शान्ति पर्व · अध्याय 248
व्यास का शुक को ब्रह्मचर्याश्रम का उपदेश
भीष्म सुनाते हैं कि शुक अपने पिता व्यास से पूछते हैं कि कर्म करने और कर्म त्यागने, दोनों की वेदाज्ञा कैसे प्रामाणिक हो सकती है, और सज्जन किस आचरण पर चलते हैं। व्यास बताते हैं कि चारों आश्रमों में से जो भी विधिपूर्वक निभाया जाए, वह परम गति तक पहुँचाता है। फिर वे जीवन के पहले चतुर्थांश, ब्रह्मचर्याश्रम का वर्णन करते हैं: गुरु की सेवा, विनय और संयम, तथा गुरुदक्षिणा देकर घर लौटना।
शुक उवाच
श्लोक 1 (12.248.1)
क्षरात्प्रभृति यः सर्गः सगुणानीन्द्रियाणि च । बुद्ध्यैश्वर्यातिसर्गोऽयं प्रधानश्चात्मनः श्रुतम् ॥
kṣarātprabhṛti yaḥ sargaḥ saguṇānīndriyāṇi ca | buddhyaiśvaryātisargo'yaṃ pradhānaścātmanaḥ śrutam
अक्षर से आरम्भ होकर जो सृष्टि हुई, गुणों सहित इन्द्रियों की जो उत्पत्ति हुई, तथा बुद्धि और ऐश्वर्य की जो यह सृष्टि है, जो आत्मा का प्रधान अंग है, यह सब मैंने सुना है।
श्लोक 2 (12.248.2)
भूय एव तु लोकेऽस्मिन्सद्वृतिं कालहेतुकीम् । यया सन्तः प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्तितुम् ॥
bhūya eva tu loke'sminsadvṛtiṃ kālahetukīm | yayā santaḥ pravartante tadicchāmyanuvartitum
इस लोक में काल के अनुरूप जो सद्वृत्ति है, जिससे सज्जन चलते हैं, उसे मैं फिर सुनना चाहता हूँ, ताकि उसका पालन कर सकूँ।
श्लोक 3 (12.248.3)
वेदे वचनमुक्तं तु कुरु कर्म त्यजेति च । कथमेतद्विजानीयां तच्च व्याख्यातुमर्हसि ॥
vede vacanamuktaṃ tu kuru karma tyajeti ca | kathametadvijānīyāṃ tacca vyākhyātumarhasi
वेद में कहा गया है कि कर्म करो, और यह भी कि कर्म छोड़ दो। इसे मैं कैसे समझूँ? कृपा करके मुझे यह समझाइए।
श्लोक 4 (12.248.4)
लोकवृत्तान्ततत्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् । कृत्वा बुद्धिं विमुक्तात्मा द्रक्ष्याम्यात्मानमव्ययं ॥
lokavṛttāntatatvajñaḥ pūto'haṃ guruśāsanāt | kṛtvā buddhiṃ vimuktātmā drakṣyāmyātmānamavyayaṃ
मैं लोक-व्यवहार का तत्त्व जानता हूँ और गुरु की शिक्षा से पवित्र हो चुका हूँ। बुद्धि को ठीक करके, मुक्त आत्मा होकर मैं अविनाशी आत्मा का दर्शन करूँगा।
व्यास उवाच
श्लोक 5 (12.248.5)
एषा वै विहिता वृत्तिः पुरस्ताद्ब्रह्मणा स्वयम् । एषा पूर्वतरैः सद्भिराचीर्णा परमर्षिभिः ॥
eṣā vai vihitā vṛttiḥ purastādbrahmaṇā svayam | eṣā pūrvataraiḥ sadbhirācīrṇā paramarṣibhiḥ
यह वृत्ति बहुत पहले स्वयं ब्रह्मा ने निर्धारित की थी, और प्राचीनकाल के सज्जनों तथा महर्षियों ने इसका आचरण किया है।
श्लोक 6 (12.248.6)
ब्रह्मचर्येण वै लोकाञ्जयन्ति परमर्षयः । आत्मनश्च हृदि श्रेयो ह्यन्विच्छन्मनसाऽऽत्मनि ॥
brahmacaryeṇa vai lokāñjayanti paramarṣayaḥ | ātmanaśca hṛdi śreyo hyanvicchanmanasā''tmani
ब्रह्मचर्य से महर्षि लोकों को जीतते हैं; और मन को आत्मा में लगाकर वे हृदय में स्थित आत्मा के परम कल्याण को खोजते हैं।
श्लोक 7 (12.248.7)
वने मूलफलाशी च तप्यन्सुविपुलं तपः । पुण्यायतनचारी च भूतानामविहिंसकः ॥
vane mūlaphalāśī ca tapyansuvipulaṃ tapaḥ | puṇyāyatanacārī ca bhūtānāmavihiṃsakaḥ
वन में कन्द-मूल और फल खाता हुआ, बड़ा तप करता हुआ, पवित्र तीर्थस्थानों में विचरता हुआ और किसी प्राणी की हिंसा न करता हुआ,
श्लोक 8 (12.248.8)
विधूमे सन्नमुसले वानप्रस्थप्रतिश्रये । काले प्राप्ते चरन्भैक्षं कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥
vidhūme sannamusale vānaprasthapratiśraye | kāle prāpte caranbhaikṣaṃ kalpate brahmabhūyase
जिस वानप्रस्थ-आश्रय में न धुआँ उठता है और न मूसल चलता है, वहाँ रहकर समय आने पर भिक्षा के लिए घूमता हुआ वह ब्रह्मभाव के योग्य बनता है।
श्लोक 9 (12.248.9)
निस्तुतिर्निर्नमस्कारः परित्यज्य शुभाशुभे । अरण्ये विचरैकाकी येनकेनचिदाशितः ॥
nistutirnirnamaskāraḥ parityajya śubhāśubhe | araṇye vicaraikākī yenakenacidāśitaḥ
किसी की स्तुति और किसी को नमस्कार न करता हुआ, शुभ और अशुभ दोनों को छोड़कर, जो कुछ मिल जाए उसी से भोजन करता हुआ, वह अकेला वन में विचरे।
शुक उवाच
श्लोक 10 (12.248.10)
यदिदं वेदवचनं लोकवादे विरुध्यते । प्रमाणे चाप्रमाणे च विरुद्धे शास्त्रतः कुतः ॥
yadidaṃ vedavacanaṃ lokavāde virudhyate | pramāṇe cāpramāṇe ca viruddhe śāstrataḥ kutaḥ
यह जो वेद का वचन है, लोक की बातों से विरुद्ध पड़ता है। जब प्रमाण और अप्रमाण में विरोध हो, तब शास्त्र का प्रामाण्य कहाँ रहा?
श्लोक 11 (12.248.11)
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि प्रमाणं तूभयं कथम् । कर्मणामविरोधेन कथमेतत्प्रवर्तते ॥
ityetacchrotumicchāmi pramāṇaṃ tūbhayaṃ katham | karmaṇāmavirodhena kathametatpravartate
यही मैं सुनना चाहता हूँ कि दोनों प्रमाण कैसे हो सकते हैं, और कर्मों में बिना विरोध के यह कैसे चलता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (12.248.12)
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं गन्धवत्याः सुतः सुतम् । ऋषिस्तत्पूजयन्वाक्यं पुत्रस्यामिततेजसः ॥
ityuktaḥ pratyuvācedaṃ gandhavatyāḥ sutaḥ sutam | ṛṣistatpūjayanvākyaṃ putrasyāmitatejasaḥ
ऐसा कहे जाने पर गन्धवती के पुत्र ऋषि व्यास ने अपने अपार तेजस्वी पुत्र के वचन का आदर करते हुए उसे यह उत्तर दिया।
व्यास उवाच
श्लोक 13 (12.248.13)
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । यथोक्तकारिणः सर्वे गच्छन्ति परमां गतिम् ॥
brahmacārī gṛhasthaśca vānaprastho'tha bhikṣukaḥ | yathoktakāriṇaḥ sarve gacchanti paramāṃ gatim
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षु, ये सब जो विधि के अनुसार आचरण करते हैं, परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 14 (12.248.14)
एको वाऽप्याश्रमानेतान्योऽनुतिष्ठेद्यथाविधि । अकामद्वेषसंयुक्तः स परत्र महीयते ॥
eko vā'pyāśramānetānyo'nutiṣṭhedyathāvidhi | akāmadveṣasaṃyuktaḥ sa paratra mahīyate
जो इन आश्रमों में से केवल एक का भी विधिपूर्वक पालन करता है, और राग-द्वेष से रहित है, वह परलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 15 (12.248.15)
चतुष्पदी हि निःश्रेयणी ब्रह्मण्येषा प्रतिष्ठिता । एतामाश्रित्य निःश्रेणीं ब्रह्मलोके महीयते ॥
catuṣpadī hi niḥśreyaṇī brahmaṇyeṣā pratiṣṭhitā | etāmāśritya niḥśreṇīṃ brahmaloke mahīyate
यह चार पैरों वाली सीढ़ी है, जो ब्रह्म में प्रतिष्ठित है। इस सीढ़ी का आश्रय लेकर मनुष्य ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 16 (12.248.16)
आयुषस्तु चतुर्भागं ब्रह्मचार्यनसूयकः । गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद्धर्मार्थकोविदः ॥
āyuṣastu caturbhāgaṃ brahmacāryanasūyakaḥ | gurau vā guruputre vā vaseddharmārthakovidaḥ
आयु के चौथाई भाग तक ब्रह्मचारी निर्मत्सर होकर, धर्म और अर्थ में कुशल रहते हुए, गुरु के अथवा गुरुपुत्र के पास रहे।
श्लोक 17 (12.248.17)
जघन्यशायी पूर्वं स्यादुत्थाय गुरुवेश्मनि । यच्च शिष्येण कर्तव्यं कार्यं दासेन वा पुनः ॥
jaghanyaśāyī pūrvaṃ syādutthāya guruveśmani | yacca śiṣyeṇa kartavyaṃ kāryaṃ dāsena vā punaḥ
वह गुरु के घर में सबसे बाद सोए और सबसे पहले उठे; और जो काम शिष्य को या सेवक को करना होता है,
श्लोक 18 (12.248.18)
कृतमित्येव तत्सर्वं कृत्वा तिष्ठेत पार्श्वतः । किंकरः सर्वकारी स्यात्सर्वकर्मसु कोविदः ॥
kṛtamityeva tatsarvaṃ kṛtvā tiṣṭheta pārśvataḥ | kiṃkaraḥ sarvakārī syātsarvakarmasu kovidaḥ
वह सब कर दे, "हो गया" कहे और पास खड़ा रहे। वह सब काम करने वाला सेवक और सभी कामों में निपुण हो।
श्लोक 19 (12.248.19)
कर्मातिशेषेण गुरावध्येतव्यं बुभूषता । दक्षिणो नापवादी स्यादाहूतो गुरुमाश्रयेत् ॥
karmātiśeṣeṇa gurāvadhyetavyaṃ bubhūṣatā | dakṣiṇo nāpavādī syādāhūto gurumāśrayet
काम पूरे हो जाने पर समृद्धि चाहने वाला शिष्य गुरु के पास अध्ययन करे। वह विनम्र रहे, निन्दा न करे, और बुलाए जाने पर गुरु के पास जाए।
श्लोक 20 (12.248.20)
शुचिर्दक्षो गुणोपेतो ब्रूयादिष्टमिवान्तरा । चक्षुषा गुरुमव्यग्रो निरीक्षेत जितेन्द्रियः ॥
śucirdakṣo guṇopeto brūyādiṣṭamivāntarā | cakṣuṣā gurumavyagro nirīkṣeta jitendriyaḥ
पवित्र, कुशल और गुणवान होकर वह बीच-बीच के अवसर पर, मानो इष्ट बात ही कहे। अविचल और जितेन्द्रिय रहकर वह आँखों से गुरु की ओर ध्यान से देखता रहे।
श्लोक 21 (12.248.21)
नाभुक्तवति चाश्नीयादपीतवति नो पिबेत् । नातिष्ठति तथासीत नासुप्ते प्रस्वपेत च ॥
nābhuktavati cāśnīyādapītavati no pibet | nātiṣṭhati tathāsīta nāsupte prasvapeta ca
गुरु ने भोजन न किया हो तो वह भोजन न करे, गुरु ने पिया न हो तो न पिए; गुरु खड़े हों तो न बैठे, और गुरु जागते हों तो न सोए।
श्लोक 22 (12.248.22)
उत्तानाभ्यां च पाणिभ्यां पादावस्य मृदु स्पृशेत् । दक्षिणं दक्षिणेनैव सव्यं सव्येन पीडयेत् ॥
uttānābhyāṃ ca pāṇibhyāṃ pādāvasya mṛdu spṛśet | dakṣiṇaṃ dakṣiṇenaiva savyaṃ savyena pīḍayet
हथेलियों को ऊपर की ओर करके वह उनके चरणों को धीरे से दबाए, दाहिने चरण को दाहिने हाथ से और बाएँ को बाएँ हाथ से।
श्लोक 23 (12.248.23)
अभिवाद्य गुरुं ब्रूयादधीष्व भगवन्निति । इदं करिष्ये भगवन्निदं चापि कृतं मया ॥
abhivādya guruṃ brūyādadhīṣva bhagavanniti | idaṃ kariṣye bhagavannidaṃ cāpi kṛtaṃ mayā
गुरु को प्रणाम करके वह कहे, "भगवन्, पढ़ाइए। भगवन्, मैं यह करूँगा, और यह भी मैंने कर दिया है।"
श्लोक 24 (12.248.24)
ब्रह्मंस्तदपि कर्ताऽस्मि यद्भावन्वक्ष्यते पुनः । इति सर्वमनुज्ञाप्य निवेद्य गुरवे पुनः ॥
brahmaṃstadapi kartā'smi yadbhāvanvakṣyate punaḥ | iti sarvamanujñāpya nivedya gurave punaḥ
"ब्रह्मन्, आप आगे जो आज्ञा देंगे, वह भी मैं करूँगा।" इस प्रकार सब कुछ के लिए अनुमति लेकर और गुरु को फिर से निवेदन करके,
श्लोक 25 (12.248.25)
कुर्यात्कृत्वा च तत्सर्वमाख्येयं गुरवे पुनः । यांस्तु गन्धान्रसान्वाऽपि ब्रह्मचारी न सेवते ॥
kuryātkṛtvā ca tatsarvamākhyeyaṃ gurave punaḥ | yāṃstu gandhānrasānvā'pi brahmacārī na sevate
वह उसे करे, और सब कर चुकने पर गुरु को फिर से बताए। जिन गन्धों और रसों का ब्रह्मचारी सेवन नहीं करता,
श्लोक 26 (12.248.26)
सेवेत तान्समावृत्त इति धर्मेषु निश्चयः । ये केचिन्नियमेनोक्ता नियमा ब्रह्मचारिणः ॥
seveta tānsamāvṛtta iti dharmeṣu niścayaḥ | ye kecinniyamenoktā niyamā brahmacāriṇaḥ
उनका सेवन वह समावर्तन के बाद करे, यह धर्मशास्त्रों का निश्चय है। ब्रह्मचारी के लिए जो भी नियम कहे गए हैं,
श्लोक 27 (12.248.27)
तान्सर्वाननुगृह्णीयाद्भवेच्चानपगो गुरोः । स एवं गुरवे प्रीतिमुपहृत्य यथाबलम् ॥
tānsarvānanugṛhṇīyādbhaveccānapago guroḥ | sa evaṃ gurave prītimupahṛtya yathābalam
उन सबका पालन करे और गुरु से दूर न रहे। इस प्रकार अपनी शक्ति के अनुसार गुरु को प्रसन्न करके,
श्लोक 28 (12.248.28)
आश्रमेष्वाश्रमेष्वेवं शिष्यो वर्तते कर्मणा । वेदव्रतोपवासेन चतुर्थे चायुषो गते । गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावर्तेद्यथाविधि ॥
āśrameṣvāśrameṣvevaṃ śiṣyo vartate karmaṇā | vedavratopavāsena caturthe cāyuṣo gate | gurave dakṣiṇāṃ dattvā samāvartedyathāvidhi
इस प्रकार शिष्य हर आश्रम में अपने कर्म से आचरण करता है। वेद-व्रत और उपवास के साथ, आयु का चौथाई भाग बीत जाने पर, गुरु को दक्षिणा देकर वह विधि के अनुसार घर लौटे।
श्लोक 29 (12.248.29)
धर्मलब्धैर्युतो दारैरग्नीनुत्पाद्य यत्नतः । द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी भवेद्व्रती ॥
dharmalabdhairyuto dārairagnīnutpādya yatnataḥ | dvitīyamāyuṣo bhāgaṃ gṛhamedhī bhavedvratī
धर्म से प्राप्त पत्नी के साथ, यत्न से अग्नियों को प्रज्वलित करके, वह व्रतधारी गृहस्थ बनकर आयु का दूसरा भाग बिताए।