शान्ति पर्व · अध्याय 233
नमुचि का इन्द्र को शोक न करने का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि विपत्ति में डूबे मनुष्य के लिए क्या श्रेयस्कर है। भीष्म इन्द्र और पराजित असुर नमुचि का संवाद सुनाते हैं, जो बँधा और श्री से हीन होकर भी अविचल बैठा है। नमुचि कहता है कि शोक से शरीर ही क्षीण होता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं, सब कुछ उसी एक शासक के विधान के अनुसार होता है, और ज्ञानी लाभ-हानि में स्थिर रहता है तथा जो पाया नहीं जा सकता उसके लिए विलाप नहीं करता।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.233.1)
व्यसनेषु निमग्नस्य किं श्रेयस्तद्ब्रवीहि मे । भूय एव महाबाहो स्थित्यर्थं तं ब्रवीहि मे ॥
vyasaneṣu nimagnasya kiṃ śreyastadbravīhi me | bhūya eva mahābāho sthityarthaṃ taṃ bravīhi me
हे महाबाहो, जो विपत्तियों में डूबा हो, उसके लिए क्या श्रेयस्कर है? मुझे बताइए, और फिर भी वह उपाय बताइए जिससे वह स्थिर रह सके।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.233.2)
अत्रैवोदाहन्तीममितिहासं पुरातनम् । शतक्रतोश्च संवादं नमुचेश्च युधिष्ठिर ॥
atraivodāhantīmamitihāsaṃ purātanam | śatakratośca saṃvādaṃ namuceśca yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: शतक्रतु और नमुचि का संवाद।
श्लोक 3 (12.233.3)
श्रिया विहीनमासीनमक्षोभ्यमिव सागरम् । भवाभवज्ञं भूतानामित्युवाच पुरंदरः ॥
śriyā vihīnamāsīnamakṣobhyamiva sāgaram | bhavābhavajñaṃ bhūtānāmityuvāca puraṃdaraḥ
श्री से हीन होकर समुद्र की तरह अविचल बैठे हुए, प्राणियों के उत्पन्न होने और नष्ट होने को जानने वाले उस (नमुचि) से पुरन्दर ने कहा:
शक्र उवाच
श्लोक 4 (12.233.4)
बद्धः पाशैश्च्युतः स्थानाद्द्विपतां वशमागतः । श्रिया विहीनो नमुचे शोचस्याहो न शोचसि ॥
baddhaḥ pāśaiścyutaḥ sthānāddvipatāṃ vaśamāgataḥ | śriyā vihīno namuce śocasyāho na śocasi
हे नमुचि, तुम पाशों में बँधे हो, अपने स्थान से गिर चुके हो, शत्रुओं के वश में आ गए हो और श्री से हीन हो; क्या तुम शोक करते हो, या शोक नहीं करते?
नमुचिरुवाच
श्लोक 5 (12.233.5)
अनवाप्यं च शोकेन शरीरं चोपशुष्यति । अमित्राश्च प्रहृष्यन्ति शोके नास्ति सहायता । तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥
anavāpyaṃ ca śokena śarīraṃ copaśuṣyati | amitrāśca prahṛṣyanti śoke nāsti sahāyatā | tasmācchakra na śocāmi sarvaṃ hyevedamantavat
शोक से कुछ पाया नहीं जाता, शरीर सूखता है, शत्रु प्रसन्न होते हैं, और शोक में कोई सहायता भी नहीं है। इसलिए हे शक्र, मैं शोक नहीं करता, क्योंकि यह सब नाशवान् है।
श्लोक 6 (12.233.6)
संतापाद्भ्रश्यते रूपं संतापाद्भ्रश्यते श्रियः । संतापाद्भ्रश्यते चायुर्धर्मश्चैव सुरेश्वर ॥
saṃtāpādbhraśyate rūpaṃ saṃtāpādbhraśyate śriyaḥ | saṃtāpādbhraśyate cāyurdharmaścaiva sureśvara
हे सुरेश्वर, सन्ताप से रूप नष्ट होता है, सन्ताप से श्री नष्ट होती है, सन्ताप से आयु क्षीण होती है और धर्म भी।
श्लोक 7 (12.233.7)
विनीय खलु तद्दुःखमागतं वै मनस्सुखम् । ध्यातव्यं मनसा हृद्यं कल्याणं संविजानता ॥
vinīya khalu tadduḥkhamāgataṃ vai manassukham | dhyātavyaṃ manasā hṛdyaṃ kalyāṇaṃ saṃvijānatā
जो समझदार है, उसे आए हुए उस दुःख को दूर करके, मन के सुख को बनाए रखते हुए, मन में प्रिय और कल्याणकारी का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 8 (12.233.8)
यथायथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः । तथैवास्य प्रसिध्यन्ति सर्वार्था नात्र संशयः ॥
yathāyathā hi puruṣaḥ kalyāṇe kurute manaḥ | tathaivāsya prasidhyanti sarvārthā nātra saṃśayaḥ
मनुष्य जैसे-जैसे अपना मन कल्याण में लगाता है, वैसे-वैसे उसके सब प्रयोजन सिद्ध होते जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 9 (12.233.9)
एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता । गर्भे शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुयुक्तः प्रवणादिवोदकं । यथा नियुक्तोऽस्मि तथा भवामि ॥
ekaḥ śāstā na dvitīyo'sti śāstā | garbhe śayānaṃ puruṣaṃ śāsti śāstā | tenānuyuktaḥ pravaṇādivodakaṃ | yathā niyukto'smi tathā bhavāmi
शासक एक ही है, दूसरा कोई शासक नहीं। गर्भ में सोए हुए पुरुष को वही शासक आदेश देता है। उसी से प्रेरित होकर, ढलान की ओर बहते जल की तरह, जैसा मुझे नियुक्त किया गया है वैसा मैं बन जाता हूँ।
श्लोक 10 (12.233.10)
भावाभावावभिजानन्गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत्करोमि । आशासु हर्म्यासु हृदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥
bhāvābhāvāvabhijānangarīyo jānāmi śreyo na tu tatkaromi | āśāsu harmyāsu hṛdāsu kurvan yathā niyukto'smi tathā vahāmi
होने और न होने को भली-भाँति जानते हुए भी मैं श्रेयस्कर को जानता हूँ, पर उसे करता नहीं; आशाओं, महलों और सरोवरों में मन लगाए हुए मैं जैसा नियुक्त किया गया हूँ वैसा ही निर्वाह करता हूँ।
श्लोक 11 (12.233.11)
यथायथाऽस्य प्राप्तव्यं प्राप्नोत्येव तथातथा । भवितव्यं यथा यच्च भवत्येव तथातथा ॥
yathāyathā'sya prāptavyaṃ prāpnotyeva tathātathā | bhavitavyaṃ yathā yacca bhavatyeva tathātathā
जिस-जिस प्रकार जो कुछ मनुष्य को पाना है, वह उसी-उसी प्रकार उसे मिलता है; और जो जैसे होना है, वह वैसे ही होता है।
श्लोक 12 (12.233.12)
यत्रयत्रैव संयुक्तो धात्रा गर्भे पुनः पुनः । तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति ॥
yatrayatraiva saṃyukto dhātrā garbhe punaḥ punaḥ | tatratatraiva vasati na yatra svayamicchati
विधाता बार-बार जिस-जिस गर्भ में जीव को जोड़ता है, वह वहीं रहता है, जहाँ वह स्वयं चाहता है वहाँ नहीं।
श्लोक 13 (12.233.13)
भावो योऽयमनुप्राप्तो भवितव्यमिदं मम । इति यस्य सदा भावो न स शोचेत्कदाचन ॥
bhāvo yo'yamanuprāpto bhavitavyamidaṃ mama | iti yasya sadā bhāvo na sa śocetkadācana
"यह जो अवस्था मुझ पर आई है, इसे आना ही था" -- जिसकी ऐसी भावना सदा रहती है, वह कभी शोक नहीं करता।
श्लोक 14 (12.233.14)
पर्यायैर्हन्यमानानामभिषङ्गो न विद्यते । दुःखमेतत्तु यद्द्वेष्टा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
paryāyairhanyamānānāmabhiṣaṅgo na vidyate | duḥkhametattu yaddveṣṭā kartā'hamiti manyate
काल के फेरों से बारी-बारी से मारे जाने वालों के लिए आसक्ति या दोष का कोई कारण नहीं; दुःख तो यह है कि मनुष्य "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानकर द्वेष करता है।
श्लोक 15 (12.233.15)
ऋषींश्च देवांश्च महासुरांश्च त्रैविद्यवृद्धांश्च वने मुनींश्च । कान्नापदो नोपनमन्ति लोके परावरज्ञास्तु न संभ्रमन्ति ॥
ṛṣīṃśca devāṃśca mahāsurāṃśca traividyavṛddhāṃśca vane munīṃśca | kānnāpado nopanamanti loke parāvarajñāstu na saṃbhramanti
ऋषियों, देवताओं, महान् असुरों, तीनों वेदों में वृद्ध विद्वानों और वन के मुनियों में से किसके पास इस लोक में विपत्तियाँ नहीं आतीं? पर जो ऊँच-नीच को जानते हैं, वे घबराते नहीं।
श्लोक 16 (12.233.16)
न पण्डितः क्रुद्ध्यति नाभिषज्यते । न चापि संसीदति न प्रहृष्यति । न चार्थकृच्छ्रव्यसनेषु शोचते । स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ॥
na paṇḍitaḥ kruddhyati nābhiṣajyate | na cāpi saṃsīdati na prahṛṣyati | na cārthakṛcchravyasaneṣu śocate | sthitaḥ prakṛtyā himavānivācalaḥ
पण्डित न क्रोध करता है, न आसक्त होता है; न दुःखी होता है, न हर्षित। धन की हानि और संकट में वह शोक नहीं करता, अपने स्वभाव में हिमालय की तरह अचल रहता है।
श्लोक 17 (12.233.17)
यमर्थसिद्धिः परमा न हर्षये । त्तथैव काले व्यसनं न मोहयेत् । सुखं च दुःखं च तथैव मध्यमं । निषेवते यः स धुरधरो नरः ॥
yamarthasiddhiḥ paramā na harṣaye | ttathaiva kāle vyasanaṃ na mohayet | sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca tathaiva madhyamaṃ | niṣevate yaḥ sa dhuradharo naraḥ
जिसे बड़ी-से-बड़ी सफलता हर्षित नहीं करती, जिसे समय पर आई विपत्ति मोहित नहीं करती, और जो सुख, दुःख तथा उनके बीच की अवस्था को एक-सा अपनाता है, वही पुरुष धुरन्धर (भार उठाने वाला) है।
श्लोक 18 (12.233.18)
यांयामवस्थां पुरुषोऽधिगच्छे । त्तस्यां रमेतापरितप्यमानः । एवं प्रवृद्धं प्रणुदन्मनोजं । संतापनीलं सकलं शरीरात् ॥
yāṃyāmavasthāṃ puruṣo'dhigacche | ttasyāṃ rametāparitapyamānaḥ | evaṃ pravṛddhaṃ praṇudanmanojaṃ | saṃtāpanīlaṃ sakalaṃ śarīrāt
मनुष्य जिस-जिस अवस्था में पहुँचे, उसमें बिना सन्ताप के रमे। इस प्रकार वह अपने समूचे शरीर से मन में उपजे, बढ़ते हुए सन्ताप के अन्धकार को दूर कर दे।
श्लोक 19 (12.233.19)
न तत्सदः सत्परिषत्सभा च । सा प्राप्य यां न कुरुते सदा भयम् । धर्मतत्त्वमवगाह्य बुद्धिमा । न्योऽभ्युपैति स धुरंधरः पुमान् ॥
na tatsadaḥ satpariṣatsabhā ca | sā prāpya yāṃ na kurute sadā bhayam | dharmatattvamavagāhya buddhimā | nyo'bhyupaiti sa dhuraṃdharaḥ pumān
ऐसा कोई सदन, परिषद् या सभा नहीं जिसमें पहुँचकर वह सदा भय करे; जो बुद्धिमान् धर्म के तत्त्व में गहरे उतरकर आगे बढ़ता है, वही पुरुष धुरन्धर है।
श्लोक 20 (12.233.20)
प्राज्ञस्य कर्माणि दुरन्वयानि । न वै प्राज्ञो मुह्यति मोहकाले । स्थानाच्च्युतश्चेन्न मुमोह गौतम । स्तावत्कृच्छ्रामापदं प्राप्य वृद्धः ॥
prājñasya karmāṇi duranvayāni | na vai prājño muhyati mohakāle | sthānāccyutaścenna mumoha gautama | stāvatkṛcchrāmāpadaṃ prāpya vṛddhaḥ
ज्ञानी के कर्म समझना कठिन होता है, और मोह के समय भी ज्ञानी मोहित नहीं होता। गौतम अपने स्थान से गिर गए, तब भी वृद्धावस्था में ऐसी कठिन विपत्ति पाकर मोहित नहीं हुए।
श्लोक 21 (12.233.21)
न मन्त्रबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण च । न शीलेन न वृत्तेन तथा नैवार्थसंपदा । अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना ॥
na mantrabalavīryeṇa prajñayā pauruṣeṇa ca | na śīlena na vṛttena tathā naivārthasaṃpadā | alabhyaṃ labhate martyastatra kā paridevanā
मन्त्र, बल, वीरता, बुद्धि या पुरुषार्थ से, और न शील, आचरण या धन-सम्पत्ति से ही मनुष्य उसे पा सकता है जो उसके भाग्य में नहीं है; फिर उसमें विलाप कैसा?
श्लोक 22 (12.233.22)
यदेवमभिजातस्य धातारो विदधुः पुरा । तदेवानुभविष्यामि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥
yadevamabhijātasya dhātāro vidadhuḥ purā | tadevānubhaviṣyāmi kiṃ me mṛtyuḥ kariṣyati
मुझ जैसे जन्मे हुए के लिए विधाताओं ने पहले जो विधान किया है, उसे ही मैं भोगूँगा; मृत्यु मेरा क्या बिगाड़ेगी?
श्लोक 23 (12.233.23)
लब्धव्यान्येव लभते गन्तव्यान्येव गच्छति । प्राप्तव्यान्येव चाप्नोति दुःखानि च सुखानि च ॥
labdhavyānyeva labhate gantavyānyeva gacchati | prāptavyānyeva cāpnoti duḥkhāni ca sukhāni ca
मनुष्य वही पाता है जो उसे पाना है, वहीं जाता है जहाँ उसे जाना है, और दुःख तथा सुख वही प्राप्त करता है जो उसके लिए नियत हैं।
श्लोक 24 (12.233.24)
एतद्विदित्वा कार्त्स्न्येन यो न मुह्यति मानवः । कुशली सर्वदुःखेषु स वै सर्वधनी नरः ॥
etadviditvā kārtsnyena yo na muhyati mānavaḥ | kuśalī sarvaduḥkheṣu sa vai sarvadhanī naraḥ
जो मनुष्य इसे पूरी तरह जानकर मोहित नहीं होता, वह सब दुःखों में कुशल है; वही सचमुच सब कुछ के धन से सम्पन्न पुरुष है।