शान्ति पर्व · अध्याय 246
व्यास द्वारा योग-साधना का उपदेश
व्यास सांख्य के उपदेश से योग के अभ्यास की ओर आते हैं और उसे बुद्धि, मन और इन्द्रियों की एकता बताते हैं। वे काटने योग्य पाँच दोष (काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा) और प्रत्येक का उपाय, आत्मा का तेज बढ़ानेवाले गुण, और इन्द्रियों को मन में तथा मन को आत्मा में समेटने की विधि बताते हैं, जिससे ब्रह्म धूमरहित अग्नि की तरह प्रकाशित होता है। फिर वे योगी के सामने आनेवाले विघ्न, साधना के योग्य स्थान और समभाव का वर्णन करते हैं, और फल यह बताते हैं कि इस मार्ग से नीच कुल में जन्मा मनुष्य या धर्म की इच्छा करनेवाली स्त्री भी परम गति को पा सकती है।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.246.1)
पृच्छतस्तव सत्पुत्र यथावदिह तत्त्वतः । साङ्ख्यन्यायेन संयुक्तं यदेतत्कीर्तितं मया ॥
pṛcchatastava satputra yathāvadiha tattvataḥ | sāṅkhyanyāyena saṃyuktaṃ yadetatkīrtitaṃ mayā
हे सत्पुत्र, तुम्हारे पूछने पर मैंने यहाँ जो यह सांख्य की रीति के अनुसार ठीक-ठीक और तत्त्वपूर्वक कहा है, वह कह दिया।
श्लोक 2 (12.246.2)
योगकृत्यं तु ते कृत्स्नं वर्तयिष्यामि तच्छृणु । एकत्वं बुद्धिमनसोरिन्द्रियाणां च सर्वशः ॥
yogakṛtyaṃ tu te kṛtsnaṃ vartayiṣyāmi tacchṛṇu | ekatvaṃ buddhimanasorindriyāṇāṃ ca sarvaśaḥ
अब मैं तुम्हें योग का सम्पूर्ण कर्तव्य बताऊँगा; उसे सुनो। वह बुद्धि और मन की तथा सब इन्द्रियों की एकता है।
श्लोक 3 (12.246.3)
आत्मनोऽव्यथिनस्तात ज्ञानमेतदनुत्तमम् । तदेतदुपशान्तेन दान्तेनाध्यात्मशीलिना ॥
ātmano'vyathinastāta jñānametadanuttamam | tadetadupaśāntena dāntenādhyātmaśīlinā
हे तात, यह अविचल आत्मा का सर्वोत्तम ज्ञान है; और इसे वही समझ सकता है जो शान्त हो, संयमी हो और अध्यात्म में रमनेवाला हो,
श्लोक 4 (12.246.4)
आत्मारामेण बुद्धेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा । योगदोषान्समुच्छिन्द्यात्पञ्च यान्कवयो विदुः ॥
ātmārāmeṇa buddhena boddhavyaṃ śucikarmaṇā | yogadoṣānsamucchindyātpañca yānkavayo viduḥ
जो आत्मा में ही रमण करता हो, जागृत हो और शुद्ध कर्म करनेवाला हो। जिन पाँच योग-दोषों को ज्ञानी जानते हैं, उन्हें वह काट डाले:
श्लोक 5 (12.246.5)
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् । क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात् ॥
kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca bhayaṃ svapnaṃ ca pañcamam | krodhaṃ śamena jayati kāmaṃ saṃkalpavarjanāt
काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवीं निद्रा। क्रोध को वह शान्ति से जीतता है और काम को संकल्पों के त्याग से।
श्लोक 6 (12.246.6)
सत्त्वसंसेवनाद्धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति । धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा ॥
sattvasaṃsevanāddhīro nidrāmucchettumarhati | dhṛtyā śiśnodaraṃ rakṣetpāṇipādaṃ ca cakṣuṣā
सत्त्व के सेवन से धीर पुरुष निद्रा को काट सकता है। वह धैर्य से उपस्थ और उदर की रक्षा करे, और नेत्र से हाथ-पैरों की;
श्लोक 7 (12.246.7)
चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा । अप्रमादाद्भयं जह्याल्लोभं प्राज्ञोपसेवनात् ॥
cakṣuḥśrotre ca manasā mano vācaṃ ca karmaṇā | apramādādbhayaṃ jahyāllobhaṃ prājñopasevanāt
मन से नेत्र और कान की, कर्म से मन और वाणी की। सावधानी से वह भय को त्यागे और ज्ञानियों की सेवा से लोभ को।
श्लोक 8 (12.246.8)
एवमेतान्योगदोषाञ्चयेन्नित्यमतन्द्रितः । अग्नींश्च ब्राह्मणांश्चार्चेद्देवताः प्रणमेत च ॥
evametānyogadoṣāñcayennityamatandritaḥ | agnīṃśca brāhmaṇāṃścārceddevatāḥ praṇameta ca
इस प्रकार आलस्य छोड़कर वह इन योग-दोषों को सदा जीते। वह अग्नियों और ब्राह्मणों की पूजा करे और देवताओं को प्रणाम करे।
श्लोक 9 (12.246.9)
वर्जयेदुशतीं वाचं हिंसायुक्तां मनोनुदाम् । ब्रह्म तेजोमयं शुक्रं यस्य सर्वमिदं ततम् ॥
varjayeduśatīṃ vācaṃ hiṃsāyuktāṃ manonudām | brahma tejomayaṃ śukraṃ yasya sarvamidaṃ tatam
वह कठोर, हिंसायुक्त और मन को चोट पहुँचानेवाली वाणी का त्याग करे। ब्रह्म तेजोमय और शुद्ध है, और उसी से यह सब व्याप्त है।
श्लोक 10 (12.246.10)
एतस्य सूत्रभूतस्य द्वयं स्थावरजङ्गमम् । ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा ॥
etasya sūtrabhūtasya dvayaṃ sthāvarajaṅgamam | dhyānamadhyayanaṃ dānaṃ satyaṃ hrīrārjavaṃ kṣamā
सूत्र की तरह सबमें पिरोये हुए इस ब्रह्म का द्विविध रूप स्थावर और जंगम है। ध्यान, अध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा,
श्लोक 11 (12.246.11)
शौचमाहारसंशुद्धिरिन्द्रियाणां च निग्रहः । एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानं चापकर्षति ॥
śaucamāhārasaṃśuddhirindriyāṇāṃ ca nigrahaḥ | etairvivardhate tejaḥ pāpmānaṃ cāpakarṣati
शौच, आहार की शुद्धि और इन्द्रियों का निग्रह: इनसे उसका तेज बढ़ता है और पाप दूर होता है।
श्लोक 12 (12.246.12)
सिद्ध्यन्ति चास्य सर्वार्था विज्ञानं च प्रवर्धते । समः सर्वेषु भूतेषु लब्धालब्धेन वर्तयेत् ॥
siddhyanti cāsya sarvārthā vijñānaṃ ca pravardhate | samaḥ sarveṣu bhūteṣu labdhālabdhena vartayet
उसके सब प्रयोजन सिद्ध होते हैं और उसका विज्ञान बढ़ता है। वह सब प्राणियों में समभाव रखे और जो मिले या न मिले, उसी से निर्वाह करे।
श्लोक 13 (12.246.13)
धूतपाप्मा तु तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्ब्रह्मणः पदम् ॥
dhūtapāpmā tu tejasvī laghvāhāro jitendriyaḥ | kāmakrodhau vaśe kṛtvā ninīṣedbrahmaṇaḥ padam
पाप को झाड़कर, तेजस्वी, हल्का आहार करनेवाला और जितेन्द्रिय होकर, काम और क्रोध को वश में करके वह ब्रह्म के धाम तक पहुँचने की इच्छा करे।
श्लोक 14 (12.246.14)
मनसश्चेन्द्रियाणां च कृत्वैकाग्र्यं समाहितः । पूर्वरात्रेऽपरात्रे च धारयेन्मन आत्मनि ॥
manasaścendriyāṇāṃ ca kṛtvaikāgryaṃ samāhitaḥ | pūrvarātre'parātre ca dhārayenmana ātmani
मन और इन्द्रियों को एकाग्र और समाहित करके वह रात के पहले और पिछले भाग में मन को आत्मा में स्थिर करे।
श्लोक 15 (12.246.15)
जन्तोः पञ्चेन्द्रियस्यास्य यदेकं छिद्रमिन्द्रियम् । ततोऽस्य स्रवते प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम् ॥
jantoḥ pañcendriyasyāsya yadekaṃ chidramindriyam | tato'sya sravate prajñā dṛteḥ pādādivodakam
पाँच इन्द्रियोंवाले इस जीव की यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र बन जाए, तो उससे प्रज्ञा बह जाती है, जैसे चमड़े की मशक के पैर से पानी।
श्लोक 16 (12.246.16)
मनस्तु पूर्वमादद्यात्कुमीनमिव मत्स्यहा । ततः श्रोत्रं ततश्चक्षुर्जिह्वा घ्राणं च योगवित् ॥
manastu pūrvamādadyātkumīnamiva matsyahā | tataḥ śrotraṃ tataścakṣurjihvā ghrāṇaṃ ca yogavit
योग का ज्ञाता पहले मन को पकड़े, जैसे मछुआरा छोटी मछली को पकड़ता है; फिर श्रवण को, फिर नेत्र को, फिर जीभ और नाक को।
श्लोक 17 (12.246.17)
तत एतानि संयम्य मनसि स्थापयेद्यतिः । तथैवापोह्य संकल्पान्मनो ह्यात्मनि धारयेत् ॥
tata etāni saṃyamya manasi sthāpayedyatiḥ | tathaivāpohya saṃkalpānmano hyātmani dhārayet
फिर इन्हें संयमित करके यति इन्हें मन में स्थापित करे; और इसी प्रकार संकल्पों को त्यागकर मन को आत्मा में स्थिर करे।
श्लोक 18 (12.246.18)
पञ्चेन्द्रियाणि संधाय मनसि स्थापयेद्यतिः । यदैतान्यवतिष्ठन्ति मनःषष्ठानि चात्मनि ॥
pañcendriyāṇi saṃdhāya manasi sthāpayedyatiḥ | yadaitānyavatiṣṭhanti manaḥṣaṣṭhāni cātmani
पाँचों इन्द्रियों को समेटकर यति उन्हें मन में स्थापित करे। जब ये, मन को छठा लेकर, आत्मा में ठहर जाती हैं,
श्लोक 19 (12.246.19)
प्रसीदन्ति च संस्थाय तदा ब्रह्म प्रकाशते । विधूम इव सप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान् ॥
prasīdanti ca saṃsthāya tadā brahma prakāśate | vidhūma iva saptārcirāditya iva dīptimān
और स्थिर होकर प्रसन्न हो जाती हैं, तब ब्रह्म प्रकाशित होता है, धूमरहित अग्नि की तरह, तेजस्वी सूर्य की तरह।
श्लोक 20 (12.246.20)
वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे दृश्यतेऽऽत्मा तथाऽऽत्मनि । सर्वस्तत्र स सर्वत्र व्यापकत्वाच्च दृश्यते ॥
vaidyuto'gnirivākāśe dṛśyate''tmā tathā''tmani | sarvastatra sa sarvatra vyāpakatvācca dṛśyate
जैसे आकाश में बिजली की अग्नि दिखाई देती है, वैसे ही आत्मा आत्मा में दिखाई देती है; और सर्वव्यापी होने के कारण वह सब कुछ बनकर वहाँ सर्वत्र दिखाई देता है।
श्लोक 21 (12.246.21)
तं पश्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा ये मनीषिणः । धृतिमन्तो महाप्राज्ञाः सर्वभूतहिते रताः ॥
taṃ paśyanti mahātmāno brāhmaṇā ye manīṣiṇaḥ | dhṛtimanto mahāprājñāḥ sarvabhūtahite ratāḥ
जो मनीषी ब्राह्मण महात्मा, धैर्यवान्, महाप्राज्ञ और सब प्राणियों के हित में लगे हैं, वे उसे देखते हैं।
श्लोक 22 (12.246.22)
एवं परिमितं कालमाचरन्संशितव्रतः । आसीनो हि रहस्येको गच्छेदक्षरसाम्यताम् ॥
evaṃ parimitaṃ kālamācaransaṃśitavrataḥ | āsīno hi rahasyeko gacchedakṣarasāmyatām
इस प्रकार नियत समय तक दृढ़ व्रत से साधना करता हुआ, एकान्त में अकेला बैठा हुआ वह अक्षर की समानता को पा सकता है।
श्लोक 23 (12.246.23)
विमोहो भ्रम आवर्तो घ्राणं श्रवणदर्शने । अद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः ॥
vimoho bhrama āvarto ghrāṇaṃ śravaṇadarśane | adbhutāni rasasparśe śītoṣṇe mārutākṛtiḥ
मोह, भ्रम, चक्कर; गन्ध, श्रवण और दर्शन के अद्भुत अनुभव, रस और स्पर्श के अद्भुत अनुभव; शीत और उष्ण; वायु के रूप:
श्लोक 24 (12.246.24)
प्रतिभामुपसर्गांश्चाप्युपसंगृह्य योगतः । तांस्तत्त्वविदनादृत्य आत्मन्येव निवर्तयेत् ॥
pratibhāmupasargāṃścāpyupasaṃgṛhya yogataḥ | tāṃstattvavidanādṛtya ātmanyeva nivartayet
योग के अभ्यास में प्रतिभा और इन विघ्नों का सामना होने पर तत्त्वज्ञ उनकी उपेक्षा करे और उन्हें आत्मा में ही लौटा दे।
श्लोक 25 (12.246.25)
कुर्यात्परिचयं योगे त्रैकाल्ये नियतो मुनिः । गिरिशृङ्गे तथा चैत्ये वृक्षाग्रेषु च योजयेत् ॥
kuryātparicayaṃ yoge traikālye niyato muniḥ | giriśṛṅge tathā caitye vṛkṣāgreṣu ca yojayet
संयमी मुनि तीनों कालों में योग का अभ्यास करे; वह पर्वत की चोटी पर, चैत्य में, अथवा वृक्षों की चोटियों पर साधना करे।
श्लोक 26 (12.246.26)
संनियम्येन्द्रियग्रामं कोष्ठे भाण्डमना इव । एकाग्रं चिन्तयेन्नित्यं योगान्नोद्वेजयेन्मनः ॥
saṃniyamyendriyagrāmaṃ koṣṭhe bhāṇḍamanā iva | ekāgraṃ cintayennityaṃ yogānnodvejayenmanaḥ
इन्द्रियों के समूह को वैसे ही समेटकर, जैसे कोई भण्डार में अपना सामान रखता है, वह सदा एकाग्र होकर चिन्तन करे और योग से मन को उद्विग्न न करे।
श्लोक 27 (12.246.27)
येनोपायेन शक्येत संनियन्तुं चलं मनः । तत्तद्युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत्ततः ॥
yenopāyena śakyeta saṃniyantuṃ calaṃ manaḥ | tattadyukto niṣeveta na caiva vicalettataḥ
जिस उपाय से चंचल मन को वश में किया जा सके, उसी उपाय का वह संयम से सेवन करे और उससे विचलित न हो।
श्लोक 28 (12.246.28)
शून्या गिरिगुहाश्चैव देवतायतनानि च । शून्यागाराणि चैकाग्रो निवासार्थमुपक्रमेत् ॥
śūnyā giriguhāścaiva devatāyatanāni ca | śūnyāgārāṇi caikāgro nivāsārthamupakramet
सूनी पर्वत-गुफाएँ, देवताओं के मन्दिर और सूने घर: एकाग्र होकर वह इन्हें अपने निवास के लिए अपनाए।
श्लोक 29 (12.246.29)
नाभिष्वजेत्परं वाचा कर्मणा मनसाऽपि वा । उपेक्षको यताहारो लब्धालब्धे समो भवेत् ॥
nābhiṣvajetparaṃ vācā karmaṇā manasā'pi vā | upekṣako yatāhāro labdhālabdhe samo bhavet
वह वाणी, कर्म या मन से भी किसी दूसरे में आसक्त न हो; उदासीन और नियमित आहारवाला रहकर लाभ और हानि में समान रहे।
श्लोक 30 (12.246.30)
यश्चैनमभिनन्देत यश्चैनमभिवादयेत् । समस्तयोश्चाप्युभयोर्नाभिध्यायेच्छुभाशुभम् ॥
yaścainamabhinandeta yaścainamabhivādayet | samastayoścāpyubhayornābhidhyāyecchubhāśubham
कोई उसका अभिनन्दन करे या कोई उसे प्रणाम करे, दोनों के प्रति वह समान रहे और शुभ-अशुभ का चिन्तन न करे।
श्लोक 31 (12.246.31)
न प्रहृष्येत लाभेषु नालाभेषु च चिन्तयेत् । समः सर्वेषु भूतेषु सधर्मा मातरिश्वनः ॥
na prahṛṣyeta lābheṣu nālābheṣu ca cintayet | samaḥ sarveṣu bhūteṣu sadharmā mātariśvanaḥ
वह लाभ में हर्षित न हो और हानि में चिन्ता न करे; सब प्राणियों में समान रहे, वायु के समान स्वभाववाला।
श्लोक 32 (12.246.32)
एवं सर्वात्मनः साधोः सर्वत्र समदर्शिनः । षण्मासान्नित्ययुक्तस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
evaṃ sarvātmanaḥ sādhoḥ sarvatra samadarśinaḥ | ṣaṇmāsānnityayuktasya śabdabrahmātivartate
इस प्रकार जो साधु सबका आत्मभूत है, सर्वत्र समदर्शी है और छह महीने तक निरन्तर साधना में लगा रहता है, वह शब्दब्रह्म को पार कर जाता है।
श्लोक 33 (12.246.33)
वेदनार्ताः प्रजा दृष्ट्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः । एतस्मिन्निरतो मार्गे विरमेन्न च मोहितः ॥
vedanārtāḥ prajā dṛṣṭvā samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | etasminnirato mārge viramenna ca mohitaḥ
पीड़ा से व्याकुल प्रजा को देखकर, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान समझता हुआ, इस मार्ग में लगा रहकर वह न रुके और न मोह में पड़े।
श्लोक 34 (12.246.34)
अपि वर्णावकृष्टस्तु नारी वा धर्मकाङ्क्षिणी । तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम् ॥
api varṇāvakṛṣṭastu nārī vā dharmakāṅkṣiṇī | tāvapyetena mārgeṇa gacchetāṃ paramāṃ gatim
अपने वर्ण से गिरा हुआ मनुष्य, अथवा धर्म की इच्छा रखनेवाली स्त्री: वे दोनों भी इसी मार्ग से परम गति पा सकते हैं।
श्लोक 35 (12.246.35)
अजं पुराणमजरं सनातनं । यदिन्द्रियैरुपलभेत निश्चलैः । अणोरणीयो महतो महत्तरं । तदात्मना पश्यति युक्तमात्मवान् ॥
ajaṃ purāṇamajaraṃ sanātanaṃ | yadindriyairupalabheta niścalaiḥ | aṇoraṇīyo mahato mahattaraṃ | tadātmanā paśyati yuktamātmavān
अजन्मा, पुरातन, अजर, सनातन, जिसे निश्चल इन्द्रियों से पाया जा सकता है, अणु से भी अणुतर और महान् से भी महत्तर: उसे योगयुक्त आत्मवान् पुरुष आत्मा से देखता है।
श्लोक 36 (12.246.36)
इदं महर्षेर्वचनं महात्मनो । यथावदुक्तं मनसाऽनुदृश्य च । अवेक्ष्य चेमां परमेष्ठिसाम्यतां । प्रयान्ति यां भूतगतिं मनीषिणः ॥
idaṃ maharṣervacanaṃ mahātmano | yathāvaduktaṃ manasā'nudṛśya ca | avekṣya cemāṃ parameṣṭhisāmyatāṃ | prayānti yāṃ bhūtagatiṃ manīṣiṇaḥ
यह महात्मा महर्षि का वचन है, जैसा है वैसा ही कहा गया; इस पर मन से विचार करके और परमेष्ठी की इस समता को देखकर मनीषी उस भूतगति को प्राप्त होते हैं।