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शान्ति पर्व · अध्याय 252

व्यास द्वारा आत्मविद्या के उपदेश का आरम्भ

व्यास अपने पुत्र शुक को बताते हैं कि सब प्राणियों में छिपा आत्मा इन्द्रियों, मन और बुद्धि से परे है और शान्त, एकाग्र मन ही उसे देख पाता है। वे इस उपदेश को वेदों का सार बताते हैं, जो दही से मक्खन की तरह निकाला गया है और जिसे केवल योग्य पुत्र या शिष्य को देना चाहिए। फिर वे शुक के प्रश्न का उत्तर देने का वचन देते हैं और आगे की शंकाएँ पूछने को कहते हैं।

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व्यास उवाच

श्लोक 1 (12.252.1)

प्रकृतेस्तु विकारा ये क्षेत्रज्ञस्तैरधिष्ठितः । न चैनं ते प्रजानन्ति स तु जानाति तानपि ॥

prakṛtestu vikārā ye kṣetrajñastairadhiṣṭhitaḥ | na cainaṃ te prajānanti sa tu jānāti tānapi

प्रकृति के जो विकार हैं, क्षेत्रज्ञ उन्हीं में अधिष्ठित रहता है। वे उसे नहीं जानते, पर वह उन्हें भी जानता है।

श्लोक 2 (12.252.2)

तैश्चैवं कुरुते कार्यं मनःषष्ठैरिहेन्द्रियैः । सुदान्तैरिव संयन्ता दृढैः परमवाजिभिः ॥

taiścaivaṃ kurute kāryaṃ manaḥṣaṣṭhairihendriyaiḥ | sudāntairiva saṃyantā dṛḍhaiḥ paramavājibhiḥ

मन को छठा लेकर इन इन्द्रियों के द्वारा ही वह यहाँ अपना कार्य करता है, जैसे सारथि भली-भाँति सधे हुए, बलवान और उत्तम घोड़ों से रथ चलाता है।

श्लोक 3 (12.252.3)

इन्द्रियेभ्यः परे ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥

indriyebhyaḥ pare hyarthā arthebhyaḥ paramaṃ manaḥ | manasastu parā buddhirbuddherātmā mahānparaḥ

इन्द्रियों से परे उनके विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे महान् आत्मा है।

श्लोक 4 (12.252.4)

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥

mahataḥ paramavyaktamavyaktātpuruṣaḥ paraḥ | puruṣānna paraṃ kiṃcitsā kāṣṭhā sā parā gatiḥ

महान् से परे अव्यक्त है और अव्यक्त से परे पुरुष है। पुरुष से परे कुछ भी नहीं है; वही अन्तिम सीमा है, वही परम गति है।

श्लोक 5 (12.252.5)

एवं सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥

evaṃ sarveṣu bhūteṣu gūḍhotmā na prakāśate | dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā sūkṣmadarśibhiḥ

इस प्रकार सब प्राणियों में छिपा हुआ आत्मा प्रकट नहीं होता; उसे सूक्ष्मदर्शी लोग तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि से ही देख पाते हैं।

श्लोक 6 (12.252.6)

अन्तरात्मनि संलीय मनः षष्ठानि मेधया । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च बहुचिन्त्यमचिन्तयन् ॥

antarātmani saṃlīya manaḥ ṣaṣṭhāni medhayā | indriyāṇīndriyārthāṃśca bahucintyamacintayan

मन को छठा लेकर सभी इन्द्रियों और उनके विषयों को विवेक से अन्तरात्मा में लीन करके, और चिन्तन योग्य बहुत-सी बातों में से किसी का भी चिन्तन न करते हुए,

श्लोक 7 (12.252.7)

ध्यानोपरमणं कृत्वा विद्यासंपादितं मनः । अनिश्चरः प्रशान्तात्मा ततोर्च्छत्यमृतं पदम् ॥

dhyānoparamaṇaṃ kṛtvā vidyāsaṃpāditaṃ manaḥ | aniścaraḥ praśāntātmā tatorcchatyamṛtaṃ padam

ध्यान को भी विराम देकर, ज्ञान से सिद्ध किए हुए मन के साथ, बाहर न भटकने वाला और शान्त चित्त वह तब अमृतपद को प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (12.252.8)

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां वश्यात्मा चलितस्मृतिः । आत्मनः संप्रदानेन मर्त्यो मृत्युमुपाश्नुते ॥

indriyāṇāṃ tu sarveṣāṃ vaśyātmā calitasmṛtiḥ | ātmanaḥ saṃpradānena martyo mṛtyumupāśnute

किन्तु जिसका मन सब इन्द्रियों के वश में है और जिसकी स्मृति डिग गई है, वह मरणशील मनुष्य अपने आपको उन्हें सौंप देने से मृत्यु को प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (12.252.9)

हित्वा तु सर्वसंकल्पान्सत्वे चित्तं निवेशयेत् । सत्वे चित्तं समावेश्य ततः कालंजरो भवेत् ॥

hitvā tu sarvasaṃkalpānsatve cittaṃ niveśayet | satve cittaṃ samāveśya tataḥ kālaṃjaro bhavet

सब संकल्पों को छोड़कर वह चित्त को सत्त्व में स्थिर करे; चित्त को सत्त्व में स्थिर कर लेने पर वह काल को जीतने वाला हो जाता है।

श्लोक 10 (12.252.10)

चित्तप्रसादेन यतिर्जहातीह शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमत्यन्तमश्नुते ॥

cittaprasādena yatirjahātīha śubhāśubham | prasannātmātmani sthitvā sukhamatyantamaśnute

चित्त की प्रसन्नता से संन्यासी यहीं शुभ और अशुभ दोनों को त्याग देता है; प्रसन्न आत्मा वाला वह आत्मा में स्थित होकर अनन्त सुख का भोग करता है।

श्लोक 11 (12.252.11)

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते ॥

lakṣaṇaṃ tu prasādasya yathā tṛptaḥ sukhaṃ svapet | nivāte vā yathā dīpo dīpyamāno na kampate

उस प्रसन्नता का लक्षण यह है: जैसे तृप्त मनुष्य सुख से सोता है, या जैसे वायुरहित स्थान में जलता दीपक काँपता नहीं।

श्लोक 12 (12.252.12)

एवं पूर्वापरे रात्रौ युञ्जन्नात्मानमात्मनि । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥

evaṃ pūrvāpare rātrau yuñjannātmānamātmani | laghvāhāro viśuddhātmā paśyatyātmānamātmani

इसी प्रकार रात के पहले और पिछले पहर में आत्मा को आत्मा में लगाता हुआ, हल्का आहार लेने वाला और शुद्ध अन्तःकरण वाला वह आत्मा में आत्मा को देखता है।

श्लोक 13 (12.252.13)

रहस्यं सर्ववेदानामनैतिह्यमनागतम् । आत्मप्रत्ययिकं शास्त्रमिदं पुत्रानुशासनम् ॥

rahasyaṃ sarvavedānāmanaitihyamanāgatam | ātmapratyayikaṃ śāstramidaṃ putrānuśāsanam

यह सब वेदों का रहस्य है; यह न किंवदन्ती पर टिका है, न बाहर से आया है। यह आत्मानुभव से प्रमाणित शास्त्र है, पुत्र को दिया जाने वाला उपदेश।

श्लोक 14 (12.252.14)

धर्माख्यानेषु सर्वेषु चित्राख्यानेषु यद्वसु । दृश्यते ऋक्सहस्राणि निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् ॥

dharmākhyāneṣu sarveṣu citrākhyāneṣu yadvasu | dṛśyate ṛksahasrāṇi nirmathyāmṛtamuddhṛtam

धर्म की सब कथाओं और विविध आख्यानों में हजारों ऋचाओं के रूप में जो भी धन दिखाई देता है, उसे मथकर यह अमृत निकाला गया है।

श्लोक 15 (12.252.15)

नवनीतं यथा दध्नः काष्ठादग्निर्यथैव च । तथैव विदुषां ज्ञानं पुत्रहेतोः समुद्धृतम् ॥

navanītaṃ yathā dadhnaḥ kāṣṭhādagniryathaiva ca | tathaiva viduṣāṃ jñānaṃ putrahetoḥ samuddhṛtam

जैसे दही से मक्खन और काठ से अग्नि निकाली जाती है, वैसे ही विद्वानों का ज्ञान पुत्र के लिए निकाला गया है।

श्लोक 16 (12.252.16)

स्नातकानामिदं शास्त्रं वाच्यं पुत्रानुशासनम् । तदिदं नाप्रशान्ताय नादान्तायातपस्विने ॥

snātakānāmidaṃ śāstraṃ vācyaṃ putrānuśāsanam | tadidaṃ nāpraśāntāya nādāntāyātapasvine

पुत्र को दिया जाने वाला यह शास्त्र स्नातकों से कहना चाहिए। यह उससे नहीं कहना चाहिए जो अशान्त हो, जिसने इन्द्रियों को वश में न किया हो और जो तपस्वी न हो,

श्लोक 17 (12.252.17)

नावेदविदुषे वाच्यं तथा नानुगताय च । नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे ॥

nāvedaviduṣe vācyaṃ tathā nānugatāya ca | nāsūyakāyānṛjave na cānirdiṣṭakāriṇe

न उससे जिसने वेद न पढ़ा हो, न अनुगत न रहने वाले से, न ईर्ष्यालु से, न कुटिल से और न आज्ञा के अनुसार न चलने वाले से कहना चाहिए,

श्लोक 18 (12.252.18)

न तर्कशास्त्रदग्धाय तथैव पिशुनाय च । श्लाघिने श्लाघनीयाय प्रशान्ताय तपस्विने ॥

na tarkaśāstradagdhāya tathaiva piśunāya ca | ślāghine ślāghanīyāya praśāntāya tapasvine

न तर्कशास्त्र से जले हुए से, न चुगलखोर से; बल्कि प्रशंसा करने वाले, प्रशंसा के योग्य, शान्त और तपस्वी से कहना चाहिए।

श्लोक 19 (12.252.19)

इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च । रहस्यधर्मं वक्तव्यं नान्यस्मै तु कथंचन ॥

idaṃ priyāya putrāya śiṣyāyānugatāya ca | rahasyadharmaṃ vaktavyaṃ nānyasmai tu kathaṃcana

यह रहस्यमय धर्म प्रिय पुत्र, शिष्य और अनुगत को बताना चाहिए, किसी और को किसी भी प्रकार नहीं।

श्लोक 20 (12.252.20)

यद्यप्यस्य महीं दद्याद्रत्नपूर्णामिमां नरः । इदमेव ततः श्रेय इति मन्येत तत्त्ववित् ॥

yadyapyasya mahīṃ dadyādratnapūrṇāmimāṃ naraḥ | idameva tataḥ śreya iti manyeta tattvavit

यदि कोई मनुष्य रत्नों से भरी यह सारी पृथ्वी भी इसे दे दे, तब भी तत्त्वज्ञानी यही माने कि यही उपदेश उससे श्रेष्ठ है।

श्लोक 21 (12.252.21)

अतो गुह्यतरार्थं तदध्यात्ममतिमानुषम् । यत्तन्महर्षिभिर्जुष्टं वेदान्तेषु च गीयते ॥

ato guhyatarārthaṃ tadadhyātmamatimānuṣam | yattanmaharṣibhirjuṣṭaṃ vedānteṣu ca gīyate

इससे भी अधिक गूढ़ अर्थ वाला वह आध्यात्मिक ज्ञान है, जो मनुष्य की पहुँच से परे है, जिसे महर्षियों ने अपनाया है और जो वेदान्त में गाया जाता है।

श्लोक 22 (12.252.22)

तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

जो तुम मुझसे पूछ रहे हो, वही मैं तुम्हें अब विस्तार से बताऊँगा।

श्लोक 23 (12.252.23)

यच्च ते मनसि वर्तते परं । यत्र चास्ति तव संशयः क्वचित् । श्रूयतामयमहं तवाग्रतः । पुत्र किं हि कथयामि ते पुनः ॥

yacca te manasi vartate paraṃ | yatra cāsti tava saṃśayaḥ kvacit | śrūyatāmayamahaṃ tavāgrataḥ | putra kiṃ hi kathayāmi te punaḥ

तुम्हारे मन में जो और कुछ है और जहाँ कहीं भी तुम्हें संशय है, वह कहा जाए; मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ। बेटा, मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?

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