शान्ति पर्व · अध्याय 229
प्रह्लाद का इन्द्र को उपदेश: सब कुछ स्वभाव से
युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या मनुष्य अपने कर्मों और उनके फल का सचमुच कर्ता है। भीष्म उत्तर में प्रह्लाद और इन्द्र का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। पतन के बाद भी अविचलित दैत्यराज को देखकर इन्द्र उनकी शान्ति का कारण पूछते हैं। प्रह्लाद कहते हैं कि सब वस्तुएँ अपने स्वभाव से उत्पन्न और लीन होती हैं, इसलिए कर्तृत्व का अभिमान निराधार है; फिर वे प्रज्ञा और शान्ति के उपाय बताते हैं: सरलता, अप्रमाद, गुरु की सेवा और सत्पुरुषों का संग, जिससे परमात्मा विष्णु की भक्ति प्राप्त होती है, जो केवल ज्ञान से देखे जाते हैं। इन्द्र प्रसन्न होकर उनका सत्कार करते हैं और अपने भवन लौट जाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.229.1)
यदिदं कर्म लोकेऽस्मिञ्शुभं वा यदि वाऽशुभम् । पुरुषं योजयत्येव फलयोगेन भारत ॥
yadidaṃ karma loke'smiñśubhaṃ vā yadi vā'śubham | puruṣaṃ yojayatyeva phalayogena bhārata
इस लोक में जो भी कर्म है, चाहे शुभ हो या अशुभ, वह मनुष्य को फल से जोड़ ही देता है, हे भारत।
श्लोक 2 (12.229.2)
कर्ता स्वित्तस्य पुरुष उताहो नेति संशयः । एतदिच्छामि तत्त्वेन त्वत्तः श्रोतुं पितामह ॥
kartā svittasya puruṣa utāho neti saṃśayaḥ | etadicchāmi tattvena tvattaḥ śrotuṃ pitāmaha
क्या पुरुष ही उसका कर्ता है, अथवा नहीं? यही मेरा संशय है। पितामह, मैं आपसे इसका यथार्थ सुनना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.229.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prahlādasya ca saṃvādamindrasya ca yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं, हे युधिष्ठिर: प्रह्लाद और इन्द्र का संवाद।
श्लोक 4 (12.229.4)
असक्तं धूतपाप्मानं कुले जातं बहुश्रुतम् । अस्तब्धमनहंकारं सत्वस्थं संयतेन्द्रियम् ॥
asaktaṃ dhūtapāpmānaṃ kule jātaṃ bahuśrutam | astabdhamanahaṃkāraṃ satvasthaṃ saṃyatendriyam
जो अनासक्त था, जिसके पाप धुल चुके थे, जो उत्तम कुल में जन्मा था, बहुश्रुत था, अकड़ और अहंकार से रहित था, सत्त्व में स्थित था और जिसकी इन्द्रियाँ संयत थीं,
श्लोक 5 (12.229.5)
तुल्यनिन्दास्तुतिं दान्तं शून्यागारसमाकृतिम् । चराचराणां भूतानां विदितप्रभवाप्ययम् ॥
tulyanindāstutiṃ dāntaṃ śūnyāgārasamākṛtim | carācarāṇāṃ bhūtānāṃ viditaprabhavāpyayam
जो निन्दा और स्तुति को समान समझता था, जितेन्द्रिय था, सूने घर में रहने वाले के समान था, और चर-अचर सब प्राणियों की उत्पत्ति और लय को जानता था,
श्लोक 6 (12.229.6)
अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमप्रियेषु प्रियेषु च । काञ्चने वाऽथ लोष्ठे वा उभयोः समदर्शनम् ॥
akrudhyantamahṛṣyantamapriyeṣu priyeṣu ca | kāñcane vā'tha loṣṭhe vā ubhayoḥ samadarśanam
जो अप्रिय में क्रोध नहीं करता और प्रिय में हर्षित नहीं होता था, और सोने तथा मिट्टी के ढेले, दोनों को समान दृष्टि से देखता था,
श्लोक 7 (12.229.7)
आत्मनि श्रेयसि ज्ञाने धीरं निश्चितनिश्चयम् । परावरज्ञं भूतानां सर्वज्ञं सर्वदर्शनम् ॥
ātmani śreyasi jñāne dhīraṃ niścitaniścayam | parāvarajñaṃ bhūtānāṃ sarvajñaṃ sarvadarśanam
जो आत्मा, परम कल्याण और ज्ञान में स्थिर था, निश्चित निश्चय वाला था, प्राणियों के ऊँच-नीच को जानता था, सर्वज्ञ था और सबको समान देखता था,
श्लोक 8 (12.229.8)
अव्यक्तात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि । हृदयेन समाविष्टं सर्वभावप्रियंकरम् ॥
avyaktātmani govinde vāsudeve mahātmani | hṛdayena samāviṣṭaṃ sarvabhāvapriyaṃkaram
जिसका हृदय अव्यक्त स्वरूप वाले महान् गोविन्द वासुदेव में पूरी तरह लगा हुआ था, और जो सब प्राणियों का प्रिय करता था,
श्लोक 9 (12.229.9)
भक्तं भागवतं नित्यं नारायणपरायणम् । ध्यायन्तं परमात्मानं हिरण्यकशिपोः सुतम् ॥
bhaktaṃ bhāgavataṃ nityaṃ nārāyaṇaparāyaṇam | dhyāyantaṃ paramātmānaṃ hiraṇyakaśipoḥ sutam
जो सदा भक्त था, भगवान् का उपासक था, नारायण-परायण था और परमात्मा का ध्यान करता था: हिरण्यकशिपु का वह पुत्र।
श्लोक 10 (12.229.10)
शक्रः प्रह्लादमासीनमेकान्ते संयतेन्द्रियम् । बुभुत्समानस्तत्प्रज्ञामभिगम्येदमब्रवीत् ॥
śakraḥ prahlādamāsīnamekānte saṃyatendriyam | bubhutsamānastatprajñāmabhigamyedamabravīt
शक्र ने एकान्त में बैठे हुए संयतेन्द्रिय प्रह्लाद के पास जाकर, उनकी प्रज्ञा को जानने की इच्छा से, यह कहा:
शक्र उवाच
श्लोक 11 (12.229.11)
यैः कैश्चित्संमतो लोके गुणैः स्यात्पुरुषो नृषु । भवत्यनपगान्सर्वांस्तान्गुणाँल्लक्षयामहे ॥
yaiḥ kaiścitsaṃmato loke guṇaiḥ syātpuruṣo nṛṣu | bhavatyanapagānsarvāṃstānguṇām̐llakṣayāmahe
"संसार में जिन गुणों से मनुष्य मनुष्यों में सम्मान पाता है, वे सब गुण हम आप में अटल रूप से देखते हैं।
श्लोक 12 (12.229.12)
अथ ते लक्ष्यते बुद्धिः समा बालजनैरिह । आत्मानं मन्यमानः सञ्श्रेयः किमिह मन्यसे ॥
atha te lakṣyate buddhiḥ samā bālajanairiha | ātmānaṃ manyamānaḥ sañśreyaḥ kimiha manyase
फिर भी आपकी बुद्धि यहाँ साधारण जनों के समान दिखाई देती है। अपने को जैसा आप मानते हैं, उसमें आप यहाँ परम कल्याण किसे मानते हैं?
श्लोक 13 (12.229.13)
बद्धः पाशैश्च्युतः स्थानाद्द्विषतां वशमागतः । श्रिया विहीनः प्रह्लाद शोचितव्ये न शोचसि ॥
baddhaḥ pāśaiścyutaḥ sthānāddviṣatāṃ vaśamāgataḥ | śriyā vihīnaḥ prahlāda śocitavye na śocasi
पाशों से बँधे हुए, अपने स्थान से गिरे हुए, शत्रुओं के वश में आए हुए और श्री से हीन होकर भी, हे प्रह्लाद! आप शोक के योग्य बात पर शोक नहीं करते।
श्लोक 14 (12.229.14)
प्रज्ञालाभेन दैतेय उताहो धृतिमत्तथा । प्रह्लाद स्वस्थरूपोऽसि पश्यन्व्यसनमात्मनः ॥
prajñālābhena daiteya utāho dhṛtimattathā | prahlāda svastharūpo'si paśyanvyasanamātmanaḥ
हे दैत्य! क्या प्रज्ञा के लाभ से, या धैर्य से, हे प्रह्लाद, आप अपने ही स्वरूप में स्थित हैं, जबकि अपनी विपत्ति को देख रहे हैं?"
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (12.229.15)
इति संचोदितस्तेन धीरो निश्चितनिश्चयः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा स्वां प्रज्ञामनुवर्णयन् ॥
iti saṃcoditastena dhīro niścitaniścayaḥ | uvāca ślakṣṇayā vācā svāṃ prajñāmanuvarṇayan
इस प्रकार उनके प्रेरित करने पर धीर और निश्चित निश्चय वाले प्रह्लाद ने मधुर वाणी में अपनी प्रज्ञा का वर्णन करते हुए कहा।
प्रह्लाद उवाच
श्लोक 16 (12.229.16)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च भूतानां यो न बुध्यते । तस्य स्तम्भो भवेद्बाल्यान्नास्ति स्तंभोऽनुपश्यतः ॥
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca bhūtānāṃ yo na budhyate | tasya stambho bhavedbālyānnāsti staṃbho'nupaśyataḥ
"जो प्राणियों की प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं समझता, उसमें बचपने के कारण अकड़ हो सकती है; जो देखता है, उसमें अकड़ नहीं होती।
श्लोक 17 (12.229.17)
गहनं सर्वभूतानां ध्येयं नित्यं सनातनम् । अनिग्रहमनौपम्यं सर्वाकारं परात्परम् ॥
gahanaṃ sarvabhūtānāṃ dhyeyaṃ nityaṃ sanātanam | anigrahamanaupamyaṃ sarvākāraṃ parātparam
वह सब प्राणियों के लिए गहन है, ध्यान करने योग्य है, नित्य और सनातन है, किसी के वश में नहीं आता, उपमा से परे है, सब आकारों वाला है और परे से भी परे है,
श्लोक 18 (12.229.18)
सर्वावरणसंभूतं तस्मादेतत्प्रवर्तते । तन्मया अपि संपश्य नानालक्षणलक्षिताः ॥
sarvāvaraṇasaṃbhūtaṃ tasmādetatpravartate | tanmayā api saṃpaśya nānālakṣaṇalakṣitāḥ
सबको आवृत करने वाले से यह उत्पन्न हुआ है, और उसी से यह सब चलता है; देखो, वे सब उसी से बने हैं और अनेक लक्षणों से युक्त दिखाई देते हैं।
श्लोक 19 (12.229.19)
स वै पाति जगत्स्रष्टा विष्णुरित्यभिशब्दितः । पुनर्दर्शति संप्राप्ते------सुरेश्वरः ॥
sa vai pāti jagatsraṣṭā viṣṇurityabhiśabditaḥ | punardarśati saṃprāpte------sureśvaraḥ
वही जगत् का सृष्टिकर्ता, जो विष्णु नाम से कहा जाता है, उसकी रक्षा करता है; और फिर समय आने पर वह … देवताओं के स्वामी को दिखाता है।
श्लोक 20 (12.229.20)
स्वभावात्संप्रवर्तन्ते निवर्तन्ते तथैव च । सर्वे भावास्तथा भावाः पुरुषार्थो न विद्यते ॥
svabhāvātsaṃpravartante nivartante tathaiva ca | sarve bhāvāstathā bhāvāḥ puruṣārtho na vidyate
स्वभाव से ही वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं और स्वभाव से ही लीन होती हैं; सब भाव और अभाव ऐसे ही हैं; पुरुषार्थ जैसी कोई वस्तु नहीं है।
श्लोक 21 (12.229.21)
पुरुषार्थस्य चाभावे नास्ति कश्चित्स्वकारकः । स्वयं च कुर्वतस्तस्य जातु मानो भवेदिह ॥
puruṣārthasya cābhāve nāsti kaścitsvakārakaḥ | svayaṃ ca kurvatastasya jātu māno bhavediha
और यदि पुरुषार्थ नहीं है, तो कोई अपना कर्ता नहीं है; पर यदि वह स्वयं करता, तो उसमें यहाँ कभी अभिमान हो सकता था।
श्लोक 22 (12.229.22)
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधु वा । तस्य दोषवती प्रज्ञा अतत्त्वज्ञेति मे मतिः ॥
yastu kartāramātmānaṃ manyate sādhvasādhu vā | tasya doṣavatī prajñā atattvajñeti me matiḥ
जो अपने को शुभ या अशुभ का कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दोषयुक्त है; वह तत्त्व को नहीं जानता, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 23 (12.229.23)
यदि स्यात्पुरुषः कर्ता शक्रात्मश्रेयसे ध्रुवम् । आरम्भास्तस्य सिद्ध्येयुर्न तु जातु पराभवेत् ॥
yadi syātpuruṣaḥ kartā śakrātmaśreyase dhruvam | ārambhāstasya siddhyeyurna tu jātu parābhavet
यदि पुरुष कर्ता होता, हे शक्र, तो अपने कल्याण के लिए उसके सब आरम्भ अवश्य सफल होते और उसकी कभी पराजय न होती।
श्लोक 24 (12.229.24)
अनिष्टस्य हि निर्वृत्तिरनिवृत्तिः प्रियस्य च । लक्ष्यते यतमानानां पुरुषार्थस्ततः कुतः ॥
aniṣṭasya hi nirvṛttiranivṛttiḥ priyasya ca | lakṣyate yatamānānāṃ puruṣārthastataḥ kutaḥ
क्योंकि प्रयत्न करने वालों में भी अनिष्ट का निवारण न होना और प्रिय का न टिकना दिखाई देता है; तब पुरुषार्थ कहाँ से रहा?
श्लोक 25 (12.229.25)
अनिष्टस्याभिनिर्वृत्तिमिष्टसंवृत्तिमेव च । अप्रयत्नेन पश्यामः केषां चित्तत्स्वभावतः ॥
aniṣṭasyābhinirvṛttimiṣṭasaṃvṛttimeva ca | aprayatnena paśyāmaḥ keṣāṃ cittatsvabhāvataḥ
कुछ लोगों में हम बिना प्रयत्न के भी अनिष्ट का अन्त और इष्ट की प्राप्ति देखते हैं; वह उनके स्वभाव से होता है।
श्लोक 26 (12.229.26)
प्रतिरूपतराः केचिद्दृश्यन्ते बुद्धिमत्तराः । विरूपेभ्योऽल्पबुद्धिभ्यो लिप्समाना धनागमं ॥
pratirūpatarāḥ keciddṛśyante buddhimattarāḥ | virūpebhyo'lpabuddhibhyo lipsamānā dhanāgamaṃ
कुछ अधिक रूपवान् और अधिक बुद्धिमान् लोग कुरूप और अल्पबुद्धि लोगों से धन पाने की इच्छा करते हुए दिखाई देते हैं।
श्लोक 27 (12.229.27)
स्वभावप्रेरिताः सर्वे निविशन्ते गुणा यदा । शुभाशुभास्तदा तत्र तस्य किं मानकारणम् ॥
svabhāvapreritāḥ sarve niviśante guṇā yadā | śubhāśubhāstadā tatra tasya kiṃ mānakāraṇam
जब सब गुण, शुभ और अशुभ, स्वभाव से प्रेरित होकर प्रविष्ट होते हैं, तब उसके अभिमान का क्या कारण है?
श्लोक 28 (12.229.28)
स्वभावादेव तत्सर्वमिति मे निश्चिता मतिः । आत्मप्रतिष्ठा प्रज्ञा वा मम नास्ति ततोऽन्यथा ॥
svabhāvādeva tatsarvamiti me niścitā matiḥ | ātmapratiṣṭhā prajñā vā mama nāsti tato'nyathā
वह सब स्वभाव से ही होता है, ऐसा मेरा निश्चित मत है। मेरी प्रज्ञा आत्मा में इससे भिन्न प्रकार से प्रतिष्ठित नहीं है।
श्लोक 29 (12.229.29)
कर्मजं त्विह मन्यन्ते फलयोगं शुभाशुभम् । कर्मणां विषयं कृत्स्नमहं वक्ष्यामि तच्छृणु ॥
karmajaṃ tviha manyante phalayogaṃ śubhāśubham | karmaṇāṃ viṣayaṃ kṛtsnamahaṃ vakṣyāmi tacchṛṇu
यहाँ लोग मानते हैं कि शुभ-अशुभ फल का संयोग कर्म से उत्पन्न होता है। मैं कर्मों का सम्पूर्ण विषय बताऊँगा; उसे सुनो।
श्लोक 30 (12.229.30)
यथा वेदयते कश्चिदोदनं पायसं ह्यदन् । एवं सर्वाणि कर्माणि स्वभावस्यैव लक्षणम् ॥
yathā vedayate kaścidodanaṃ pāyasaṃ hyadan | evaṃ sarvāṇi karmāṇi svabhāvasyaiva lakṣaṇam
जैसे चावल और खीर खाने वाला उसे जान लेता है, वैसे ही सब कर्म केवल स्वभाव के ही लक्षण हैं।
श्लोक 31 (12.229.31)
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् । तस्य स्तंभो भवेद्बाल्यान्नास्ति स्तंभोऽनुपश्यतः ॥
vikārāneva yo veda na veda prakṛtiṃ parām | tasya staṃbho bhavedbālyānnāsti staṃbho'nupaśyataḥ
जो केवल विकारों को जानता है और परा प्रकृति को नहीं जानता, उसमें बचपने के कारण अकड़ हो सकती है; जो देखता है, उसमें अकड़ नहीं होती।
श्लोक 32 (12.229.32)
स्वभावभाविनो भावान्सर्वानेवेह निश्चये । बुद्ध्यमानस्य दर्पो वा मानो वा किं करिष्यति ॥
svabhāvabhāvino bhāvānsarvāneveha niścaye | buddhyamānasya darpo vā māno vā kiṃ kariṣyati
जो यह समझ लेता है कि यहाँ सब भाव स्वभाव से ही उत्पन्न होते हैं, उसका दर्प या अभिमान क्या करेगा?
श्लोक 33 (12.229.33)
वेद धर्मविधिं कृत्स्नं भूतानां चाप्यनित्यताम् । तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥
veda dharmavidhiṃ kṛtsnaṃ bhūtānāṃ cāpyanityatām | tasmācchakra na śocāmi sarvaṃ hyevedamantavat
मैं धर्म का सम्पूर्ण विधान और प्राणियों की अनित्यता जानता हूँ। इसलिए हे शक्र! मैं शोक नहीं करता, क्योंकि यह सब अन्त वाला है।
श्लोक 34 (12.229.34)
निर्ममो निरहंकारो निरीहो मुक्तबन्धनः । स्वस्थो व्यपेतः पश्यामि भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥
nirmamo nirahaṃkāro nirīho muktabandhanaḥ | svastho vyapetaḥ paśyāmi bhūtānāṃ prabhavāpyayau
ममता से रहित, अहंकार से रहित, चेष्टा से रहित, बन्धन से मुक्त, स्वस्थ और निर्लिप्त होकर मैं प्राणियों की उत्पत्ति और लय को देखता हूँ।
श्लोक 35 (12.229.35)
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः । नायासो विद्यते शक्र पश्यतो योगवित्तया ॥
kṛtaprajñasya dāntasya vitṛṣṇasya nirāśiṣaḥ | nāyāso vidyate śakra paśyato yogavittayā
जिसकी प्रज्ञा सिद्ध हो चुकी है, जो दमनशील है, तृष्णा और आशा से रहित है, उस योगविद्या से देखने वाले को, हे शक्र, कोई श्रम नहीं होता।
श्लोक 36 (12.229.36)
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे । द्वेष्टारं च न पश्यामि यो ममाद्य विरुध्यति ॥
prakṛtau ca vikāre ca na me prītirna ca dviṣe | dveṣṭāraṃ ca na paśyāmi yo mamādya virudhyati
प्रकृति और विकार में न मेरी प्रीति है और न मैं द्वेष करता हूँ; और ऐसा कोई द्वेष करने वाला मुझे नहीं दिखाई देता जो आज मेरा विरोध करता हो।
श्लोक 37 (12.229.37)
नोर्ध्वं नावाङ्न तिर्यक्च न क्वचिच्छक्र कामये । न हि ज्ञेये न विज्ञाने नाज्ञाने विद्यतेऽन्तरम् ॥
nordhvaṃ nāvāṅna tiryakca na kvacicchakra kāmaye | na hi jñeye na vijñāne nājñāne vidyate'ntaram
हे शक्र! मैं ऊपर, नीचे, तिरछे या कहीं भी कुछ नहीं चाहता; ज्ञेय में, विज्ञान में और अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है।
शक्र उवाच
श्लोक 38 (12.229.38)
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते । प्रब्रूहि तमुपायं मे सम्यक्प्रह्लाद पृच्छते ॥
yenaiṣā labhyate prajñā yena śāntiravāpyate | prabrūhi tamupāyaṃ me samyakprahlāda pṛcchate
"हे प्रह्लाद! मैं पूछता हूँ; वह उपाय मुझे ठीक-ठीक बताइए जिससे यह प्रज्ञा प्राप्त होती है और जिससे शान्ति मिलती है।"
प्रह्लाद उवाच
श्लोक 39 (12.229.39)
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया । गुरुशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत् ॥
ārjavenāpramādena prasādenātmavattayā | guruśuśrūṣayā śakra puruṣo labhate mahat
"सरलता से, अप्रमाद से, प्रसन्नता से, आत्मवत्ता से और गुरु की सेवा से, हे शक्र, मनुष्य परम पद पाता है।
श्लोक 40 (12.229.40)
स्वभावाल्लभते प्रज्ञां शान्तिमेति स्वभावतः । स्वभावादेव तत्सर्वं यत्किंचिदनुपश्यति ॥
svabhāvāllabhate prajñāṃ śāntimeti svabhāvataḥ | svabhāvādeva tatsarvaṃ yatkiṃcidanupaśyati
स्वभाव से वह प्रज्ञा पाता है, स्वभाव से शान्ति को प्राप्त होता है; जो कुछ वह देखता है, वह सब स्वभाव से ही है।
श्लोक 41 (12.229.41)
नैवान्तरं विजानाति श्रुत्वा गुरुमुखात्ततः । वाक्यं वाक्यार्थविज्ञानमालोक्य मनसा यतिः ॥
naivāntaraṃ vijānāti śrutvā gurumukhāttataḥ | vākyaṃ vākyārthavijñānamālokya manasā yatiḥ
गुरु के मुख से सुनकर भी यति तब तक भीतरी भेद को नहीं जानता; किन्तु वाक्य और उसके अर्थ के ज्ञान पर मन से विचार करके वह विवेक की निश्चितता से प्राप्त आत्मा को देखता है।
श्लोक 42 (12.229.42)
विवेकप्रत्ययापन्नमात्मानमनुपश्यति । विरज्यति ततो भीत्या परमेश्वरमृच्छति ॥
vivekapratyayāpannamātmānamanupaśyati | virajyati tato bhītyā parameśvaramṛcchati
तब भय के कारण वह संसार से विरक्त होता है और परमेश्वर की शरण जाता है।
श्लोक 43 (12.229.43)
त्रातारं सर्वदुःखानां तत्सुखान्वेषणं ततः । करोति सद्भिः संसर्गमलं सन्तः सुखाय वै ॥
trātāraṃ sarvaduḥkhānāṃ tatsukhānveṣaṇaṃ tataḥ | karoti sadbhiḥ saṃsargamalaṃ santaḥ sukhāya vai
फिर वह सब दुःखों के त्राता के सुख की खोज करता है; वह सज्जनों का संग करता है, क्योंकि सज्जन सुख के लिए पर्याप्त हैं।
श्लोक 44 (12.229.44)
सतां सकाशादाज्ञाय मार्गं लक्षणवत्तया । सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः परमात्मानमृच्छति ॥
satāṃ sakāśādājñāya mārgaṃ lakṣaṇavattayā | sarvasaṅgavinirmuktaḥ paramātmānamṛcchati
सज्जनों से लक्षणों सहित मार्ग को जानकर, और सब आसक्तियों से मुक्त होकर, वह परमात्मा को प्राप्त होता है।
श्लोक 45 (12.229.45)
विषयेच्छाकृतो धर्मं सरजस्को भयावहः । धर्महानिमवाप्नोति क्रमात्तेन नरः पुनः ॥
viṣayecchākṛto dharmaṃ sarajasko bhayāvahaḥ | dharmahānimavāpnoti kramāttena naraḥ punaḥ
जो विषयों की इच्छा से धर्म करता है, रजोगुण से भरा और भय उत्पन्न करने वाला है, वह मनुष्य क्रम से धर्म की हानि पाता है, और उसी से फिर गिरता है।
श्लोक 46 (12.229.46)
भक्तिहीनो भवत्येव परमात्मनि चाच्युत । वाचके वाऽपि च स्थानं न हन्त्येव विमोचितः ॥
bhaktihīno bhavatyeva paramātmani cācyuta | vācake vā'pi ca sthānaṃ na hantyeva vimocitaḥ
वह परमात्मा के प्रति भक्तिहीन हो जाता है, हे अच्युत; मुक्त हो जाने पर भी वह उसके वाचक शब्द में अपना स्थान नहीं बनाए रखता।
श्लोक 47 (12.229.47)
सार्क्ष्ये चास्य रतिर्नित्यं संसारे च रतिर्भवेत् । तस्य नित्यमविज्ञानादात्माचैव न सिद्ध्यति ॥
sārkṣye cāsya ratirnityaṃ saṃsāre ca ratirbhavet | tasya nityamavijñānādātmācaiva na siddhyati
उसकी रति सदा इन्द्रियों के संग में रहती है और उसकी रति संसार में हो जाती है; उसके सदा अज्ञान के कारण आत्मा सिद्ध नहीं होती।
श्लोक 48 (12.229.48)
उन्मत्तवृत्तिर्भवति क्रमादेवं प्रवर्तते । आशौचं वर्धते नित्यं न शाम्यति कथंचन ॥
unmattavṛttirbhavati kramādevaṃ pravartate | āśaucaṃ vardhate nityaṃ na śāmyati kathaṃcana
क्रम से वह उन्मत्त के समान आचरण करने लगता है; इसी प्रकार आगे बढ़ता है। उसकी अशुद्धि निरन्तर बढ़ती है और उसे किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती।
श्लोक 49 (12.229.49)
विषये चान्वितस्यास्य मोक्षवाञ्छा न जायते । हेत्वाभासेषु संलीनः स्तौति वैषयिकान्गुणान् ॥
viṣaye cānvitasyāsya mokṣavāñchā na jāyate | hetvābhāseṣu saṃlīnaḥ stauti vaiṣayikānguṇān
विषयों में लगे हुए उसमें मोक्ष की इच्छा उत्पन्न नहीं होती; हेतु के आभासों में डूबा हुआ वह विषयों के गुणों की स्तुति करता है।
श्लोक 50 (12.229.50)
न शास्त्राणि शृणोत्येव मानदर्पसमन्वितः । स्वतःसिद्धं न भोगस्तं स्वतः सिद्धं न वेत्ति च । चिद्रूपधारणं चैव परसृष्टिमथाव्ययम् ॥
na śāstrāṇi śṛṇotyeva mānadarpasamanvitaḥ | svataḥsiddhaṃ na bhogastaṃ svataḥ siddhaṃ na vetti ca | cidrūpadhāraṇaṃ caiva parasṛṣṭimathāvyayam
अभिमान और दर्प से भरा हुआ वह शास्त्रों को नहीं सुनता। जो स्वतःसिद्ध है, उसे भोग नहीं पाता, और वह स्वतःसिद्ध को नहीं जानता, न चैतन्यरूप के धारण को, न परमात्मा की अविनाशी सृष्टि को।
श्लोक 51 (12.229.51)
नानायोनिगतस्तेन भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः । तीर्णपारं न जानाति महामोहसमन्वितः । आचार्यसंश्रयाद्विद्याद्विनयं समुपागतः ॥
nānāyonigatastena bhrāmyamāṇaḥ svakarmabhiḥ | tīrṇapāraṃ na jānāti mahāmohasamanvitaḥ | ācāryasaṃśrayādvidyādvinayaṃ samupāgataḥ
इसलिए अनेक योनियों में भटकता हुआ, अपने कर्मों से घुमाया जाता हुआ और महामोह से भरा हुआ वह पार पहुँचे हुए तट को नहीं जानता। आचार्य का आश्रय लेकर और विनय को प्राप्त होकर वह जान सकता है।
श्लोक 52 (12.229.52)
अनुकूलेषु धर्मेषु चिनोत्येनं ततस्ततः । आचार्य इति च ख्यातस्तेनासौ बलवृत्रहन् ॥
anukūleṣu dharmeṣu cinotyenaṃ tatastataḥ | ācārya iti ca khyātastenāsau balavṛtrahan
आचार्य उसे यहाँ-वहाँ से अनुकूल धर्मों में चुन लेता है, और इसी से, हे बलवान् वृत्रहन्! वह आचार्य कहलाता है।
श्लोक 53 (12.229.53)
नियतेनैव सद्भावस्तेन जन्मान्तरादिषु । कर्मसञ्चयतूलौघः क्षिप्यते ज्ञानवायुना ॥
niyatenaiva sadbhāvastena janmāntarādiṣu | karmasañcayatūlaughaḥ kṣipyate jñānavāyunā
नियमित साधना से जन्म-जन्मान्तरों में उसका सद्भाव बनता है; कर्मों के संचय का रूई का ढेर ज्ञान की वायु से उड़ा दिया जाता है।
श्लोक 54 (12.229.54)
एवं युक्तसमाचारः संसारविनिवर्तकः । अनुकूलवृत्तिं सततं छिनत्त्येव भृगुर्यथा ॥
evaṃ yuktasamācāraḥ saṃsāravinivartakaḥ | anukūlavṛttiṃ satataṃ chinattyeva bhṛguryathā
इस प्रकार संयमित आचरण वाला और संसार को लौटाने वाला वह अनुकूल प्रवृत्ति को निरन्तर काटता रहता है, जैसे भृगु।
श्लोक 55 (12.229.55)
येन चायं समापन्नं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति । अभ्यन्तरः स्मृतः शक्र तत्साम्यं परिवर्जयेत् ॥
yena cāyaṃ samāpannaṃ vaitṛṣṇyaṃ nādhigacchati | abhyantaraḥ smṛtaḥ śakra tatsāmyaṃ parivarjayet
जिसके कारण यह पुरुष, उसे पाकर भी, तृष्णा से मुक्ति नहीं पाता, उसे हे शक्र! "आभ्यन्तर" कहा गया है; उस साम्य से उसे बचना चाहिए।
श्लोक 56 (12.229.56)
प्रथमं तत्कृतेनैव कर्मणा परिमृच्छति । द्वितीयं स्वप्नयोगं च कर्मणा परिगच्छति ॥
prathamaṃ tatkṛtenaiva karmaṇā parimṛcchati | dvitīyaṃ svapnayogaṃ ca karmaṇā parigacchati
पहले वह उसी से किए गए कर्म द्वारा चारों ओर घूमता है; दूसरे, कर्म से वह स्वप्न की अवस्था को प्राप्त होता है।
श्लोक 57 (12.229.57)
एतैरक्षैः समापन्नः प्रत्यक्षोऽसौ समास्थितः । सुषुप्त्याख्यस्तुरीयोऽसौ न च ह्यावरणान्वितः ॥
etairakṣaiḥ samāpannaḥ pratyakṣo'sau samāsthitaḥ | suṣuptyākhyasturīyo'sau na ca hyāvaraṇānvitaḥ
इन इन्द्रियों से युक्त होकर यह प्रत्यक्ष रूप में स्थित रहता है; यह तुरीय अवस्था है जिसे सुषुप्ति कहा गया है, जिसमें कोई आवरण नहीं है।
श्लोक 58 (12.229.58)
लोकवृत्त्या तमीशानं यजञ्जुह्वन्यमी भवेत् । आत्मन्यायासयोगेन निष्क्रियं स परात्परम् ॥
lokavṛttyā tamīśānaṃ yajañjuhvanyamī bhavet | ātmanyāyāsayogena niṣkriyaṃ sa parātparam
लोकव्यवहार के अनुसार उस ईश्वर की उपासना और आहुति देता हुआ वह संयमी हो जाता है; आत्मा में प्रयत्न करने से वह निष्क्रिय परात्पर को पाता है।
श्लोक 59 (12.229.59)
आयामे तां विजानाति मायैषा परमात्मनः । प्रातिभासिकसामान्याद्बुद्धेर्या संविदात्मिका ॥
āyāme tāṃ vijānāti māyaiṣā paramātmanaḥ | prātibhāsikasāmānyādbuddheryā saṃvidātmikā
आयाम में वह उसे जान लेता है: यह परमात्मा की माया है, प्रातिभासिक सामान्य से बुद्धि में उत्पन्न होने वाली संवित्-रूप वस्तु।
श्लोक 60 (12.229.60)
स्फुलिङ्गसत्त्वसदृशादग्निभावो यथा भवेत् । शिशूनामेवमज्ञानामात्मभावोऽन्यथा स्मृतः ॥
sphuliṅgasattvasadṛśādagnibhāvo yathā bhavet | śiśūnāmevamajñānāmātmabhāvo'nyathā smṛtaḥ
जैसे चिनगारी के समान वस्तु से अग्नि का स्वरूप जाना जा सकता है, वैसे ही बच्चों के समान अज्ञानियों के लिए आत्मा का स्वरूप अन्यथा माना गया है।
श्लोक 61 (12.229.61)
साध्येऽप्यवस्तुभूताख्ये मित्रामित्रादयः कुतः । तदभावे तु शोकाद्या न वर्तन्ते सुरेश्वर ॥
sādhye'pyavastubhūtākhye mitrāmitrādayaḥ kutaḥ | tadabhāve tu śokādyā na vartante sureśvara
अवस्तु कही जाने वाली साध्य वस्तु में मित्र-शत्रु आदि कहाँ से? उनके न रहने पर शोक आदि नहीं होते, हे सुरेश्वर।
श्लोक 62 (12.229.62)
एवं बुध्यस्व भगवन्समबुद्धिं समन्वियात् । उपायमेतदाख्यातं मा वक्रं गच्छ देवप ॥
evaṃ budhyasva bhagavansamabuddhiṃ samanviyāt | upāyametadākhyātaṃ mā vakraṃ gaccha devapa
हे भगवन्! इस प्रकार समझिए: उसे समबुद्धि प्राप्त करनी चाहिए। यह उपाय मैंने बताया; हे देवपालक! टेढ़े मार्ग पर मत जाइए।
श्लोक 63 (12.229.63)
ज्ञानेन पश्यते कर्म ज्ञानिनां न प्रवर्तकम् । यावदारब्धमस्येह तावन्नैवोपशाम्यति ॥
jñānena paśyate karma jñānināṃ na pravartakam | yāvadārabdhamasyeha tāvannaivopaśāmyati
ज्ञान से वह देखता है कि कर्म ज्ञानियों को प्रवृत्त नहीं करता; फिर भी जब तक यहाँ आरम्भ किया हुआ कर्म रहता है, तब तक शान्त नहीं होता।
श्लोक 64 (12.229.64)
तदन्ते तं प्रयात्येव न विद्वानिति मे मतिः । यदस्य वाचकं वक्ष्ये संस्मरे तद्भवेत्तदा ॥
tadante taṃ prayātyeva na vidvāniti me matiḥ | yadasya vācakaṃ vakṣye saṃsmare tadbhavettadā
उसके अन्त में वह उसी को प्राप्त होता है; ज्ञानी पीछे नहीं रहता, ऐसा मेरा मत है। उसका वाचक शब्द मैं बताऊँगा; उसका स्मरण करने पर तब वैसा ही होगा।
श्लोक 65 (12.229.65)
तेनतेन च भावेन अपायं तत्र पश्यति । स्थानभेदेषु वागेषा तालुसंस्था यथा तथा ॥
tenatena ca bhāvena apāyaṃ tatra paśyati | sthānabhedeṣu vāgeṣā tālusaṃsthā yathā tathā
वह प्रत्येक भाव से उसमें हानि को देखता है; जैसे यह वाणी उच्चारण-स्थानों के भेद से तालु आदि में स्थित रहती है।
श्लोक 66 (12.229.66)
तद्वदुद्धिगता ह्यर्था बुद्धिमात्मगतः सदा ॥
tadvaduddhigatā hyarthā buddhimātmagataḥ sadā
इसी प्रकार बुद्धि में आए हुए विषय और बुद्धि, उसके लिए जो आत्मा में चला गया है, सदा।
श्लोक 67 (12.229.67)
समस्तसंकल्पविशेषमुक्तं । परं पराणां परमं महात्मा । त्रय्यन्तविद्भिः परिगीयतेऽसौ । विष्णुर्विभुर्वास्ति गुणो न नित्यम् ॥
samastasaṃkalpaviśeṣamuktaṃ | paraṃ parāṇāṃ paramaṃ mahātmā | trayyantavidbhiḥ parigīyate'sau | viṣṇurvibhurvāsti guṇo na nityam
समस्त संकल्प-विशेषों से मुक्त, परों में भी परम, महात्मा को त्रयी के अन्त के ज्ञाता विष्णु, विभु के रूप में गाते हैं, जिनमें कोई गुण नित्य नहीं है।
श्लोक 68 (12.229.68)
वर्णेषु लोकेषु विशेषणेषु । स वासुदेवो वसनान्महात्मा । गुणानुरूपं स च कर्मरूपं । ददाति सर्वस्य समस्तरूपम् । न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य । न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ॥
varṇeṣu lokeṣu viśeṣaṇeṣu | sa vāsudevo vasanānmahātmā | guṇānurūpaṃ sa ca karmarūpaṃ | dadāti sarvasya samastarūpam | na saṃdṛśe tiṣṭhati rūpamasya | na cakṣuṣā paśyati kaścidenam
वर्णों, लोकों और विशेष भेदों में वह महात्मा वासुदेव है, क्योंकि वह सब में निवास करता है। वह प्रत्येक को उसके गुणों और कर्म के स्वरूप के अनुसार उसका समस्त रूप देता है। उसका रूप दृष्टि के सामने नहीं ठहरता; कोई उसे आँख से नहीं देखता।
श्लोक 69 (12.229.69)
भक्त्या च धृत्या च समाहितात्मा । ज्ञानस्वरूपं परिपश्यतीह ॥
bhaktyā ca dhṛtyā ca samāhitātmā | jñānasvarūpaṃ paripaśyatīha
भक्ति और धैर्य से समाहित चित्त वाला व्यक्ति यहाँ ज्ञानस्वरूप आत्मा को देखता है।
श्लोक 70 (12.229.70)
वदन्ति तन्मे भगवान्ददौ स । स एव शेषं मघवान्महात्मा । एवं ममोपायमवैहि शक्र । तस्माल्लोको नास्ति मह्यं सदैव ॥
vadanti tanme bhagavāndadau sa | sa eva śeṣaṃ maghavānmahātmā | evaṃ mamopāyamavaihi śakra | tasmālloko nāsti mahyaṃ sadaiva
"कहते हैं कि भगवान् ने मुझे वह दिया। वही शेष है, वही महात्मा मघवान् है। हे शक्र! मेरा उपाय इसी प्रकार समझिए। इसीलिए मेरे लिए कभी कोई लोक नहीं है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 71 (12.229.71)
इत्युक्तो दैत्यपतिना शक्रो विस्मयमागमत् । प्रीतिमांश्च तदा राजंस्तद्वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥
ityukto daityapatinā śakro vismayamāgamat | prītimāṃśca tadā rājaṃstadvākyaṃ pratyapūjayat
दैत्यराज के ऐसा कहने पर शक्र को विस्मय हुआ; और हे राजन्! प्रसन्न होकर उसने उनकी बात का आदर किया।
श्लोक 72 (12.229.72)
स तदाभ्यर्च्य दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यपतिरीश्वरः । असुरेन्द्रमुपामन्त्र्य जगाम स्वं निवेशनम् ॥
sa tadābhyarcya daityendraṃ trailokyapatirīśvaraḥ | asurendramupāmantrya jagāma svaṃ niveśanam
तब त्रिलोकी के स्वामी ईश्वर इन्द्र ने दैत्यराज का सत्कार करके असुरराज से विदा ली और अपने भवन को चले गए।