शान्ति पर्व · अध्याय 247
व्यास का उपदेश: कर्म और विद्या के दो मार्ग
शुक पूछते हैं कि कर्म करने और त्याग करने की जो वेदाज्ञाएँ परस्पर विरोधी लगती हैं, वे किस दिशा को ले जाती हैं। व्यास दो मार्ग समझाते हैं, प्रवृत्ति का और निवृत्ति का: कर्म बाँधता है और देह में फिर जन्म देता है, जबकि विद्या मुक्त करती है और उस अविनाशी पद तक पहुँचाती है जहाँ न शोक है, न मृत्यु, न जन्म। वे विद्यामय और कर्ममय पुरुष की तुलना चन्द्रमा की सूक्ष्म कला और उसके बढ़ते रूप से करते हैं, और देहधारी, उसके भीतर की अग्नि, क्षेत्रज्ञ और जीव के गुणों का वर्णन करते हैं।
शुक उवाच
श्लोक 1 (12.247.1)
यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ॥
yadidaṃ vedavacanaṃ kuru karma tyajeti ca | kāṃ diśaṃ vidyayā yānti kāṃ ca gacchanti karmaṇā
यह जो वेद का वचन है, "कर्म करो" और "त्याग करो": ज्ञान से लोग किस दिशा को जाते हैं और कर्म से किस दिशा को?
श्लोक 2 (12.247.2)
एतद्वै श्रोतुमिच्छामि तद्भवान्प्रब्रवीतु मे । एतच्चान्योन्यवैरूप्ये वर्तेते प्रतिकूलतः ॥
etadvai śrotumicchāmi tadbhavānprabravītu me | etaccānyonyavairūpye vartete pratikūlataḥ
यह मैं सुनना चाहता हूँ; आप मुझे बताइए। क्योंकि ये दोनों परस्पर भिन्न स्वरूप के हैं और एक-दूसरे के विरुद्ध दिखाई देते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.247.3)
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं पराशरसुतः सुतम् । कर्मविद्यामयावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ ॥
ityuktaḥ pratyuvācedaṃ parāśarasutaḥ sutam | karmavidyāmayāvetau vyākhyāsyāmi kṣarākṣarau
ऐसा कहे जाने पर पराशर के पुत्र ने अपने पुत्र को उत्तर दिया: "कर्ममय और विद्यामय इन दो क्षर और अक्षर को मैं समझाऊँगा।"
व्यास उवाच
श्लोक 4 (12.247.4)
यां दिशं विद्यया यान्ति यां च गच्छन्ति कर्मणा । शृणुष्वैकमना वत्स गह्वरं ह्येतदन्तरम् ॥
yāṃ diśaṃ vidyayā yānti yāṃ ca gacchanti karmaṇā | śṛṇuṣvaikamanā vatsa gahvaraṃ hyetadantaram
विद्या से लोग जिस दिशा को जाते हैं और कर्म से जिस दिशा को, उसे एकाग्र मन से सुनो, हे वत्स; यह भेद गहन है।
श्लोक 5 (12.247.5)
अस्ति धर्म इति ह्युक्त्वा नास्तीत्यत्रैव यो वदेत् । तस्य पक्षस्य सदृशमिदं मम भवेदथ ॥
asti dharma iti hyuktvā nāstītyatraiva yo vadet | tasya pakṣasya sadṛśamidaṃ mama bhavedatha
जो पहले कहे कि "धर्म है" और फिर उसी विषय में कहे कि "नहीं है": मेरा यह कथन ऐसे मनुष्य के पक्ष के समान लग सकता है।
श्लोक 6 (12.247.6)
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च व्यवस्थितः ॥
dvāvimāvatha panthānau yatra vedāḥ pratiṣṭhitāḥ | pravṛttilakṣaṇo dharmo nivṛttau ca vyavasthitaḥ
ये दो मार्ग हैं, जिन पर वेद प्रतिष्ठित हैं: प्रवृत्ति के लक्षणवाला धर्म, और निवृत्ति में स्थित धर्म।
श्लोक 7 (12.247.7)
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥
karmaṇā badhyate janturvidyayā tu pramucyate | tasmātkarma na kurvanti yatayaḥ pāradarśinaḥ
कर्म से प्राणी बँधता है और विद्या से मुक्त होता है। इसीलिए पार देखनेवाले यति कर्म नहीं करते।
श्लोक 8 (12.247.8)
कर्मणा जायते प्रेत्य मूर्तिमान्षोडशात्मकः । विद्यया जायते नित्यमव्ययो ह्यक्षरात्मकः ॥
karmaṇā jāyate pretya mūrtimānṣoḍaśātmakaḥ | vidyayā jāyate nityamavyayo hyakṣarātmakaḥ
कर्म से वह मरने के बाद सोलह अंगोंवाला शरीरधारी होकर फिर जन्म लेता है; विद्या से वह सदा के लिए अविनाशी और अक्षरस्वरूप होकर उत्पन्न होता है।
श्लोक 9 (12.247.9)
कर्म त्वेके प्रशंसन्ति स्वल्पबुद्धितया नराः । तेन ते देहजालानि रमयन्त उपासते ॥
karma tveke praśaṃsanti svalpabuddhitayā narāḥ | tena te dehajālāni ramayanta upāsate
कुछ अल्पबुद्धि मनुष्य कर्म की प्रशंसा करते हैं; उसके द्वारा वे शरीरों के जालों में रमते हुए बने रहते हैं।
श्लोक 10 (12.247.10)
ये स्म बुद्धिं परां प्राप्ता धर्मनैपुण्यदर्शिनः । न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव ॥
ye sma buddhiṃ parāṃ prāptā dharmanaipuṇyadarśinaḥ | na te karma praśaṃsanti kūpaṃ nadyāṃ pibanniva
जो परम बुद्धि को पा चुके हैं और धर्म की सूक्ष्मता को देखते हैं, वे कर्म की प्रशंसा नहीं करते, जैसे कोई नदी के रहते कुएँ का पानी पीए।
श्लोक 11 (12.247.11)
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ । विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ॥
karmaṇaḥ phalamāpnoti sukhaduḥkhe bhavābhavau | vidyayā tadavāpnoti yatra gatvā na śocati
कर्म से मनुष्य उसका फल पाता है: सुख और दुःख, भव और अभव; विद्या से वह उसे पाता है जहाँ पहुँचकर शोक नहीं करता।
श्लोक 12 (12.247.12)
यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न जीर्यते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते ॥
yatra gatvā na mriyate yatra gatvā na jāyate | na jīryate yatra gatvā yatra gatvā na vardhate
जहाँ पहुँचकर मनुष्य मरता नहीं, जहाँ पहुँचकर जन्म नहीं लेता, जहाँ पहुँचकर बूढ़ा नहीं होता और जहाँ पहुँचकर बढ़ता भी नहीं।
श्लोक 13 (12.247.13)
यत्र तद्ब्रह्म परममव्यक्तमचलं ध्रुवम् । अव्याहतमनायासममृतं चावियोगि च ॥
yatra tadbrahma paramamavyaktamacalaṃ dhruvam | avyāhatamanāyāsamamṛtaṃ cāviyogi ca
वहाँ वह परम ब्रह्म है: अव्यक्त, अचल, ध्रुव, अबाधित, प्रयासरहित, अमृत और कभी वियोग न देनेवाला।
श्लोक 14 (12.247.14)
द्वन्द्वैर्न यत्र बाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा । समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः ॥
dvandvairna yatra bādhyante mānasena ca karmaṇā | samāḥ sarvatra maitrāśca sarvabhūtahite ratāḥ
वहाँ मन या कर्म से द्वन्द्व उन्हें पीड़ित नहीं करते; वे सर्वत्र सम, सबके मित्र और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
श्लोक 15 (12.247.15)
विद्यामयोऽन्यः पुरुषस्तात कर्ममयोऽपरः । विद्धि चन्द्रमसं दर्शे सूक्ष्मया कलया स्थितम् । विद्यामयं तं पुरुषं नित्यं ज्ञानगुणात्मकम् ॥
vidyāmayo'nyaḥ puruṣastāta karmamayo'paraḥ | viddhi candramasaṃ darśe sūkṣmayā kalayā sthitam | vidyāmayaṃ taṃ puruṣaṃ nityaṃ jñānaguṇātmakam
हे तात, एक पुरुष विद्यामय है और दूसरा कर्ममय। अमावस्या के चन्द्रमा को जानो, जो एक सूक्ष्म कला में स्थित है। उस विद्यामय पुरुष को सदा ज्ञान-गुणरूप जानो।
श्लोक 16 (12.247.16)
तदेतदृषिणा प्रोक्तं विस्तरेणानुमीयते । नवं तु शशिनं दृष्ट्वा वक्रतन्तुमिवाम्बरे ॥
tadetadṛṣiṇā proktaṃ vistareṇānumīyate | navaṃ tu śaśinaṃ dṛṣṭvā vakratantumivāmbare
यह ऋषि ने कहा है और विस्तार से अनुमान द्वारा समझा जाता है: आकाश में टेढ़े सूत की तरह दिखनेवाले नए चन्द्रमा को देखो।
श्लोक 17 (12.247.17)
एकादशविकारात्मा कलासंभारसंभृतः । मूर्तिमानिति तं विद्धि तात कर्म गुणात्मकम् ॥
ekādaśavikārātmā kalāsaṃbhārasaṃbhṛtaḥ | mūrtimāniti taṃ viddhi tāta karma guṇātmakam
ग्यारह विकारों से बना और कलाओं के समूह से गठित: हे तात, उसे मूर्तिमान्, कर्म-गुणरूप जानो।
श्लोक 18 (12.247.18)
तस्मिन्यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः । आत्मानं तं विजानीहि नित्यं त्यागजितात्मकम् ॥
tasminyaḥ saṃsthito hyagnirnityaṃ sthālyāmivāhitaḥ | ātmānaṃ taṃ vijānīhi nityaṃ tyāgajitātmakam
उसमें जो अग्नि स्थित है, जो सदा उसमें हँडिया में रखी हुई की तरह रहती है: उसे आत्मा जानो, जो सदा त्याग से जीती जाती है।
श्लोक 19 (12.247.19)
देवो यः संश्रितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे । क्षेत्रज्ञं तं विजानीयान्नित्यं योगजितात्मकम् ॥
devo yaḥ saṃśritastasminnabbinduriva puṣkare | kṣetrajñaṃ taṃ vijānīyānnityaṃ yogajitātmakam
उसमें जो देव कमल के पत्ते पर जल की बूँद की तरह स्थित है: उसे क्षेत्रज्ञ जानो, जो सदा योग से जीता जाता है।
श्लोक 20 (12.247.20)
तमोरजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणात्मकम् । जीवमात्मगुणं विद्यादात्मानं परमात्मनः ॥
tamorajaśca sattvaṃ ca viddhi jīvaguṇātmakam | jīvamātmaguṇaṃ vidyādātmānaṃ paramātmanaḥ
तमस्, रजस् और सत्त्व को जीव के गुण जानो। जीव को आत्मा का गुण जानो और आत्मा को परमात्मा का जानो।
श्लोक 21 (12.247.21)
अचेतनं जीवगुणं वदन्ति । स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति । प्राकल्पयद्यो भुवनानि सप्त ॥
acetanaṃ jīvaguṇaṃ vadanti | sa ceṣṭate ceṣṭayate ca sarvam | tataḥ paraṃ kṣetravido vadanti | prākalpayadyo bhuvanāni sapta
वे जीव के गुण को अचेतन कहते हैं; वह स्वयं चेष्टा करता है और सबसे चेष्टा कराता है। उससे परे उसे क्षेत्र को जाननेवाले बताते हैं, जिसने सात भुवनों की रचना की।