शान्ति पर्व · अध्याय 225
दम की प्रशंसा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य क्या करे जिससे उसे सुख मिले और वह निर्भय होकर लोक में विचरे। भीष्म उत्तर में दम की प्रशंसा करते हैं, जिसे ज्ञानी जन सभी वर्णों के लिए और विशेषकर ब्राह्मण के लिए सबसे ऊपर मानते हैं। वे दान्त पुरुष के लक्षण गिनाते हैं, जैसे सन्तोष, क्रोध का अभाव, दया और समभाव, उन्हें दुष्टों के मार्ग से अलग दिखाते हैं, और बताते हैं कि ऐसे पुरुष से कोई नहीं डरता, सब उसका सम्मान करते हैं और वह स्वर्ग जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.225.1)
किं कुर्वन्सुखमाप्नोति किं कुर्वन्दुःखमाप्नुयात् । किं कुर्वन्निर्भयो लोके सिद्धश्चरति भारत ॥
kiṃ kurvansukhamāpnoti kiṃ kurvanduḥkhamāpnuyāt | kiṃ kurvannirbhayo loke siddhaścarati bhārata
हे भारत! क्या करने से मनुष्य सुख पाता है और क्या करने से दुःख पाता है? क्या करने से वह लोक में निर्भय और सिद्ध होकर विचरता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.225.2)
दममेव प्रशंसन्ति वृद्धाः श्रुतिसमाधयः । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥
damameva praśaṃsanti vṛddhāḥ śrutisamādhayaḥ | sarveṣāmeva varṇānāṃ brāhmaṇasya viśeṣataḥ
श्रुति में चित्त लगाने वाले वृद्ध जन दम की ही प्रशंसा करते हैं, सभी वर्णों के लिए और विशेषकर ब्राह्मण के लिए।
श्लोक 3 (12.225.3)
नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते । क्रिया तपश्च देवाश्च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
nādāntasya kriyāsiddhiryathāvadupapadyate | kriyā tapaśca devāśca dame sarvaṃ pratiṣṭhitam
जो दम से रहित है, उसे कर्म की सिद्धि यथावत् नहीं मिलती। क्रिया, तप और देवता सब दम में ही प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 4 (12.225.4)
दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उच्यते । विपाप्मा निर्भयो दान्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥
damastejo vardhayati pavitraṃ dama ucyate | vipāpmā nirbhayo dāntaḥ puruṣo vindate mahat
दम तेज को बढ़ाता है और उसे पवित्र करने वाला कहा जाता है। पापरहित और निर्भय दान्त पुरुष महान फल पाता है।
श्लोक 5 (12.225.5)
सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुध्यते । सुखं लोके विपर्येति मनश्चास्य प्रसीदति ॥
sukhaṃ dāntaḥ prasvapiti sukhaṃ ca pratibudhyate | sukhaṃ loke viparyeti manaścāsya prasīdati
दान्त पुरुष सुख से सोता है और सुख से जागता है; वह लोक में सुख से विचरता है और उसका मन प्रसन्न रहता है।
श्लोक 6 (12.225.6)
तेजो दमेन ध्रियते तत्र तीक्ष्णोऽधिगच्छति । अमित्रांश्च बहून्नित्यं पृथगात्मनि पश्यति ॥
tejo damena dhriyate tatra tīkṣṇo'dhigacchati | amitrāṃśca bahūnnityaṃ pṛthagātmani paśyati
तेज दम से सँभला रहता है; उसे पाने वाला तीक्ष्ण स्वभाव का पुरुष अपने भीतर सदा अनेक अलग-अलग शत्रुओं को देखता है।
श्लोक 7 (12.225.7)
क्रव्याद्भ्य इव भूतानामदान्तेभ्यः सदा भयम् । तेषां विप्रतिषेधार्थं राजा सृष्टः स्वयंभुवा ॥
kravyādbhya iva bhūtānāmadāntebhyaḥ sadā bhayam | teṣāṃ vipratiṣedhārthaṃ rājā sṛṣṭaḥ svayaṃbhuvā
जैसे मांसभक्षी पशुओं से प्राणियों को भय रहता है, वैसे ही असंयमी लोगों से सदा भय रहता है। उनको रोकने के लिए स्वयम्भू ने राजा की सृष्टि की।
श्लोक 8 (12.225.8)
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते । धर्मः संरक्ष्यते तैस्तु यतस्ते धर्मसेतवः । यच्च तेषु फलं धर्म्यं भूयो दान्ते तदुच्यते ॥
āśrameṣu ca sarveṣu dama eva viśiṣyate | dharmaḥ saṃrakṣyate taistu yataste dharmasetavaḥ | yacca teṣu phalaṃ dharmyaṃ bhūyo dānte taducyate
सभी आश्रमों में दम ही सबसे बढ़कर है। उन्हीं से धर्म की रक्षा होती है, क्योंकि वे धर्म के सेतु हैं। और उनमें जो धर्मयुक्त फल है, वह दान्त में और भी अधिक कहा जाता है।
श्लोक 9 (12.225.9)
तेषां लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः । अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ॥
teṣāṃ liṅgāni vakṣyāmi yeṣāṃ samudayo damaḥ | akārpaṇyamasaṃrambhaḥ saṃtoṣaḥ śraddadhānatā
जिनमें दम का उदय होता है, उनके लक्षण मैं बताऊँगा: दीनता का अभाव, उतावली का अभाव, सन्तोष, श्रद्धा,
श्लोक 10 (12.225.10)
अक्रोध आर्जवं नित्यं नातिवादोऽभिमानिता । गुरुपूजाऽनसूया च दया भूतेष्वपैशुनम् ॥
akrodha ārjavaṃ nityaṃ nātivādo'bhimānitā | gurupūjā'nasūyā ca dayā bhūteṣvapaiśunam
क्रोध का अभाव, सदा सरलता, अधिक बोलने से बचना, अभिमान का न होना, गुरु की पूजा, ईर्ष्या का अभाव, प्राणियों पर दया, चुगली न करना,
श्लोक 11 (12.225.11)
जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविवर्जनम् । साधुकामांश्च स्पृहयेन्नायतिं प्रत्ययेषु च ॥
janavādamṛṣāvādastutinindāvivarjanam | sādhukāmāṃśca spṛhayennāyatiṃ pratyayeṣu ca
लोकचर्चा, झूठ, स्तुति और निन्दा से बचना। वह भलाई चाहने वालों से प्रेम करे और अपने अनुभवों में आगे आने वाले की लालसा न करे।
श्लोक 12 (12.225.12)
अवैरकृत्सूपचारः समो निन्दाप्रशंसयोः । सुवृत्तः शीलसंपन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मवाञ्शुचिः ॥
avairakṛtsūpacāraḥ samo nindāpraśaṃsayoḥ | suvṛttaḥ śīlasaṃpannaḥ prasannātmā''tmavāñśuciḥ
वह वैर नहीं करता, शिष्टाचारी होता है, निन्दा और प्रशंसा में समान रहता है; सदाचारी, शीलवान, प्रसन्नचित्त, आत्मवान और शुद्ध होता है।
श्लोक 13 (12.225.13)
प्राप्य लोके च सत्कारं स्वर्गं वै प्रेत्य गच्छति । दुर्गमं सर्वभूतानां प्रापयन्मोदते सुखी ॥
prāpya loke ca satkāraṃ svargaṃ vai pretya gacchati | durgamaṃ sarvabhūtānāṃ prāpayanmodate sukhī
लोक में सम्मान पाकर वह मरने के बाद स्वर्ग जाता है। और सुखी होकर वह सब प्राणियों को दुर्लभ वस्तु पहुँचाता हुआ आनन्द पाता है।
श्लोक 14 (12.225.14)
सर्वभूतहिते युक्तो न स्म यो द्विषते जनम् । महाह्रद इवाक्षोभ्यः प्राज्ञस्तृप्तः प्रसीदति ॥
sarvabhūtahite yukto na sma yo dviṣate janam | mahāhrada ivākṣobhyaḥ prājñastṛptaḥ prasīdati
वह सब प्राणियों के हित में लगा रहता है और किसी से द्वेष नहीं करता। महान सरोवर के समान अक्षुब्ध रहकर वह ज्ञानी और तृप्त पुरुष प्रसन्न रहता है।
श्लोक 15 (12.225.15)
अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः । नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान् ॥
abhayaṃ yasya bhūtebhyaḥ sarveṣāmabhayaṃ yataḥ | namasyaḥ sarvabhūtānāṃ dānto bhavati buddhimān
जिससे प्राणियों को भय नहीं है और जिसके कारण सबको अभय है, ऐसा बुद्धिमान दान्त पुरुष सब प्राणियों का वन्दनीय होता है।
श्लोक 16 (12.225.16)
न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति । सदाऽपरिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ॥
na hṛṣyati mahatyarthe vyasane ca na śocati | sadā'parimitaprajñaḥ sa dānto dvija ucyate
वह बड़े लाभ पर हर्षित नहीं होता और विपत्ति में शोक नहीं करता। सदा अपरिमित बुद्धि वाला वही दान्त द्विज कहलाता है।
श्लोक 17 (12.225.17)
कर्मभिः श्रुतसंपन्नः सद्भिराचारतः शुचिः । सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महाफलम् ॥
karmabhiḥ śrutasaṃpannaḥ sadbhirācārataḥ śuciḥ | sadaiva damasaṃyuktastasya bhuṅkte mahāphalam
कर्मों से श्रुत-सम्पन्न, सज्जनों के आचार से शुद्ध और सदा दम से युक्त वह उसके महान फल का भोग करता है।
श्लोक 18 (12.225.18)
अनसूयाऽक्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता । सत्यं दानमनायासो नैष मार्गो दुरात्मनाम् ॥
anasūyā'kṣamā śāntiḥ saṃtoṣaḥ priyavāditā | satyaṃ dānamanāyāso naiṣa mārgo durātmanām
ईर्ष्या का अभाव, क्षमा, शान्ति, सन्तोष, प्रिय बोलना, सत्य, दान और अनायास भाव; यह दुष्टों का मार्ग नहीं है।
श्लोक 19 (12.225.19)
कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येर्ष्या विकत्थना । अतुष्टिरनृतं मोह एष मार्गो दुरात्मनाम् ॥
kāmakrodhau ca lobhaśca parasyerṣyā vikatthanā | atuṣṭiranṛtaṃ moha eṣa mārgo durātmanām
काम, क्रोध और लोभ, दूसरे से ईर्ष्या, डींग हाँकना, असन्तोष, झूठ और मोह; यह दुष्टों का मार्ग है।
श्लोक 20 (12.225.20)
कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मणः संशितव्रतः । कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान्निरपाय इवात्मवान् ॥
kāmakrodhau vaśe kṛtvā brahmacārī jitendriyaḥ | vikramya ghore tapasi brāhmaṇaḥ saṃśitavrataḥ | kālākāṅkṣī carellokānnirapāya ivātmavān
काम और क्रोध को वश में करके, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय और दृढ़व्रत ब्राह्मण घोर तप में पराक्रम करके, अपने समय की प्रतीक्षा करता हुआ, आत्मवान होकर मानो निर्भय-सा लोकों में विचरे।