शान्ति पर्व · अध्याय 236
जैगीषव्य का देवल को निन्दा और स्तुति में समभाव का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि कैसा आचरण मनुष्य को प्रकृति से परे ब्रह्म के शाश्वत धाम तक पहुँचाता है। भीष्म उत्तर में मुनि जैगीषव्य और असित देवल का प्राचीन संवाद सुनाते हैं। निन्दा और स्तुति से अविचलित जैगीषव्य बताते हैं कि ज्ञानी जन ईर्ष्या, क्रोध और आसक्ति से रहित होकर जीते हैं, अपमान को शान्ति से सह लेना दोनों लोकों में सुख देता है और ऐसा पुरुष परम गति को पाता है। फिर एक लम्बा प्रसंग आता है: देवल जैगीषव्य के शिष्य बने, और शिव तथा उमा की उपस्थिति में जैगीषव्य ने शिव के वरदान-प्रस्ताव को भी ठुकराकर केवल अपनी बात सुने जाने की प्रार्थना की।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.236.1)
किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपराक्रमः । प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥
kiṃśīlaḥ kiṃsamācāraḥ kiṃvidyaḥ kiṃparākramaḥ | prāpnoti brahmaṇaḥ sthānaṃ yatparaṃ prakṛterdhruvam
कैसे स्वभाव, कैसे आचरण, कैसी विद्या और कैसे पराक्रम वाला मनुष्य ब्रह्म के उस शाश्वत धाम को पाता है जो प्रकृति से परे है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.236.2)
मोक्षधर्मेषु नियतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं तत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥
mokṣadharmeṣu niyato laghvāhāro jitendriyaḥ | prāpnoti brahmaṇaḥ sthānaṃ tatparaṃ prakṛterdhruvam
जो मोक्षधर्मों में दृढ़ रहता है, हल्का आहार करता है और इन्द्रियों को जीत चुका है, वह ब्रह्म के उस शाश्वत धाम को पाता है जो प्रकृति से परे है।
श्लोक 3 (12.236.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । जैगीषव्यस्य संवादमसितस्य च भारत ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | jaigīṣavyasya saṃvādamasitasya ca bhārata
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, हे भारत: जैगीषव्य और असित का संवाद।
श्लोक 4 (12.236.4)
महादेवान्तरे वृत्तं देव्याश्चैवान्तरे तथा । यथावच्छृणु राजेन्द्र ज्ञानदं पापनाशनम् ॥
mahādevāntare vṛttaṃ devyāścaivāntare tathā | yathāvacchṛṇu rājendra jñānadaṃ pāpanāśanam
महादेव और देवी के बीच जो घटित हुआ, उसे ठीक-ठीक सुनो, हे राजेन्द्र। वह ज्ञान देनेवाला और पापों का नाश करनेवाला है।
श्लोक 5 (12.236.5)
जैगीषव्यं महाप्रज्ञं धर्माणामागतागमम् । अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमसितो देवलोऽब्रवीत् ॥
jaigīṣavyaṃ mahāprajñaṃ dharmāṇāmāgatāgamam | akrudhyantamahṛṣyantamasito devalo'bravīt
महाप्रज्ञ जैगीषव्य, जो धर्मों के आगम को जाननेवाले थे और न क्रोध करते थे न हर्षित होते थे, उनसे असित देवल ने कहा:
देवल उवाच
श्लोक 6 (12.236.6)
न प्रीयसे वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यसि । का ते प्रज्ञा कुतश्चैषा किं ते तस्याः परायणम् ॥
na prīyase vandyamāno nindyamāno na kupyasi | kā te prajñā kutaścaiṣā kiṃ te tasyāḥ parāyaṇam
आप सम्मान पाकर प्रसन्न नहीं होते और निन्दा होने पर क्रोध नहीं करते। आपकी यह प्रज्ञा कैसी है, कहाँ से आई है और इसका परम आश्रय क्या है?
भीष्म उवाच
श्लोक 7 (12.236.7)
इति तेनानुयुक्तः स तमुवाच महातपाः । महद्वाक्यमसंदिग्धं पुष्कलार्थपदं शुचि ॥
iti tenānuyuktaḥ sa tamuvāca mahātapāḥ | mahadvākyamasaṃdigdhaṃ puṣkalārthapadaṃ śuci
इस प्रकार पूछे जाने पर महातपस्वी जैगीषव्य ने उन्हें एक गम्भीर, सन्देहरहित, शुद्ध और अर्थ तथा पदों से भरा उत्तर दिया।
जैगीषव्य उवाच
श्लोक 8 (12.236.8)
या गतिर्या परा निष्ठा या शान्तिः पुण्यकर्मणाम् । तां तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यां मां पृच्छसि वै द्विज ॥
yā gatiryā parā niṣṭhā yā śāntiḥ puṇyakarmaṇām | tāṃ te'haṃ saṃpravakṣyāmi yāṃ māṃ pṛcchasi vai dvija
पुण्यकर्मा लोगों की जो गति है, जो परम निष्ठा है और जो शान्ति है, हे द्विज, तुम जो मुझसे पूछ रहे हो वही मैं तुम्हें भलीभाँति बताऊँगा।
श्लोक 9 (12.236.9)
निन्दत्सु वा समो नित्यं प्रशंसत्सु च देवल । निह्नुवन्ति च ये तेषां समयं सुकृतं च यत् ॥
nindatsu vā samo nityaṃ praśaṃsatsu ca devala | nihnuvanti ca ye teṣāṃ samayaṃ sukṛtaṃ ca yat
हे देवल, जो निन्दा करनेवालों और प्रशंसा करनेवालों के प्रति सदा समभाव रखते हैं, और जो अपने संकल्प तथा अपने किए पुण्य को छिपाए रखते हैं,
श्लोक 10 (12.236.10)
उक्ताश्च न विवक्षन्ति वक्तारमहिते हितम् । प्रतिहन्तुं न चेच्छन्ति हन्तारं वै मनीषिणः ॥
uktāśca na vivakṣanti vaktāramahite hitam | pratihantuṃ na cecchanti hantāraṃ vai manīṣiṇaḥ
कठोर वचन कहे जाने पर वे अहित करनेवाले वक्ता को उत्तर देना नहीं चाहते, और ज्ञानी लोग प्रहार करनेवाले पर भी प्रहार करना नहीं चाहते।
श्लोक 11 (12.236.11)
नाप्राप्तमनुशोचन्ति प्राप्तकालानि कुर्वते । न चातीतानि शोचन्ति न चैतान्प्रतिजानते ॥
nāprāptamanuśocanti prāptakālāni kurvate | na cātītāni śocanti na caitānpratijānate
जो अभी आया नहीं, उसके लिए वे शोक नहीं करते; समय आने पर उचित कर्म करते हैं; जो बीत गया उसके लिए शोक नहीं करते और उसे फिर अपनाते भी नहीं।
श्लोक 12 (12.236.12)
संप्राप्तानां च पूज्यानां कामादर्थेषु देवल । यथोपपत्तिं कुर्वन्ति शक्तिमन्तो धृतव्रताः ॥
saṃprāptānāṃ ca pūjyānāṃ kāmādartheṣu devala | yathopapattiṃ kurvanti śaktimanto dhṛtavratāḥ
हे देवल, जब पूज्य अतिथि आते हैं तब सामर्थ्यवान् और दृढ़व्रत लोग अपनी इच्छा से, अवसर के अनुसार, धन देकर उनका सत्कार करते हैं।
श्लोक 13 (12.236.13)
पक्वविद्या महाप्राज्ञा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । मनसा कर्मणा वाचा नापराध्यन्ति कस्यचित् ॥
pakvavidyā mahāprājñā jitakrodhā jitendriyāḥ | manasā karmaṇā vācā nāparādhyanti kasyacit
वे परिपक्व विद्या वाले, महाप्राज्ञ, क्रोध और इन्द्रियों को जीते हुए होते हैं; मन, कर्म और वाणी से किसी का अपराध नहीं करते।
श्लोक 14 (12.236.14)
अनीर्षवो न चान्योन्यं विहिंसन्ति कदाचन । न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ॥
anīrṣavo na cānyonyaṃ vihiṃsanti kadācana | na ca jātūpatapyante dhīrāḥ parasamṛddhibhiḥ
वे ईर्ष्या से रहित होते हैं और कभी एक-दूसरे को कष्ट नहीं देते; वे धीर पुरुष दूसरों की समृद्धि देखकर कभी नहीं जलते।
श्लोक 15 (12.236.15)
निन्दाप्रशंसे चात्यर्थं न वदन्ति परस्य च । न च निन्दाप्रशंसाभ्यां विक्रियन्ते कदाचन ॥
nindāpraśaṃse cātyarthaṃ na vadanti parasya ca | na ca nindāpraśaṃsābhyāṃ vikriyante kadācana
वे दूसरे की अधिक निन्दा या प्रशंसा नहीं करते, और निन्दा या प्रशंसा से स्वयं कभी विचलित नहीं होते।
श्लोक 16 (12.236.16)
सर्वतश्च प्रशान्ता ये सर्वभूतहिते रताः । न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति नापराध्यन्ति कस्यचित् ॥
sarvataśca praśāntā ye sarvabhūtahite ratāḥ | na krudhyanti na hṛṣyanti nāparādhyanti kasyacit
वे सब ओर से शान्त और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं; न क्रोध करते हैं, न हर्षित होते हैं और किसी का अपराध नहीं करते।
श्लोक 17 (12.236.17)
विमुच्य हृदयग्रन्थिं चङ्कम्यन्ते यथासुखम् । न चैषां बान्धवाः सन्ति ये चान्येषां न बान्धवाः ॥
vimucya hṛdayagranthiṃ caṅkamyante yathāsukham | na caiṣāṃ bāndhavāḥ santi ye cānyeṣāṃ na bāndhavāḥ
हृदय की गाँठें खोलकर वे अपनी इच्छा से विचरते हैं। उनका कोई बन्धु नहीं होता, और वे भी किसी के बन्धु नहीं होते।
श्लोक 18 (12.236.18)
अमित्राश्च न सन्त्येषां ये चामित्रा न कस्यचित् । य एवं कुर्वते मर्त्याः सुखं जीवन्ति सर्वदा ॥
amitrāśca na santyeṣāṃ ye cāmitrā na kasyacit | ya evaṃ kurvate martyāḥ sukhaṃ jīvanti sarvadā
उनका कोई शत्रु नहीं होता और वे भी किसी के शत्रु नहीं होते। जो मनुष्य इस प्रकार रहते हैं, वे सदा सुख से जीते हैं।
श्लोक 19 (12.236.19)
ये धर्मं चानुरुध्यन्ते धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः । ये ह्यतो विच्युता मार्गात्ते हृष्यन्त्युद्विजन्ति च ॥
ye dharmaṃ cānurudhyante dharmajñā dvijasattamāḥ | ye hyato vicyutā mārgātte hṛṣyantyudvijanti ca
जो धर्म को जाननेवाले हैं, हे द्विजश्रेष्ठ, वे धर्म का ही अनुसरण करते हैं। किन्तु जो इस मार्ग से गिर गए हैं, वे कभी हर्षित होते हैं और कभी उद्विग्न।
श्लोक 20 (12.236.20)
आस्थितस्तमहं मार्गमसूयिष्यामि कं कथम् । निन्द्यमानः प्रशस्तो वा हृष्येयं केन हेतुना ॥
āsthitastamahaṃ mārgamasūyiṣyāmi kaṃ katham | nindyamānaḥ praśasto vā hṛṣyeyaṃ kena hetunā
उस मार्ग पर स्थित होकर मैं किससे और कैसे डाह करूँगा? निन्दित होऊँ या प्रशंसित, मैं किस कारण हर्षित होऊँ?
श्लोक 21 (12.236.21)
यद्यदिच्छन्ति तत्तस्मादधिगच्छन्ति मानवाः । न मे निन्दाप्रशंसाभ्यां ह्रासवृद्धी भविष्यतः ॥
yadyadicchanti tattasmādadhigacchanti mānavāḥ | na me nindāpraśaṃsābhyāṃ hrāsavṛddhī bhaviṣyataḥ
मनुष्य जो-जो चाहते हैं, उसी के अनुसार चलते हैं। निन्दा या प्रशंसा से मेरी न हानि होगी न वृद्धि।
श्लोक 22 (12.236.22)
अमृतस्येव संतृप्येदवमानस्य तत्त्ववित् । विषस्येवोद्विजेन्नित्यं संमानस्य विचक्षणः ॥
amṛtasyeva saṃtṛpyedavamānasya tattvavit | viṣasyevodvijennityaṃ saṃmānasya vicakṣaṇaḥ
तत्त्व को जाननेवाला अपमान से अमृत के समान तृप्त हो, और विवेकी पुरुष सम्मान से सदा विष की भाँति उद्विग्न हो।
श्लोक 23 (12.236.23)
अवज्ञातः सुखं शेते इह चामुत्र चोभयोः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यो योऽवमन्ता स बध्यते ॥
avajñātaḥ sukhaṃ śete iha cāmutra cobhayoḥ | vimuktaḥ sarvapāpebhyo yo'vamantā sa badhyate
जिसका अपमान हुआ है वह इस लोक और परलोक दोनों में सुख से सोता है और सब पापों से मुक्त हो जाता है; जो अपमान करता है वही बँधता है।
श्लोक 24 (12.236.24)
परां गतिं च ये केचित्प्रार्थयन्ति मनीषिणः । एतद्व्रतं समाश्रित्य सुखमेधन्ति ते जनाः ॥
parāṃ gatiṃ ca ye kecitprārthayanti manīṣiṇaḥ | etadvrataṃ samāśritya sukhamedhanti te janāḥ
जो भी विवेकी जन परम गति चाहते हैं, वे इसी व्रत का आश्रय लेकर सुख से बढ़ते हैं।
श्लोक 25 (12.236.25)
सर्वतश्च समाहृत्य क्रतून्सर्वाञ्जितेन्द्रियः । प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥
sarvataśca samāhṛtya kratūnsarvāñjitendriyaḥ | prāpnoti brahmaṇaḥ sthānaṃ yatparaṃ prakṛterdhruvam
सब ओर से सब यज्ञों को समेटकर, इन्द्रियों को जीतकर, वह ब्रह्म के उस शाश्वत धाम को पाता है जो प्रकृति से परे है।
श्लोक 26 (12.236.26)
नास्य देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । पदमन्ववरोहन्ति प्राप्तस्य परमां गतिम् ॥
nāsya devā na gandharvā na piśācā na rākṣasāḥ | padamanvavarohanti prāptasya paramāṃ gatim
परम गति को प्राप्त हुए उस पुरुष के पदचिह्नों पर न देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही चल सकते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 27 (12.236.27)
एतच्छ्रुत्वा मुनेस्तस्य वचनं देवलस्तथा । तदधीनोऽभवच्छिष्यः सर्वद्वन्द्वविनिष्ठितः ॥
etacchrutvā munestasya vacanaṃ devalastathā | tadadhīno'bhavacchiṣyaḥ sarvadvandvaviniṣṭhitaḥ
उन मुनि के ये वचन सुनकर देवल भी उनके शिष्य हो गए, उन्हीं के अधीन रहकर और सब द्वन्द्वों से परे दृढ़ स्थित होकर।
श्लोक 28 (12.236.28)
अथान्यत्तु पुरावृत्तं जैगीषव्यस्य धीमतः । शृणु राजन्नवहितः सर्वज्ञानसमन्वितः ॥
athānyattu purāvṛttaṃ jaigīṣavyasya dhīmataḥ | śṛṇu rājannavahitaḥ sarvajñānasamanvitaḥ
हे राजन्, सर्वज्ञान से सम्पन्न होकर तुम ध्यान से सुनो: बुद्धिमान जैगीषव्य की एक और पुरानी घटना है।
श्लोक 29 (12.236.29)
यमाहुः सर्वलोकेशं सर्वलोकनमस्कृतम् । अष्टमूर्ति जगन्मूर्तिमिष्टसंधिविभूषितम् । यं प्राप्ता न विषीदन्ति न शोचन्त्युद्विजन्ति च ॥
yamāhuḥ sarvalokeśaṃ sarvalokanamaskṛtam | aṣṭamūrti jaganmūrtimiṣṭasaṃdhivibhūṣitam | yaṃ prāptā na viṣīdanti na śocantyudvijanti ca
जिन्हें सब लोकों का ईश्वर कहा जाता है, जिन्हें सारा संसार नमन करता है, जो अष्टमूर्ति हैं, जगत्-स्वरूप हैं और अपने प्रिय संयोगों से विभूषित हैं; जो उन्हें पा लेते हैं वे न विषाद में डूबते हैं, न शोक करते हैं, न विचलित होते हैं।
श्लोक 30 (12.236.30)
यस्य स्वाभाविकी शक्तिरिदं विश्वं चराचरम् । याति सज्जति सर्वात्मा स देवः परमेश्वरः ॥
yasya svābhāvikī śaktiridaṃ viśvaṃ carācaram | yāti sajjati sarvātmā sa devaḥ parameśvaraḥ
यह सारा चराचर जगत् जिनकी स्वाभाविक शक्ति है, जो सबके आत्मा हैं और जिनमें यह जगत् गति करता और आसक्त रहता है, वही परमेश्वर देव हैं।
श्लोक 31 (12.236.31)
मेरोरुत्तरपूर्वे तु सर्वरत्नविभूषिते । अचिन्त्ये विमले स्थाने सर्वर्तुकुसुमान्विते ॥
meroruttarapūrve tu sarvaratnavibhūṣite | acintye vimale sthāne sarvartukusumānvite
मेरु के उत्तर-पूर्व में, सब रत्नों से विभूषित, अचिन्त्य, निर्मल और सब ऋतुओं के फूलों से भरे एक स्थान में,
श्लोक 32 (12.236.32)
वृक्षैश्च शोभिते नित्यं दिव्यवायुसमीरिते । नानाभूतगणैर्युक्तः सर्वदेवनमस्कृतः ॥
vṛkṣaiśca śobhite nityaṃ divyavāyusamīrite | nānābhūtagaṇairyuktaḥ sarvadevanamaskṛtaḥ
जो वृक्षों से सदा शोभित और दिव्य वायु से लहराता रहता है, वहाँ अनेक प्राणिसमूहों से घिरे हुए और सब देवताओं से नमस्कृत वे देव विराजते हैं।
श्लोक 33 (12.236.33)
तत्र विद्याधरगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः । लोकपालाः समुद्राश्च नद्यः शैलाः सरांसि च ॥
tatra vidyādharagaṇā gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | lokapālāḥ samudrāśca nadyaḥ śailāḥ sarāṃsi ca
वहाँ विद्याधरों के गण, गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह, लोकपाल, समुद्र, नदियाँ, पर्वत और सरोवर,
श्लोक 34 (12.236.34)
ऋषयो वालखिल्याश्च यज्ञाः स्तोभाह्वयास्तथा । उपासांचक्रिरे देवं प्रजानां पतयस्तथा ॥
ṛṣayo vālakhilyāśca yajñāḥ stobhāhvayāstathā | upāsāṃcakrire devaṃ prajānāṃ patayastathā
ऋषि, वालखिल्य, स्तोभ नामक यज्ञ तथा प्रजापति, सब उन देव की उपासना करते थे।
श्लोक 35 (12.236.35)
तत्र रुद्रो महादेवो देव्या चैव सहोमया । आस्ते वृषध्वजः श्रीमान्सोमसूर्याग्निलोचनः ॥
tatra rudro mahādevo devyā caiva sahomayā | āste vṛṣadhvajaḥ śrīmānsomasūryāgnilocanaḥ
वहाँ वृषध्वज श्रीमान् रुद्र महादेव देवी उमा के साथ बैठे हैं, जिनके नेत्र सोम, सूर्य और अग्नि हैं।
श्लोक 36 (12.236.36)
तत्रैवं देवमालोक्य देवी धात्री विभावरी । उमा देवी परेशानमपृच्छद्विनयान्विता ॥
tatraivaṃ devamālokya devī dhātrī vibhāvarī | umā devī pareśānamapṛcchadvinayānvitā
वहाँ देव को इस प्रकार देखकर धात्री, विभावरी देवी उमा ने विनयपूर्वक परमेश्वर से पूछा।
श्लोक 37 (12.236.37)
अर्थः कोऽथार्थशक्तिः का भगवन्ब्रूहि मेऽर्थितः । तयैवं परिपृष्टोऽसौ प्राह देवो महेश्वरः ॥
arthaḥ ko'thārthaśaktiḥ kā bhagavanbrūhi me'rthitaḥ | tayaivaṃ paripṛṣṭo'sau prāha devo maheśvaraḥ
"भगवन्, मैं पूछती हूँ, बताइए: अर्थ क्या है और अर्थशक्ति क्या है?" उसके इस प्रकार पूछने पर देव महेश्वर बोले।
महादेव उवाच
श्लोक 38 (12.236.38)
अर्थोऽहमर्थशक्तिस्त्वं भोक्ताऽहं भोज्यमेव च । रूपं विद्धि महाभागे प्रकृतिस्त्वं परो ह्यहम् ॥
artho'hamarthaśaktistvaṃ bhoktā'haṃ bhojyameva ca | rūpaṃ viddhi mahābhāge prakṛtistvaṃ paro hyaham
"मैं अर्थ हूँ और तुम अर्थशक्ति हो। मैं भोक्ता हूँ और भोग्य भी मैं ही हूँ। हे महाभागे, ऐसा जानो: तुम प्रकृति हो और मैं परम हूँ।"
श्लोक 39 (12.236.39)
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा ह्यहं यज्ञस्तथैव च । आवयोर्न च भेदोऽस्ति परमार्थस्ततोऽबले । तथापि विद्मस्ते भेदं किं मां त्वं परिपृच्छसि ॥
ahaṃ viṣṇurahaṃ brahmā hyahaṃ yajñastathaiva ca | āvayorna ca bhedo'sti paramārthastato'bale | tathāpi vidmaste bhedaṃ kiṃ māṃ tvaṃ paripṛcchasi
"मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ और मैं ही यज्ञ भी हूँ। हे अबले, परमार्थ में हम दोनों में कोई भेद नहीं है। फिर भी हम तुम्हारे मन का भेद जानते हैं; तुम मुझसे क्यों पूछती हो?"
भीष्म उवाच
श्लोक 40 (12.236.40)
एवमुक्ता ततः प्राह ह्यधिकं ह्येतयोर्वद । श्रेष्ठं वेद महादेव नम इत्येव भामिनी ॥
evamuktā tataḥ prāha hyadhikaṃ hyetayorvada | śreṣṭhaṃ veda mahādeva nama ityeva bhāminī
यह सुनकर उस भामिनी ने कहा: "इन दोनों में कौन बड़ा है, यह बताइए। हे महादेव, श्रेष्ठ को आप जानते हैं; आपको नमस्कार है।"
श्लोक 41 (12.236.41)
तदन्तरे स्थितो विद्वान्वसुरूपो महामुनिः । जैगीषव्यः स्मयन्प्राह ह्यर्थ इत्येव नादयन् ॥
tadantare sthito vidvānvasurūpo mahāmuniḥ | jaigīṣavyaḥ smayanprāha hyartha ityeva nādayan
उसी बीच वहाँ वसु-रूप में खड़े विद्वान महामुनि जैगीषव्य ने मुस्कुराकर "अर्थ!" यह शब्द गुँजाते हुए कहा।
जैगीषव्य उवाच
श्लोक 42 (12.236.42)
श्रेष्ठोऽन्योऽस्मान्महीपिण्डा तल्लीना शक्तिरापरा । मुद्रिकादिविशेषेण विस्तृता संभृतेति च ॥
śreṣṭho'nyo'smānmahīpiṇḍā tallīnā śaktirāparā | mudrikādiviśeṣeṇa vistṛtā saṃbhṛteti ca
"हमसे श्रेष्ठ कोई और है: मिट्टी के पिण्ड में लीन वह दूसरी शक्ति, मुद्रिका आदि के भेदों से फैली हुई है और धारण की गई है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (12.236.43)
तच्छ्रुत्वा वचनं देवी कोऽसावित्यब्रवीद्रुषा । वाक्यमस्याद्य संभङ्क्त्वा प्रोक्तवानिति शंकरम् ॥
tacchrutvā vacanaṃ devī ko'sāvityabravīdruṣā | vākyamasyādya saṃbhaṅktvā proktavāniti śaṃkaram
ये वचन सुनकर देवी ने क्रोध से पूछा, "यह कौन है?" और शंकर से कहा कि उसने आज इनकी बात को काटकर अपनी बात कही है।
श्लोक 44 (12.236.44)
तच्छ्रुत्वा निर्गतो धीमानाश्रमं स्वं महामुनिः । स्थानात्स्वर्गगणे विद्वान्योगैश्वर्यसमन्वितः ॥
tacchrutvā nirgato dhīmānāśramaṃ svaṃ mahāmuniḥ | sthānātsvargagaṇe vidvānyogaiśvaryasamanvitaḥ
यह सुनकर योग के ऐश्वर्य से सम्पन्न विद्वान् बुद्धिमान महामुनि उस स्थान से, स्वर्ग के गणों के बीच से, अपने आश्रम को चले गए।
श्लोक 45 (12.236.45)
ततः प्रहस्य भगवान्सर्वपापहरो हरः । प्राह देवीं प्रशान्तात्मा जैगीषव्यो महामुनिः ॥
tataḥ prahasya bhagavānsarvapāpaharo haraḥ | prāha devīṃ praśāntātmā jaigīṣavyo mahāmuniḥ
तब सब पापों को हरनेवाले भगवान् हर ने हँसकर, शान्त चित्त से देवी से महामुनि जैगीषव्य के विषय में कहा।
महादेव उवाच
श्लोक 46 (12.236.46)
भक्तो मम सखा चैव शिष्यश्चात्र महामुनिः । जैगीषव्य इति ख्यातः प्रोक्त्वासा निर्गतः शुभे ॥
bhakto mama sakhā caiva śiṣyaścātra mahāmuniḥ | jaigīṣavya iti khyātaḥ proktvāsā nirgataḥ śubhe
"मेरा भक्त, मेरा मित्र और यहाँ मेरा शिष्य, जैगीषव्य नाम से प्रसिद्ध वह महामुनि, यह कहकर चला गया है, हे शुभे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (12.236.47)
तच्छ्रुत्वा साऽथ संक्रुद्धा न न्याय्यं तेन वै कृतम् । विकृताऽहं त्वया देव मुनिना च तथाकृता ॥
tacchrutvā sā'tha saṃkruddhā na nyāyyaṃ tena vai kṛtam | vikṛtā'haṃ tvayā deva muninā ca tathākṛtā
यह सुनकर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुई: "उसने जो किया वह उचित नहीं है। हे देव, आपने और उस मुनि ने भी मेरे साथ अन्याय किया है।"
श्लोक 48 (12.236.48)
अतज्ज्ञादथ देवेश मध्ये प्राप्तं न तच्छ्रुतम् । तच्छ्रुत्वा भगवानाह महादेवः पिनाकधृत् ॥
atajjñādatha deveśa madhye prāptaṃ na tacchrutam | tacchrutvā bhagavānāha mahādevaḥ pinākadhṛt
"हे देवेश, मैं उन्हें जानती नहीं थी, इसलिए बीच में जो कहा गया वह मैंने सुना नहीं।" यह सुनकर पिनाकधारी भगवान् महादेव बोले।
महादेव उवाच
श्लोक 49 (12.236.49)
निरपेक्षो मुनिर्योगी मामुपाश्रित्य संस्थितः । निर्द्वन्द्वः सततं धीमान्समरूपस्वभावधृत् ॥
nirapekṣo muniryogī māmupāśritya saṃsthitaḥ | nirdvandvaḥ satataṃ dhīmānsamarūpasvabhāvadhṛt
"वह मुनि योगी है, निरपेक्ष है; मेरा आश्रय लेकर स्थित है, द्वन्द्वों से रहित, सदा बुद्धिमान और सम स्वभाव को धारण करनेवाला है।"
श्लोक 50 (12.236.50)
तस्मात्क्षमस्व तं देवि रक्षितव्यस्त्वया च सः ॥
tasmātkṣamasva taṃ devi rakṣitavyastvayā ca saḥ
"इसलिए, हे देवि, उसे क्षमा करो, और तुम्हें उसकी रक्षा भी करनी चाहिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 51 (12.236.51)
इत्युक्ता प्राह सा देवी मुनेस्तस्य महात्मनः । निराशत्वमहं द्रष्टुमिच्छाम्यन्तकनाशन ॥
ityuktā prāha sā devī munestasya mahātmanaḥ | nirāśatvamahaṃ draṣṭumicchāmyantakanāśana
ऐसा कहे जाने पर देवी ने कहा: "हे अन्तक का नाश करनेवाले, मैं उस महात्मा मुनि की निःस्पृहता देखना चाहती हूँ।"
श्लोक 52 (12.236.52)
तथेति चोक्त्वा तां देवो वृषमारुह्य सत्वरम् । देवगन्धर्वसङ्घैश्च स्तूयमानो जगत्पतिः ॥
tatheti coktvā tāṃ devo vṛṣamāruhya satvaram | devagandharvasaṅghaiśca stūyamāno jagatpatiḥ
"ऐसा ही हो", यह कहकर जगत्पति देव शीघ्र ही वृषभ पर चढ़े, देवों और गन्धर्वों के समूह उनकी स्तुति कर रहे थे,
श्लोक 53 (12.236.53)
अजरामरशुद्धात्मा यत्रास्ते स महामुनिः । इतस्ततः समाहृत्य वीरसंघैर्महायशाः ॥
ajarāmaraśuddhātmā yatrāste sa mahāmuniḥ | itastataḥ samāhṛtya vīrasaṃghairmahāyaśāḥ
उस स्थान की ओर जहाँ वह अजर, अमर और शुद्धात्मा महामुनि रहते थे; महायशस्वी शिव इधर-उधर से वीरों के दलों को साथ लेते हुए चले।
श्लोक 54 (12.236.54)
देहप्रावरणार्थं वै संसरन्स तदा मुनिः । प्रत्युद्गम्य महादेवं यथार्हं प्रतिपूज्य च । पुनः स पूर्ववत्कन्थां सूच्या सूत्रेण सूचयत् ॥
dehaprāvaraṇārthaṃ vai saṃsaransa tadā muniḥ | pratyudgamya mahādevaṃ yathārhaṃ pratipūjya ca | punaḥ sa pūrvavatkanthāṃ sūcyā sūtreṇa sūcayat
उस समय शरीर ढकने के लिए घूमते हुए उन मुनि ने आगे बढ़कर महादेव का स्वागत किया और यथायोग्य पूजा की; फिर पहले की तरह वे सुई और धागे से अपनी गुदड़ी सीने लगे।
श्लोक 55 (12.236.55)
तमाह भगवाञ्शंभुः किं प्रदास्यामि ते मुने । वृणीष्व मत्तः सर्वं त्वं जैगीषव्य यदीच्छसि ॥
tamāha bhagavāñśaṃbhuḥ kiṃ pradāsyāmi te mune | vṛṇīṣva mattaḥ sarvaṃ tvaṃ jaigīṣavya yadīcchasi
भगवान् शम्भु ने उनसे कहा: "मुनि, मैं तुम्हें क्या दूँ? जैगीषव्य, जो कुछ तुम चाहो वह सब मुझसे माँग लो।"
श्लोक 56 (12.236.56)
नावलोकयमानस्तु देवदेवं महामुनिः । अनवाप्तं न पश्यामि त्वत्तो गोवृषभध्वज । कृतार्थः परिपूर्णोऽहं यत्ते कार्यं तु गम्यताम् ॥
nāvalokayamānastu devadevaṃ mahāmuniḥ | anavāptaṃ na paśyāmi tvatto govṛṣabhadhvaja | kṛtārthaḥ paripūrṇo'haṃ yatte kāryaṃ tu gamyatām
देवों के देव की ओर देखे बिना ही महामुनि ने कहा: "हे वृषभध्वज, मैं आपसे कुछ भी अप्राप्त नहीं देखता। मैं कृतार्थ और परिपूर्ण हूँ; आपका जो कार्य हो उसके लिए आप जाइए।"
श्लोक 57 (12.236.57)
प्रहसंस्तु पुनः शर्वो वृणीष्वेति तमब्रवीत् । अवश्यं हि वरो मत्तः श्राव्यं वरमनुत्तमम् ॥
prahasaṃstu punaḥ śarvo vṛṇīṣveti tamabravīt | avaśyaṃ hi varo mattaḥ śrāvyaṃ varamanuttamam
शर्व ने फिर हँसकर उनसे कहा, "माँगो!" और बोले: "मुझसे वर अवश्य लेना होगा; मैं कोई अनुपम वर सुनूँ।"
श्लोक 58 (12.236.58)
जैगीषव्यस्तमाहेदं श्रोतव्यं च त्वया मम । सूचीमनु महादेव सूत्रं समनुगच्छतः ॥
jaigīṣavyastamāhedaṃ śrotavyaṃ ca tvayā mama | sūcīmanu mahādeva sūtraṃ samanugacchataḥ
जैगीषव्य ने उनसे यह कहा: "हे महादेव, मुझसे यह सुनिए: सुई के पीछे चलनेवाले धागे के विषय में।"
श्लोक 59 (12.236.59)
ततः प्रहस्य भगवान्गौरीमालोक्य शङ्करः । स्वस्थानं प्रययौ हृष्टः सर्वदेवनमस्कृतः ॥
tataḥ prahasya bhagavāngaurīmālokya śaṅkaraḥ | svasthānaṃ prayayau hṛṣṭaḥ sarvadevanamaskṛtaḥ
तब भगवान् शंकर ने मुस्कुराकर गौरी की ओर देखा और प्रसन्न होकर, सब देवताओं से नमस्कृत, अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 60 (12.236.60)
एतत्ते कथितं राजन्यस्मात्त्वं परिपृच्छसि । निर्द्वन्द्वा योगिनो नित्याः सर्वशस्ते स्वयंभुवः ॥
etatte kathitaṃ rājanyasmāttvaṃ paripṛcchasi | nirdvandvā yogino nityāḥ sarvaśaste svayaṃbhuvaḥ
हे राजन्, तुम जो पूछ रहे हो उसके उत्तर में यह मैंने कहा: द्वन्द्वों से रहित योगी नित्य हैं और सब प्रकार से स्वयम्भू के समान हैं।