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शान्ति पर्व · अध्याय 235

श्री का इन्द्र को असुरों को छोड़ने का कारण बताना

युधिष्ठिर पूछते हैं कि किसी मनुष्य के उत्थान या पतन का पहले से कैसे पता चले, और भीष्म एक पुराने संवाद से उत्तर देते हैं। गङ्गा के तट पर नारद और इन्द्र बैठे हैं कि तभी देवी श्री एक दीप्तिमान् विमान से उतरती हैं और कहती हैं कि वे वहीं रहती हैं जहाँ सत्य, धर्म, उदारता और बड़ों का आदर बना रहता है। वे बताती हैं कि पहले सद्गुणी दैत्य कैसे अभिमान, क्रोध, अपवित्रता और गुरुजनों, माता-पिता तथा देवताओं के प्रति अनादर में गिर गए, इसलिए उन्होंने उन्हें छोड़कर देवताओं के बीच रहना चुना। इन्द्र और नारद उनका स्वागत करते हैं, संसार समृद्ध होता है, और भीष्म अन्त में युधिष्ठिर को वासुदेव-परायण होकर प्रजा का पालन करने का उपदेश देते हैं।

अध्याय 234अध्याय-सूचीअध्याय 236

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.235.1)

पूर्वरूपाणि मे राजन्पुरुषस्य भविष्यतः । पराभविष्यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

pūrvarūpāṇi me rājanpuruṣasya bhaviṣyataḥ | parābhaviṣyataścaiva tanme brūhi pitāmaha

हे राजन्! जो पुरुष आगे उन्नति पाने वाला है और जो पतन को प्राप्त होने वाला है, उनके पूर्वलक्षण क्या होते हैं? पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.235.2)

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति । भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥

mana eva manuṣyasya pūrvarūpāṇi śaṃsati | bhaviṣyataśca bhadraṃ te tathaiva na bhaviṣyataḥ

मनुष्य का मन ही उसके भविष्य के लक्षण पहले से बता देता है, चाहे वह आगे कल्याण पाने वाला हो या न पाने वाला। तुम्हारा मंगल हो।

श्लोक 3 (12.235.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । श्रिया शक्रस्य संवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | śriyā śakrasya saṃvādaṃ tannibodha yudhiṣṭhira

इस विषय में लोग एक पुरातन इतिहास सुनाते हैं, श्री और इन्द्र का संवाद। युधिष्ठिर, उसे सुनो।

श्लोक 4 (12.235.4)

महतस्तपसो व्यष्ट्या पश्यँल्लोकौ परावरौ । सामान्यमृषिभिर्गत्वा ब्रह्मलोकनिवासिभिः ॥

mahatastapaso vyaṣṭyā paśyam̐llokau parāvarau | sāmānyamṛṣibhirgatvā brahmalokanivāsibhiḥ

अपने महान् तप के प्रकाश से ऊँचे और नीचे दोनों लोकों को देखते हुए, ब्रह्मलोक में रहने वाले ऋषियों के साथ समान भाव से जाकर,

श्लोक 5 (12.235.5)

ब्रह्मेवामितदीप्तौजाः शान्तपाप्मा महातपाः । विचचार यथाकालं त्रिषु लोकेषु नारदः ॥

brahmevāmitadīptaujāḥ śāntapāpmā mahātapāḥ | vicacāra yathākālaṃ triṣu lokeṣu nāradaḥ

ब्रह्मा के समान असीम तेज वाले, निष्पाप और महान् तपस्वी नारद समय के अनुसार तीनों लोकों में विचरण करते थे।

श्लोक 6 (12.235.6)

कदाचित्प्रातरुत्थाय पिस्पृक्षुः सलिलं शुचि । ध्रुवद्वारभवां गङ्गां जगामावततार च ॥

kadācitprātarutthāya pispṛkṣuḥ salilaṃ śuci | dhruvadvārabhavāṃ gaṅgāṃ jagāmāvatatāra ca

एक बार प्रातःकाल उठकर, पवित्र जल का स्पर्श करने की इच्छा से, वे ध्रुवद्वार से प्रकट होने वाली गङ्गा के पास गए और उसमें उतरे।

श्लोक 7 (12.235.7)

मेरुपादोद्भवां गङ्गां नारायणपदच्युताम् । स वीक्षमाणो हृष्टात्मा तं देशमभिजग्मिवान् ॥

merupādodbhavāṃ gaṅgāṃ nārāyaṇapadacyutām | sa vīkṣamāṇo hṛṣṭātmā taṃ deśamabhijagmivān

मेरु के चरणों से उद्भूत और नारायण के चरणों से च्युत गङ्गा को हर्षित मन से देखते हुए वे उस स्थान पर पहुँचे:

श्लोक 8 (12.235.8)

यं देवजवाकीर्णं सूक्ष्मकाञ्चनवालुकम् । गङ्गाद्वीपं समासाद्य नानावृक्षैरलङ्कृतम् ॥

yaṃ devajavākīrṇaṃ sūkṣmakāñcanavālukam | gaṅgādvīpaṃ samāsādya nānāvṛkṣairalaṅkṛtam

गङ्गा के उस द्वीप पर पहुँचकर, जो दिव्य जपा-पुष्पों से बिखरा हुआ था, जिसकी बालू स्वर्ण-कणों के समान सूक्ष्म थी और जो नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित था,

श्लोक 9 (12.235.9)

सालतालाश्वकर्णानां चन्दनानां च राजिभिः । मण्डितं विविधैः पुष्पैर्हंसकारण्डवायुतम् ॥

sālatālāśvakarṇānāṃ candanānāṃ ca rājibhiḥ | maṇḍitaṃ vividhaiḥ puṣpairhaṃsakāraṇḍavāyutam

जो साल, ताल, अश्वकर्ण और चन्दन के वृक्षों की पंक्तियों तथा नाना प्रकार के फूलों से सजा था और हंसों तथा कारण्डव पक्षियों से भरा था,

श्लोक 10 (12.235.10)

नदीपुलिनमासाद्य स्नात्वा संतर्प्य देवताः । जजाप जप्यं धर्मात्मा तन्मयत्वेन भास्वता ॥

nadīpulinamāsādya snātvā saṃtarpya devatāḥ | jajāpa japyaṃ dharmātmā tanmayatvena bhāsvatā

वे नदी के तट पर आए, स्नान करके देवताओं का तर्पण किया; और उस धर्मात्मा ने तेजस्वी परमदेव में पूर्णतः तन्मय होकर अपना जप किया।

श्लोक 11 (12.235.11)

सहस्रनयनश्चापि वज्री शम्बरपाकहा । तस्या देवर्षिजुष्टायास्तीरमभ्याजगाम ह ॥

sahasranayanaścāpi vajrī śambarapākahā | tasyā devarṣijuṣṭāyāstīramabhyājagāma ha

तभी सहस्रनेत्र वज्रधारी इन्द्र, जो शम्बर और पाक के संहारक हैं, देवर्षियों से सेवित उस नदी के तट पर आ पहुँचे।

श्लोक 12 (12.235.12)

तावाप्लुत्य यतात्मानौ कृतजप्यौ समासतः । नद्याः पुलिनमासाद्य सूक्ष्मकाञ्चनवालुकम् ॥

tāvāplutya yatātmānau kṛtajapyau samāsataḥ | nadyāḥ pulinamāsādya sūkṣmakāñcanavālukam

स्नान करके उन दोनों संयतात्माओं ने संक्षेप में जप किया और नदी के उस तट पर बैठे, जहाँ की बालू स्वर्ण-कणों के समान सूक्ष्म थी।

श्लोक 13 (12.235.13)

पुण्यकर्मभिराख्याता देवर्षिकथिताः कथाः । चक्रतुस्तौ तथाऽऽसीनौ महर्षिकथितास्तथा । पूर्ववृत्तव्यतीतानि कथयन्तौ समाहितौ ॥

puṇyakarmabhirākhyātā devarṣikathitāḥ kathāḥ | cakratustau tathā''sīnau maharṣikathitāstathā | pūrvavṛttavyatītāni kathayantau samāhitau

वहाँ बैठे हुए वे दोनों एकाग्र चित्त से कथाएँ कहने लगे, पुण्यकर्मियों द्वारा कही गई, देवर्षियों और महर्षियों द्वारा सुनाई गई कथाएँ, जिनमें बीते हुए पुराने प्रसंगों का वर्णन था।

श्लोक 14 (12.235.14)

अथ भास्करमुद्यन्तं रश्मिजालपुरस्कृतम् । पूर्णमण्डलमालोक्य तावुत्थायोपतस्थतुः ॥

atha bhāskaramudyantaṃ raśmijālapuraskṛtam | pūrṇamaṇḍalamālokya tāvutthāyopatasthatuḥ

तब किरणों के जाल से आगे-आगे घिरे हुए, पूर्ण मण्डल वाले उगते हुए सूर्य को देखकर वे दोनों उठ खड़े हुए और उसकी उपासना की।

श्लोक 15 (12.235.15)

विविक्ते पुण्यदेशे तु रममाणौ मुदा युतौ । ददृशातेऽन्तरिक्षे तौ सूर्यस्योदयनं प्रति ॥

vivikte puṇyadeśe tu ramamāṇau mudā yutau | dadṛśāte'ntarikṣe tau sūryasyodayanaṃ prati

उस एकान्त पुण्य स्थान में आनन्दित और प्रसन्न बैठे हुए उन दोनों ने आकाश में सूर्योदय की दिशा में देखा:

श्लोक 16 (12.235.16)

ज्योतिर्ज्वालसमाकीर्णं ज्योतिषां गणमण्डितम् । अभितस्तूदयन्तं तमर्कमर्कमिवापरम् ॥

jyotirjvālasamākīrṇaṃ jyotiṣāṃ gaṇamaṇḍitam | abhitastūdayantaṃ tamarkamarkamivāparam

तेज की ज्वालाओं से व्याप्त, ज्योतिर्गणों से सुशोभित एक प्रकाश-पुंज, जो उस सूर्य के चारों ओर दूसरे सूर्य के समान उदित हो रहा था।

श्लोक 17 (12.235.17)

आकाशे ददृशे ज्योतिरुद्यतार्चिः समप्रभम् । अर्कस्य तेजसा तुल्यं तद्भास्करसमप्रभम् । तयोः समीपं तं प्राप्तं प्रत्यदृश्यत भारत ॥

ākāśe dadṛśe jyotirudyatārciḥ samaprabham | arkasya tejasā tulyaṃ tadbhāskarasamaprabham | tayoḥ samīpaṃ taṃ prāptaṃ pratyadṛśyata bhārata

आकाश में ऊपर उठी ज्वालाओं वाली, समान प्रभा से युक्त एक ज्योति दिखाई दी, जो सूर्य के तेज के तुल्य थी, सूर्य के समान कान्ति वाली थी। हे भारत! वह उन दोनों के समीप आकर उनकी आँखों के सामने प्रकट हो गई।

श्लोक 18 (12.235.18)

तत्सुपर्णार्करचितमास्थितं वैष्णवं पदम् । भाभिरप्रतिमं भाति त्रैलोक्यमवभासयत् ॥

tatsuparṇārkaracitamāsthitaṃ vaiṣṇavaṃ padam | bhābhirapratimaṃ bhāti trailokyamavabhāsayat

वह विष्णु का अपना धाम था, जिसे सुपर्ण और सूर्य ने रचा था और जो आकाश में स्थित था। अपनी अनुपम आभा से वह तीनों लोकों को प्रकाशित करता हुआ चमक रहा था।

श्लोक 19 (12.235.19)

दृष्ट्वा तौ तु विक्रान्तौ प्राञ्जली समुपास्थितौ । क्रमात्संप्रेक्ष्यमाणौ तौ विमानं दिव्यमद्भुतम् ॥

dṛṣṭvā tau tu vikrāntau prāñjalī samupāsthitau | kramātsaṃprekṣyamāṇau tau vimānaṃ divyamadbhutam

उसे देखकर वे दोनों पराक्रमी हाथ जोड़कर उसके सामने खड़े हो गए और क्रम से उस अद्भुत दिव्य विमान को देखने लगे,

श्लोक 20 (12.235.20)

तस्मिंस्तदा सतीं कान्तां लोककान्तां परां शुभाम् । धात्रीं लोकस्य रमणीं लोकमातरमच्युताम् ॥

tasmiṃstadā satīṃ kāntāṃ lokakāntāṃ parāṃ śubhām | dhātrīṃ lokasya ramaṇīṃ lokamātaramacyutām

और उसमें उन्होंने उस सती, कमनीय देवी को देखा, जो लोक की प्रिया, परम शुभ, लोक का पालन करने वाली, उसे आनन्द देने वाली, लोकमाता और अच्युता हैं,

श्लोक 21 (12.235.21)

दिव्याभिरुपशोभाभिरप्सरोभिः पुरस्कृताम् । बृहतीमंशुमत्प्रख्यां बृहद्भानोरिवार्चिषम् ॥

divyābhirupaśobhābhirapsarobhiḥ puraskṛtām | bṛhatīmaṃśumatprakhyāṃ bṛhadbhānorivārciṣam

जो सुन्दर रूप-शोभा वाली दिव्य अप्सराओं से घिरी थीं, ऊँची और सूर्य के समान दीप्तिमती थीं, मानो किसी विशाल अग्नि की ज्वाला हों,

श्लोक 22 (12.235.22)

नक्षत्रकल्पाभरणां तारापङ्क्तिसमस्रजम् । श्रियं ददृशतुः पद्मां साक्षात्पद्मदलस्थिताम् ॥

nakṣatrakalpābharaṇāṃ tārāpaṅktisamasrajam | śriyaṃ dadṛśatuḥ padmāṃ sākṣātpadmadalasthitām

जिनके आभूषण नक्षत्रों जैसे थे और जिनकी माला तारों की पंक्ति के समान थी। उन दोनों ने कमलदल पर साक्षात् खड़ी श्री पद्मा को देखा।

श्लोक 23 (12.235.23)

साऽवरुह्य विमानाग्रादङ्गनानामनुत्तमा । अभ्यागच्छत्त्रिलोकेशं शक्रं चर्षिं च नारदम् ॥

sā'varuhya vimānāgrādaṅganānāmanuttamā | abhyāgacchattrilokeśaṃ śakraṃ carṣiṃ ca nāradam

नारियों में सर्वश्रेष्ठ वे देवी विमान के अग्रभाग से उतरीं और त्रिलोकेश्वर इन्द्र तथा ऋषि नारद के पास आईं।

श्लोक 24 (12.235.24)

नारदानुगतः साक्षान्मघवांस्तामुपागमत् । कृताञ्जलिपुटो देवीं निवेद्यात्मानमात्मना ॥

nāradānugataḥ sākṣānmaghavāṃstāmupāgamat | kṛtāñjalipuṭo devīṃ nivedyātmānamātmanā

नारद के पीछे-पीछे स्वयं इन्द्र हाथ जोड़कर देवी के पास गए और स्वयं अपना परिचय देकर उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 25 (12.235.25)

चक्रे चानुपमां पूजां तस्याश्चापि स सर्ववित् । देवराजः श्रियं राजन्वाक्यं चेदमुवाच ह ॥

cakre cānupamāṃ pūjāṃ tasyāścāpi sa sarvavit | devarājaḥ śriyaṃ rājanvākyaṃ cedamuvāca ha

फिर उन सर्वज्ञ देवराज ने उनकी अनुपम पूजा की और हे राजन्! श्री से यह वचन कहा:

शक्र उवाच

श्लोक 26 (12.235.26)

का त्वं केन च कार्येण संप्राप्ता चारुहासिनि । कुतश्चागम्यते सुभ्रु गन्तव्यं क्व च ते शुभे ॥

kā tvaṃ kena ca kāryeṇa saṃprāptā cāruhāsini | kutaścāgamyate subhru gantavyaṃ kva ca te śubhe

हे सुन्दर मुस्कान वाली! तुम कौन हो और किस कार्य से आई हो? हे सुन्दर भौंहों वाली! तुम कहाँ से आ रही हो और हे शुभे! तुम्हें कहाँ जाना है?

श्रीरुवाच

श्लोक 27 (12.235.27)

पुण्येषु त्रिषु लोकेषु सर्वे स्थावरजङ्गमाः । ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मना ॥

puṇyeṣu triṣu lokeṣu sarve sthāvarajaṅgamāḥ | mamātmabhāvamicchanto yatante paramātmanā

तीनों पुण्य लोकों में समस्त स्थावर और जंगम प्राणी मेरी भावना को पाने की इच्छा से पूरी शक्ति लगाकर प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 28 (12.235.28)

साऽहं वै पङ्कजे जाता सूर्यरश्मिप्रबोधिते । भूत्यर्थं सर्वभूतानां पद्मा श्रीः पद्ममालिनी ॥

sā'haṃ vai paṅkaje jātā sūryaraśmiprabodhite | bhūtyarthaṃ sarvabhūtānāṃ padmā śrīḥ padmamālinī

मैं वही हूँ जो सूर्य की किरणों से खिले कमल में उत्पन्न हुई; सब प्राणियों के ऐश्वर्य के लिए मैं पद्मा, श्री और पद्ममालिनी हूँ।

श्लोक 29 (12.235.29)

अहं लक्ष्मीरहं भूतिः श्रीश्चाहं बलसूदन । अहं श्रद्धा च मेधा च सन्नतिर्विजितिः स्थितिः ॥

ahaṃ lakṣmīrahaṃ bhūtiḥ śrīścāhaṃ balasūdana | ahaṃ śraddhā ca medhā ca sannatirvijitiḥ sthitiḥ

हे बलसूदन! मैं लक्ष्मी हूँ, मैं भूति हूँ, मैं श्री हूँ; मैं श्रद्धा और मेधा हूँ, मैं सन्नति, विजिति और स्थिति हूँ।

श्लोक 30 (12.235.30)

अहं धृतिरहं सिद्धिरहं संभूतिरेव च । अहं स्वाहा स्वधा चैव संस्तुतिर्नियतिः कृतिः ॥

ahaṃ dhṛtirahaṃ siddhirahaṃ saṃbhūtireva ca | ahaṃ svāhā svadhā caiva saṃstutirniyatiḥ kṛtiḥ

मैं धृति हूँ, मैं सिद्धि हूँ, मैं सम्भूति हूँ; मैं स्वाहा और स्वधा हूँ, मैं स्तुति, नियति और कृति हूँ।

श्लोक 31 (12.235.31)

राज्ञां विजयमानानां सेनाग्रेषु ध्वजेषु च । निवसे धर्मशीलानां विषयेषु पुरेषु च ॥

rājñāṃ vijayamānānāṃ senāgreṣu dhvajeṣu ca | nivase dharmaśīlānāṃ viṣayeṣu pureṣu ca

मैं विजयी राजाओं के साथ, उनकी सेनाओं के अग्रभाग में और ध्वजाओं पर निवास करती हूँ, तथा धर्मशील लोगों के राज्यों और नगरों में भी रहती हूँ।

श्लोक 32 (12.235.32)

जितकाशिनि शूरे च संग्रामेष्वनिवर्तिनि । निवसामि मनुष्येन्द्रे सदैव बलसूदन ॥

jitakāśini śūre ca saṃgrāmeṣvanivartini | nivasāmi manuṣyendre sadaiva balasūdana

हे बलसूदन! जो नरेश विजय से सुशोभित, शूर और युद्धों में कभी पीछे न हटने वाला है, उसमें मैं सदा निवास करती हूँ।

श्लोक 33 (12.235.33)

धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि । प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥

dharmanitye mahābuddhau brahmaṇye satyavādini | praśrite dānaśīle ca sadaiva nivasāmyaham

जो धर्म में नित्य स्थित, महाबुद्धिमान्, ब्राह्मणों का भक्त, सत्यवादी, विनम्र और दानशील है, उसमें मैं सदा निवास करती हूँ।

श्लोक 34 (12.235.34)

असुरेष्ववसं पूर्वं सत्यधर्मनिबन्धनात् । विपरीतांस्तु तान्बुद्ध्वा त्वयि वासमरोचयम् ॥

asureṣvavasaṃ pūrvaṃ satyadharmanibandhanāt | viparītāṃstu tānbuddhvā tvayi vāsamarocayam

पहले मैं असुरों में रहती थी, क्योंकि वे सत्य और धर्म से बँधे थे; पर उन्हें उलटे मार्ग पर गया देखकर मैंने तुम्हारे यहाँ रहना पसन्द किया।

शक्र उवाच

श्लोक 35 (12.235.35)

कथं वृत्तेषु दैत्येषु त्वमवात्सीर्वरानने । दृष्ट्वा च किमिहागास्त्वं हित्वा दैतेयदानवान् ॥

kathaṃ vṛtteṣu daityeṣu tvamavātsīrvarānane | dṛṣṭvā ca kimihāgāstvaṃ hitvā daiteyadānavān

हे सुन्दर मुख वाली! दैत्य किस आचरण में रहे कि तुम उनके बीच रहीं? और ऐसा क्या देखकर तुम दैत्यों और दानवों को छोड़कर यहाँ आई हो?

श्रीरुवाच

श्लोक 36 (12.235.36)

स्वधर्ममनुतिष्ठत्सु धैर्यादचलितेषु च । स्वर्गमार्गाभिरामेषु सत्वेषु निरता ह्यहम् ॥

svadharmamanutiṣṭhatsu dhairyādacaliteṣu ca | svargamārgābhirāmeṣu satveṣu niratā hyaham

मैं उन प्राणियों में रमती थी जो अपने धर्म का पालन करते थे, धैर्य से विचलित नहीं होते थे और स्वर्ग के मार्ग में आनन्द लेते थे।

श्लोक 37 (12.235.37)

दानाध्ययनयज्ञेज्यापितृदैवतपूजनम् । गुरूणामतिथीनां च तेषां नित्यमवर्तत ॥

dānādhyayanayajñejyāpitṛdaivatapūjanam | gurūṇāmatithīnāṃ ca teṣāṃ nityamavartata

दान, अध्ययन, यज्ञ-पूजन, पितरों और देवताओं का सम्मान तथा गुरुओं और अतिथियों की सेवा, यह सब उनमें नित्य चलता था।

श्लोक 38 (12.235.38)

सुसंमृष्टगृहाश्चासञ्जितस्त्रीका हुताग्नयः । गुरुशुश्रूषका दान्ता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥

susaṃmṛṣṭagṛhāścāsañjitastrīkā hutāgnayaḥ | guruśuśrūṣakā dāntā brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ

वे अपने घर भली-भाँति स्वच्छ रखते थे, स्त्रियों के विषय में आत्मसंयमी थे, अग्नि में हवन करते थे, गुरुजनों की सेवा करते थे, जितेन्द्रिय, ब्राह्मण-भक्त और सत्यवादी थे।

श्लोक 39 (12.235.39)

श्रद्दधाना जितक्रोधा दानशीलाऽनसूयवः । भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ॥

śraddadhānā jitakrodhā dānaśīlā'nasūyavaḥ | bhṛtaputrā bhṛtāmātyā bhṛtadārā hyanīrṣavaḥ

वे श्रद्धावान्, क्रोध को जीतने वाले, दानशील और असूया से रहित थे; पुत्रों, मन्त्रियों और पत्नियों का पालन करते थे और ईर्ष्या नहीं रखते थे।

श्लोक 40 (12.235.40)

अमर्षेण न चान्योन्यं स्पृहयन्ते कदाचन । न च जातूपतप्यन्ति धीराः परसमृद्धिभिः ॥

amarṣeṇa na cānyonyaṃ spṛhayante kadācana | na ca jātūpatapyanti dhīrāḥ parasamṛddhibhiḥ

वे अधीर होकर कभी एक-दूसरे की वस्तुओं की लालसा नहीं करते थे, और धीर होने के कारण दूसरों की समृद्धि देखकर कभी कुढ़ते नहीं थे।

श्लोक 41 (12.235.41)

दातारः संग्रहीतार आर्याः करुणवेदिनः । महाप्रसादा ऋजवो दृढभक्ता जितेन्द्रियाः ॥

dātāraḥ saṃgrahītāra āryāḥ karuṇavedinaḥ | mahāprasādā ṛjavo dṛḍhabhaktā jitendriyāḥ

वे दाता और आश्रय देने वाले, श्रेष्ठ, करुणा को जानने वाले, बड़ी कृपा करने वाले, सरल, दृढ़ निष्ठा वाले और जितेन्द्रिय थे,

श्लोक 42 (12.235.42)

संतुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रियवादिनः । यथार्हमानार्थकरा ह्रीनिषेवा यतव्रताः ॥

saṃtuṣṭabhṛtyasacivāḥ kṛtajñāḥ priyavādinaḥ | yathārhamānārthakarā hrīniṣevā yatavratāḥ

उनके सेवक और मन्त्री सन्तुष्ट रहते थे; वे कृतज्ञ, प्रियभाषी, योग्यता के अनुसार मान और धन देने वाले, लज्जाशील और व्रतों में दृढ़ थे,

श्लोक 43 (12.235.43)

नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलङ्कृताः । उपवासतपः शीलाः प्रतीता ब्रह्मवादिनः ॥

nityaṃ parvasu susnātāḥ svanuliptāḥ svalaṅkṛtāḥ | upavāsatapaḥ śīlāḥ pratītā brahmavādinaḥ

जो पर्वों पर भली-भाँति स्नान करते, लेप लगाते और सुन्दर आभूषण पहनते थे, उपवास और तप में रत, प्रसिद्ध और ब्रह्मवादी थे।

श्लोक 44 (12.235.44)

नैनानभ्युदियात्सूर्यो नैवास्वप्स्यन्प्रगेशयाः । रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जयन् ॥

nainānabhyudiyātsūryo naivāsvapsyanprageśayāḥ | rātrau dadhi ca saktūṃśca nityameva vyavarjayan

सूर्य कभी उन्हें सोते हुए नहीं पाता था, वे प्रातःकाल कभी सोते नहीं रहते थे; और रात में दही तथा सत्तू को वे सदा त्यागे रहते थे।

श्लोक 45 (12.235.45)

काल्यं घृतं तु चान्वीक्ष्य प्रयता ब्रह्मवादिनः । मङ्गल्यान्यपि चापश्यन्ब्राह्मणांश्चाप्यपूजयन् ॥

kālyaṃ ghṛtaṃ tu cānvīkṣya prayatā brahmavādinaḥ | maṅgalyānyapi cāpaśyanbrāhmaṇāṃścāpyapūjayan

शुद्ध आचरण वाले वे ब्रह्मवादी प्रातःकाल घी का दर्शन करते, मंगलमय वस्तुओं को देखते और ब्राह्मणों का पूजन करते थे।

श्लोक 46 (12.235.46)

सदा हि ददतां धर्म्यं सदाचाप्रतिगृह्णताम् । अर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ॥

sadā hi dadatāṃ dharmyaṃ sadācāpratigṛhṇatām | ardhaṃ ca rātryāḥ svapatāṃ divā cāsvapatāṃ tathā

जो सदा धर्मसंगत दान देते थे और कभी दान ग्रहण नहीं करते थे, जो रात के आधे भाग में सोते थे और दिन में कभी नहीं सोते थे,

श्लोक 47 (12.235.47)

कृपणानाथवृद्धानां दुर्बलातुरयोषिताम् । दयां च संविभागं च नित्यमेवान्वमोदताम् । कालो यातः सुखेनैव धर्ममार्गे निवर्तताम् ॥

kṛpaṇānāthavṛddhānāṃ durbalāturayoṣitām | dayāṃ ca saṃvibhāgaṃ ca nityamevānvamodatām | kālo yātaḥ sukhenaiva dharmamārge nivartatām

और जो दीन, अनाथ और वृद्धों, दुर्बलों, रोगियों तथा स्त्रियों पर सदा दया करने और उनके साथ बाँटने में आनन्द मानते थे, उनका समय धर्म के मार्ग पर रहते हुए सुखपूर्वक बीतता था।

श्लोक 48 (12.235.48)

त्रस्तं विषण्णमुद्विग्नं भयार्तं व्याधिपीडितम् । हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासयन्ति ते ॥

trastaṃ viṣaṇṇamudvignaṃ bhayārtaṃ vyādhipīḍitam | hṛtasvaṃ vyasanārtaṃ ca nityamāśvāsayanti te

भयभीत, विषादग्रस्त, व्याकुल, भय से पीड़ित, रोग से व्यथित, जिनका धन छिन गया हो और जो विपत्ति से दुःखी हों, इन सबको वे सदा ढाढ़स बँधाते थे।

श्लोक 49 (12.235.49)

धर्ममेवानुवर्तन्ते न हिंसन्ति परस्परम् । अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ॥

dharmamevānuvartante na hiṃsanti parasparam | anukūlāśca kāryeṣu guruvṛddhopasevinaḥ

वे केवल धर्म का अनुसरण करते थे, एक-दूसरे को हानि नहीं पहुँचाते थे, कार्यों में एक-दूसरे के अनुकूल रहते थे और गुरुजनों तथा वृद्धों की सेवा करते थे।

श्लोक 50 (12.235.50)

पितॄन्देवातिथींश्चैव गुरूंश्चैवाभ्यपूजयन् । अवशेषाणि चाश्नन्ति नित्यं सत्यतपोधृताः ॥

pitṝndevātithīṃścaiva gurūṃścaivābhyapūjayan | avaśeṣāṇi cāśnanti nityaṃ satyatapodhṛtāḥ

वे पितरों, देवताओं, अतिथियों और गुरुओं का पूजन करते थे और सत्य तथा तप में दृढ़ रहकर सदा उनसे बचा हुआ अन्न ही खाते थे।

श्लोक 51 (12.235.51)

नैकेऽश्नन्ति सुसंपन्नं न गच्छन्ति परस्त्रियम् । सर्वभूतेष्ववर्तन्त यथाऽऽत्मनि दयां प्रति ॥

naike'śnanti susaṃpannaṃ na gacchanti parastriyam | sarvabhūteṣvavartanta yathā''tmani dayāṃ prati

उनमें कोई उत्तम भोजन अकेले नहीं खाता था, कोई परस्त्री के पास नहीं जाता था, और सब प्राणियों के प्रति वे अपने समान दया का व्यवहार करते थे।

श्लोक 52 (12.235.52)

नैवाकाशे न पशुषु नायोनौ च न पर्वसु । इन्द्रियस्य विसर्गं ते रोचयन्ति कदाचन ॥

naivākāśe na paśuṣu nāyonau ca na parvasu | indriyasya visargaṃ te rocayanti kadācana

वे खुले आकाश के नीचे, पशुओं में, अनुचित स्थान पर या पर्व के दिनों में वीर्यपात करना कभी पसन्द नहीं करते थे।

श्लोक 53 (12.235.53)

नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा । उत्साहोऽथानहंकारः परमं सौहृदं क्षमा ॥

nityaṃ dānaṃ tathā dākṣyamārjavaṃ caiva nityadā | utsāho'thānahaṃkāraḥ paramaṃ sauhṛdaṃ kṣamā

नित्य दान, कुशलता, सदा सरलता, उत्साह, अहंकार का अभाव, परम सौहार्द और क्षमा,

श्लोक 54 (12.235.54)

सत्यं दानं तपः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा । मित्रेषु चानभिद्रोहः सर्वं तेष्वभवत्प्रभो ॥

satyaṃ dānaṃ tapaḥ śaucaṃ kāruṇyaṃ vāganiṣṭhurā | mitreṣu cānabhidrohaḥ sarvaṃ teṣvabhavatprabho

सत्य, दान, तप, पवित्रता, करुणा, कोमल वाणी और मित्रों से द्रोह न करना, हे प्रभो! यह सब उनमें विद्यमान था।

श्लोक 55 (12.235.55)

निद्रा तन्द्रीरसंप्रीतिरसूयाऽथानवेक्षिता । अरतिश्च विषादश्च स्पृहा चाप्यविशन्न तान् ॥

nidrā tandrīrasaṃprītirasūyā'thānavekṣitā | aratiśca viṣādaśca spṛhā cāpyaviśanna tān

निद्रा, तन्द्रा, असन्तोष, असूया, असावधानी, उदासीनता, विषाद और लालसा उनमें प्रवेश नहीं करते थे।

श्लोक 56 (12.235.56)

साऽहमेवंगुणेष्वेव दानवेष्ववसं पुरा । प्रजासर्गमुपादाय यावद्गुणविपर्ययम् ॥

sā'hamevaṃguṇeṣveva dānaveṣvavasaṃ purā | prajāsargamupādāya yāvadguṇaviparyayam

इस प्रकार मैं ऐसे गुणों वाले दानवों में प्रजा की सृष्टि के समय से लेकर उनके गुणों के उलट जाने तक रहती आई।

श्लोक 57 (12.235.57)

ततः कालविपर्यासे तेषां गुणविपर्ययात् । अपश्यं निर्गतं धर्मं कामक्रोधवशात्मनाम् ॥

tataḥ kālaviparyāse teṣāṃ guṇaviparyayāt | apaśyaṃ nirgataṃ dharmaṃ kāmakrodhavaśātmanām

फिर समय के पलटने पर, उनके गुण उलट जाने से, मैंने देखा कि काम और क्रोध के वश में पड़े उन लोगों से धर्म निकल गया।

श्लोक 58 (12.235.58)

सभासदां च वृद्धानां सतां कथयतां कथाः । प्राहसन्नभ्यसूयंश्च सर्वबुद्धान्गुरून्परान् ॥

sabhāsadāṃ ca vṛddhānāṃ satāṃ kathayatāṃ kathāḥ | prāhasannabhyasūyaṃśca sarvabuddhāngurūnparān

जब सभा के वृद्ध और सज्जन लोग कथाएँ कह रहे होते, तब वे उन पर हँसते और ताने कसते थे, सब ज्ञानियों, गुरुजनों और अन्य लोगों पर भी।

श्लोक 59 (12.235.59)

युवानश्च समासीना वृद्धानपि गतान्सतः । नाभ्युत्थानाभिवादाभ्यां यथापूर्वमपूजयन् ॥

yuvānaśca samāsīnā vṛddhānapi gatānsataḥ | nābhyutthānābhivādābhyāṃ yathāpūrvamapūjayan

बैठे हुए युवक आए हुए सज्जन वृद्धों का भी पहले की तरह उठकर और अभिवादन करके सम्मान नहीं करते थे।

श्लोक 60 (12.235.60)

वर्तयत्येव पितरि पुत्रः प्रभवते तथा । अमित्रभृत्यतां प्राप्य ख्यापयन्त्यनपत्रपाः ॥

vartayatyeva pitari putraḥ prabhavate tathā | amitrabhṛtyatāṃ prāpya khyāpayantyanapatrapāḥ

पिता के जीवित रहते हुए पुत्र स्वामी बन बैठता था; और शत्रुओं की सेवकाई में पड़कर वे निर्लज्ज होकर उसका बखान करते थे।

श्लोक 61 (12.235.61)

तथा धर्मादपेतेन कर्मणा गर्हितेन ये । महतः प्राप्नुवन्त्यर्थांस्तेषां तत्राभवत्स्पृहा ॥

tathā dharmādapetena karmaṇā garhitena ye | mahataḥ prāpnuvantyarthāṃsteṣāṃ tatrābhavatspṛhā

और जो लोग धर्म से हटे हुए, निन्दित कर्मों से बड़ा धन पा लेते थे, उन्हीं की दूसरों में लालसा जागती थी।

श्लोक 62 (12.235.62)

उच्चैश्चाभ्यवदन्रात्रौ नीचैस्तत्राग्निरज्वलत् । पुत्राः पितॄनत्यचरन्नार्यश्चात्यचरन्पतीन् ॥

uccaiścābhyavadanrātrau nīcaistatrāgnirajvalat | putrāḥ pitṝnatyacarannāryaścātyacaranpatīn

रात में वे ऊँचे स्वर से बोलते थे, और वहाँ अग्नि धीमी जलती थी; पुत्र पिताओं का और स्त्रियाँ पतियों का उल्लंघन करती थीं।

श्लोक 63 (12.235.63)

मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् । गुरुत्वान्नाभ्यनन्दन्त कुमारान्नान्वपालयन् ॥

mātaraṃ pitaraṃ vṛddhamācāryamatithiṃ gurum | gurutvānnābhyanandanta kumārānnānvapālayan

माता, वृद्ध पिता, आचार्य, अतिथि और गुरु का वे अपने अभिमान के कारण स्वागत नहीं करते थे और बालकों का पालन नहीं करते थे।

श्लोक 64 (12.235.64)

भिक्षां बलिमदत्त्वा च स्वयमन्नानि भुञ्जते । अनिष्ट्वाऽसंविभज्याथ पितृदेवातिथीन्गुरून् ॥

bhikṣāṃ balimadattvā ca svayamannāni bhuñjate | aniṣṭvā'saṃvibhajyātha pitṛdevātithīngurūn

वे भिक्षा और बलि दिए बिना, पितरों, देवताओं, अतिथियों और गुरुओं के लिए यज्ञ और विभाग किए बिना, स्वयं ही अन्न खा जाते थे।

श्लोक 65 (12.235.65)

न शौचमन्वरुद्ध्यन्त तेषां सूदजनास्तथा । मनसा कर्मणा वाचा भक्ष्यमासीदनावृतम् ॥

na śaucamanvaruddhyanta teṣāṃ sūdajanāstathā | manasā karmaṇā vācā bhakṣyamāsīdanāvṛtam

उनके रसोइए और सेवक भी शुद्धता का पालन नहीं करते थे; मन, कर्म और वाणी, तीनों से उनका भोजन खुला ही पड़ा रहता था।

श्लोक 66 (12.235.66)

बालानां प्रेक्षमाणानां भक्तान्यश्नन्ति मोहिताः । एको दासो भवेत्तेषां तेषां दासीद्वयं तथा ॥

bālānāṃ prekṣamāṇānāṃ bhaktānyaśnanti mohitāḥ | eko dāso bhavetteṣāṃ teṣāṃ dāsīdvayaṃ tathā

मोहित होकर वे बालकों के देखते हुए भोजन करते थे। उनमें किसी के पास एक दास होता, तो किसी के पास दो दासियाँ।

श्लोक 67 (12.235.67)

त्रिगवा दानवाः केचिच्चतुरोजास्तथा परे । षडश्वाः सप्तमातङ्गाः पञ्चमाहिषिकाः परे ॥

trigavā dānavāḥ keciccaturojāstathā pare | ṣaḍaśvāḥ saptamātaṅgāḥ pañcamāhiṣikāḥ pare

कुछ दानवों के पास तीन गायें थीं, कुछ के पास चार बकरियाँ; किसी के पास छह घोड़े, किसी के पास सात हाथी और कुछ के पास पाँच भैंसें थीं।

श्लोक 68 (12.235.68)

रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेवाविवर्जिताः । अन्तर्दशाहे चाश्नन्ति गवां क्षीरं विचेतनाः ॥

rātrau dadhi ca saktūṃśca nityamevāvivarjitāḥ | antardaśāhe cāśnanti gavāṃ kṣīraṃ vicetanāḥ

वे रात में दही और सत्तू कभी नहीं छोड़ते थे, और विवेकहीन होकर बछड़ा जनने के दस दिन के भीतर ही गायों का दूध पी लेते थे।

श्लोक 69 (12.235.69)

क्रमदोहं न कुर्वन्ति वत्सस्तन्यानि भुञ्जते । अनाथां कृपणां भार्यां घ्नन्ति नित्यं शपन्ति च ॥

kramadohaṃ na kurvanti vatsastanyāni bhuñjate | anāthāṃ kṛpaṇāṃ bhāryāṃ ghnanti nityaṃ śapanti ca

वे क्रम से दूध नहीं दुहते थे और बछड़े का हिस्सा भी खा जाते थे; अपनी असहाय, दीन पत्नियों को वे नित्य मारते और कोसते थे।

श्लोक 70 (12.235.70)

शूद्रान्नपुष्टा विप्रास्तु निर्लज्जाश्च भवन्त्युत । संकीर्णानि च धान्यानि नात्यवेक्षत्कुटुंबिनी ॥

śūdrānnapuṣṭā viprāstu nirlajjāśca bhavantyuta | saṃkīrṇāni ca dhānyāni nātyavekṣatkuṭuṃbinī

शूद्र के अन्न से पुष्ट हुए ब्राह्मण निर्लज्ज हो गए; और गृहिणी आपस में मिले हुए अनाज की देखभाल नहीं करती थी।

श्लोक 71 (12.235.71)

मार्जारकुक्कुटश्वानैः क्रीडां कुर्वन्ति मानवाः । गृहे कण्टकिनो वृक्षास्तथा निष्पाववल्लरी ॥

mārjārakukkuṭaśvānaiḥ krīḍāṃ kurvanti mānavāḥ | gṛhe kaṇṭakino vṛkṣāstathā niṣpāvavallarī

लोग बिल्लियों, मुर्गों और कुत्तों के साथ खेलते थे; उनके घरों में काँटेदार वृक्ष और सेम की बेलें उगी रहती थीं।

श्लोक 72 (12.235.72)

यज्ञियाश्च तथा वृक्षास्तेषामासन्दुरात्मनाम् । कूपस्नानरता नित्यं पर्वमैथुनगामिनः ॥

yajñiyāśca tathā vṛkṣāsteṣāmāsandurātmanām | kūpasnānaratā nityaṃ parvamaithunagāminaḥ

उन दुष्ट मन वालों के यहाँ यज्ञ के योग्य वृक्ष भी वैसे ही पड़े रहते थे; वे सदा कुएँ पर नहाने में रमे रहते और पर्व के दिनों में भी स्त्री-संग करते थे।

श्लोक 73 (12.235.73)

तिलानश्नन्ति रात्रौ च तैलाभ्यक्ताश्च शेरते । विभीतककरञ्जानां छायामूलनिवासिनः ॥

tilānaśnanti rātrau ca tailābhyaktāśca śerate | vibhītakakarañjānāṃ chāyāmūlanivāsinaḥ

वे रात में तिल खाते और तेल लगाकर सोते थे, तथा बहेड़ा और करंज के वृक्षों की जड़ों की छाया में रहते थे।

श्लोक 74 (12.235.74)

करवीरं च ते पुष्पं धारयन्ति च मोहिताः । पद्मबीजानि खादन्ति पुष्पं जिघ्रन्ति मोहिताः ॥

karavīraṃ ca te puṣpaṃ dhārayanti ca mohitāḥ | padmabījāni khādanti puṣpaṃ jighranti mohitāḥ

मोह में पड़े हुए वे कनेर के फूल धारण करते, कमल के बीज खाते और मोहग्रस्त होकर फूल सूँघा करते थे।

श्लोक 75 (12.235.75)

न भोक्ष्यन्ति तथा नित्यं दैत्याः कालेन मोहिताः । निन्दन्ति स्तवनं विष्णोस्तस्य नित्यद्विषो जनाः ॥

na bhokṣyanti tathā nityaṃ daityāḥ kālena mohitāḥ | nindanti stavanaṃ viṣṇostasya nityadviṣo janāḥ

काल से मोहित हुए दैत्य पहले की तरह नियम से भोजन नहीं करते थे; और विष्णु से सदा द्वेष रखने वाले लोग उनकी स्तुति की निन्दा करते थे।

श्लोक 76 (12.235.76)

होमधूमो न तत्रासीद्वेदघोषस्तथैव च । यज्ञाश्च न प्रवर्तन्ते यथापूर्वं गृहेगृहे ॥

homadhūmo na tatrāsīdvedaghoṣastathaiva ca | yajñāśca na pravartante yathāpūrvaṃ gṛhegṛhe

वहाँ हवन का धुआँ नहीं उठता था, वेद का घोष भी नहीं सुनाई देता था; हर घर में पहले की तरह यज्ञ नहीं होते थे।

श्लोक 77 (12.235.77)

शिष्याचार्यक्रमो नासीत्पुत्रैरात्मपितुः पिता । विष्णुं ब्रह्मण्यदेवेशं हित्वा पाषण्डमाश्रिताः ॥

śiṣyācāryakramo nāsītputrairātmapituḥ pitā | viṣṇuṃ brahmaṇyadeveśaṃ hitvā pāṣaṇḍamāśritāḥ

शिष्य और आचार्य का क्रम नहीं रहा, और पुत्र अपने पिता के पिता के सामने अपनी मर्यादा में नहीं रहे। ब्राह्मणों के हितैषी देवेश्वर विष्णु को छोड़कर वे पाखण्ड की शरण में चले गए।

श्लोक 78 (12.235.78)

हव्यकव्यविहीनाश्च ज्ञानाध्ययनवर्जिताः । देवस्वादानरुचयो ब्रह्मस्वरुचयस्तथा । स्तुतिमङ्गलहीनानि देवस्थानानि सर्वशः ॥

havyakavyavihīnāśca jñānādhyayanavarjitāḥ | devasvādānarucayo brahmasvarucayastathā | stutimaṅgalahīnāni devasthānāni sarvaśaḥ

वे देवों और पितरों के हव्य-कव्य से रहित और ज्ञान तथा अध्ययन से हीन थे; देवताओं और ब्राह्मणों की सम्पत्ति हड़पने में उन्हें रुचि थी; और देवालय सब जगह स्तुति और मंगलाचार से शून्य हो गए थे।

श्लोक 79 (12.235.79)

विप्रकीर्णानि धान्यानि काकमूषिकभोजनम् । अपावृतं पयोतिष्ठदुच्छिष्टाश्चास्पृशन्घृतम् ॥

viprakīrṇāni dhānyāni kākamūṣikabhojanam | apāvṛtaṃ payotiṣṭhaducchiṣṭāścāspṛśanghṛtam

अनाज बिखरा पड़ा रहता था और कौओं तथा चूहों का भोजन बनता था; दूध खुला रखा रहता था, और जूठे हाथों से वे घी को छू लेते थे।

श्लोक 80 (12.235.80)

कुद्दालं दात्रपिटकं प्रकीर्णं कांस्यभोजनम् । द्रव्योपकरणं सर्वं नान्ववैक्षत्कुटुम्बिनी ॥

kuddālaṃ dātrapiṭakaṃ prakīrṇaṃ kāṃsyabhojanam | dravyopakaraṇaṃ sarvaṃ nānvavaikṣatkuṭumbinī

कुदाल, हँसिया, टोकरी, इधर-उधर पड़े काँसे के बर्तन और घर का सारा सामान, इनकी गृहिणी देखभाल नहीं करती थी।

श्लोक 81 (12.235.81)

प्राकारागारविध्वंसान्न स्म ते प्रतिकुर्वते । क्षुद्राः संस्कारहीनाश्च नार्यो ह्युदरपोषणाः ॥

prākārāgāravidhvaṃsānna sma te pratikurvate | kṣudrāḥ saṃskārahīnāśca nāryo hyudarapoṣaṇāḥ

वे अपनी टूटी चहारदीवारियों और घरों की मरम्मत नहीं करते थे। और वहाँ की स्त्रियाँ क्षुद्र, संस्कारहीन और केवल पेट भरने में लगी रहती थीं,

श्लोक 82 (12.235.82)

शौचाचारपरिभ्रष्टा निर्लज्जा भोगवञ्चिताः । उभाभ्यामेव पाणिभ्यां शिरः कण्डूयनान्विताः । गृहजालाभिसंस्थाना ह्यासंस्तत्र स्त्रियः पुनः ॥

śaucācāraparibhraṣṭā nirlajjā bhogavañcitāḥ | ubhābhyāmeva pāṇibhyāṃ śiraḥ kaṇḍūyanānvitāḥ | gṛhajālābhisaṃsthānā hyāsaṃstatra striyaḥ punaḥ

शौच और सदाचार से भ्रष्ट, निर्लज्ज, सच्चे भोग से वंचित, दोनों हाथों से सिर खुजलाती हुई, और घरों की जालियों के पास आ बैठती थीं।

श्लोक 83 (12.235.83)

श्वश्रूश्वशुरयोर्मध्ये भर्तारं कृतकं यथा । प्रेक्षयन्ति च निर्लज्जा नार्यः कुलजलक्षणाः ॥

śvaśrūśvaśurayormadhye bhartāraṃ kṛtakaṃ yathā | prekṣayanti ca nirlajjā nāryaḥ kulajalakṣaṇāḥ

सास और ससुर के बीच वे निर्लज्ज स्त्रियाँ, कुलीन होने के लक्षण रखते हुए भी, अपने पति को कठपुतली की तरह दिखाती फिरती थीं।

श्लोक 84 (12.235.84)

नाद्रियन्ते पशून्बद्ध्वा यवसेनोदकेन च । बालानां प्रेक्षमाणानां स्वयं भक्ष्यमभक्षयन् । तथा भृत्यजनं सर्वमसंतर्प्य च दानवाः ॥

nādriyante paśūnbaddhvā yavasenodakena ca | bālānāṃ prekṣamāṇānāṃ svayaṃ bhakṣyamabhakṣayan | tathā bhṛtyajanaṃ sarvamasaṃtarpya ca dānavāḥ

वे पशुओं को बाँधकर उन्हें चारा और पानी देने की परवाह नहीं करते थे; बालकों के देखते हुए वे स्वयं भोजन खा जाते थे, और दानव अपने सब आश्रितों को बिना तृप्त किए ही रहने देते थे।

श्लोक 85 (12.235.85)

पायसं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः । अपाचयन्नात्मनोऽर्थे वृथा मांसान्यभक्षयन् ॥

pāyasaṃ kṛsaraṃ māṃsamapūpānatha śaṣkulīḥ | apācayannātmano'rthe vṛthā māṃsānyabhakṣayan

खीर, खिचड़ी, मांस, पूए और पकौड़ियाँ वे केवल अपने लिए पकाते थे, और व्यर्थ ही मांस खाते थे।

श्लोक 86 (12.235.86)

उत्सूर्यशायिनश्चासन्सर्वे चासन्प्रगेशयाः । आवृत्तकलहाश्चात्र दिवारात्रं गृहेगृहे ॥

utsūryaśāyinaścāsansarve cāsanprageśayāḥ | āvṛttakalahāścātra divārātraṃ gṛhegṛhe

वे सूर्योदय के बाद तक सोते रहते थे और सभी प्रातःकाल सोए रहते थे; और हर घर में दिन-रात झगड़े चलते रहते थे।

श्लोक 87 (12.235.87)

अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह । आश्रमस्थान्विकर्मस्थाः प्राद्विषन्त परस्परम् ॥

anāryāścāryamāsīnaṃ paryupāsanna tatra ha | āśramasthānvikarmasthāḥ prādviṣanta parasparam

नीच लोग अपने बीच बैठे श्रेष्ठ पुरुष की सेवा नहीं करते थे; जो निषिद्ध कर्म करते थे, वे आश्रमों में स्थित लोगों से द्वेष रखते थे, और आपस में भी वैर करते थे।

श्लोक 88 (12.235.88)

संकराश्चाभ्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत । ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये । निरन्तरविशेषास्ते बहुमानावमानयोः ॥

saṃkarāścābhyavartanta na ca śaucamavartata | ye ca vedavido viprā vispaṣṭamanṛcaśca ye | nirantaraviśeṣāste bahumānāvamānayoḥ

वर्णसंकर फैल गया और शुद्धता नहीं रही। जो ब्राह्मण वेद के ज्ञाता थे और जो स्पष्ट ही ऋचाओं से अनभिज्ञ थे, वे मान और अपमान में एक-से हो गए, उनमें कोई भेद नहीं रहा।

श्लोक 89 (12.235.89)

भावमाभरणं वेषं गतं स्थितमवेक्षितम् । असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् ॥

bhāvamābharaṇaṃ veṣaṃ gataṃ sthitamavekṣitam | asevanta bhujiṣyā vai durjanācaritaṃ vidhim

दासियाँ दुष्टजनों के भाव, आभूषण, वेश, चाल, ठहरने के ढंग और चितवन, उनकी पूरी रीति को अपनाने लगीं।

श्लोक 90 (12.235.90)

स्त्रियः पुरुषवेषेण पुंसः स्त्रीवेषधारिणः । क्रीडारतिविहारेषु परां मुदमवाप्नुवन् ॥

striyaḥ puruṣaveṣeṇa puṃsaḥ strīveṣadhāriṇaḥ | krīḍārativihāreṣu parāṃ mudamavāpnuvan

पुरुष-वेश धारण करने वाली स्त्रियाँ और स्त्री-वेश धारण करने वाले पुरुष क्रीड़ा, रति और विहार में परम आनन्द पाते थे।

श्लोक 91 (12.235.91)

प्रभवद्भिः पुरा दायानर्हेभ्यः प्रतिपादितान् । नाभ्यवर्तन्त नास्तिक्याद्वर्तन्तः संभवेष्वपि ॥

prabhavadbhiḥ purā dāyānarhebhyaḥ pratipāditān | nābhyavartanta nāstikyādvartantaḥ saṃbhaveṣvapi

समर्थ लोगों ने पहले योग्य पात्रों को जो अंश दिए थे, उनका नास्तिकता के कारण वे लोग भी सम्मान नहीं करते थे, जिनके पास देने के साधन थे।

श्लोक 92 (12.235.92)

मित्रेणाभ्यर्थितं द्रव्यमर्थी संश्रयते क्वचित् । वालकोट्यग्रमात्रेण स्वार्थेनाघ्नत तद्वसु ॥

mitreṇābhyarthitaṃ dravyamarthī saṃśrayate kvacit | vālakoṭyagramātreṇa svārthenāghnata tadvasu

जब मित्र मित्र से धन माँगता और कभी वह जरूरतमंद उसके पास आ भी जाता, तब भी बाल की नोक जितने स्वार्थ के लिए वे उस धन को हड़प जाते थे।

श्लोक 93 (12.235.93)

परस्वादानरुचयो विपणव्यवहारिणः । अदृश्यन्तार्यवर्णेषु शूद्राश्चापि तपोधनाः ॥

parasvādānarucayo vipaṇavyavahāriṇaḥ | adṛśyantāryavarṇeṣu śūdrāścāpi tapodhanāḥ

वे दूसरों का धन लेने में रुचि रखते थे और बाजार का व्यवहार करते थे; और आर्य वर्णों में शूद्र भी तपस्वी के रूप में दिखाई देने लगे।

श्लोक 94 (12.235.94)

अधीयन्तेऽव्रताः केचिद्वृथा व्रतमथापरे । अशुश्रूषुर्गुरोः शिष्यः कश्चिच्छिष्यसखो गुरुः ॥

adhīyante'vratāḥ kecidvṛthā vratamathāpare | aśuśrūṣurguroḥ śiṣyaḥ kaścicchiṣyasakho guruḥ

कुछ बिना व्रत के अध्ययन करते थे, कुछ व्यर्थ ही व्रत रखते थे; शिष्य गुरु की सेवा नहीं करता था और कोई गुरु शिष्यों का सखा बन जाता था।

श्लोक 95 (12.235.95)

पिता चैव जनित्री च श्रान्तौ वृत्तोत्सवाविव । अप्रभुत्वे स्थितौ वृद्धावन्नं प्रार्थयतः सुतान् ॥

pitā caiva janitrī ca śrāntau vṛttotsavāviva | aprabhutve sthitau vṛddhāvannaṃ prārthayataḥ sutān

माता-पिता, उत्सव समाप्त हो चुके लोगों की तरह थके हुए, वृद्ध और अधिकारहीन होकर अपने पुत्रों से अन्न की याचना करते थे।

श्लोक 96 (12.235.96)

तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः । कृष्यादिष्वभवन्सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ॥

tatra vedavidaḥ prājñā gāmbhīrye sāgaropamāḥ | kṛṣyādiṣvabhavansaktā mūrkhāḥ śrāddhānyabhuñjata

समुद्र जैसी गम्भीरता वाले वेदज्ञ विद्वान् भी खेती आदि में लग गए, और मूर्ख श्राद्धों में भोजन करने लगे।

श्लोक 97 (12.235.97)

प्रातः सायं च सुप्रश्नं कल्पनं प्रेषणक्रियाः । शिष्यानुप्रहितास्तेषामकुर्वन्गुरवश्च ह ॥

prātaḥ sāyaṃ ca supraśnaṃ kalpanaṃ preṣaṇakriyāḥ | śiṣyānuprahitāsteṣāmakurvanguravaśca ha

प्रातः और सायं गुरु लोग शिष्यों के लिए कुशल-प्रश्न, तैयारी और वे काम करते थे जिनके लिए शिष्य उन्हें भेजते थे।

श्लोक 98 (12.235.98)

श्वश्रूश्वशुरयोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत । अन्वशासच्च भर्तारं समाह्वायाभिजल्पति ॥

śvaśrūśvaśurayoragre vadhūḥ preṣyānaśāsata | anvaśāsacca bhartāraṃ samāhvāyābhijalpati

सास और ससुर के सामने वधू सेवकों को आज्ञा देती थी; वह पति को भी आदेश देती और उसे बुलाकर बकझक करती थी।

श्लोक 99 (12.235.99)

प्रयत्नेनापि चारक्षच्चित्तं पुत्रस्य वै पिता । व्यभजच्चापि संरम्भाद्दुःखवासं तथाऽवसत् ॥

prayatnenāpi cārakṣaccittaṃ putrasya vai pitā | vyabhajaccāpi saṃrambhādduḥkhavāsaṃ tathā'vasat

यत्नपूर्वक पुत्र के मन की रक्षा करने पर भी पिता क्रोध में आकर उससे अलग हो जाता और दुःख में जीवन बिताता था।

श्लोक 100 (12.235.100)

अग्निदाहेन चोरैर्वा राजभिर्वा हृतं धनम् । दृष्ट्वा द्वेषात्प्राहसन्त सुहृत्संभाविता ह्यपि ॥

agnidāhena corairvā rājabhirvā hṛtaṃ dhanam | dṛṣṭvā dveṣātprāhasanta suhṛtsaṃbhāvitā hyapi

जब किसी का धन आग, चोरों या राजाओं द्वारा छिन जाता, तो यह देखकर द्वेष के कारण वे हँसते थे, यहाँ तक कि वे भी जिन्हें मित्र आदर देते थे।

श्लोक 101 (12.235.101)

कृतघ्ना नास्तिकाः पापा गुरुदाराभिमर्शिनः । श्वशुरानुगताः सर्वे ह्युत्सृज्य पितरौ सुताः ॥

kṛtaghnā nāstikāḥ pāpā gurudārābhimarśinaḥ | śvaśurānugatāḥ sarve hyutsṛjya pitarau sutāḥ

कृतघ्न, नास्तिक, पापी, गुरु की स्त्रियों से दुराचार करने वाले, ससुर के अनुयायी बनकर माता-पिता दोनों को छोड़ देने वाले पुत्र,

श्लोक 102 (12.235.102)

स्वकर्मणा च जातोऽहमित्येवंवादिनस्तथा । अभक्ष्यभक्षणरता निर्मर्यादा हतत्विषः ॥

svakarmaṇā ca jāto'hamityevaṃvādinastathā | abhakṣyabhakṣaṇaratā nirmaryādā hatatviṣaḥ

"मैं अपने कर्म से उत्पन्न हुआ हूँ" ऐसा कहने वाले, अभक्ष्य खाने में रत, मर्यादाहीन और तेजहीन हो गए,

श्लोक 103 (12.235.103)

तेष्वेवमादीनाचारानाचरत्सु विपर्यये । नाहं देवेन्द्र वत्स्यामि दानवेष्विति मे मतिः ॥

teṣvevamādīnācārānācaratsu viparyaye | nāhaṃ devendra vatsyāmi dānaveṣviti me matiḥ

जब वे इस प्रकार के उलटे आचरण करने लगे, तो मेरा निश्चय हो गया कि हे देवेन्द्र! मैं दानवों में नहीं रहूँगी।

श्लोक 104 (12.235.104)

तन्मां स्वयमनुप्राप्तामभिनन्द शचीपते । त्वयाऽर्चितां मां देवेश पुरो धास्यन्ति देवताः ॥

tanmāṃ svayamanuprāptāmabhinanda śacīpate | tvayā'rcitāṃ māṃ deveśa puro dhāsyanti devatāḥ

इसलिए हे शचीपते! स्वयं आई हुई मेरा स्वागत कीजिए। हे देवेश! आपसे सम्मानित होने पर देवता मुझे अपने आगे रखेंगे।

श्लोक 105 (12.235.105)

यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः । सप्तदेव्यो मयाष्टम्यो वासमेष्यन्ति तेऽष्टधा ॥

yatrāhaṃ tatra matkāntā madviśiṣṭā madarpaṇāḥ | saptadevyo mayāṣṭamyo vāsameṣyanti te'ṣṭadhā

जहाँ मैं रहती हूँ, वहाँ मेरी प्रिय सहचरियाँ भी रहेंगी, जो मुझसे विशिष्ट हैं और मुझमें समर्पित हैं: सात देवियाँ, आठवीं मैं, आठ रूपों में निवास करने आएँगी।

श्लोक 106 (12.235.106)

आशा श्रद्धा धृतिः क्षान्तिर्विजितिः सन्नतिः क्षमा । अष्टमी वृत्तिरेतासां पुरोगा पाकशासन ॥

āśā śraddhā dhṛtiḥ kṣāntirvijitiḥ sannatiḥ kṣamā | aṣṭamī vṛttiretāsāṃ purogā pākaśāsana

आशा, श्रद्धा, धृति, क्षान्ति, विजिति, सन्नति और क्षमा; और आठवीं वृत्ति है, जो हे पाकशासन! इन सबकी अग्रगामिनी है।

श्लोक 107 (12.235.107)

ताश्चाहं चासुरांस्त्यक्त्वा युष्मद्विषयमागताः । त्रिदशेषु निवत्स्यामो धर्मनिष्ठान्तरात्मसु ॥

tāścāhaṃ cāsurāṃstyaktvā yuṣmadviṣayamāgatāḥ | tridaśeṣu nivatsyāmo dharmaniṣṭhāntarātmasu

वे सब और मैं असुरों को छोड़कर आपके राज्य में आई हैं। हम उन देवताओं के बीच रहेंगी जिनके अन्तःकरण धर्म में स्थिर हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 108 (12.235.108)

इत्युक्तवचनां देवीं प्रीत्यर्थं च ननन्दतुः । नारदश्चात्र देवर्षिर्वृत्रहन्ता च वासवः ॥

ityuktavacanāṃ devīṃ prītyarthaṃ ca nanandatuḥ | nāradaścātra devarṣirvṛtrahantā ca vāsavaḥ

इस प्रकार कहने वाली देवी को प्रसन्न करने के लिए देवर्षि नारद और वृत्रहन्ता इन्द्र दोनों ने आनन्द प्रकट किया।

श्लोक 109 (12.235.109)

ततोऽनलसखो वायुः प्रववौ देववर्त्मसु । इष्टगन्धः सुखस्पर्शः सर्वेन्द्रियसुखावहः ॥

tato'nalasakho vāyuḥ pravavau devavartmasu | iṣṭagandhaḥ sukhasparśaḥ sarvendriyasukhāvahaḥ

तब अग्नि के मित्र वायु देवताओं के मार्गों में बहने लगे, सुगन्धित, सुखद स्पर्श वाले और सब इन्द्रियों को सुख देने वाले।

श्लोक 110 (12.235.110)

शुचौ चाभ्यर्थिते देशे त्रिदशाः प्रायशः स्थिताः । लक्ष्मीसहितमासीनं मघवन्तं दिदृक्षवः ॥

śucau cābhyarthite deśe tridaśāḥ prāyaśaḥ sthitāḥ | lakṣmīsahitamāsīnaṃ maghavantaṃ didṛkṣavaḥ

उस शुद्ध और अभीष्ट स्थान में लक्ष्मी के साथ बैठे इन्द्र को देखने की इच्छा से देवता अधिकांश रूप में एकत्र खड़े थे।

श्लोक 111 (12.235.111)

ततो दिवं प्राप्य सहस्रलोचनः । स्त्रियोपपन्नः सुहृदा महर्षिणा । रथेन हर्यश्वयुजा सुरर्षभः । सदः सुराणामभिसत्कृतो ययौ ॥

tato divaṃ prāpya sahasralocanaḥ | striyopapannaḥ suhṛdā maharṣiṇā | rathena haryaśvayujā surarṣabhaḥ | sadaḥ surāṇāmabhisatkṛto yayau

तब सहस्रलोचन इन्द्र अपनी स्त्री और मित्र महर्षि के साथ हरे घोड़ों से जुते रथ पर स्वर्ग पहुँचे, और देवताओं में श्रेष्ठ वे सत्कार पाकर देवताओं की सभा में गए।

श्लोक 112 (12.235.112)

अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारदः । श्रियश्च देव्या मनसा विचारयन् । श्रियै शशंसामरदृष्टपौरुषः । शिवेन तत्रागमनं महर्षिभिः ॥

atheṅgitaṃ vajradharasya nāradaḥ | śriyaśca devyā manasā vicārayan | śriyai śaśaṃsāmaradṛṣṭapauruṣaḥ | śivena tatrāgamanaṃ maharṣibhiḥ

तब नारद ने, जिनका पराक्रम अमर देवताओं ने देखा था, वज्रधारी इन्द्र और देवी श्री के अभिप्राय को मन में विचारकर श्री को महर्षियों सहित वहाँ अपने शुभ आगमन की सूचना दी।

श्लोक 113 (12.235.113)

ततोऽमृतं द्यौः प्रववर्ष भास्वती । पितामहस्यायतने स्वयंभुवः । अनाहता दुन्दुभयोऽथ नेदिरे । तथा प्रसन्नाश्च दिशश्चकाशिरे ॥

tato'mṛtaṃ dyauḥ pravavarṣa bhāsvatī | pitāmahasyāyatane svayaṃbhuvaḥ | anāhatā dundubhayo'tha nedire | tathā prasannāśca diśaścakāśire

तब दीप्तिमान् आकाश ने स्वयम्भू पितामह के भवन पर अमृत बरसाया; बिना बजाए नगाड़े बज उठे और दिशाएँ निर्मल होकर चमक उठीं।

श्लोक 114 (12.235.114)

यथर्तु सस्येषु ववर्ष वासवो । न धर्ममार्गाद्विचचाल कश्चन । अनेकरत्नाकरभूषणा च भूः । सुघोषघोषाश्च दिवौकसां जये ॥

yathartu sasyeṣu vavarṣa vāsavo | na dharmamārgādvicacāla kaścana | anekaratnākarabhūṣaṇā ca bhūḥ | sughoṣaghoṣāśca divaukasāṃ jaye

इन्द्र ने ऋतु के अनुसार खेतों में वर्षा की; कोई भी धर्म के मार्ग से विचलित नहीं हुआ; और अनेक रत्नों की खानों से विभूषित पृथ्वी स्वर्गवासियों की विजय पर मधुर घोष से गूँज उठी।

श्लोक 115 (12.235.115)

क्रियाभिरामा मनुजा मनस्विनो । बभुः शुभे पुण्यकृतां पथि स्थिताः । नरामराः किन्नरयक्षराक्षसाः । समृद्धिमन्तः सुमनस्विनोऽभवन् ॥

kriyābhirāmā manujā manasvino | babhuḥ śubhe puṇyakṛtāṃ pathi sthitāḥ | narāmarāḥ kinnarayakṣarākṣasāḥ | samṛddhimantaḥ sumanasvino'bhavan

सत्कर्मों में रमने वाले उदार मनुष्य पुण्यात्माओं के शुभ मार्ग पर स्थित होकर शोभित हुए; मनुष्य, देवता, किन्नर, यक्ष और राक्षस सभी समृद्ध और प्रसन्नचित्त हो गए।

श्लोक 116 (12.235.116)

न जात्वकाले कुसुमं कुतः फलं । पपात वृक्षात्पवनेरितादपि । रसप्रदाः कामदुघाश्च धेनवो । न दारुणा वाग्विचचार कस्यचित् ॥

na jātvakāle kusumaṃ kutaḥ phalaṃ | papāta vṛkṣātpavaneritādapi | rasapradāḥ kāmadughāśca dhenavo | na dāruṇā vāgvicacāra kasyacit

वायु से हिलाए जाने पर भी वृक्ष से असमय कभी फूल नहीं गिरा, फल की तो बात ही क्या; गायें रसदायिनी और कामधेनु जैसी हो गईं; और किसी के मुख से कठोर वाणी नहीं निकली।

श्लोक 117 (12.235.117)

इमां सपर्यां सह सर्वकामदैः । श्रियाश्च शक्रप्रमुखैश्च दैवतैः । पठन्ति ये विप्रसदः समागताः । समृद्धकामाः श्रियमाप्नुवन्ति ते ॥

imāṃ saparyāṃ saha sarvakāmadaiḥ | śriyāśca śakrapramukhaiśca daivataiḥ | paṭhanti ye viprasadaḥ samāgatāḥ | samṛddhakāmāḥ śriyamāpnuvanti te

जो लोग विद्वानों की सभा में एकत्र होकर सब कामनाएँ पूर्ण करने वालों के साथ श्री और इन्द्र आदि देवताओं की इस पूजा-कथा का पाठ करते हैं, वे समृद्ध मनोरथ वाले होकर श्री को पाते हैं।

श्लोक 118 (12.235.118)

त्वया कुरूणां वर यत्प्रचोदितं । भवाभवस्येह परं निदर्शनम् । तदद्य सर्वं परिकीर्तितं मया । परीक्ष्य तत्त्वं परिगन्तुमर्हसि ॥

tvayā kurūṇāṃ vara yatpracoditaṃ | bhavābhavasyeha paraṃ nidarśanam | tadadya sarvaṃ parikīrtitaṃ mayā | parīkṣya tattvaṃ parigantumarhasi

हे कुरुश्रेष्ठ! तुमने इस लोक में उन्नति और पतन के विषय में जो पूछा था, उसका सबसे बड़ा उदाहरण मैंने अब पूरा कह सुनाया। इसके तत्त्व की परीक्षा करके तुम्हें इसे समझ लेना चाहिए।

श्लोक 119 (12.235.119)

संस्मृत्य बुद्धीन्द्रियगोचरातिगं । स्वगोचरे सर्वकृतालयं तम् । हरिं महापापहरं जनास्ते । संस्मृत्य संपूज्य विधूतपापाः ॥

saṃsmṛtya buddhīndriyagocarātigaṃ | svagocare sarvakṛtālayaṃ tam | hariṃ mahāpāpaharaṃ janāste | saṃsmṛtya saṃpūjya vidhūtapāpāḥ

मन और इन्द्रियों की पहुँच से परे, अपने ही क्षेत्र में सब रचे हुए पदार्थों के आश्रयस्थान, महापापों को हरने वाले हरि का स्मरण और पूजन करके वे लोग पापरहित हो जाते हैं,

श्लोक 120 (12.235.120)

यमैश्च नित्यं नियमैश्च संयता । स्तत्वं च विष्णोः परिपश्यमानाः । देवानुसारेण विमुक्तियोगं । ते गाहमानाः परमाप्नुवन्ति ॥

yamaiśca nityaṃ niyamaiśca saṃyatā | statvaṃ ca viṣṇoḥ paripaśyamānāḥ | devānusāreṇa vimuktiyogaṃ | te gāhamānāḥ paramāpnuvanti

और यम-नियमों से सदा संयत रहकर, विष्णु के तत्त्व को देखते हुए, देवताओं के अनुसार मुक्ति के मार्ग में प्रवेश करके वे परम पद को पाते हैं।

श्लोक 121 (12.235.121)

एवं राजेन्द्र सततं जपहोमपरायणः । वासुदेवपरो नित्यं ज्ञानध्यानपरायणः ॥

evaṃ rājendra satataṃ japahomaparāyaṇaḥ | vāsudevaparo nityaṃ jñānadhyānaparāyaṇaḥ

इसलिए हे राजेन्द्र! तुम सदा जप और होम में तत्पर रहो, सदा वासुदेव में, ज्ञान और ध्यान में लगे रहो,

श्लोक 122 (12.235.122)

दानधर्मरतिर्नित्यं प्रजास्त्वं परिपालय । वासुदेवपरो नित्यं ज्ञानध्यानपरायणान् । विशेषेणार्चयेथास्त्वं सततं पर्युपास्व च ॥

dānadharmaratirnityaṃ prajāstvaṃ paripālaya | vāsudevaparo nityaṃ jñānadhyānaparāyaṇān | viśeṣeṇārcayethāstvaṃ satataṃ paryupāsva ca

दान और धर्म में सदा रत रहकर प्रजा का पालन करो; सदा वासुदेव-परायण रहकर ज्ञान और ध्यान में लगे लोगों का विशेष रूप से सम्मान करो और निरन्तर उनकी सेवा करो।

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