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शान्ति पर्व · अध्याय 232

श्री का बलि को छोड़ना और चार भागों में स्थापित होना

इन्द्र देखते हैं कि असुरराज बलि के शरीर से दीप्तिमयी श्री निकल रही है और उससे पूछते हैं कि वह कौन है। श्री अपना परिचय देकर बताती है कि बलि के सत्य, दान, तप और ब्राह्मण-भक्ति से विमुख हो जाने के कारण उसने उसे छोड़ा है। वह चार भागों में बँटकर इन्द्र के पास रहना स्वीकार करती है; ये भाग पृथ्वी, जल, अग्नि और सज्जनों में स्थापित किए जाते हैं। त्यागा हुआ बलि चेतावनी देता है कि वह एक दिन फिर देवताओं को जीतेगा; ब्रह्मा की आज्ञा से इन्द्र उसे छोड़ देते हैं और दोनों अपनी-अपनी राह चले जाते हैं।

अध्याय 231अध्याय-सूचीअध्याय 233

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.232.1)

शतक्रतुरथापश्यद्बलेर्दीप्तां महात्मनः । स्वरूपिणीं शरीराद्धि निष्क्रामन्तीं तदा श्रियम् ॥

śatakraturathāpaśyadbalerdīptāṃ mahātmanaḥ | svarūpiṇīṃ śarīrāddhi niṣkrāmantīṃ tadā śriyam

तब शतक्रतु (इन्द्र) ने देखा कि महात्मा बलि के शरीर से उसकी दीप्तिमयी लक्ष्मी अपने साकार रूप में बाहर निकल रही है।

श्लोक 2 (12.232.2)

तां दृष्ट्वा प्रभया दीप्तां भगवान्पाकशासनः । विस्मयोत्फुल्लनयनो बलिं पप्रच्छ वासवः ॥

tāṃ dṛṣṭvā prabhayā dīptāṃ bhagavānpākaśāsanaḥ | vismayotphullanayano baliṃ papraccha vāsavaḥ

उसे तेज से दमकती देखकर पाक का संहार करने वाले भगवान् वासव (इन्द्र) ने विस्मय से खिले नेत्रों के साथ बलि से पूछा।

शक्र उवाच

श्लोक 3 (12.232.3)

बले केयमपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी । त्वत्तः स्थिता सकेयूरा दीप्यमाना स्वतेजसा ॥

bale keyamapakrāntā rocamānā śikhaṇḍinī | tvattaḥ sthitā sakeyūrā dīpyamānā svatejasā

बलि, यह कौन है जो चोटी बाँधे, बाजूबन्द पहने, अपने ही तेज से जगमगाती हुई तुमसे निकलकर खड़ी है?

बलिरुवाच

श्लोक 4 (12.232.4)

न हीमामासुरीं वेद्मि न दैवीं च न मानुषीम् । त्वमेनां पृच्छ वा मा वा यथेष्टं कुरु वासव ॥

na hīmāmāsurīṃ vedmi na daivīṃ ca na mānuṣīm | tvamenāṃ pṛccha vā mā vā yatheṣṭaṃ kuru vāsava

मैं इसे न असुर-कन्या जानता हूँ, न देवी और न मानवी। हे वासव, चाहो तो इसी से पूछ लो, चाहो तो न पूछो; जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करो।

शक्र उवाच

श्लोक 5 (12.232.5)

का त्वं बलेरपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी । अजानतो ममाचक्ष्व नामधेयं शुचिस्मिते ॥

kā tvaṃ balerapakrāntā rocamānā śikhaṇḍinī | ajānato mamācakṣva nāmadheyaṃ śucismite

तुम कौन हो जो चोटी बाँधे, दमकती हुई बलि को छोड़कर आई हो? हे शुचिस्मिते, मैं नहीं जानता, इसलिए मुझे अपना नाम बताओ।

श्लोक 6 (12.232.6)

का त्वं तिष्ठसि मामेवं दीप्यमाना स्वतेजसा । हित्वा दैत्यवरं सुभ्रु तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥

kā tvaṃ tiṣṭhasi māmevaṃ dīpyamānā svatejasā | hitvā daityavaraṃ subhru tanmamācakṣva pṛcchataḥ

हे सुभ्रू, दैत्यों के अग्रणी को छोड़कर तुम कौन हो जो इस प्रकार अपने तेज से दमकती हुई मेरे सामने खड़ी हो? मैं पूछता हूँ, मुझे यह बताओ।

श्रीरुवाच

श्लोक 7 (12.232.7)

न मां विरोचनो वेद नायं वैरोचनो बलिः । आहुर्मां दुःसहेत्येवं विधित्सेति च मां विदुः ॥

na māṃ virocano veda nāyaṃ vairocano baliḥ | āhurmāṃ duḥsahetyevaṃ vidhitseti ca māṃ viduḥ

न विरोचन ने मुझे जाना, न विरोचन के पुत्र इस बलि ने। लोग मुझे दुःसहा कहते हैं और विधित्सा के नाम से जानते हैं।

श्लोक 8 (12.232.8)

भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येव च वासव । त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ॥

bhūtirlakṣmīti māmāhuḥ śrīrityeva ca vāsava | tvaṃ māṃ śakra na jānīṣe sarve devā na māṃ viduḥ

हे वासव, मुझे भूति और लक्ष्मी कहते हैं, और श्री भी। हे शक्र, तुम मुझे नहीं जानते; कोई भी देवता मुझे नहीं जानता।

शक्र उवाच

श्लोक 9 (12.232.9)

किमिदं त्वं मम कृते उताहो बलिनः कृते । दुःसहे विजहास्येनं चिरसंवासिनी सती ॥

kimidaṃ tvaṃ mama kṛte utāho balinaḥ kṛte | duḥsahe vijahāsyenaṃ cirasaṃvāsinī satī

यह क्या है? क्या यह मेरे लिए है या बलि के लिए? हे दुःसहे, तुम तो इसके साथ बहुत समय से रह रही हो और सती भी हो, फिर इसे क्यों छोड़ रही हो?

श्रीरुवाच

श्लोक 10 (12.232.10)

नो धाता न विधाता मां विदधाति कथंचन । कालस्तु शक्र पर्यागान्मैवं शक्रावमन्यथाः ॥

no dhātā na vidhātā māṃ vidadhāti kathaṃcana | kālastu śakra paryāgānmaivaṃ śakrāvamanyathāḥ

न धाता और न विधाता किसी प्रकार मुझे कहीं स्थापित करता है। हे शक्र, यह तो काल का फेर है; इसलिए हे शक्र, मेरा इस प्रकार अनादर मत करो।

शक्र उवाच

श्लोक 11 (12.232.11)

कथं त्वया बलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि । कथं च मां न जह्यास्त्वं तन्मे ब्रूहि शुचिस्मिते ॥

kathaṃ tvayā balistyaktaḥ kimarthaṃ vā śikhaṇḍini | kathaṃ ca māṃ na jahyāstvaṃ tanme brūhi śucismite

हे शिखण्डिनि, तुमने बलि को कैसे और क्यों छोड़ा? और तुम मुझे कैसे नहीं छोड़ोगी? हे शुचिस्मिते, यह मुझे बताओ।

श्रीरुवाच

श्लोक 12 (12.232.12)

सत्ये स्थिताऽस्मि दाने च व्रते तपसि चैव हि । पराक्रमे च धर्मे च पराचीनस्ततो बलिः ॥

satye sthitā'smi dāne ca vrate tapasi caiva hi | parākrame ca dharme ca parācīnastato baliḥ

मैं सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम और धर्म में ठहरती हूँ। बलि इन सबसे विमुख हो गया है।

श्लोक 13 (12.232.13)

ब्रह्मण्योऽयं पुरा भूत्वा सत्यवादी जितेन्द्रियः । अभ्यसूयन्ब्राह्मणान्वै उच्छिष्टश्चास्पृशद्धृतम् ॥

brahmaṇyo'yaṃ purā bhūtvā satyavādī jitendriyaḥ | abhyasūyanbrāhmaṇānvai ucchiṣṭaścāspṛśaddhṛtam

यह पहले ब्राह्मणों का भक्त, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था; पर अब यह ब्राह्मणों से द्वेष करने लगा है, और जूठन खाकर अशुद्ध होते हुए भी घी को छू लेता है।

श्लोक 14 (12.232.14)

यज्ञशीलः सदा भूत्वा मामेव यजते स्वयम् । ततः प्रहाय मूढात्मा कालेनोपनिपीडितः ॥

yajñaśīlaḥ sadā bhūtvā māmeva yajate svayam | tataḥ prahāya mūḍhātmā kālenopanipīḍitaḥ

यज्ञ में सदा लगा रहकर वह स्वयं मेरा ही यजन करता था; फिर काल से पीड़ित होकर उस मूढ़ बुद्धि ने उसे छोड़ दिया।

श्लोक 15 (12.232.15)

अपक्रान्ता ततः शक्र त्वयि वत्स्यामि वासव । अप्रमत्तेन धार्याऽस्मि तपसा विक्रमेण च ॥

apakrāntā tataḥ śakra tvayi vatsyāmi vāsava | apramattena dhāryā'smi tapasā vikrameṇa ca

इसीलिए हे शक्र, मैं चली आई हूँ और हे वासव, तुम्हारे भीतर रहूँगी। पर मुझे वही धारण कर सकता है जो सावधान रहकर तप और पराक्रम के साथ चले।

शक्र उवाच

श्लोक 16 (12.232.16)

कोऽस्ति देवमनुष्येषु सर्वभूतेषु वा पुमान् । यस्त्वामेको विषहितुं शक्नुयात्कमलालये ॥

ko'sti devamanuṣyeṣu sarvabhūteṣu vā pumān | yastvāmeko viṣahituṃ śaknuyātkamalālaye

हे कमलवासिनि, देवताओं, मनुष्यों और समस्त प्राणियों में ऐसा कौन पुरुष है जो अकेला तुम्हें सह सके?

श्रीरुवाच

श्लोक 17 (12.232.17)

नैव देवो न गन्धर्वो नासुरो न च राक्षसः । यो मामेको विषहितुं शक्तः कश्चित्पुरंदर ॥

naiva devo na gandharvo nāsuro na ca rākṣasaḥ | yo māmeko viṣahituṃ śaktaḥ kaścitpuraṃdara

हे पुरन्दर, न कोई देवता, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस ही अकेला मुझे सह सकता है।

शक्र उवाच

श्लोक 18 (12.232.18)

तिष्ठेथा मयि नित्यं त्वं यथा तद्ब्रूहि मे शुभे । तत्करिष्यामि ते वाक्यमृतं तद्वक्तुमर्हसि ॥

tiṣṭhethā mayi nityaṃ tvaṃ yathā tadbrūhi me śubhe | tatkariṣyāmi te vākyamṛtaṃ tadvaktumarhasi

हे शुभे, मुझे बताओ कि तुम मेरे पास सदा कैसे रह सकती हो; मैं तुम्हारा कहा करूँगा। तुम्हें वह सच-सच बताना चाहिए।

श्रीरुवाच

श्लोक 19 (12.232.19)

स्थास्यामि नित्यं देवेन्द्र यथा त्वयि निबोध तत् । विधिना वेददृष्टेन चतुर्धा विभजस्व माम् ॥

sthāsyāmi nityaṃ devendra yathā tvayi nibodha tat | vidhinā vedadṛṣṭena caturdhā vibhajasva mām

हे देवेन्द्र, मैं तुम्हारे पास सदा रहूँगी; वह कैसे, सुनो। वेद में बताई विधि से मुझे चार भागों में बाँट दो।

शक्र उवाच

श्लोक 20 (12.232.20)

अहं वै त्वां निधास्यामि यथाशक्ति यथाबलम् । न तु मेऽतिक्रमः स्याद्वै सदा लक्ष्मि तवान्तिके ॥

ahaṃ vai tvāṃ nidhāsyāmi yathāśakti yathābalam | na tu me'tikramaḥ syādvai sadā lakṣmi tavāntike

मैं अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार तुम्हें स्थापित करूँगा; और हे लक्ष्मी, तुम्हारे समीप रहते मुझसे कभी कोई चूक न हो।

श्लोक 21 (12.232.21)

भूमिरेव मनुष्येषु धारिणी भूतभाविनी । सा ते पादं तितिक्षेत समर्था हीति मे मतिः ॥

bhūmireva manuṣyeṣu dhāriṇī bhūtabhāvinī | sā te pādaṃ titikṣeta samarthā hīti me matiḥ

मनुष्यों में पृथ्वी ही सबको धारण करने और जीवों को पालने वाली है। वह तुम्हारा एक चरण सह सकती है; मेरा विचार है कि वह समर्थ है।

श्रीरुवाच

श्लोक 22 (12.232.22)

एष मे निहितः पादो योऽयं भूमौ प्रतिष्ठितः । द्वितीयं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ॥

eṣa me nihitaḥ pādo yo'yaṃ bhūmau pratiṣṭhitaḥ | dvitīyaṃ śakra pādaṃ me tasmātsunihitaṃ kuru

मेरा यह चरण, जो पृथ्वी पर टिका है, भली-भाँति स्थापित हो गया। इसलिए हे शक्र, मेरा दूसरा चरण भी स्थापित करो।

शक्र उवाच

श्लोक 23 (12.232.23)

आप एव मनुष्येषु द्रवन्त्यः परिधारणे । तास्ते पादं तितिक्षन्तामलमापस्तितिक्षितुम् ॥

āpa eva manuṣyeṣu dravantyaḥ paridhāraṇe | tāste pādaṃ titikṣantāmalamāpastitikṣitum

मनुष्यों में जल ही बहते हुए सबको धारण करता है। वह तुम्हारा एक चरण सहे; जल उसे सहने में पूर्ण समर्थ है।

श्रीरुवाच

श्लोक 24 (12.232.24)

एष मे निहितः पादो योऽयमप्सु प्रतिष्ठितः । तृतीयं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ॥

eṣa me nihitaḥ pādo yo'yamapsu pratiṣṭhitaḥ | tṛtīyaṃ śakra pādaṃ me tasmātsunihitaṃ kuru

मेरा यह चरण, जो जल में टिका है, भली-भाँति स्थापित हो गया। इसलिए हे शक्र, मेरा तीसरा चरण स्थापित करो।

शक्र उवाच

श्लोक 25 (12.232.25)

यस्मिन्वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मिन्देवाः प्रतिष्ठिताः । तृतीयं पादमग्निस्ते सुधृतं धारयिष्यति ॥

yasminvedāśca yajñāśca yasmindevāḥ pratiṣṭhitāḥ | tṛtīyaṃ pādamagniste sudhṛtaṃ dhārayiṣyati

जिसमें वेद, यज्ञ और देवता प्रतिष्ठित हैं, वह अग्नि तुम्हारे तीसरे चरण को भली-भाँति धारण करेगा।

श्रीरुवाच

श्लोक 26 (12.232.26)

एष मे निहितः पादो योऽयमग्नौ प्रतिष्ठितः । चतुर्थं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ॥

eṣa me nihitaḥ pādo yo'yamagnau pratiṣṭhitaḥ | caturthaṃ śakra pādaṃ me tasmātsunihitaṃ kuru

मेरा यह चरण, जो अग्नि में टिका है, भली-भाँति स्थापित हो गया। इसलिए हे शक्र, मेरा चौथा चरण स्थापित करो।

शक्र उवाच

श्लोक 27 (12.232.27)

ये वै सन्तो मनुष्येषु ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः । तेते पादं तितिक्षन्तामलं सन्तस्तितिक्षितुम् ॥

ye vai santo manuṣyeṣu brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ | tete pādaṃ titikṣantāmalaṃ santastitikṣitum

मनुष्यों में जो सज्जन ब्राह्मणों के भक्त और सत्यवादी हैं, वे तुम्हारा चरण सहें; सज्जन उसे सहने में पूर्ण समर्थ हैं।

श्रीरुवाच

श्लोक 28 (12.232.28)

एष मे निहितः पादो योऽयं सत्सु प्रतिष्ठितः । एवं हि निहितां शक्र भूतेषु परिधत्स्व माम् ॥

eṣa me nihitaḥ pādo yo'yaṃ satsu pratiṣṭhitaḥ | evaṃ hi nihitāṃ śakra bhūteṣu paridhatsva mām

मेरा यह चरण, जो सज्जनों में टिका है, भली-भाँति स्थापित हो गया। हे शक्र, इस प्रकार प्राणियों में बाँटी हुई मुझे तुम अपना लो।

शक्र उवाच

श्लोक 29 (12.232.29)

भूमिशुद्धिं ततः कृत्वा अद्भिः संतर्पयन्ति ये । भूतानि च यजन्त्यग्नौ तेषां त्वमनपायिनी ॥

bhūmiśuddhiṃ tataḥ kṛtvā adbhiḥ saṃtarpayanti ye | bhūtāni ca yajantyagnau teṣāṃ tvamanapāyinī

जो लोग भूमि को शुद्ध करके जल से तर्पण करते हैं और प्राणियों के लिए तथा अग्नि में यजन करते हैं, उनके पास तुम कभी न छोड़ने वाली होकर रहो।

श्लोक 30 (12.232.30)

ये क्रियाभिः सुरक्ताभिर्हेतुयुक्ताः समाहिताः । ज्ञानवन्तो विवत्सायां लब्धा माद्यन्ति योगिनः ॥

ye kriyābhiḥ suraktābhirhetuyuktāḥ samāhitāḥ | jñānavanto vivatsāyāṃ labdhā mādyanti yoginaḥ

और जो योगी प्रिय कर्मों में लगे रहते हैं, तर्कयुक्त, एकाग्र और ज्ञानी हैं, वे अपने साथ तुम्हारे निवास की इच्छा करते हुए तुम्हें पाकर आनन्दित होते हैं।

श्लोक 31 (12.232.31)

भूतानामिह यो वै त्वां मया विनिहितां सतीम् । उपहन्यात्स मे द्वेष्यस्तथा शृण्वन्तु मे वचः ॥

bhūtānāmiha yo vai tvāṃ mayā vinihitāṃ satīm | upahanyātsa me dveṣyastathā śṛṇvantu me vacaḥ

प्राणियों में जो भी यहाँ मेरे द्वारा इस प्रकार स्थापित की गई तुम्हें हानि पहुँचाएगा, वह मेरा द्वेष्य होगा। सब लोग मेरी यह बात सुन लें।

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (12.232.32)

तथेति चोक्त्वा सा भ्रष्टा सर्वलोकनमस्कृता । वासवं पालयामास सा देवी कमलालया ॥

tatheti coktvā sā bhraṣṭā sarvalokanamaskṛtā | vāsavaṃ pālayāmāsa sā devī kamalālayā

"ऐसा ही हो" कहकर सब लोकों से वन्दित वह कमलवासिनी देवी (बलि से) चली आई और वासव की रक्षा करने लगी।

श्लोक 33 (12.232.33)

ततस्त्यक्तः श्रिया राजा दैत्यानां बलिरब्रवीत् ॥

tatastyaktaḥ śriyā rājā daityānāṃ balirabravīt

तब श्री से त्यागे गए दैत्यराज बलि ने कहा:

बलिरुवाच

श्लोक 34 (12.232.34)

यावत्पुरस्तात्प्रतपेत्तावद्वै दक्षिणां दिशम् । पश्चिमां तावदेवापि तथोदीचीं दिवाकरः ॥

yāvatpurastātpratapettāvadvai dakṣiṇāṃ diśam | paścimāṃ tāvadevāpi tathodīcīṃ divākaraḥ

सूर्य जितनी दूर पूर्व में तपता है, उतनी ही दूर दक्षिण दिशा में भी तपता है; इसी प्रकार पश्चिम और उत्तर में भी।

श्लोक 35 (12.232.35)

तथा मध्यंदिने सूर्यो नास्तमेति यदा तदा । पुनर्देवासुरं युद्धं भावि जेताऽस्मि वस्तदा ॥

tathā madhyaṃdine sūryo nāstameti yadā tadā | punardevāsuraṃ yuddhaṃ bhāvi jetā'smi vastadā

और जब दोपहर में सूर्य अस्त नहीं होगा, तब फिर देवासुर-युद्ध होगा और उस समय मैं तुम्हें जीतने वाला होऊँगा।

श्लोक 36 (12.232.36)

सर्वलोकान्यदाऽऽदित्यो मध्यस्थस्तापयिष्यति । तदा देवासुरे युद्धे जेताऽहं त्वां शतक्रतो ॥

sarvalokānyadā''dityo madhyasthastāpayiṣyati | tadā devāsure yuddhe jetā'haṃ tvāṃ śatakrato

जब सूर्य बीच में खड़ा होकर सब लोकों को तपाएगा, तब हे शतक्रतु, देवासुर-युद्ध में मैं तुम्हें जीत लूँगा।

शक्र उवाच

श्लोक 37 (12.232.37)

ब्रह्मणाऽस्मि समादिष्टो न हन्तव्यो भवानिति । तेन तेऽहं बले वज्रं न विमुञ्जामि मूर्धनि ॥

brahmaṇā'smi samādiṣṭo na hantavyo bhavāniti | tena te'haṃ bale vajraṃ na vimuñjāmi mūrdhani

ब्रह्मा ने मुझे आदेश दिया है कि "तुम्हें मारना नहीं है"। इसीलिए हे बलि, मैं तुम्हारे सिर पर वज्र नहीं छोड़ता।

श्लोक 38 (12.232.38)

यथेष्टं गच्छ दैत्येन्द्र स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ॥

yatheṣṭaṃ gaccha daityendra svasti te'stu mahāsura

हे दैत्येन्द्र, जहाँ चाहो जाओ; हे महासुर, तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 39 (12.232.39)

आदित्यो नैव तपिता कदाचिन्मध्यतः स्थितः । स्थापितो ह्यस्य समयः पूर्वमेव स्वयंभुवा ॥

ādityo naiva tapitā kadācinmadhyataḥ sthitaḥ | sthāpito hyasya samayaḥ pūrvameva svayaṃbhuvā

सूर्य कभी बीच में ठहरकर नहीं तपेगा; उसका नियम स्वयम्भू ने पहले ही स्थापित कर दिया है।

श्लोक 40 (12.232.40)

अजस्रं परियात्येष सत्येनावतपन्प्रजाः । अयनं तस्य षण्मासा उत्तरं दक्षिणं तथा । येन संयाति लोकेषु शीतोष्णे विसृजन्रविः ॥

ajasraṃ pariyātyeṣa satyenāvatapanprajāḥ | ayanaṃ tasya ṣaṇmāsā uttaraṃ dakṣiṇaṃ tathā | yena saṃyāti lokeṣu śītoṣṇe visṛjanraviḥ

वह निरन्तर चलता रहता है और अपने अटल सत्य-नियम से प्रजा को तपाता है। उत्तर और दक्षिण, उसके दो अयन छह-छह महीने के हैं, जिनसे सूर्य शीत और ताप को बरसाता हुआ लोकों में विचरता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 41 (12.232.41)

एवमुक्तस्तु दैत्येन्द्रो बलिरिन्द्रेण भारत । जगाम दक्षिणामाशामुदीचीं तु पुरंदरः ॥

evamuktastu daityendro balirindreṇa bhārata | jagāma dakṣiṇāmāśāmudīcīṃ tu puraṃdaraḥ

हे भारत, इन्द्र के इस प्रकार कहने पर दैत्येन्द्र बलि दक्षिण दिशा की ओर चला गया और पुरन्दर उत्तर दिशा की ओर।

श्लोक 42 (12.232.42)

इत्येतद्बलिना गीतमनहंकारसंज्ञितम् । वाक्यं श्रुत्वा सहस्राक्षः स्वमेवारुरुहे तदा ॥

ityetadbalinā gītamanahaṃkārasaṃjñitam | vākyaṃ śrutvā sahasrākṣaḥ svamevāruruhe tadā

इस प्रकार बलि ने "अहंकार-त्याग" नाम का यह उपदेश गाया। उसकी बात सुनकर सहस्राक्ष इन्द्र तब अपने ही धाम को चले गए।

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