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शान्ति पर्व · अध्याय 242

योग का रथ और साङ्ख्य का लक्षण

व्यास शुक से कहते हैं कि ज्ञानी लोग जन्म-मरण की नदी को प्रज्ञा की नावों से पार करते हैं, और योग का अभ्यास करनेवाला पुरुष अपनी विद्या या आचरण जैसा भी हो, उसे पार कर लेता है। वे योगी के आन्तरिक अनुशासन को एक दिव्य रथ के रूप में दिखाते हैं जो आत्मा को ब्रह्मलोक तक ले जाता है, फिर योग-दर्शन की अवस्थाएँ (धूम, जल, अग्नि, वायु, आकाश और बुद्धि के रूप), उनसे मिलनेवाली सिद्धियाँ तथा पंच महाभूतों और अहंकार पर विजय बताते हैं। अन्त में योग और साङ्ख्य के समान पच्चीस तत्त्व, व्यक्त और अव्यक्त, और मुक्त साङ्ख्य के लक्षण बताते हैं, जो समदर्शी, कामनारहित और सब प्राणियों के प्रति अहिंसक होता है।

अध्याय 241अध्याय-सूचीअध्याय 243

व्यास उवाच

श्लोक 1 (12.242.1)

अथ चेद्रोचयेदेतदुह्यते मनसा तथा । उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानवान्प्लववान्भवेत् ॥

atha cedrocayedetaduhyate manasā tathā | unmajjaṃśca nimajjaṃśca jñānavānplavavānbhavet

यदि यह उसे रुचे और मन उसे इसी ओर बहा ले चले, तो प्रवाह में उठता और डूबता हुआ वह ज्ञानवान् और नाववाला बने।

श्लोक 2 (12.242.2)

प्रज्ञया निर्मितैर्धीरास्तारयन्त्यबुधान्प्लवैः । नाबुधास्तारयन्त्यन्यानात्मानं वा कथंचन ॥

prajñayā nirmitairdhīrāstārayantyabudhānplavaiḥ | nābudhāstārayantyanyānātmānaṃ vā kathaṃcana

धीर लोग प्रज्ञा से बनी नावों में अज्ञानियों को पार ले जाते हैं। अज्ञानी न दूसरों को पार ले जाते हैं, न अपने को ही, किसी भी प्रकार।

श्लोक 3 (12.242.3)

छिन्नदोषो मुनिर्योगयुक्तो युञ्जीत द्वादश । दशकर्मसुखानर्थानुपायापायनिष्क्रियः ॥

chinnadoṣo muniryogayukto yuñjīta dvādaśa | daśakarmasukhānarthānupāyāpāyaniṣkriyaḥ

जिस मुनि के दोष कट चुके हैं और जो योग में लगा है, वह बारह का अभ्यास करे, तथा दस प्रकार के कर्मों, सुखों और प्रयोजनों के प्रति और उपाय तथा उसके नाश के प्रति निष्क्रिय हो जाए।

श्लोक 4 (12.242.4)

चक्षुराचारसंग्राहैर्मनसा दर्शनेन च । यच्छेद्वाङ्मनसी बुद्ध्या य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम् ॥

cakṣurācārasaṃgrāhairmanasā darśanena ca | yacchedvāṅmanasī buddhyā ya icchejjñānamuttamam

जो परम ज्ञान चाहता है, वह नेत्र और आचरण को समेटकर और संयत करके, मन और दर्शन के द्वारा, वाणी और मन को बुद्धि से रोके।

श्लोक 5 (12.242.5)

ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मनः । एतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥

jñānena yacchedātmānaṃ ya icchecchāntimātmanaḥ | eteṣāṃ cedanudraṣṭā puruṣo'pi sudāruṇaḥ

जो अपने लिए शान्ति चाहता है, वह ज्ञान से आत्मा को संयत करे। यदि कोई पुरुष, चाहे वह अत्यन्त उग्र भी हो, इन साधनों का अनुसरण करे,

श्लोक 6 (12.242.6)

यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाऽप्यनृचो द्विजः । यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तमः ॥

yadi vā sarvavedajño yadi vā'pyanṛco dvijaḥ | yadi vā dhārmiko yajvā yadi vā pāpakṛttamaḥ

चाहे वह सब वेदों का ज्ञाता हो या ऋचाओं से अनभिज्ञ द्विज हो, चाहे धार्मिक और यज्ञकर्ता हो या महापापी,

श्लोक 7 (12.242.7)

यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वैक्लव्यधारणः । तरत्येवं महादुर्गं जरामरणसागरम् ॥

yadi vā puruṣavyāghro yadi vaiklavyadhāraṇaḥ | taratyevaṃ mahādurgaṃ jarāmaraṇasāgaram

चाहे वह पुरुषों में व्याघ्र हो या दुर्बलता को धारण करनेवाला, वह इस प्रकार जरा और मरण के सागर रूपी इस महादुर्ग को पार कर लेता है।

श्लोक 8 (12.242.8)

एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानो ह्येवमन्ततः । अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्माऽतिवर्तते ॥

evaṃ hyetena yogena yuñjāno hyevamantataḥ | api jijñāsamāno'pi śabdabrahmā'tivartate

क्योंकि इस प्रकार इस योग से जो अन्त में इसी तरह अपने को जोड़ता है, वह केवल जिज्ञासु होता हुआ भी शब्दब्रह्म से आगे निकल जाता है।

श्लोक 9 (12.242.9)

धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपायापायकूवरः । अपानाक्षः प्राणयुगः प्रज्ञायुर्जीवबन्धनः ॥

dharmopastho hrīvarūtha upāyāpāyakūvaraḥ | apānākṣaḥ prāṇayugaḥ prajñāyurjīvabandhanaḥ

इसका आसन धर्म है, इसका आवरण लज्जा है, इसका जूए का दण्ड उपाय और अपाय है; इसकी धुरी अपान है, जूआ प्राण है, प्रज्ञा इसकी आयु है और जीव इसका बन्धन है;

श्लोक 10 (12.242.10)

चेतनाबन्धुरश्चारुश्चाचारग्रहनेमिमान् । दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः ॥

cetanābandhuraścāruścācāragrahanemimān | darśanasparśanavaho ghrāṇaśravaṇavāhanaḥ

चेतना इसकी सुन्दर रेलिंग है, सदाचार इसकी पकड़ और चक्र की परिधि है; दर्शन और स्पर्श इसके वाहक हैं, घ्राण और श्रवण इसके वाहन हैं;

श्लोक 11 (12.242.11)

प्रज्ञानाभिः सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथिः । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरः सरः ॥

prajñānābhiḥ sarvatantrapratodo jñānasārathiḥ | kṣetrajñādhiṣṭhito dhīraḥ śraddhādamapuraḥ saraḥ

विवेक इसकी नाभि है, सब नियम इसकी छड़ी हैं, ज्ञान इसका सारथि है; क्षेत्रज्ञ उस पर अधिष्ठित है, वह धीर है, और श्रद्धा तथा दम उसके आगे-आगे चलते हैं;

श्लोक 12 (12.242.12)

त्यागरश्म्यनुगः क्षेम्यः शौचगो ध्यानगोचरः । जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते ॥

tyāgaraśmyanugaḥ kṣemyaḥ śaucago dhyānagocaraḥ | jīvayukto ratho divyo brahmaloke virājate

यह त्याग की लगामों के पीछे चलता है, क्षेमकारी है, शुचिता के मार्ग से जाता है और ध्यान के क्षेत्र में विचरता है। जीव से जुता हुआ यह दिव्य रथ ब्रह्मलोक में शोभित होता है।

श्लोक 13 (12.242.13)

अथ संत्वरमाणस्य रथमेवं युयुक्षतः । अक्षरं गन्तुमनसो विधिं वक्ष्यामि शीघ्रगम् ॥

atha saṃtvaramāṇasya rathamevaṃ yuyukṣataḥ | akṣaraṃ gantumanaso vidhiṃ vakṣyāmi śīghragam

अब जो शीघ्रता कर रहा है, इस प्रकार इस रथ को जोतना चाहता है और अक्षर तक पहुँचने का मन रखता है, उसे मैं शीघ्र पहुँचानेवाली विधि बताऊँगा।

श्लोक 14 (12.242.14)

सप्त यो धारणाः कृत्स्ना वाग्यतः प्रतिपद्यते । पृष्ठतः पार्श्वतश्चान्यास्तावत्यस्ताः प्रधारणाः ॥

sapta yo dhāraṇāḥ kṛtsnā vāgyataḥ pratipadyate | pṛṣṭhataḥ pārśvataścānyāstāvatyastāḥ pradhāraṇāḥ

जो वाणी को संयत रखकर सातों धारणाओं को पूर्ण रूप से सिद्ध करता है, और उनके पीछे तथा पार्श्व में स्थित जितनी अन्य धारणाएँ हैं उन्हें भी, वे प्रधारणाएँ कहलाती हैं।

श्लोक 15 (12.242.15)

क्रमशः पार्थिवं यच्च वायव्यं खं तथा पयः । ज्योतिषो यत्तदैश्वर्यमहंकारस्य बुद्धितः । अव्यक्तस्य तथैश्वर्यं क्रमशः प्रतिपद्यते ॥

kramaśaḥ pārthivaṃ yacca vāyavyaṃ khaṃ tathā payaḥ | jyotiṣo yattadaiśvaryamahaṃkārasya buddhitaḥ | avyaktasya tathaiśvaryaṃ kramaśaḥ pratipadyate

वह क्रम से पार्थिव, वायव्य, आकाश और जल पर, फिर तेज, अहंकार और बुद्धि पर, तथा इसी प्रकार अव्यक्त पर भी ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (12.242.16)

विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युङ्क्ते स योगतः । तथाऽस्य योगयुक्तस्य सिद्धिमात्मनि पश्यतः ॥

vikramāścāpi yasyaite tathā yuṅkte sa yogataḥ | tathā'sya yogayuktasya siddhimātmani paśyataḥ

और जिनके ये पराक्रम हैं, वह योग से उसी प्रकार अपने को जोड़ता है। और योग में लगे हुए, अपने भीतर सिद्धि देखनेवाले उस साधक के लिए,

श्लोक 17 (12.242.17)

निर्मुच्यमानः सूक्ष्मत्वाद्रूपाणीमानि पश्यतः । शैशिरस्तु यथा धूमः सूक्ष्मः संश्रयते नभः ॥

nirmucyamānaḥ sūkṣmatvādrūpāṇīmāni paśyataḥ | śaiśirastu yathā dhūmaḥ sūkṣmaḥ saṃśrayate nabhaḥ

जब वह अपनी सूक्ष्मता के कारण मुक्त होता जाता है, तब ये रूप उसे दीखते हैं। जैसे शिशिर का सूक्ष्म कुहरा आकाश में टिकता है,

श्लोक 18 (12.242.18)

तथा देहाद्विमुक्तस्य पूर्वरूपं भवत्युत । अथ धूमस्य विरमेद्द्वितीयं रूपदर्शनम् ॥

tathā dehādvimuktasya pūrvarūpaṃ bhavatyuta | atha dhūmasya virameddvitīyaṃ rūpadarśanam

वैसे ही शरीर से मुक्त हुए साधक को पहला रूप प्रकट होता है। जब धुआँ थम जाता है, तब रूप का दूसरा दर्शन होता है:

श्लोक 19 (12.242.19)

जलरूपमिवाकाशे तत्रैवात्मनि पश्यति । अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्निरूपं प्रकाशते ॥

jalarūpamivākāśe tatraivātmani paśyati | apāṃ vyatikrame cāsya vahnirūpaṃ prakāśate

वह अपने भीतर आकाश में जल जैसा रूप देखता है। जल के बीत जाने पर उसके सामने अग्नि का रूप प्रकाशित होता है।

श्लोक 20 (12.242.20)

तस्मिन्नुपरते चास्य वायव्यं सूक्ष्ममव्ययम् । रूपं प्रकाशते तस्य पीतवस्त्रवदव्ययम् ॥

tasminnuparate cāsya vāyavyaṃ sūkṣmamavyayam | rūpaṃ prakāśate tasya pītavastravadavyayam

उसके शान्त होने पर उसके लिए वायु का सूक्ष्म, अविनाशी रूप प्रकाशित होता है; वह रूप पीत वस्त्र के समान अविनाशी होकर चमकता है।

श्लोक 21 (12.242.21)

तस्मिन्नुपरते रूपमाकाशस्य प्रकाशते । तस्मिन्नुपरते चास्य बुद्धिरूपं प्रकाशते । ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूपं प्रकाशते ॥

tasminnuparate rūpamākāśasya prakāśate | tasminnuparate cāsya buddhirūpaṃ prakāśate | ūrṇārūpasavarṇasya tasya rūpaṃ prakāśate

उसके शान्त होने पर आकाश का रूप प्रकाशित होता है। उसके शान्त होने पर उसके लिए बुद्धि का रूप प्रकाशित होता है। और ऊन के रूप के समान वर्ण वाले उस साधक का रूप प्रकाशित होता है।

श्लोक 22 (12.242.22)

अथ श्वेतां गतिं गत्वा सोऽहङ्कारे प्रकाशते । सुशुक्लं चेतसः सौक्ष्म्यमप्युक्तं ब्राह्मणस्य वै ॥

atha śvetāṃ gatiṃ gatvā so'haṅkāre prakāśate | suśuklaṃ cetasaḥ saukṣmyamapyuktaṃ brāhmaṇasya vai

फिर श्वेत गति को पाकर वह अहंकार में प्रकाशित होता है। मन की अत्यन्त शुभ्र सूक्ष्मता भी ब्राह्मण के विषय में कही गई है।

श्लोक 23 (12.242.23)

एतेष्वपि हि जातेषु फलजातानि मे शृणु । जातस्य पार्थिवैश्वर्यैः सृष्टिरिष्टा विधीयते ॥

eteṣvapi hi jāteṣu phalajātāni me śṛṇu | jātasya pārthivaiśvaryaiḥ sṛṣṭiriṣṭā vidhīyate

इनके उत्पन्न हो जाने पर जो फल होते हैं, उन्हें भी मुझसे सुनो। जिसे पार्थिव ऐश्वर्य प्राप्त हो गया है, उसके लिए इच्छित सृष्टि का विधान है।

श्लोक 24 (12.242.24)

प्रजापतिरिवाक्षोभ्यः शरीरात्सृजते प्रजाः । अङ्गुल्यङ्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा ॥

prajāpatirivākṣobhyaḥ śarīrātsṛjate prajāḥ | aṅgulyaṅguṣṭhamātreṇa hastapādena vā tathā

प्रजापति के समान अक्षोभ्य रहकर वह अपने शरीर से प्रजा रचता है, चाहे अँगुली या अँगूठे जितने परिमाण से, चाहे हाथ या पैर से।

श्लोक 25 (12.242.25)

पृथिवीं कम्पयत्येको गुणो वायोरिति श्रुतिः । आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात्प्रकाशते । वर्णतो गृह्यते चाप्सु नापः पिबति चाशया ॥

pṛthivīṃ kampayatyeko guṇo vāyoriti śrutiḥ | ākāśabhūtaścākāśe savarṇatvātprakāśate | varṇato gṛhyate cāpsu nāpaḥ pibati cāśayā

वायु का एक ही गुण पृथ्वी को कँपा देता है, ऐसा श्रुति कहती है। आकाश रूप हो जाने पर वह समान वर्ण के कारण आकाश में प्रकाशित होता है। जल में वह अपने वर्ण से पहचाना जाता है, पर लालसा से जल नहीं पीता।

श्लोक 26 (12.242.26)

न चास्य तेजसां रूपं दृश्यते शाम्यते तथा । अहंकारेऽस्य विजिते पञ्चैते स्युर्वशानुगाः ॥

na cāsya tejasāṃ rūpaṃ dṛśyate śāmyate tathā | ahaṃkāre'sya vijite pañcaite syurvaśānugāḥ

उसके तेजों का रूप दिखाई नहीं देता, और वह शान्त हो जाता है। अहंकार के जीत लिए जाने पर ये पाँचों उसके वश में आ जाते हैं।

श्लोक 27 (12.242.27)

षण्णामात्मनि बुद्धौ च जितायां प्रभवत्यथ । निर्दोषा प्रतिभा ह्येनं कृत्स्ना समभिवर्तते ॥

ṣaṇṇāmātmani buddhau ca jitāyāṃ prabhavatyatha | nirdoṣā pratibhā hyenaṃ kṛtsnā samabhivartate

जब छहों के साथ आत्मा और बुद्धि जीत ली जाती है, तब वह समर्थ हो जाता है; तब निर्दोष प्रतिभा सम्पूर्ण रूप से उसके पास आती है।

श्लोक 28 (12.242.28)

तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते । यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञकः ॥

tathaiva vyaktamātmānamavyaktaṃ pratipadyate | yato niḥsarate loko bhavati vyaktasaṃjñakaḥ

उसी प्रकार वह व्यक्त आत्मा अव्यक्त को प्राप्त होता है, जिससे यह लोक निकलता है और व्यक्त नाम पाता है।

श्लोक 29 (12.242.29)

तत्राव्यक्तमयीं विद्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे । तथा व्यक्तमयं चैव संख्यापूर्वं निबोध मे ॥

tatrāvyaktamayīṃ vidyāṃ śṛṇu tvaṃ vistareṇa me | tathā vyaktamayaṃ caiva saṃkhyāpūrvaṃ nibodha me

अव्यक्त से बनी हुई विद्या मुझसे विस्तार से सुनो, और पहले व्यक्त से बनी हुई गणना को भी जानो।

श्लोक 30 (12.242.30)

पञ्चविंशतितत्त्वानि तुल्यान्युभयतः समम् । योगे साङ्ख्येऽपि च तथा विशेषं तत्र मे शृणु ॥

pañcaviṃśatitattvāni tulyānyubhayataḥ samam | yoge sāṅkhye'pi ca tathā viśeṣaṃ tatra me śṛṇu

पच्चीस तत्त्व दोनों में समान हैं, योग में और साङ्ख्य में भी; उनके बीच जो भेद है, उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 31 (12.242.31)

प्रोक्तं तद्व्यक्तमित्येव जायते वर्धते च यत् । जीर्यते म्रियते चैव चतुर्भिर्लक्षणैर्युतम् ॥

proktaṃ tadvyaktamityeva jāyate vardhate ca yat | jīryate mriyate caiva caturbhirlakṣaṇairyutam

जो उत्पन्न होता है, बढ़ता है, जीर्ण होता है और मरता है, इन चार लक्षणों से युक्त उसे व्यक्त कहा गया है।

श्लोक 32 (12.242.32)

विपरीतमतो यत्तु तदव्यक्तमुदाहृतम् । द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतौ ॥

viparītamato yattu tadavyaktamudāhṛtam | dvāvātmānau ca vedeṣu siddhānteṣvapyudāhṛtau

इसके विपरीत जो है, उसे अव्यक्त कहा गया है। वेदों में और सिद्धान्तों में भी दो आत्माएँ बताई गई हैं।

श्लोक 33 (12.242.33)

चतुर्लक्षणजं त्वाद्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते । व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धिरथेतरत् । सत्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद्द्वयमव्यक्तदर्शनम् ॥

caturlakṣaṇajaṃ tvādyaṃ caturvargaṃ pracakṣate | vyaktamavyaktajaṃ caiva tathā buddhirathetarat | satvaṃ kṣetrajña ityetaddvayamavyaktadarśanam

चार लक्षणों से उत्पन्न पहले को वे चतुर्वर्ग कहते हैं: व्यक्त, अव्यक्त से उत्पन्न, बुद्धि और दूसरा। सत्त्व और क्षेत्रज्ञ: यह जोड़ा अव्यक्त का दर्शन है।

श्लोक 34 (12.242.34)

द्वावात्मानौ च वेदेषु विषयेष्वनुरज्यतः । विषयात्प्रतिसंहारः साङ्ख्यानां विद्धि लक्षणम् ॥

dvāvātmānau ca vedeṣu viṣayeṣvanurajyataḥ | viṣayātpratisaṃhāraḥ sāṅkhyānāṃ viddhi lakṣaṇam

वेदों में बताई गई दोनों आत्माएँ विषयों में आसक्त होती हैं। विषयों से पीछे हट जाना: इसे साङ्ख्यों का लक्षण जानो।

श्लोक 35 (12.242.35)

निर्ममश्चानहंकारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ॥

nirmamaścānahaṃkāro nirdvandvaśchinnasaṃśayaḥ | naiva krudhyati na dveṣṭi nānṛtā bhāṣate giraḥ

ममता से रहित, अहंकार से रहित, द्वन्द्वों से रहित, संशयों को काट चुका हुआ वह न क्रोध करता है, न द्वेष करता है, और न असत्य वाणी बोलता है।

श्लोक 36 (12.242.36)

आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रीयं ध्याति नाशुभम् । वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तकः ॥

ākruṣṭastāḍitaścaiva maitrīyaṃ dhyāti nāśubham | vāgdaṇḍakarmamanasāṃ trayāṇāṃ ca nivartakaḥ

गाली दिए जाने पर और पीटे जाने पर भी वह अशुभ नहीं सोचता, मैत्री का ही ध्यान करता है। वह वाणी, कर्म और मन के तीनों दण्डों से निवृत्त रहता है।

श्लोक 37 (12.242.37)

समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते । नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थितः ॥

samaḥ sarveṣu bhūteṣu brahmāṇamabhivartate | naivecchati na cāniccho yātrāmātravyavasthitaḥ

सब प्राणियों में सम होकर वह ब्रह्म की ओर बढ़ता है। वह न इच्छा करता है, न अनिच्छा; जीवन-यात्रा भर के निर्वाह में ही स्थित रहता है।

श्लोक 38 (12.242.38)

अलोलुपोऽव्यथो दान्तो नाकृतिर्न निराकृतिः । नास्येन्द्रियमनेकाग्रं नाविक्षिप्तमनोरथः ॥

alolupo'vyatho dānto nākṛtirna nirākṛtiḥ | nāsyendriyamanekāgraṃ nāvikṣiptamanorathaḥ

वह लोभरहित, अव्यथित और संयमी है; न आकृति दिखानेवाला है, न आकृतिरहित; उसकी इन्द्रियाँ बिखरी हुई नहीं हैं और उसके मनोरथ दूर तक भटकनेवाले नहीं हैं।

श्लोक 39 (12.242.39)

सर्वभूतसदृङ्मैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥

sarvabhūtasadṛṅmaitraḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ

सब प्राणियों को समान देखनेवाला और सबका मित्र, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान माननेवाला, प्रिय और अप्रिय में एक-सा, धीर, और अपनी निन्दा तथा स्तुति में तुल्य,

श्लोक 40 (12.242.40)

अस्पृहः सर्वकामेभ्यो ब्रह्मचर्यदृढव्रतः । अहिंस्रः सर्वभूतानामीदृक्साङ्ख्यो विमुच्यते ॥

aspṛhaḥ sarvakāmebhyo brahmacaryadṛḍhavrataḥ | ahiṃsraḥ sarvabhūtānāmīdṛksāṅkhyo vimucyate

सब कामनाओं की स्पृहा से रहित, ब्रह्मचर्य के दृढ़ व्रत वाला और किसी प्राणी की हिंसा न करनेवाला ऐसा साङ्ख्य मुक्त होता है।

श्लोक 41 (12.242.41)

यथा योगाद्विमुच्यन्ते कारणैर्यैर्निबोध तत् । योगैश्वर्यमतिक्रान्तो योऽतिक्रामति मुच्यते ॥

yathā yogādvimucyante kāraṇairyairnibodha tat | yogaiśvaryamatikrānto yo'tikrāmati mucyate

अब जानो कि मनुष्य योग से किन कारणों द्वारा मुक्त होते हैं। जो योग के ऐश्वर्य को पार कर चुका है और उससे आगे जाता है, वह मुक्त होता है।

श्लोक 42 (12.242.42)

इत्येषा भावजा बुद्धिः कथिता ते न संशयः । एवं भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्माणं चाधिगच्छति ॥

ityeṣā bhāvajā buddhiḥ kathitā te na saṃśayaḥ | evaṃ bhavati nirdvandvo brahmāṇaṃ cādhigacchati

इस प्रकार भावों से उत्पन्न होनेवाली बुद्धि तुम्हें बता दी गई; इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार वह द्वन्द्वों से रहित होता है और ब्रह्म को प्राप्त होता है।

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