शान्ति पर्व · अध्याय 245
शुक का प्रश्न और व्यास का उत्तर: शरीर, इन्द्रियाँ और आत्मा
शुक अपने पिता के उपदेश की प्रशंसा करके पूछते हैं कि विद्वान् गृहस्थ ब्रह्म को कैसे पाता है और मन तथा इन्द्रियों की एकाग्रता कैसे सधती है। व्यास उत्तर देते हैं कि सिद्धि ज्ञान, तप, इन्द्रिय-संयम और लोभ-त्याग से ही मिलती है। वे बताते हैं कि महाभूत और उनके देवता शरीर में कैसे रहते हैं, मन कैसे इन्द्रियों का स्वामी है, और जो आत्मा आँख से नहीं दिखती, वह दीपक बने हुए मन से कैसे दिखाई देती है। फिर वे सर्वव्यापी आत्मा, अक्षर और क्षर, तथा नौ द्वारों के नगर को छोड़नेवाले हंस की बात कहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.245.1)
इत्युक्तोऽभिप्रशस्यैतत्परमर्षेस्तु शासनम् । मोक्षधर्मार्थसंयुक्तमिदं प्रष्टुं प्रचक्रमे ॥
ityukto'bhipraśasyaitatparamarṣestu śāsanam | mokṣadharmārthasaṃyuktamidaṃ praṣṭuṃ pracakrame
इस प्रकार कहे जाने पर शुक ने परमर्षि के इस उपदेश की प्रशंसा की, जो मोक्षधर्म के अर्थ से युक्त था, और आगे यह पूछना आरम्भ किया।
शुक उवाच
श्लोक 2 (12.245.2)
प्रजावाञ्श्रोत्रियो यज्वा कृतप्रज्ञोऽनसूयकः । अनागतमनैतिह्यं कथं ब्रह्माधिगच्छति ॥
prajāvāñśrotriyo yajvā kṛtaprajño'nasūyakaḥ | anāgatamanaitihyaṃ kathaṃ brahmādhigacchati
जो सन्तानवान्, वेदज्ञ, यज्ञ करनेवाला, प्रज्ञावान् और ईर्ष्या से रहित है, वह ब्रह्म को कैसे पाता है, जो अभी अप्राप्त है और जिसका कोई परम्परागत प्रमाण नहीं?
श्लोक 3 (12.245.3)
तपसा ब्रह्मचर्येण सर्वत्यागेन मेधया । साङ्ख्ये वा यदि वा योग एतत्पृष्टो वदस्व मे ॥
tapasā brahmacaryeṇa sarvatyāgena medhayā | sāṅkhye vā yadi vā yoga etatpṛṣṭo vadasva me
तप, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग और बुद्धि के द्वारा; सांख्य में अथवा योग में: मेरे पूछने पर यह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (12.245.4)
मनसश्चेन्द्रियाणां च यथैकाग्र्यमवाप्यते । येनोपायेन पुरुषैस्तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥
manasaścendriyāṇāṃ ca yathaikāgryamavāpyate | yenopāyena puruṣaistattvaṃ vyākhyātumarhasi
मनुष्य मन और इन्द्रियों की एकाग्रता किस उपाय से पाते हैं? आप इसका तत्त्व समझाने योग्य हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 5 (12.245.5)
नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् । नान्यत्र लोभसंत्यागात्सिद्धिं विन्दति कश्चन ॥
nānyatra vidyātapasornānyatrendriyanigrahāt | nānyatra lobhasaṃtyāgātsiddhiṃ vindati kaścana
विद्या और तप के बिना, इन्द्रियों के निग्रह के बिना और लोभ के त्याग के बिना कहीं भी कोई सिद्धि नहीं पाता।
श्लोक 6 (12.245.6)
महाभूतानि सर्वाणि पूर्वसृष्टिः स्वयंभुवः । भूयिष्ठं प्राणभृत्काये निविष्टानि शरीरिषु ॥
mahābhūtāni sarvāṇi pūrvasṛṣṭiḥ svayaṃbhuvaḥ | bhūyiṣṭhaṃ prāṇabhṛtkāye niviṣṭāni śarīriṣu
स्वयम्भू की पहली सृष्टि के सब महाभूत अधिकतर प्राणधारी शरीरधारियों के शरीर में स्थित हैं।
श्लोक 7 (12.245.7)
भूमेर्देहो जलात्स्रोतो ज्योतिषश्चक्षुषी स्मृते । प्राणापानाश्रयो वायुः स्वेष्वाकाशं शरीरिणाम् ॥
bhūmerdeho jalātsroto jyotiṣaścakṣuṣī smṛte | prāṇāpānāśrayo vāyuḥ sveṣvākāśaṃ śarīriṇām
शरीर पृथ्वी से है; स्रोत जल से हैं; दोनों नेत्र तेज के कहे गए हैं; प्राण और अपान का आधार वायु है; और शरीरधारियों के छिद्रों में आकाश है।
श्लोक 8 (12.245.8)
क्रान्ते विष्णुर्बले शक्रः कोष्ठेऽग्निर्भोक्तुमिच्छति । कर्णयोः प्रदिशः श्रोत्रे जिह्वायां वाक् सरस्वती ॥
krānte viṣṇurbale śakraḥ koṣṭhe'gnirbhoktumicchati | karṇayoḥ pradiśaḥ śrotre jihvāyāṃ vāk sarasvatī
पग में विष्णु हैं, बल में इन्द्र हैं, उदर में खाने की इच्छा करनेवाली अग्नि है; कानों में दिशाएँ हैं, श्रवण में भी, और जीभ पर वाणी सरस्वती हैं।
श्लोक 9 (12.245.9)
कर्णौ त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी । दश तानीन्द्रियोक्तानि द्वाराण्याहारसिद्धये ॥
karṇau tvakcakṣuṣī jihvā nāsikā caiva pañcamī | daśa tānīndriyoktāni dvārāṇyāhārasiddhaye
दो कान, त्वचा, दो नेत्र, जीभ और पाँचवीं नासिका: ये दस इन्द्रियाँ कही गई हैं, जो आहार की सिद्धि के द्वार हैं।
श्लोक 10 (12.245.10)
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः । इन्द्रियाणि पृथक्स्वार्थान्मनसा दर्शयन्त्युत ॥
śabdaḥ sparśastathā rūpaṃ raso gandhaśca pañcamaḥ | indriyāṇi pṛthaksvārthānmanasā darśayantyuta
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध: इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय अलग-अलग मन को दिखाती हैं।
श्लोक 11 (12.245.11)
इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते वश्यान्यन्तेव वाजिनः । मनश्चापि सदा युङ्क्ते भूतात्मा हृदयाश्रितः ॥
indriyāṇi mano yuṅkte vaśyānyanteva vājinaḥ | manaścāpi sadā yuṅkte bhūtātmā hṛdayāśritaḥ
मन इन्द्रियों को जोड़ता है, जैसे सारथी अपने वश में रहनेवाले घोड़ों को; और हृदय में रहनेवाला भूतात्मा सदा मन को जोड़ता है।
श्लोक 12 (12.245.12)
इन्द्रियाणां तथैवैषां सर्वेषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मानसस्तथा ॥
indriyāṇāṃ tathaivaiṣāṃ sarveṣāmīśvaraṃ manaḥ | niyame ca visarge ca bhūtātmā mānasastathā
इन सब इन्द्रियों का स्वामी मन है; और उनके नियमन तथा विसर्जन में मन में रहनेवाला भूतात्मा भी वैसे ही स्वामी है।
श्लोक 13 (12.245.13)
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः । प्राणापानौ च जीवश्च नित्यं देहेषु देहिनाम् ॥
indriyāṇīndriyārthāśca svabhāvaścetanā manaḥ | prāṇāpānau ca jīvaśca nityaṃ deheṣu dehinām
इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय, स्वभाव, चेतना, मन, प्राण और अपान तथा जीव: ये देहधारियों के शरीरों में सदा रहते हैं।
श्लोक 14 (12.245.14)
आश्रयो नास्ति सत्वस्य गुणः सत्त्वस्य चेतना । सत्वं हि तेजः सृजति न गुणान्वै कथंचन ॥
āśrayo nāsti satvasya guṇaḥ sattvasya cetanā | satvaṃ hi tejaḥ sṛjati na guṇānvai kathaṃcana
सत्त्व का कोई आश्रय नहीं है; चेतना सत्त्व का गुण है; सत्त्व तेज को उत्पन्न करता है, पर गुणों को किसी प्रकार भी उत्पन्न नहीं करता।
श्लोक 15 (12.245.15)
एवं सप्तदशं देहे वृतं षोडशभिर्गुणैः । मनीषीमनसा विप्रः पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
evaṃ saptadaśaṃ dehe vṛtaṃ ṣoḍaśabhirguṇaiḥ | manīṣīmanasā vipraḥ paśyatyātmānamātmani
इस प्रकार शरीर में सोलह गुणों से घिरा हुआ सत्रहवाँ तत्त्व है; मनीषी विप्र मन से आत्मा को आत्मा में देखता है।
श्लोक 16 (12.245.16)
न ह्ययं चक्षुषा दृश्यो न च सर्वैरपीन्द्रियैः । मनसा दीपभूतेन महानात्मा प्रकाशते ॥
na hyayaṃ cakṣuṣā dṛśyo na ca sarvairapīndriyaiḥ | manasā dīpabhūtena mahānātmā prakāśate
यह आत्मा न आँख से दिखाई देती है, न सब इन्द्रियों से; महान् आत्मा दीपक बने हुए मन से प्रकाशित होती है।
श्लोक 17 (12.245.17)
अशब्दस्पर्शरूपं तदरसागन्धमव्ययम् । अशरीरं शरीरेषु निरीक्षते निरिन्द्रियम् ॥
aśabdasparśarūpaṃ tadarasāgandhamavyayam | aśarīraṃ śarīreṣu nirīkṣate nirindriyam
वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से रहित, अविनाशी, अशरीर और इन्द्रियरहित है; उसे शरीरों में देखा जाता है।
श्लोक 18 (12.245.18)
अव्यक्तं सर्वदेहेषु मर्त्येष्वमृतमाहितम् । योऽनुपश्यति स प्रेत्य कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥
avyaktaṃ sarvadeheṣu martyeṣvamṛtamāhitam | yo'nupaśyati sa pretya kalpate brahmabhūyase
अव्यक्त और अमर तत्त्व सब मरणशील शरीरों में स्थित है; जो उसे देखता है, वह मृत्यु के बाद ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
श्लोक 19 (12.245.19)
विद्याभिजनसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
vidyābhijanasaṃpanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ
विद्या और कुलीनता से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी पण्डित लोग समान दृष्टि रखते हैं।
श्लोक 20 (12.245.20)
स हि सर्वेषु भूतेषु जङ्गमेषु ध्रुवेषु च । वसत्येको महानात्मा येन सर्वमिदं ततम् ॥
sa hi sarveṣu bhūteṣu jaṅgameṣu dhruveṣu ca | vasatyeko mahānātmā yena sarvamidaṃ tatam
वही एक महान् आत्मा सब चर और अचर प्राणियों में रहता है, जिससे यह सब व्याप्त है।
श्लोक 21 (12.245.21)
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । यदा पश्यति भूतात्मा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani | yadā paśyati bhūtātmā brahma saṃpadyate tadā
जब जीवात्मा सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सब प्राणियों को देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 22 (12.245.22)
यावानात्मनि मे ह्यात्मा तावानात्मा परात्मनि । य एवं सततं वेद सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
yāvānātmani me hyātmā tāvānātmā parātmani | ya evaṃ satataṃ veda so'mṛtatvāya kalpate
जितना बड़ा आत्मा मुझमें है, उतना ही बड़ा आत्मा परमात्मा में है; जो इसे सदा इस प्रकार जानता है, वह अमरता के योग्य हो जाता है।
श्लोक 23 (12.245.23)
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतहितस्य च । देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ॥
sarvabhūtātmabhūtasya sarvabhūtahitasya ca | devā'pi mārge muhyanti apadasya padaiṣiṇaḥ
जो सब प्राणियों का आत्मभूत और सब प्राणियों का हित करनेवाला है, उसके मार्ग में देवता भी भ्रम में पड़ जाते हैं; वे ऐसे पुरुष के पदचिह्न खोजते हैं जिसका कोई पद नहीं।
श्लोक 24 (12.245.24)
शकुन्तानामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके । यथा गतिर्न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः ॥
śakuntānāmivākāśe matsyānāmiva codake | yathā gatirna dṛśyeta tathā jñānavidāṃ gatiḥ
जैसे आकाश में पक्षियों की और जल में मछलियों की गति दिखाई नहीं देती, वैसे ही ज्ञानियों की गति भी नहीं दिखाई देती।
श्लोक 25 (12.245.25)
कालः पचति भूतानि सर्वाण्येवात्मनाऽऽत्मनि । यस्मिंस्तु पच्यते कालस्तं वेदेह न कश्चन ॥
kālaḥ pacati bhūtāni sarvāṇyevātmanā''tmani | yasmiṃstu pacyate kālastaṃ vedeha na kaścana
काल सब प्राणियों को आत्मा में आत्मा के द्वारा पकाता है; पर जिसमें स्वयं काल पक जाता है, उसे यहाँ कोई नहीं जानता।
श्लोक 26 (12.245.26)
न स ऊर्ध्वं न तिर्यक्च नाधश्चरति यः पुनः । न मध्ये प्रतिगृह्णीते नैव किंचित्कुतश्चन ॥
na sa ūrdhvaṃ na tiryakca nādhaścarati yaḥ punaḥ | na madhye pratigṛhṇīte naiva kiṃcitkutaścana
वह न ऊपर जाता है, न तिरछा, न नीचे; वह बीच में भी कुछ नहीं पकड़ता, और कहीं से कुछ भी ग्रहण नहीं करता।
श्लोक 27 (12.245.27)
सर्वेऽन्तस्था इमे लोका बाह्यमेषां न किंचन । यः सहस्रं समा गच्छेद्यथा बाणो गुणच्युतः ॥
sarve'ntasthā ime lokā bāhyameṣāṃ na kiṃcana | yaḥ sahasraṃ samā gacchedyathā bāṇo guṇacyutaḥ
ये सब लोक उसके भीतर स्थित हैं; इनमें से कुछ भी बाहर नहीं है। जो मनुष्य डोरी से छूटे बाण की तरह एक हज़ार वर्ष तक चलता रहे,
श्लोक 28 (12.245.28)
नैवान्तं कारणस्येयाद्यद्यपि स्यान्मनोजवः । तस्मात्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नास्ति स्थूलतरं ततः ॥
naivāntaṃ kāraṇasyeyādyadyapi syānmanojavaḥ | tasmātsūkṣmātsūkṣmataraṃ nāsti sthūlataraṃ tataḥ
वह मन के वेग से चलता हुआ भी उस कारण का अन्त नहीं पाएगा; क्योंकि उससे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर कुछ नहीं है और उससे बड़ा भी कुछ नहीं।
श्लोक 29 (12.245.29)
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvatokṣiśiromukham | sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati
उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं, कान भी लोक में सब ओर हैं; वह सबको घेरकर स्थित है।
श्लोक 30 (12.245.30)
तदेवाणोरणुतरं तन्महद्भ्यो महत्तरम् । तदन्तः सर्वभूतानां ध्रुवं तिष्ठन्न दृश्यते ॥
tadevāṇoraṇutaraṃ tanmahadbhyo mahattaram | tadantaḥ sarvabhūtānāṃ dhruvaṃ tiṣṭhanna dṛśyate
वही अणु से भी अणुतर है और महान् से भी महत्तर है; वह सब प्राणियों के भीतर स्थिर रहता है, फिर भी दिखाई नहीं देता।
श्लोक 31 (12.245.31)
अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः । क्षरः सर्वेषु भूतेषु दिवि ह्यमृतमक्षरम् ॥
akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva dvaidhībhāvo'yamātmanaḥ | kṣaraḥ sarveṣu bhūteṣu divi hyamṛtamakṣaram
अक्षर और क्षर, यह आत्मा का दो प्रकार का भाव है। क्षर सब प्राणियों में है; अक्षर स्वर्ग में अमृतरूप है।
श्लोक 32 (12.245.32)
नवद्वारं पुरं गत्वा हंसो हि नियतो वशी । ईशः सर्वस्य भूतस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥
navadvāraṃ puraṃ gatvā haṃso hi niyato vaśī | īśaḥ sarvasya bhūtasya sthāvarasya carasya ca
संयमी और वश में रहनेवाला हंस नौ द्वारोंवाले नगर में जाकर सब स्थावर और जंगम प्राणियों का ईश्वर है।
श्लोक 33 (12.245.33)
हानिभङ्गविकल्पानां नवानां संचयेन च । शरीराणामजस्याहुर्हंसत्वं पारदर्शिनः ॥
hānibhaṅgavikalpānāṃ navānāṃ saṃcayena ca | śarīrāṇāmajasyāhurhaṃsatvaṃ pāradarśinaḥ
शरीरों के नौ द्वारों के क्षय, भंग और विकल्प से तथा उनके संचय से पारदर्शी लोग अजन्मा आत्मा के हंसभाव की बात कहते हैं।
श्लोक 34 (12.245.34)
हंसोक्तं चाक्षरं चैव कूटस्थं यत्तदक्षरम् । तद्विद्वानक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी ॥
haṃsoktaṃ cākṣaraṃ caiva kūṭasthaṃ yattadakṣaram | tadvidvānakṣaraṃ prāpya jahāti prāṇajanmanī
जिसे हंस कहा गया है, वह अक्षर है, कूटस्थ है; उस अक्षर को पाकर ज्ञानी प्राण और जन्म दोनों को छोड़ देता है।