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शान्ति पर्व · अध्याय 239

प्रलय में भूतों का ब्रह्म में लय

शुक को अपना उपदेश जारी रखते हुए व्यास ब्रह्मा की रात्रि के आरम्भ में जगत् के उपसंहार का वर्णन करते हैं। पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में, वायु आकाश में और आकाश मन में लीन होता है; फिर मन को क्रम से चन्द्रमा, संकल्प, ज्ञान और काल ग्रस लेते हैं, और अन्त में विद्वान् सब भूतों को अव्यक्त परब्रह्म में समेट लेता है। वे कहते हैं कि हज़ार युगों के प्रत्येक दिन और रात के साथ विस्तार और संकोच बार-बार होते रहते हैं।

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व्यास उवाच

श्लोक 1 (12.239.1)

प्रत्याहारं तु वक्ष्यामि शर्वर्यादौ गतेऽहनि । यथेदं कुरुतेऽध्यात्मं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः ॥

pratyāhāraṃ tu vakṣyāmi śarvaryādau gate'hani | yathedaṃ kurute'dhyātmaṃ susūkṣmaṃ viśvamīśvaraḥ

मैं प्रत्याहार (जगत् के उपसंहार) का वर्णन करूँगा: दिन बीतकर रात्रि का आरम्भ होने पर ईश्वर इस विश्व को अत्यन्त सूक्ष्म रीति से अपने आत्मस्वरूप में कैसे समेट लेते हैं।

श्लोक 2 (12.239.2)

दिवि सूर्यस्तथा सप्त दहन्ति शिखिनोऽर्चिषः । सर्वमेतत्तदाऽर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते जगत् ॥

divi sūryastathā sapta dahanti śikhino'rciṣaḥ | sarvametattadā'rcirbhiḥ pūrṇaṃ jājvalyate jagat

आकाश में सूर्य और वैसे ही अग्नि की सात ज्वालाएँ जलाती हैं; तब ज्वालाओं से भरा हुआ यह सारा जगत् दहक उठता है।

श्लोक 3 (12.239.3)

पृथिव्यां यानि भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥

pṛthivyāṃ yāni bhūtāni jaṅgamāni dhruvāṇi ca | tānyevāgre pralīyante bhūmitvamupayānti ca

पृथ्वी पर जो भी प्राणी हैं, जंगम और स्थावर, वे सबसे पहले लीन होते हैं और भूमिभाव को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 4 (12.239.4)

ततः प्रलीने सर्वस्मिन्स्थावरे जङ्गमे तथा । अकाष्ठा निस्तृणा भूमिर्दृश्यते कूर्मपृष्ठवत् ॥

tataḥ pralīne sarvasminsthāvare jaṅgame tathā | akāṣṭhā nistṛṇā bhūmirdṛśyate kūrmapṛṣṭhavat

तब सम्पूर्ण स्थावर और जंगम के लीन हो जाने पर पृथ्वी काठ-रहित और तृण-रहित, कछुए की पीठ के समान दिखाई देती है।

श्लोक 5 (12.239.5)

भूमेरपि गुणं गन्धमाप आददते यदा । आत्तगन्धा तदा भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥

bhūmerapi guṇaṃ gandhamāpa ādadate yadā | āttagandhā tadā bhūmiḥ pralayatvāya kalpate

जब जल पृथ्वी का गुण, गन्ध, ग्रहण कर लेते हैं, तब गन्धरहित हुई पृथ्वी प्रलय के योग्य हो जाती है।

श्लोक 6 (12.239.6)

आपस्तत्र प्रतिष्ठन्ते ऊर्मिमत्यो महास्वनाः । सर्वमेवेदमापूर्य तिष्ठन्ति च चरन्ति च ॥

āpastatra pratiṣṭhante ūrmimatyo mahāsvanāḥ | sarvamevedamāpūrya tiṣṭhanti ca caranti ca

तब जल प्रकट होते हैं, लहरों से भरे और महान् गर्जना करते हुए; वे इस सब को भरकर स्थिर भी रहते हैं और चलते भी हैं।

श्लोक 7 (12.239.7)

अपामपि गुणांस्तात ज्योतिराददते यदा । आपस्तदा त्वात्तगुणा ज्योतिः षूपरमन्ति वै ॥

apāmapi guṇāṃstāta jyotirādadate yadā | āpastadā tvāttaguṇā jyotiḥ ṣūparamanti vai

तात, जब अग्नि जल के गुण को ग्रहण कर लेती है, तब गुण छिन गए जल ज्योति में शान्त हो जाते हैं।

श्लोक 8 (12.239.8)

यदाऽऽदित्यं स्थितं मध्ये गूहन्ति शिखिनोऽर्चिषः । सर्वमेवेदमर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते नभः ॥

yadā''dityaṃ sthitaṃ madhye gūhanti śikhino'rciṣaḥ | sarvamevedamarcirbhiḥ pūrṇaṃ jājvalyate nabhaḥ

जब अग्नि की ज्वालाएँ बीच में स्थित सूर्य को ढक लेती हैं, तब ज्वालाओं से भरा यह सारा आकाश दहकने लगता है।

श्लोक 9 (12.239.9)

ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुराददते यदा । प्रशाम्यति ततो ज्योतिर्वायुर्दोधूयते महान् ॥

jyotiṣo'pi guṇaṃ rūpaṃ vāyurādadate yadā | praśāmyati tato jyotirvāyurdodhūyate mahān

जब वायु अग्नि का गुण, रूप, ग्रहण कर लेता है, तब ज्योति शान्त हो जाती है और महान् वायु प्रचण्ड वेग से चलता है।

श्लोक 10 (12.239.10)

ततस्तु मूलमासाद्य वायुः संभवमात्मनः । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ॥

tatastu mūlamāsādya vāyuḥ saṃbhavamātmanaḥ | adhaścordhvaṃ ca tiryakca dodhavīti diśo daśa

तब अपने मूल, अपने उद्भव-स्थान को पाकर वायु नीचे, ऊपर और तिरछे, दसों दिशाओं में प्रचण्ड वेग से बहता है।

श्लोक 11 (12.239.11)

वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते यदा । प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु तिष्ठति नानदत् ॥

vāyorapi guṇaṃ sparśamākāśaṃ grasate yadā | praśāmyati tadā vāyuḥ khaṃ tu tiṣṭhati nānadat

जब आकाश वायु का गुण, स्पर्श, निगल लेता है, तब वायु शान्त हो जाता है और आकाश ही शब्द-रहित होकर रह जाता है।

श्लोक 12 (12.239.12)

अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् । सर्वलोकप्रणुदितं स्वं तु तिष्ठति नानदत् ॥

arūpamarasasparśamagandhaṃ na ca mūrtimat | sarvalokapraṇuditaṃ svaṃ tu tiṣṭhati nānadat

रूप, रस, स्पर्श और गन्ध से रहित, मूर्ति-रहित, सब लोकों के निकल जाने पर आकाश ही शब्द-रहित होकर शेष रहता है।

श्लोक 13 (12.239.13)

आकाशस्य गुणं शब्दमभिव्यक्तात्मकं मनः । ग्रसते च यदा सोऽपि शाम्यति प्रतिसंचरे । मनसो व्यक्तमव्यक्तं ब्राह्मः संप्रतिसंचरः ॥

ākāśasya guṇaṃ śabdamabhivyaktātmakaṃ manaḥ | grasate ca yadā so'pi śāmyati pratisaṃcare | manaso vyaktamavyaktaṃ brāhmaḥ saṃpratisaṃcaraḥ

व्यक्त स्वरूपवाला मन आकाश का गुण, शब्द, ग्रहण कर लेता है; और जब वह भी निगल लिया जाता है, तब प्रतिसंचर में शान्त हो जाता है। मन का व्यक्त से अव्यक्त में जाना ही ब्राह्म प्रतिसंचर है।

श्लोक 14 (12.239.14)

तदाऽऽत्मगुणमाविश्य मनो ग्रसति चन्द्रमाः । मनस्युपरते चात्मा चन्द्रमस्युपतिष्ठते ॥

tadā''tmaguṇamāviśya mano grasati candramāḥ | manasyuparate cātmā candramasyupatiṣṭhate

तब चन्द्रमा मन के आत्मगुण में प्रवेश करके मन को ग्रस लेता है; मन के शान्त हो जाने पर आत्मा चन्द्रमा में स्थित होता है।

श्लोक 15 (12.239.15)

तं तु कालेन महता संकल्पं कुरुते वशे । चित्तं ग्रसति संकल्पस्तच्च ज्ञानमनुत्तमम् ॥

taṃ tu kālena mahatā saṃkalpaṃ kurute vaśe | cittaṃ grasati saṃkalpastacca jñānamanuttamam

बहुत समय में उस संकल्प को वश में कर लिया जाता है; संकल्प चित्त को ग्रस लेता है, और वही परम ज्ञान है।

श्लोक 16 (12.239.16)

कालो गिरति विज्ञानं कालं बलमिति श्रुतिः । बलं कालो ग्रसति तु तं विद्वान्कुरुते वशे ॥

kālo girati vijñānaṃ kālaṃ balamiti śrutiḥ | balaṃ kālo grasati tu taṃ vidvānkurute vaśe

काल विज्ञान को निगल जाता है; श्रुति कहती है कि बल ही काल है। काल बल को ग्रस लेता है, और विद्वान् उस काल को अपने वश में कर लेता है।

श्लोक 17 (12.239.17)

आकाशस्य तदा घोषं तं विद्वान्कुरुतेऽऽत्मनि । तदव्यक्तं परं ब्रह्म तच्छाश्वतमनुत्तमम् । एवं सर्वाणि भूतानि ब्रह्मैव प्रतिसंहरेत् ॥

ākāśasya tadā ghoṣaṃ taṃ vidvānkurute''tmani | tadavyaktaṃ paraṃ brahma tacchāśvatamanuttamam | evaṃ sarvāṇi bhūtāni brahmaiva pratisaṃharet

तब विद्वान् आकाश के घोष को अपने आत्मा में समेट लेता है। वही अव्यक्त परब्रह्म है, वही शाश्वत और अनुत्तम है। इस प्रकार सब भूतों को ब्रह्म में ही समेट लेना चाहिए।

श्लोक 18 (12.239.18)

यथावत्कीर्तितं सत्यमेवमेतदसंशयम् । बोध्यं विद्यामयं दृष्ट्वा योगिभिः परमात्मभिः ॥

yathāvatkīrtitaṃ satyamevametadasaṃśayam | bodhyaṃ vidyāmayaṃ dṛṣṭvā yogibhiḥ paramātmabhiḥ

जैसा कहा गया वह सत्य है, और ऐसा ही है, इसमें सन्देह नहीं। इस विद्यामय सत्य को देखकर परमात्मा में लगे हुए योगियों को इसे समझना चाहिए।

श्लोक 19 (12.239.19)

एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुनःपुनः । युगसाहस्रयोरादावहोरात्र्यास्तथैव च ॥

evaṃ vistārasaṃkṣepau brahmāvyakte punaḥpunaḥ | yugasāhasrayorādāvahorātryāstathaiva ca

इस प्रकार विस्तार और संकोच अव्यक्त ब्रह्म में बार-बार होते हैं, हज़ार युगों के दिन के आरम्भ में और वैसे ही रात्रि के आरम्भ में।

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