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शान्ति पर्व · अध्याय 238

व्यास का शुक को सृष्टि-क्रम और युगों का उपदेश

युधिष्ठिर भीष्म से सब प्राणियों के आदि और अन्त के विषय में पूछते हैं, और भीष्म वह प्रसंग सुनाते हैं जब शुक ने अपने पिता व्यास से ये प्रश्न किए थे। व्यास बताते हैं कि प्रधान और महत्-तत्त्व से अहंकार, पाँच भूत और उनके गुण, इन्द्रियाँ और मन कैसे उत्पन्न होते हैं, और विधाता प्राणियों की सृष्टि कैसे करता है। फिर वे निमेष से लेकर ब्रह्मा के दिन तक के कालमान, चारों युगों की अवधि और उनके बदलते धर्म का वर्णन करते हैं, और अन्त में कहते हैं कि वेद, कर्ता, कर्म और उसका फल, यह सब अब कह दिया गया।

अध्याय 237अध्याय-सूचीअध्याय 239

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.238.1)

आद्यन्तं सर्वभूतानां ज्ञातुमिच्छामि कौरव । ध्यानं कर्म च कालं च तथैवायुर्युगेयुगे ॥

ādyantaṃ sarvabhūtānāṃ jñātumicchāmi kaurava | dhyānaṃ karma ca kālaṃ ca tathaivāyuryugeyuge

हे कुरुनन्दन, मैं सब प्राणियों का आदि और अन्त जानना चाहता हूँ, और प्रत्येक युग में उनका ध्यान, कर्म, काल और आयु कैसी होती है, यह भी।

श्लोक 2 (12.238.2)

लोकतत्त्वं च कार्त्स्न्येन भूतानामागतिं गतिम् । सर्गश्च निधनं चैव कुत एतत्प्रवर्तते ॥

lokatattvaṃ ca kārtsnyena bhūtānāmāgatiṃ gatim | sargaśca nidhanaṃ caiva kuta etatpravartate

मैं लोक के तत्त्व को सम्पूर्ण रूप से, प्राणियों के आने और जाने को, तथा सृष्टि और प्रलय को भी जानना चाहता हूँ: यह सब किससे प्रवृत्त होता है?

श्लोक 3 (12.238.3)

भेदकं भेदतत्वं च तथाऽन्येषां मतं तथा । अवस्थात्रितयं चैव यादृशं च पितामह ॥

bhedakaṃ bhedatatvaṃ ca tathā'nyeṣāṃ mataṃ tathā | avasthātritayaṃ caiva yādṛśaṃ ca pitāmaha

पितामह, मैं भेद करनेवाले तत्त्व और भेद के तत्त्व के विषय में, दूसरों के मतों के विषय में, और तीन अवस्थाओं के विषय में भी पूछता हूँ कि वे कैसी हैं।

श्लोक 4 (12.238.4)

यदि तेऽनुग्रहे बुद्धिरस्मास्विह सतां वर । एतद्भवन्तं पृच्छामि तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥

yadi te'nugrahe buddhirasmāsviha satāṃ vara | etadbhavantaṃ pṛcchāmi tadbhavānprabravītu me

सज्जनों में श्रेष्ठ, यदि आपकी बुद्धि यहाँ हम पर अनुग्रह करने की हो, तो मैं आपसे यही पूछता हूँ; आप मुझे यह बताइए।

श्लोक 5 (12.238.5)

पूर्वं हि कथितं श्रुत्वा भृगुभाषितमुत्तमम् । भरद्वाजस्य विप्रर्षेस्ततो मे बुद्धिरुत्तमा ॥

pūrvaṃ hi kathitaṃ śrutvā bhṛgubhāṣitamuttamam | bharadvājasya viprarṣestato me buddhiruttamā

ब्रह्मर्षि भरद्वाज से भृगु ने जो उत्तम उपदेश कहा था, उसे सुनकर मुझमें एक उत्तम बुद्धि उत्पन्न हुई है,

श्लोक 6 (12.238.6)

जाता परमधर्मिष्ठा दिव्यसंस्थानसंस्थिता । ततो भूयस्तु पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

jātā paramadharmiṣṭhā divyasaṃsthānasaṃsthitā | tato bhūyastu pṛcchāmi tadbhavānvaktumarhati

जो परम धर्मनिष्ठ है और दिव्य अवस्था में स्थित है। इसलिए मैं आगे और पूछता हूँ; आप मुझे बताने योग्य हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (12.238.7)

अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् । जगौ यद्भगवान्व्यासः पुत्राय परिपृच्छते ॥

atra te vartayiṣye'hamitihāsaṃ purātanam | jagau yadbhagavānvyāsaḥ putrāya paripṛcchate

इस विषय में मैं तुम्हें एक पुराना इतिहास सुनाऊँगा, जिसे भगवान् व्यास ने अपने पूछनेवाले पुत्र को सुनाया था।

श्लोक 8 (12.238.8)

अधीत्य वेदानखिलान्साङ्गोपनिषदस्तथा । अन्विच्छन्नैष्ठिकं कर्म धर्मनैपुणदर्शनात् ॥

adhītya vedānakhilānsāṅgopaniṣadastathā | anvicchannaiṣṭhikaṃ karma dharmanaipuṇadarśanāt

समस्त वेदों को अंगों और उपनिषदों सहित पढ़कर, और धर्म की सूक्ष्मता को देखने के कारण निष्ठा-युक्त कर्म की खोज करते हुए,

श्लोक 9 (12.238.9)

कृष्णद्वैपायनं व्यासं पुत्रो वैयासकिः शुकः । पप्रच्छ संशयमिमं छिन्नधर्मार्थसंशयम् ॥

kṛṣṇadvaipāyanaṃ vyāsaṃ putro vaiyāsakiḥ śukaḥ | papraccha saṃśayamimaṃ chinnadharmārthasaṃśayam

व्यास के पुत्र वैयासकि शुक ने धर्म और अर्थ के सब संशयों को काट देनेवाले कृष्णद्वैपायन व्यास से अपना यह संशय पूछा।

श्रीशुक उवाच

श्लोक 10 (12.238.10)

भूतग्रामस्य कर्तारं कालज्ञाने च निश्चितम् । ज्ञानं ब्रह्म च योगं च गवात्मकमिदं जगत् ॥

bhūtagrāmasya kartāraṃ kālajñāne ca niścitam | jñānaṃ brahma ca yogaṃ ca gavātmakamidaṃ jagat

प्राणिसमूह के कर्ता के विषय में और काल के ज्ञान में जो निश्चित है उसके विषय में बताइए; ज्ञान, ब्रह्म और योग के विषय में, और इन्द्रियस्वरूप इस जगत् के विषय में भी;

श्लोक 11 (12.238.11)

त्रितये त्वेनमायाति तथा ह्येषोऽपि वा पुनः । केनैव च विभागः स्यात्तुरीयो लक्षणैर्विना ॥

tritaye tvenamāyāti tathā hyeṣo'pi vā punaḥ | kenaiva ca vibhāgaḥ syātturīyo lakṣaṇairvinā

तीन अवस्थाओं में यह कैसे प्राप्त होता है, और फिर यह भी कैसे वैसा है; तथा चौथी अवस्था, जो लक्षणों से रहित है, किस विभाग और किन लक्षणों से पहचानी जाए;

श्लोक 12 (12.238.12)

ज्ञानज्ञेयान्तरे कोसौ कोयं भावस्तु भेदवत् । यज्ज्ञानं लक्षणं चैव तेषां कर्तारमेव च । ब्राह्मणस्य च यत्कृत्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

jñānajñeyāntare kosau koyaṃ bhāvastu bhedavat | yajjñānaṃ lakṣaṇaṃ caiva teṣāṃ kartārameva ca | brāhmaṇasya ca yatkṛtyaṃ tadbhavānvaktumarhati

ज्ञान और ज्ञेय के बीच में कौन है, और यह भेदयुक्त-सा भाव क्या है; ज्ञान क्या है, उसका लक्षण क्या है, और उनका कर्ता कौन है; तथा ब्राह्मण का कर्तव्य क्या है। यह सब आप मुझे बताने योग्य हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (12.238.13)

तस्मै प्रोवाच तत्सर्वं पिता पुत्राय पृच्छते । अतीतानागते विद्वान्सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥

tasmai provāca tatsarvaṃ pitā putrāya pṛcchate | atītānāgate vidvānsarvajñaḥ sarvadharmavit

पूछनेवाले पुत्र से उसके पिता ने, जो सर्वज्ञ, सब धर्मों के ज्ञाता और भूत तथा भविष्य के जाननेवाले विद्वान् थे, यह सब कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 14 (12.238.14)

पृच्छतस्तव सत्पुत्र यथावत्कीर्तयाम्यहम् । शृणुष्वावहितो भूत्वा यथाऽऽवृतमिदं जगत् ॥

pṛcchatastava satputra yathāvatkīrtayāmyaham | śṛṇuṣvāvahito bhūtvā yathā''vṛtamidaṃ jagat

सुपुत्र, जैसा तुम पूछ रहे हो, मैं तुम्हें ठीक-ठीक बताऊँगा। ध्यान लगाकर सुनो कि यह जगत् किस प्रकार आवृत है।

श्लोक 15 (12.238.15)

कार्यादि कारणान्तं यत्कार्यान्तं कारणादिकम् । ज्ञानं तदुभयं वित्त्वा सत्यं च परमं शुभम् ॥

kāryādi kāraṇāntaṃ yatkāryāntaṃ kāraṇādikam | jñānaṃ tadubhayaṃ vittvā satyaṃ ca paramaṃ śubham

जो कार्य से आरम्भ होकर कारण पर समाप्त होता है और जो कारण से आरम्भ होकर कार्य पर समाप्त होता है, इन दोनों को ज्ञान जानकर परम और शुभ सत्य को भी जानो।

श्लोक 16 (12.238.16)

ब्रह्मेति चाभिविख्यातं तद्वै पश्यन्ति सूरयः । ब्रह्मतेजोमयं भूतं भूतकारणमद्भुतम् ॥

brahmeti cābhivikhyātaṃ tadvai paśyanti sūrayaḥ | brahmatejomayaṃ bhūtaṃ bhūtakāraṇamadbhutam

जिसे ब्रह्म कहा जाता है, उसे ज्ञानी देखते हैं: वह ब्रह्म के तेज से परिपूर्ण, अद्भुत और प्राणियों का कारण है।

श्लोक 17 (12.238.17)

आसीदादौ ततस्त्वाहुः प्राधान्यमिति तद्विदः । त्रिगुणां तां महामायां वैष्णवीं प्रकृतिं विदुः ॥

āsīdādau tatastvāhuḥ prādhānyamiti tadvidaḥ | triguṇāṃ tāṃ mahāmāyāṃ vaiṣṇavīṃ prakṛtiṃ viduḥ

जानकार कहते हैं कि आदि में प्राधान्य (प्रधान) था; उसे वे तीन गुणोंवाली महामाया, विष्णु की प्रकृति के रूप में जानते हैं।

श्लोक 18 (12.238.18)

तदीदृशमनाद्यन्तमव्यक्तमजरं ध्रुवम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे वैकृतं च तत् ॥

tadīdṛśamanādyantamavyaktamajaraṃ dhruvam | apratarkyamavijñeyaṃ brahmāgre vaikṛtaṃ ca tat

वह ऐसा है: आदि-अन्त से रहित, अव्यक्त, अजर, ध्रुव, तर्क से परे और अविज्ञेय। वह आदि में ब्रह्म है और विकार को प्राप्त हुआ भी वही है।

श्लोक 19 (12.238.19)

तद्वै प्रधानमुद्दिष्टं त्रिसूक्ष्मं त्रिगुणात्मकम् । सम्यग्योगगुणं स्वस्थं तदिच्छाक्षोभितं महत् ॥

tadvai pradhānamuddiṣṭaṃ trisūkṣmaṃ triguṇātmakam | samyagyogaguṇaṃ svasthaṃ tadicchākṣobhitaṃ mahat

उसी को प्रधान कहा गया है, जो तीन प्रकार से सूक्ष्म है, तीन गुणोंवाला है, योग-गुण से भली-भाँति युक्त और अपने में स्थित है; उसकी इच्छा से क्षुब्ध होकर वह महत् हुआ।

श्लोक 20 (12.238.20)

शक्तित्रयात्मिका तस्य प्रकृतिः कारणात्मिका । अस्वतन्त्रा च सततं विदधिष्ठानसंयुता ॥

śaktitrayātmikā tasya prakṛtiḥ kāraṇātmikā | asvatantrā ca satataṃ vidadhiṣṭhānasaṃyutā

उसकी प्रकृति, जो कारणरूप है, तीन शक्तियों वाली है; वह सदा परतन्त्र है और अधिष्ठाता चेतन से संयुक्त है।

श्लोक 21 (12.238.21)

स्वभावाख्यं समापन्ना मोहविग्रहधारिणी । विविधस्यास्य जीवस्य भोगार्थं समुपागता ॥

svabhāvākhyaṃ samāpannā mohavigrahadhāriṇī | vividhasyāsya jīvasya bhogārthaṃ samupāgatā

स्वभाव नाम धारण कर और मोह का रूप लिए हुए वह इस नाना प्रकार के जीव के भोग के लिए आई है।

श्लोक 22 (12.238.22)

यथा संनिधिमात्रेण गन्धक्षोभाय जायते । मनस्तद्वदशेषस्य परात्पर इति स्मृतः ॥

yathā saṃnidhimātreṇa gandhakṣobhāya jāyate | manastadvadaśeṣasya parātpara iti smṛtaḥ

जैसे गन्ध की निकटता मात्र से मन क्षुब्ध होता है, वैसे ही परात्पर परमात्मा सम्पूर्ण जगत् को क्षुब्ध करनेवाला माना गया है।

श्लोक 23 (12.238.23)

सृष्ट्वा प्रविश्य तत्तस्मिन्क्षोभयामास विष्ठितः । सात्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान् ॥

sṛṣṭvā praviśya tattasminkṣobhayāmāsa viṣṭhitaḥ | sātviko rājasaścaiva tāmasaśca tridhā mahān

उसकी सृष्टि कर और उसमें प्रवेश कर वह भीतर स्थित होकर उसे क्षुब्ध करता रहा; वह महत् तीन प्रकार का हुआ: सात्त्विक, राजस और तामस।

श्लोक 24 (12.238.24)

प्रधानतत्वादुद्भूतो महत्वाच्च महान्स्मृतः । प्रधानतत्वमुद्भूतं महत्तत्वं समावृणोत् ॥

pradhānatatvādudbhūto mahatvācca mahānsmṛtaḥ | pradhānatatvamudbhūtaṃ mahattatvaṃ samāvṛṇot

वह प्रधान-तत्त्व से उत्पन्न हुआ और अपनी महत्ता के कारण महान् कहा गया; उत्पन्न हुए प्रधान-तत्त्व ने महत्-तत्त्व को आवृत कर लिया।

श्लोक 25 (12.238.25)

कालात्मनाऽभिभूतं तत्कालोंऽशः परमात्मनः । पुरुषश्चाप्रमेयात्मा स एव इति गीयते ॥

kālātmanā'bhibhūtaṃ tatkāloṃ'śaḥ paramātmanaḥ | puruṣaścāprameyātmā sa eva iti gīyate

कालरूप आत्मा से अभिभूत होकर वह वैसा हुआ; काल परमात्मा का अंश है, और अप्रमेय आत्मावाला पुरुष वही कहा जाता है।

श्लोक 26 (12.238.26)

त्रिगुणोसौ महाज्ञातः प्रधान इति वै श्रुतिः ॥

triguṇosau mahājñātaḥ pradhāna iti vai śrutiḥ

यह तीन गुणोंवाला, महा-ज्ञात ही प्रधान है: ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 27 (12.238.27)

सात्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधात्मकः । त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्वादजायत ॥

sātviko rājasaścaiva tāmasaśca tridhātmakaḥ | trividho'yamahaṅkāro mahattatvādajāyata

सात्त्विक, राजस और तामस, इस प्रकार तीन रूपोंवाला यह तीन प्रकार का अहंकार महत्-तत्त्व से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 28 (12.238.28)

तामसोऽसावहङ्कारो भूतादिरिति संज्ञितः । भूतानामादिभूतत्वाद्रक्ताहिस्तामसः स्मृतः ॥

tāmaso'sāvahaṅkāro bhūtādiriti saṃjñitaḥ | bhūtānāmādibhūtatvādraktāhistāmasaḥ smṛtaḥ

तामस अहंकार भूतादि नाम से कहा गया है; क्योंकि वह भूतों का आदि है, इसलिए तामस अहंकार रक्ताहि कहलाता है।

श्लोक 29 (12.238.29)

भूतादिः स विकुर्वाणः शिष्टं तन्मात्रकं ततः । ससर्ज शब्दं तन्मात्रमाकाशं शब्दलक्षणम् ॥

bhūtādiḥ sa vikurvāṇaḥ śiṣṭaṃ tanmātrakaṃ tataḥ | sasarja śabdaṃ tanmātramākāśaṃ śabdalakṣaṇam

विकार को प्राप्त होते हुए उस भूतादि ने तब शेष तन्मात्रा की सृष्टि की: उसने शब्द-तन्मात्रा और शब्द-लक्षणवाले आकाश को रचा।

श्लोक 30 (12.238.30)

शब्दलक्षणमाकाशं शब्दतन्मात्रमावृणोत् । तेन संपीड्यमानस्तु स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ॥

śabdalakṣaṇamākāśaṃ śabdatanmātramāvṛṇot | tena saṃpīḍyamānastu sparśamātraṃ sasarja ha

शब्द-लक्षणवाले आकाश ने शब्द-तन्मात्रा को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने स्पर्श-तन्मात्रा की सृष्टि की।

श्लोक 31 (12.238.31)

शब्दमात्रं तदाकाशं स्पर्शमात्रं समावृणोत् । ससर्ज वायुस्तेनासौ पीड्यमान इति श्रुतिः ॥

śabdamātraṃ tadākāśaṃ sparśamātraṃ samāvṛṇot | sasarja vāyustenāsau pīḍyamāna iti śrutiḥ

शब्दमात्र वह आकाश स्पर्शमात्र को आवृत करता है; उससे पीड़ित होकर उसने वायु को रचा, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 32 (12.238.32)

स्पर्शमात्रं तदा वायू रूपमात्रं समावृणोत् । तेन संपीड्यमानस्तु ससर्जाग्निमिति श्रुतिः ॥

sparśamātraṃ tadā vāyū rūpamātraṃ samāvṛṇot | tena saṃpīḍyamānastu sasarjāgnimiti śrutiḥ

तब स्पर्शमात्र वायु ने रूपमात्र को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने अग्नि को रचा, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 33 (12.238.33)

रूपमात्रं ततो वह्निं समुत्सृज्य समावृणोत् । तेन संपीड्यमानस्तु रसमात्रं ससर्ज ह ॥

rūpamātraṃ tato vahniṃ samutsṛjya samāvṛṇot | tena saṃpīḍyamānastu rasamātraṃ sasarja ha

तब अग्नि को उत्पन्न कर उसने रूपमात्र को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने रसमात्र की सृष्टि की।

श्लोक 34 (12.238.34)

रूपमात्रगतं तेजो रसमात्रं समावृणोत् । तेन संपीड्यमानस्तु ससर्जाम्भ इति श्रुतिः ॥

rūpamātragataṃ tejo rasamātraṃ samāvṛṇot | tena saṃpīḍyamānastu sasarjāmbha iti śrutiḥ

रूपमात्र में स्थित तेज ने रसमात्र को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने जल को रचा, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 35 (12.238.35)

रसमात्रात्मकं भूयो रसं तन्मात्रमावृणोत् । तेन संपीड्यमानस्तु गन्धं तन्मात्रकं ततः ॥

rasamātrātmakaṃ bhūyo rasaṃ tanmātramāvṛṇot | tena saṃpīḍyamānastu gandhaṃ tanmātrakaṃ tataḥ

फिर रसमात्र-स्वरूप ने रस-तन्मात्रा को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने तब गन्ध-तन्मात्रा को उत्पन्न किया।

श्लोक 36 (12.238.36)

ससर्ज गन्धं तन्मात्रमावृणोत्करकं ततः । तेन संपीड्यमानस्तु काठिन्यं च ससर्ज ह ॥

sasarja gandhaṃ tanmātramāvṛṇotkarakaṃ tataḥ | tena saṃpīḍyamānastu kāṭhinyaṃ ca sasarja ha

उसने गन्ध-तन्मात्रा की सृष्टि की और तब कठोर पिण्ड (करक) को आवृत किया; उससे पीड़ित होकर उसने कठिनता को रचा।

श्लोक 37 (12.238.37)

पृथिवी जायते तस्माद्गन्धतन्मात्रजात्तथा ॥

pṛthivī jāyate tasmādgandhatanmātrajāttathā

गन्ध-तन्मात्रा से पृथ्वी उत्पन्न होती है।

श्लोक 38 (12.238.38)

अम्मयं सर्वमेवेदमापस्तस्तम्भिरे पुनः । भूतानीमानि जातानि पृथिव्यादीनि वै श्रुतिः ॥

ammayaṃ sarvamevedamāpastastambhire punaḥ | bhūtānīmāni jātāni pṛthivyādīni vai śrutiḥ

यह सब जलमय है; फिर जल दृढ़ हो गया। इस प्रकार पृथ्वी आदि ये भूत उत्पन्न हुए, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 39 (12.238.39)

भूतानां मूर्तिरेवैषामन्नं चैषां मता बुधैः । तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तन्मात्रा इति ते स्मृताः ॥

bhūtānāṃ mūrtirevaiṣāmannaṃ caiṣāṃ matā budhaiḥ | tasmiṃstasmiṃstu tanmātrā tanmātrā iti te smṛtāḥ

ज्ञानी लोग इन्हें ही प्राणियों की मूर्ति और उनका अन्न मानते हैं। उनमें से प्रत्येक में उसकी अपनी तन्मात्रा है, इसीलिए वे तन्मात्रा कहे जाते हैं।

श्लोक 40 (12.238.40)

तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश । एकादशं मनश्चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः ॥

taijasānīndriyāṇyāhurdevā vaikārikā daśa | ekādaśaṃ manaścātra devā vaikārikāḥ smṛtāḥ

कहा गया है कि इन्द्रियाँ तैजस हैं; दस देवता वैकारिक हैं; यहाँ ग्यारहवाँ मन है, और उसके देवता भी वैकारिक माने गए हैं।

श्लोक 41 (12.238.41)

एषामुद्धर्तकः कालो नानाभेदवदास्थितः । परमात्मा च भूतात्मा गुणभेदेन संस्थितः । एक एव त्रिधा भिन्नः करोति विविधाः क्रियाः ॥

eṣāmuddhartakaḥ kālo nānābhedavadāsthitaḥ | paramātmā ca bhūtātmā guṇabhedena saṃsthitaḥ | eka eva tridhā bhinnaḥ karoti vividhāḥ kriyāḥ

इन सबको फिर समेटनेवाला काल है, जो नाना भेदों वाले की तरह स्थित है। परमात्मा और भूतात्मा गुणों के भेद से स्थित हैं; वह एक ही तीन प्रकार से विभक्त होकर अनेक प्रकार के कर्म करता है।

श्लोक 42 (12.238.42)

ब्रह्मा सृजति भूतानि पाति नारायणोऽव्ययः । रुद्रो हन्ति जगन्मूर्तिः काल एष क्रियाबुधः ॥

brahmā sṛjati bhūtāni pāti nārāyaṇo'vyayaḥ | rudro hanti jaganmūrtiḥ kāla eṣa kriyābudhaḥ

ब्रह्मा प्राणियों की सृष्टि करते हैं, अविनाशी नारायण पालन करते हैं और जगत्-रूप रुद्र संहार करते हैं। यह कर्मों को जाननेवाला काल है।

श्लोक 43 (12.238.43)

कालोपि तन्मयोचिन्त्यस्त्रिगुणात्मा सनातनः । अव्यक्तोसावचिन्त्योसौ वर्तते भिन्नलक्षणः ॥

kālopi tanmayocintyastriguṇātmā sanātanaḥ | avyaktosāvacintyosau vartate bhinnalakṣaṇaḥ

काल भी उसी से बना है: अचिन्त्य, त्रिगुणात्मक और सनातन। वह अव्यक्त और अचिन्त्य भिन्न-भिन्न लक्षणों के साथ स्थित है।

श्लोक 44 (12.238.44)

कालात्मना त्विदं भिन्नमभिन्नं श्रूयते हि यत् । अनाद्यन्तमजं दिव्यमव्यक्तमजरं ध्रुवम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे संप्रवर्तते ॥

kālātmanā tvidaṃ bhinnamabhinnaṃ śrūyate hi yat | anādyantamajaṃ divyamavyaktamajaraṃ dhruvam | apratarkyamavijñeyaṃ brahmāgre saṃpravartate

काल-स्वरूप आत्मा के द्वारा जो भिन्न और अभिन्न दोनों सुना जाता है, वह आदि-अन्त से रहित, अजन्मा, दिव्य, अव्यक्त, अजर, ध्रुव, तर्क से परे और अविज्ञेय तत्त्व आरम्भ में ब्रह्म के रूप में प्रवृत्त होता है।

श्लोक 45 (12.238.45)

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव । त्रिंशत्तु काष्ठा गणयेत्कलां ताम् । त्रिंशत्कलश्चापि भवेन्मुहूर्तो । भागः कलाया दशमश्च यः स्यात् ॥

kāṣṭhā nimeṣā daśa pañca caiva | triṃśattu kāṣṭhā gaṇayetkalāṃ tām | triṃśatkalaścāpi bhavenmuhūrto | bhāgaḥ kalāyā daśamaśca yaḥ syāt

पन्द्रह निमेष की एक काष्ठा होती है; तीस काष्ठाओं की एक कला गिनो; तीस कला और कला का एक दसवाँ भाग मिलकर एक मुहूर्त होता है।

श्लोक 46 (12.238.46)

त्रिंशन्मुहूर्तं तु भवेदहश्च । रात्रिश्च सङ्ख्या मुनिभिः प्रणीता । मासः स्मृतो रात्र्यहनी च त्रिंशत् । संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ॥

triṃśanmuhūrtaṃ tu bhavedahaśca | rātriśca saṅkhyā munibhiḥ praṇītā | māsaḥ smṛto rātryahanī ca triṃśat | saṃvatsaro dvādaśamāsa uktaḥ

तीस मुहूर्त का एक दिन होता है, और रात्रि भी इतनी ही होती है; मुनियों ने यही गणना निश्चित की है। तीस दिन-रात का एक मास माना गया है और बारह मास का एक वर्ष कहा गया है।

श्लोक 47 (12.238.47)

संवत्सरं द्वे अयने वदन्ति । सङ्ख्याविदो दक्षिणमुत्तरं च ॥

saṃvatsaraṃ dve ayane vadanti | saṅkhyāvido dakṣiṇamuttaraṃ ca

गणना जाननेवाले कहते हैं कि वर्ष के दो अयन हैं, दक्षिण और उत्तर।

श्लोक 48 (12.238.48)

अहोरात्रौ विभजते सूर्यो मानुषलौकिकौ । रात्रिः स्वप्नाय संयाति चेष्टायै कर्मणामहः ॥

ahorātrau vibhajate sūryo mānuṣalaukikau | rātriḥ svapnāya saṃyāti ceṣṭāyai karmaṇāmahaḥ

सूर्य मनुष्यलोक के दिन और रात को अलग करता है: रात्रि सोने के लिए होती है और दिन कर्मों की चेष्टा के लिए।

श्लोक 49 (12.238.49)

पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः । शुक्लोऽहः कर्मचेष्टायां कृष्णः स्वप्नाय शर्वरी ॥

pitrye rātryahanī māsaḥ pravibhāgastayoḥ punaḥ | śuklo'haḥ karmaceṣṭāyāṃ kṛṣṇaḥ svapnāya śarvarī

पितरों का एक मास उनके दिन-रात होता है, और उसका विभाग फिर इस प्रकार है: शुक्ल पक्ष दिन है, जो कर्म और चेष्टा के लिए है, और कृष्ण पक्ष रात्रि है, जो सोने के लिए है।

श्लोक 50 (12.238.50)

दैवे रात्र्यहनी ह्यब्दः प्रविभागस्तयोः पुनः । अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ॥

daive rātryahanī hyabdaḥ pravibhāgastayoḥ punaḥ | ahastatrodagayanaṃ rātriḥ syāddakṣiṇāyanam

देवताओं का एक वर्ष उनके दिन-रात होता है, और उसका विभाग फिर इस प्रकार है: उत्तरायण दिन है और दक्षिणायन रात्रि।

श्लोक 51 (12.238.51)

ये ते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते दैवलौकिके । तयोः सङ्ख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहः क्षपे ॥

ye te rātryahanī pūrvaṃ kīrtite daivalaukike | tayoḥ saṅkhyāya varṣāgraṃ brāhme vakṣyāmyahaḥ kṣape

देवों और मनुष्यों के जिन दो दिन-रातों का पहले वर्णन किया गया, उनके वर्षों की गणना करके मैं ब्रह्मा के दिन और रात्रि के वर्षों का योग बताऊँगा।

श्लोक 52 (12.238.52)

तेषां संवत्सराग्राणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । कृते त्रेतायुगे चैव द्वापरे च कलौ तथा ॥

teṣāṃ saṃvatsarāgrāṇi pravakṣyāmyanupūrvaśaḥ | kṛte tretāyuge caiva dvāpare ca kalau tathā

मैं क्रम से उनके वर्षों के योग बताऊँगा: कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग में।

श्लोक 53 (12.238.53)

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् । तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥

catvāryāhuḥ sahasrāṇi varṣāṇāṃ tatkṛtaṃ yugam | tasya tāvacchatī saṃdhyā saṃdhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

कहते हैं कि कृतयुग चार हज़ार वर्षों का है; उसकी सन्ध्या चार सौ वर्षों की और सन्ध्यांश भी उतना ही है।

श्लोक 54 (12.238.54)

इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु । एकापायेन संयान्ति सहस्राणि शतानि च ॥

itareṣu sasaṃdhyeṣu saṃdhyāṃśeṣu tatastriṣu | ekāpāyena saṃyānti sahasrāṇi śatāni ca

शेष तीन युगों में, उनकी सन्ध्याओं और सन्ध्यांशों सहित, हज़ार और सौ एक-एक घटते जाते हैं।

श्लोक 55 (12.238.55)

एतानि शाश्वताँल्लोकान्धारयन्ति सनातनान् । एतद्ब्रह्मविदां तात विदितं ब्रह्म शाश्वतम् ॥

etāni śāśvatām̐llokāndhārayanti sanātanān | etadbrahmavidāṃ tāta viditaṃ brahma śāśvatam

ये सनातन और शाश्वत लोकों को धारण करते हैं। तात, यह ब्रह्मवेत्ताओं को ज्ञात है: शाश्वत ब्रह्म।

श्लोक 56 (12.238.56)

चतुष्पात्सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे । नाधर्मेणागमः कश्चिद्युगे तस्मिन्प्रवर्तते ॥

catuṣpātsakalo dharmaḥ satyaṃ caiva kṛte yuge | nādharmeṇāgamaḥ kaścidyuge tasminpravartate

कृतयुग में धर्म चारों पादों से पूर्ण रहता है, और सत्य भी; उस युग में अधर्म से कोई लाभ नहीं होता।

श्लोक 57 (12.238.57)

इतरेष्वागमाद्धर्मः पादशस्त्ववरोप्यते । सत्यं शौचं तथायुश्च धर्मश्चापैति पादशः । चौर्यकानृतमायाभिरधर्मश्चोपचीयते ॥

itareṣvāgamāddharmaḥ pādaśastvavaropyate | satyaṃ śaucaṃ tathāyuśca dharmaścāpaiti pādaśaḥ | cauryakānṛtamāyābhiradharmaścopacīyate

अन्य युगों में ऐसे लाभों के कारण धर्म एक-एक पाद करके घटाया जाता है। सत्य, शौच, आयु और धर्म पाद-पाद करके चले जाते हैं, और चोरी, असत्य तथा छल से अधर्म बढ़ता जाता है।

श्लोक 58 (12.238.58)

अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः । कृते त्रेतायुगे त्वेषां पादशो ह्रसते वयः ॥

arogāḥ sarvasiddhārthāścaturvarṣaśatāyuṣaḥ | kṛte tretāyuge tveṣāṃ pādaśo hrasate vayaḥ

कृतयुग में मनुष्य नीरोग रहते हैं, उनके सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं और वे चार सौ वर्ष जीते हैं; कृत से त्रेता में आने पर उनकी आयु एक-एक पाद घटती है।

श्लोक 59 (12.238.59)

वेदवादाश्चानुयुगं ह्रसन्तीतीह न श्रुतम् । आयूंषि चाशिषश्चैव वेदस्यैव च यत्फलम् ॥

vedavādāścānuyugaṃ hrasantītīha na śrutam | āyūṃṣi cāśiṣaścaiva vedasyaiva ca yatphalam

यहाँ यह नहीं सुना गया कि वेद के सिद्धान्त प्रत्येक युग में घटते जाते हैं; किन्तु आयु, आशीर्वाद और स्वयं वेद का फल घटते जाते हैं।

श्लोक 60 (12.238.60)

अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे । अन्ये कलियुगे धर्मा यथाशक्ति कृता इव ॥

anye kṛtayuge dharmāstretāyāṃ dvāpare'pare | anye kaliyuge dharmā yathāśakti kṛtā iva

कृतयुग के धर्म अलग हैं, त्रेता के अलग और द्वापर के अलग; कलियुग के धर्म फिर अलग हैं, जो मानो अपनी शक्ति के अनुसार किए जाते हैं।

श्लोक 61 (12.238.61)

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां सत्यमुत्तमम् । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलौ युगे ॥

tapaḥ paraṃ kṛtayuge tretāyāṃ satyamuttamam | dvāpare yajñamevāhurdānameva kalau yuge

कृतयुग में तप श्रेष्ठ है; त्रेता में सत्य सर्वोत्तम है; द्वापर में यज्ञ कहा गया है और कलियुग में केवल दान।

श्लोक 62 (12.238.62)

एतां द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां कवयो विदुः । सहस्रपरिवर्तं तद्ब्राह्मं दिवसमुच्यते ॥

etāṃ dvādaśasāhasrīṃ yugākhyāṃ kavayo viduḥ | sahasraparivartaṃ tadbrāhmaṃ divasamucyate

ज्ञानी इस बारह हज़ार के समूह को युग नाम से जानते हैं; इसके एक हज़ार आवर्तन को ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है।

श्लोक 63 (12.238.63)

रात्रिस्तु तावती ब्राह्मी तदादौ विश्वमीश्वरः । प्रलयेत्मानमाविश्य सुप्त्वासोऽन्ते विबुध्यते ॥

rātristu tāvatī brāhmī tadādau viśvamīśvaraḥ | pralayetmānamāviśya suptvāso'nte vibudhyate

उसकी रात्रि भी उतनी ही लम्बी होती है। उसके आरम्भ में विश्व के स्वामी प्रलय में अपने आत्मस्वरूप में प्रवेश कर सो जाते हैं और अन्त में जाग उठते हैं।

श्लोक 64 (12.238.64)

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणे विदुः । रात्रिं युगसहस्रां तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥

sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇe viduḥ | rātriṃ yugasahasrāṃ tāṃ te'horātravido janāḥ

ब्रह्मा का जो दिन वे मानते हैं, वह हज़ार युगों तक चलता है; और उसकी रात्रि भी हज़ार युगों की है, ऐसा दिन-रात को जाननेवाले लोग जानते हैं।

श्लोक 65 (12.238.65)

प्रतिबुद्धो विकुरुते ब्रह्माक्षय्यं क्षपाक्षये । सृजते च महद्भूतं तस्माद्व्यक्तात्मकं मनः ॥

pratibuddho vikurute brahmākṣayyaṃ kṣapākṣaye | sṛjate ca mahadbhūtaṃ tasmādvyaktātmakaṃ manaḥ

रात्रि के अन्त में जागकर अविनाशी ब्रह्मा सृष्टि-क्रिया आरम्भ करते हैं; वे महत्-तत्त्व की सृष्टि करते हैं और उससे व्यक्त स्वरूपवाले मन की।

श्लोक 66 (12.238.66)

मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया । आकाशं जायते तस्मात्तस्य शब्दो गुणो मतः ॥

manaḥ sṛṣṭiṃ vikurute codyamānaṃ sisṛkṣayā | ākāśaṃ jāyate tasmāttasya śabdo guṇo mataḥ

सृष्टि की इच्छा से प्रेरित मन सृष्टि का विस्तार करता है; उससे आकाश उत्पन्न होता है, और शब्द उसका गुण माना गया है।

श्लोक 67 (12.238.67)

आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः । बलवाञ्जायते वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥

ākāśāttu vikurvāṇātsarvagandhavahaḥ śuciḥ | balavāñjāyate vāyustasya sparśo guṇo mataḥ

विकार को प्राप्त होते आकाश से वायु उत्पन्न होता है, जो शुद्ध, बलवान् और सब गन्धों को वहन करनेवाला है; स्पर्श उसका गुण माना गया है।

श्लोक 68 (12.238.68)

वायोरपि विकुर्वाणाज्ज्योतिर्भवति भास्वरम् । रोचनं जनयेच्छुद्धं तद्रूपगुणमुच्यते ॥

vāyorapi vikurvāṇājjyotirbhavati bhāsvaram | rocanaṃ janayecchuddhaṃ tadrūpaguṇamucyate

विकार को प्राप्त होते वायु से भी तेजस्वी ज्योति उत्पन्न होती है, जो शुद्ध प्रकाश को जन्म देती है; रूप उसका गुण कहा जाता है।

श्लोक 69 (12.238.69)

ज्योतिषोपि विकुर्वाणाद्भवन्त्यापो रसात्मिकाः । अद्भ्यो गन्धवहा भूमिः पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते ॥

jyotiṣopi vikurvāṇādbhavantyāpo rasātmikāḥ | adbhyo gandhavahā bhūmiḥ pūrveṣāṃ sṛṣṭirucyate

विकार को प्राप्त होती ज्योति से रसमय जल उत्पन्न होते हैं; जल से गन्ध को वहन करनेवाली भूमि बनती है। यह पूर्ववर्ती तत्त्वों की सृष्टि कही जाती है।

श्लोक 70 (12.238.70)

ब्रह्मतेजोमयं शुक्लं यस्य सर्वमिदं जगत् । एकस्य ब्रह्मभूतस्य द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥

brahmatejomayaṃ śuklaṃ yasya sarvamidaṃ jagat | ekasya brahmabhūtasya dvayaṃ sthāvarajaṅgamam

जो ब्रह्मस्वरूप हुआ एक है, जिसका यह सारा जगत् ब्रह्म के तेज से बना हुआ श्वेत है, उसका दो प्रकार का रूप है: स्थावर और जंगम।

श्लोक 71 (12.238.71)

अहर्मुखे विबुद्धं तत्सृजते विद्यया जगत् । अग्र एव महद्भूतमाशु व्यक्तात्मकं मनः ॥

aharmukhe vibuddhaṃ tatsṛjate vidyayā jagat | agra eva mahadbhūtamāśu vyaktātmakaṃ manaḥ

दिन के आरम्भ में जागकर वह विद्या से जगत् की सृष्टि करता है: पहले महान् भूत की, और शीघ्र ही व्यक्त स्वरूपवाले मन की।

श्लोक 72 (12.238.72)

अभिभूयेह चातिष्ठद्व्यसृजत्सप्त मानसान् । दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् ॥

abhibhūyeha cātiṣṭhadvyasṛjatsapta mānasān | dūragaṃ bahudhāgāmi prārthanāsaṃśayātmakam

यहाँ सबको अभिभूत करके वह स्थित रहा और उसने सात मानस पुत्रों की सृष्टि की; मन दूर तक जानेवाला, अनेक मार्गों पर चलनेवाला और इच्छा तथा संशय के स्वभाववाला है।

श्लोक 73 (12.238.73)

मनः सृष्टिं न कुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया । आकाशोजायते तस्मात्तस्य शब्दो गुणो मतः ॥

manaḥ sṛṣṭiṃ na kurute codyamānaṃ sisṛkṣayā | ākāśojāyate tasmāttasya śabdo guṇo mataḥ

सृष्टि की इच्छा से प्रेरित होने पर भी मन सृष्टि नहीं करता; उससे आकाश उत्पन्न होता है, और शब्द उसका गुण माना गया है।

श्लोक 74 (12.238.74)

आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः । बलवाञ्जायते वायुस्तस्य स्पर्शगुणं विदुः ॥

ākāśāttu vikurvāṇātsarvagandhavahaḥ śuciḥ | balavāñjāyate vāyustasya sparśaguṇaṃ viduḥ

विकार को प्राप्त होते आकाश से वायु उत्पन्न होता है, जो शुद्ध, बलवान् और सब गन्धों को वहन करनेवाला है; उसका गुण स्पर्श जाना जाता है।

श्लोक 75 (12.238.75)

वायोरपि विकुर्वाणाज्ज्योतिर्भूतं तमोनुदम् । रोचिष्णुर्जायते तत्र तद्रूपगुणमुच्यते ॥

vāyorapi vikurvāṇājjyotirbhūtaṃ tamonudam | rociṣṇurjāyate tatra tadrūpaguṇamucyate

विकार को प्राप्त होते वायु से भी अन्धकार को दूर करनेवाली ज्योति उत्पन्न होती है; वह प्रकाशमान होकर वहाँ प्रकट होती है, और रूप उसका गुण कहा जाता है।

श्लोक 76 (12.238.76)

ज्योतिषोपि विकुर्वाणाद्भवन्त्यापो रसात्मिकाः । अद्भ्यो गन्धवहा भूमिः पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते ॥

jyotiṣopi vikurvāṇādbhavantyāpo rasātmikāḥ | adbhyo gandhavahā bhūmiḥ pūrveṣāṃ sṛṣṭirucyate

विकार को प्राप्त होती ज्योति से रसमय जल उत्पन्न होते हैं; जल से गन्ध को वहन करनेवाली भूमि बनती है। यह पूर्ववर्ती तत्त्वों की सृष्टि कही जाती है।

श्लोक 77 (12.238.77)

गुणाः पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् । तेषां यावद्गुणं यद्यत्तत्तावद्गुणकं स्मृतम् ॥

guṇāḥ pūrvasya pūrvasya prāpnuvantyuttarottaram | teṣāṃ yāvadguṇaṃ yadyattattāvadguṇakaṃ smṛtam

प्रत्येक पूर्ववर्ती तत्त्व के गुण उसके बाद वाले तत्त्व में आ जाते हैं; जिसने जितने गुण ग्रहण किए, उसमें उतने ही गुण माने गए हैं।

श्लोक 78 (12.238.78)

उपलभ्याप्सु चेद्गन्धं केचिद्ब्रूयुरनैपुणात् । पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रितम् ॥

upalabhyāpsu cedgandhaṃ kecidbrūyuranaipuṇāt | pṛthivyāmeva taṃ vidyādapāṃ vāyośca saṃśritam

यदि कुछ लोग अकुशलता से कहें कि जल में गन्ध पाई जाती है, तो जानना चाहिए कि वह पृथ्वी की ही है और जल तथा वायु में आश्रित है।

श्लोक 79 (12.238.79)

एते सप्तविधात्मानो नानावीर्याः पृथक्पृथक् । नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥

ete saptavidhātmāno nānāvīryāḥ pṛthakpṛthak | nāśaknuvanprajāḥ sraṣṭumasamāgamya kṛtsnaśaḥ

ये सात स्वरूप, जिनमें प्रत्येक की शक्ति अलग-अलग है, पूर्ण रूप से मिले बिना प्रजा की सृष्टि नहीं कर सके।

श्लोक 80 (12.238.80)

ते समेत्य महात्मानो ह्यन्योन्यमभिसंश्रिताः । शरीराश्रयणं प्राप्तास्ततः पुरुष उच्यते ॥

te sametya mahātmāno hyanyonyamabhisaṃśritāḥ | śarīrāśrayaṇaṃ prāptāstataḥ puruṣa ucyate

उन महान् तत्त्वों ने परस्पर मिलकर एक-दूसरे का आश्रय लिया और शरीर में निवास प्राप्त किया; इसीलिए वह पुरुष कहा जाता है।

श्लोक 81 (12.238.81)

श्रयणाच्छरीरी भवति मूर्तिमान्षोडशात्मकः । तमाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मणा ॥

śrayaṇāccharīrī bhavati mūrtimānṣoḍaśātmakaḥ | tamāviśanti bhūtāni mahānti saha karmaṇā

इस आश्रय के कारण वह शरीरधारी, मूर्तिमान् और सोलह अंगोंवाला होता है; महाभूत कर्म सहित उसमें प्रविष्ट होते हैं।

श्लोक 82 (12.238.82)

सर्वभूतान्युपादाय तपसश्चरणाय हि । आदिकर्ता महाभूतं तमेवाहुः प्रजापतिम् ॥

sarvabhūtānyupādāya tapasaścaraṇāya hi | ādikartā mahābhūtaṃ tamevāhuḥ prajāpatim

तपस्या के आचरण के लिए सब भूतों को ग्रहण करके जो आदिकर्ता महाभूत हैं, उन्हें ही प्रजापति कहते हैं।

श्लोक 83 (12.238.83)

स वै सृजति भूतानि स एव पुरुषः परः । अजो जनयते ब्रह्मा देवर्षिपितृमानवान् ॥

sa vai sṛjati bhūtāni sa eva puruṣaḥ paraḥ | ajo janayate brahmā devarṣipitṛmānavān

वही प्राणियों की सृष्टि करता है, वही परम पुरुष है। अजन्मा ब्रह्मा देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों को उत्पन्न करता है,

श्लोक 84 (12.238.84)

लोकान्नदीः समुद्रांश्च दिशः शैलान्वनस्पतीन् । नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान् । अव्ययं च व्ययं चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥

lokānnadīḥ samudrāṃśca diśaḥ śailānvanaspatīn | narakinnararakṣāṃsi vayaḥ paśumṛgoragān | avyayaṃ ca vyayaṃ caiva dvayaṃ sthāvarajaṅgamam

लोकों, नदियों, समुद्रों, दिशाओं, पर्वतों और वृक्षों को; मनुष्य, किन्नर और राक्षसों को; पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों को; अव्यय और व्यय को, अर्थात् स्थावर और जंगम इस द्विविध को।

श्लोक 85 (12.238.85)

तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपाद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥

teṣāṃ ye yāni karmāṇi prāksṛṣṭyāṃ pratipedire | tānyeva pratipādyante sṛjyamānāḥ punaḥ punaḥ

पूर्व सृष्टि में उन्होंने जो-जो कर्म अपनाए थे, बार-बार रचे जाने पर वे वही कर्म फिर अपनाते हैं।

श्लोक 86 (12.238.86)

हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥

hiṃsrāhiṃsre mṛdukrūre dharmādharmāvṛtānṛte | tadbhāvitāḥ prapadyante tasmāttattasya rocate

हिंसक और अहिंसक, कोमल और क्रूर, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य: इनसे संस्कारित होकर वे उन्हीं को अपनाते हैं, इसीलिए प्रत्येक को अपना वही स्वभाव रुचता है।

श्लोक 87 (12.238.87)

महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु । विनियोगं च भूतानां धातैव विदधात्युत ॥

mahābhūteṣu nānātvamindriyārtheṣu mūrtiṣu | viniyogaṃ ca bhūtānāṃ dhātaiva vidadhātyuta

महाभूतों में, इन्द्रियों के विषयों में और मूर्तियों में जो नानात्व है, और प्राणियों का जो नियोजन है, उसे विधाता ही निश्चित करता है।

श्लोक 88 (12.238.88)

केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्मविदो जनाः । दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः ॥

kecitpuruṣakāraṃ tu prāhuḥ karmavido janāḥ | daivamityapare viprāḥ svabhāvaṃ bhūtacintakāḥ

कर्म को जाननेवाले कुछ लोग इसे पुरुषार्थ कहते हैं; दूसरे विप्र इसे दैव कहते हैं; और भूतों पर विचार करनेवाले इसे स्वभाव कहते हैं।

श्लोक 89 (12.238.89)

पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिस्वभावतः । त्रय एतेऽपृथग्भूता अविवेकः कथंचन ॥

pauruṣaṃ karma daivaṃ ca phalavṛttisvabhāvataḥ | traya ete'pṛthagbhūtā avivekaḥ kathaṃcana

पुरुषार्थ, कर्म, दैव और फल देनेवाला स्वभाव: ये तीनों अलग नहीं हैं; इनमें किसी प्रकार भेद नहीं किया जा सकता।

श्लोक 90 (12.238.90)

एवमेतच्च दैवं च यद्भूतं सृजते जगत् । कर्मस्था विषयं ब्रूयुः सत्वस्थाः समदर्शिनः ॥

evametacca daivaṃ ca yadbhūtaṃ sṛjate jagat | karmasthā viṣayaṃ brūyuḥ satvasthāḥ samadarśinaḥ

ऐसा ही है: यह, दैव, और जो भूत जगत् की सृष्टि करता है। कर्म में स्थित लोग विषयों की बात करते हैं; सत्त्व में स्थित लोग सबको समान देखते हैं।

श्लोक 91 (12.238.91)

ततो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः । तेन सर्वानवाप्नोति यान्कामान्मनसेच्छति ॥

tato niḥśreyasaṃ jantostasya mūlaṃ śamo damaḥ | tena sarvānavāpnoti yānkāmānmanasecchati

उसी से प्राणी का परम कल्याण होता है, जिसका मूल शम और दम है; उससे वह मन से जिन-जिन कामनाओं की इच्छा करता है, उन सबको पा लेता है।

श्लोक 92 (12.238.92)

तपसा तदवाप्नोति यद्भूतं सृजते जगत् । स तद्भूतश्च सर्वेषां भूतानां भवति प्रभुः ॥

tapasā tadavāpnoti yadbhūtaṃ sṛjate jagat | sa tadbhūtaśca sarveṣāṃ bhūtānāṃ bhavati prabhuḥ

तप से मनुष्य उसे प्राप्त करता है जो भूत होकर जगत् की सृष्टि करता है; वही होकर वह सब प्राणियों का स्वामी बन जाता है।

श्लोक 93 (12.238.93)

ऋषयस्तपसा वेदानध्यैषन्त दिवानिशम् । अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा ॥

ṛṣayastapasā vedānadhyaiṣanta divāniśam | anādinidhanā nityā vāgutsṛṣṭā svayaṃbhuvā

ऋषियों ने तप से दिन-रात वेदों का अध्ययन किया: वह नित्य वाणी, जिसका न आदि है न अन्त, स्वयम्भू द्वारा प्रकट की गई थी।

श्लोक 94 (12.238.94)

ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु सृष्टयः । नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् ॥

ṛṣīṇāṃ nāmadheyāni yāśca vedeṣu sṛṣṭayaḥ | nāma rūpaṃ ca bhūtānāṃ karmaṇāṃ ca pravartanam

ऋषियों के नाम और वेदों में वर्णित सृष्टियाँ, प्राणियों के नाम-रूप और उनके कर्मों की प्रवृत्ति,

श्लोक 95 (12.238.95)

वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमीते स ईश्वरः । नामधेयानि चर्षीणां याश्च वेदेषु सृष्टयः । शर्वर्यन्तेषु जातानामन्येभ्यो विदधात्यजः ॥

vedaśabdebhya evādau nirmimīte sa īśvaraḥ | nāmadheyāni carṣīṇāṃ yāśca vedeṣu sṛṣṭayaḥ | śarvaryanteṣu jātānāmanyebhyo vidadhātyajaḥ

ईश्वर आदि में वेद के शब्दों से ही रचता है: ऋषियों के नाम और वेदों में कही गई सृष्टियाँ। रात्रियों के अन्त में उत्पन्न होनेवालों के लिए अजन्मा उन्हें अन्य जनों के लिए फिर विधान करता है।

श्लोक 96 (12.238.96)

नामभेदतपः कर्मयज्ञाख्या लोकसिद्धये । आत्मसिद्धिस्तु वेदेषु प्रोच्यते दशभिः क्रमैः ॥

nāmabhedatapaḥ karmayajñākhyā lokasiddhaye | ātmasiddhistu vedeṣu procyate daśabhiḥ kramaiḥ

नाम के भेद तथा तप, कर्म और यज्ञ नाम से कहे जानेवाले साधन लोक की सिद्धि के लिए हैं; आत्मसिद्धि का उपदेश वेदों में दस क्रमों से किया जाता है।

श्लोक 97 (12.238.97)

यदुक्तं वेदवादेषु गहनं वेददृष्टिभिः । तदन्तेषु यथायुक्तं क्रमयोगेन लक्ष्यते ॥

yaduktaṃ vedavādeṣu gahanaṃ vedadṛṣṭibhiḥ | tadanteṣu yathāyuktaṃ kramayogena lakṣyate

वेद की दृष्टि रखनेवालों ने वेदवादों में जो गूढ़ बात कही है, वह उनके अन्त में यथायोग्य क्रम-योग से दिखाई देती है।

श्लोक 98 (12.238.98)

कर्मजोऽयं पृथग्भावो द्वन्द्वयुक्तो हि देहिनः । आत्मसिद्धिस्तु विज्ञानाज्जहाति प्रायशो बलम् ॥

karmajo'yaṃ pṛthagbhāvo dvandvayukto hi dehinaḥ | ātmasiddhistu vijñānājjahāti prāyaśo balam

कर्म से उत्पन्न यह पृथक्-भाव, जो द्वन्द्वों से युक्त है, देहधारी का है; किन्तु विज्ञान से मिलनेवाली आत्मसिद्धि प्रायः इस बल को छोड़ देती है।

श्लोक 99 (12.238.99)

द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

dve brahmaṇī veditavye śabdabrahma paraṃ ca yat | śabdabrahmaṇi niṣṇātaḥ paraṃ brahmādhigacchati

दो ब्रह्म जानने योग्य हैं: शब्दब्रह्म और जो परब्रह्म है। जो शब्दब्रह्म में निष्णात हो जाता है, वह परब्रह्म को प्राप्त करता है।

श्लोक 100 (12.238.100)

आलम्भयज्ञाः क्षत्राश्च हविर्यज्ञा विशः स्मृताः । परिचारयज्ञाः शूद्रास्तु तपोयज्ञा द्विजातयः ॥

ālambhayajñāḥ kṣatrāśca haviryajñā viśaḥ smṛtāḥ | paricārayajñāḥ śūdrāstu tapoyajñā dvijātayaḥ

क्षत्रिय आलम्भ-यज्ञ करनेवाले, वैश्य हविर्यज्ञ करनेवाले, शूद्र परिचर्या-यज्ञ करनेवाले और द्विज तपोयज्ञ करनेवाले माने गए हैं।

श्लोक 101 (12.238.101)

त्रेतायुगे विधिस्त्वेष यज्ञानां न कृते युगे । द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलियुगे तथा ॥

tretāyuge vidhistveṣa yajñānāṃ na kṛte yuge | dvāpare viplavaṃ yānti yajñāḥ kaliyuge tathā

यज्ञों की यह विधि त्रेतायुग की है, कृतयुग की नहीं; द्वापर में यज्ञ अव्यवस्था को प्राप्त होते हैं, और कलियुग में भी वैसे ही।

श्लोक 102 (12.238.102)

अपृथग्धर्मिणो मर्त्या ऋक्सामानि यजूंषि च । काम्या इष्टीः पृथक्दृष्ट्वा तपोभिस्तप एव च ॥

apṛthagdharmiṇo martyā ṛksāmāni yajūṃṣi ca | kāmyā iṣṭīḥ pṛthakdṛṣṭvā tapobhistapa eva ca

जिन मनुष्यों के धर्म अलग-अलग नहीं थे, वे ऋक्, साम और यजुः मन्त्रों तथा काम्य अनुष्ठानों को पृथक् देखकर तपों की ओर, और केवल तप की ओर ही प्रवृत्त हुए।

श्लोक 103 (12.238.103)

त्रेतायां तु समस्ता ये प्रादुरासन्महाबलाः । संयन्तारः स्थावराणां जङ्गमानां च सर्वशः ॥

tretāyāṃ tu samastā ye prādurāsanmahābalāḥ | saṃyantāraḥ sthāvarāṇāṃ jaṅgamānāṃ ca sarvaśaḥ

त्रेतायुग में सब महाबली एक साथ प्रकट हुए, जो सब ओर स्थावर और जंगम प्राणियों पर शासन करनेवाले थे।

श्लोक 104 (12.238.104)

त्रेतायां संहता वेदा यज्ञा वर्णास्तथैव च । संरोधादायुषस्त्वेते व्यस्यन्ते द्वापरे युगे ॥

tretāyāṃ saṃhatā vedā yajñā varṇāstathaiva ca | saṃrodhādāyuṣastvete vyasyante dvāpare yuge

त्रेतायुग में वेद, यज्ञ और वर्ण एक साथ संगठित रहे; द्वापर में आयु के संकुचित होने से वे बिखर जाते हैं।

श्लोक 105 (12.238.105)

दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः । उत्सीदन्ते सयज्ञाश्च केवला धर्मपीडिताः ॥

dṛśyante na ca dṛśyante vedāḥ kaliyuge'khilāḥ | utsīdante sayajñāśca kevalā dharmapīḍitāḥ

कलियुग में सारे वेद दिखाई भी देते हैं और नहीं भी; वे यज्ञों सहित क्षीण हो जाते हैं, धर्म की दृष्टि से पूरी तरह पीड़ित होकर।

श्लोक 106 (12.238.106)

कृते युगे यस्तु धर्मो ब्राह्मणेषु प्रदृश्यते । आत्मवत्सु तपोवत्सु श्रुतवत्सु प्रतिष्ठितः ॥

kṛte yuge yastu dharmo brāhmaṇeṣu pradṛśyate | ātmavatsu tapovatsu śrutavatsu pratiṣṭhitaḥ

कृतयुग में ब्राह्मणों में जो धर्म दिखाई देता है, वह आत्मवान्, तपस्वी और शास्त्रज्ञों में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 107 (12.238.107)

स धर्मः प्रैति संयोगं यथाधर्मं युगेयुगे । विक्रियन्ते स्वधर्मस्था वेदवादा यथागमम् ॥

sa dharmaḥ praiti saṃyogaṃ yathādharmaṃ yugeyuge | vikriyante svadharmasthā vedavādā yathāgamam

वह धर्म प्रत्येक युग में उसके धर्म के अनुसार मेल को प्राप्त होता है; और अपने धर्म में स्थित लोगों के वेदवाद परम्परा के अनुसार बदलते हैं।

श्लोक 108 (12.238.108)

यथा विश्वानि भूतानि वृष्ट्या भूयांसि प्रावृषि । सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगेयुगे ॥

yathā viśvāni bhūtāni vṛṣṭyā bhūyāṃsi prāvṛṣi | sṛjyante jaṅgamasthāni tathā dharmā yugeyuge

जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा से नाना प्रकार के असंख्य जंगम और स्थावर प्राणी उत्पन्न होते हैं, वैसे ही प्रत्येक युग में धर्म उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 109 (12.238.109)

यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्महरादिषु ॥

yathartuṣvṛtuliṅgāni nānārūpāṇi paryaye | dṛśyante tāni tānyeva tathā brahmaharādiṣu

जैसे ऋतुओं के चक्र के बदलने पर उनके नाना रूपों वाले चिह्न बार-बार दिखाई देते हैं, वैसे ही ब्रह्मा, हर आदि में होता है।

श्लोक 110 (12.238.110)

विहितं कालनानात्वमनादिनिधनं तथा । कीर्तितं यत्पुरस्तात्ते तत्सूते चात्ति च प्रजाः ॥

vihitaṃ kālanānātvamanādinidhanaṃ tathā | kīrtitaṃ yatpurastātte tatsūte cātti ca prajāḥ

काल की विविधता निर्धारित है, और वह आदि-अन्त से रहित है, जैसा पहले तुमसे कहा गया था; वह प्राणियों को जन्म देता है और उन्हें खा भी जाता है।

श्लोक 111 (12.238.111)

ददाति भवनस्थानं भूतानां संयमो यमः । स्वभावेनैव वर्तन्ते द्वन्द्वयुक्तानि भूरिशः ॥

dadāti bhavanasthānaṃ bhūtānāṃ saṃyamo yamaḥ | svabhāvenaiva vartante dvandvayuktāni bhūriśaḥ

नियन्ता यम प्राणियों को उनके निवास-स्थान देता है। वे अपने स्वभाव से ही द्वन्द्वों से युक्त होकर बड़ी संख्या में चलते रहते हैं।

श्लोक 112 (12.238.112)

सर्वकालक्रिया वेदाः कर्ता कार्यं क्रियाफलम् । प्रोक्तं ते पुत्र सर्वं वै यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

sarvakālakriyā vedāḥ kartā kāryaṃ kriyāphalam | proktaṃ te putra sarvaṃ vai yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

सब कालों की क्रियाएँ, वेद, कर्ता, कार्य और कर्म का फल: पुत्र, तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया।

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