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शान्ति पर्व · अध्याय 234

बलि और इन्द्र: काल का शासन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि विपत्ति में डूबे मनुष्य के लिए क्या श्रेयस्कर है। भीष्म उत्तर देते हैं कि धैर्य ही श्रेयस्कर है, और बलि तथा इन्द्र का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। पर्वत की गुफा में पराजित दैत्यराज बलि से मिलकर इन्द्र उसे ताना देते हैं कि वह खोए हुए राज्य पर शोक क्यों नहीं करता। बलि कहता है कि स्वामियों को बनाने और गिराने वाला केवल काल है, असंख्य इन्द्र और राजा बीत चुके हैं, और शोक से कुछ नहीं मिलता। उसकी शान्ति से प्रभावित होकर इन्द्र उसे और कष्ट नहीं देते, उसके बन्धन खुलने की बात बताते हैं और ऋषियों से स्तुत होकर स्वर्ग लौट जाते हैं।

अध्याय 233अध्याय-सूचीअध्याय 235

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.234.1)

मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेयः पुरुषस्य हि । बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽथवा पुनः ॥

magnasya vyasane kṛcchre kiṃ śreyaḥ puruṣasya hi | bandhunāśe mahīpāla rājyanāśe'thavā punaḥ

हे पृथ्वीपाल! जो मनुष्य भारी विपत्ति में डूब गया हो, चाहे उसके बन्धु-बान्धव नष्ट हो गए हों या उसका राज्य छिन गया हो, उसके लिए क्या श्रेयस्कर है?

श्लोक 2 (12.234.2)

त्वं हि नः परमो वक्ता लोकेऽस्मिन्भरतर्षभ । एतद्भवन्तं पृच्छामि तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥

tvaṃ hi naḥ paramo vaktā loke'sminbharatarṣabha | etadbhavantaṃ pṛcchāmi tanme tvaṃ vaktumarhasi

हे भरतश्रेष्ठ! इस लोक में आप ही हमारे सबसे श्रेष्ठ वक्ता हैं। मैं आपसे यही पूछता हूँ; आप मुझे यह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.234.3)

पुत्रदारैः सुखैश्चैव वियुक्तस्य धनेन च । मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेयस्करी नृप । धैर्येण युक्तस्य सतः शरीरं न विशीर्यते ॥

putradāraiḥ sukhaiścaiva viyuktasya dhanena ca | magnasya vyasane kṛcchre dhṛtiḥ śreyaskarī nṛpa | dhairyeṇa yuktasya sataḥ śarīraṃ na viśīryate

हे राजन्! जो मनुष्य पुत्र, पत्नी, सुख और धन से बिछुड़कर भारी विपत्ति में डूब गया हो, उसके लिए धैर्य ही कल्याणकारी है। जो धैर्य से युक्त रहता है, उसका शरीर क्षीण नहीं होता।

श्लोक 4 (12.234.4)

विशोकता सुखं धत्ते धत्ते चारोग्यमुत्तमम् । आरोग्याच्च शरीरस्य स पुनर्विन्दते श्रियम् ॥

viśokatā sukhaṃ dhatte dhatte cārogyamuttamam | ārogyācca śarīrasya sa punarvindate śriyam

शोक से मुक्त रहना सुख देता है और उत्तम आरोग्य को बनाए रखता है; और शरीर के स्वस्थ होने से मनुष्य फिर लक्ष्मी को पा लेता है।

श्लोक 5 (12.234.5)

यश्च प्राज्ञो नरस्तात सात्विकीं वृत्तिमास्थितः । तस्यैश्वर्यं च धैर्यं च व्यवसायश्च कर्मसु ॥

yaśca prājño narastāta sātvikīṃ vṛttimāsthitaḥ | tasyaiśvaryaṃ ca dhairyaṃ ca vyavasāyaśca karmasu

हे तात! जो बुद्धिमान पुरुष सात्त्विक वृत्ति में स्थित रहता है, उसे ऐश्वर्य, धैर्य और कर्मों में दृढ़ निश्चय प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (12.234.6)

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बलिवासवसंवादं पुनरेव युधिष्ठिर ॥

atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | balivāsavasaṃvādaṃ punareva yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! इसी विषय में लोग बलि और वासव (इन्द्र) के संवाद का यह प्राचीन इतिहास फिर से सुनाते हैं।

श्लोक 7 (12.234.7)

वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्यदानवसंक्षये । विष्णुक्रान्तेषु लोकेषु देवराजे शतक्रतौ ॥

vṛtte devāsure yuddhe daityadānavasaṃkṣaye | viṣṇukrānteṣu lokeṣu devarāje śatakratau

जब देवताओं और असुरों का युद्ध समाप्त हो गया, दैत्यों और दानवों का संहार हो चुका, लोक विष्णु के पगों से नाप लिए गए और देवराज के पद पर शतक्रतु (इन्द्र) प्रतिष्ठित थे,

श्लोक 8 (12.234.8)

इज्यमानेषु देवेषु चातुर्वर्ण्ये व्यवस्थिते । समृध्यमाने त्रैलोक्ये प्रीतियुक्ते स्वयंभुवि ॥

ijyamāneṣu deveṣu cāturvarṇye vyavasthite | samṛdhyamāne trailokye prītiyukte svayaṃbhuvi

जब देवताओं का यज्ञों से पूजन हो रहा था, चारों वर्णों की व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी, तीनों लोक समृद्ध हो रहे थे और स्वयम्भू (ब्रह्मा) प्रसन्न थे,

श्लोक 9 (12.234.9)

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यामपि चर्षिभिः । गन्धर्वैर्भुजगेन्द्रैश्च सिद्धैश्चान्यैर्वृतः प्रभुः ॥

rudrairvasubhirādityairaśvibhyāmapi carṣibhiḥ | gandharvairbhujagendraiśca siddhaiścānyairvṛtaḥ prabhuḥ

तब रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, दोनों अश्विनीकुमारों और ऋषियों से, तथा गन्धर्वों, नागराजों, सिद्धों और अन्य गणों से घिरे हुए प्रभु इन्द्र ने

श्लोक 10 (12.234.10)

चतुर्दन्तं सुदान्तं च वारणेन्द्रं श्रिया वृतम् । आरुह्यैरावणं शक्रस्त्रैलोक्यमनुसंययौ ॥

caturdantaṃ sudāntaṃ ca vāraṇendraṃ śriyā vṛtam | āruhyairāvaṇaṃ śakrastrailokyamanusaṃyayau

चार दाँतों वाले, भली-भाँति सधे हुए, शोभा से सम्पन्न गजराज ऐरावण पर सवार होकर तीनों लोकों में भ्रमण किया।

श्लोक 11 (12.234.11)

स कदाचित्समुद्रान्ते कस्मिंश्चिद्गिरिगह्वरे । बलिं वैरोचनिं वज्री ददर्शोपससर्प च ॥

sa kadācitsamudrānte kasmiṃścidgirigahvare | baliṃ vairocaniṃ vajrī dadarśopasasarpa ca

एक बार समुद्र के किनारे किसी पर्वत की गुफा में वज्रधारी इन्द्र ने विरोचनपुत्र बलि को देखा और उसके पास गया।

श्लोक 12 (12.234.12)

तमैरावतमूर्धस्थं प्रेक्ष्य देवगणैर्वृतम् । सुरेन्द्रमिन्द्रं दैत्येन्द्रो न शुशोच न विव्यथे ॥

tamairāvatamūrdhasthaṃ prekṣya devagaṇairvṛtam | surendramindraṃ daityendro na śuśoca na vivyathe

ऐरावत के मस्तक पर बैठे, देवगणों से घिरे हुए देवेन्द्र इन्द्र को देखकर दैत्यराज बलि न शोक में पड़ा, न काँपा।

श्लोक 13 (12.234.13)

दृष्ट्वा तमविकारस्थं तिष्ठन्तं निर्भयं बलिम् । अधिरूढो द्विपश्रेष्ठमित्युवाच शतक्रतुः ॥

dṛṣṭvā tamavikārasthaṃ tiṣṭhantaṃ nirbhayaṃ balim | adhirūḍho dvipaśreṣṭhamityuvāca śatakratuḥ

बलि को विकारहीन और निर्भय खड़ा देखकर श्रेष्ठ हाथी पर बैठे शतक्रतु ने यह कहा —

इन्द्र उवाच

श्लोक 14 (12.234.14)

दैत्य न व्यथसे शौर्यादथवा वृद्धसेवया । तपसा भावितत्वाद्वा सर्वथैतत्सुदुष्करम् ॥

daitya na vyathase śauryādathavā vṛddhasevayā | tapasā bhāvitatvādvā sarvathaitatsuduṣkaram

"हे दैत्य! तुम व्याकुल नहीं हो रहे — चाहे यह शूरता के कारण हो, या वृद्धों की सेवा के कारण, या तप से परिपक्व होने के कारण। जो भी हो, यह अत्यन्त कठिन है।"

श्लोक 15 (12.234.15)

शत्रुभिर्वशमानीतो हीनः स्थानादनुत्तमात् । वैरोचने किमाश्रित्य शोचितव्ये न शोचसि ॥

śatrubhirvaśamānīto hīnaḥ sthānādanuttamāt | vairocane kimāśritya śocitavye na śocasi

"शत्रुओं के वश में पड़कर, सर्वोच्च पद से गिरकर, हे वैरोचन! शोक के योग्य अवस्था में भी तुम किसके भरोसे शोक नहीं करते?"

श्लोक 16 (12.234.16)

श्रैष्ठ्यं प्राप्य स्वजातीनां भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् । हृतस्वरत्नराज्यस्त्वं ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥

śraiṣṭhyaṃ prāpya svajātīnāṃ bhuktvā bhogānanuttamān | hṛtasvaratnarājyastvaṃ brūhi kasmānna śocasi

"तुम अपनी जाति में श्रेष्ठता पाकर सर्वोत्तम भोग भोग चुके हो; अब रत्न और राज्य छिन जाने पर भी बताओ, तुम शोक क्यों नहीं करते?"

श्लोक 17 (12.234.17)

ईश्वरो हि पुरा भूत्वा पितृपैतामहे पदे । तत्त्वमद्य हृतं दृष्ट्वा सपत्नैः किं न शोचसि ॥

īśvaro hi purā bhūtvā pitṛpaitāmahe pade | tattvamadya hṛtaṃ dṛṣṭvā sapatnaiḥ kiṃ na śocasi

"तुम पहले अपने पिता और पितामह के पद पर स्वामी थे। उसे अब शत्रुओं द्वारा छीना हुआ देखकर भी तुम शोक क्यों नहीं करते?"

श्लोक 18 (12.234.18)

बद्धश्च वारुणैः पाशैर्वज्रेण च समाहतः । हृतदारो हृतधनो ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥

baddhaśca vāruṇaiḥ pāśairvajreṇa ca samāhataḥ | hṛtadāro hṛtadhano brūhi kasmānna śocasi

"वरुण के पाशों से बँधे हुए, वज्र से आहत, पत्नी और धन से वंचित होकर भी बताओ, तुम शोक क्यों नहीं करते?"

श्लोक 19 (12.234.19)

नष्टश्रीर्विभवभ्रष्टो यन्न शोचसि दुष्करम् । त्रैलोक्यराज्यनाशे हि कोऽन्यो जीवितुमुत्सहेत् ॥

naṣṭaśrīrvibhavabhraṣṭo yanna śocasi duṣkaram | trailokyarājyanāśe hi ko'nyo jīvitumutsahet

"श्रीहीन और वैभव से भ्रष्ट होकर भी तुम शोक नहीं करते, यह बड़ा कठिन है। तीनों लोकों का राज्य नष्ट होने पर और कौन जीने का साहस कर सकता है?"

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (12.234.20)

एतच्चान्यच्च परुषं ब्रुवन्तं परिभूय तम् । श्रुत्वा दुःखमसंभ्रान्तो बलिर्वैरोचनोऽब्रवीत् ॥

etaccānyacca paruṣaṃ bruvantaṃ paribhūya tam | śrutvā duḥkhamasaṃbhrānto balirvairocano'bravīt

अपमान करते हुए इन्द्र के ये और ऐसे ही अन्य कठोर वचन सुनकर, दुःख से विचलित न होते हुए विरोचनपुत्र बलि ने उत्तर दिया।

बलिरुवाच

श्लोक 21 (12.234.21)

निगृहीते मयि भृशं शक्र किं कत्थितेन ते । वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरंदर ॥

nigṛhīte mayi bhṛśaṃ śakra kiṃ katthitena te | vajramudyamya tiṣṭhantaṃ paśyāmi tvāṃ puraṃdara

"हे शक्र! जब मुझे भली-भाँति दबोच लिया गया है, तब तुम्हारी इस डींग का क्या अर्थ? हे पुरंदर! मैं देख रहा हूँ कि तुम वज्र उठाए खड़े हो।"

श्लोक 22 (12.234.22)

अशक्तः पूर्वमासीस्त्वं कथंचिच्छक्ततां गतः । कस्त्वदन्य इमां वाचं सुक्रूरां वक्तुमर्हति ॥

aśaktaḥ pūrvamāsīstvaṃ kathaṃcicchaktatāṃ gataḥ | kastvadanya imāṃ vācaṃ sukrūrāṃ vaktumarhati

"तुम पहले असमर्थ थे और किसी प्रकार समर्थ हो गए हो। तुम्हारे सिवा और कौन ऐसी अत्यन्त क्रूर बातें कहने योग्य होगा?"

श्लोक 23 (12.234.23)

यस्तु शत्रोर्वशस्थस्य शक्तोऽपि कुरुते दयाम् । हस्तप्राप्तस्य वीरस्य तं चैव पुरुषं विदुः ॥

yastu śatrorvaśasthasya śakto'pi kurute dayām | hastaprāptasya vīrasya taṃ caiva puruṣaṃ viduḥ

"किन्तु जो समर्थ होकर भी शत्रु के अपने वश में आ जाने पर, हाथ में आए हुए उस शत्रु पर दया करता है, उसी वीर को लोग सच्चा पुरुष मानते हैं।"

श्लोक 24 (12.234.24)

अनिश्चयो हि युद्धेषु द्वयोर्विवदमानयोः । एकः प्राप्नोति विजयमेकश्चैव पराजयम् ॥

aniścayo hi yuddheṣu dvayorvivadamānayoḥ | ekaḥ prāpnoti vijayamekaścaiva parājayam

"युद्धों में दो लड़ने वालों के लिए कुछ निश्चित नहीं होता; एक को विजय मिलती है और दूसरे को पराजय।"

श्लोक 25 (12.234.25)

मा च ते भूत्स्वभावोऽयं मयि दानवपुङ्गवे । ईश्वरः सर्वभूतानां विक्रमेण जितो बलात् ॥

mā ca te bhūtsvabhāvo'yaṃ mayi dānavapuṅgave | īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ vikrameṇa jito balāt

"दानवों में श्रेष्ठ मेरे प्रति तुम्हारा यह भाव न रहे कि सब प्राणियों का स्वामी बल और पराक्रम से जीत लिया गया।"

श्लोक 26 (12.234.26)

नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र कृतं त्वया । यत्त्वमेवं गतो वज्रिन्यद्वाऽऽप्येवं गता वयम् ॥

naitadasmatkṛtaṃ śakra naitacchakra kṛtaṃ tvayā | yattvamevaṃ gato vajrinyadvā''pyevaṃ gatā vayam

"हे शक्र! हे वज्रधारी! तुम जिस दशा में हो और हम जिस दशा में हैं, यह न हमारा किया हुआ है, न तुम्हारा।"

श्लोक 27 (12.234.27)

अहमासं यथाऽद्य त्वं भविता त्वं यथा वयम् । मावमंस्था मया कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत ॥

ahamāsaṃ yathā'dya tvaṃ bhavitā tvaṃ yathā vayam | māvamaṃsthā mayā karma duṣkṛtaṃ kṛtamityuta

"मैं कभी वैसा था जैसे तुम आज हो, और तुम वैसे हो जाओगे जैसे हम हैं। यह सोचकर मेरा अपमान मत करो कि मैंने कोई दुष्कर्म किया था।"

श्लोक 28 (12.234.28)

सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणाधिगच्छति । पर्यायेणासि शक्रत्वं प्राप्तः शक्र न कर्मणा ॥

sukhaduḥkhe hi puruṣaḥ paryāyeṇādhigacchati | paryāyeṇāsi śakratvaṃ prāptaḥ śakra na karmaṇā

"मनुष्य सुख और दुःख को बारी-बारी से पाता है। हे शक्र! तुमने इन्द्रपद भी बारी से पाया है, कर्म से नहीं।"

श्लोक 29 (12.234.29)

कालः काले नयति मां त्वां च कालो नयत्ययम् । तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वयम् ॥

kālaḥ kāle nayati māṃ tvāṃ ca kālo nayatyayam | tenāhaṃ tvaṃ yathā nādya tvaṃ cāpi na yathā vayam

"काल अपने समय पर मुझे आगे ले जाता है, और यही काल तुम्हें भी ले जाता है। इसीलिए आज मैं वैसा नहीं हूँ जैसे तुम हो, और तुम वैसे नहीं हो जैसे हम हैं।"

श्लोक 30 (12.234.30)

न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् । नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ॥

na mātṛpitṛśuśrūṣā na ca daivatapūjanam | nānyo guṇasamācāraḥ puruṣasya sukhāvahaḥ

"न माता-पिता की सेवा, न देवताओं की पूजा, और न कोई अन्य सद्गुण या सदाचार मनुष्य को सुख देता है।"

श्लोक 31 (12.234.31)

न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः । शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ॥

na vidyā na tapo dānaṃ na mitrāṇi na bāndhavāḥ | śaknuvanti paritrātuṃ naraṃ kālena pīḍitam

"काल से पीड़ित मनुष्य की रक्षा न विद्या कर सकती है, न तप, न दान, न मित्र और न बन्धु-बान्धव।"

श्लोक 32 (12.234.32)

नागामिनमनर्थं हि प्रतिघातशतैरपि । शक्नुवन्ति प्रतिव्योढुमृते बुद्धिबलान्नराः ॥

nāgāminamanarthaṃ hi pratighātaśatairapi | śaknuvanti prativyoḍhumṛte buddhibalānnarāḥ

"आने वाली विपत्ति को मनुष्य सैकड़ों उपायों से भी नहीं रोक सकते, केवल बुद्धि के बल से ही कुछ कर सकते हैं।"

श्लोक 33 (12.234.33)

पर्यायैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते । इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताऽहमिति मन्यसे ॥

paryāyairhanyamānānāṃ paritrātā na vidyate | idaṃ tu duḥkhaṃ yacchakra kartā'hamiti manyase

"जो पर्यायों (काल के चक्र) से मारे जा रहे हैं, उनका कोई रक्षक नहीं। हे शक्र! दुःख तो यह है कि तुम यह मानते हो कि 'मैं कर्ता हूँ'।"

श्लोक 34 (12.234.34)

यदि कर्ता भवेत्कर्ता न क्रियेत कदाचन । यस्मात्तु क्रियते कर्ता तस्मात्कर्ताऽप्यनीश्वरः ॥

yadi kartā bhavetkartā na kriyeta kadācana | yasmāttu kriyate kartā tasmātkartā'pyanīśvaraḥ

"यदि कर्ता सचमुच कर्ता होता, तो वह कभी स्वयं किया न जाता; पर क्योंकि कर्ता भी किया जाता है, इसलिए कर्ता भी स्वामी नहीं है।"

श्लोक 35 (12.234.35)

कालेन त्वाऽहमजयं कालेनाहं जितस्त्वया । गन्ता गतिमतां कालः कालः कलयति प्रजाः ॥

kālena tvā'hamajayaṃ kālenāhaṃ jitastvayā | gantā gatimatāṃ kālaḥ kālaḥ kalayati prajāḥ

"काल से ही मैंने तुम्हें जीता था और काल से ही तुमने मुझे जीता। चलने वालों का चालक काल है; काल ही सब प्राणियों को आगे हाँकता है।"

श्लोक 36 (12.234.36)

इन्द्र प्राकृतया बुद्ध्या प्रलपन्नावबुद्ध्यसे । केचित्त्वां बहुमन्यन्ते श्रैष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ॥

indra prākṛtayā buddhyā pralapannāvabuddhyase | kecittvāṃ bahumanyante śraiṣṭhyaṃ prāptaṃ svakarmaṇā

"हे इन्द्र! तुम साधारण बुद्धि से बड़बड़ाते हो और समझते नहीं। कुछ लोग तुम्हें बड़ा मानते हैं, यह समझकर कि तुमने अपने कर्म से श्रेष्ठता पाई।"

श्लोक 37 (12.234.37)

कथमस्मद्विधो नाम जानँल्लोकप्रवृत्तयः । कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद्वाऽप्यथविभ्रमेत् ॥

kathamasmadvidho nāma jānam̐llokapravṛttayaḥ | kālenābhyāhataḥ śocenmuhyedvā'pyathavibhramet

"मुझ जैसा संसार की गति को जानने वाला पुरुष काल से आहत होकर कैसे शोक करे, मोह में पड़े या बुद्धि खो बैठे?"

श्लोक 38 (12.234.38)

कथं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा । बुद्धिर्व्यसनमासाद्य भिन्ना नौरिव सीदति ॥

kathaṃ kālaparītasya mama vā madvidhasya vā | buddhirvyasanamāsādya bhinnā nauriva sīdati

"काल से घिरे हुए मुझ जैसे किसी भी पुरुष की बुद्धि विपत्ति में पड़कर टूटी नाव की तरह कैसे डूबे?"

श्लोक 39 (12.234.39)

अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः । ते सर्वे शक्र यास्यन्ति मार्गमिन्द्रशतैर्गतम् ॥

ahaṃ ca tvaṃ ca ye cānye bhaviṣyanti surādhipāḥ | te sarve śakra yāsyanti mārgamindraśatairgatam

"मैं, तुम और जो अन्य देवाधिपति आगे होंगे, हे शक्र! वे सब उसी मार्ग पर जाएँगे जिस पर सैकड़ों इन्द्र जा चुके हैं।"

श्लोक 40 (12.234.40)

त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परया श्रिया । काले परिणते कालः कलयिष्यति मामिव ॥

tvāmapyevaṃ sudurdharṣaṃ jvalantaṃ parayā śriyā | kāle pariṇate kālaḥ kalayiṣyati māmiva

"तुम जैसे दुर्धर्ष और परम तेज से दमकते हुए को भी, समय पक जाने पर, काल वैसे ही पकड़ लेगा जैसे उसने मुझे पकड़ा है।"

श्लोक 41 (12.234.41)

बहूनीन्द्रसहस्राणि दैवतानां युगे युगे । अभ्यतीतानि कालेन कालो हि दुरतिक्रमः ॥

bahūnīndrasahasrāṇi daivatānāṃ yuge yuge | abhyatītāni kālena kālo hi duratikramaḥ

"युग-युग में देवताओं के हज़ारों इन्द्र काल के द्वारा बीत चुके हैं; क्योंकि काल का उल्लंघन करना बहुत कठिन है।"

श्लोक 42 (12.234.42)

इदं तु लब्ध्वा संस्थानमात्मानं बहु मन्यसे । सर्वभूतभवं देवं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥

idaṃ tu labdhvā saṃsthānamātmānaṃ bahu manyase | sarvabhūtabhavaṃ devaṃ brahmāṇamiva śāśvatam

"यह पद पाकर तुम अपने को बहुत बड़ा मानते हो, मानो तुम सब प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता सनातन देव ब्रह्मा हो।"

श्लोक 43 (12.234.43)

न चेदमचलं स्थानमनन्तं वाऽपि कस्यचित् । त्वं तु बालिशया बुद्ध्या ममेदमिति मन्यसे ॥

na cedamacalaṃ sthānamanantaṃ vā'pi kasyacit | tvaṃ tu bāliśayā buddhyā mamedamiti manyase

"पर यह पद किसी के लिए भी अचल या अनन्त नहीं है; फिर भी तुम बालबुद्धि से मानते हो कि 'यह मेरा है'।"

श्लोक 44 (12.234.44)

अविश्वस्ते विश्वसिषि मन्यसे वाऽध्रुवे ध्रुवम् । नित्यं कालपरीतात्मा भवत्येवं सुरेश्वर ॥

aviśvaste viśvasiṣi manyase vā'dhruve dhruvam | nityaṃ kālaparītātmā bhavatyevaṃ sureśvara

"तुम अविश्वसनीय पर विश्वास करते हो और अस्थिर को स्थिर मानते हो। हे देवेश्वर! जिसकी आत्मा सदा काल से घिरी रहती है, उसकी दशा ऐसी ही होती है।"

श्लोक 45 (12.234.45)

ममेयमिति मोहात्त्वं राजश्रियमभीप्ससि । नेयं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा मता ॥

mameyamiti mohāttvaṃ rājaśriyamabhīpsasi | neyaṃ tava na cāsmākaṃ na cānyeṣāṃ sthirā matā

"मोह के कारण तुम 'यह मेरी है' ऐसा मानकर राजलक्ष्मी की कामना करते हो। यह न तुम्हारी है, न हमारी, न किसी और की; इसे स्थिर नहीं माना गया है।"

श्लोक 46 (12.234.46)

अतिक्रम्य बहूनन्यांस्त्वयि तावदियं गता । कंचित्कालमियं स्थित्वा त्वयि वासव चञ्चला ॥

atikramya bahūnanyāṃstvayi tāvadiyaṃ gatā | kaṃcitkālamiyaṃ sthitvā tvayi vāsava cañcalā

"अनेक अन्य लोगों को छोड़कर यह तुम्हारे पास आई है; और हे वासव! कुछ समय तुम्हारे पास रहकर यह चंचल लक्ष्मी"

श्लोक 47 (12.234.47)

गौर्निवासमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति । सुरेशा ये ह्यतिक्रान्तास्तान्न संख्यातुमुत्सहे ॥

gaurnivāsamivotsṛjya punaranyaṃ gamiṣyati | sureśā ye hyatikrāntāstānna saṃkhyātumutsahe

"गाय जैसे अपना बाड़ा छोड़कर चली जाती है, वैसे ही तुम्हें छोड़कर किसी दूसरे के पास चली जाएगी। जो देवेश्वर पहले हो चुके हैं, उन्हें मैं गिन नहीं सकता।"

श्लोक 48 (12.234.48)

त्वत्तो बहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरंदर । सवृक्षौषधिगुल्मेयं ससरित्पर्वताकरा ॥

tvatto bahutarāścānye bhaviṣyanti puraṃdara | savṛkṣauṣadhigulmeyaṃ sasaritparvatākarā

"हे पुरंदर! तुमसे भी बहुत अधिक आगे होंगे। वृक्षों, औषधियों और झाड़ियों से भरी, नदियों, पर्वतों और खानों से युक्त इस पृथ्वी को"

श्लोक 49 (12.234.49)

तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेयं पुरा मही । पृथुरैलो मयो भीमो नरकः शम्बरस्तथा ॥

tānidānīṃ na paśyāmi yairbhukteyaṃ purā mahī | pṛthurailo mayo bhīmo narakaḥ śambarastathā

"जिन्होंने पहले भोगा था, उन्हें अब मैं नहीं देखता — पृथु, ऐल, मय, भीम, नरक, शम्बर,"

श्लोक 50 (12.234.50)

अश्वग्रीवः पुलोमा च स्वर्भानुरमितप्रभः । प्रह्लादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः ॥

aśvagrīvaḥ pulomā ca svarbhānuramitaprabhaḥ | prahlādo namucirdakṣo vipracittirvirocanaḥ

"अश्वग्रीव, पुलोमा, अपार तेज वाला स्वर्भानु, प्रह्लाद, नमुचि, दक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन,"

श्लोक 51 (12.234.51)

ह्रीनिषेवः सुहोत्रश्च भूरिहा पुष्पवान्वृषः । सत्येषुर्ऋषभो बाहुः कपिलाश्वो निरूपकः ॥

hrīniṣevaḥ suhotraśca bhūrihā puṣpavānvṛṣaḥ | satyeṣurṛṣabho bāhuḥ kapilāśvo nirūpakaḥ

"ह्रीनिषेव, सुहोत्र, भूरिहा, पुष्पवान्, वृष, सत्येषु, ऋषभ, बाहु, कपिलाश्व, निरूपक,"

श्लोक 52 (12.234.52)

बाणः कार्तस्वरो वह्निर्विश्वदंष्ट्रोऽथ नैर्ऋतिः । संकोचोऽथ वरीताक्षो वराहाश्वो रुचिप्रभः ॥

bāṇaḥ kārtasvaro vahnirviśvadaṃṣṭro'tha nairṛtiḥ | saṃkoco'tha varītākṣo varāhāśvo ruciprabhaḥ

"बाण, कार्तस्वर, वह्नि, विश्वदंष्ट्र, नैर्ऋति, संकोच, वरीताक्ष, वराहाश्व, रुचिप्रभ,"

श्लोक 53 (12.234.53)

विश्वजित्प्रतिरूपश्च वृषाण्डो विष्करो मधुः । हिरण्यकशिपुश्चैव कैटभश्चैव दानवः ॥

viśvajitpratirūpaśca vṛṣāṇḍo viṣkaro madhuḥ | hiraṇyakaśipuścaiva kaiṭabhaścaiva dānavaḥ

"विश्वजित्, प्रतिरूप, वृषाण्ड, विष्कर, मधु, हिरण्यकशिपु और दानव कैटभ —"

श्लोक 54 (12.234.54)

दैतेया दानवाश्चैव सर्वे ते नैर्ऋतैः सह । एते चान्ये च बहवः पूर्वे पूर्वतराश्च ये ॥

daiteyā dānavāścaiva sarve te nairṛtaiḥ saha | ete cānye ca bahavaḥ pūrve pūrvatarāśca ye

"दैत्य और दानव, वे सभी नैर्ऋतों के साथ। ये और अन्य बहुत-से, पहले के और उससे भी पहले के,"

श्लोक 55 (12.234.55)

दैत्येन्द्रा दानवेन्द्राश्च यांश्चान्याननुशुश्रुम् । बहवः पूर्वदैत्येन्द्राः संत्यज्य पृथिवीं गताः ॥

daityendrā dānavendrāśca yāṃścānyānanuśuśrum | bahavaḥ pūrvadaityendrāḥ saṃtyajya pṛthivīṃ gatāḥ

"और जिन अन्य दैत्येन्द्रों और दानवेन्द्रों के बारे में हमने सुना है — पहले के बहुत-से दैत्येन्द्र पृथ्वी को छोड़कर चले गए।"

श्लोक 56 (12.234.56)

कालेनाभ्याहताः सर्वे कालो हि बलवत्तरः । सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं न त्वमेकः शतक्रतुः ॥

kālenābhyāhatāḥ sarve kālo hi balavattaraḥ | sarvaiḥ kratuśatairiṣṭaṃ na tvamekaḥ śatakratuḥ

"वे सब काल से मारे गए, क्योंकि काल अधिक बलवान् है। उन सबने सैकड़ों यज्ञ किए थे; सौ यज्ञ करने वाले केवल तुम्हीं नहीं हो।"

श्लोक 57 (12.234.57)

सर्वे धर्मपराश्चासन्सर्वे सततसत्रिणः । अन्तरिक्षचराः सर्वे सर्वेऽभिमुखयोधिनः ॥

sarve dharmaparāścāsansarve satatasatriṇaḥ | antarikṣacarāḥ sarve sarve'bhimukhayodhinaḥ

"वे सब धर्म में तत्पर थे, सब निरन्तर यज्ञ करते थे, सब आकाश में विचरते थे, सब शत्रु के सामने डटकर लड़ते थे,"

श्लोक 58 (12.234.58)

सर्वे संहननोपेताः सर्वे परिघबाहवः । सर्वे मायाशतधराः सर्वे ते कामरूपिणः । सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते पराजिताः ॥

sarve saṃhananopetāḥ sarve parighabāhavaḥ | sarve māyāśatadharāḥ sarve te kāmarūpiṇaḥ | sarve samaramāsādya na śrūyante parājitāḥ

"सब सुदृढ़ देह वाले थे, सबकी भुजाएँ लोहे की गदा जैसी थीं, सब सैकड़ों मायाएँ जानते थे, सब इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे; रणभूमि में उतरकर वे कभी पराजित हुए नहीं सुने गए।"

श्लोक 59 (12.234.59)

सर्वे सत्यव्रतपराः सर्वे कामविहारिणः । सर्वे वेदव्रतपराः सर्वे चैव बहुश्रुताः ॥

sarve satyavrataparāḥ sarve kāmavihāriṇaḥ | sarve vedavrataparāḥ sarve caiva bahuśrutāḥ

"सब सत्यव्रत में तत्पर थे, सब इच्छानुसार विहार करते थे, सब वेद-व्रतों में लगे थे और सब बहुश्रुत थे।"

श्लोक 60 (12.234.60)

सर्वे संमतमैश्वर्यमीश्वराः प्रतिपेदिरे । न चैश्वर्यमदस्तेषां भूतपूर्वो महात्मनाम् ॥

sarve saṃmatamaiśvaryamīśvarāḥ pratipedire | na caiśvaryamadasteṣāṃ bhūtapūrvo mahātmanām

"वे सब स्वामी होकर अपना मनचाहा ऐश्वर्य पा चुके थे; और उन महात्माओं में ऐश्वर्य का अहंकार कभी नहीं हुआ।"

श्लोक 61 (12.234.61)

सर्वे यथार्हदातारः सर्वे विगतमत्सराः । सर्वे सर्वेषु भूतेषु यथावत्प्रतिपेदिरे ॥

sarve yathārhadātāraḥ sarve vigatamatsarāḥ | sarve sarveṣu bhūteṣu yathāvatpratipedire

"सब यथायोग्य दान देते थे, सब द्वेष से रहित थे, और सब सब प्राणियों के साथ उचित व्यवहार करते थे।"

श्लोक 62 (12.234.62)

सर्वे दाक्षायणीपुत्राः प्राजापत्या महाबलाः । ज्वलन्तः प्रतपन्तश्च कालेन प्रतिसंहृताः ॥

sarve dākṣāyaṇīputrāḥ prājāpatyā mahābalāḥ | jvalantaḥ pratapantaśca kālena pratisaṃhṛtāḥ

"सब दाक्षायणी के पुत्र थे, प्रजापति के वंशज, महाबली, जलते और तपते हुए — फिर भी काल ने उन्हें अपने में समेट लिया।"

श्लोक 63 (12.234.63)

त्वं चैवेमां यदा भुक्त्वा पृथिवीं त्यक्ष्यसे पुनः । न शक्ष्यसि तदा शक्र नियन्तुं शोकमात्मनः ॥

tvaṃ caivemāṃ yadā bhuktvā pṛthivīṃ tyakṣyase punaḥ | na śakṣyasi tadā śakra niyantuṃ śokamātmanaḥ

"और हे शक्र! जब तुम भी इस पृथ्वी को भोगकर फिर छोड़ोगे, तब अपने शोक को रोक नहीं सकोगे।"

श्लोक 64 (12.234.64)

मुञ्चेच्छां कामभोगेषु मुञ्चेमं श्रीभवं मदम् । एवं स्वराज्यनाशे त्वं शोकं संप्रसहिष्यसि ॥

muñcecchāṃ kāmabhogeṣu muñcemaṃ śrībhavaṃ madam | evaṃ svarājyanāśe tvaṃ śokaṃ saṃprasahiṣyasi

"भोगों की इच्छा छोड़ो; वैभव से उपजा यह मद छोड़ो। तभी अपना राज्य नष्ट होने पर तुम शोक सह सकोगे।"

श्लोक 65 (12.234.65)

शोककाले शुचो मा त्वं हर्षकाले च मा हृषः । अतीतानागतं हित्वा प्रत्युत्पन्नेन वर्तय ॥

śokakāle śuco mā tvaṃ harṣakāle ca mā hṛṣaḥ | atītānāgataṃ hitvā pratyutpannena vartaya

"शोक के समय शोक मत करो और हर्ष के समय हर्षित मत हो; बीते हुए और आने वाले को छोड़कर वर्तमान के अनुसार चलो।"

श्लोक 66 (12.234.66)

मां चेदभ्यागतः कालः सदा युक्तमतन्द्रितः । क्षमस्व न चिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति ॥

māṃ cedabhyāgataḥ kālaḥ sadā yuktamatandritaḥ | kṣamasva na cirādindra tvāmapyupagamiṣyati

"यदि सदा तत्पर और अथक काल मुझ पर आ पड़ा है, तो धैर्य रखो; थोड़े ही समय में वह तुम्हारे पास भी आ पहुँचेगा।"

श्लोक 67 (12.234.67)

त्रासयन्निव देवेन्द्र वाग्भिस्तक्षसि मामिह । संयते मयि नूनं त्वमात्मानं बहु मन्यसे ॥

trāsayanniva devendra vāgbhistakṣasi māmiha | saṃyate mayi nūnaṃ tvamātmānaṃ bahu manyase

"हे देवेन्द्र! मानो मुझे डराने के लिए तुम यहाँ शब्दों से मुझे छील रहे हो। मेरे बँधे होने के कारण तुम निश्चय ही अपने को बहुत बड़ा समझ रहे हो।"

श्लोक 68 (12.234.68)

कालः प्रथममायान्मां पश्चात्त्वामनुधावति । तेन गर्जसि देवेन्द्र पूर्वं कालहते मयि ॥

kālaḥ prathamamāyānmāṃ paścāttvāmanudhāvati | tena garjasi devendra pūrvaṃ kālahate mayi

"काल पहले मेरे पास आया और बाद में तुम्हारे पीछे दौड़ रहा है; इसी कारण, हे देवेन्द्र! पहले काल से मारे गए मुझ पर तुम गरज रहे हो।"

श्लोक 69 (12.234.69)

को हि स्थातुमलं लोके मम क्रुद्धस्य संयुगे । कालस्तु बलवान्प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव ॥

ko hi sthātumalaṃ loke mama kruddhasya saṃyuge | kālastu balavānprāptastena tiṣṭhasi vāsava

"जब मैं क्रोध में होता हूँ, तब संग्राम में कौन मेरे सामने टिक सकता है? किन्तु बलवान् काल आ पहुँचा है, इसी से तुम खड़े हो, हे वासव!"

श्लोक 70 (12.234.70)

यत्तद्वर्षसहस्रान्तं तूर्णं भवितुमर्हति । यथा मे सर्वगात्राणि न सुस्थानि महौजसः ॥

yattadvarṣasahasrāntaṃ tūrṇaṃ bhavitumarhati | yathā me sarvagātrāṇi na susthāni mahaujasaḥ

"वह हज़ार वर्षों की अवधि शीघ्र ही बीत जानी चाहिए, जैसे मुझ महातेजस्वी के सारे अंग अब स्वस्थ नहीं रहे।"

श्लोक 71 (12.234.71)

अहमैन्द्राच्च्युतः स्थानात्त्वमिन्द्रः प्रकृतो दिवि । सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययः ॥

ahamaindrāccyutaḥ sthānāttvamindraḥ prakṛto divi | sucitre jīvaloke'sminnupāsyaḥ kālaparyayaḥ

"मैं इन्द्र के पद से गिर गया हूँ और तुम स्वर्ग में इन्द्र बनाए गए हो; इस विचित्र जीवलोक में काल के चक्र का आदर करना ही उचित है।"

श्लोक 72 (12.234.72)

किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं वा कृत्वा वयं च्युताः । कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम् ॥

kiṃ hi kṛtvā tvamindro'dya kiṃ vā kṛtvā vayaṃ cyutāḥ | kālaḥ kartā vikartā ca sarvamanyadakāraṇam

"आज तुम इन्द्र हो तो क्या करके, और हम गिरे हैं तो क्या करके? काल ही कर्ता और विकर्ता है; शेष सब कुछ कारण नहीं है।"

श्लोक 73 (12.234.73)

नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखदुःखे भवाभवौ । विद्वान्प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् ॥

nāśaṃ vināśamaiśvaryaṃ sukhaduḥkhe bhavābhavau | vidvānprāpyaivamatyarthaṃ na prahṛṣyenna ca vyathet

"नाश, विनाश, ऐश्वर्य, सुख-दुःख, उत्पत्ति और लय — यह जानकर विद्वान् न अत्यधिक हर्षित होता है, न व्यथित होता है।"

श्लोक 74 (12.234.74)

त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान्वेदाहं त्वां च वासव । किं कत्थसे मां किंच त्वं कालेन निरपत्रपः ॥

tvameva hīndra vetthāsmānvedāhaṃ tvāṃ ca vāsava | kiṃ katthase māṃ kiṃca tvaṃ kālena nirapatrapaḥ

"हे इन्द्र! तुम स्वयं हमें जानते हो और हे वासव! मैं भी तुम्हें जानता हूँ। हे निर्लज्ज! यह सब तो काल का किया हुआ है; फिर मुझ पर डींग क्यों मारते हो?"

श्लोक 75 (12.234.75)

त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत्तदा पौरुषं मम । समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥

tvameva hi purā vettha yattadā pauruṣaṃ mama | samareṣu ca vikrāntaṃ paryāptaṃ tannidarśanam

"उस समय मेरा जो पराक्रम था और युद्धों में जो शौर्य मैंने दिखाया, उसे तुम स्वयं जानते हो; वही पर्याप्त प्रमाण है।"

श्लोक 76 (12.234.76)

आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह । मया विनिर्जिताः पूर्वं मरुतश्च शचीपते ॥

ādityāścaiva rudrāśca sādhyāśca vasubhiḥ saha | mayā vinirjitāḥ pūrvaṃ marutaśca śacīpate

"हे शचीपति! आदित्य, रुद्र, वसुओं सहित साध्य और मरुद्गण भी पहले मेरे द्वारा जीते गए थे।"

श्लोक 77 (12.234.77)

त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे । समेता विबुधा भग्नास्तरसा समरे मया ॥

tvameva śakra jānāsi devāsurasamāgame | sametā vibudhā bhagnāstarasā samare mayā

"हे शक्र! देवासुर-संग्राम में इकट्ठे हुए देवताओं को मैंने रण में तुरन्त तोड़ डाला था, यह तुम स्वयं जानते हो।"

श्लोक 78 (12.234.78)

पर्वताश्चासकृत्क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः । सशृङ्गशिखरा भग्नाः समरे मूर्ध्नि ते मया ॥

parvatāścāsakṛtkṣiptāḥ savanāḥ savanaukasaḥ | saśṛṅgaśikharā bhagnāḥ samare mūrdhni te mayā

"वनों और वनवासियों सहित पर्वत बार-बार फेंके गए; शृंगों और शिखरों के टूट जाने पर भी वे युद्ध में मेरे द्वारा तुम्हारे सिर पर पटके गए।"

श्लोक 79 (12.234.79)

किं नु शक्यं मया कर्तुं कालो हि दुरतिक्रमः । न हि त्वां नोत्सहे हन्तुं सवज्रमपि मुष्टिना ॥

kiṃ nu śakyaṃ mayā kartuṃ kālo hi duratikramaḥ | na hi tvāṃ notsahe hantuṃ savajramapi muṣṭinā

"पर मैं क्या कर सकता हूँ? काल का उल्लंघन करना कठिन है। ऐसा नहीं कि वज्र सहित तुम्हें भी मैं मुट्ठी से मारने में असमर्थ हूँ।"

श्लोक 80 (12.234.80)

न तु विक्रमकालोऽयं क्षमाकालोऽयमागतः । तेन त्वां मर्षये शक्र दुर्मर्षणतरस्त्वया ॥

na tu vikramakālo'yaṃ kṣamākālo'yamāgataḥ | tena tvāṃ marṣaye śakra durmarṣaṇatarastvayā

"किन्तु यह पराक्रम का समय नहीं है; क्षमा का समय आ गया है। इसी कारण, हे शक्र! तुम अत्यन्त असह्य होने पर भी मैं तुम्हें सह रहा हूँ।"

श्लोक 81 (12.234.81)

तं मां परिणते काले परीतं कालवह्निना । नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे ॥

taṃ māṃ pariṇate kāle parītaṃ kālavahninā | niyataṃ kālapāśena baddhaṃ śakra vikatthase

"काल के परिपक्व होने पर काल की अग्नि से घिरे हुए और काल के पाश से दृढ़ बँधे हुए मुझ को ही, हे शक्र! तुम ताना मार रहे हो।"

श्लोक 82 (12.234.82)

अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य दुरतिक्रमः । बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनया यथा ॥

ayaṃ sa puruṣaḥ śyāmo lokasya duratikramaḥ | baddhvā tiṣṭhati māṃ raudraḥ paśuṃ raśanayā yathā

"यह वही श्याम पुरुष है, जिसे लोक लाँघ नहीं सकता; वह भयंकर मुझे पशु की तरह रस्सी से बाँधे खड़ा है।"

श्लोक 83 (12.234.83)

लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ । वधो बन्धप्रमोक्षश्च सर्वं कालेन लभ्यते ॥

lābhālābhau sukhaṃ duḥkhaṃ kāmakrodhau bhavābhavau | vadho bandhapramokṣaśca sarvaṃ kālena labhyate

"लाभ और हानि, सुख और दुःख, काम और क्रोध, उत्पत्ति और लय, वध, बन्धन और मोक्ष — सब कुछ काल से ही प्राप्त होता है।"

श्लोक 84 (12.234.84)

नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः । सोयं पचति कालो मां वृक्षे फलमिवागतम् ॥

nāhaṃ kartā na kartā tvaṃ kartā yastu sadā prabhuḥ | soyaṃ pacati kālo māṃ vṛkṣe phalamivāgatam

"न मैं कर्ता हूँ, न तुम; कर्ता वह है जो सदा प्रभु है। यही काल मुझे पका रहा है, जैसे वृक्ष पर आया हुआ फल पकता है।"

श्लोक 85 (12.234.85)

यान्येव पुरुषः कुर्वन्सुखैः कालेन युज्यते । पुनस्तान्येव कुर्वाणो दुःखैः कालेन युज्यते ॥

yānyeva puruṣaḥ kurvansukhaiḥ kālena yujyate | punastānyeva kurvāṇo duḥkhaiḥ kālena yujyate

"मनुष्य जो-जो कर्म करता है, उनसे काल उसे सुखों से जोड़ता है; फिर वही कर्म करते हुए काल उसे दुःखों से जोड़ देता है।"

श्लोक 86 (12.234.86)

न च कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हति । तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहायता ॥

na ca kālena kālajñaḥ spṛṣṭaḥ śocitumarhati | tena śakra na śocāmi nāsti śoke sahāyatā

"काल को जानने वाले को काल का स्पर्श होने पर शोक करना उचित नहीं। इसलिए, हे शक्र! मैं शोक नहीं करता; शोक में कोई सहायता नहीं है।"

श्लोक 87 (12.234.87)

यदा हि शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति । सामर्थ्यं शोचतो नास्तीत्यतोऽहं नाद्य शोचामि ॥

yadā hi śocataḥ śoko vyasanaṃ nāpakarṣati | sāmarthyaṃ śocato nāstītyato'haṃ nādya śocāmi

"जब शोक करने वालों का शोक विपत्ति को दूर नहीं करता और शोक करने में कोई सामर्थ्य नहीं है, तो इसी कारण मैं आज शोक नहीं करता।"

भीष्म उवाच

श्लोक 88 (12.234.88)

एवमुक्तः सहस्राक्षो भगवान्पाकशासनः । प्रतिसंहृत्य संरम्भमित्युवाच शतक्रतुः ॥

evamuktaḥ sahasrākṣo bhagavānpākaśāsanaḥ | pratisaṃhṛtya saṃrambhamityuvāca śatakratuḥ

ऐसा कहे जाने पर पाक के संहारक, हज़ार नेत्रों वाले भगवान् शतक्रतु ने अपना आवेश रोककर कहा —

इन्द्र उवाच

श्लोक 89 (12.234.89)

सवज्रमुद्यतं बाहुं दृष्ट्वा पाशांश्च वारुणान् । कस्येह न व्यथेद्बुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ॥

savajramudyataṃ bāhuṃ dṛṣṭvā pāśāṃśca vāruṇān | kasyeha na vyathedbuddhirmṛtyorapi jighāṃsataḥ

"वज्र सहित उठी हुई मेरी भुजा और वरुण के पाशों को देखकर यहाँ किसकी बुद्धि न काँपे — मारने को उद्यत मृत्यु की भी?"

श्लोक 90 (12.234.90)

सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी । ब्रुवन्न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात्सत्यपराक्रम ॥

sā te na vyathate buddhiracalā tattvadarśinī | bruvanna vyathase'dya tvaṃ dhairyātsatyaparākrama

"तुम्हारी वह बुद्धि नहीं काँपती, जो अचल है और तत्त्व को देखने वाली है। हे सत्यपराक्रमी! ऐसा बोलते हुए भी तुम आज अपने धैर्य के कारण विचलित नहीं हो।"

श्लोक 91 (12.234.91)

को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् । कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा संप्रस्थितं जगत् ॥

ko hi viśvāsamartheṣu śarīre vā śarīrabhṛt | kartumutsahate loke dṛṣṭvā saṃprasthitaṃ jagat

"संसार को नष्ट होने की ओर जाता देखकर कौन देहधारी धन-सम्पत्ति पर या शरीर पर विश्वास करने का साहस कर सकता है?"

श्लोक 92 (12.234.92)

अहमप्येवमेवैनं लोकं जानाम्यशाश्वतम् । कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ॥

ahamapyevamevainaṃ lokaṃ jānāmyaśāśvatam | kālāgnāvāhitaṃ ghore guhye satatage'kṣare

"मैं भी इस लोक को ऐसा ही अनित्य जानता हूँ — काल की भयंकर अग्नि में रखा हुआ, जो गुप्त है, सदा गतिशील है और अविनाशी है।"

श्लोक 93 (12.234.93)

न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् । सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ॥

na cātra parihāro'sti kālaspṛṣṭasya kasyacit | sūkṣmāṇāṃ mahatāṃ caiva bhūtānāṃ paripacyatām

"और काल के स्पर्श में आए किसी के लिए भी यहाँ बचाव नहीं है — पकाए जा रहे छोटे और बड़े सब प्राणियों के लिए।"

श्लोक 94 (12.234.94)

अनीशस्याप्रमत्तस्य भूतानि पचतः सदा । अनिवृत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ॥

anīśasyāpramattasya bhūtāni pacataḥ sadā | anivṛttasya kālasya kṣayaṃ prāpto na mucyate

"जिस काल का कोई स्वामी नहीं, जो कभी असावधान नहीं होता, जो सदा प्राणियों को पकाता है और कभी लौटता नहीं, उसके विनाश में पड़ा हुआ कोई छूटता नहीं।"

श्लोक 95 (12.234.95)

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु । प्रयत्नेनाप्यपक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् ॥

apramattaḥ pramatteṣu kālo jāgarti dehiṣu | prayatnenāpyapakrānto dṛṣṭapūrvo na kenacit

"असावधान प्राणियों के बीच सावधान काल जागता रहता है; प्रयत्न करके भी उससे निकल भागा हुआ कोई कभी किसी ने नहीं देखा।"

श्लोक 96 (12.234.96)

पुराणः शाश्वतो धर्मः सर्वप्राणभृतां समः । कालो न परिहार्यश्च न चास्यास्ति व्यतिक्रमः ॥

purāṇaḥ śāśvato dharmaḥ sarvaprāṇabhṛtāṃ samaḥ | kālo na parihāryaśca na cāsyāsti vyatikramaḥ

"यह सनातन और शाश्वत धर्म है, सब प्राणियों के लिए समान; काल को टाला नहीं जा सकता, और उसका उल्लंघन नहीं हो सकता।"

श्लोक 97 (12.234.97)

अहोरात्रांश्च मासांश्च क्षणान्काष्ठा लवान्कलाः । संपीडयति यः कालो वृद्धिं वार्धुषिको यथा ॥

ahorātrāṃśca māsāṃśca kṣaṇānkāṣṭhā lavānkalāḥ | saṃpīḍayati yaḥ kālo vṛddhiṃ vārdhuṣiko yathā

"जैसे सूदखोर ब्याज बढ़ाता जाता है, वैसे ही काल दिनों-रातों, महीनों, क्षणों, काष्ठाओं, लवों और कलाओं को दबाता जाता है।"

श्लोक 98 (12.234.98)

इदमद्य करिष्यामि श्वः कर्ताऽस्मीति वादिनम् । कालो हरति संप्राप्तो नदीवेग इव द्रुमम् ॥

idamadya kariṣyāmi śvaḥ kartā'smīti vādinam | kālo harati saṃprāpto nadīvega iva drumam

"जो कहता है कि 'यह आज करूँगा, वह कल करूँगा', उसे काल आकर वैसे ही बहा ले जाता है जैसे नदी का वेग वृक्ष को।"

श्लोक 99 (12.234.99)

इदानीं तावदेवासौ मया दृष्टः कथं मृतः । इति कालेन ह्रियतां प्रलापः श्रूयते नृणाम् ॥

idānīṃ tāvadevāsau mayā dṛṣṭaḥ kathaṃ mṛtaḥ | iti kālena hriyatāṃ pralāpaḥ śrūyate nṛṇām

"'अभी-अभी तो मैंने उसे देखा था, वह मर कैसे गया?' — काल द्वारा हरे जाते हुए मनुष्यों का ऐसा विलाप सुनाई देता है।"

श्लोक 100 (12.234.100)

नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च । जीवितं जीवलोकस्य कालेनागम्य नीयते ॥

naśyantyarthāstathā bhogāḥ sthānamaiśvaryameva ca | jīvitaṃ jīvalokasya kālenāgamya nīyate

"धन नष्ट हो जाते हैं, भोग भी, पद और ऐश्वर्य भी; काल आकर जीवलोक का प्राण तक ले जाता है।"

श्लोक 101 (12.234.101)

उच्छ्राया विनिपातान्ता भावोऽभावः स एव च । अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसायो हि दुष्करः ॥

ucchrāyā vinipātāntā bhāvo'bhāvaḥ sa eva ca | anityamadhruvaṃ sarvaṃ vyavasāyo hi duṣkaraḥ

"सब ऊँचाइयों का अन्त पतन में होता है और उत्पत्ति का अन्त विनाश में; सब कुछ अनित्य और अस्थिर है, और दृढ़ निश्चय बनाए रखना कठिन है।"

श्लोक 102 (12.234.102)

सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी । अहमासं पुरा चेति मनसाऽपि न बुद्ध्यते ॥

sā te na vyathate buddhiracalā tattvadarśinī | ahamāsaṃ purā ceti manasā'pi na buddhyate

"तुम्हारी वह बुद्धि नहीं काँपती, जो अचल और तत्त्वदर्शी है; 'मैं पहले ऐसा था' यह बात उसके मन में आती तक नहीं।"

श्लोक 103 (12.234.103)

कालेनाक्रम्य लोकेऽस्मिन्पच्यमाने बलीयसा । अज्येष्ठमकनिष्ठं च क्षिप्यमाणो न बुद्ध्यते ॥

kālenākramya loke'sminpacyamāne balīyasā | ajyeṣṭhamakaniṣṭhaṃ ca kṣipyamāṇo na buddhyate

"बलवान् काल से दबोचा हुआ यह लोक पकाया जा रहा है; जो बड़े-छोटे का विचार किए बिना उछाला जा रहा है, उसे इसका बोध नहीं होता।"

श्लोक 104 (12.234.104)

ईर्ष्याभिमानलोभेषु कामक्रोधभयेषु च । स्पृहामोहाभिमानेषु लोकः सक्तो विमुह्यति ॥

īrṣyābhimānalobheṣu kāmakrodhabhayeṣu ca | spṛhāmohābhimāneṣu lokaḥ sakto vimuhyati

"ईर्ष्या, अभिमान और लोभ में, काम, क्रोध और भय में, स्पृहा, मोह और अहंकार में आसक्त होकर संसार भ्रम में पड़ा रहता है।"

श्लोक 105 (12.234.105)

भवांस्तु भावतत्त्वज्ञो विद्वाञ्ज्ञानतपोन्वितः । कालं पश्यति सुव्यक्तं पाणावामलकं यथा ॥

bhavāṃstu bhāvatattvajño vidvāñjñānataponvitaḥ | kālaṃ paśyati suvyaktaṃ pāṇāvāmalakaṃ yathā

"परन्तु तुम पदार्थों के तत्त्व को जानते हो, विद्वान् हो, ज्ञान और तप से सम्पन्न हो; तुम काल को हथेली पर रखे आँवले की तरह साफ़ देखते हो।"

श्लोक 106 (12.234.106)

कालचारित्रतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । वैरोचने कृतार्थोऽसि स्पृहणीयो विजानताम् ॥

kālacāritratattvajñaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ | vairocane kṛtārtho'si spṛhaṇīyo vijānatām

"तुम काल के स्वरूप और गति के तत्त्व को जानने वाले और सब शास्त्रों में निपुण हो; हे वैरोचन! तुम कृतकृत्य हो और जानने वालों के लिए भी ईर्ष्या के योग्य हो।"

श्लोक 107 (12.234.107)

सर्वलोको ह्ययं मन्ये बुद्ध्या परिगतस्त्वया । विहरन्सर्वतोमुक्तो न क्वचिच्च विषीदसि ॥

sarvaloko hyayaṃ manye buddhyā parigatastvayā | viharansarvatomukto na kvacicca viṣīdasi

"मैं मानता हूँ कि तुमने इस सारे संसार को अपनी बुद्धि से समझ लिया है; सब ओर से मुक्त होकर विचरते हुए तुम कहीं भी खिन्न नहीं होते।"

श्लोक 108 (12.234.108)

रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम् । निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ॥

rajaśca hi tamaśca tvāṃ spṛśate na jitendriyam | niṣprītiṃ naṣṭasaṃtāpamātmānaṃ tvamupāsase

"हे जितेन्द्रिय! रजोगुण और तमोगुण तुम्हें छूते नहीं; आसक्ति से रहित और सन्ताप से मुक्त होकर तुम आत्मा की उपासना करते हो।"

श्लोक 109 (12.234.109)

सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् । दृष्ट्वा त्वां मम संजाता त्वय्यनुक्रोशिनी मतिः ॥

suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ nirvairaṃ śāntamānasam | dṛṣṭvā tvāṃ mama saṃjātā tvayyanukrośinī matiḥ

"तुम्हें सब प्राणियों का मित्र, वैरहीन और शान्त मन वाला देखकर मेरे मन में तुम्हारे प्रति करुणा उत्पन्न हो गई है।"

श्लोक 110 (12.234.110)

नाहमेतादृशं बुद्धं हन्तुमिच्छामि बन्धनैः । आनृशंस्यं परो धर्मो ह्यनुक्रोशश्च मे त्वयि ॥

nāhametādṛśaṃ buddhaṃ hantumicchāmi bandhanaiḥ | ānṛśaṃsyaṃ paro dharmo hyanukrośaśca me tvayi

"ऐसे ज्ञानी को मैं बन्धनों से मारना नहीं चाहता। क्रूरता का अभाव परम धर्म है, और तुम्हारे प्रति मुझे दया है।"

श्लोक 111 (12.234.111)

मोक्ष्यन्ते वारुणाः पाशास्तवेमे कालपर्ययात् । प्रजानामुपचारेण स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ॥

mokṣyante vāruṇāḥ pāśāstaveme kālaparyayāt | prajānāmupacāreṇa svasti te'stu mahāsura

"काल के फेर से तुम्हारे ये वरुण के पाश खुल जाएँगे। हे महान् असुर! प्रजाजनों की सेवा के कारण तुम्हारा कल्याण हो।"

श्लोक 112 (12.234.112)

यदा श्वश्रूं स्नुषा वृद्धां परिचारेण योक्ष्यते । पुत्रश्च पितरं मोहात्प्रेषयिष्यति कर्मसु ॥

yadā śvaśrūṃ snuṣā vṛddhāṃ paricāreṇa yokṣyate | putraśca pitaraṃ mohātpreṣayiṣyati karmasu

"जब बहू वृद्ध सास से अपनी सेवा करवाएगी और पुत्र मोह में पड़कर पिता को कामों पर भेजेगा,"

श्लोक 113 (12.234.113)

ब्राह्मणैः कारयिष्यन्ति वृषलाः पादधावनम् । शूद्राश्च ब्राह्मणीं भार्यामुपयास्यन्ति निर्भयाः ॥

brāhmaṇaiḥ kārayiṣyanti vṛṣalāḥ pādadhāvanam | śūdrāśca brāhmaṇīṃ bhāryāmupayāsyanti nirbhayāḥ

"जब वृषल ब्राह्मणों से पाँव धुलवाएँगे और शूद्र निर्भय होकर ब्राह्मण-पत्नियों के पास जाएँगे,"

श्लोक 114 (12.234.114)

वियोनिषु विमोक्ष्यन्ति बीजानि पुरुषा यदा । संकरं कांस्यभाण्डैश्च बलिं चैव कुपात्रकैः ॥

viyoniṣu vimokṣyanti bījāni puruṣā yadā | saṃkaraṃ kāṃsyabhāṇḍaiśca baliṃ caiva kupātrakaiḥ

"जब पुरुष अनुचित योनियों में बीज डालेंगे, काँसे के पात्रों से वर्णसंकर करेंगे और अयोग्य पात्रों से बलि अर्पित करेंगे,"

श्लोक 115 (12.234.115)

चातुर्वर्ण्यं यदा कृत्स्नममर्यादं भविष्यति । एकैकस्ते तदा पाशः क्रमशः परिमोक्ष्यते ॥

cāturvarṇyaṃ yadā kṛtsnamamaryādaṃ bhaviṣyati | ekaikaste tadā pāśaḥ kramaśaḥ parimokṣyate

"जब चारों वर्ण पूरी तरह मर्यादाहीन हो जाएँगे, तब तुम्हारा एक-एक पाश क्रम से खुलता जाएगा।"

श्लोक 116 (12.234.116)

अस्मत्तस्ते भयं नास्ति समयं प्रतिपालय । सुखी भव निराबाधः स्वस्थचेता निरामयः ॥

asmattaste bhayaṃ nāsti samayaṃ pratipālaya | sukhī bhava nirābādhaḥ svasthacetā nirāmayaḥ

"हमसे तुम्हें कोई भय नहीं। समय की मर्यादा का पालन करो। सुखी रहो, निर्बाध रहो, शान्तचित्त और निरोग रहो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 117 (12.234.117)

तमेवमुक्त्वा भगवाञ्छतक्रतुः । प्रतिप्रयातो गजराजवाहनः । विजित्य सर्वानसुरान्सुराधिपो । ननन्द हर्षेण बभूव चैकराट् ॥

tamevamuktvā bhagavāñchatakratuḥ | pratiprayāto gajarājavāhanaḥ | vijitya sarvānasurānsurādhipo | nananda harṣeṇa babhūva caikarāṭ

उससे इस प्रकार कहकर भगवान् शतक्रतु गजराज पर सवार होकर लौट गए; सब असुरों को जीतकर देवाधिपति इन्द्र हर्ष से आनन्दित हुए और अकेले सम्राट् हो गए।

श्लोक 118 (12.234.118)

महर्षयस्तुष्टुवुरञ्जसा च तं । वृषाकपिं सर्वचराचरेश्वरम् । हिमापहो हव्यमुवाह चाध्वरे । तथाऽमृतं चार्पितमीश्वरोऽपि हि ॥

maharṣayastuṣṭuvurañjasā ca taṃ | vṛṣākapiṃ sarvacarācareśvaram | himāpaho havyamuvāha cādhvare | tathā'mṛtaṃ cārpitamīśvaro'pi hi

महर्षियों ने तुरन्त उनकी स्तुति की — वृषाकपि की, जो समस्त चर और अचर के ईश्वर हैं। यज्ञ में शीत को हरने वाले अग्नि ने हव्य वहन किया, और ईश्वर के योग्य अमृत भी अर्पित किया गया।

श्लोक 119 (12.234.119)

द्विजोत्तमैः सर्वगतैरभिष्टुतो । विदीप्ततेजाः शतमन्युरीश्वरः । प्रशान्तचेता मुदितः स्वमालयं । त्रिविष्टपं प्राप्य मुमोद वासवः ॥

dvijottamaiḥ sarvagatairabhiṣṭuto | vidīptatejāḥ śatamanyurīśvaraḥ | praśāntacetā muditaḥ svamālayaṃ | triviṣṭapaṃ prāpya mumoda vāsavaḥ

सर्वत्र पहुँचे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों से स्तुति पाकर, प्रज्वलित तेज वाले, शान्तचित्त और प्रसन्न ईश्वर शतमन्यु वासव अपने धाम स्वर्ग को पहुँचकर आनन्दित हुए।

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