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शान्ति पर्व · अध्याय 251

संन्यासी (पारिव्राज्य) आश्रम का वर्णन

शुक पूछते हैं कि वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए परम पद चाहने वाला मनुष्य आत्मा को कैसे योग में लगाए। व्यास चौथे आश्रम का वर्णन करते हुए उत्तर देते हैं: संन्यासी अकेला विचरता है, बिना अग्नि और बिना घर के, दिन में एक बार थोड़ा भोजन करता है और सब निन्दा मौन रहकर सह लेता है। वे उस सच्चे ब्राह्मण के लक्षण बताते हैं जिसे देवता पहचानते हैं, सिखाते हैं कि सब धर्म अहिंसा और अभय में समाए हैं, और उस पुरुष के आन्तरिक यज्ञ का वर्णन करते हैं जो अपने प्राणों की आहुति आत्मा में देता है।

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श्रीशुक उवाच

श्लोक 1 (12.251.1)

वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा । योक्तव्योऽऽत्मा कथं शक्त्या परं वै काङ्क्षता पदम् ॥

vartamānastathaivātra vānaprasthāśrame yathā | yoktavyo''tmā kathaṃ śaktyā paraṃ vai kāṅkṣatā padam

वानप्रस्थ आश्रम में पहले की तरह रहते हुए, परम पद की इच्छा करने वाले को अपनी शक्ति के अनुसार आत्मा को कैसे योग में लगाना चाहिए?

व्यास उवाच

श्लोक 2 (12.251.2)

प्राप्य संस्कारमेताभ्यामाश्रमाभ्यां ततः परम् । यत्कार्यं परमार्थार्थं तदिहैकमनाः शृणु ॥

prāpya saṃskārametābhyāmāśramābhyāṃ tataḥ param | yatkāryaṃ paramārthārthaṃ tadihaikamanāḥ śṛṇu

इन दोनों आश्रमों से संस्कार पाकर, उसके बाद परम प्रयोजन के लिए जो करना चाहिए, उसे अब एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 3 (12.251.3)

कषायं पाचयित्वाऽऽशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु । प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् ॥

kaṣāyaṃ pācayitvā''śu śreṇisthāneṣu ca triṣu | pravrajecca paraṃ sthānaṃ pārivrājyamanuttamam

सीढ़ी के तीन स्थानों में अपने दोष को शीघ्र पकाकर, वह परम स्थान की ओर प्रव्रज्या ले, जो परिव्राजक का सर्वोत्तम आश्रम है।

श्लोक 4 (12.251.4)

तद्भवानेवमभ्यस्य वर्ततां श्रूयतां तथा । एक एव चरेद्धर्मं सिद्ध्यर्थमसहायवान् ॥

tadbhavānevamabhyasya vartatāṃ śrūyatāṃ tathā | eka eva careddharmaṃ siddhyarthamasahāyavān

इसलिए तुम इसका अभ्यास करके इसी प्रकार चलो और इसे सुनो। सिद्धि के लिए वह साथी के बिना अकेला ही धर्म का आचरण करे।

श्लोक 5 (12.251.5)

एकश्चरति यः पश्यन्न जहाति न हीयते । अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥

ekaścarati yaḥ paśyanna jahāti na hīyate | anagniraniketaśca grāmamannārthamāśrayet

जो सत्य को देखता हुआ अकेला विचरता है, वह न किसी को छोड़ता है और न छोड़ा जाता है। अग्नि और घर के बिना वह भोजन के लिए गाँव का आश्रय ले।

श्लोक 6 (12.251.6)

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमन्वितः । लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥

aśvastanavidhātā syānmunirbhāvasamanvitaḥ | laghvāśī niyatāhāraḥ sakṛdannaniṣevitā

वह कल के लिए कुछ संचय न करे, भावपूर्ण मुनि हो, हल्का और संयमित आहार करने वाला हो, और दिन में एक बार भोजन करे।

श्लोक 7 (12.251.7)

कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता । उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद्भिक्षुलक्षणम् ॥

kapālaṃ vṛkṣamūlāni kucelamasahāyatā | upekṣā sarvabhūtānāmetāvadbhikṣulakṣaṇam

मिट्टी का पात्र, वृक्षों की जड़ें, फटा-पुराना वस्त्र, कोई साथी न होना, और सब प्राणियों के प्रति उपेक्षा: बस इतना ही भिक्षु का लक्षण है।

श्लोक 8 (12.251.8)

यस्मिन्वाचः प्राविशन्ति कूपे प्राप्ताः शिला इव । न वक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥

yasminvācaḥ prāviśanti kūpe prāptāḥ śilā iva | na vaktāraṃ punaryānti sa kaivalyāśrame vaset

जिसमें शब्द कुएँ में पड़े पत्थरों की तरह प्रवेश करते हैं और बोलने वाले के पास लौटकर नहीं आते, वह कैवल्य आश्रम में निवास करे।

श्लोक 9 (12.251.9)

नैव पश्येन्न शृणुयादवाच्यं जातु कस्यचित् । ब्राह्मणानां विशेषेण नैव ब्रूयात्कथंचन ॥

naiva paśyenna śṛṇuyādavācyaṃ jātu kasyacit | brāhmaṇānāṃ viśeṣeṇa naiva brūyātkathaṃcana

वह किसी के विषय में न कहने योग्य बात को न देखे, न सुने; विशेषकर ब्राह्मणों के विषय में, और उसे किसी प्रकार भी न कहे।

श्लोक 10 (12.251.10)

यद्ब्राह्मणस्य कुशलं तदेव सततं वदेत् । तूष्णीमासीत निन्दायां कुर्वन्भैषज्यमात्मनः ॥

yadbrāhmaṇasya kuśalaṃ tadeva satataṃ vadet | tūṣṇīmāsīta nindāyāṃ kurvanbhaiṣajyamātmanaḥ

ब्राह्मण का जो कल्याण है, वही वह सदा कहे; निन्दा होने पर वह चुप रहे और उसे अपने लिए औषधि बना ले।

श्लोक 11 (12.251.11)

येन पूर्णमिवाकाशं भवत्येकेन सर्वदा । शून्यं येन जनाकीर्णं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

yena pūrṇamivākāśaṃ bhavatyekena sarvadā | śūnyaṃ yena janākīrṇaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जिस एक के कारण आकाश सदा भरा-सा लगता है और जिसके कारण जनों से भरा स्थान सूना हो जाता है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 12 (12.251.12)

येनकेनचिदाच्छन्नो येनकेनचिदाशितः । यत्र क्वचन शायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

yenakenacidācchanno yenakenacidāśitaḥ | yatra kvacana śāyī ca taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो कुछ मिल जाए उसी से ढका हुआ, जो कुछ मिल जाए उसी से भोजन करने वाला और जहाँ कहीं सो जाने वाला, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 13 (12.251.13)

अहेरिव गणाद्भीतः सन्मानान्मरणादिव । कुणपादिव च स्त्रीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

aheriva gaṇādbhītaḥ sanmānānmaraṇādiva | kuṇapādiva ca strībhyastaṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो भीड़ से साँप की तरह डरता है, सम्मान से मृत्यु की तरह, और स्त्रियों से शव की तरह, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 14 (12.251.14)

न क्रुध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः । सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

na krudhyenna prahṛṣyecca mānito'mānitaśca yaḥ | sarvabhūteṣvabhayadastaṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो मान पाकर या अपमान पाकर न क्रोध करता है और न हर्षित होता है, जो सब प्राणियों को अभय देता है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 15 (12.251.15)

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् । कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥

nābhinandeta maraṇaṃ nābhinandeta jīvitam | kālameva pratīkṣeta nideśaṃ bhṛtako yathā

वह न मृत्यु का स्वागत करे और न जीवन का; वह केवल अपने समय की प्रतीक्षा करे, जैसे नौकर स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करता है।

श्लोक 16 (12.251.16)

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग्भवेत् । निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥

anabhyāhatacittaḥ syādanabhyāhatavāgbhavet | nirmuktaḥ sarvapāpebhyo niramitrasya kiṃ bhayam

उसका चित्त क्षुब्ध न हो और उसकी वाणी भी क्षुब्ध न हो। सब पापों से मुक्त और शत्रुरहित के लिए भय कहाँ?

श्लोक 17 (12.251.17)

अभयं सर्वभूतेभ्यो भूतानामभयं यतः । तस्य मोहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥

abhayaṃ sarvabhūtebhyo bhūtānāmabhayaṃ yataḥ | tasya mohādvimuktasya bhayaṃ nāsti kutaścana

जो सब प्राणियों को अभय देता है और जिससे प्राणियों को भय नहीं होता, मोह से मुक्त उस पुरुष को कहीं से भी भय नहीं है।

श्लोक 18 (12.251.18)

यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् । सर्वाण्येवापिलीयन्ते पदजातानि कौञ्जरे ॥

yathā nāgapade'nyāni padāni padagāminām | sarvāṇyevāpilīyante padajātāni kauñjare

जैसे हाथी के पदचिह्न में चलने वाले अन्य सब प्राणियों के पदचिह्न समा जाते हैं, वैसे ही सब कुछ हाथी के मार्ग में लीन हो जाता है।

श्लोक 19 (12.251.19)

एवं सर्वमहिंसायां धर्मार्थमभिधीयते । अमृतः स नित्यं भवति यो हिंसां न प्रपद्यते ॥

evaṃ sarvamahiṃsāyāṃ dharmārthamabhidhīyate | amṛtaḥ sa nityaṃ bhavati yo hiṃsāṃ na prapadyate

इसी प्रकार सब कुछ अहिंसा में समाया हुआ है, यही धर्म का उपदेश है। जो हिंसा का आश्रय नहीं लेता, वह सदा अमर रहता है।

श्लोक 20 (12.251.20)

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान्नियतेन्द्रियः । शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥

ahiṃsakaḥ samaḥ satyo dhṛtimānniyatendriyaḥ | śaraṇyaḥ sarvabhūtānāṃ gatimāpnotyanuttamām

जो हिंसा न करने वाला, सम, सत्यवादी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय है, और सब प्राणियों का शरण्य है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 21 (12.251.21)

एवं प्रज्ञानतृप्तस्य निर्भयस्य निराशिषः । न मृत्युरतिगो भावः स मृत्युं नाधिगच्छति ॥

evaṃ prajñānatṛptasya nirbhayasya nirāśiṣaḥ | na mṛtyuratigo bhāvaḥ sa mṛtyuṃ nādhigacchati

ज्ञान से तृप्त, निर्भय और आशा से रहित ऐसे पुरुष पर मृत्यु का कोई भाव प्रबल नहीं होता; वह मृत्यु को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 22 (12.251.22)

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत्स्थितम् । अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

vimuktaṃ sarvasaṅgebhyo munimākāśavatsthitam | asvamekacaraṃ śāntaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो सब आसक्तियों से मुक्त है, आकाश के समान स्थित मुनि है, जिसका कुछ अपना नहीं, जो अकेला विचरता और शान्त है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 23 (12.251.23)

जीवितं यस्य धर्मार्थं धर्मो हर्यर्थमेव च । अहोरात्राश्च पुण्यार्थं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

jīvitaṃ yasya dharmārthaṃ dharmo haryarthameva ca | ahorātrāśca puṇyārthaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जिसका जीवन धर्म के लिए है, धर्म हरि के लिए है, और जिसके दिन-रात पुण्य के लिए हैं, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 24 (12.251.24)

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् । निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

nirāśiṣamanārambhaṃ nirnamaskāramastutim | nirmuktaṃ bandhanaiḥ sarvaistaṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो आशा से रहित है, कोई उद्यम नहीं करता, न किसी को नमस्कार करता है और न किसी की स्तुति, और सब बन्धनों से मुक्त है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।

श्लोक 25 (12.251.25)

सर्वाणि भूतानि सुखे रमन्ते । सर्वाणि दुःखस्य भृशं त्रसन्ते । तेषां भयोत्पादनजातखेदः । कुर्यान्न कर्माणि हि श्रद्दधानः ॥

sarvāṇi bhūtāni sukhe ramante | sarvāṇi duḥkhasya bhṛśaṃ trasante | teṣāṃ bhayotpādanajātakhedaḥ | kuryānna karmāṇi hi śraddadhānaḥ

सब प्राणी सुख में रमते हैं और दुःख से बहुत डरते हैं। जो उन्हें भय देने की बात से खिन्न होता है, वह श्रद्धावान् पुरुष ऐसे कर्म न करे।

श्लोक 26 (12.251.26)

दानं हि भूताभयदक्षिणायाः । सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह । तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति । सोऽनन्तमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः ॥

dānaṃ hi bhūtābhayadakṣiṇāyāḥ | sarvāṇi dānānyadhitiṣṭhatīha | tīkṣṇāṃ tanuṃ yaḥ prathamaṃ jahāti | so'nantamāpnotyabhayaṃ prajābhyaḥ

प्राणियों को अभय देने की दक्षिणा सब दानों से बढ़कर है; यह यहाँ सब दानों के ऊपर स्थित है। जो पहले अपने कठोर रूप को छोड़ देता है, वह प्राणियों की ओर से अनन्त अभय प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (12.251.27)

स दत्तमास्येन हविर्जुहोति । लोकस्य नाभिर्जगतः प्रतिष्ठा । तस्याङ्गमङ्गानि कृताकृतं च । वैश्वानरः सर्वमिदं प्रपेदे ॥

sa dattamāsyena havirjuhoti | lokasya nābhirjagataḥ pratiṣṭhā | tasyāṅgamaṅgāni kṛtākṛtaṃ ca | vaiśvānaraḥ sarvamidaṃ prapede

वह अपने मुख में दिया हुआ अन्न हवि के रूप में अर्पित करता है। वह लोक की नाभि और जगत् की प्रतिष्ठा है; उसका शरीर और उसके अंग, किया और अनकिया, यह सब वैश्वानर में प्रविष्ट है।

श्लोक 28 (12.251.28)

प्रादेशमात्रे हृदि निःसृतं यत् । तस्मिन्प्राणानात्मयाजी जुहोति । तस्याग्निहोत्रं हुतमात्मसंस्थं । सर्वेषु लोकेषु सदैवतेषु ॥

prādeśamātre hṛdi niḥsṛtaṃ yat | tasminprāṇānātmayājī juhoti | tasyāgnihotraṃ hutamātmasaṃsthaṃ | sarveṣu lokeṣu sadaivateṣu

हृदय में जो प्रादेशमात्र परिमाण का प्रकट हुआ है, उसमें आत्मयाजी अपने प्राणों की आहुति देता है। उसका अग्निहोत्र आत्मा में स्थित होकर देवताओं सहित सब लोकों में सम्पन्न होता है।

श्लोक 29 (12.251.29)

देवं त्रिधातुं त्रिवृतं सुपर्णं । ये विद्युरग्र्यां परमात्मतां च । ते सर्वलोकेषु महीयमाना । देवाः समर्था अमृतं वहन्ति ॥

devaṃ tridhātuṃ trivṛtaṃ suparṇaṃ | ye vidyuragryāṃ paramātmatāṃ ca | te sarvalokeṣu mahīyamānā | devāḥ samarthā amṛtaṃ vahanti

जो तीन धातुओं वाले, त्रिवृत् और सुपर्ण रूप देव को तथा परमात्मता की श्रेष्ठ स्थिति को जानते हैं, वे सब लोकों में सम्मानित होते हैं; वे समर्थ देवता अमरत्व को धारण करते हैं।

श्लोक 30 (12.251.30)

वेदांश्च वेद्यं तु विधिं च कृत्स्नम् । अथो निरुक्तं परमार्थतां च । सर्वं शरीरात्मनि यः प्रवेद । तस्य स्म देवाः स्पृहयन्ति नित्यम् ॥

vedāṃśca vedyaṃ tu vidhiṃ ca kṛtsnam | atho niruktaṃ paramārthatāṃ ca | sarvaṃ śarīrātmani yaḥ praveda | tasya sma devāḥ spṛhayanti nityam

जो वेदों को, जानने योग्य को, सम्पूर्ण विधि को, निरुक्त को और परमार्थ को, यह सब शरीर में स्थित आत्मा में जानता है, उसकी देवता सदा स्पृहा करते हैं।

श्लोक 31 (12.251.31)

भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेयं । हिरण्मयं योऽण्डजमण्डमध्ये । पतत्रिणं पक्षिणमन्तरिक्षे । यो वेद भोग्यात्मनि दीप्तरश्मिः ॥

bhūmāvasaktaṃ divi cāprameyaṃ | hiraṇmayaṃ yo'ṇḍajamaṇḍamadhye | patatriṇaṃ pakṣiṇamantarikṣe | yo veda bhogyātmani dīptaraśmiḥ

जो उस स्वर्णमय को जानता है, जो पृथ्वी में आसक्त नहीं और आकाश में अप्रमेय है, जो अण्ड के बीच अण्ड से उत्पन्न पक्षी है और अन्तरिक्ष में उड़ने वाला पंखधारी है, और जो भोक्ता आत्मा में दीप्त किरणों वाला है।

श्लोक 32 (12.251.32)

आवर्तमानमजरं विवर्तनं । षण्णाभिकं द्वादशारं सुपर्व । यस्येदमास्योपरि याति विश्वं । यत्कालचक्रं निहितं गुहायाम् ॥

āvartamānamajaraṃ vivartanaṃ | ṣaṇṇābhikaṃ dvādaśāraṃ suparva | yasyedamāsyopari yāti viśvaṃ | yatkālacakraṃ nihitaṃ guhāyām

घूमता हुआ, अजर, निरन्तर चलने वाला, छह नाभियों, बारह अरों और सुन्दर जोड़ों वाला कालचक्र गुहा में निहित है, और यह सारा विश्व उसके मुख के ऊपर से गुजरता है।

श्लोक 33 (12.251.33)

यः संप्रजानञ्जगतः शरीरं । सर्वान्स लोकानधिगच्छतीह । तस्मिन्हितं तर्पयतीह देवांस् । ते वै तृप्तास्तर्पयन्त्यास्यमस्य ॥

yaḥ saṃprajānañjagataḥ śarīraṃ | sarvānsa lokānadhigacchatīha | tasminhitaṃ tarpayatīha devāṃs | te vai tṛptāstarpayantyāsyamasya

जो जगत् के शरीर को भलीभाँति जानता है, वह यहीं सब लोकों को प्राप्त होता है। उसमें जो अर्पित किया जाता है, वह यहाँ देवताओं को तृप्त करता है, और वे तृप्त होकर उसके मुख को तृप्त करते हैं।

श्लोक 34 (12.251.34)

तेजोमयो नित्यमयः पुराणो । लोकाननन्तानभयानुपैति । भूतानि यस्मान्न त्रसन्ते कदाचित् । स भूतानां न त्रसते कदाचित् ॥

tejomayo nityamayaḥ purāṇo | lokānanantānabhayānupaiti | bhūtāni yasmānna trasante kadācit | sa bhūtānāṃ na trasate kadācit

तेजोमय, नित्य स्वरूप वाला और पुराण पुरुष वह अनन्त और निर्भय लोकों को प्राप्त होता है। जिससे प्राणी कभी नहीं डरते, वह स्वयं प्राणियों से कभी नहीं डरता।

श्लोक 35 (12.251.35)

अगर्हणीयो न च गर्हतेऽन्यान् । स वै विप्रः परमात्मानमीक्षेत् । विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो । न चेह नामुत्र च सोऽर्थमृच्छति ॥

agarhaṇīyo na ca garhate'nyān | sa vai vipraḥ paramātmānamīkṣet | vinītamoho vyapanītakalmaṣo | na ceha nāmutra ca so'rthamṛcchati

जो स्वयं निन्दनीय नहीं है और दूसरों की निन्दा नहीं करता, वह विप्र निश्चय ही परमात्मा का दर्शन करता है; मोह से रहित और पाप से मुक्त वह न इस लोक में और न परलोक में किसी लाभ की इच्छा करता है।

श्लोक 36 (12.251.36)

अरोषमोहः समलोष्टकाञ्चनः । प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रहः । अपेतनिन्दास्तुतिरप्रियाप्रियश् । चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥

aroṣamohaḥ samaloṣṭakāñcanaḥ | prahīṇaśoko gatasandhivigrahaḥ | apetanindāstutirapriyāpriyaś | carannudāsīnavadeṣa bhikṣukaḥ

जो क्रोध और मोह से रहित है, मिट्टी के ढेले और सोने को समान देखता है, शोकमुक्त है, सन्धि और विग्रह से परे है, निन्दा-स्तुति और प्रिय-अप्रिय से मुक्त है, और उदासीन की तरह विचरता है, वही सच्चा भिक्षु है।

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