शान्ति पर्व · अध्याय 253
तत्त्व, इन्द्रियाँ और तीन गुण
शुक व्यास से आत्मज्ञान को विस्तार से समझाने को कहते हैं। व्यास बताते हैं कि समुद्र की लहरों की तरह पाँच महाभूत शरीर और इन्द्रियों को रचते हैं, हर भूत के गुण और अंग क्या हैं, और बुद्धि मन तथा इन्द्रियों को वैसे ही संयम में रखती है जैसे कछुआ अपने अंग समेट लेता है। अन्त में वे सत्त्व, रजस् और तमस् के लक्षण बताते हैं।
शुक उवाच
श्लोक 1 (12.253.1)
अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे । यदध्यात्मं यथा वेद भगवन्नृषिसत्तम ॥
adhyātmaṃ vistareṇeha punareva vadasva me | yadadhyātmaṃ yathā veda bhagavannṛṣisattama
हे भगवन्, ऋषिश्रेष्ठ, अध्यात्म को मुझे फिर विस्तार से बताइए: वह क्या है और कैसे जाना जाता है।
व्यास उवाच
श्लोक 2 (12.253.2)
अध्यात्मं यदिदं तात पुरुषस्येह विद्यते । तत्तेऽहं वर्तयिष्यामि तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥
adhyātmaṃ yadidaṃ tāta puruṣasyeha vidyate | tatte'haṃ vartayiṣyāmi tasya vyākhyāmimāṃ śṛṇu
तात, मनुष्य में जो यह अध्यात्म है, उसकी व्याख्या मैं तुम्हें बताता हूँ; इसे सुनो।
श्लोक 3 (12.253.3)
भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाश एव च । महाभूतानि भूतानां सागरस्योर्मयो यथा ॥
bhūmirāpastathā jyotirvāyurākāśa eva ca | mahābhūtāni bhūtānāṃ sāgarasyormayo yathā
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश प्राणियों के महाभूत हैं, जैसे समुद्र की लहरें होती हैं।
श्लोक 4 (12.253.4)
प्रसार्येह यथाऽङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः । तद्वन्महान्ति भूतानि यवीयःसु विकुर्वते ॥
prasāryeha yathā'ṅgāni kūrmaḥ saṃharate punaḥ | tadvanmahānti bhūtāni yavīyaḥsu vikurvate
जैसे कछुआ अपने अंग फैलाकर फिर समेट लेता है, वैसे ही महाभूत छोटे भूतों में विकार रूप धारण करते हैं।
श्लोक 5 (12.253.5)
इति तन्मयमेवेदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् । सर्गे च प्रलये चैव तस्मिन्निर्दिश्यते तथा ॥
iti tanmayamevedaṃ sarvaṃ sthāvarajaṅgamam | sarge ca pralaye caiva tasminnirdiśyate tathā
इस प्रकार यह सब चराचर उन्हीं से बना है; सृष्टि और प्रलय में भी उसका निर्देश उन्हीं के रूप में होता है।
श्लोक 6 (12.253.6)
महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् । अकरोत्तात वैषम्यं यस्मिन्यदनुपश्यति ॥
mahābhūtāni pañcaiva sarvabhūteṣu bhūtakṛt | akarottāta vaiṣamyaṃ yasminyadanupaśyati
तात, भूतों के रचयिता ने पाँचों महाभूतों को सब प्राणियों में विषम बनाया, जिसमें जो उचित देखा उसी के अनुसार।
शुक उवाच
श्लोक 7 (12.253.7)
अकरोद्यच्छरीरेषु कथं तदुपलक्षयेत् । इन्द्रियाणि गुणाः केचित्कथं तानुपलक्षयेत् ॥
akarodyaccharīreṣu kathaṃ tadupalakṣayet | indriyāṇi guṇāḥ kecitkathaṃ tānupalakṣayet
उसने शरीरों में जो बनाया है, उसे कैसे पहचाना जाए? और इन्द्रियों तथा कुछ गुणों को कैसे पहचाना जाए?
व्यास उवाच
श्लोक 8 (12.253.8)
एतत्ते वर्तयिष्यामि यथावदनुपूर्वकः । शृणु तत्त्वमिहैकाग्रो यथा तत्त्वं यथा च तत् ॥
etatte vartayiṣyāmi yathāvadanupūrvakaḥ | śṛṇu tattvamihaikāgro yathā tattvaṃ yathā ca tat
यह मैं तुम्हें क्रम से, ठीक जैसा है वैसा बताऊँगा। यहाँ एकाग्र होकर सुनो कि तत्त्व जैसा है और जिस प्रकार है।
श्लोक 9 (12.253.9)
शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसंभवम् । प्राणश्चेष्टा तथा स्पर्श एते वायुगुणास्त्रयः ॥
śabdaḥ śrotraṃ tathā khāni trayamākāśasaṃbhavam | prāṇaśceṣṭā tathā sparśa ete vāyuguṇāstrayaḥ
शब्द, श्रोत्र और शरीर के छिद्र, ये तीनों आकाश से उत्पन्न हैं। प्राण, चेष्टा और स्पर्श, ये तीनों वायु के गुण हैं।
श्लोक 10 (12.253.10)
रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिधा ज्योतिर्विधीयते । रसोऽथ रसनं स्नेहो गुणास्त्वेते त्रयोऽम्भसः ॥
rūpaṃ cakṣurvipākaśca tridhā jyotirvidhīyate | raso'tha rasanaṃ sneho guṇāstvete trayo'mbhasaḥ
रूप, नेत्र और पाचन, इस प्रकार अग्नि तीन रूपों में निर्धारित है। रस, जिह्वा और स्नेह, ये तीनों जल के गुण हैं।
श्लोक 11 (12.253.11)
घ्रेयं घ्राणं शरीरं च भूमेरेते गुणास्त्रयः । श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी ॥
ghreyaṃ ghrāṇaṃ śarīraṃ ca bhūmerete guṇāstrayaḥ | śrotraṃ tvakcakṣuṣī jihvā nāsikā caiva pañcamī
सूँघने योग्य वस्तु, घ्राण और शरीर, ये तीनों पृथ्वी के गुण हैं। श्रोत्र, त्वचा, दोनों नेत्र, जिह्वा और पाँचवीं नासिका।
श्लोक 12 (12.253.12)
एतावानिन्द्रियग्रामो व्याख्यातः पाञ्चभौतिकः । वायोः स्पर्शो रसोऽद्भ्यश्च ज्योतिषो रूपमुच्यते । आकाशप्रभवः शब्दो गन्धो भूमिगुणः स्मृतः ॥
etāvānindriyagrāmo vyākhyātaḥ pāñcabhautikaḥ | vāyoḥ sparśo raso'dbhyaśca jyotiṣo rūpamucyate | ākāśaprabhavaḥ śabdo gandho bhūmiguṇaḥ smṛtaḥ
यही पाँच भूतों से बना इन्द्रियों का समूह बताया गया। वायु का स्पर्श, जल का रस, और अग्नि का रूप कहा जाता है; शब्द आकाश से उत्पन्न होता है और गन्ध पृथ्वी का गुण माना गया है।
श्लोक 13 (12.253.13)
मनो बुद्धिः स्वभावश्च त्रय एते मनोमयाः । न गुणानतिवर्तन्ते गुणेभ्यः परमागताः ॥
mano buddhiḥ svabhāvaśca traya ete manomayāḥ | na guṇānativartante guṇebhyaḥ paramāgatāḥ
मन, बुद्धि और स्वभाव, ये तीनों मन से बने हैं। ये गुणों से ऊपर पहुँचे हुए होने पर भी गुणों का अतिक्रमण नहीं करते।
श्लोक 14 (12.253.14)
यथा कूर्म इहाङ्गानि प्रसार्य विनियच्छति । एवमेवेन्द्रियग्रामं बुद्धिः सृष्ट्वा नियच्छति ॥
yathā kūrma ihāṅgāni prasārya viniyacchati | evamevendriyagrāmaṃ buddhiḥ sṛṣṭvā niyacchati
जैसे कछुआ अपने अंग फैलाकर फिर उन्हें रोक लेता है, वैसे ही बुद्धि इन्द्रियों के समूह को रचकर उसे नियन्त्रित करती है।
श्लोक 15 (12.253.15)
यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ्मूर्ध्नश्च पश्यति । एतस्मिन्नेव कृत्ये तु वर्तते बुद्धिरुत्तमा ॥
yadūrdhvaṃ pādatalayoravāṅmūrdhnaśca paśyati | etasminneva kṛtye tu vartate buddhiruttamā
पैरों के तलवों से ऊपर और सिर से नीचे जो कुछ वह देखती है, उसी कार्य में सर्वोत्तम बुद्धि लगी रहती है।
श्लोक 16 (12.253.16)
गुणान्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाण्यपि । मनः षष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ॥
guṇānnenīyate buddhirbuddhirevendriyāṇyapi | manaḥ ṣaṣṭhāni sarvāṇi buddhyabhāve kuto guṇāḥ
बुद्धि ही गुणों को आगे ले जाती है और बुद्धि ही मन को छठा लेकर सब इन्द्रियों को भी चलाती है। बुद्धि के अभाव में गुण कहाँ?
श्लोक 17 (12.253.17)
इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते । सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञं पुनरष्टमम् ॥
indriyāṇi nare pañca ṣaṣṭhaṃ tu mana ucyate | saptamīṃ buddhimevāhuḥ kṣetrajñaṃ punaraṣṭamam
मनुष्य में पाँच इन्द्रियाँ हैं, मन को छठा कहा जाता है, बुद्धि को सातवाँ बताते हैं और क्षेत्रज्ञ को आठवाँ।
श्लोक 18 (12.253.18)
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः । बुद्धिरध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥
cakṣurālocanāyaiva saṃśayaṃ kurute manaḥ | buddhiradhyavasānāya sākṣī kṣetrajña ucyate
नेत्र देखने के लिए है, मन संशय उठाता है, बुद्धि निश्चय करने के लिए है और क्षेत्रज्ञ साक्षी कहा जाता है।
श्लोक 19 (12.253.19)
रजस्तमश्च सत्वं च त्रय एते स्वयोनिजाः । समाः सर्वेषु भूतेषु तान्गुणानुपलक्षयेत् ॥
rajastamaśca satvaṃ ca traya ete svayonijāḥ | samāḥ sarveṣu bhūteṣu tānguṇānupalakṣayet
रजस्, तमस् और सत्त्व, ये तीनों अपने ही कारण से उत्पन्न हैं और सब प्राणियों में समान रूप से रहते हैं। उन गुणों को पहचानना चाहिए।
श्लोक 20 (12.253.20)
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किंचिदात्मनि लक्षयेत् । प्रशान्तमिव संशुद्धं सत्वं तदुपधारयेत् ॥
tatra yatprītisaṃyuktaṃ kiṃcidātmani lakṣayet | praśāntamiva saṃśuddhaṃ satvaṃ tadupadhārayet
इनमें जो कुछ अपने भीतर प्रीति से युक्त, मानो शान्त और निर्मल दिखाई दे, उसे सत्त्व समझे।
श्लोक 21 (12.253.21)
यत्तु संतापसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । प्रवृत्तं रज इत्येवं तत्र चाप्युपलक्षयेत् ॥
yattu saṃtāpasaṃyuktaṃ kāye manasi vā bhavet | pravṛttaṃ raja ityevaṃ tatra cāpyupalakṣayet
और जो शरीर या मन में सन्ताप से युक्त हो और प्रवृत्त हो रहा हो, उसे वहाँ रजस् समझे।
श्लोक 22 (12.253.22)
यत्तु संमोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधार्यताम् ॥
yattu saṃmohasaṃyuktamavyaktaviṣayaṃ bhavet | apratarkyamavijñeyaṃ tamastadupadhāryatām
और जो मोह से युक्त हो, जिसका विषय अव्यक्त हो, जो तर्क से परे और अज्ञेय हो, उसे तमस् समझा जाए।
श्लोक 23 (12.253.23)
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः साम्यं स्वस्थात्मचित्तता । अकस्माद्यदि वा कस्माद्वर्तन्ते सात्विका गुणाः ॥
praharṣaḥ prītirānandaḥ sāmyaṃ svasthātmacittatā | akasmādyadi vā kasmādvartante sātvikā guṇāḥ
हर्ष, प्रीति, आनन्द, समता और स्वस्थ चित्त, ये जब अचानक या किसी कारण से उत्पन्न हों, तब सत्त्व के गुण होते हैं।
श्लोक 24 (12.253.24)
अभिमानो मृषावादो लोभो मोहस्तथाऽक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानि वर्तन्ते हेत्वहेतुतः ॥
abhimāno mṛṣāvādo lobho mohastathā'kṣamā | liṅgāni rajasastāni vartante hetvahetutaḥ
अभिमान, झूठ बोलना, लोभ, मोह और असहनशीलता, ये रजस् के लक्षण हैं और ये कारण से या बिना कारण के प्रकट होते हैं।
श्लोक 25 (12.253.25)
तथा मोहः प्रमादश्च निद्रा तन्द्रा प्रबोधिता । कथंचिदभिवर्तन्ते विज्ञेयास्तामसा गुणाः ॥
tathā mohaḥ pramādaśca nidrā tandrā prabodhitā | kathaṃcidabhivartante vijñeyāstāmasā guṇāḥ
तथा मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और जागृति, ये किसी-न-किसी प्रकार प्रकट होते हैं; इन्हें तमस् के गुण जानना चाहिए।