शान्ति पर्व · अध्याय 254
बुद्धि, इन्द्रियाँ और क्षेत्रज्ञ
व्यास समझाते हैं कि एक ही बुद्धि कार्य करते समय मन और अलग-अलग इन्द्रियों का रूप ले लेती है, और आत्मा इन सबके पीछे स्थित है। मन से इन्द्रियों की लगाम खींचने पर ही आत्मा उसी तरह दिखाई देता है जैसे दीपक के प्रकाश में कोई आकृति, और योगी गुणों से उसी तरह अलिप्त रहता है जैसे जल का पक्षी जल से। अन्त में वे गुणों को रचने वाले सत्त्व और केवल देखने वाले क्षेत्रज्ञ का भेद बताते हैं, जो फिर भी सदा साथ-साथ रहते हैं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.254.1)
मनः प्रसृजते भावं बुद्धिरध्यवसायिनी । हृदयं प्रियाप्रिये वेद त्रिविधा कर्मवेदना ॥
manaḥ prasṛjate bhāvaṃ buddhiradhyavasāyinī | hṛdayaṃ priyāpriye veda trividhā karmavedanā
मन भाव को उत्पन्न करता है, बुद्धि निश्चय करती है और हृदय प्रिय-अप्रिय को जानता है; इस प्रकार कर्म का अनुभव तीन प्रकार का है।
श्लोक 2 (12.254.2)
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा परो मतः ॥
indriyebhyaḥ parā hyarthā arthebhyaḥ paramaṃ manaḥ | manasastu parā buddhirbuddherātmā paro mataḥ
इन्द्रियों से परे उनके विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे आत्मा माना गया है।
श्लोक 3 (12.254.3)
बुद्धिरात्मा मनुष्यस्य बुद्धिरेवात्मनो गतिः । यदा विकुरुते भावं तदा भवति सा मनः ॥
buddhirātmā manuṣyasya buddhirevātmano gatiḥ | yadā vikurute bhāvaṃ tadā bhavati sā manaḥ
बुद्धि ही मनुष्य का आत्मा है, बुद्धि ही आत्मा की गति है। जब वह भाव को बदलती है, तब वही मन हो जाती है।
श्लोक 4 (12.254.4)
इन्द्रियाणां पृथग्भावाद्बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत् । शृण्वती भवति श्रोत्रं स्पृशती स्पर्श उच्यते ॥
indriyāṇāṃ pṛthagbhāvādbuddhirvikriyate'sakṛt | śṛṇvatī bhavati śrotraṃ spṛśatī sparśa ucyate
इन्द्रियों के अलग-अलग होने से बुद्धि बार-बार रूप बदलती है: सुनती हुई वह श्रोत्र बन जाती है और छूती हुई स्पर्श कहलाती है।
श्लोक 5 (12.254.5)
पश्यती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् । जिघ्रती भवति घ्राणं बुद्धिर्विक्रियते पृथक् ॥
paśyatī bhavate dṛṣṭī rasatī rasanaṃ bhavet | jighratī bhavati ghrāṇaṃ buddhirvikriyate pṛthak
देखती हुई वह नेत्र बन जाती है, चखती हुई जिह्वा, सूँघती हुई घ्राण। इस प्रकार बुद्धि अलग-अलग रूप धारण करती है।
श्लोक 6 (12.254.6)
इन्द्रियाणीति तान्याहुस्तेष्वदृश्योऽधितिष्ठति । तिष्ठती पुरुषे बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ॥
indriyāṇīti tānyāhusteṣvadṛśyo'dhitiṣṭhati | tiṣṭhatī puruṣe buddhistriṣu bhāveṣu vartate
इन्हें इन्द्रियाँ कहते हैं और इनमें अदृश्य अधिष्ठाता रहता है। पुरुष में स्थित बुद्धि तीन भावों में प्रवृत्त होती है।
श्लोक 7 (12.254.7)
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति । न सुखेन न दुःखेन कदाचिदिह युज्यते ॥
kadācillabhate prītiṃ kadācidapi śocati | na sukhena na duḥkhena kadācidiha yujyate
कभी वह प्रीति पाती है, कभी शोक करती है; कभी यहाँ वह न सुख से जुड़ती है न दुःख से।
श्लोक 8 (12.254.8)
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेताननुवर्तते । सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥
seyaṃ bhāvātmikā bhāvāṃstrīnetānanuvartate | saritāṃ sāgaro bhartā mahāvelāmivormimān
भावस्वरूप यह बुद्धि इन तीनों भावों का अनुसरण करती है, जैसे नदियों का स्वामी तरंगों से भरा समुद्र अपनी विशाल तटरेखा का।
श्लोक 9 (12.254.9)
यदा प्रार्थयते किंचित्तदा भवति सा मनः । अधिष्ठानानि वै बुद्ध्यां पृथगेतानि संस्मरेत । इन्द्रियाण्येवमेतानि विजेतव्यानि कृत्स्नशः ॥
yadā prārthayate kiṃcittadā bhavati sā manaḥ | adhiṣṭhānāni vai buddhyāṃ pṛthagetāni saṃsmareta | indriyāṇyevametāni vijetavyāni kṛtsnaśaḥ
जब वह कुछ चाहती है, तब वह मन हो जाती है। बुद्धि में स्थित इन अधिष्ठानों को अलग-अलग स्मरण करना चाहिए; इसी प्रकार इन इन्द्रियों को पूरी तरह जीतना चाहिए।
श्लोक 10 (12.254.10)
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण यद्यदाऽनुविधीयते । अविभागगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते । प्रवर्तमानं तु रजः सत्वमप्यनुवर्तते ॥
sarvāṇyevānupūrvyeṇa yadyadā'nuvidhīyate | avibhāgagatā buddhirbhāve manasi vartate | pravartamānaṃ tu rajaḥ satvamapyanuvartate
क्रम से जब-जब जिसका अनुसरण किया जाता है, तब अविभक्त बुद्धि मन के भाव में स्थित रहती है; और जब रजस् प्रवृत्त होता है, तब सत्त्व भी उसके पीछे चलता है।
श्लोक 11 (12.254.11)
ये चैव भावा वर्तन्ते सर्व एष्वेव ते त्रिषु । अन्वर्थाः संप्रवर्तन्ते रथनेमिमरा इव ॥
ye caiva bhāvā vartante sarva eṣveva te triṣu | anvarthāḥ saṃpravartante rathanemimarā iva
जो भी भाव हैं, वे सब इन्हीं तीनों में हैं; वे अपने प्रयोजन के अनुसार चलते हैं, जैसे रथ के पहिए की नेमि में आरे जुड़े होते हैं।
श्लोक 12 (12.254.12)
प्रदीपार्थं मनः कुर्यादिन्द्रियैर्बुद्धिसत्तमैः । निश्चरद्भिर्यथायोगमुदासीनैर्यदृच्छया ॥
pradīpārthaṃ manaḥ kuryādindriyairbuddhisattamaiḥ | niścaradbhiryathāyogamudāsīnairyadṛcchayā
मन को उन इन्द्रियों के द्वारा प्रकाश का काम करना चाहिए जो उत्तम बुद्धि के अधीन हैं और जो यथायोग्य बाहर निकलती हैं, उदासीन और अनायास।
श्लोक 13 (12.254.13)
एवं स्वभावमेवेदमिति विद्वान्न मुह्यति । अशोचन्नप्रहृष्यन्हि नित्यं विगतमत्सरः ॥
evaṃ svabhāvamevedamiti vidvānna muhyati | aśocannaprahṛṣyanhi nityaṃ vigatamatsaraḥ
यह सब इसका स्वभाव ही है, ऐसा जानने वाला विद्वान् मोहित नहीं होता; वह शोक और हर्ष से रहित और सदा मत्सरमुक्त रहता है।
श्लोक 14 (12.254.14)
न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियैः कामगोचरैः । प्रवर्तमानैरनयैर्दुर्धर्षैरकृतात्मभिः ॥
na cātmā śakyate draṣṭumindriyaiḥ kāmagocaraiḥ | pravartamānairanayairdurdharṣairakṛtātmabhiḥ
कामनाओं के विषयों में विचरने वाली, अनुचित मार्ग पर जाने वाली और अजितात्मा लोगों के लिए दुर्दम्य इन्द्रियों से आत्मा नहीं देखा जा सकता।
श्लोक 15 (12.254.15)
तेषां तु मनसा रश्मीन्यदा सम्यङ्नियच्छति । तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा दीपदीप्ता यथाऽऽकृतिः ॥
teṣāṃ tu manasā raśmīnyadā samyaṅniyacchati | tadā prakāśate'syātmā dīpadīptā yathā''kṛtiḥ
जब मन से उनकी लगामें भली-भाँति खींच ली जाती हैं, तब आत्मा प्रकाशित होता है, जैसे दीपक से प्रकाशित कोई आकृति।
श्लोक 16 (12.254.16)
सर्वेषामेव भूतानां मनस्युपरते यथा । प्रकाशं भवते सर्वं तथेदमुपधार्यताम् ॥
sarveṣāmeva bhūtānāṃ manasyuparate yathā | prakāśaṃ bhavate sarvaṃ tathedamupadhāryatām
जैसे सब प्राणियों का मन शान्त हो जाने पर सब कुछ प्रकाशमान हो जाता है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिए।
श्लोक 17 (12.254.17)
यथा वारिचरः पक्षी न लिप्यति जले चरन् । विमुक्तात्मा तथा योगी गुणदोषैर्न लिप्यते ॥
yathā vāricaraḥ pakṣī na lipyati jale caran | vimuktātmā tathā yogī guṇadoṣairna lipyate
जैसे जल में विचरने वाला पक्षी जल से लिप्त नहीं होता, वैसे ही मुक्तात्मा योगी गुणों के दोषों से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 18 (12.254.18)
एवमेव कृतप्रज्ञो न दोषैर्विषयांश्चरन् । असज्जमानः सर्वेषु कथंचन न लिप्यते ॥
evameva kṛtaprajño na doṣairviṣayāṃścaran | asajjamānaḥ sarveṣu kathaṃcana na lipyate
इसी प्रकार जिसकी बुद्धि परिपक्व हो गई है, वह विषयों में विचरता हुआ भी उनके दोषों से लिप्त नहीं होता; किसी में आसक्त न होकर वह किसी प्रकार भी लिप्त नहीं होता।
श्लोक 19 (12.254.19)
त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्य सदाऽऽत्मनि । सर्वभूतात्मभूतस्य गुणवर्गेष्वसज्जतः ॥
tyaktvā pūrvakṛtaṃ karma ratiryasya sadā''tmani | sarvabhūtātmabhūtasya guṇavargeṣvasajjataḥ
जो पहले किए हुए कर्मों को छोड़कर सदा आत्मा में रमता है, जो सब प्राणियों का आत्मभूत हो गया है और गुणों के समूहों में आसक्त नहीं होता:
श्लोक 20 (12.254.20)
सत्वमात्मा प्रसरति गुणान्वाऽपि कदाचन । न गुणा विदुरात्मानं गुणान्वेद स सर्वदा ॥
satvamātmā prasarati guṇānvā'pi kadācana | na guṇā vidurātmānaṃ guṇānveda sa sarvadā
कभी आत्मा सत्त्व में या अन्य गुणों में फैलता है; फिर भी गुण आत्मा को नहीं जानते, जबकि वह गुणों को सदा जानता है।
श्लोक 21 (12.254.21)
परिद्रष्टा गुणानां च परिस्रष्टा यथातथम् । सत्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयोः ॥
paridraṣṭā guṇānāṃ ca parisraṣṭā yathātatham | satvakṣetrajñayoretadantaraṃ viddhi sūkṣmayoḥ
एक गुणों का द्रष्टा है और दूसरा यथार्थ रूप से उनका रचयिता। सत्त्व और क्षेत्रज्ञ, इन दोनों सूक्ष्म तत्त्वों का यही भेद जानो।
श्लोक 22 (12.254.22)
सृजतेऽत्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् । पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ संप्रयुक्तौ च सर्वदा ॥
sṛjate'tra guṇāneka eko na sṛjate guṇān | pṛthagbhūtau prakṛtyā tau saṃprayuktau ca sarvadā
यहाँ एक गुणों को रचता है, दूसरा गुणों को नहीं रचता; स्वभाव से दोनों अलग हैं, फिर भी सदा साथ जुड़े हुए हैं।
श्लोक 23 (12.254.23)
यथा मत्स्योऽद्भिरन्यः स्यात्संप्रयुक्तौ तथैव तौ । मशकोदुम्बरौ वाऽपि संप्रयुक्तौ यथा सह ॥
yathā matsyo'dbhiranyaḥ syātsaṃprayuktau tathaiva tau | maśakodumbarau vā'pi saṃprayuktau yathā saha
जैसे मछली जल से भिन्न होकर भी उससे जुड़ी रहती है, वैसे ही वे दोनों जुड़े हैं; या जैसे मच्छर और गूलर साथ-साथ रहते हैं।
श्लोक 24 (12.254.24)
इषीका वा यथा मुञ्जे पृथक्च सह चैव च । तथैव सहितावेतावन्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ ॥
iṣīkā vā yathā muñje pṛthakca saha caiva ca | tathaiva sahitāvetāvanyonyasminpratiṣṭhitau
अथवा जैसे मूँज में सींक अलग भी है और साथ भी, वैसे ही ये दोनों साथ-साथ हैं और एक-दूसरे में प्रतिष्ठित हैं।