शान्ति पर्व · अध्याय 230
गधे के रूप में बलि से इन्द्र की भेंट
युधिष्ठिर पूछते हैं कि अपनी राजलक्ष्मी खो चुका राजा किस बुद्धि के सहारे जीवन बिताए, और भीष्म इन्द्र तथा बलि का एक पुराना संवाद सुनाते हैं। असुरों को जीतने के बाद इन्द्र ब्रह्मा से बलि का पता पूछते हैं; ब्रह्मा बताते हैं कि वह सूने घर में गधे के रूप में मिलेगा, पर उसे मारना नहीं है। इन्द्र उसे खोजकर उसके बीते वैभव की याद दिलाकर ताने देते हैं; बलि हँसकर उत्तर देता है कि समय इन्द्र को भी वैसी ही दशा में पहुँचाएगा, और विवेकी लोग न दुःख में शोक करते हैं न समृद्धि में हर्षित होते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.230.1)
यया बुद्ध्या महीपालो भ्रष्टश्रीर्विचरेन्महीम् । कालदण्डविनिष्पिष्टस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
yayā buddhyā mahīpālo bhraṣṭaśrīrvicarenmahīm | kāladaṇḍaviniṣpiṣṭastanme brūhi pitāmaha
पितामह, जो राजा अपनी राजलक्ष्मी से भ्रष्ट हो गया हो और काल के दण्ड से कुचला जा चुका हो, वह किस बुद्धि का सहारा लेकर पृथ्वी पर जीवन बिताए? यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.230.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वासवस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vāsavasya ca saṃvādaṃ balervairocanasya ca
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: वासव (इन्द्र) और विरोचन के पुत्र बलि का संवाद।
श्लोक 3 (12.230.3)
पितामहमुपागम्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । सर्वानेवासुराञ्जित्वा बलिं पप्रच्छ वासवः ॥
pitāmahamupāgamya praṇipatya kṛtāñjaliḥ | sarvānevāsurāñjitvā baliṃ papraccha vāsavaḥ
सब असुरों को जीतकर वासव पितामह के पास गया, हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे बलि के विषय में पूछा।
शक्र उवाच
श्लोक 4 (12.230.4)
यस्य स्म ददतो वित्तं न कदाचन हीयते । तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥
yasya sma dadato vittaṃ na kadācana hīyate | taṃ baliṃ nādhigacchāmi brahmannācakṣva me balim
ब्रह्मन्, बलि वह था जो दान देता रहता था फिर भी जिसका धन कभी घटता नहीं था। उस बलि को मैं कहीं नहीं पाता। मुझे बताइए कि बलि कहाँ है।
श्लोक 5 (12.230.5)
स वायुर्वरुणश्चैव स रविः स च चन्द्रमाः । सोऽग्निस्तपति भूतानि जलं च स भवत्युत ॥
sa vāyurvaruṇaścaiva sa raviḥ sa ca candramāḥ | so'gnistapati bhūtāni jalaṃ ca sa bhavatyuta
वही वायु था, वही वरुण, वही सूर्य और वही चन्द्रमा; वही अग्नि बनकर प्राणियों को तपाता था और वही जल भी बन जाता था। ब्रह्मन्, उस बलि को मैं कहीं नहीं पाता। मुझे बताइए कि बलि कहाँ है।
श्लोक 6 (12.230.6)
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् । स एव ह्यस्तमयते स स्म विद्योतते दिशः ॥
taṃ baliṃ nādhigacchāmi brahmannācakṣva me balim | sa eva hyastamayate sa sma vidyotate diśaḥ
ब्रह्मन्, उस बलि को मैं कहीं नहीं पाता। मुझे बताइए कि बलि कहाँ है। वही अस्त होता था और वही दिशाओं को प्रकाशित करता था।
श्लोक 7 (12.230.7)
स वर्षति स्म वर्षाणि यथाकालमतन्द्रितः । तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥
sa varṣati sma varṣāṇi yathākālamatandritaḥ | taṃ baliṃ nādhigacchāmi brahmannācakṣva me balim
वही बिना थके ठीक समय पर वर्षा बरसाता था। ब्रह्मन्, उस बलि को मैं कहीं नहीं पाता। मुझे बताइए कि बलि कहाँ है।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 8 (12.230.8)
नैतत्ते साधु मघवन्यदेनमनुपृच्छसि । पृष्टस्तु नानृतं ब्रूयात्तस्माद्वक्ष्यामि ते बलिम् ॥
naitatte sādhu maghavanyadenamanupṛcchasi | pṛṣṭastu nānṛtaṃ brūyāttasmādvakṣyāmi te balim
मघवन्, तुम जो इस प्रकार उसके विषय में पूछ रहे हो, यह उचित नहीं है। फिर भी पूछे जाने पर झूठ नहीं बोलना चाहिए, इसलिए मैं तुम्हें बलि के विषय में बताऊँगा।
श्लोक 9 (12.230.9)
उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः । वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ॥
uṣṭreṣu yadi vā goṣu khareṣvaśveṣu vā punaḥ | variṣṭho bhavitā jantuḥ śūnyāgāre śacīpate
शचीपति, किसी सूने घर में ऊँटों, गायों, गधों या घोड़ों के बीच वह उन जीवों में श्रेष्ठ होकर रहेगा।
शक्र उवाच
श्लोक 10 (12.230.10)
यदि स्म बलिना ब्रह्मञ्शून्यागारे समेयिवान् । हन्यामेनं न वा हन्यां तद्ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥
yadi sma balinā brahmañśūnyāgāre sameyivān | hanyāmenaṃ na vā hanyāṃ tadbrahmannanuśādhi mām
ब्रह्मन्, यदि मैं बलि से किसी सूने घर में मिलूँ, तो मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं उसे मारूँ या न मारूँ।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 11 (12.230.11)
मा स्म शक्र बलिं हिंसीर्न बलिर्वधमर्हति । न्यायस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वया वासव काम्यया ॥
mā sma śakra baliṃ hiṃsīrna balirvadhamarhati | nyāyastu śakra praṣṭavyastvayā vāsava kāmyayā
शक्र, बलि की हिंसा मत करना; बलि वध के योग्य नहीं है। हाँ वासव, तुम चाहो तो उससे नीति (क्या उचित है) के विषय में प्रश्न कर सकते हो।
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (12.230.12)
एवमुक्तो भगवता महेन्द्रः पृथिवीं तदा । चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिया वृतः ॥
evamukto bhagavatā mahendraḥ pṛthivīṃ tadā | cacārairāvataskandhamadhiruhya śriyā vṛtaḥ
भगवान् ब्रह्मा के ऐसा कहने पर वैभव से घिरे महेन्द्र ऐरावत के कन्धे पर बैठकर पृथ्वी पर घूमने लगे।
श्लोक 13 (12.230.13)
ततो ददर्श स बलिं खरवेषेण संवृतम् । यथाख्यातं भगवता शून्यागारकृतालयम् ॥
tato dadarśa sa baliṃ kharaveṣeṇa saṃvṛtam | yathākhyātaṃ bhagavatā śūnyāgārakṛtālayam
तब उन्होंने बलि को गधे का रूप धारण किए हुए, सूने घर में रहते देखा, ठीक वैसे ही जैसा भगवान् ने बताया था।
शक्र उवाच
श्लोक 14 (12.230.14)
खरयोनिमनुप्राप्तस्तुषभक्षोऽसि दानव । इयं ते योनिरधमा शोचस्याहो न शोचसि ॥
kharayonimanuprāptastuṣabhakṣo'si dānava | iyaṃ te yoniradhamā śocasyāho na śocasi
दानव, तुम गधे की योनि में आ पड़े हो और भूसी खाते हो। यह तुम्हारी योनि बहुत नीची है। क्या तुम इसका शोक करते हो, या नहीं करते?
श्लोक 15 (12.230.15)
अदृष्टं वत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् । श्रिया विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टैश्वर्यपराक्रमम् ॥
adṛṣṭaṃ vata paśyāmi dviṣatāṃ vaśamāgatam | śriyā vihīnaṃ mitraiśca bhraṣṭaiśvaryaparākramam
मैं वह देख रहा हूँ जो पहले कभी नहीं देखा था: तुम शत्रुओं के वश में आ पड़े हो, तुम्हारी श्री और मित्र छूट गए हैं, और तुम्हारा ऐश्वर्य तथा पराक्रम नष्ट हो चुका है।
श्लोक 16 (12.230.16)
यत्तद्यानसहस्रैस्त्वं ज्ञातिभिः परिवारितः । लोकान्प्रतापयन्सर्वान्यास्यस्मानवितर्कयन् ॥
yattadyānasahasraistvaṃ jñātibhiḥ parivāritaḥ | lokānpratāpayansarvānyāsyasmānavitarkayan
तुम जो कभी हज़ारों वाहनों पर चलते थे, अपने बन्धुओं से घिरे हुए, सब लोकों को तपाते हुए और हमारी ओर ध्यान तक न देते हुए जाया करते थे,
श्लोक 17 (12.230.17)
त्वन्मुखाश्चैव दैतेय व्यतिष्ठंस्तव शासने । अकृष्टपच्या पृथिवी तवैश्वर्ये बभूव ह ॥
tvanmukhāścaiva daiteya vyatiṣṭhaṃstava śāsane | akṛṣṭapacyā pṛthivī tavaiśvarye babhūva ha
दैत्य, दैत्य तुम्हें अपना मुखिया मानकर तुम्हारे शासन में रहते थे, और तुम्हारे ऐश्वर्य के समय पृथ्वी बिना जोते ही अन्न उपजाती थी।
श्लोक 18 (12.230.18)
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि । यदाऽतिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिखन् ॥
idaṃ ca te'dya vyasanaṃ śocasyāho na śocasi | yadā'tiṣṭhaḥ samudrasya pūrvakūle vilelikhan
आज तुम पर आई इस विपत्ति का तुम शोक करते हो या नहीं? जब तुम समुद्र के पूर्वी तट पर खड़े होकर अपने बन्धुओं में बाँटने के लिए धन के भाग रेखांकित कर रहे थे, तब तुम्हारा मन कैसा था?
श्लोक 19 (12.230.19)
ज्ञातिभ्यो विभजन्वित्तं तदासीत्ते मनः कथम् । यत्ते सहस्रसमिता ननृतुर्देवयोषितः ॥
jñātibhyo vibhajanvittaṃ tadāsītte manaḥ katham | yatte sahasrasamitā nanṛturdevayoṣitaḥ
जब हज़ारों देवांगनाएँ बहुत वर्षों तक तुम्हारे विहार-स्थलों में तुम्हारे सामने नाचती थीं और तुम वैभव से दीप्त रहते थे,
श्लोक 20 (12.230.20)
बहूनि वर्षपूगानि विहारे दीप्यतः श्रिया । सर्वाः पुष्करमालिन्यः सर्वाः काञ्चनसप्रभाः ॥
bahūni varṣapūgāni vihāre dīpyataḥ śriyā | sarvāḥ puṣkaramālinyaḥ sarvāḥ kāñcanasaprabhāḥ
वे सब कमल की मालाएँ पहने थीं और सब सोने की-सी दमकती थीं; उस समय तुम्हारा मन कैसा था?
श्लोक 21 (12.230.21)
कथमद्य तदा चैव मनस्ते दानवेश्वर । छत्रं तवासीत्सुमहत्सौवर्णं रत्नभूषितम् ॥
kathamadya tadā caiva manaste dānaveśvara | chatraṃ tavāsītsumahatsauvarṇaṃ ratnabhūṣitam
दानवेश्वर, आज तुम्हारा मन कैसा है, और तब कैसा था? तुम्हारे पास रत्नों से सजा हुआ एक बहुत बड़ा सोने का छत्र था,
श्लोक 22 (12.230.22)
ननृतुस्तत्र गन्धर्वाः षट्सहस्राणि सप्तधा । यूपस्तवासीत्सुमहान्यजतः सर्वकाञ्चनः ॥
nanṛtustatra gandharvāḥ ṣaṭsahasrāṇi saptadhā | yūpastavāsītsumahānyajataḥ sarvakāñcanaḥ
जिसके नीचे छह हज़ार गन्धर्व सात-सात के समूहों में नाचते थे; और जब तुम यज्ञ करते थे तब तुम्हारा यज्ञ-स्तम्भ विशाल और पूरा सोने का था।
श्लोक 23 (12.230.23)
यत्राददः सहस्राणि अयुतानां गवां दश । अनन्तरं सहस्रेण तदाऽऽसीद्दैत्य का मतिः ॥
yatrādadaḥ sahasrāṇi ayutānāṃ gavāṃ daśa | anantaraṃ sahasreṇa tadā''sīddaitya kā matiḥ
वहाँ तुमने हज़ारों गायें दान कीं, दस अयुत (एक लाख), और उसके बाद एक हज़ार और। दैत्य, तब तुम्हारे मन में क्या था?
श्लोक 24 (12.230.24)
यदा च पृथिवीं सर्वां यजमानोऽनुपर्यगाः । शम्याक्षेपेण विधिना तदाऽऽसीत्किंतु ते हृदि ॥
yadā ca pṛthivīṃ sarvāṃ yajamāno'nuparyagāḥ | śamyākṣepeṇa vidhinā tadā''sītkiṃtu te hṛdi
और जब तुम यजमान बनकर शम्या फेंकने की विधि से सारी पृथ्वी की परिक्रमा कर आए थे, तब तुम्हारे हृदय में क्या था?
श्लोक 25 (12.230.25)
न ते पश्यामि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजनं न च । ब्रह्मदत्तां च ते मालां न पश्याम्यसुराधिप ॥
na te paśyāmi bhṛṅgāraṃ na cchatraṃ vyajanaṃ na ca | brahmadattāṃ ca te mālāṃ na paśyāmyasurādhipa
असुरों के स्वामी, मुझे न तुम्हारा जलपात्र दिखता है, न छत्र, न पंखा; और ब्रह्मा की दी हुई तुम्हारी माला भी मुझे नहीं दिखती।
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (12.230.26)
ततः प्रहस्य स बलिर्वासवेन समीरितम् । निशम्य मानगम्भीरं सुरराजमथाब्रवीत् ॥
tataḥ prahasya sa balirvāsavena samīritam | niśamya mānagambhīraṃ surarājamathābravīt
तब बलि हँसा, और वासव के कहे हुए गर्व और गम्भीरता से भरे वचन सुनकर उसने देवराज को उत्तर दिया।
बलिरुवाच
श्लोक 27 (12.230.27)
अहो हि तव बालिश्यमिह देवगणाधिप । अयुक्तं देवराजस्य तव कष्टमिदं वचः ॥
aho hi tava bāliśyamiha devagaṇādhipa | ayuktaṃ devarājasya tava kaṣṭamidaṃ vacaḥ
अरे देवगणों के स्वामी, तुम्हारा यह कैसा बचपना है! देवराज के लिए ये वचन अनुचित हैं, और कष्ट देने वाले हैं।
श्लोक 28 (12.230.28)
न त्वं पश्यसि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजनं न च । ब्रह्मदत्तां च मे मालां न त्वं द्रक्ष्यसि वासव ॥
na tvaṃ paśyasi bhṛṅgāraṃ na cchatraṃ vyajanaṃ na ca | brahmadattāṃ ca me mālāṃ na tvaṃ drakṣyasi vāsava
वासव, तुम मेरा जलपात्र, मेरा छत्र और मेरा पंखा नहीं देख रहे; और ब्रह्मा की दी हुई मेरी माला भी तुम नहीं देख पाओगे।
श्लोक 29 (12.230.29)
गुहायां निहितानि त्वं मम रत्नानि पृच्छसि । यदा मे भविता कालस्तदा त्वं तानि द्रक्ष्यसि ॥
guhāyāṃ nihitāni tvaṃ mama ratnāni pṛcchasi | yadā me bhavitā kālastadā tvaṃ tāni drakṣyasi
तुम मुझसे गुफा में छिपाकर रखे मेरे रत्नों के बारे में पूछ रहे हो। जब मेरा समय आएगा, तब तुम उन्हें देखोगे।
श्लोक 30 (12.230.30)
न जानीषे भवान्सिद्धिं शुभाङ्गस्वरूपरूपिणीम् । कालेन भविता सर्वो नात्र गच्छति वासव ॥
na jānīṣe bhavānsiddhiṃ śubhāṅgasvarūparūpiṇīm | kālena bhavitā sarvo nātra gacchati vāsava
आप उस सिद्धि को नहीं जानते जो शुभ अंगों और रूप वाली होकर आती है। सब कुछ समय आने पर ही होता है; यहाँ कोई उससे बाहर नहीं जाता, वासव।
श्लोक 31 (12.230.31)
न त्वेतदनुरूपं ते यशसो वा कुलस्य च । समृद्धार्थोऽसमृद्धार्थं यन्मां कत्थितुमिच्छसि ॥
na tvetadanurūpaṃ te yaśaso vā kulasya ca | samṛddhārtho'samṛddhārthaṃ yanmāṃ katthitumicchasi
तुम्हारे यश और कुल के अनुरूप यह नहीं है कि तुम, जिसके सब प्रयोजन सिद्ध हो चुके हैं, मुझ जैसे असफल के सामने डींग मारना चाहो।
श्लोक 32 (12.230.32)
न हि दुःखेषु शोचन्ते न प्रहृष्यन्ति चर्द्धिषु । कृतप्रज्ञाः ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ॥
na hi duḥkheṣu śocante na prahṛṣyanti carddhiṣu | kṛtaprajñāḥ jñānatṛptāḥ kṣāntāḥ santo manīṣiṇaḥ
जिनकी बुद्धि स्थिर है, जो ज्ञान से तृप्त और क्षमाशील हैं, ऐसे विवेकी सज्जन दुःखों में शोक नहीं करते और समृद्धि में हर्षित नहीं होते।
श्लोक 33 (12.230.33)
त्वं तु प्राकृतया बुद्ध्या पुरंदर विकत्थसे । यदाऽहमिव भावी स्यास्तदा नैवं वदिष्यसि ॥
tvaṃ tu prākṛtayā buddhyā puraṃdara vikatthase | yadā'hamiva bhāvī syāstadā naivaṃ vadiṣyasi
पुरन्दर, तुम तो साधारण बुद्धि से डींग मार रहे हो। जब तुम मेरे समान स्थिति में पहुँचोगे, तब ऐसा नहीं बोलोगे।
श्लोक 34 (12.230.34)
ऐश्वर्यमदमत्तो मां स त्वं किंचिन्न बुद्ध्यसे । राज्याद्विनिपतानेन सोऽहं न त्वपराजितः ॥
aiśvaryamadamatto māṃ sa tvaṃ kiṃcinna buddhyase | rājyādvinipatānena so'haṃ na tvaparājitaḥ
ऐश्वर्य के मद में चूर होकर तुम मेरे विषय में कुछ भी नहीं समझते। राज्य से इस पतन के कारण मैं अब सचमुच अपराजित नहीं रहा।