष्य नित्यनैमित्तिकान्वितः । परमात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि ॥
bhartā ca tāmanuprekṣya nityanaimittikānvitaḥ | paramātmani govinde vāsudeve mahātmani
उसका पति भी उसे देखते हुए नित्य और नैमित्तिक कर्मों में लगा रहा और उन्हें परमात्मा गोविन्द, महात्मा वासुदेव में अर्पित करता रहा,
श्लोक 104 (12.224.104)
समाधाय च कर्माणि तन्मयत्वेन भावितः । कालेन महता राजन्प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
samādhāya ca karmāṇi tanmayatvena bhāvitaḥ | kālena mahatā rājanprāpnoti paramāṃ gatim
और सब कर्म उसी में समर्पित करके तथा उसी के भाव से भरकर, हे राजन्, दीर्घ काल के बाद वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 105 (12.224.105)
एतत्ते कथितं राजन्यस्मात्त्वं परिपृच्छसि । गार्हस्थ्यं च समास्थाय गतौ जायापती परम् ॥
etatte kathitaṃ rājanyasmāttvaṃ paripṛcchasi | gārhasthyaṃ ca samāsthāya gatau jāyāpatī param
हे राजन्! आपने जो पूछा था, वही मैंने आपसे कह दिया: गृहस्थ-धर्म में रहकर पति-पत्नी दोनों परम गति को गए।