शान्ति पर्व · अध्याय 240
ब्राह्मण के कर्तव्य और दान की महिमा
व्यास अपने पुत्र शुक को उपदेश देते हुए सब प्राणियों के कर्तव्यों से आगे बढ़कर ब्राह्मण के कर्तव्य बताते हैं: गुरु के पास अध्ययन, फिर चार आश्रमों में से किसी एक में निवास, जिनमें गृहस्थाश्रम सबका मूल है। वे कहते हैं कि गृहस्थ यज्ञ, अध्ययन और विशेषतः सुपात्रों को दान देने से स्थायी कीर्ति पाता है, और उन राजाओं और ऋषियों की सूची देते हैं जिन्होंने धन, राज्य, पत्नी, कन्या, नेत्र, पुत्र और प्राण तक दान करके स्वर्ग पाया।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.240.1)
भूतग्रामे नियुक्तं यत्तदेतत्कीर्तितं मया । ब्राह्मणस्य तु यत्कृत्यं तत्ते वक्ष्यामि सांप्रतम् ॥
bhūtagrāme niyuktaṃ yattadetatkīrtitaṃ mayā | brāhmaṇasya tu yatkṛtyaṃ tatte vakṣyāmi sāṃpratam
प्राणियों के समूह के लिए जो विधान है, वह मैंने कह दिया। अब ब्राह्मण का जो कर्तव्य है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 2 (12.240.2)
जातकर्मप्रभृत्यस्य कर्मणां दक्षिणावताम् । क्रिया स्यादासमावृत्तेराचार्ये वेदपारगे ॥
jātakarmaprabhṛtyasya karmaṇāṃ dakṣiṇāvatām | kriyā syādāsamāvṛtterācārye vedapārage
जातकर्म से आरम्भ करके दक्षिणा वाले उसके कर्मों का अनुष्ठान होना चाहिए, और समावर्तन तक वेद के पारंगत आचार्य के पास उसकी शिक्षा होनी चाहिए।
श्लोक 3 (12.240.3)
अधीत्य वेदानखिलान्गुरुशुश्रूषणे रतः । गुरूणामनृणो भूत्वा समावर्तेत यज्ञवित् ॥
adhītya vedānakhilānguruśuśrūṣaṇe rataḥ | gurūṇāmanṛṇo bhūtvā samāvarteta yajñavit
सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करके और गुरु की सेवा में लगा रहकर, यज्ञ को जाननेवाला पुरुष गुरुओं के ऋण से मुक्त होकर घर लौटे।
श्लोक 4 (12.240.4)
आचार्येणाभ्यनुज्ञातश्चतुर्णामेकमाश्रमम् । आविमोक्षाच्छरीरस्य सोऽवतिष्ठेद्यथाविधि ॥
ācāryeṇābhyanujñātaścaturṇāmekamāśramam | āvimokṣāccharīrasya so'vatiṣṭhedyathāvidhi
आचार्य की आज्ञा पाकर वह चार आश्रमों में से किसी एक का विधिपूर्वक शरीर छूटने तक पालन करे।
श्लोक 5 (12.240.5)
प्रजासर्गेण दारैश्च ब्रह्मचर्येण वा पुनः । वने गुरुसकाशे वा यतिधर्मेण वा पुनः ॥
prajāsargeṇa dāraiśca brahmacaryeṇa vā punaḥ | vane gurusakāśe vā yatidharmeṇa vā punaḥ
वह सन्तान उत्पन्न करके और पत्नियों के साथ रहकर, अथवा ब्रह्मचर्य से, अथवा वन में, अथवा गुरु के समीप, अथवा संन्यासी के धर्म से उसका पालन करे।
श्लोक 6 (12.240.6)
गृहस्थस्त्वेष धर्माणां सर्वेषां मूलमुच्यते । यत्र पक्वकषायो हि दान्तः सर्वत्र सिध्यति ॥
gṛhasthastveṣa dharmāṇāṃ sarveṣāṃ mūlamucyate | yatra pakvakaṣāyo hi dāntaḥ sarvatra sidhyati
इनमें गृहस्थ ही सब धर्मों का मूल कहा जाता है, क्योंकि वहाँ जिसके दोष पक चुके हैं और जो इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सर्वत्र सिद्धि पाता है।
श्लोक 7 (12.240.7)
प्रजावान्श्रोत्रियो यज्वा मुक्त एव ऋणैस्त्रिभिः । अथान्यानाश्रमान्पश्चात्पूतो गच्छेत कर्मभिः ॥
prajāvānśrotriyo yajvā mukta eva ṛṇaistribhiḥ | athānyānāśramānpaścātpūto gaccheta karmabhiḥ
सन्तानवान्, वेदज्ञ और यज्ञ करनेवाला पुरुष तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है। कर्मों से पवित्र होकर वह फिर अन्य आश्रमों में जा सकता है।
श्लोक 8 (12.240.8)
यत्पृथिव्यां पुण्यतमं विद्यात्स्थानं तदावसेत् । यतेत तस्मिन्प्रामाण्यं गन्तुं यशसि चोत्तमे ॥
yatpṛthivyāṃ puṇyatamaṃ vidyātsthānaṃ tadāvaset | yateta tasminprāmāṇyaṃ gantuṃ yaśasi cottame
पृथ्वी पर जिस स्थान को वह सबसे अधिक पुण्यमय जाने, वहीं निवास करे, और उसमें प्रामाणिकता तथा उत्तम यश पाने का यत्न करे।
श्लोक 9 (12.240.9)
तपसा वा सुमहता विद्यानां पारणेन वा । इज्यया वा प्रदानैर्वा विप्राणां वर्धते यशः ॥
tapasā vā sumahatā vidyānāṃ pāraṇena vā | ijyayā vā pradānairvā viprāṇāṃ vardhate yaśaḥ
महान् तप से, विद्याओं के पूर्ण अध्ययन से, यज्ञ से अथवा दानों से ब्राह्मणों का यश बढ़ता है।
श्लोक 10 (12.240.10)
यावदस्य भवत्यस्मिन्कीर्तिर्लोके यशस्करी । तावत्पुण्यकृताँल्लोकाननन्तान्पुरुषोऽश्नुते ॥
yāvadasya bhavatyasminkīrtirloke yaśaskarī | tāvatpuṇyakṛtām̐llokānanantānpuruṣo'śnute
जब तक इस लोक में यश देनेवाली उसकी कीर्ति बनी रहती है, तब तक पुरुष अपने पुण्य से प्राप्त अनन्त लोकों का भोग करता है।
श्लोक 11 (12.240.11)
अध्यापयेदधीयीत याजयेत यजेत वा । न वृथा प्रतिगृह्णीयान्न च दद्यात्कथंचन ॥
adhyāpayedadhīyīta yājayeta yajeta vā | na vṛthā pratigṛhṇīyānna ca dadyātkathaṃcana
वह पढ़ाए, पढ़े, यज्ञ कराए और स्वयं यज्ञ करे। वह व्यर्थ दान न ले, और कभी व्यर्थ दान न दे।
श्लोक 12 (12.240.12)
याज्यतः शिष्यतो वाऽपि कन्याया वा धनं महत् । यद्यागच्छेद्यजेद्दद्यान्नैकोऽश्नीयात्कथंचन ॥
yājyataḥ śiṣyato vā'pi kanyāyā vā dhanaṃ mahat | yadyāgacchedyajeddadyānnaiko'śnīyātkathaṃcana
यदि यजमान से, शिष्य से, अथवा कन्या से उसे बहुत धन मिले, तो उससे यज्ञ करे और दान दे, और उसे कभी अकेला न खाए।
श्लोक 13 (12.240.13)
गृहमावसतो ह्यस्य नान्यत्तीर्थमुदाहृतम् । देवर्षिपितृगुर्वर्थं वृद्धातुरबुभुक्षताम् ॥
gṛhamāvasato hyasya nānyattīrthamudāhṛtam | devarṣipitṛgurvarthaṃ vṛddhāturabubhukṣatām
गृहस्थ के लिए इसके सिवा कोई और तीर्थ नहीं बताया गया: देवताओं, ऋषियों, पितरों और गुरुओं के लिए, तथा वृद्धों, रोगियों और भूखों के लिए दान देना।
श्लोक 14 (12.240.14)
अन्तर्हिताभितप्तानां यथाशक्ति बुभूषताम् । द्रव्याणामतिशक्त्याऽपि देयमेषां कृतादपि ॥
antarhitābhitaptānāṃ yathāśakti bubhūṣatām | dravyāṇāmatiśaktyā'pi deyameṣāṃ kṛtādapi
जो छिपे हुए अभाव से पीड़ित हैं, जो सन्तप्त हैं और जो जीवन की इच्छा रखते हैं, उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार, यहाँ तक कि शक्ति से बढ़कर भी, और तैयार किए हुए अन्न में से भी, द्रव्य देना चाहिए।
श्लोक 15 (12.240.15)
अर्हतामनुरूपाणां नादेयं ह्यस्ति किंचन । उच्चैः श्रवसमप्यश्वं काश्यपाय महात्मने । दत्त्वा जगाम प्रह्लादो लोकान्देवैरभिष्टुतान् ॥
arhatāmanurūpāṇāṃ nādeyaṃ hyasti kiṃcana | uccaiḥ śravasamapyaśvaṃ kāśyapāya mahātmane | dattvā jagāma prahlādo lokāndevairabhiṣṭutān
योग्य और उपयुक्त पात्रों के लिए कुछ भी अदेय नहीं है। प्रह्लाद ने उच्चैःश्रवा घोड़े तक को महात्मा कश्यप को देकर देवताओं से स्तुत लोकों को प्रस्थान किया।
श्लोक 16 (12.240.16)
अनुनीय तथा काव्यः सत्यसन्धो महाव्रतः । स्वैः प्राणैर्ब्राह्मणप्राणान्परित्राय दिवं गतः ॥
anunīya tathā kāvyaḥ satyasandho mahāvrataḥ | svaiḥ prāṇairbrāhmaṇaprāṇānparitrāya divaṃ gataḥ
सत्य पर दृढ़ और महान् व्रतों वाले काव्य (उशना) ने उन्हें शान्त करके अपने प्राणों से ब्राह्मणों के प्राणों की रक्षा की और स्वर्ग को गए।
श्लोक 17 (12.240.17)
रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने । अपः प्रदाय शीतोष्णा नाकपृष्ठे महीयते ॥
rantidevaśca sāṃkṛtyo vasiṣṭhāya mahātmane | apaḥ pradāya śītoṣṇā nākapṛṣṭhe mahīyate
सांकृत्य रन्तिदेव ने महात्मा वसिष्ठ को शीतल और उष्ण जल देकर स्वर्ग के शिखर पर सम्मान पाया।
श्लोक 18 (12.240.18)
आत्रेयश्चेन्द्रद्रुमये ह्यर्हते विविधं धनम् । दत्त्वा लोकान्ययौ धीमाननन्तान्स महीपतिः ॥
ātreyaścendradrumaye hyarhate vividhaṃ dhanam | dattvā lokānyayau dhīmānanantānsa mahīpatiḥ
आत्रेय नामक उस बुद्धिमान् राजा ने योग्य इन्द्रद्रुमय को नाना प्रकार का धन देकर अनन्त लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 19 (12.240.19)
शिबिरौशीनरोऽङ्गानि सुतं च प्रियमौरसम् । ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥
śibirauśīnaro'ṅgāni sutaṃ ca priyamaurasam | brāhmaṇārthamupākṛtya nākapṛṣṭhamito gataḥ
उशीनर के पुत्र शिबि ने ब्राह्मण के लिए अपने अंग और अपना प्रिय औरस पुत्र अर्पित किया और यहाँ से स्वर्ग के शिखर को गए।
श्लोक 20 (12.240.20)
प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय नयने स्वके । ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥
pratardanaḥ kāśipatiḥ pradāya nayane svake | brāhmaṇāyātulāṃ kīrtimiha cāmutra cāśnute
काशी के राजा प्रतर्दन ने ब्राह्मण को अपने नेत्र दे दिए, और इस लोक तथा परलोक दोनों में अतुल कीर्ति पाते हैं।
श्लोक 21 (12.240.21)
दिव्यमष्टशलाकं तु सौवर्णं परमर्द्धिमत् । छत्रं देवावृधो दत्त्वा सराष्ट्रोऽभ्यगमद्दिवम् ॥
divyamaṣṭaśalākaṃ tu sauvarṇaṃ paramarddhimat | chatraṃ devāvṛdho dattvā sarāṣṭro'bhyagamaddivam
देवावृध ने आठ शलाकाओं वाला, परम वैभवशाली, सोने का दिव्य छत्र देकर अपने राष्ट्र सहित स्वर्ग को प्राप्त किया।
श्लोक 22 (12.240.22)
सांकृतिश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् । उपदिश्य महातेजा गतो लोकाननुत्तमान् ॥
sāṃkṛtiśca tathā''treyaḥ śiṣyebhyo brahma nirguṇam | upadiśya mahātejā gato lokānanuttamān
सांकृति और आत्रेय ने भी शिष्यों को निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देकर, महान् तेज से युक्त होकर, परम लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 23 (12.240.23)
अम्बरीषो गवां दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः प्रतापवान् । अर्बुदानि दशैकं च सराष्ट्रोऽभ्यगमद्दिवम् ॥
ambarīṣo gavāṃ dattvā brāhmaṇebhyaḥ pratāpavān | arbudāni daśaikaṃ ca sarāṣṭro'bhyagamaddivam
प्रतापी अम्बरीष ने ब्राह्मणों को दस और एक अर्बुद अर्थात् ग्यारह अर्बुद गौएँ दान दीं और अपने राष्ट्र सहित स्वर्ग को गए।
श्लोक 24 (12.240.24)
सावित्री कुण्डले दिव्ये शरीरं जनमेजयः । ब्राह्मणार्थे परित्यज्य जग्मतुर्लोकमुत्तमम् ॥
sāvitrī kuṇḍale divye śarīraṃ janamejayaḥ | brāhmaṇārthe parityajya jagmaturlokamuttamam
सावित्री ने अपने दो दिव्य कुण्डल और जनमेजय ने अपना शरीर ब्राह्मणों के लिए त्यागा, और वे दोनों उत्तम लोक को गए।
श्लोक 25 (12.240.25)
सर्वरत्नं वृषादर्विर्युवनाश्वः प्रियाः स्त्रियः । रम्यमावसथं चैव दत्त्वामुं लोकमास्थितः ॥
sarvaratnaṃ vṛṣādarviryuvanāśvaḥ priyāḥ striyaḥ | ramyamāvasathaṃ caiva dattvāmuṃ lokamāsthitaḥ
वृषादर्भि ने सब रत्न दिए और युवनाश्व ने अपनी प्रिय स्त्रियाँ तथा सुन्दर निवास दिया; इस प्रकार दान करके वे उस परलोक में स्थित हुए।
श्लोक 26 (12.240.26)
निमी राष्ट्रं च वैदेहो जामदग्न्यो वसुंधराम् । ब्राह्मणेभ्यो ददौ चापि गयश्चोर्वीं सपत्तनाम् ॥
nimī rāṣṭraṃ ca vaideho jāmadagnyo vasuṃdharām | brāhmaṇebhyo dadau cāpi gayaścorvīṃ sapattanām
विदेह के राजा निमि ने अपना राज्य, जमदग्नि के पुत्र ने पृथ्वी, और गय ने नगरों सहित भूमि ब्राह्मणों को दे दी।
श्लोक 27 (12.240.27)
अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि भूतकृत् । वसिष्ठो जीवयामास प्रजापतिरिव प्रजाः ॥
avarṣati ca parjanye sarvabhūtāni bhūtakṛt | vasiṣṭho jīvayāmāsa prajāpatiriva prajāḥ
जब पर्जन्य ने वर्षा नहीं की, तब प्राणियों के रचयिता वसिष्ठ ने सब प्राणियों को वैसे ही जीवित कर दिया जैसे प्रजापति अपनी प्रजा को करते हैं।
श्लोक 28 (12.240.28)
करंधमस्य पुत्रस्तु मरुतो नृपतिस्तथा । कन्यामङ्गिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम ह ॥
karaṃdhamasya putrastu maruto nṛpatistathā | kanyāmaṅgirase dattvā divamāśu jagāma ha
करन्धम के पुत्र राजा मरुत्त ने अपनी कन्या अङ्गिरा को देकर शीघ्र स्वर्ग को प्रस्थान किया।
श्लोक 29 (12.240.29)
ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा बुद्धिमतां वरः । निधिं शङ्खं द्विजाग्र्येभ्यो दत्त्वा लोकानवाप्तवान् ॥
brahmadattaśca pāñcālyo rājā buddhimatāṃ varaḥ | nidhiṃ śaṅkhaṃ dvijāgryebhyo dattvā lokānavāptavān
पाञ्चाल के राजा ब्रह्मदत्त ने, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ थे, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शङ्ख नामक निधि दी और लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 30 (12.240.30)
राजा मित्रसहश्चापि वसिष्ठाय महात्मने । मदयन्तीं प्रियां दत्त्वा तया सह दिवं गतः ॥
rājā mitrasahaścāpi vasiṣṭhāya mahātmane | madayantīṃ priyāṃ dattvā tayā saha divaṃ gataḥ
राजा मित्रसह ने महात्मा वसिष्ठ को अपनी प्रिय पत्नी मदयन्ती देकर उसके साथ स्वर्ग की यात्रा की।
श्लोक 31 (12.240.31)
सहस्रजिच्च राजर्षिः प्राणानिष्टान्महायशाः । ब्राह्मणार्थं परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥
sahasrajicca rājarṣiḥ prāṇāniṣṭānmahāyaśāḥ | brāhmaṇārthaṃ parityajya gato lokānanuttamān
महायशस्वी राजर्षि सहस्रजित् ने ब्राह्मण के लिए अपने प्रिय प्राण त्याग दिए और परम लोकों को गए।
श्लोक 32 (12.240.32)
सर्वकामैश्च संपूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् । मुद्गलाय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥
sarvakāmaiśca saṃpūrṇaṃ dattvā veśma hiraṇmayam | mudgalāya gataḥ svargaṃ śatadyumno mahīpatiḥ
राजा शतद्युम्न ने मुद्गल को सब कामनाओं की वस्तुओं से भरा सोने का भवन देकर स्वर्ग को प्राप्त किया।
श्लोक 33 (12.240.33)
नाम्ना च द्युतिमान्नाम साल्वराजः प्रतापवान् । दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥
nāmnā ca dyutimānnāma sālvarājaḥ pratāpavān | dattvā rājyamṛcīkāya gato lokānanuttamān
शाल्वों के प्रतापी राजा द्युतिमान् ने ऋचीक को अपना राज्य देकर परम लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 34 (12.240.34)
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः । ऋश्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वकामैरयुज्यत ॥
lomapādaśca rājarṣiḥ śāntāṃ dattvā sutāṃ prabhuḥ | ṛśyaśṛṅgāya vipulaiḥ sarvakāmairayujyata
राजर्षि लोमपाद ने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृङ्ग को देकर विपुल सब कामनाओं की पूर्ति पाई।
श्लोक 35 (12.240.35)
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् । हिरण्यहस्ताय गतो लोकान्देवैरभिष्टुतान् ॥
madirāśvaśca rājarṣirdattvā kanyāṃ sumadhyamām | hiraṇyahastāya gato lokāndevairabhiṣṭutān
राजर्षि मदिराश्व ने सुन्दर कटि वाली अपनी कन्या हिरण्यहस्त को देकर देवताओं से स्तुत लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 36 (12.240.36)
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा प्रसेनजित् । सवत्सानां महातेजा गतो लोकाननुत्तमान् ॥
dattvā śatasahasraṃ tu gavāṃ rājā prasenajit | savatsānāṃ mahātejā gato lokānanuttamān
महातेजस्वी राजा प्रसेनजित् ने बछड़ों सहित एक लाख गौएँ देकर परम लोकों को प्राप्त किया।
श्लोक 37 (12.240.37)
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसैव च । महात्मानो गताः स्वर्गं शिष्टात्मानो जितेन्द्रियाः ॥
ete cānye ca bahavo dānena tapasaiva ca | mahātmāno gatāḥ svargaṃ śiṣṭātmāno jitendriyāḥ
ये और दूसरे बहुत से महात्मा, जो शिष्ट स्वभाव के और जितेन्द्रिय थे, दान और तप से स्वर्ग को गए।
श्लोक 38 (12.240.38)
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत्स्थास्यति मेदिनी । दानयज्ञप्रजासर्गैरेते हि दिवमाप्नुवन् ॥
teṣāṃ pratiṣṭhitā kīrtiryāvatsthāsyati medinī | dānayajñaprajāsargairete hi divamāpnuvan
जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक उनकी कीर्ति स्थिर रहेगी; दान, यज्ञ और सन्तान उत्पन्न करने से उन्होंने स्वर्ग पाया।