शान्ति पर्व · अध्याय 241
काल की नदी और ब्राह्मण का पार उतरना
व्यास शुक को विद्वान् ब्राह्मण गृहस्थ के जीवन का उपदेश आगे देते हैं: छह कर्म, पाँच नित्य यज्ञ, आत्मसंयम तथा क्रोध और ईर्ष्या से मुक्ति। फिर वे संसार को एक भयंकर नदी के रूप में दिखाते हैं जिसका जल काल है और जिसका ग्राह काम है, और जो सब प्राणियों को यम की ओर बहा ले जाती है। केवल ज्ञानी लोग बुद्धि की नाव से उसे पार करते हैं, और व्यास ब्राह्मण को उस पार निकलने का यत्न करने को कहते हैं। अन्त में वे बताते हैं कि अज्ञानी धर्म और अधर्म को मिला देते हैं और इसलिए बार-बार जन्मते-मरते हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.241.1)
त्रयीं विद्यामवेक्षेत वेदेषूत्तमतां गतः । ऋक्सामवर्णाक्षरतो यजुषोऽथर्वणस्तथा ॥
trayīṃ vidyāmavekṣeta vedeṣūttamatāṃ gataḥ | ṛksāmavarṇākṣarato yajuṣo'tharvaṇastathā
जो वेदों में उत्कृष्टता को प्राप्त हो चुका है, वह त्रयी विद्या का आश्रय ले, और ऋक्, साम, यजुः तथा अथर्वण का उनके वर्णों और अक्षरों के अनुसार अध्ययन करे।
श्लोक 2 (12.241.2)
तिष्ठत्येतेषु भगवान्षट्सु कर्मसु संस्थितः । वेदवादेषु कुशला ह्यध्यात्मकुशलाश्च ये ॥
tiṣṭhatyeteṣu bhagavānṣaṭsu karmasu saṃsthitaḥ | vedavādeṣu kuśalā hyadhyātmakuśalāśca ye
पूज्य ब्राह्मण इन छह कर्मों में प्रतिष्ठित होकर इनमें स्थित रहता है। जो लोग वेदवाद में कुशल हैं और अध्यात्म में कुशल हैं,
श्लोक 3 (12.241.3)
सत्ववन्तो महाभागाः पश्यन्ति प्रभवाप्ययौ । एवं धर्मेण वर्तेत क्रियाः शिष्टवदाचरेत् ॥
satvavanto mahābhāgāḥ paśyanti prabhavāpyayau | evaṃ dharmeṇa varteta kriyāḥ śiṣṭavadācaret
सत्त्वगुण से युक्त और महान् भाग्यशाली होकर वे उत्पत्ति और लय को देखते हैं। इसी प्रकार वह धर्म के अनुसार चले और शिष्ट पुरुषों की भाँति कर्म करे।
श्लोक 4 (12.241.4)
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत वै द्विजः । सद्भ्य आगतविज्ञानः शिष्टः शास्त्रविचक्षणः ॥
asaṃrodhena bhūtānāṃ vṛttiṃ lipseta vai dvijaḥ | sadbhya āgatavijñānaḥ śiṣṭaḥ śāstravicakṣaṇaḥ
ब्राह्मण प्राणियों को बाधा पहुँचाए बिना अपनी जीविका चाहे, जो सज्जनों से ज्ञान पा चुका है, शिष्ट है और शास्त्रों में निपुण है,
श्लोक 5 (12.241.5)
स्वधर्मेण क्रिया लोके कुर्वाणः सोऽप्यसङ्करः । तिष्ठते तेषु गृहवान्षट्सु कर्मसु स द्विजः ॥
svadharmeṇa kriyā loke kurvāṇaḥ so'pyasaṅkaraḥ | tiṣṭhate teṣu gṛhavānṣaṭsu karmasu sa dvijaḥ
अपने धर्म के अनुसार लोक में कर्म करता हुआ वह भी संकर से रहित है। वह गृहस्थ ब्राह्मण उन छह कर्मों में स्थित रहता है,
श्लोक 6 (12.241.6)
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च । धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् । वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ॥
pañcabhiḥ satataṃ yajñaiḥ śraddadhāno yajeta ca | dhṛtimānapramattaśca dānto dharmavidātmavān | vītaharṣamadakrodho brāhmaṇo nāvasīdati
और श्रद्धा के साथ पाँच यज्ञों से निरन्तर यजन करे। धैर्यवान्, सावधान, संयमी, धर्म को जाननेवाला और आत्मवान्, हर्ष, मद और क्रोध से रहित ब्राह्मण कभी दुःख में नहीं डूबता।
श्लोक 7 (12.241.7)
दानमध्ययनं यज्ञस्तपो ह्रीरार्जवं दमः । एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति ॥
dānamadhyayanaṃ yajñastapo hrīrārjavaṃ damaḥ | etairvivardhate tejaḥ pāpmānaṃ cāpakarṣati
दान, अध्ययन, यज्ञ, तप, लज्जा, सरलता और दम: इनसे उसका तेज बढ़ता है और पाप दूर होता है।
श्लोक 8 (12.241.8)
धूतपाप्मा च मेधावी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्ब्रह्मणः पदम् ॥
dhūtapāpmā ca medhāvī laghvāhāro jitendriyaḥ | kāmakrodhau vaśe kṛtvā ninīṣedbrahmaṇaḥ padam
पाप को झाड़कर, बुद्धिमान्, हल्का आहार करनेवाला, जितेन्द्रिय, और काम तथा क्रोध को वश में करके वह ब्रह्म के पद तक पहुँचने की इच्छा करे।
श्लोक 9 (12.241.9)
अग्नींश्च ब्राह्मणांश्चार्चेद्देवताः प्रणमेत च । वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसां चाधर्मसंहिताम् ॥
agnīṃśca brāhmaṇāṃścārceddevatāḥ praṇameta ca | varjayeduśatīṃ vācaṃ hiṃsāṃ cādharmasaṃhitām
वह अग्नियों और ब्राह्मणों की पूजा करे और देवताओं को प्रणाम करे। वह प्रलोभन देनेवाली वाणी और अधर्म से जुड़ी हिंसा को त्याग दे।
श्लोक 10 (12.241.10)
एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । ज्ञानागमेन कर्माणि कुर्वन्कर्मसु सिद्ध्यति ॥
eṣā pūrvatarā vṛttirbrāhmaṇasya vidhīyate | jñānāgamena karmāṇi kurvankarmasu siddhyati
ब्राह्मण के लिए यह प्राचीन जीवन-पद्धति बताई गई है: शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान के साथ कर्म करता हुआ वह कर्मों में सिद्धि पाता है।
श्लोक 11 (12.241.11)
पञ्चेन्द्रियजलां घोरां लोभकूलां सुदुस्तराम् । मन्युपङ्कामनाधृष्यां नदीं तरति बुद्धिमान् ॥
pañcendriyajalāṃ ghorāṃ lobhakūlāṃ sudustarām | manyupaṅkāmanādhṛṣyāṃ nadīṃ tarati buddhimān
बुद्धिमान् पुरुष उस नदी को पार करता है जो भयंकर और अत्यन्त दुस्तर है, जिसका जल पाँच इन्द्रियाँ हैं, जिसके किनारे लोभ हैं, जिसका कीचड़ क्रोध है, और जिसे कोई जीत नहीं सकता।
श्लोक 12 (12.241.12)
कालमभ्युद्यतं पश्येन्नित्यमत्यन्तमोहनम् ॥
kālamabhyudyataṃ paśyennityamatyantamohanam
वह सदा उठे हुए और अत्यन्त मोह में डालनेवाले काल को देखे,
श्लोक 13 (12.241.13)
महता विधिदृष्टेन बलिनाऽप्रतिघातिना । स्वभावस्रोतसा वृत्तमुह्यते सततं जगत् ॥
mahatā vidhidṛṣṭena balinā'pratighātinā | svabhāvasrotasā vṛttamuhyate satataṃ jagat
क्योंकि चलता हुआ यह जगत् अपने स्वभाव की धारा में निरन्तर बहता जाता है, जो विशाल है, विधान से निर्धारित दीखती है, बलवती है और रोकी नहीं जा सकती;
श्लोक 14 (12.241.14)
कालोदकेन महता वर्षावर्तेन संततम् । मासोर्मिणर्तुवेगेन पक्षोलपतृणेन च ॥
kālodakena mahatā varṣāvartena saṃtatam | māsormiṇartuvegena pakṣolapatṛṇena ca
वह धारा जिसका जल काल है, जो विशाल है, जिसके भँवर वर्षाएँ हैं, जिसकी लहरें मास हैं, जिसका वेग ऋतुएँ हैं, और जिसके सरकण्डे और तृण पक्ष हैं,
श्लोक 15 (12.241.15)
निमेषोन्मेषफेनेन अहोरात्रजवेन च । कामग्राहेण घोरेण वेदयज्ञप्लवेन च ॥
nimeṣonmeṣaphenena ahorātrajavena ca | kāmagrāheṇa ghoreṇa vedayajñaplavena ca
जिसका फेन पलक का खुलना और बन्द होना है, जिसका वेग दिन और रात हैं, जिसका भयानक ग्राह काम है, और जिसकी नौका वेद और यज्ञ हैं,
श्लोक 16 (12.241.16)
धर्मद्वीपेन भूतानां चार्थकामरवेण च । ऋतवाङ्मोक्षतीरेण विहिंसातरुवाहिना ॥
dharmadvīpena bhūtānāṃ cārthakāmaraveṇa ca | ṛtavāṅmokṣatīreṇa vihiṃsātaruvāhinā
जिसका द्वीप धर्म है, जिसकी गर्जना प्राणियों के अर्थ और काम का कोलाहल है, जिसके तट सत्य वाणी और मोक्ष हैं, और जो हिंसा के वृक्षों को बहा ले जाती है,
श्लोक 17 (12.241.17)
युगह्रदौघमध्येन ब्रह्मप्रायभवेन च । धात्रा सृष्टानि भूतानि कृष्यन्ते यमसादनम् ॥
yugahradaughamadhyena brahmaprāyabhavena ca | dhātrā sṛṣṭāni bhūtāni kṛṣyante yamasādanam
जिसके मध्य में युगों के ह्रद और प्रवाह हैं, जिसका उद्गम ब्रह्मा में है: उसी के द्वारा विधाता के रचे हुए प्राणी यमलोक की ओर खींचे जाते हैं।
श्लोक 18 (12.241.18)
एतत्प्रज्ञामयैर्धीरा निस्तरन्ति मनीषिणः । प्लवैरप्लववन्तो हि किं करिष्यन्त्यचेतसः ॥
etatprajñāmayairdhīrā nistaranti manīṣiṇaḥ | plavairaplavavanto hi kiṃ kariṣyantyacetasaḥ
धीर और मनीषी लोग प्रज्ञा से बनी इन नौकाओं से पार उतरते हैं। जिनके पास नाव नहीं, वे विवेकहीन लोग क्या कर सकेंगे?
श्लोक 19 (12.241.19)
उपपन्नं हि यत्प्राज्ञो निस्तरेन्नेतरो जनः । दूरतो गुणदोषौ हि प्राज्ञः सर्वत्र पश्यति ॥
upapannaṃ hi yatprājño nistarennetaro janaḥ | dūrato guṇadoṣau hi prājñaḥ sarvatra paśyati
यह उचित ही है कि ज्ञानी पार उतरता है, दूसरा जन नहीं, क्योंकि ज्ञानी सर्वत्र गुण और दोष को दूर से ही देख लेता है।
श्लोक 20 (12.241.20)
संशयात्तु स कामात्मा चलचित्तोऽल्पचेतनः । अप्राज्ञो न तरत्येनं यो ह्यास्ते न स गच्छति ॥
saṃśayāttu sa kāmātmā calacitto'lpacetanaḥ | aprājño na taratyenaṃ yo hyāste na sa gacchati
किन्तु जो संशय में पड़ा है, कामना से भरा है, जिसका चित्त चंचल है और बुद्धि थोड़ी है, वह अज्ञानी इसे पार नहीं करता; और जो केवल बैठा रहता है, वह कहीं पहुँचता नहीं।
श्लोक 21 (12.241.21)
अप्लवो हि महादोषं मुह्यमानो न गच्छति । कामग्राहगृहीतस्य ज्ञानमप्यस्य न प्लवः ॥
aplavo hi mahādoṣaṃ muhyamāno na gacchati | kāmagrāhagṛhītasya jñānamapyasya na plavaḥ
नाव के बिना मोहित मनुष्य इस महान् संकट को पार नहीं कर पाता। जिसे काम के ग्राह ने पकड़ लिया है, उसके लिए ज्ञान भी नाव नहीं बनता।
श्लोक 22 (12.241.22)
तस्मादुन्मज्जनस्यार्थे प्रयतेत विचक्षणः । एतदुन्मज्जनं तस्य यदयं ब्राह्मणो भवेत् ॥
tasmādunmajjanasyārthe prayateta vicakṣaṇaḥ | etadunmajjanaṃ tasya yadayaṃ brāhmaṇo bhavet
इसलिए विवेकी पुरुष उबरने का यत्न करे। उसका उबरना यही है कि वह ब्राह्मण बने, अर्थात् ब्रह्म को जाननेवाला हो।
श्लोक 23 (12.241.23)
त्र्यवदाते कुले जातस्त्रिसंदेहस्त्रिकर्मकृत् । तस्मादुन्मज्जनं तिष्ठेत्प्रज्ञया निस्तरेद्यथा ॥
tryavadāte kule jātastrisaṃdehastrikarmakṛt | tasmādunmajjanaṃ tiṣṭhetprajñayā nistaredyathā
तीन प्रकार से शुद्ध कुल में उत्पन्न, तीन बातों में संशयशील और तीन कर्म करनेवाला पुरुष इसलिए उबरने के उपाय पर टिका रहे, जिससे वह प्रज्ञा के द्वारा पार उतर जाए।
श्लोक 24 (12.241.24)
संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः । प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिह लोके परत्र च ॥
saṃskṛtasya hi dāntasya niyatasya yatātmanaḥ | prājñasyānantarā siddhiriha loke paratra ca
जो संस्कारयुक्त, संयमी, नियमबद्ध और आत्मनियन्त्रित है, उस ज्ञानी को इस लोक में और परलोक में बिना विलम्ब के सिद्धि मिलती है।
श्लोक 25 (12.241.25)
वर्तेत तेषु गृहवानक्रुध्यन्ननसूयकः । पञ्चभिः सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च ॥
varteta teṣu gṛhavānakrudhyannanasūyakaḥ | pañcabhiḥ satataṃ yajñairvighasāśī yajeta ca
गृहस्थ उन कर्मों में रहे, क्रोध और ईर्ष्या से रहित होकर, यज्ञ से बचा हुआ अन्न खाते हुए और पाँच यज्ञों से निरन्तर यजन करता हुआ।
श्लोक 26 (12.241.26)
सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् । असंरोधेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेदगर्हिताम् ॥
satāṃ dharmeṇa varteta kriyāṃ śiṣṭavadācaret | asaṃrodhena lokasya vṛttiṃ lipsedagarhitām
वह सज्जनों के धर्म के अनुसार चले, शिष्टों की तरह कर्म करे, और संसार को बाधा पहुँचाए बिना निन्दा-रहित जीविका चाहे।
श्लोक 27 (12.241.27)
श्रुतविज्ञानतत्त्वज्ञः शिष्टाचारविचक्षणः । स्वधर्मेण क्रियावांश्च कर्मणा सोऽप्यसंकरः ॥
śrutavijñānatattvajñaḥ śiṣṭācāravicakṣaṇaḥ | svadharmeṇa kriyāvāṃśca karmaṇā so'pyasaṃkaraḥ
जो सुने हुए और अनुभव किए हुए ज्ञान के तत्त्व को जानता है, शिष्ट आचार में निपुण है, और अपने धर्म के अनुसार कर्म में लगा है, वह भी अपने कर्म से संकर-रहित है।
श्लोक 28 (12.241.28)
क्रियावाञ्श्रद्दधानो हि दान्तः प्रायोऽनसूयकः । धर्माधर्मविशेषज्ञः सर्वं तरति दुस्तरम् ॥
kriyāvāñśraddadhāno hi dāntaḥ prāyo'nasūyakaḥ | dharmādharmaviśeṣajñaḥ sarvaṃ tarati dustaram
कर्मनिष्ठ, श्रद्धावान्, संयमी, प्रायः ईर्ष्या से रहित और धर्म-अधर्म के भेद को जाननेवाला पुरुष हर दुस्तर संकट को पार कर जाता है।
श्लोक 29 (12.241.29)
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् । वीतहर्षमदक्रोधो ब्राह्मणो नावसीदति ॥
dhṛtimānapramattaśca dānto dharmavidātmavān | vītaharṣamadakrodho brāhmaṇo nāvasīdati
धैर्यवान्, सावधान, संयमी, धर्म को जाननेवाला, आत्मवान्, और हर्ष, मद तथा क्रोध से रहित ब्राह्मण नहीं डूबता।
श्लोक 30 (12.241.30)
एषा पुरातनी वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । ज्ञानवृद्ध्यैव कर्माणि कुर्वन्सर्वत्र सिध्यति ॥
eṣā purātanī vṛttirbrāhmaṇasya vidhīyate | jñānavṛddhyaiva karmāṇi kurvansarvatra sidhyati
ब्राह्मण के लिए यह पुरातन जीवन-पद्धति बताई गई है: बढ़ते हुए ज्ञान के साथ कर्म करता हुआ वह सर्वत्र सिद्ध होता है।
श्लोक 31 (12.241.31)
अधर्मं धर्मकामो हि करोति ह्यविचक्षणः । धर्मं वा धर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः ॥
adharmaṃ dharmakāmo hi karoti hyavicakṣaṇaḥ | dharmaṃ vā dharmasaṃkāśaṃ śocanniva karoti saḥ
धर्म की कामना करनेवाला अज्ञानी पुरुष अधर्म कर बैठता है; अथवा जो केवल धर्म जैसा दीखता है, उसे मानो शोक करता हुआ-सा करता है।
श्लोक 32 (12.241.32)
धर्मं करोमीति करोत्यधर्म । मधर्मकामश्च करोति धर्मम् । उभे बालः कर्मणी न प्रजानन् । संजायते म्रियते चापि देही ॥
dharmaṃ karomīti karotyadharma | madharmakāmaśca karoti dharmam | ubhe bālaḥ karmaṇī na prajānan | saṃjāyate mriyate cāpi dehī
"मैं धर्म कर रहा हूँ" ऐसा समझकर वह अधर्म करता है, और अधर्म की कामना करनेवाला धर्म कर देता है। दोनों प्रकार के कर्मों को न जाननेवाला अज्ञानी देहधारी जन्मता और मरता है।