शान्ति पर्व · अध्याय 237
नारद के गुण और बिना लोहे का शस्त्र
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पृथ्वी पर ऐसा कौन है जो सारे संसार को प्रिय और सब गुणों से सम्पन्न हो। भीष्म बताते हैं कि उग्रसेन के पूछने पर कृष्ण ने नारद के गुण गिनाए: अभिमान, क्रोध और लोभ से मुक्ति, सत्यवादिता, विद्या, क्षमा और सबके प्रति समभाव। आगे कथा आती है कि नारद ने कृष्ण को अपने ही बन्धुओं के विरोध से व्यथित पाया और सलाह दी कि उनकी जीभ बिना लोहे के शस्त्र, अर्थात् दान, से रोक दी जाए; कृष्ण ने मुस्कुराकर वैसा ही किया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.237.1)
प्रियः सर्वस्य लोकस्य सर्वसत्वाभिनन्दितः । गुणैः सर्वैरुपेतश्च को न्वस्ति भुवि मानवः ॥
priyaḥ sarvasya lokasya sarvasatvābhinanditaḥ | guṇaiḥ sarvairupetaśca ko nvasti bhuvi mānavaḥ
इस पृथ्वी पर ऐसा कौन मनुष्य है जो सारे संसार को प्रिय हो, सब प्राणियों से अभिनन्दित हो और सब गुणों से सम्पन्न हो?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.237.2)
अत्र ते वर्तयिष्यामि पृच्छतो भरतर्षभ । उग्रसेनस्य संवादं नारदे केशवस्य च ॥
atra te vartayiṣyāmi pṛcchato bharatarṣabha | ugrasenasya saṃvādaṃ nārade keśavasya ca
इस विषय में, हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे पूछने पर मैं नारद के विषय में उग्रसेन और केशव का संवाद सुनाता हूँ।
उग्रसेन उवाच
श्लोक 3 (12.237.3)
यस्य संकल्पते लोको नारदस्य प्रकीर्तने । मन्ये स गुणसंपन्नो ब्रूहि तन्मम पृच्छतः ॥
yasya saṃkalpate loko nāradasya prakīrtane | manye sa guṇasaṃpanno brūhi tanmama pṛcchataḥ
नारद का नाम लिए जाने पर संसार उनके प्रति अनुकूल हो उठता है। मैं उन्हें गुणों से सम्पन्न मानता हूँ; मैं पूछ रहा हूँ, मुझे यह बताइए।
वासुदेव उवाच
श्लोक 4 (12.237.4)
कुकुराधिप यान्मन्ये शृणु तान्मे विवक्षतः । नारदस्य गुणान्साधून्संक्षेपेण नराधिप ॥
kukurādhipa yānmanye śṛṇu tānme vivakṣataḥ | nāradasya guṇānsādhūnsaṃkṣepeṇa narādhipa
हे कुकुरों के अधिपति, मैं नारद के जिन गुणों को मानता हूँ उन्हें संक्षेप में कहता हूँ, हे राजन्; सुनिए।
श्लोक 5 (12.237.5)
न चारित्रनिमित्तोऽस्याहंकारो देहपातनः । अभिन्नश्रुतचारित्रस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
na cāritranimitto'syāhaṃkāro dehapātanaḥ | abhinnaśrutacāritrastasmātsarvatra pūjitaḥ
अपने आचरण के कारण उसमें वह अहंकार नहीं उठता जो देह का पतन करता है; उसका शास्त्रज्ञान और आचरण अखण्डित हैं; इसीलिए वह सर्वत्र पूजित है।
श्लोक 6 (12.237.6)
अरतिः क्रोधचापल्ये भयं नैतानि नारदे । अदीर्घसूत्रः शूरश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
aratiḥ krodhacāpalye bhayaṃ naitāni nārade | adīrghasūtraḥ śūraśca tasmātsarvatra pūjitaḥ
नारद में अरति, क्रोध, चपलता और भय नहीं हैं। वे दीर्घसूत्री नहीं हैं और शूर हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 7 (12.237.7)
उपास्यो नारदो बाढं वाचि नास्य व्यतिक्रमः । कामतो यदि वा लोभात्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
upāsyo nārado bāḍhaṃ vāci nāsya vyatikramaḥ | kāmato yadi vā lobhāttasmātsarvatra pūjitaḥ
नारद निश्चय ही उपासना के योग्य हैं; उनकी वाणी में कभी चूक नहीं होती, न कामना से, न लोभ से; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 8 (12.237.8)
अध्यात्मविधितत्त्वज्ञः क्षान्तः शक्तो जितेन्द्रियः । ऋजुश्च सत्यवादी च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
adhyātmavidhitattvajñaḥ kṣāntaḥ śakto jitendriyaḥ | ṛjuśca satyavādī ca tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे अध्यात्म-विधि के तत्त्व को जाननेवाले, क्षमाशील, समर्थ, जितेन्द्रिय, सरल और सत्यवादी हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 9 (12.237.9)
तेजसा यशसा बुद्ध्या ज्ञानेन विनयेन च । जन्मना तपसा वृद्धस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
tejasā yaśasā buddhyā jñānena vinayena ca | janmanā tapasā vṛddhastasmātsarvatra pūjitaḥ
वे तेज, यश, बुद्धि, ज्ञान और विनय में, तथा जन्म और तप में बढ़े हुए हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 10 (12.237.10)
सुशीलः सुखसंवेशः सुभोजः स्वादरः शुचिः । सुवाक्यश्चाप्यनीर्ष्यश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
suśīlaḥ sukhasaṃveśaḥ subhojaḥ svādaraḥ śuciḥ | suvākyaścāpyanīrṣyaśca tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे सुशील हैं, साथ रहने में सुखद हैं, सहज ही सन्तुष्ट होनेवाले हैं, आदर करनेवाले, पवित्र, मधुर वचन बोलनेवाले और ईर्ष्यारहित हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 11 (12.237.11)
कल्याणं कुरुते बाढं पापमस्मिन्न विद्यते । न प्रीयते परानर्थैस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
kalyāṇaṃ kurute bāḍhaṃ pāpamasminna vidyate | na prīyate parānarthaistasmātsarvatra pūjitaḥ
वे निश्चय ही कल्याण करते हैं; उनमें पाप नहीं मिलता; दूसरों की विपत्तियों में वे प्रसन्न नहीं होते; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 12 (12.237.12)
वेदश्रुतिभिराख्यानैरर्थानभिजिगीषति । तितिक्षुरनवज्ञश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
vedaśrutibhirākhyānairarthānabhijigīṣati | titikṣuranavajñaśca tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे वेद, श्रुति और आख्यानों के द्वारा अपने प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं; वे सहनशील हैं और किसी का अनादर नहीं करते; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 13 (12.237.13)
समत्वाच्च प्रियो नास्ति नाप्रियश्च कथंचन । मनोऽनुकूलवादी च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
samatvācca priyo nāsti nāpriyaśca kathaṃcana | mano'nukūlavādī ca tasmātsarvatra pūjitaḥ
समदृष्टि होने के कारण उनके लिए कोई प्रिय या अप्रिय नहीं है, और वे सुननेवाले के मन के अनुकूल बोलते हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 14 (12.237.14)
बहुश्रुतश्चित्रकथः पण्डितोऽनलसोऽशठः । अदीनोऽक्रोधनोऽलुब्धस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
bahuśrutaścitrakathaḥ paṇḍito'nalaso'śaṭhaḥ | adīno'krodhano'lubdhastasmātsarvatra pūjitaḥ
वे बहुश्रुत हैं, विविध कथाएँ कहनेवाले, पण्डित, आलस्यरहित और छलरहित हैं; दीन, क्रोधी और लोभी नहीं हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 15 (12.237.15)
नार्थे धने वा कामे वा भूतपूर्वोऽस्य विग्रहः । दोषाश्चास्य समुच्छिन्नास्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
nārthe dhane vā kāme vā bhūtapūrvo'sya vigrahaḥ | doṣāścāsya samucchinnāstasmātsarvatra pūjitaḥ
अर्थ, धन या काम को लेकर उनका कभी किसी से झगड़ा नहीं हुआ, और उनके दोष जड़ से कट चुके हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 16 (12.237.16)
दृढभक्तिरनिन्द्यात्मा श्रुतवाननृशंसवान् । वीतसंमोहदोषश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
dṛḍhabhaktiranindyātmā śrutavānanṛśaṃsavān | vītasaṃmohadoṣaśca tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे दृढ़ भक्तिवाले, निर्दोष आत्मा वाले, शास्त्रज्ञ और दयालु हैं, और मोह के दोषों से मुक्त हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 17 (12.237.17)
असक्तः सर्वसङ्गेषु सक्तात्मेव च लक्ष्यते । अदीर्घसंशयो वाग्मी तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
asaktaḥ sarvasaṅgeṣu saktātmeva ca lakṣyate | adīrghasaṃśayo vāgmī tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे सब आसक्तियों में अनासक्त हैं, फिर भी आसक्त जैसे दिखाई देते हैं; वे देर तक संशय में नहीं रहते और वाक्पटु हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 18 (12.237.18)
समाधिर्नास्य कामार्थे नात्मानं स्तौति कर्हिचित् । अनीर्षुर्मृदुसंवादस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
samādhirnāsya kāmārthe nātmānaṃ stauti karhicit | anīrṣurmṛdusaṃvādastasmātsarvatra pūjitaḥ
उनकी समाधि काम और धन के लिए नहीं है, और वे कभी अपनी प्रशंसा नहीं करते; ईर्ष्यारहित और मृदुभाषी होने से वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 19 (12.237.19)
नाहंकारे मुक्तिरस्य चारित्रे बुद्धिरास्थिता । वेदार्थविद्विभागेन यज्ञविद्योगवित्कविः । भक्तिमान्यः सदा विद्वांस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
nāhaṃkāre muktirasya cāritre buddhirāsthitā | vedārthavidvibhāgena yajñavidyogavitkaviḥ | bhaktimānyaḥ sadā vidvāṃstasmātsarvatra pūjitaḥ
अहंकार में उनकी मुक्ति नहीं है; उनकी बुद्धि सदाचार में स्थिर है। वे विभाग-पूर्वक वेद के अर्थ को जानते हैं, यज्ञ, विद्या और योग के ज्ञाता तथा कवि हैं। भक्तिमान् और सदा विद्वान् होने से वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 20 (12.237.20)
त्रिगुणं गुणभोक्तारं पञ्चयज्ञात्मकं तथा । यथावत्स विजानाति तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
triguṇaṃ guṇabhoktāraṃ pañcayajñātmakaṃ tathā | yathāvatsa vijānāti tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे त्रिगुणात्मक प्रकृति को, गुणों के भोक्ता को तथा पाँच यज्ञों से बने तत्त्व को भी यथार्थ रूप से जानते हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 21 (12.237.21)
कल्याणं कुरुते बाढं पापमस्मिन्न विद्यते । न प्रीयते परानर्थैस्तस्मात्सर्वत्र पूज्यते ॥
kalyāṇaṃ kurute bāḍhaṃ pāpamasminna vidyate | na prīyate parānarthaistasmātsarvatra pūjyate
वे निश्चय ही कल्याण करते हैं; उनमें पाप नहीं मिलता; दूसरों की विपत्तियों में वे प्रसन्न नहीं होते; इसीलिए वे सर्वत्र आदर पाते हैं।
श्लोक 22 (12.237.22)
लोकस्य विविधं चित्तं प्रेक्षते चाप्यकुत्सयन् । संसर्गविद्याकुशलस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
lokasya vividhaṃ cittaṃ prekṣate cāpyakutsayan | saṃsargavidyākuśalastasmātsarvatra pūjitaḥ
वे संसार के लोगों के विविध चित्त को बिना निन्दा किए देखते हैं और मेल-जोल की कला में कुशल हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 23 (12.237.23)
नासूयत्यागमं कंचित्स्वनयेनोपजीवति । अबन्ध्यकालोऽवश्यात्मा तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
nāsūyatyāgamaṃ kaṃcitsvanayenopajīvati | abandhyakālo'vaśyātmā tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे किसी शास्त्र की निन्दा नहीं करते और अपनी ही नीति से जीवन चलाते हैं; उनका कोई समय व्यर्थ नहीं जाता और उनकी आत्मा किसी के वश में नहीं है; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 24 (12.237.24)
कृतश्रमः कृतप्रज्ञो न च तृप्तः समाधितः । नित्ययुक्तोऽप्रमत्तश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
kṛtaśramaḥ kṛtaprajño na ca tṛptaḥ samādhitaḥ | nityayukto'pramattaśca tasmātsarvatra pūjitaḥ
उन्होंने परिश्रम किया है, प्रज्ञा पाई है, और वे समाधि से कभी तृप्त नहीं होते; वे सदा संयमी और सावधान हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 25 (12.237.25)
नापत्रपश्च युक्तश्च नियुक्तः श्रेयसे परैः । अभेत्ता परगुह्यानां तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
nāpatrapaśca yuktaśca niyuktaḥ śreyase paraiḥ | abhettā paraguhyānāṃ tasmātsarvatra pūjitaḥ
वे निर्लज्ज नहीं हैं, संयमी हैं और दूसरे उन्हें कल्याण के कार्य में लगाते हैं; वे दूसरों के रहस्य नहीं खोलते; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 26 (12.237.26)
न हृष्यत्यर्थलाभेषु नालाभे तु व्यथत्यपि । स्थिरबुद्धिरसक्तात्मा तस्मात्सर्वत्र पूजितः ॥
na hṛṣyatyarthalābheṣu nālābhe tu vyathatyapi | sthirabuddhirasaktātmā tasmātsarvatra pūjitaḥ
धन के लाभ में वे हर्षित नहीं होते और हानि में व्यथित नहीं होते; वे स्थिर बुद्धि और अनासक्त आत्मा वाले हैं; इसीलिए वे सर्वत्र पूजित हैं।
श्लोक 27 (12.237.27)
तं सर्वगुणसंपन्नं दक्षं शुचिमनामयम् । कालज्ञं च प्रियज्ञं च कः प्रियं न करिष्यति ॥
taṃ sarvaguṇasaṃpannaṃ dakṣaṃ śucimanāmayam | kālajñaṃ ca priyajñaṃ ca kaḥ priyaṃ na kariṣyati
सब गुणों से सम्पन्न, कुशल, पवित्र, निरोग, समय को पहचाननेवाले और दूसरों का प्रिय जाननेवाले उस पुरुष का प्रिय कौन नहीं करेगा?
भीष्म उवाच
श्लोक 28 (12.237.28)
इत्युक्तः संप्रशस्यैनमुग्रसेनो गतो गृहात् । आस्ते कृष्णस्तथैकान्ते पर्यङ्के रत्नभूषिते ॥
ityuktaḥ saṃpraśasyainamugraseno gato gṛhāt | āste kṛṣṇastathaikānte paryaṅke ratnabhūṣite
यह सुनकर उग्रसेन उनकी प्रशंसा करके घर से चले गए। कृष्ण रत्नों से सजे पलंग पर एकान्त में बैठे रहे।
श्लोक 29 (12.237.29)
कदाचित्तत्र भगवान्प्रविवेश महामुनिः । तमभ्यर्च्य यथान्यायं तूष्णीमास्ते जनार्दनः ॥
kadācittatra bhagavānpraviveśa mahāmuniḥ | tamabhyarcya yathānyāyaṃ tūṣṇīmāste janārdanaḥ
एक बार वहाँ भगवान् महामुनि नारद आए। जनार्दन ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया और चुप बैठे रहे।
श्लोक 30 (12.237.30)
तं खिन्नमिव संलक्ष्य केशवं वाक्यमब्रवीत् । किमिदं केशव तव वैमनस्यं जनार्दन । अभूतपूर्वं गोविन्द तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
taṃ khinnamiva saṃlakṣya keśavaṃ vākyamabravīt | kimidaṃ keśava tava vaimanasyaṃ janārdana | abhūtapūrvaṃ govinda tanme vyākhyātumarhasi
केशव को खिन्न-सा देखकर नारद ने कहा: "हे केशव, हे जनार्दन, तुम्हारी यह उदासी कैसी है? हे गोविन्द, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ; तुम मुझे यह समझाओ।"
श्रीवासुदेव उवाच
श्लोक 31 (12.237.31)
नासुहृत्परमं मेऽद्य नापदोऽर्हति वेदितुम् । अपण्डितो वापि सुहृत्पण्डितो वाऽप्यनात्मवान् ॥
nāsuhṛtparamaṃ me'dya nāpado'rhati veditum | apaṇḍito vāpi suhṛtpaṇḍito vā'pyanātmavān
जो मित्र नहीं है वह मेरी इस समय की बड़ी विपत्ति जानने के योग्य नहीं; न वह मित्र जो अपण्डित है, और न वह जो पण्डित होकर भी आत्मसंयम से रहित है।
श्लोक 32 (12.237.32)
स त्वं सुहृच्च विद्वांश्च जितात्मा श्रोतुमर्हसि । अप्येतद्धृदि यद्दुःखं तद्भवाञ्श्रोतुमर्हति ॥
sa tvaṃ suhṛcca vidvāṃśca jitātmā śrotumarhasi | apyetaddhṛdi yadduḥkhaṃ tadbhavāñśrotumarhati
किन्तु तुम मित्र हो, विद्वान हो और जितात्मा हो, इसलिए सुनने के योग्य हो। मेरे हृदय में जो दुःख है, उसे भी तुम सुन सकते हो।
श्लोक 33 (12.237.33)
दास्यमैश्वर्यवादेन ज्ञातीनां च करोम्यहम् । द्विषन्ति सततं क्रुद्धा ज्ञातिसंबन्धिबान्धवाः ॥
dāsyamaiśvaryavādena jñātīnāṃ ca karomyaham | dviṣanti satataṃ kruddhā jñātisaṃbandhibāndhavāḥ
ऐश्वर्य के नाम पर मैं अपने जातिबन्धुओं की दासता करता हूँ, फिर भी मेरे जाति-भाई, सम्बन्धी और बन्धु क्रोधित होकर निरन्तर मुझसे द्वेष करते हैं।
श्लोक 34 (12.237.34)
दिव्या अपि तथा भोगा दत्तास्तेषां मया पृथक् । तथाऽपि च द्विषन्तो मां वर्तन्ते च परस्परम् ॥
divyā api tathā bhogā dattāsteṣāṃ mayā pṛthak | tathā'pi ca dviṣanto māṃ vartante ca parasparam
मैंने उनमें से हर एक को दिव्य भोग भी दिए; फिर भी वे मुझसे द्वेष करते रहते हैं और आपस में भी वैसा ही बर्ताव करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 35 (12.237.35)
अनायसेन शस्त्रेण परिमृज्यानुमृज्य च । जिह्वामुद्धर चैतेषां न वक्ष्यन्ति ततः परम् ॥
anāyasena śastreṇa parimṛjyānumṛjya ca | jihvāmuddhara caiteṣāṃ na vakṣyanti tataḥ param
बिना लोहे के शस्त्र से उन्हें चारों ओर से पोंछ-पोंछकर उनकी जीभ उखाड़ दो; इसके बाद वे कुछ नहीं कहेंगे।
भगवानुवाच
श्लोक 36 (12.237.36)
अनायसं कथं विन्द्यां शस्त्रं मुनिवरोत्तम । येनैषामुद्धरे जिह्वां ब्रूहि तन्मे यथातथम् ॥
anāyasaṃ kathaṃ vindyāṃ śastraṃ munivarottama | yenaiṣāmuddhare jihvāṃ brūhi tanme yathātatham
हे मुनिश्रेष्ठ, मैं बिना लोहे का वह शस्त्र कैसे पाऊँ जिससे उनकी जीभ उखाड़ सकूँ? मुझे ठीक-ठीक बताइए।
नारद उवाच
श्लोक 37 (12.237.37)
गोहिरण्यं च वासांसि रत्नाद्यं यद्धनं बहु । आस्ये प्रक्षिप चैतेषां शस्त्रमेतदनायसम् ॥
gohiraṇyaṃ ca vāsāṃsi ratnādyaṃ yaddhanaṃ bahu | āsye prakṣipa caiteṣāṃ śastrametadanāyasam
गायें, सोना, वस्त्र और रत्न आदि जो बहुत-सा धन है, उसे उनके मुँह में डाल दो। यही बिना लोहे का शस्त्र है।
श्लोक 38 (12.237.38)
सुहृत्संबन्धिमित्राणां गुरूणां स्वजनस्य च । आख्यातं शस्त्रमेतद्धि तेन च्छिन्धि पुनः पुनः ॥
suhṛtsaṃbandhimitrāṇāṃ gurūṇāṃ svajanasya ca | ākhyātaṃ śastrametaddhi tena cchindhi punaḥ punaḥ
मित्रों, सम्बन्धियों, साथियों, गुरुजनों और स्वजनों के लिए यही शस्त्र कहा गया है; इससे बार-बार उन्हें काटते रहो।
श्लोक 39 (12.237.39)
तवैश्वर्यप्रदानानि श्लाघ्यमेषां वचांसि च । समर्थं त्वामभिज्ञाय प्रवदन्ति च ते नराः ॥
tavaiśvaryapradānāni ślāghyameṣāṃ vacāṃsi ca | samarthaṃ tvāmabhijñāya pravadanti ca te narāḥ
तुम्हारे ऐश्वर्य के दान प्रशंसनीय होंगे और उनके वचन भी अनुकूल होंगे; तुम्हें समर्थ जानकर वे लोग तुम्हारे विषय में अच्छा ही कहेंगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 40 (12.237.40)
ततः प्रहस्य भगवान्संपूज्य च महामुनिम् । तथाऽकरोन्महातेजा मुनिवाक्येन चोदितः ॥
tataḥ prahasya bhagavānsaṃpūjya ca mahāmunim | tathā'karonmahātejā munivākyena coditaḥ
तब महातेजस्वी भगवान् ने हँसकर महामुनि का सत्कार किया और मुनि की बात से प्रेरित होकर वैसा ही किया।
श्लोक 41 (12.237.41)
एवंप्रभावो ब्रह्मर्षिर्नारदो मुनिसत्तमः । पृष्टवानसि यन्मां त्वं तदुक्तं राजसत्तम ॥
evaṃprabhāvo brahmarṣirnārado munisattamaḥ | pṛṣṭavānasi yanmāṃ tvaṃ taduktaṃ rājasattama
मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि नारद का ऐसा प्रभाव है। हे राजश्रेष्ठ, तुमने मुझसे जो पूछा था वह मैंने कह दिया।
श्लोक 42 (12.237.42)
सर्वधर्महिते युक्ताः सत्यधर्मपरायणाः । लोकप्रियत्वं गच्छन्ति ज्ञानविज्ञानकोविदाः ॥
sarvadharmahite yuktāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ | lokapriyatvaṃ gacchanti jñānavijñānakovidāḥ
जो सबके हित और धर्म में लगे रहते हैं, सत्य और धर्म को ही अपना आश्रय बनाते हैं और ज्ञान तथा विज्ञान में निपुण हैं, वे लोकप्रिय हो जाते हैं।