शान्ति पर्व · अध्याय 231
बलि का इन्द्र को उत्तर: सब कुछ काल के अधीन
इन्द्र बलि को उसके पतन पर फिर ताना देते हैं। बलि उत्तर देता है कि वह शोक नहीं करता: शरीर और सम्पत्ति का अन्त होता है, वास्तविक कर्ता कोई मनुष्य नहीं है, और काल ही सब कुछ लेता और देता है। वह अपने पुराने बल को याद करता है, कहता है कि केवल अपने ऊपर खड़े काल के कारण वह इन्द्र को गिरा नहीं रहा, और काल को उस अदृश्य प्रभु के रूप में बताता है जिसे कोई अग्नि और कोई प्रजापति कहता है। अन्त में वह इन्द्र को चेताता है कि हज़ारों इन्द्र बीत चुके हैं, श्री कभी एक जगह नहीं रहती, और वह इन्द्र को भी छोड़ देगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.231.1)
पुनरेव तु तं शक्रः प्रहसन्निदमब्रवीत् । निश्वसन्तं यथा नागं प्रव्याहाराय भारत ॥
punareva tu taṃ śakraḥ prahasannidamabravīt | niśvasantaṃ yathā nāgaṃ pravyāhārāya bhārata
तब शक्र ने हँसते हुए उससे फिर यह कहा, जो साँप की तरह लम्बी साँसें ले रहा था, हे भरतवंशी, ताकि वह कुछ उत्तर दे।
शक्र उवाच
श्लोक 2 (12.231.2)
यत्तद्यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः । लोकान्प्रतापयन्सर्वान्यास्यस्मानवितर्कयन् ॥
yattadyānasahasreṇa jñātibhiḥ parivāritaḥ | lokānpratāpayansarvānyāsyasmānavitarkayan
तुम जो कभी हज़ारों वाहनों पर चलते थे, अपने बन्धुओं से घिरे हुए, सब लोकों को तपाते हुए और हमारी ओर ध्यान तक न देते हुए जाया करते थे,
श्लोक 3 (12.231.3)
दृष्ट्वा सुकृपणां चेमामवस्थामात्मनो बले । ज्ञातिमित्रपरित्यक्तः शोचस्याहो न शोचसि ॥
dṛṣṭvā sukṛpaṇāṃ cemāmavasthāmātmano bale | jñātimitraparityaktaḥ śocasyāho na śocasi
बलि, अपनी यह अत्यन्त दयनीय दशा देखकर, जब बन्धुओं और मित्रों ने भी तुम्हें छोड़ दिया है, क्या तुम शोक करते हो, या नहीं करते?
श्लोक 4 (12.231.4)
प्रीतिं प्राप्यातुलां पूर्वं लोकांश्चात्मवशे स्थितान् । विनिपातमिमं चाद्य शोचस्याहो न शोचसि ॥
prītiṃ prāpyātulāṃ pūrvaṃ lokāṃścātmavaśe sthitān | vinipātamimaṃ cādya śocasyāho na śocasi
तुमने पहले अतुलनीय आनन्द पाया था, जब लोक तुम्हारे वश में थे; अब इस पतन पर क्या तुम शोक करते हो, या नहीं करते?
बलिरुवाच
श्लोक 5 (12.231.5)
गर्वं हित्वा तथा मानं देवराज शृणुष्व मे । मया च त्वाऽनुसद्भावं पूर्वमाचरितं महत् ॥
garvaṃ hitvā tathā mānaṃ devarāja śṛṇuṣva me | mayā ca tvā'nusadbhāvaṃ pūrvamācaritaṃ mahat
देवराज, गर्व और अभिमान छोड़कर मेरी बात सुनो। पहले मैंने तुम्हारे प्रति बड़ी सच्ची भावना से व्यवहार किया था।
श्लोक 6 (12.231.6)
अवश्यकालपर्यायमात्मनः परिवर्तनम् । अविदँल्लोकमाहात्म्यं ॥
avaśyakālaparyāyamātmanaḥ parivartanam | avidam̐llokamāhātmyaṃ
काल का पलटना अवश्यम्भावी है, और उसी के साथ अपनी स्थिति भी बदलती है। संसार की महिमा को न जानते हुए …
श्लोक 7 (12.231.7)
अनित्यमुपलक्ष्येह कालपर्यायमात्मनः । तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥
anityamupalakṣyeha kālaparyāyamātmanaḥ | tasmācchakra na śocāmi sarvaṃ hyevedamantavat
यह देखकर कि अपनी दशा अनित्य है और काल के चक्र के अनुसार बदलती है, शक्र, मैं शोक नहीं करता; क्योंकि यह सब अन्त वाला है।
श्लोक 8 (12.231.8)
अन्तवन्त इमे देहा भूतानां च सुराधिप । तेन शक्र न शोचामि नापराधादिदं मम ॥
antavanta ime dehā bhūtānāṃ ca surādhipa | tena śakra na śocāmi nāparādhādidaṃ mama
अमरों के स्वामी, प्राणियों के ये शरीर अन्त वाले हैं। इसलिए शक्र, मैं शोक नहीं करता; यह मुझ पर किसी अपराध के कारण नहीं आया।
श्लोक 9 (12.231.9)
जीवितं च शरीरं च जात्या वै सह जायते । उभे सह विवर्धेते उभे सह विनश्यतः ॥
jīvitaṃ ca śarīraṃ ca jātyā vai saha jāyate | ubhe saha vivardhete ubhe saha vinaśyataḥ
जीवन और शरीर जन्म के साथ ही साथ उत्पन्न होते हैं; दोनों साथ बढ़ते हैं और दोनों साथ ही नष्ट होते हैं।
श्लोक 10 (12.231.10)
न हीदृशमहंभावमवशः प्राप्य केवलम् । यदेवमभिजानामि का व्यथा मे विजानतः ॥
na hīdṛśamahaṃbhāvamavaśaḥ prāpya kevalam | yadevamabhijānāmi kā vyathā me vijānataḥ
ऐसा अहंभाव अपनी इच्छा से नहीं मिलता; वह तो विवश होकर, केवल यों ही प्राप्त होता है। जब मैं इसे इसी रूप में जानता हूँ, तब जानने वाले मुझे कैसी व्यथा?
श्लोक 11 (12.231.11)
भूतानां निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागरः । नैतत्सम्यग्विजानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रधृत् ॥
bhūtānāṃ nidhanaṃ niṣṭhā srotasāmiva sāgaraḥ | naitatsamyagvijānanto narā muhyanti vajradhṛt
प्राणियों का अन्त और अन्तिम विश्राम मृत्यु है, जैसे नदियों के लिए समुद्र। वज्रधारी, जो लोग इसे ठीक-ठीक नहीं समझते, वे मोह में पड़ते हैं।
श्लोक 12 (12.231.12)
ये त्वेवं नाभिजानन्ति रजोमोहपरायणाः । ते कृच्छ्रं प्राप्य सीदन्ति बुद्धिर्येषां प्रणश्यति ॥
ye tvevaṃ nābhijānanti rajomohaparāyaṇāḥ | te kṛcchraṃ prāpya sīdanti buddhiryeṣāṃ praṇaśyati
जो लोग इसे नहीं जानते और रजोगुण तथा मोह में डूबे रहते हैं, वे संकट आने पर दुःख में डूब जाते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है।
श्लोक 13 (12.231.13)
बुद्धिलाभात्तु पुरुषः सर्वं नुदति किल्विषम् । विपाप्मा लभते सत्वं सत्वस्थः संप्रसीदति ॥
buddhilābhāttu puruṣaḥ sarvaṃ nudati kilviṣam | vipāpmā labhate satvaṃ satvasthaḥ saṃprasīdati
बुद्धि के प्राप्त होने से मनुष्य सब पाप दूर कर देता है; पापरहित होकर वह सत्त्व पाता है और सत्त्व में स्थित होकर प्रसन्न हो जाता है।
श्लोक 14 (12.231.14)
ततस्तु ये निवर्तन्ते जायन्ते वा पुनः पुनः । कृपणाः परितप्यन्ते तैरर्थैरभिचोदिताः ॥
tatastu ye nivartante jāyante vā punaḥ punaḥ | kṛpaṇāḥ paritapyante tairarthairabhicoditāḥ
परन्तु जो लौट जाते हैं, या बार-बार जन्म लेते हैं, वे दीन लोग उन्हीं प्रयोजनों से प्रेरित होकर कष्ट पाते हैं।
श्लोक 15 (12.231.15)
अर्थसिद्धिमनर्थं च जीवितं मरणं तथा । सुखं दुःखं फलं चैव न द्वेष्मि न च कामये ॥
arthasiddhimanarthaṃ ca jīvitaṃ maraṇaṃ tathā | sukhaṃ duḥkhaṃ phalaṃ caiva na dveṣmi na ca kāmaye
लाभ और हानि, जीवन और मरण, सुख और दुःख रूपी फल, इनसे न मैं द्वेष करता हूँ, न इनकी कामना करता हूँ।
श्लोक 16 (12.231.16)
हतं हन्ति हतो ह्येव यो नरो हन्ति कंचन । उभौ तौ न विजानीतो यश्च हन्ति हतश्च यः ॥
hataṃ hanti hato hyeva yo naro hanti kaṃcana | ubhau tau na vijānīto yaśca hanti hataśca yaḥ
जो मनुष्य किसी को मारता है, वह पहले से मरे हुए को ही मारता है, और वह स्वयं भी पहले से मरा हुआ ही है; मारने वाला और मरने वाला, दोनों यह नहीं जानते।
श्लोक 17 (12.231.17)
हत्वा जित्वा च मघवन्यः कश्चित्पुरुषायते । अकर्ता ह्येव भवति कर्ता ह्येव करोति तत् ॥
hatvā jitvā ca maghavanyaḥ kaścitpuruṣāyate | akartā hyeva bhavati kartā hyeva karoti tat
मघवन्, जो कोई मारकर और जीतकर वीर बनता है, वह वास्तव में कर्ता नहीं है; उसे तो कर्ता ही करता है।
श्लोक 18 (12.231.18)
को हि लोकस्य कुरुते विनाशप्रभवावुभौ । कृतं हि तत्कृतेनैव कर्ता तस्यापि चापरः ॥
ko hi lokasya kurute vināśaprabhavāvubhau | kṛtaṃ hi tatkṛtenaiva kartā tasyāpi cāparaḥ
संसार के नाश और उत्पत्ति, इन दोनों को कौन करता है? जो किया गया है वह पहले किए हुए से ही किया गया है, और उस कर्ता के पीछे भी कोई दूसरा कर्ता है।
श्लोक 19 (12.231.19)
पृथिवी ज्योतिराकाशमापो वायुश्च पञ्चमः । एतद्योनीनि भूतानि तत्र का परिदेवना ॥
pṛthivī jyotirākāśamāpo vāyuśca pañcamaḥ | etadyonīni bhūtāni tatra kā paridevanā
पृथ्वी, ज्योति, आकाश, जल और पाँचवाँ वायु: प्राणियों की उत्पत्ति इन्हीं से होती है। इसमें विलाप कैसा?
श्लोक 20 (12.231.20)
महाविद्योऽल्पविद्यश्च बलवान्दुर्बलश्च यः । दर्शनीयो विरूपश्च सुभगो दुर्भगश्च यः ॥
mahāvidyo'lpavidyaśca balavāndurbalaśca yaḥ | darśanīyo virūpaśca subhago durbhagaśca yaḥ
अत्यन्त विद्वान् और थोड़ा जानने वाला, बलवान् और दुर्बल, सुन्दर और कुरूप, भाग्यवान् और अभागा:
श्लोक 21 (12.231.21)
सर्वं कालः समादत्ते गम्भीरः स्वेन तेजसा । तस्मिन्कालवशं प्राप्ते का व्यथा मे विजानतः ॥
sarvaṃ kālaḥ samādatte gambhīraḥ svena tejasā | tasminkālavaśaṃ prāpte kā vyathā me vijānataḥ
गम्भीर काल अपने तेज से सबको समेट लेता है। जब सब कुछ काल के वश में है, तो यह जानने वाले मुझे कैसी व्यथा?
श्लोक 22 (12.231.22)
दग्धमेवानुदहते हतमेवानुहन्यते । नश्यते नष्टमेवाग्रे लब्धव्यं लभते नरः ॥
dagdhamevānudahate hatamevānuhanyate | naśyate naṣṭamevāgre labdhavyaṃ labhate naraḥ
जो जल चुका है वही फिर जलता है, जो मर चुका है वही फिर मारा जाता है; जो नष्ट होता है वह पहले ही नष्ट हो चुका होता है, और मनुष्य वही पाता है जो उसे पाना है।
श्लोक 23 (12.231.23)
नास्य द्वीपः कुतः पारो नावारः संप्रदृश्यते । नान्तमस्य प्रपश्यामि विधेर्दिव्यस्य चिन्तयन् ॥
nāsya dvīpaḥ kutaḥ pāro nāvāraḥ saṃpradṛśyate | nāntamasya prapaśyāmi vidherdivyasya cintayan
इसके लिए न कोई द्वीप है, तब पार कहाँ? और न निकट का तट ही दिखाई देता है। इस दैवी विधान पर विचार करते हुए मुझे इसका कोई अन्त नहीं दिखता।
श्लोक 24 (12.231.24)
यदि मे पश्यतः कालो भूतानि न विनाशयेत् । स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ॥
yadi me paśyataḥ kālo bhūtāni na vināśayet | syānme harṣaśca darpaśca krodhaścaiva śacīpate
शचीपति, यदि मेरे देखते-देखते काल प्राणियों का नाश न करता, तो मुझे हर्ष, अभिमान और क्रोध होता।
श्लोक 25 (12.231.25)
तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे । बिभ्रतं गार्दभं रूपमागत्य परिगर्हसे ॥
tuṣabhakṣaṃ tu māṃ jñātvā praviviktajane gṛhe | bibhrataṃ gārdabhaṃ rūpamāgatya parigarhase
मुझे भूसी खाने वाला जानकर, इस एकान्त घर में, जहाँ मैंने गधे का रूप धारण किया है, तुम आकर मेरी निन्दा करते हो।
श्लोक 26 (12.231.26)
इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि बहुधाऽऽत्मनः । विभीषणानि यानीक्ष्य पलायेथास्त्वमेव मे ॥
icchannahaṃ vikuryāṃ hi rūpāṇi bahudhā''tmanaḥ | vibhīṣaṇāni yānīkṣya palāyethāstvameva me
यदि मैं चाहूँ तो अपने बहुत-से रूप धारण कर सकता हूँ, इतने भयंकर कि उन्हें देखकर तुम स्वयं मेरे सामने से भाग खड़े होओ।
श्लोक 27 (12.231.27)
कालः सर्वं समादत्ते कालः सर्वं प्रयच्छति । कालेन विहितं सर्वं मा कृथाः शक्र पौरुषम् ॥
kālaḥ sarvaṃ samādatte kālaḥ sarvaṃ prayacchati | kālena vihitaṃ sarvaṃ mā kṛthāḥ śakra pauruṣam
काल सबको ले लेता है और काल ही सबको देता है; सब कुछ काल से ही निर्धारित है। शक्र, पौरुष का दिखावा मत करो।
श्लोक 28 (12.231.28)
पुरा सर्वं प्रव्यथितं मयि क्रुद्धे पुरंदर । विद्रवन्ति त्वया सार्धं सर्व एव दिवौकसः ॥
purā sarvaṃ pravyathitaṃ mayi kruddhe puraṃdara | vidravanti tvayā sārdhaṃ sarva eva divaukasaḥ
पुरन्दर, पहले जब मैं क्रोध करता था तब सब काँप उठते थे; और तुम्हारे साथ स्वर्गवासी सब देवता भाग खड़े होते थे।
श्लोक 29 (12.231.29)
अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मम् शक्र सनातनम् । त्वमप्येवमवेक्षस्व माऽऽत्मना विस्मयं गमः ॥
avaimi tvasya lokasya dharmam śakra sanātanam | tvamapyevamavekṣasva mā''tmanā vismayaṃ gamaḥ
शक्र, मैं इस लोक का सनातन धर्म जानता हूँ; तुम भी इसे इसी प्रकार देखो, और अपने ही विषय में गर्व-भरे विस्मय में मत पड़ो।
श्लोक 30 (12.231.30)
प्रभवश्च प्रभावश्च नात्मसंस्थः कदाचन । कौमारमेव ते चित्तं तथैवाद्य यथा पुरा । समवेक्षस्व मघवन्बुद्धिं विन्दस्व नैष्ठिकीम् ॥
prabhavaśca prabhāvaśca nātmasaṃsthaḥ kadācana | kaumārameva te cittaṃ tathaivādya yathā purā | samavekṣasva maghavanbuddhiṃ vindasva naiṣṭhikīm
ऐश्वर्य और उसका प्रभाव कभी अपने ही अधीन नहीं होते। तुम्हारा मन आज भी बालक जैसा है, जैसा पहले था। मघवन्, चारों ओर देखो और वह बुद्धि प्राप्त करो जो अन्तिम निश्चय की है।
श्लोक 31 (12.231.31)
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः । आसन्सर्वे मम वशे तत्सर्वं वेत्थ वासव ॥
devā manuṣyāḥ pitaro gandharvoragarākṣasāḥ | āsansarve mama vaśe tatsarvaṃ vettha vāsava
देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस, सब मेरे वश में थे। वासव, यह सब तुम जानते हो।
श्लोक 32 (12.231.32)
नमस्तस्यै दिशेऽप्यस्तु यस्यां वैरोचनो बलिः । इति मामभ्यपद्यन्त बुद्धिमात्सर्यमोहिताः ॥
namastasyai diśe'pyastu yasyāṃ vairocano baliḥ | iti māmabhyapadyanta buddhimātsaryamohitāḥ
"उस दिशा को नमस्कार जिसमें विरोचन का पुत्र बलि रहता है": इस प्रकार ईर्ष्या से मोहित मन वाले लोग मेरे पास आते थे।
श्लोक 33 (12.231.33)
नाहं तदनुशोचामि नात्मभ्रंशं शचीपते । एवं मे निश्चिता बुद्धिः शास्तुस्तिष्ठाम्यहं वशे ॥
nāhaṃ tadanuśocāmi nātmabhraṃśaṃ śacīpate | evaṃ me niścitā buddhiḥ śāstustiṣṭhāmyahaṃ vaśe
शचीपति, मैं उसका शोक नहीं करता, और न अपने स्थान से गिरने का। मेरी बुद्धि ने यही निश्चय किया है कि मैं शासन करने वाले परमेश्वर के वश में रहता हूँ।
श्लोक 34 (12.231.34)
दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीयः प्रतापवान् । दुःखं जीवन्सहामात्यो भवितव्यं हि तत्तथा ॥
dṛśyate hi kule jāto darśanīyaḥ pratāpavān | duḥkhaṃ jīvansahāmātyo bhavitavyaṃ hi tattathā
कोई अच्छे कुल में जन्मा, सुन्दर और प्रतापी मनुष्य अपने मन्त्रियों सहित दुःख में जीता दिखाई देता है; यह ऐसा ही होना था।
श्लोक 35 (12.231.35)
दौष्कुलेयस्तथा मूढो दुर्जातः शक्र दृश्यते । सुखं जीवन्सहामात्यो भवितव्यं हि तत्तथा ॥
dauṣkuleyastathā mūḍho durjātaḥ śakra dṛśyate | sukhaṃ jīvansahāmātyo bhavitavyaṃ hi tattathā
और बुरे कुल का, मूर्ख और नीच जन्म वाला मनुष्य अपने मन्त्रियों सहित सुख से जीता दिखाई देता है; यह भी ऐसा ही होना था।
श्लोक 36 (12.231.36)
कल्याणी रूपसंपन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते । अलक्षणा विरूपा च सुभगा दृश्यते परा ॥
kalyāṇī rūpasaṃpannā durbhagā śakra dṛśyate | alakṣaṇā virūpā ca subhagā dṛśyate parā
शक्र, कोई कल्याणी और रूपवती स्त्री अभागी दिखती है, और कोई दूसरी, लक्षणहीन और कुरूप, भाग्यवती दिखती है।
श्लोक 37 (12.231.37)
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वया कृतम् । यत्त्वमेवं गतो वज्रिन्यच्चाप्येवं गता वयम् ॥
naitadasmatkṛtaṃ śakra naitacchakra tvayā kṛtam | yattvamevaṃ gato vajrinyaccāpyevaṃ gatā vayam
शक्र, न यह हमारा किया है और न तुम्हारा, कि तुम इस दशा में हो, वज्रधारी, या हम इस दशा में हैं।
श्लोक 38 (12.231.38)
न कर्म तव नान्येषां कुतो मम शतक्रतो । ऋद्धिर्वाऽप्यथवा नर्द्धिः पर्यायकृतमेव तत् ॥
na karma tava nānyeṣāṃ kuto mama śatakrato | ṛddhirvā'pyathavā narddhiḥ paryāyakṛtameva tat
शतक्रतु, यह न तुम्हारा कर्म है, न दूसरों का, न मेरा। समृद्धि हो या उसका अभाव, वह काल के चक्र से ही बनता है।
श्लोक 39 (12.231.39)
पश्यामि त्वां विराजन्तं देवराजमवस्थितम् । श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जमानं ममोपरि ॥
paśyāmi tvāṃ virājantaṃ devarājamavasthitam | śrīmantaṃ dyutimantaṃ ca garjamānaṃ mamopari
मैं तुम्हें देवराज के रूप में शोभित खड़े देख रहा हूँ, श्रीमान् और दीप्तिमान्, मेरे ऊपर गरजते हुए।
श्लोक 40 (12.231.40)
एवं नैव न चेत्कालो मामाक्रम्य स्थितो भवेत् । पातयेयमहं त्वाऽद्य सवज्रमपि मुष्टिना ॥
evaṃ naiva na cetkālo māmākramya sthito bhavet | pātayeyamahaṃ tvā'dya savajramapi muṣṭinā
यदि काल मुझे दबाकर मेरे ऊपर खड़ा न होता, तो यह कभी ऐसा न होता; मैं आज तुम्हें वज्र सहित अपनी मुट्ठी से गिरा देता।
श्लोक 41 (12.231.41)
न तु विक्रमकालोऽयं शान्तिकालोऽयमागतः । कालः स्थापयते सर्वं कालः पचति वै तथा ॥
na tu vikramakālo'yaṃ śāntikālo'yamāgataḥ | kālaḥ sthāpayate sarvaṃ kālaḥ pacati vai tathā
परन्तु यह पराक्रम का समय नहीं है; शान्ति का समय आ गया है। काल सबको स्थापित करता है और काल ही सबको पकाता है।
श्लोक 42 (12.231.42)
मां चेदभ्यागतः कालो दानवेश्वरमूर्जितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च कमन्यं नागमिष्यति ॥
māṃ cedabhyāgataḥ kālo dānaveśvaramūrjitam | garjantaṃ pratapantaṃ ca kamanyaṃ nāgamiṣyati
यदि काल मुझ जैसे बलशाली दानवेश्वर के पास भी आ गया, जो गरजता और तपता था, तो वह और किसके पास नहीं आएगा?
श्लोक 43 (12.231.43)
द्वादशानां तु भवतामादित्यानां महात्मनाम् । तेजांस्येकेन सर्वेषां देवराज धृतानि मे ॥
dvādaśānāṃ tu bhavatāmādityānāṃ mahātmanām | tejāṃsyekena sarveṣāṃ devarāja dhṛtāni me
देवराज, तुम बारह महात्मा आदित्यों के सब तेजों को मैं अकेला धारण करता था।
श्लोक 44 (12.231.44)
अहमेवोद्वहाम्यापो विसृजामि च वासव । तपामि चैव त्रैलोक्यं विद्योताम्यहमेव च ॥
ahamevodvahāmyāpo visṛjāmi ca vāsava | tapāmi caiva trailokyaṃ vidyotāmyahameva ca
वासव, मैं ही जल को ऊपर उठाता और बरसाता था; मैं ही तीनों लोकों को तपाता और प्रकाशित करता था।
श्लोक 45 (12.231.45)
संरक्षामि विलुम्पामि ददाम्यहमथाददे । संयच्छामि नियच्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वरः ॥
saṃrakṣāmi vilumpāmi dadāmyahamathādade | saṃyacchāmi niyacchāmi lokeṣu prabhurīśvaraḥ
मैं रक्षा करता था और छीनता था, देता था और वापस लेता था; मैं रोकता और नियन्त्रित करता था, लोकों में प्रभु और स्वामी था।
श्लोक 46 (12.231.46)
तदद्य विनिवृत्तं मे प्रभुत्वममराधिप । कालसैन्यावगाढस्य सर्वं न प्रतिभाति मे ॥
tadadya vinivṛttaṃ me prabhutvamamarādhipa | kālasainyāvagāḍhasya sarvaṃ na pratibhāti me
अमरों के स्वामी, मेरा वह प्रभुत्व अब मुझसे लौट गया है। काल की सेना से घिरे हुए मुझे कुछ भी स्पष्ट नहीं सूझता।
श्लोक 47 (12.231.47)
नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्यः कर्ता शचीपते । पर्यायेण हि भुज्यन्ते लोकाः शक्र यदृच्छया ॥
nāhaṃ kartā na caiva tvaṃ nānyaḥ kartā śacīpate | paryāyeṇa hi bhujyante lokāḥ śakra yadṛcchayā
शचीपति, न मैं कर्ता हूँ, न तुम, न कोई और। शक्र, लोक बारी-बारी से, संयोगवश, भोगे जाते हैं।
श्लोक 48 (12.231.48)
मासमासार्धवेश्मानमहोरात्राभिसंवृतम् । ऋतुद्वारं वायुमुखमायुर्वेदविदो जनाः ॥
māsamāsārdhaveśmānamahorātrābhisaṃvṛtam | ṛtudvāraṃ vāyumukhamāyurvedavido janāḥ
आयु के विज्ञान को जानने वाले लोग इसे महीनों और पखवाड़ों का घर बताते हैं, जो दिन-रात से घिरा है, जिसके द्वार ऋतुएँ हैं और मुख वायु है।
श्लोक 49 (12.231.49)
आहुः सर्वमिदं चिन्त्यं जनाः केचिन्मनीषया । अनित्यपञ्चवर्षाणि षष्ठो दृश्यति देहिनाम् ॥
āhuḥ sarvamidaṃ cintyaṃ janāḥ kecinmanīṣayā | anityapañcavarṣāṇi ṣaṣṭho dṛśyati dehinām
कुछ लोग कहते हैं कि यह सब बुद्धि से विचारने योग्य है: देहधारियों के लिए पाँच वर्ष अनित्य हैं, और छठा दिखाई देता है।
श्लोक 50 (12.231.50)
अस्याः पञ्चैव चिन्तायाः पर्येष्यामि च पञ्चधा । ततस्तानि न पश्यामि काले तमपि वृत्रहन् ॥
asyāḥ pañcaiva cintāyāḥ paryeṣyāmi ca pañcadhā | tatastāni na paśyāmi kāle tamapi vṛtrahan
इस चिन्तन के पाँच ही अंग हैं, और मैं उन्हें पाँच प्रकार से देखूँगा। तब वृत्रहन्, मैं उन्हें, उस एक को भी, काल में नहीं देखता।
श्लोक 51 (12.231.51)
गम्भीरं गहनं ब्रह्म महत्तोयार्णवं यथा । अनादिनिधनं चाहुरक्षरं क्षरमेव च ॥
gambhīraṃ gahanaṃ brahma mahattoyārṇavaṃ yathā | anādinidhanaṃ cāhurakṣaraṃ kṣarameva ca
ब्रह्म गम्भीर और गहन है, महान् जल-समुद्र के समान। उसे आदि और अन्त से रहित कहते हैं, अक्षर भी और क्षर भी।
श्लोक 52 (12.231.52)
सत्त्वेषु लिङ्गमाविश्य निर्लिङ्गमपि तत्स्वयम् । मन्यन्ते ध्रुवमेवैनं ये जनास्तत्त्वदर्शिनः ॥
sattveṣu liṅgamāviśya nirliṅgamapi tatsvayam | manyante dhruvamevainaṃ ye janāstattvadarśinaḥ
प्राणियों में चिह्न के साथ प्रवेश करके भी वह स्वयं चिह्नरहित है। जो लोग तत्त्व को देखते हैं, वे उसे ध्रुव मानते हैं।
श्लोक 53 (12.231.53)
यमिन्द्रियाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति पञ्चधा । तं कालमिति जानीहि यस्य सर्वमिदं वशे ॥
yamindriyāṇi sarvāṇi nānupaśyanti pañcadhā | taṃ kālamiti jānīhi yasya sarvamidaṃ vaśe
जिसे सब इन्द्रियाँ पाँचों प्रकार से नहीं देख पातीं, उसे काल जानो, जिसके वश में यह सब है।
श्लोक 54 (12.231.54)
भूतानां तु विपर्यासं कुरुते भगवानिति । न ह्येतावद्भवेद्ग्राम्यं न यस्मात्प्रभवेत्पुनः ॥
bhūtānāṃ tu viparyāsaṃ kurute bhagavāniti | na hyetāvadbhavedgrāmyaṃ na yasmātprabhavetpunaḥ
कहते हैं कि भगवान् प्राणियों का उलट-फेर करता है। क्योंकि यह इतनी साधारण बात नहीं होगी कि ऐसा कुछ न हो जिससे वह फिर उत्पन्न हो।
श्लोक 55 (12.231.55)
गतिं हि सर्वभूतानामगत्वा क्व गमिष्यति । यो धावता न हातव्यस्तिष्ठन्नपि न हीयते ॥
gatiṃ hi sarvabhūtānāmagatvā kva gamiṣyati | yo dhāvatā na hātavyastiṣṭhannapi na hīyate
सब प्राणियों की गति तक पहुँचे बिना तुम कहाँ जाओगे? दौड़ने वाला उसे पीछे नहीं छोड़ सकता, और खड़ा रहने वाला भी उसे नहीं खोता।
श्लोक 56 (12.231.56)
तमिन्द्रियाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति पञ्चधा । आहुश्चैनं केचिदग्निं केचिदाहुः प्रजापतिम् ॥
tamindriyāṇi sarvāṇi nānupaśyanti pañcadhā | āhuścainaṃ kecidagniṃ kecidāhuḥ prajāpatim
सब इन्द्रियाँ उसे पाँचों प्रकार से नहीं देख पातीं। कोई उसे अग्नि कहते हैं, कोई प्रजापति।
श्लोक 57 (12.231.57)
ऋतून्मासार्धमासांश्च दिवसांश्च क्षणांस्तथा । पूर्वाह्णमपराह्णं च मध्याह्नमपि चापरे ॥
ṛtūnmāsārdhamāsāṃśca divasāṃśca kṣaṇāṃstathā | pūrvāhṇamaparāhṇaṃ ca madhyāhnamapi cāpare
कोई उसे ऋतुएँ, मास और पक्ष, दिन और क्षण कहते हैं; दूसरे उसे पूर्वाह्न, अपराह्न और मध्याह्न कहते हैं;
श्लोक 58 (12.231.58)
मुहूर्तमपि चैवाहुरेकं सन्तमनेकधा । तं कालमिति जानीहि यस्य सर्वमिदं वशे ॥
muhūrtamapi caivāhurekaṃ santamanekadhā | taṃ kālamiti jānīhi yasya sarvamidaṃ vaśe
और उसे एक मुहूर्त भी कहते हैं, जबकि वह एक होकर भी अनेक रूपों में है। उसे काल जानो, जिसके वश में यह सब है।
श्लोक 59 (12.231.59)
बहूनीन्द्रसहस्राणि समतीतानि वासव । बलवीर्योपपन्नानि यथैव त्वं शचीपते ॥
bahūnīndrasahasrāṇi samatītāni vāsava | balavīryopapannāni yathaiva tvaṃ śacīpate
वासव, बल और पराक्रम से सम्पन्न हज़ारों इन्द्र पहले बीत चुके हैं, ठीक वैसे ही जैसे तुम हो, शचीपति।
श्लोक 60 (12.231.60)
त्वामप्यतिबलं शक्र देवराजं बलोत्कटम् । प्राप्ते काले महावीर्यः कालः संशमयिष्यति ॥
tvāmapyatibalaṃ śakra devarājaṃ balotkaṭam | prāpte kāle mahāvīryaḥ kālaḥ saṃśamayiṣyati
शक्र, तुम देवराज भी अत्यन्त बलवान् और बल के गर्व वाले हो; समय आने पर महाबली काल तुम्हें भी शान्त कर देगा।
श्लोक 61 (12.231.61)
य इदं सर्वमादत्ते तस्माच्छक्र स्थिरो भव । मया त्वया च पूर्वैश्च न स शक्योऽतिवर्तितुम् ॥
ya idaṃ sarvamādatte tasmācchakra sthiro bhava | mayā tvayā ca pūrvaiśca na sa śakyo'tivartitum
जो यह सब अपने में समेट लेता है, उसके सामने इसलिए शक्र, स्थिर रहो। मैं, तुम और हमसे पहले के लोग, कोई उसे लाँघ नहीं सकता।
श्लोक 62 (12.231.62)
यामेतां प्राप्य जानीषे राज्यश्रियमनुत्तमाम् । स्थिता मयीति तन्मिथ्या नैषा ह्येकत्र तिष्ठति ॥
yāmetāṃ prāpya jānīṣe rājyaśriyamanuttamām | sthitā mayīti tanmithyā naiṣā hyekatra tiṣṭhati
यह सर्वोत्तम राजलक्ष्मी जिसे पाकर तुम समझते हो कि "यह मुझमें ठहरी है", यह झूठ है, क्योंकि वह एक स्थान पर नहीं रहती।
श्लोक 63 (12.231.63)
स्थिता हीन्द्रसहस्रेषु त्वद्विशिष्टतमेष्वियम् । मां च लोला परित्यज्य त्वामगाद्विबुधाधिप ॥
sthitā hīndrasahasreṣu tvadviśiṣṭatameṣviyam | māṃ ca lolā parityajya tvāmagādvibudhādhipa
वह तुमसे भी श्रेष्ठ हज़ारों इन्द्रों के पास रह चुकी है; और वह चंचला मुझे छोड़कर तुम्हारे पास आई है, देवताओं के स्वामी।
श्लोक 64 (12.231.64)
मैवं शक्र पुनः कार्षीः शान्तो भवितुमर्हसि । त्वामप्येवंविधं ज्ञात्वा क्षिप्रमन्यं गमिष्यति । कालेन चोदिता शक्र मा ते गर्वः शतक्रतो ॥
maivaṃ śakra punaḥ kārṣīḥ śānto bhavitumarhasi | tvāmapyevaṃvidhaṃ jñātvā kṣipramanyaṃ gamiṣyati | kālena coditā śakra mā te garvaḥ śatakrato
शक्र, फिर ऐसा मत करना; तुम्हें शान्त हो जाना चाहिए। तुम्हें भी ऐसी दशा में जानकर वह शीघ्र किसी और के पास चली जाएगी। शतक्रतु, काल से प्रेरित होकर तुम्हारा गर्व न रहे।
श्लोक 65 (12.231.65)
क्षमस्व कालयोगं तमागतं विद्धि देवप । निर्लज्जश्चैव कस्मात्त्वं देवराज विकत्थसे ॥
kṣamasva kālayogaṃ tamāgataṃ viddhi devapa | nirlajjaścaiva kasmāttvaṃ devarāja vikatthase
देवताओं के रक्षक, तुम पर आए इस काल के प्रभाव को सह लो और इसे समझो। देवराज, तुम निर्लज्ज होकर डींग क्यों मारते हो?
श्लोक 66 (12.231.66)
सर्वासुराणामधिपः सर्वदेवभयंकरः । जितवान्ब्रह्मणो लोकं को विद्यादागतं गतिम् ॥
sarvāsurāṇāmadhipaḥ sarvadevabhayaṃkaraḥ | jitavānbrahmaṇo lokaṃ ko vidyādāgataṃ gatim
सब असुरों का स्वामी, सब देवताओं को भय देने वाला, जिसने ब्रह्मा का लोक जीत लिया था, उसके सामने जो गति आ पड़ी है उसे कौन जान सकता है?